गुरुवार, 28 जुलाई 2016

रागिनी मिश्रा एवं पूजा सिंह की नजर में कांच के शामियाने

 रागिनी मिश्रा ,तुमने तो निःशब्द कर दिया ।सुबह चार बजे उठ कर घर का काम खत्म करने के बाद स्कूल की प्रिंसिपल का जिम्मेवारी भरा कर्तव्य निभा, फिर एक ही सिटिंग पूरा उपन्यास भी पढ़ लिया ।पाठकों का यही प्यार बस मेरी पूँजी है और गहरी जिम्मेवारी का भी आभास करवाती है ।'शिवानी' जैसी प्रसिद्ध लेखिका का जिक्र पढ़कर तो कानों को हाथ लगा लिया , उन जैसा शतांश भी लिख पाऊं तो धन्य समझूँ खुद को ।
तुम्हें बहुत शुक्रिया और स्नेह :)

                 कांच के शामियाने


आदरणीय रश्मि दी!.

स्कूल से लौटते ही "काँच के शामियाने" आज दोपहर १ बजे मिली, ...खाना खाने के बाद से पढ़ना शुरू किया | रोज दोपहर में थक जाने के कारण सो जाती थी लेकिन किताबों का पुराना शौक और नयी किताब का हाथ में आना और उस पर आपका सशक्त लेखन..... सोने पे सुहागा| ५ बजकर ४० मिनट पर पूरी किताब शब्द ब शब्द पढकर समाप्त की, या यूं कहूं कि "जया" के जीवन की यात्रा पूरी की |
 कभी कभी लगा कि "शिवानी" का कोई प्रसिद्ध उपन्यास पढ रही हूँ | इस पुस्तक की विशेष बात कि इसने पूरा बांधकर रखा मेरे चंचल मन को..... तो गंभीर पाठक की बात ही क्या| अन्त में मेरे जैसा मस्त व्यक्ति रोया भी | 
आप वाकई प्रशंसा और बधाई की पात्र हैं|

पूजा सिंह 
 
 कुछ ही महीने पहले पूजा विवाह बंधन में बंधी है . उसकी एंगेजमेंट , शादी, की तस्वीरें देखती रहती थी .फिर एक दिन अचानक इनबॉक्स में मैसेज मिला, 'मैंने भी कांच के शामियाने ' मंगवा अली है...जल्दी ही पढ़ती  हूँ . मुझे लगा, अभी तो इसकी शादी हुई है, किसी और के जीवन की इतनी कडवी हकीकतों से क्या रूबरू होना...लिहाजा मैंने अपनी ही किताब के लिए कहा...'अभी रहने दो...बाद में कभी पढ़ लेना '...पर वो नहीं मानी...और एक दिन उसके वाल पर ये स्टेटस था :)
थैंक्यू पूजा...इतने प्यारे संदेश और फोटो के लिए :)


                      कांच के शामियाने

 
 रश्मि  दी जब आपने कहा था कि बहुत सुखद नहीं है आराम से पढ़ना तो मैंने सोचा की तभी पढूंगी जब एक सिटींग में पढ़ लूँ। आज पढ़ लिया, पता नहीं कितनी बार रोई पर सबसे ज्यादा रोना आया जब जया काव्या की नोटबुक पढ़ती है।

अगर मैं अपनी जेनेरेशन की लड़की मानकर जया को देखती तो बहुत गुस्सा आता उसपर की क्यों सहा इतना, तीन बच्चे क्यों पैदा किये। पर जैसे ही मैं उसे अपने अपने पूर्वी उत्तर प्रदेश के छोटे से कस्बे से जोड़कर देखती हूँ तो पाती हूँ की ये कोई एक कहानी नहीं है, ऐसी कितनी जया को तो मैं पर्सनली जानती हूँ।

बहुत अच्छी सी किताब के शुक्रिया आपका

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

कारगिल हीरो कैप्टन विजयंत थापर

Rashmi Ravija's photo.'कारगिल हीरोज़' पर लिखी एक अंग्रेजी किताब के कुछ चैप्टर का हिंदी अनुवाद किया था ।हिंदी में यह किताब कब और कहाँ से प्रकाशित हुई इसकी कोई सूचना नहीं मिली ।पर कुछ लोगों तक उन जाबांजों की कहानी और उनके विजय अभियान का विवरण पहुंचा होगा ।इतना सन्तोष ही काफी है ।उन सभी वीरों को शत शत नमन

उसी अनुवाद में से 'कैप्टन विजयंत थापर' पर लिखे आलेख का अंश ।

कैप्टन विजयंत थापर का जन्म 26 दिसंबर 1976 को हुआ था। उस वक्त उनके पिता कर्नल वी .एन.थापर की पोस्टिंग पठानकोट में बख्तरबंद ब्रिगेड ( armoured brigade ) के हेडक्वार्टर्स में थी। उनकी माँ तृप्ता थापर एक शिक्षिका हैं। उस ब्रिगेड के रेजिमेंट में उन दिनों विजयंत नामक टैंक थे। उन्हीं टैंक के नाम पर उनके माता-पिता ने उनका नाम विजयंत रखा ।
विजयंत जिनके घर का नाम रॉबिन था की शिक्षा देश के विभिन्न शहरों में हुई।शिक्षा पूरी करने के बाद 1997 में इन्डियन मिलटरी एकेडमी (IMA ) द्वारा जेंटलमैन कैडेट के रूप में उनका चुनाव हो गया। 23 दिसंबर 1998 को ग्वालियर में कैप्टन विजयंत ने अपनी बटालियन 2 RAJ RIF को ज्वाइन किया .उन्हें जम्मू और कश्मीर जाने का आदेश मिला, जहाँ की घाटी में काउंटर इंसरजेंसी ऑपरेशन की ट्रेनिंग दी जा रही थी ।
कारगिल में पाकिस्तान घुसपैठ रोकने के लिए सेना ने अपनी तैयारी शुरू कर दी ।
2 RAJ RIF की बटालियन को 25 मई 1999 से सोनमर्ग में ट्रेनिगं दी जाने लगी। ताकि 16000 फीट की उंचाई पर स्थित टोटोलिंग रिज़ पर किये जाने वाले युद्ध के लिए वे खुद को ढाल सकें।
'कैप्टन विजयंत भी ' टोटोलिंग टॉप' पर विजय पताका फहराने वाले सैनिक दल के सदस्य थे जिस अभियान का नाम था "बरबाद बंकर " और इसके तहत भारतीय सेना ने 12/13 जून 1999 को पाकिस्तानी सेना के उत्तरी लाईट इन्फेंट्री द्वारा कब्ज़ा किये बंकर को नेस्तनाबूद कर विजय हासिल की थी।
यह भारतीय सेना की पहली विजय थी। सैनिक बहुत ही खुश और जोश में भरे हुए थे। कैप्टन विजय भी अति उत्साहित थे। टोटोलिंग टॉप पर अधिकार जमाने के बाद 20 जून 1999 को इस यूनिट को एक पहाड़ी इलाका 'जिसे "ब्लैक रॉक्स " का नाम दिया गया पर आक्रमण करने की जिम्मेवारी सौंपी गयी। यह इलाका 'टाइगर हिल ' और "टोटोलिंग टॉप " के बीच में था। इसे इलाके को भी तीन भागों में विभक्त किया गया। "नौल' (Knoll ) , "थ्री पिम्पल्स (Three Pimples) , और लोन हिल (Lone Hill ) . "A " कम्पनी को जिसका संचालन मेजर आचार्य और कैप्टन विजयंत कर रहे थे , नॉल (Knoll) पर कब्ज़ा करने की जिम्मेवारी सौंपी गयी . नॉल पाकिस्तानियों का बहुत ही सुरक्षित ठिकाना था और अस्त्र-शास्त्रों का बड़ा भण्डार भी था। इस ठिकाने तक पहुँचने का रास्ता बहुत ही संकरा सा था और जिसपर लगातार गोलियों की बौछार होती रहती थी। ये रास्ता बहुत ही घुमावदार था और इसके दोनों तरफ गहरी घाटियाँ थीं।
कैप्टन विजयंत के प्रिय मित्र मेजर आचार्य ने विजयंत के प्लाटून को इस आक्रमण का नेतृत्व करने की जिम्मेवारी सौंपी। दुश्मन के ठिकाने से 800 मीटर की दूरी पर से उन्होंने अपने बटालियन द्वारा गोलीबारी करके विजयंत की यूनिट को कवर देने का प्लान भी बनाया। जिस से दुशमनो को अपना सर छुपाना पड़े और कैप्टन विजयंत के प्लाटून के बढ़ते कदम उन्हें नज़र न आयें।
कैप्टन विजयंत ने अपने प्लाटून द्वारा आक्रमण का समय 8 बजे रात को तय किया। इसे H -Hour कहा गया। यह पूर्णिमा की रात थी और कैप्टन विजयंत को लगा, चंद्रमा की रौशनी में उनकी यूनिट दुश्मन के ठिकाने तक पहुँच जायेगी। परन्तु दुश्मनों की तरफ से भारी गोलीबारी की गयी .प्लाटून के चारो तरफ दुश्मनों के आर्टिलरी फायर गोले बरसने लगे .और प्लाटून के कदम वहीँ रुक गए। भारतीय सैनिक जान बचाने के लिए तितर-बितर हो गए।
कमांडिंग ऑफिसर दूर से ही इस आक्रमण का जायजा ले रहे थे . उन्हें लगा, ये आक्रमण बुरी तरह से असफल हो गया। कैप्टन विजयंत और उनकी प्लाटून दिया गया टास्क पूरा नहीं कर पायी।
यह सब देखकर कैप्टन विजयंत बहुत आहत हुए और अपनी जान की सुरक्षा की परवाह किये बिना गोलियों की बौछारों के बीच इस चट्टान से उस चट्टान पर जम्प करते हुए अपने साथियों को आवाजें लगाते रहे ,उनका उत्साह बढाते रहे, उनमे जोश भरते रहे .आखिरकार वे उस बटालियन के 19 लोगो को जमा करने में सफल हो गए। उनके मित्र मेजर आचार्य इस युद्ध में शहीद हो गए थे ।
मेजर आचार्य की शहादत ने कैप्टन विजयंत को दुश्मनों से बदला लेने के लिए प्रतिबद्ध कर दिया। अब उनके लिए रुकना बिलकुल असम्भव था। वे बिलकुल तीखी चढ़ाइयों वाले संकरे रास्ते पर किसी तरह बढ़ रहे थे। चारो तरफ दुश्मन के तोप बंदूकें आग के गोले बरसा रहे थे . उनके द्वारा फेंके हुए ग्रेनेड के शेल, कैप्टन विजयंत और इन सैनिकों के आस-पास गिर रहे थे . आखिरकार नॉल (Knoll ) पर उन्हें पैर जमाने को थोड़ी सी जगह मिल गयी।
कैप्टन विजयंत जिन्हें सब प्यार से रॉबिन बुलाते थे , ने देखा नायक तिलक सिंह अकेले एक लाईट मशीनगन (LMG ) लेकर दुशमनो पर गोलियां बरसा रहा है। उन्होंने एक शहीद हुए साथी की मशीनगन उठायी और बीस मीटर की दूरी से दुश्मनों पर आक्रमण जारी रखा। दोनों तरफ से गोलियां चलनी जारी थीं। आधी रात के बाद युद्ध में थोडा सा ठहराव आया। रॉबिन उठकर दुश्मनों के ठिकाने की तरफ भागे उसी वक़्त दुशमनों ने उनपर गोलियों की बौछार कर दी। रॉबिन के हाथ पेट में कई गोलियां लगीं,फिर भी वे रेंगते हुए दुश्मनों पर हथगोले फेंकते रहे .और अपने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी। पर उनकी शहादत बेकार नहीं गयी। उनके बलिदान से प्रेरणा पाकर उनकी बटालियन के सैनिक दुशमनो के ठिकाने पर पहुँच गए और दुश्मनों को मार गिराया। नॉल (Knoll ) बेस पर भारतीय सेना ने अधिकार कर लिया।
दुशमनो के विरुद्ध इतनी अभूतपूर्व वीरता दिखाने और उन्हें परास्त करने के लिए कैप्टन विजयंत को मरणोपरांत 'वीर चक्र ' प्रदान किया गया

जम्मू काश्मीर में , 'काउंटर इंसरजेंसी ऑपरेशन' के दौरान कैप्टन विजयंत से जुड़ी एक बहुत ही मार्मिक घटना हुई जिसने सबके दिल में उनके लिए विशेष जगह बना ली । 'ट्रास' गाँव' के एक स्कूल में कैप्टन विजयंत, एक छोटी सी लड़की से मिले। रुखसाना छः सात साल की एक बच्ची थी जिसके पिता एक गरीब मजदूर थे . आतंकवादियों ने सेना के मुखबिर होने के शक में बहुत ही बेदर्दी से रुखसाना की माँ और रुखसाना की आँखों के सामने ही उसके पिता का क़त्ल कर दिया। इस घटना से रुखसाना को ऐसा शॉक लगा कि उस छोटी सी बच्ची की आवाज ही चली गयी।

उस वक़्त कैप्टन विजयंत का दल उस स्कूल के पास ही ठहरा हुआ था . उस बच्ची की ऐसी हालत देखकर विजयंत का ह्रदय पिघल गया और उन्होंने उस बच्ची से दोस्ती कर ली। वे ज्यादा से ज्यादा समय उस बच्ची के साथ बिताने लगे . उसके साथ खेलते, उसे चौकलेट देते, मिठाई देते . कैप्टन विजयंत के इस प्यार भरे व्यवहार का असर हुआ और लड़की ने धीरे धीरे वापस बोलना शुरू कर दिया। जब उन्हें घर जाने की छुट्टी मिली तो उन्होंने अपनी माँ से कहा , एक छोटी बच्ची के लिए कुछ कपडे खरीद कर रखें। वे जब वापस ड्यूटी पर लौटेंगे तो लेते आयेंगे। पर दुर्भाग्यवश, लड़ाई छिड़ गयी और कैप्टन विजयंत की छुट्टी कैंसल हो गयी। वे घर नहीं जा सके। उन्होंने अपने माता-पिता को चिट्ठी लिख कर कहा कि अगर वे युद्ध से जीवित न लौटें तो रुखसाना के लिए वे लोग हर महीने 50 रुपये भेज दिया करें।

कैप्टन विजयंत के शहीद हो जाने के बाद उनके माता-पिता , उनकी इस इच्छा का सम्मान करते हुए नियमित रूप से रुखसाना को पैसे भेजते रहे। दस साल के बाद रुखसाना ने कैप्टन विजयंत के माता-पिता से उनके दिल्ली स्थित नोएडा वाले फ़्लैट में मिलकर उनकी नियमित मदद का शुक्रिया अदा किया .

रविवार, 10 जुलाई 2016

'काँच के शामियाने' पर 'कुसुम पालीवाल जी ' की टिप्पणी

'कुसुम पालीवाल जी 'कनाडा में अपनी नवासी के आगमन की तैयारियों में व्यस्त थीं और बीच बीच में मैसेज करती रहतीं, 'किताब ले आई हूँ, पर पढ़ नहीं पा रही ' .मैंने कहा, 'पहले तो बिटिया और नवासी की देखभाल कीजिये ,उनके सामीप्य का आनन्द उठाइए ,किताब कहाँ भागी जा रही ' उनकी बिटिया और नन्ही परी को बहुत[ बहुत प्यार एवं आशीष :)
भारत आने के बाद उन्होंने किताब पढी और अपने विचार भी व्यक्त किये.....आपका बहुत बहुत शुक्रिया
" काँच के शामियाने "
दोस्तों ....रश्मि रविजा के इस उपन्यास को आज खत्म किया इसमें जया एक ऐसा पात्र है जो किसी न किसी रूप में हर घर में विद्दमान है । हमारे समाज का एक हिस्सा ... आज भी जया की तरह जिन्दगी बसर कर रहा है ये कहना गलत न होगा ।
जया एक ऐसी लडकी ...जिसने माँ के घर में नाज नखरों से जिन्दगी बसर की हो और ससुराल में बिल्कुल अलग परिवेष में पहुँच कर किस तरह अपनी जिन्दगी को जहन्नुम होते देख कर , उन रूढिवादी संस्कारों से जकडे लोगों के बीच अपने आत्म सम्मान की धज्जियों के टुकडों को बार - बार समेंटते हुए जिन्दगी को मौके दे रही थी कि शायद आज नहीं तो कल तो बदलेगें उसके दिन ......जहाँ का वातावरण न उसके अनुरूप था और न ही उसके मन के अनुरूप । वहाँ उसको एक ऐसे व्यक्ति के साथ जीवन यापन करना है ........जिसको पत्नी नहीं .. सिर्फ औरत का शरीर चाहिए क्षुधा पूर्ती हेतु ।
जया एक एेसा पात्र है जिसके लिए मन में दया उपजती है कि कोई इतनी जिल्लत कैसे सह सकता है .. वो भी उस पुरूष के द्वारा जो खुद पढा -लिखा तो है लेकिन अपनी पितृसत्त्तात्मक समाज के दकिया नूसी ख्यालात और पुरूष प्रधानी सत्ता को अपने से अलग नहीं कर सका ....और उसके इसी सोच का नतीजा जया भुगतती रही ।
जया डरपोक या निर्बल नहीं है वो जो भी जिल्लत सह रही है तो सिर्फ इस कारण कि बचपन से लडकी को यही समझाया जाता रहा है कि तुम्हारा घर वही है उस घर की जिम्मेदारी तुम्हारी है , अब वो लडकी जया किस तरह अपनें ससुराल वालों की बुराई पक्ष को बताये मायके में , सब सह रही है फिर भी जी रही है अपने बच्चों के भविष्य की खातिर ।
किताब पढ़कर पता चलता[ है, जाया ने किस तरह समाज के दोगले लोगो के बीच संघर्ष करके अपने बच्चों को बनाया और अपने लिए एक मुकाम हासिल किया ।

रश्मि के इस उपन्यास में हर लडकी कहीं न कहीं , कुछ धटनाऔ में अपने को खड़ा पायेगी इस उपन्यास की यही सार्थकता है ।
रश्मि को बधाई है ....कि उन्होने नारी का एक सशक्त पहलू प्रस्तुत किया है .....कि नारी ही है ..जो तमाम तकलीफो के बावजूद भी हिम्मत नही हारती है ।

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

हैप्पी बर्थडे अंकुर

ब्लॉग, अब सबकुछ सहेजने कर रखने के काम ही आने लगा है . पिछले चार साल से बेटों के जन्मदिन पर उनकी कुछ शरारतों का फेसबुक पर जिक्र करती रहती हूँ .अब लगा, ये रोचक किस्से क्रमवार यहाँ सहेज लेने चाहिए:)
ये जनाब एक डिफरेंट टाइम ज़ोन में रहते हैं...जब सब सो रहे होते हैं ये जागते हैं...और जब चिड़ियाँ गीत गा कर सारी दुनिया को जगा रही होती हैं तो ये उसमे अपने खर्राटे का सुर मिलाते हैं. फुटबॉल खेलते हैं..नाटकों में भाग लेते हैं..गिटार बजाते हैं...और जब परीक्षा सर पर आए तो रात रात भर जागकर काली कॉफी और मैगी के सहारे थोड़ी सी पढ़ाई भी कर लेते हैं.
जब लगातार फोन पर घंटे टाइप करते देख माँ ने कहा."लगता है...गर्ल-फ्रेंड आ गयी है ,लाइफ में ' तो फोन सामने कर दिखा दिया..'इस गर्ल-फ्रेंड का नम ट्विटर है...कई फिल्मो के प्रीमियर शो के टिकट...क्रिकेट मैच -रॉक कंसर्ट्स के टिकट..टी-शर्ट्स,स्केट बोर्ड ..जीत चुके हैं,ट्विटर पर फिर भी एक महंगा गिटार जीतने की ललक धडाधड करवाती रहती है.
 

चुनिन्दा आर्ट फिल्मे ही देखते हैं...और फिल्मे देख, रोने में जरा नहीं शर्माते...बल्कि बड़े फख्र से कहते हैं..'कैंसेरियन तो रोतडू होते ही हैं' .टी.वी. पर पसंदीदा कार्यक्रम है...' मास्टर शेफ' और सिर्फ प्रोग्राम देख देख कर ही खुद को बढ़िया शेफ समझने लगे हैं...माँ को टिप्स देते रहते हैं. वैसे मैगी..ऑमलेट..सैंडविच..पिज्जा बना लेते हैं...एक बार बढ़िया चॉकलेट केक भी बनाया था .पर अगर मूड ना हो तो एक कप चाय बनाने के लिए कहने पर भी मासूमियत से पूछते हैं..."कैसे बनाते हैं,चाय?" माँ भी इतनी ढीठ है...हर बार चाय की विधि बात देती है...जिसे ये अगली बार सुविधानुसार भूल जाते हैं.

कभी मूड हो तो घर का कोना-कोना शीशे सा चमका देते हैं (साल में एक बार )...आठवीं क्लास से दिवाली पर घर के सामने रंगोली यही बनाते हैं. पर दूसरी क्लास से ही माँ सिखा रही है..'अपने कपड़े जगह पर रखो' ये नहीं सीखा. कपड़े हमेशा फर्श पर फेंके हुए ही मिलते हैं.एक बार माँ ने पुरानी लौंड्री बास्केट हटा दी..और दूसरी अभी लाई नहीं थी..दो दिन में हकलान कर दिया.."कमरे में लौंड्री बास्केट नहीं है..कपड़े कहा रखूँ?" जब माँ ने कहा..लौंड्री बास्केट में तो कपड़े आज तक नहीं रखे..तो जबाब मिला..'लौंड्री बास्केट रहता था कमरे में तो कम से कम इतना पता रहता था..कपड़े किस दिशा में किधर फेंकने है..अब कुछ समझ में ही नहीं आता'
वैसे आज इनकी इतनी बातें क्यूँ कर रही हूँ...क्यूंकि आज इनका ..यानि मेरे बड़े सुपुत्र हैं..जन्मदिन है...
जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो अंकुर

पिछले कुछ दिनों से इनकी ज़िन्दगी ने 180 डिग्री का टर्न ले लिया है. कहाँ वो लापरवाह सा थ्री-फोर्थ और
चप्पल में घूमना,और अब प्रेस की हुई शर्ट को दुबारा प्रेस करना और मैचिंग मोज़े का ख्याल,माँ पीछे पड़ी रहती थी, 'हेयर कट लो' और अब ऑफिस से लौटकर नौ बजे रात को बाल कटवाने जाना ,दिन रात हेड फोन लगाए लैपटॉप पर गाने सुनना और फ़िल्में देखना, गए युग की बात लगती है. पर इनकी माँ की ज़िन्दगी ने 360 डिग्री का टार्न ले लिया है, जहां से चली थी वहीँ पहुँच गयी, जब ये छोटे थे, इन्हें सुबह उठा कर इनका लंच पैक कर ऊँगली थामे स्कूल बस के स्टॉप तक पहुंचाना और आज भी सुबह उठाना,टिफिन पैक करना और ऊँगली थाम कर नहीं पर कार से ही सही, कम्पनी के बस स्टॉप तक छोड़ कर आना .
आज जनाब ने छुट्टी ली, सब खुश हो गए 'जन्मदिन परिवार के साथ बिताने का इरादा है ' पर असल वजह थी कि ऑफिस में सब घेर कर केक कटवायें और हैप्पी बर्थडे गायें , ये पसंद नहीं .पर हमसबने ने तो घर में ही जोर से हैप्पी बर्थडे गाकर बिल्डिंग वालों को गाकर बता ही दिया 
 
 
अंकुर जब फर्स्ट स्टैण्डर्ड में था एक दिन घर आकर बोला, 'मिस ने डायरी में कुछ लिखा है ' मैंने डरते हुए डायरी खोली कि जरूर कुछ शिकायत होगी पर ये लिखा था कि उसने १०० मीटर में गोल्ड मेडल जीता है. मेरे ये पूछने पर कि 'रेस में फर्स्ट आये तुम ?' उसने कंधे उचका दिए ,'वो तो कई बार आया '. कई राउंड हुए होंगे उसके बाद फाइनल .पर उसे ये सब समझ में नहीं आया. उसके बाद स्कूल में रेस में कभी गोल्ड, कभी सिल्वर कभी ब्रोंज़ भी मिलते रहे . 'लॉन्ग जम्प' में महाराष्ट्र का रेकॉर्ड भी ब्रेक किया (शायद अब भी उस कैटेगरी का रेकॉर्ड उसके ही नाम है. करीब सात साल बाद उस स्पोर्ट्स डे के चीफ गेस्ट, कहीं बाहर मिले और अंकुर को पहचान कर ये बताया )
स्कूल -कॉलेज के दिन ख़त्म हो गए .नौकरी में आ गया रेसिंग भी ख़त्म हो गयी पर दौड़ना ख़त्म नहीं हुआ .आज भी कम्पनी की बस दौड़ कर ही पकड़ी जाती है .शिफ्ट वाली ड्यूटी में ऑफिस कार गेट के पास आती है फिर भी ये जनाब दौड़ते हुए ही जाते हैं क्यूंकि हमेशा लेट हो रहे होते हैं :)
बस यूँ ही दौड़ते हुए नयी मंजिलें तय करते रहें यही आशीर्वाद है . जन्मदिन पर ढेरों शुभकामनाएं !!



आजकल बिल्डिंग के वाचमेन कार को धोने-पोंछने का काम करते हैं. उन्हें कुछ अतिरिक्त आमदनी हो जाती है और कार भी साफ़-सुथरी रहती है. रोज तो वे बाहर से ही धो-पोंछ कर साफ़ करते हैं ,इतवार के दिन चाबी ले जाकर अंदर से भी सफाई करते हैं. एक इतवार को वाचमैन ने कार में से पांच जोड़ी चप्पलें निकाल कर दीं. ये सारी चप्पलें मेरे बड़े सुपुत्र 'अंकुर (किंजल्क ) ने कार में छोड़ी हुई थीं . उसे सुबह सवा सात बजे निकलना होता है .और रात दो के पहले सो नहीं सकता . सुबह दौड़ते-भागते तैयार होता है और जूते हाथ में ले, कार में जाकर पहनता है. चप्पलें वहीँ छोड़ देता है, और पैरों से लग कर चप्पल सीट के नीचे . छोटा भाई , अलग परेशान , सारी चप्पलें कहाँ गायब होती जा रही है.
स्कूल-कॉलेज में भी यूँ ही दौड़ते-भागते तैयार हुआ करता था और मैं सोचती थी नौकरी में जाएगा तब शायद समय पर सोना-उठना हो जाए .पर अब भी वही हाल .पर शुक्र यही है कि बाकी सारे काम बखूबी करता है , आज उसके जन्मदिन पर यही शुभकामनाएं और आशीर्वाद है कि यूँ ही अपने कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा करते हुए कामयाबी की सीढियां चढ़ता रहे (और समय पर तैयार भी हुआ करे :) )

Rashmi Ravija
July 5, 2016  
11 hrs · 

महानगरों में ऑफिस दूर हो तो जल्दी निकलना पड़ता है और अक्सर नाश्ता कुर्बान हो जाता है. अंकुर भी सुबह हाथों में एक सेब लेकर घर से निकलता है. मैं हमेशा ध्यान रखती हूँ, घर में सेब की आपूर्ति बनी रहे .पर एक शाम आठ बजे देखा, सेब नहीं हैं .अब बाहर जाने का मन नहीं था .पतिदेव वॉक के लिए निकल गए थे .और वे कभी फोन लेकर नहीं जाते ,शायद इसी डर से कि मैं कोई काम न बता दूँ :)
छोटा बेटा रोज की तरह ,दोस्तों से मिलने चला गया था ,पता नहीं उसके पास उतने पैसे थे या नहीं फिर मैंने सोचा जिसे सेब खानी है, उसी को कहा जाए .उसके आने के रास्ते में ही डी मार्ट के सामने कतार से फल के ठेले वाले खड़े होते हैं .
मैंने उसे फोन किया, "डी मार्ट की तरफ से ही आओगे ना...एक किलो सेब लेते आना "
थोड़ी देर बाद फोन आया ," डी मार्ट में तो कोई फल है ही नहीं. इनलोगों ने फल-सब्जियां रखनी बंद कर दी है "
"तुम्हें अंदर जाने को किसने कहा....बाहर भी तो मिलते हैं ."
"ओह..ओके..हाँ "
इन जनाब को ईश्वर थोड़ी व्यावहारिक बुद्धि भी प्रदान करे ,इसी कामना के साथ जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं !!

सोमवार, 4 जुलाई 2016

"कांच के शामियाने" पर नीलिमा शर्मा जी के विचार



नीलिमा शर्मा जी आपका बहुत शुक्रिया आपने उपन्यास पढ़ा और अपने विचार भी रखे .परन्तु पहले अपनी आँखों का अच्छी तरह ख्याल रखिये ...किताबें तो हमेशा रहने वाली हैं .

नीलिमा जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठाया है, " क्या ऐसी महिलाओं का संघर्ष हमेशा सफल होता ?? उनके बच्चे हमेशा उनकी कदर करते ? "
बहुत दुःख होता है ये कहते कि अक्सर ऐसा नहीं होता. बच्चे माँ को जली कटी सुनते देख, प्रताड़ित होते देख सहानुभूति तो रखते हैं पर अक्सर वे भी माँ का दिल दुखा जाते हैं. नाराज़ होने पर, परेशान होने पर वे भी माँ को ही चार बात सुना जाते हैं क्यूंकि वे माँ को सब कुछ सहन करते देखते आये हैं तो उन्हें लगता है...माँ है ही सहने के लिए और माँ का सारा संघर्ष, त्याग व्यर्थ चला जाता है .

                                                    "कांच के शामियाने" 
 
काफी समय से इस उपन्यास के बारे में फेसबुक पर पढ़ रहीथी |
और एकदिन उपासना के कहने पर मैंने COD मंगवा ही लिया | उपन्यास पढना हो तो काफी समय की जरुरत होती हैं समय निकालना ही मुश्किल होता हैं समय का न होना एक बहाना होता हैं सबके पास |

एक सप्ताह उपन्यास साइड टेबल पर रहा | एक दोपहर ऐसे ही कुछ पन्ने पलटे तो जया के कुछ संवाद पढ़े | और उपन्यास ने खुद मेरे को पढने के लिय उत्प्रेरित कर किया | मैंने पढना शुरू किया तो पन्ना दर पन्ना पढ़ती गयी | लाइट चली गयी तब भी कांच के शामियाने मेरे हाथ में रही | इन्वर्टर भी अंतिम सांसे लेने लगा \( गलती से चार्जिंग ऑफ हो गयी होगी ) और मैं हाथ से पंखा झलती हुयी नावेल पढ़ती रही | कहानी में लगातार रोचकता बनी रही |प्रवाहमयी कथानक एक पल को को बोझिल नही लगा | कभी भोजपुरी भाषा से सम्पर्क नही रहा लेकिन यहाँ सब संवाद समझ आ रहे थे |

नायिका के सपने , पिता से लगाव , बहनों जीजाओ का स्नेह , माँ का आत्मिक प्रेम सब अपना सा लगा | क्षेत्र कोई भी हो भावनायें वही रहती हैं | राजीव का चरित्र बहुत अच्छे से सामने आया हैं आपके शब्दों द्वारा |एक पाठक होने के नाते मैं सब चरित्रों के साथ सम्वेदानाताम्क रूप से जुड़ रही थी | हर दृश्य एक चलचित्र सा जैसे सामने घटित हो रहा था | मुखोटे पहने सब चरित्रों की कलई खोलते शब्द, शब्द ना होकर तस्वीर बन जाते हैं | संघर्ष नियति हैं | "बिना खुद मरे स्वर्ग नही पा सकते हो", अक्सर मेरी माँ कहा करती थी और "दिल जलाने से अच्छा होता हैं अपने पाँव जलाओ और सिध्ह करो सब कारज |"

आज माँ ज़िंदा होती तो उनको सुनाती यह कथा | माँ के कहे मुहावरे उनकी देशज भाषा में नही कह पायी हूँ लेकिन भोजपुरी के सब देशज मुहावरे और संवादों से खुद को अवश्य जोड़ पायी हूँ | राजीव का चरित्र हो या अमित का , सास ससुर का हो या माँ का कोई भी अपने होने को फ़िज़ूल नही ठहराता हैं सब अपने अपने स्थान पर जया के चरित्र को उभार रहे हैं |भाषा शैली अच्छी लगी |

रश्मि जी लेकिन क्या ऐसी महिलाओं का संघर्ष हमेशा सफल होता ?? उनके बच्चे हमेशा उनकी कदर करते ? वास्तविक जिन्दगी में लोग प्रैक्टिकल सोच रखते आज के बच्चे भी अपवाद नही | कुल मिलकर एक ही सिटींग में उपन्यास एक लम्बे अरसे के बाद पढ़ा वो भी आँखे दर्द ( अभी लैज़र सर्जरी करवाई थी) होने के बावजूद | बहुत डांट भी खायी अपने पति से लेकिन उपन्यास पढने के बाद उनसे और प्यार हो गया | इश्वर से शुक्र मनाया कि हमारी जिन्दगी में राजीव जैसा या अमित जैसा पुरुष नही | आपने देखा अपने उपन्यास का असर मेरी जिन्दगी की जगह भोजपुरी हम लिख गयी मैं :D |
.बहुत बहुत शुभकामनाये |

सोमवार, 27 जून 2016

'काँच के शामियाने ' पर ऋताम्भरा कुमार की टिप्पणी

यूं ही स्क्रॉल करते ,ऋताम्भरा कुमार, के स्टेटस पर नजर पड़ी और सुखद आश्चर्य से भर गई .वे आज ही मित्र सूची में शामिल हुई हैं और उनका कोई मैसेज भी नहीं मिला था .ऐसे सरप्राइज़ अच्छे लगते हैं :)
 
ऋताम्भरा जी ने उपन्यास पढ़कर एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही है..." बदलाव तभी संभव है जब हम खुद कोशिश करते हैं। किसी भी लड़की की जिन्दगी में सपनों का राजकुमार नहीं आता। राजकुमारी को अपनी जिन्दगी की खुशी खुद ही तलाश करनी होती है।
आपको उपन्यास पसंद आया ,खासकर आंचलिक बोली का समावेश ,,और अपने उसपर लिखा भी . बहुत बहुत शुक्रिया .
(कुछ लोगों ने पूछा है, उपन्यास कैसे मिल सकता है,उनके लिए लिंक नीचे है.)
                                                         'काँच के शामियाने '
कई महिनों से "रश्मि रविजा" का उपन्यास "कांच के शामियाने " पढ़ने की सोच रही थी... लेकिन पूजा खरे की समीक्षा पढ़ने के बाद तो समय गंवाये बिना ही मंगवा लिया। हाथ में किताब आने के बाद भी सोचा कि चलो रोज थोड़ा थोड़ा पढूंगी ( समयाभाव के कारण )... लगा एक हफ्ते की व्यवस्था हो गयी ☺

लेकिन जब पढना शुरू की.... समय का पता ही नहीं चला... कई बार कोशिश की, अब रहने देती हूँ कल तक खतम कर लूंगी पर मेरी कोशिश नाकाम रही... समय देखी तो रात के तीन बज रहे थे। सच में यह उपन्यास हर औरत की कहानी है। पूरी न सही, किसी को कम, किसी को ज्यादा पर पढते समय लगता है कि ये सब तो मेरी जिन्दगी में भी हो चुका है। दो दिन तक सोचती रही हूँ कि रश्मि जी ने "जया "से इतना संघर्ष क्यों करवाया। समय बहुत बदल चुका है। लोग समझदार हो रहे हैं। उसके बाद कई दोस्त, परिचित एवं खुद की जिन्दगी को खंगालना शुरू की तो पाया कि समय वहीं का वहीं है। बदलाव तभी संभव है जब हम खुद कोशिश करते हैं। किसी भी लड़की की जिन्दगी में सपनों का राजकुमार नहीं आता। राजकुमारी को अपनी जिन्दगी की खुशी खुद ही तलाश करनी होती है। ये बात अलग है कि कोई औरत जल्दी समझ जाती और कोई देर से। और जो नहीं समझतीं समझौता करके जिन्दगी काट देती हैं।

उपन्यास से लगाव का एक कारण यह भी हो गया है कि मैंने बचपन से लेकर बीस बरस की उम्र तक का समय "हाजीपुर " और उसके आसपास के ही जगहों में ही बिताए हैं। आंचलिक बोली भी एक वजह बनी। जया की ननद का बोलने का लहजा भी किसी भूले बिसरे की याद दिला गया। धन्यवाद पूजा खरे अन्यथा इस उपन्यास को पढ़ने में और देर हो जाती...

निम्न लिंक पर उपन्यास मंगवाया जा सकता है
http://www.amazon.in/Kanch-Ke-Shamiyane-Rashmi…/…/9384419192
http://www.infibeam.com/…/kanch-ke-shami…/9789384419196.html

बुधवार, 22 जून 2016

काँच के शामियाने पर सरस दरबारी जी की टिप्पणी

बहुत शुक्रिया सरस दी (Saras Darbari )।आपने उपन्यास ही नहीं लिखने की प्रक्रिया भी समझने की कोशिश की ।लिख तो लिया था पर इसे एडिट करने में दो साल लगा दिए ।दिमाग इस दर्द से बचने के सौ बहाने ढूंढ लेता और देर होती जाती ।पर आख़िरकार किया और अब ख़ुशी है कि दिल से लिखी बात दिल तक पहुँच रही है ।
पुनः आभार ।
काँच के शामियाने

कल ही काँच के शामियाने पढ़कर खत्म की ...
रश्मि रविजा की यह कहानी जब पहली बार उनके ब्लॉग पर पढ़ी थी तभी मन बहुत दुखी हुआ था, आखिर इतना दर्द क्यों लिख देता है ऊपर वाला किसी के नसीब में ...
पर जब आसपास देखती हूँ, तो बहुत लोगों को इसी पीड़ा से ग्रस्त पाती हूँ. हो सकता है उसकी डिग्री उतनी न हो, पर उस पीड़ा को ज़्यादातर स्त्रियों ने किसी न किसी रूप में सहा है. और इसीलिए यह कहानी सनातन हो गयी है . हर पाठक ख़ास तौर पर स्त्रियाँ अपने आपको उससे जुड़ा पाती हैं. स्त्रियाँ ही नहीं पुरुषों की प्रतिक्रियाएं भी हमने पढ़ी. जया के दर्द ने सबको झकझोरा है, और पुरुषों को अपने भीतर झाँकने को प्रेरित किया है.
यह रश्मि की कलम का जादू ही है की हर पाठक , जया के दर्द की टीस को महसूस कर रहा है उसके दर्द से विचलित हो रहा है .
किसी के दर्द को समझने के लिए उस दर्द से गुज़रना होता है, उसकी पीड़ा को पूरी शिद्दत से महसूस करना होता है , तभी उस कहानी की सच्चाई , पाठकों तक पहुँच पाती है . .
रश्मि ने यह बखूबी किया है. समझती हूँ इस पूरी प्रक्रिया में उन्होंने भी उस दुःख के सागर को तैर कर पार किया होगा .
इतने सक्षम लेखन के लिए उन्हें दिलसे बधाई और जया जैसी अनेकों स्त्रियों के लिए दिलसे दुआएँ , कि ईश्वर दुनिया की सारी खुशियाँ उनकी झोली में डाल दे और दुःख की परछाईं भी उन्हें न छू पाए .

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