सोमवार, 26 अगस्त 2013

क्षमा करना कितना सही

"क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात "
 
"क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो "

"To err is human , to forgive is divine "

"Forgiveness is the virtue of the brave and the final form of love "

ये  सारी उक्तियाँ सुनने में बहुत ही प्रेरणास्पद लगती हैं . क्षमा अपने आप में एक महान चीज़ है, व्यक्ति के उदारमना होने का परिचय देती है, अपराधी को सुधरने का मौक़ा देती है. पर क्या गारंटी है कि अपराधी सुधर जाए ?? कई बार अपराधी इसे सामनेवाले की  कमजोरी भी समझ लेते हैं और फिर वे तो नहीं ही सुधरते बल्कि उन्हें यूँ कोई सजा पाते न देख आपराधिक प्रवृत्ति के दुसरे लोगों का भी हौसला बढ़ता है और उनका डर गायब हो जाता है ,फिर उन्हें भी कोई अपराध करने में हिचक नहीं होती .

अभी हाल में ही महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित शहर कहे जाने वाले मुंबई में एक वीभत्स घटना हुई .(जो सामने आयी वरना पता नहीं मुम्बई सहित कितने शहरों में रोज ऐसे कितने ही अपराध होते हैं और पता भी नहीं चलता ) पिछले दिसंबर में निर्भया के साथ हुए दर्दनाक हादसे और उसकी मौत से पूरे देश का गुस्सा उबल पड़ा था , लोग सड़कों पर  आ गए  थे . लेकिन उन अपराधियों को सजा देने की प्रक्रिया भेडचाल से चल रही है. ऐसा नहीं है कि मुम्बई में इस कुकृत्य को करने वाले इन अपराधियों ने देश का वो रोष नहीं देखा होगा . लोग सड़कों पर थे ,टी,वी चैनल्स हफ़्तों पूरे पूरे दिन इसका प्रसारण करते रहे फिर भी इन अपराधियों को ज़रा भी डर नहीं लगा . वे साथ में ये भी देख रहे थे कि नारों,धरनों और टी.वी. रिपोर्टिंग के आगे कुछ नहीं हो रहा . उन्होंने इस फोटो जर्नलिस्ट के पहले भी जाने कितनी ही लड़कियों के साथ ये अमानुषिक अत्याचार किया है. क्यूंकि इन्हें सजा पाने का कोई डर नहीं था . इन्हें विश्वास था कि लडकियां पुलिस में रिपोर्ट नहीं करेंगी. समाज में बदनामी का भय और पुलिस की नाकामी और हमारी धीमी न्याय प्रक्रिया ..इन अपराधियों के हौसले और भी बढ़ा देती है .

पिछली पोस्ट लिखते वक़्त मुझे दो घटनाएं याद आयीं जो इन बड़े बड़े अपराधों के समक्ष तो बहुत छोटी हैं पर अपराध की श्रेणी में तो आती ही हैं.
 

जब मैंने यह जिक्र किया था कि धीमी ट्रैफिक में मैंने कार का शीशा इसलिए नीचे नहीं किया क्यूंकि मंगलसूत्र छिन जाने का डर था ...उस वक्त दिमाग में कुछ ही दिनों पहले अखबार में पढ़ी एक घटना ताज़ा थी . फिल्म अभिनेता 'विद्युत जामवाल ' ट्रैफिक जैम में फंसे हुए थे और अपने कार का शीशा नीचे कर मोबाइल पर बातें कर रहे थे .तभी एक लड़का उनके हाथों से मोबाइल छीन कर भागा . आज के अभिनेताओं की तरह विद्युत् भी अच्छी  वर्जिश करते हैं और फिट हैं. उन्होंने उस लड़के का पीछा किया .लड़के का एक साथी मोटरसाइकिल पर सवार था , लड़का जैसे ही बाइक पर बैठने को हुआ विद्युत् ने उसे पकड़ लिया .उसे कुछ झापड़ रसीद किये .पब्लिक ने भी उसे मारना शुरू कर दिया. लड़का गिडगिडाने लगा और विद्युत् ने उसे माफ़ कर दिया ,पब्लिक से बचा कर उसे जाने दिया. विद्युत् का कहना है , "वह एक अच्छे घर का पढ़ा -लिखा लड़का लग रहा था. अंग्रेजी में बातें कर रहा था .उसे सुधरने का मौक़ा मिलना चाहिए "
पहली नज़र में विद्युत् जामवाल की बातें सही लगती हैं ,लेकिन क्या पता वो लड़का इसे एक थ्रिल समझे फिर से ऐसा करने का प्रयास करे. इस बार किसी ओवरवेट सज्जन का मोबाइल छीने जो उसे भाग कर नहीं पकड़ सकें. उसे अपने किये की कोई सजा तो नहीं मिली .

जब मैंने मॉर्निंग वाक पर जाने वाली महिलाओं के गले से चेन छीने जाने की घटना का जिक्र किया तो उसी से जुडी एक घटना याद हो आयी .तीन-चार साल पहले की बात है ,इस तरह की घटनाएं नयी नयी शुरू हुई थीं .एक दिन वॉक पर जाते वक़्त मैं गले की चेन उतारना भूल गयी. मेरी फ्रेंड ने कहा . उतार कर पर्स में रख लो ,मैंने वैसा ही किया .लौटते वक़्त सब्जी खरीदने के लिए छोटा सा पर्स हम साथ रखते थे . वॉक से लौटकर मैंने डाइनिंग टेबल पर पर्स रख दिया और दुसरे कामों में लग गयी . जब बाद में पर्स ढूँढा तो पर्स नहीं मिला. पर्स में छः सौ रुपये भी थे . इसके चार-पांच दिनों पहले कहीं जाते हुए मंगलसूत्र पहनना चाहा था तो वो भी नहीं मिला . मुझे लगा मैंने कहीं और रखा होगा . मैं इतनी कुशल गृहणी नहीं हूँ . हर चीज़ जगह पर नहीं रखती  और आलमीरा भी लॉक  नहीं करती. मैंने सोचा किसी और दराज में या किसी और डब्बे में रख दिया होगा. मेरी लापरवाही की एक और वजह है, इतने दिनों की गृहस्थी में मुझे हमेशा ईमानदार कामवालियां मिलीं थीं . बाथरूम में गिरा हुआ चेन उठा कर दे देतीं, इधर उधर पड़ी मेरी अंगूठियाँ, कड़े  उठा कर दे देतीं. जब मैं पटना जाती तो वहां भी वही आदत ,कहीं भी चीज़ें रख देतीं और माँ  कहतीं 'यहाँ की कामवालियां तुम्हारे मुम्बईवालियों की तरह ईमानदार नहीं हैं ' इसीलिए जब मंगलसूत्र नहीं मिला तो मुझे कामवाली पर शक नहीं हुआ. नयी कामवाली दस दिन पहले ही मेरे पास आयी थी . उसका पिता पिछले दस वषों से बगल की बिल्डिंग में वाचमैन था .उसकी माँ भी आस-पास के फ्लैट्स में काम करती थी इसलिए उसपर शक का कोई सवाल ही नहीं पर जब चेन भी नहीं मिला तो उसपर शक किये बिना गुजारा भी  नहीं. मैंने कबर्ड का कोना कोना..पूरा दराज, हर डब्बा खोल खोल कर देख लिया पर न तो चेन था न मंगलसूत्र . सोचा वो काम करने आएगी तो पहले काम करवा लूंगी ,फिर उस से पूछताछ करुँगी. पर इतना धीरज नहीं रहा . उससे पूछा और वो जोर जोर से चिल्ला कर कसमें खाने लगी...रोने लगी ..तरह तरह के दलील देने लगी. पर मेरा भी कहना था , 'उसके सिवा कोई बाहरी व्यक्ति घर में आया ही नहीं.' वो बाहर चली गयी , अपने पिताजी , माँ को लेकर आयी . उनका भी यही कहना था ,"ऐसा काम वो कर ही नहीं सकती " जब मैंने पुलिस की धमकी दी तो रोने लगी, "मेरे दो छोटे छोटे बच्चे हैं..पति ने छोड़ दिया है..बच्चों का क्या होगा " मेरे बेटे  भी उसका रोना देख द्रवित हो गए . अंकुर ने मुझे अलग बुलाकर कहा , "उस दिन तुमने मुझे पांच सौ दिए थे ..शायद उसी पर्स में से दिया होगा " मेरी झल्लाहट उनपर निकली ,"अकेला वही पांच सौ का नोट था घर में ??"
पूरे दिन ये चलता रहा ,वो, उसके भाई..माता-पिता आते रहे . {और झाडू-पोछा बर्तन मैं करती रही :(} आखिर उसने कहा , "आपने ही  घर में इधर उधर गिरा दिया होगा..ठीक से देखिये " मैं उसकी चाल समझ गयी .मैंने कहा," ठीक है तुम्ही देखो" तो उसने  कहा,"अब तो रात हो गयी..कल झाड़ू लगाकर देखती हूँ '

दुसरे दिन आते ही उसने झाडू उठाया .मैं जानबूझकर कमरे में नहीं गयी . थोड़ी देर बाद उसकी चिल्लाने की आवाज़ आयी.."भाभी देखिये..यहाँ चेन है.." कोने में एक थैला पड़ा था जिसमे कुछ कागज़ वगैरह रखे थे. उसी में से उसने चेन निकाल कर दे दिया. मुझे सुनाया भी.."आप खुद ठीक से नहीं रखतीं ...दुसरे का नाम लगाती हैं..आदि आदि " उस पर्स में से निकल कर उस थैले में चेन गिर जाने की कोई संभावना नहीं थी फिर भी मैं चुप रही..मैंने कहा.."देखो ऐसे ही कहीं मंगलसूत्र गिरा होगा..वो भी ढूंढो " पर पूरे घर में झाडू लगाने के बाद उसने झाडू पटका और जोर से ये कहती हुई कि " चेन की तरह मंगलसूत्र भी आपने  कहीं गिरा दिया होगा,शायद घर से बाहर गिराया हो  " चली गयी. फिर दुबारा उसने मेरे घर का रुख नहीं किया . कई बार मन में आया पुलिस में शिकायत करूँ फिर उसके  बच्चों का ख्याल कर रुक गयी. कुछ दिनों बाद सुनने में  आया आस-पास के फ्लैट्स से भी उसने पैसे ,बर्तन चुराए हैं .सबने उसे निकाल दिया . अब किसी नयी कॉलोनी में काम कर रही होगी .पर न तो उसे कोई सबक मिला  न उसकी आदतें सुधरीं . ये उसके  हक में भी अच्छा नहीं हुआ. इसी तरह हर जगह से काम छूट जाएगा तो भूखो मरने की नौबत आ जायेगी .

मेरे लिए तो और भी बुरा हुआ . उसकी झोपड़पट्टी में ये बात फ़ैल गयी . .बाद में जो कामवाली आयी ,उसने भी बड़ा आश्चर्य जताया ,अपने ईमानदार होने की  कसमे खाईं . उन दिनों मेरे कुछ बुरे ग्रह ही चल रहे थे .एक दिन ऐसे ही देर रात कंप्यूटर पर कुछ पढ़ते हुए इस अंगुली की  अंगूठी उस अंगुली में डाल रही थी और अंगूठी नीचे गिर गयी . टन्न से आवाज़ भी हुई . झुक कर देखा,नहीं मिला..सोचा अब इतनी रात में मेज खिसका कर क्या सबकी नींद खराब करूँ .दुसरे दिन मैंने  बाई के साथ ही टेबल खिसका कर ढूँढा पर मुझसे पहले शायद बाई को नज़र आ गयी . और अंगूठी नहीं मिली .

कुछ दिनों बाद ही  किसी फंक्शन में जाना था ,मैंने अपनी डायमंड इयररिंग्स उतार कर सौ रुपये के मैचिंग लम्बे इयररिंग्स पहने  . दुसरे दिन, घर पर कुछ गेस्ट आने वाले थे ,बहुत ही बिजी थी..उसी में जल्दी में पुरानी इयररिंग्स पहनी पर ठीक से उसका स्क्रू नहीं लगा और वो  घर में ही कहीं गिर गया . मैंने तो अगले दिन नोटिस किया तब तक झाडू-पोछा हो चुका था .दुबारा झाडू लगाकर ढूँढने की कोशिश की पर नहीं मिला.  कामवाली साफ़ नकार गयी . उसे डर तो था नहीं कि ये पुलिस में शिकायत कर देंगी . उसे लगा, इनके यहाँ तो आराम से चीज़ें ली जा सकती हैं .उन मैडम को भी अलविदा कहा . टचवुड उसके बाद से सब ठीक रहा है...मैं भी थोड़ी सतर्क हो गयी और अच्छी कामवाली भी  मिल गयी . लोगो ने ये कह कर भी डरा दिया था "सोना खोना बहुत बुरा होता है " पर सब ठीक ठाक ही है.

फिर भी कई बार ये ख्याल आता है अगर मैं पहली वाली बाई के साथ ही सख्ती बरतती तो शायद उसे मेरा मंगलसूत्र भी लौटाना पड़ता और दूसरी बाइयां भी मुझसे डर कर रहतीं कि इनके यहाँ से चोरी करके नहीं बचा जा सकता. उन्हें सबक मिलता तो उनकी आदतें भी सुधर जातीं .
 
क्षमा करने जैसी बात सुनने में बड़ी अच्छी लगती है ,पर जिन्हें क्षमा किया जाता है, उनका कुछ अच्छा नहीं होता .आखिर हम अपने बच्चों को भी छोटी छोटी बातों पर सजा देते हैं. 'होमवर्क नहीं किया, आज टी.वी. देखना बंद.' 'अपनी चीज़ें जगह पर नहीं रखीं ,.खेलने जाना बंद' .अपने बच्चों को हम अच्छा इंसान बनाना चाहते हैं ,उनकी गलतियां सुधारना चाहते हैं ,उनमें अच्छे गुण भरना चाहते हैं तो वैसे ही समाज के प्रति भी हमारा यही दृष्टिकोण होना चाहिए . उन्हें भी सुधारने की जिम्मेवारी हमारी ही है .

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

रसातल और कितनी दूर

स्कूल कॉलेज के दिनों में बिहार में माँ के साथ उत्तर बिहार से दक्षिण बिहार का (जो अब झारखंड है ) रात में बस से लंबा सफ़र किया है . एक बार तो  'तिलैया सैनिक स्कूल' में छोटे भाई से मुलाकात कर लौटते वक़्त तिलैया के छोटे से बस स्टैंड पर हम माँ  -बेटी को बस के इंतज़ार में देर रात तक रुकना पडा था पर हमें किसी तरह का डर भी नहीं लगा था और हम बस पकड़ छः घंटे का सफ़र कर सकुशल घर पहुँच गए थे.
 

एक सहेली के साथ कई बार लगभग खाली पिक्चर हॉल में दोपहर के शो देखे हैं. जब पूरी बालकनी में सिर्फ हम दो सहेलियां ही हुआ करती थीं. पर हमें कभी अपने लड़की होने का कोई डर नहीं लगा .हमारे पैरेंट्स भी हमें जाने की इजाज़त देते थे ,इसका अर्थ उन्हें भी किसी अनहोनी की आशंका नहीं थी.
 

जब मुम्बई शिफ्ट हुई उस वक्त घर पर फोन नहीं था और रात ग्यारह के बाद कॉल चार्ज वन फोर्थ हो जाते थे . मैं और पड़ोस में रहने वाली एक फ्रेंड ,अपने अपने पति और बच्चों को खिला-पिला-सुला कर करीब एक  किलोमीटर चलकर मार्किट एरिया में फोन करने जाते और फिर आइसक्रीम खाते हुए, गप्पें लड़ाते हुए ,आराम से लौटते. मुम्बई की यह बात मुझे बहुत ही भली लगती . आश्चर्य भी होता और ख़ुशी भी कि इतनी आजादी है यहाँ..लडकियां/औरतें इतनी सुरक्षित हैं .
 

जब कभी परिवार के साथ देर रात लोकल ट्रेन से लौटना होता तो देखती कई लडकियां अकेले लौट रही हैं .वे प्लेटफॉर्म  पर उतर जातीं, फिर भी मेरी आँखें दूर तक उनका पीछा करतीं .कितने आत्मविश्वास से भरी हैं ये लडकियां. अब यहाँ से ऑटो या बस ले अकेले ही घर जायेंगी ..महिलाओं की ये तरक्की देख ,मन गर्व से भर जाता . कभी किसी फ़िल्मी अवार्ड समारोह में या ज़ी टी.वी. के 'सा रे  गा मा' , या 'अन्त्याक्षरी' का शो देखने जाती तो अच्छा लगता देख , प्रोडक्शन टीम में आधे से ज्यादा लडकियां ही होतीं . अक्सर रात के बारह-एक बजे शो ख़त्म होता तो मैं यही सोचती अब जाकर ये लडकियां घर जा सकेंगी .कितने इत्मीनान से इतनी देर तक  बाहर रहती हैं .कोई डर नहीं इन्हें और एक बार मुम्बई को मन ही मन थैंक्स कह देती.

एक बार ऐसा मौका भी आया, जब मैं,मेरी फ्रेंड और उसकी ननद एक शो देखने गए और रात के करीब एक बजे लौटे. मेरे लिए वह पहला मौक़ा था जब इतनी देर रात सहेलियों के साथ अकेले लौट रही थी. फ्रेंड ही ड्राइव कर रही थी. वह काफी पहले से मुम्बई में रह रही थी और एक वही आत्मविश्वास से भरी हुई थी .मेरे लिए और यू.पी.से आयी हुई उसकी ननद के लिए यह नया अनुभव था ...थोडा रोमांच भी था , और एक आज़ादी का अहसास भी .

पर यह सब तेरह-चौदह  साल पहले की बात है . मैंने धीरे धीरे मुम्बई को बदलते देखा है. सिर्फ मुम्बई ही क्या पूरे देश को ही बदलते देख रही हूँ. देश के हालात बद से बदतर होते जा रहे है . हर शहर से लूट-पाट, ह्त्या ,बलात्कार की ख़बरें सुर्ख़ियों में होती हैं.
एक तरफ विज्ञान और तकनीक में प्रगति की ख़बरें मिलती हैं और दूसरी तरफ मानवीयता जैसे रसातल में जा रही है.
  
करीब तेरह साल पहले मैं बिना किसी डर के ,देर रात सिर्फ महिलओं के साथ अकेली लौटती हूँ .और अभी दो दिन पहले की राखी के दिन की  बात है . अब ऑफिस में राखी की छुट्टी तो होती नहीं , लिहाजा रात में ही राखी  बाँधने का कार्यक्रम संपन्न होता है. लौटते वक़्त रात के सवा बारह बज गए . बेटे को काफी खांसी जुकाम था . उसने कहा,' कार की ए.सी. बंद कर दो.' पर मैं ए.सी. बंद कर कार की खिडकी के शीशे  नीचे करने में डर गयी क्यूंकि मैंने सोने का मंगलसूत्र पहना हुआ था और ड्राइव कर रही थी, इसलिए इतना मौका नहीं था कि उसे निकाल कर पर्स में रख दूँ . डर था कि सिग्नल पर या धीमी ट्रैफिक होने पर कोई गले से खींच न ले.

कई वर्षों से मॉर्निंग वॉक पर जाती हूँ , हमेशा हम सहेलियां गले में सोने की चेन और हाथों में सोने के कड़े या चूड़ियाँ पहने होती थीं. पर पिछले तीन -चार साल से मॉर्निंग वॉक पर जाने वाली महिलाओं के गले से चेन छीनने की घटनाएं इतनी आम हो गयी हैं कि मोटरसाइकिल पर पुलिस गश्त लगाती रहती है और जिनलोगो ने चेन पहने होते हैं उन्हें पास बुला कर चेन पहनने से मना करती है. अभी कुछ महीनों से तो देख रही हूँ . बीच में पुलिस चौकी सा ही बना दिया गया है और  सुबह सुबह एक पुलिसमैन वहाँ तैनात रहता है. हम सबने चेन,मंगलसूत्र  और कड़े पहनना छोड़ ही दिया है कि अब रोज पहनने और उतारने की इल्लत कौन पाले.

पहले देर रात अकेले काम से लौटती लड़कियों को देख मन गर्व से भर जाता था और मैं दूर तक उन्हें जाते हुए देखती रहती थी पर अब ख़ुशी और गर्व की जगह आशंका और डर ही ले लेगा. अब शायद किसी अकेली लड़की को देख डरा हुआ मन बस ये दुआ करेगा कि वो जल्द से जल्द सुरक्षित अपने घर पहुँच जाए.

बाईस साल की जीवन से भरपूर लड़की ,अपनी रूचि का काम पाकर कितनी खुश होगी. कितने मंसूबे होंगे उसके ,कितनी बेफिक्र होगी वह ...पर उन वहशियों ने पल भर में उसकी ज़िन्दगी तहस-नहस कर डाली. ईश्वर करे...वो लड़की इन सबको एक भयानक हादसा समझ भूल जाए और अपनी आगे की ज़िन्दगी,उसी उत्साह और उमंग  के साथ जिए. पर इन सबसे उबरने में जो समय लगेगा, उसका हिसाब कौन देगा ?? उसने जो शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेलीं ,कौन होगा इसका जिम्मेवार?? 

बहसें शुरू हो गयी हैं , सरकार, प्रशासन, पुलिस, क़ानून व्यवस्था को जिम्मेवार ठहराना, बढती जनसँख्या..अशिक्षा.. बेरोजगारी को कारण बताना...मोर्चे निकालना...धरना देना ..आलेख लिखना ..पोस्ट लिखना ..जैसे एक चक्र  सा चल पडा है ...फिर यह पहिया रुक जाएगा...अगले हादसे के इंतज़ार तक .

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

भाई-बहन के निश्छल स्नेह के कुछ अनमोल पल

राखी का एक दिन तो ऐसा है जब भाई सात समंदर पार हो....कितना भी व्यस्त हो, किसी काम में आकंठ डूबा हो...बहन की याद आ ही जाती है और कैसे नहीं आएगी?? बहन इतने दिल से जो याद करती है :)

इस राखी  पर मैं भी , अपने सभी भाइयों  के लिए दिल से दुआ करती हूँ कि 

 

सफलताओं के शिखर हो,उनके कदमो तले
हर डाली पर जीवन की,नव पुष्प खिले,
दीपों की माला सी, पाँत खुशियों की जगमगाए
सुख, शान्ति, समृद्धि से उनका दामन भर जाए
.


हम मध्यमवर्गियों का इतिहास में कहीं नाम नहीं होता पर रस्मो-रिवाज़,त्योहार,परम्पराएं..एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इन्ही के द्वारा हस्तांतरित की जाती है. राखी में भी बहने बड़े शौक से राखी खरीदती हैं या खुद बनाती हैं, मिठाइयां  बनाती हैं,भाई शहर में हुआ तो राखी बाँधने जाती हैं  वरना दिनों पहले ,राखी पोस्ट की जाती है, भाई भी उसी स्नेह से इसका प्रतिदान करते हैं.

पर जब भाई -बहन का यही प्यार निम्न वर्ग और उच्च  वर्ग में देखने को मिलता है तो बड़ी सुखद अनुभूति होती है.

एक बार मैं अपने दादा जी के पास गाँव गयी हुई थी.देखा हमारी गायें चराने वाला चौदह -पंद्रह वर्ष का एक किशोर, मेरे दादा जी से सौ  रुपये मांग रहा है (तब वह एक बड़ी रकम थी ) कुछ दिन बाद उसकी माँ ने बताया कि शिवराम अपनी बहन 'प्रमिला' से मिलने पहली बार उसके ससुराल गया .प्रमिला चावल का पानी निकाल रही थी (भोजपुरी में कहें तो मांड पसा रही थी )..उसने जैसे ही सुना, भाई आया है, ख़ुशी में उसका ध्यान बंट गया और गरम पानी से उसका हाथ जल गया. शिवराम अंदर गया तो देखा,उसकी बहन पुआल पर सोती है. घर आकर वह अपनी माँ से बहुत झगडा कि ऐसी जगह उसकी शादी कर दी कि उसका हाथ जल गया और वह पुआल पर सोती है. उसने मेरे दादाजी से एडवांस पैसे लिए और एक चौकी खरीद,बैलगाड़ी पर लाद, अपनी बहन के ससुराल पहुंचा आया.

ऐसा ही प्यार हाल में देखा. मेरी कामवाली मराठी  बाई, 'माँ बीमार है' कहकर एक दिन अचानक गाँव चली गयी.उसकी बहन काम पर आने लगी तो बताया कि उसके पति ने बहुत मारा-पीटा है..इसीलिए वह चली गयी है. करीब दस दिन बाद वह वापस आई, उसने कुछ नहीं बताया तो मैने भी नहीं पूछा...अचानक उसके थैले में से मोबाइल बजने लगा.मैने यूँ ही पूछ लिया ,'नया मोबाइल लिया?"

तब उसने सारी बात बतायी कि यह सब सुनकर ,उसका भाई चार लोगों के साथ गाँव से आया और उसके पति की अच्छी धुनाई की (कितने मध्यमवर्गीय भाई हैं जिन्होंने यह सुन, अपने जीजाजी को दो झापड़ रसीद किए हों कि मेरी बहन पर हाथ क्यूँ उठाया ?..खैर..) एक कमरा किराये पर ले उसका सारा समान वहाँ शिफ्ट किया और बहन को एक मोबाइल खरीद कर दिया कि जब भी जरूरत हो,बस एक फोन कर ले .इसका  परिणाम भी यह हुआ कि उसका पति खुद माफ़ी मांगता हुआ साथ रहने आ गया.

भाई-बहन का ऐसा  ही निश्छल स्नेह ,उच्च वर्ग में देख भी आँखें नम हो जाती हैं.


अमिताभ बच्चन जब कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान भयंकर रूप से बीमार  पड़े थे ,उन्हीं दिनों राखी भी पड़ी थी और डॉक्टर के मना करने के बावजूद ,अमिताभ बच्चन ने 'सोनिया गांधी' और रमोला (अजिताभ की पत्नी ) की राखी कलाई से नहीं उतारी थी. बाद में सोनिया गाँधी और अमिताभ बच्चन  के सम्बन्ध मधुर नहीं रहें.पर जब तक निश्छल प्रेम था,उसे नज़रंदाज़ कैसे किया जा सकता है? पता नहीं कितने लोगों को पता है,सोनिया गाँधी की शादी ,हरिवंश राय बच्चन के घर से हुई थी ,मेहंदी,हल्दी की रस्म वहीँ अदा की गयी थी और इसी नाते अमिताभ से भाई का रिश्ता बना.

संजय दत्त से सम्बंधित घटना बहुत ही द्रवित करनेवाली है. एक प्रोग्राम में उनकी बहन प्रिया बता रही थीं. संजय दत्त सबसे बड़े थे,इसलिए दोनों बहनों को हमेशा इंतज़ार रहता कि राखी पर क्या मिलेगा,वे अपनी फरमाईशें भी रखा करतीं.पर जब संजय दत्त जेल में थे,उनके पास राखी पर देने के लिए कुछ भी नहीं था. उन्हें  जेल में कारपेंटरी और बागबानी  कर दो दो रुपये के कुछ कूपन मिले थे. उन्होंने वही कूपन , बहनों को दिए. जिसे प्रिया ने संभाल कर रखा था और उस प्रोग्राम में दिखाया. सबकी आँखें गीली हो आई थीं.

ऋतिक रौशन का किस्सा कुछ अलग सा है. उनका और उनकी बहन सुनयना के कमरे तो अलग अलग थे पर उन्हें बाथरूम शेयर करना पड़ता था. ऋतिक रौशन को सफाई पसंद थी जबकि टीनएज़र लड़कियों सी सुनयना  के क्रीम, लोशन,क्लिप्स, नेलपौलिश इधर उधर बिखरे होते. उनका रोज झगडा होता. फिर सुनयना  की शादी हो गयी.ऋतिक जब दूसरे दिन  बाथरूम में गए तो एकदम साफ़ झक झक करता बाथरूम  देख हैरान रह गए.और इतनी  याद आई बहन  की कि तौलिया आँखों से लगाए बाथरूम के फर्श पर ही बैठ रोने लगे.

ये थे भाई बहनों के निश्छल स्नेह के कुछ खट्टे-मीठे पल.



एक बार फिर मेरे सभी भाइयों को राखी की ढेर सारी  शुभकामनाएं
(तीन साल पहले यह पोस्ट लिखी थी आज इसे ही फिर से पढने और पढवाने का मन हो आया )

बुधवार, 14 अगस्त 2013

जीना यहाँ,मरना यहाँ...इसके सिवा जाना कहाँ

मुम्बई एक happening city  तो है ही...हमेशा चर्चा में रहती है . कुछ लोगो को पसंद आती है कुछ लोगो को नहीं, कोई इस शहर से बेपनाह मुहब्बत  करता है तो कोई शिद्दत से नफरत तो किसी किसी के नफरत और मुहब्बत का पलड़ा बिलकुल बराबर का रहता है. इस शहर में कोई मजबूरीवश रहता  है  तो कोई शौक से रहता है . इस शहर के अन्दर भी हर तबके के लोगों के लिए जैसे एक अलग शहर बना हुआ है. और ये  सारे शहर समानांतर चलते हैं. और सब अपने अपने शहर में मगन रहते हैं.एक दुसरे के क्षेत्र  का अतिक्रमण नहीं करते. 

इस शहर में हज़ार कमियाँ हैं . सडकों की हालत खस्ता है . रोड पर गड्ढे हैं.( मुम्बई की सडकों से कहीं अच्छी तो मेरी गाँव की सड़कें हैं .मेरा बेटा  हैरान था ,वहाँ की सड़कों को देखकर..'माँ, एक भी गड्ढा नहीं है सड़क पर' ये उदगार थे उसके  ) भयंकर ट्रैफिक जैम है . एक जगह से दूसरी जगह पहुँचने में घंटो लगते हैं. बेतहाशा महंगाई है . लगातार होती बारिश है... बहुत भीड़ है..गंदगी है... ढूँढने बैठें तो शायद लिखते थक जाएँ पर कमियों की फेहरिस्त ख़त्म न हो.

 मुम्बई में कुछ महीने गुजार चुके एक मित्र ने एक दिलचस्प बात नोटिस की कि इस शहर में इतनी सारी कमियाँ होते हुए भी यहाँ रहने वाला  एक भी व्यक्ति,उन्हें  ऐसा नहीं मिला जिसे मुंबई से शिकायत हो, इस शहर को भला-बुरा कहे, कोसे ...यहाँ रहने वाले सभी को मुंबई पसंद है ....जबकि ऐसा किसी और शहर के लिए उन्होंने नहीं देखा ."

उनकी इस बात ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया ,आखिर ऐसी क्या बात है, मुम्बई में ??
 बाहर से आनेवालों को मुम्बई पसंद नहीं आती पर वही बाहर से आये लोग जब यहाँ के बाशिंदे बन जाते हैं तो उन्हें मुम्बई रास आ जाती है. हालात वहीँ रहते हैं पर नज़रें बदल जाती हैं...भावनाएं अलग सी हो जाती हैं .

इसका मतलब यही होगा कि जब लोग यहाँ बसने की सोच लेते हैं तो फिर इस शहर को अपना लेते हैं... उसके अनुसार रहने की आदत डाल लेते हैं . इसकी अच्छाइयां-बुराइयां उनकी अपनी हो जाती हैं. और जब किसी को भी, चाहे वो शहर हो या व्यक्ति या कोई वस्तु ,अपना लो तो उसकी बुराइयां दिखती तो हैं पर खलती नहीं. कुछ देर के लिए खीझ भी जाएँ...परेशान भी हो जाएँ पर ये भाव स्थायी नहीं होते  क्यूंकि "जीना यहाँ,मरना यहाँ...इसके सिवा जाना कहाँ

अब जिन शहरों में रहते हुए भी लोग नाखुश रहते हैं, उस शहर से शिकायत होती है तो शायद यही वजह होती हो कि उनके सामने हमेशा ये विकल्प खुला होता है , "उस शहर को छोड़ कर चले जाने का " . दुसरे शहर में बसने का सपना पलता रहता है उनके मन में . इसमें कोई बुराई भी नहीं ,हर किसी  को बेहतर भविष्य के प्रयास का हक है. पर जिनलोगों ने उस शहर को अपना बसेरा बना लिया होगा, वे शायद शिकायत न करते हों, उस शहर को भला-बुरा न कहते हों  या करते भी हों तो खुद के लिए नहीं अपने बच्चों के लिए क्यूंकि उन्हें बच्चों के भविष्य के लिए शायद साधन सीमित लगते हों,वहाँ  .वरना अपनी पुरानी बनिए की दूकान, दूधवाला , सब्जीवाली , कपड़े की दूकान जिसे अब दादा के बाद पोता चला रहा हो..सब अपने से लगते होंगे .रास्ते में जमा  पानी और नियमित पावर कट भी जीवन का हिस्सा बन गए होंगे .और अपने हिस्से से शिकायत कैसी ? 
(वैसे कुछ लोगों की शिकायत की आदत ही होती है,  हर चीज़ से शिकायत होती है,उन्हें ...उनका जिक्र नहीं हो रहा ,यहाँ ) 
मेरा गाँव 

वरना मेरे गाँव में ज्यादा सुविधाएं नहीं थीं. बिजली नहीं रहती थी (अब भी नाम के लिए ही आती है ) ..शहर दूर था ,अच्छे डॉक्टर नहीं थे पर हमने अपने दादा जी को या गाँव के लोगो को कभी गाँव की बुराई करते नहीं सुना .क्यूंकि वो 'उनका गाँव' था .उस से अलग जीवन उन्होंने जिया नहीं था और ना ही जीने की इच्छा थी,इसीलिए उन्हें कोई शिकायत भी नहीं थी. 


रविवार, 14 जुलाई 2013

क़ानून को बदला लेने का हथियार न बनाएं


हाल में ही  एक ऐसी खबर पढ़ी जिसे पढ़कर सुकून आया . आजकल कई केस ऐसे देखने में आ रहे हैं जहां लड़के लडकियां लिव-इन-रिलेशनशिप में रहते हैं. और झगडे, ग़लतफ़हमी किसी भी वजह से आपसी अफेयर  ख़त्म हो जाता है तो लड़की, लड़के के ऊपर रेप का केस दर्ज कर देती है. पुलिस तो नियम के तहत बंधी है, वो लड़के को गिरफ्तार कर लेती  है और इस अपराध में जमानत भी नहीं होती . लड़के को जेल जाना पड़ता है. 

बॉम्बे हाई कोर्ट की जज साधना जाधव ने  ३९ वर्षीय मनेश कोटियन को उनपर तीन साल पहले लगे रेप  चार्ज से विमुक्त कर दिया है ...और तीन साल के बाद उन्हें जेल से रिहा करने के आदेश दे दिए गए हैं. महेश कोटियन का एक लड़की के साथ अफेयर था ,लड़की प्रेग्नेंट भी हो गयी पर फिर उनका सम्बन्ध टूट गया और लड़की ने मनेश पर केस कर दिया, और वे गिरफ्तार हो गए. 

मनेश पर धोखाधड़ी का मुकदमा कायम है क्यूंकि उन्होंने अपने शादी-शुदा और तीन बच्चे होने की बात छुपाई थी. लड़की से पूरी सहानुभूति होते हुए भी उसे दोषमुक्त नहीं कहा जा सकता .गलती उसकी भी बराबर की है क्यूंकि अदालत ने भी इस बात का उल्लेख किया है कि वह चीखी चिल्लाई नहीं और तुरंत उस पर रेप चार्ज नहीं लगाया बल्कि आपसी सम्बन्ध बिगड़ने के बाद  लगाया ,इसलिए लड़के को दोषी नहीं माना जा सकता.

ज़िया खान की ख़ुदकुशी से बहुत दुःख हुआ. एक उभरती हुई ज़िन्दगी असमय ही कालग्रसित  हो गए. पर जिया की  आत्महत्या के  लिए 'सूरज पंचोली' को दोषी ठहराना कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं होता.  कच्ची  सी उम्र में उन्हें बीस दिन जेल  की सलाखों के पीछे रहना पड़ा. किस अपराध के तहत ?? अगर प्यार करने का अपराध  था तो ये दोनों ही भागीदार थे. सूरज ने अपनी ज़िन्दगी, जिया के नाम नहीं लिख दी थी कि उसके इशारों पर चले. क़ानून दोषियों को सजा देने के लिए बनाए जाते हैं न कि निरपराधों को परेशान करने के लिए.


एक लड़के और उसके परिवार की पीड़ा बहुत पास से देखी  है, मेरी एक परिचिता के छोटे भाई की शादी हुई पर दोनों की आपस में  नहीं बनी .दोनों ने  डिवोर्स का फैसला ले लिया पर केस तो सालों चलते हैं. इस बीच लड़के ने एक लड़की के साथ मिलकर कोई बिजनेस शुरू किया . दोनों के बीच  प्यार हुआ पर वह लड़की से शादी नहीं कर सकता था क्यूंकि डिवोर्स की कार्यवाई पूरी नहीं हुई थी और उसे अभी डिवोर्स नहीं मिला था. दोनों लिव-इन रिलेशन में रहने लगे . चार साल साथ रहने के बाद उनके आपसी  सम्बन्ध खराब हुए और उस लड़की ने लड़के के ऊपर रेप चार्ज लगा दिया. पुलिस ने लड़के को गिरफ्तार कर लिया. उस लड़की ने मेरी परिचिता ,उसके पति और  और उनके  बच्चों  का नाम भी पुलिस में दे दिया था (डोमेस्टिक वायलेंस या ऐसा ही कुछ चार्ज होगा ) परिचिता  के पति ने पुलिस को पचास हज़ार रिश्वत देकर अपने परिवार का नाम हटवाया. और इस बीच दस दिन तक एक अपराधी की तरह पूरा परिवार पुलिस से छुपता रहा . महीनों जेल में रहा वो लड़का. उसके क्लास वन ऑफिसर पिता जिन्हें रिटायरमेंट के बाद जहां सुकून से अपनी ज़िन्दगी बितानी चाहिए थी. नियमित रूप से बेटे से जेल में मिलने जाते. उनके घर में मातम का माहौल था . फिर आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट हुआ. उस लड़की को अच्छे खासे पैसे दिए गए .तब उसने अपना चार्ज वापस लिया और लड़का जेल से रिहा हुआ .

अगर लडकियां लिव-इन-रिलेशन में रहना स्वीकार करती हैं या फिर प्यार में सारी  सीमाएं तोड़ देती हैं तो उन्हें इस सम्बन्ध के टूटने के अंदेशे  के लिए भी मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए. मात्र अफेयर में होने से  या लिव-इन -रिलेशनशिप  शिप में होने से वे शादी के लिए दबाव नहीं डाल सकतीं . और अफेयर ख़त्म हो जाने कि दशा में लड़के को सजा देने के लिए इस कानून को हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकतीं. 

यह एक बहुत ही जरूरी क़ानून है और हज़ारों लडकियां जो रेप का शिकार होती हैं ,उनके अपराधी को इस क़ानून के सहारे सजा दिलवाई जा सकती है. इस क़ानून को और सख्त बना कर इसका आतंक पैदा किया जा सकता है. लेकिन इसे बदला लेने का हथियार बना ,क़ानून का माखौल नहीं उड़ाने दिया जा सकता. बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला  स्वागतयोग्य है.

रविवार, 7 जुलाई 2013

ख़ामोश इल्तिज़ा

(मन हो तो ये कहानी पढ़ लें या फिर निलेश मिश्रा जी की गहरी भावभरी आवाज़ में सुन लें )

तन्वी बालकनी में खड़ी सामने फैले स्याह अँधेरे को घूंट घूंट पीने की कोशिश कर रही थी ,सोचती कुछ ऐसा जादू हो कि वो स्याह अँधेरे में गुम हो जाए और फिर कोई उसे देख न पाए. तभी मोबाईल पर मैसेज टोन बजावो चेक करने नहीं गयीपता था सचिन का मैसेज होगा, "पढ़ लिया न मेरा मैसेज ,अब जरा मुस्करा दो . सचिन का पहला मैसेज पढने के बाद ही बालकनी में आयी थी. और पता था वो दूसरा मैसेज यही भेजेगा . सचिन उसके ऑफिस में हाल में ही आया है ,पर अक्सर टूर पर रहता है. पूरे देश में घूमता रहता और जहां भी जाता है वहां से उसे मैसेज जरूर करता है, कुछ ख़ास नहीं बस उसकी खिडकी से जो भी नज़ारा उसे दिखता है ,वो लिख भेजता है .कभी लिखता , ‘बर्फीली चोटियों पर चाँद की किरणें ऐसे पड़ रही हैं कि सबकुछ नीले रंग में नहा उठा  है ,काश तुम देख पाती कभी राजस्थान के सैंड ड्यून्स का वर्णन करता , कभी काले घुमड़ते बादलों का ,कभी दहकते गुलमोहर का तो कभी पछाड़ खाती समुद्र की लहरों का . एक बार ताजमहल देखने गया तो सिर्फ इतना मैसेज लिखा...वाह ताज !!  ताजमहल को देखा और तुम याद आयी वो किसी मैसेज का जबाब नहीं देती .और सचिन ये बात जानता था .एक बार मैसेज में ही लिखा था , ‘मेरा फोन तो उठाओगी नहीं पर जानता हूँ मैसेज जरूर पढ़ोगी और पढ़ कर मुस्कुराओगी भी ‘.

सचिन बहुत ही जिंदादिल और हंसमुख लड़का था . जितने दिन भी ऑफिस में रहता रौनक आ जाती ऑफिस में. लडकियां तो उसके आस-पास ही मंडराती रहतीं. लड़के भी उसके अच्छे दोस्त थे. अक्सर शाम उन सबका  किसी पार्टी का प्लान बन जाता. वो हमेशा की तरह बस अपने काम से काम रखती और फिर ऑफिस के बाद सीधा घर . शुरू में सबने उसे भी शामिल करने की कोशिश की थी. पर हर बार उसकी ना सुन कर उसे अपने हाल पर छोड़ दिया था .सचिन ने भी हर संभव कोशिश की ,साथ चाय कॉफ़ी लंच का आग्रह ,उसे घर छोड़ देने की पेशकश पर हर बार वो सिर्फ हल्का सा मुस्कुरा कर सर हिला कर ना कर देती . एक बार सचिन ने उसे कह ही दिया , “आपको पता है, आपने अपने चारो तरफ एक  दीवार उठा रखी है, पर यह दीवार दूसरों  को बाहर रखने से ज्यादा आपको अन्दर बंद रखेगी...बहुत घुटन होगी...एक छोटी सी खिड़की तो खोलिए ,थोड़ी ताज़ी हवा आने दीजिये
आपकी बातें मेरी बिलकुल समझ में नहीं आ रहीं...ये काम निबटा लूँ ज़रा कब से पेंडिंग पड़ा है और तन्वी ने कंप्यूटर स्क्रीन पर नज़रें गड़ा दीं.
कोई बात नहीं ,हम भी छेनी हथौड़ा लेकर इस दीवार को गिरा कर ही रहेंगे .उसकी तरफ एक मुस्कुराहट उछालता सचिन चला गया वहाँ से .

वो बेतरह डर गयी , अगर सचिन ज्यादा से ज्यादा टूर पर नहीं होता तब शायद वो रिजाइन ही कर देती. अब किसी के करीब जाने या किसी को अपने करीब आने देने की हिम्मत नहीं बची थी उसमे. दो दो बार धोखा खा कर उसका दिल छलनी हो चुका था.

*** 

सिड तन्वी की बिल्डिंग में रहता था और उसके ही स्कूल में था . कब साथ खेलते पढ़ते उनके बीच प्रेम का अंकुर फूटा, अहसास भी नहीं हुआ. पर धीरे धीरे वो अंकुर एक पौधे का रूप ले चुका था और उसमे फूल खिल आये थे, जिसकी खुशबु पूरी बिल्डिंग में फ़ैल गयी थी . सबको पता चल गया था , बात तन्वी के माता-पिता तक भी पहुंची .लेकिन तन्वी की शादी को लेकर उसके माता- पिता ने बड़े बड़े ख्वाब बुन रखे . लम्बे बालों वाला, कलाई में ब्रेसलेट पहने ,हाथों पर टैटू बनवाये ,म्युज़िक को ही अपनी ज़िन्दगी समझने वाला सिड कहीं से भी उन सपनों पर खरा नहीं उतरता था .तन्वी ने हिम्मत दिखाई , ‘सिड के साथ भाग जाने को भी तैयार थी .पर सिड ने ही कदम खींच लिए .उलटा उसे समझाने लगा , ‘हम कहाँ रहेंगे ,कैसे घर चालायेंगे ,मेरे कैरियर  का क्या होगा?’ तन्वी ने कहा भी, ‘वो नौकरी कर लेगी, सिड आराम से अपना कैरियर बना सकता हैलेकिन सिड उलटा उसे समझाने लगा , “तुम कितना कमा लोगी कि हम अलग रह कर घर भी चला सकें और मैं अपने शौक भी पूरे कर सकूँ. एक गिटार की कीमत पता है?? और उसकी क्लासेज़ की फीस ?? मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है तन्वी...कितनी मिन्नतें करनी पड़ती हैं ,तब जाकर पापा पैसे देते हैं. अगर तुम्हारे पैरेंट्स नहीं मान रहे तो फिर हमें एक दुसरे को गुडबाय कह देना चाहिए

सिड की ये बातें सुनकर तन्वी ने फिर कुछ नहीं कहा, ‘उसे भीख में प्रेम नहीं चाहिए था ‘ .पर इस घटना ने पता नहीं उसके पैरेंट्स पर क्या असर डाला कि वे तन्वी की शादी के लिए जल्दबाजी मचाने लगे. चुपचाप रिश्तेदारों से मिलकर एक लड़का ढूंढा गया और मुम्बई से बहुत दूर वह इस शहर में ब्याह दी गयी. तन्वी के एतराज जताने पर माँ से सुनने को मिला, “पहले ही बहुत गुल खिला चुकी हो...इसके पहले कि हमारे मुहं पर कालिख पुते, अपना घर –बार संभालो “.

तन्वी को भी अपने पैरेंट्स पर बहुत गुस्सा आया और उसने भी सोच लिया..ठीक है वह ,अब अपना घर बार ही संभालेगी ,पलट कर उन्हें नहीं देखेगी उसने पूरे तन-मन से अपने पति को अपनाया . पर उसकी किस्मत ने यहाँ भी धोखा दिया. उसके पति को एक साथी नहीं एक केयर टेकर चाहिए थी. उनकी ज़िन्दगी शादी से पहले जैसी चल रही थी, उसमे शादी के बाद भी कोई बदलाव नहीं आया . वही ऑफिस के बाद दोस्तों के साथ समय बिताना . शनिवार की रात जमकर शराब पीना और फिर सारा सन्डे सो कर निकालना . अगर तन्वी कुछ कहती तो गालियाँ मिलतीं . एक बार तन्वी ने तेज आवाज़ में एतराज जताया तो पति ने हाथ भी उठा दिया . इसके बाद तन्वी सहम सी गयी , अपने माता-पिता से शिकायत की तो उन्होंने कहा , “वक़्त के साथ सब ठीक हो जाएगा थोड़ा बर्दाश्त करो पर वक़्त के साथ ठीक कुछ भी नहीं हुआ बल्कि पति और भी ढीठ हो गया . तन्वी के पति को खुद के एक छोटे शहर से होने का बहुत कॉम्प्लेक्स था .वे अक्सर तन्वी को बड़े शहर वाली , बॉम्बे वाली कहकर ताना दे जाते. फिर भी तन्वी इस शादी को कामयाब बनाने की कोशिश में जुटी रही. पर जब उसका मिसकैरेज हुआ और उसके बाद भी पति ने एक दिन भी छुट्टी नहीं ली, उसे हॉस्पिटल में छोड़ वैसे ही ऑफिस चला गया तब तन्वी बुरी तरह टूट गयी. उसे इस शादी से कोई उम्मीद नहीं बची.

दो तीन महीने तो वो डिप्रेशन में ही रही. फिर उसके बाद खुद को ही धीरे धीरे समेट कर ज़िन्दगी पटरी पर लाने की कोशिश करने लगी. रोज अखबार में नौकरी वाले कॉलम देखती,लाल निशान लगाती और बिना पति को बताये इंटरव्यू दे आती. पर कहीं उसे नौकरी पसंद नहीं आती कहीं क्वालिफिकेशन के अभाव में वो रिजेक्ट कर दी जाती. कहीं दोनों पसंद आते तो सैलरी इतनी कम होती कि इतना मर खप कर नौकरी करना उसे नहीं जमता. फिर उसे इस कंपनी में मनलायक नौकरी मिली.

पति से पूछा नहीं बस उन्हें बताया . सुनने को मिला, “हमारे खानदान की औरतें नौकरी नहीं करतीं

उसने पलट कर तुरंत ही कहा और हमारे खानदान के पुरुष शराब पीकर औरतों को नहीं पीटते
शायद नयी जॉब ने ही उसे इतना कहने की हिम्मत दे दी थी . पर पति का इगो बहुत हर्ट हुआ और वे रोज सुबह शाम ताने कस कर बदला लेने लगे , तैयार होते देख व्यंग्य करते ,”इतना सजा धजा किसके लिए जा रहा है ,बॉस  बहुत हैंडसम है क्या ?”
रोज देर से आने वाले पति अब जल्दी आने लगे थे . जिस दिन उसे देर हो जाती सुनने को मिलता, “ ऑफिस के बाद कॉफ़ी-शॉफी पीने चली गयी होंगी , नौकरी बचाए रखने को ये सब करना पड़ता है...रोज देखता हूँ मैं, यह सब  “

अपने होंठ सिल कर वो सारे काम किये जाती. अपने माँ-बाप के मन का हाल जानती थी . उन्हें अगर पता चल जाता कि उसके पति को उसका जॉब करना पसंद नहीं तो शायद जबरदस्ती छुड़वा देते. इसलिए बिना पति के किसी ताने  का जबाब दिए वह सारे काम करती और ज्यादा से ज्यादा उनसे दूर रहती. बस ऑफिस का काम ही उसके लिए जीने का सहारा था. उसने बहुत मन लगाकर काम सीखा. ऑफिस के पौलिटिक्स, गॉसिप से भी दूर रहती, मेहनत से काम करती. इस वजह से ऑफिस में उसकी बहुत इज्जत भी थी .

कभी कभी तलाक लेने के विषय में सोचती भी पर फिर खुद को ही समझा देती, “क्या फर्क पड़ जाएगा तलाक लेने से ,आज भी एक छत के नीचे अजनबी की तरह ही रह रहे हैं, आगे भी अजनबी ही रहेंगे पर एक दिन वो घर की चाबी ले जाना भूल गयी थी. ऑफिस में ऑडिट चल रहा था, उसे घर आने में देर हो गयी. कई बार घंटी बजायी पर उसके पति ने दरवाजा नहीं खोला. पूरी रात उसने सीढियों पर बैठ कर बिताई . और वहीँ बैठे बैठे एक निर्णय ले लिया. सुबह दूध वाले, पेपर वाले न देख लें इस डर से पति ने दरवाजा खोल दिया . वह अपने कमरे में जाकर सो गयी . उस दिन ऑफिस से छुट्टी ले ली. और सारा दिन घर ढूँढने में बिताया . शाम को सामान बाँधा पति के आने का इंतज़ार किया पति का रिएक्शन था ,“ हाँ ,ठीक है..जाइए जाइए..मैं भी डिवोर्स दे दूंगा..दूसरी शादी करूंगा

आप शौक से दूसरी तीसरी जीतनी मर्जी हो शादी कीजिये मुझे आपके डिवोर्स पेपर का इंतज़ार रहेगा “  कह वह बाहर निकल आयी.

उसके बाद से ही उसकी ज़िन्दगी एक शांत झील की तरह हो गयी है. सीमित दायरे में कैद...न उसमें कोई तरंग उठती है न किनारे  टूटने का कोई डर होता है. ऑफिस से आना देर रात किताबें पढना , गज़लें सुनना .इतना सुकून शायद उसकी ज़िन्दगी में कभी रहा भी नहीं. पर जब से सचिन ने ऑफिस ज्वाइन किया है वो लगातार इस शांत झील में कंकड़ फेंकता जा रहा  है. थोड़ी देर को तरंगें उठती हैं पर फिर झील की सतह वैसे ही शांत हो जाती है. पर अब झील के तल में इतने कंकड़ जमा हो गए थे कि उनकी चुभन , झील को तकलीफ दे रही थी .

***

सचिन भला लड़का था, तन्वी को उसका अटेंशन पाकर अच्छा लगता था.पर प्यार और शादी में दो बार धोखा खा चुकी तन्वी, सचिन को करीब आने देने से डर रही थी. उसे यह भी लगता, सचिन को उसके पास्ट के बारे में मालूम नहीं है, इसीलिए वह उसकी तरफ आकर्षित है. जैसे ही सचिन को सच्चाई पता चलेगी ,वह उस से खुद ब खुद दूर हो जाएगा ,इसीलिए वह सचिन से दूर दूर ही रहती पर सचिन के बार बार आते sms ने उसे उलझन में डाल दिया था. और उसने सचिन से मिलकर उसे सबकुछ साफ़ साफ़ बता देने का फैसला किया. उसे विश्वास था सचिन को उसके बारे में कुछ भी पता नहीं अगर वो अपना सारा पास्ट उसे बता देगी तो वो बात समझ जाएगा और फिर उस से दूर हो जाएगा . कुल जमा अपनी चौबीस साल की ज़िन्दगी में तन्वी ने इतना कुछ देख लिया था कि उसे अब अपनी ज़िन्दगी में और उथल-पुथल गवारा नहीं थे.

उसने सचिन को मैसेज किया , “कब वापस आ रहे हो टूर से ?”

वाsssऊ... कांट बीलीव, तुम पूछ रही हो...बस अभी एयरपोर्ट की तरफ निकलता हूँ , सुबह तक कोई न कोई फ्लाईट मिल ही जायेगी और फिर डेढ़ घंटे में आपके सामने हाज़िर
मजाक छोडो ..सच बताओ...तन्वी ने फिर से मैसेज किया .
आई शपथ...सच कह रहा हूँ
ठीक है मैं कल ऑफिस में पता कर लूंगी...
और इस बार सचिन ने मैसेज की जगह कॉल ही किया. थोड़ी देर फोन घूरती रही तन्वी फिर उठा कर जैसे ही हलोकहा, सचिन का चिंता भरा स्वर सुनायी दिया, “क्या बात है तन्वी...कुछ परेशानी है...मैं मजाक नहीं कर रहा ,सच में कल आ सकता हूँ “ 
दिल भर आया तन्वी का थोडा रुक कर बोली , कि कहीं आवाज़ का कम्पन पता न चल जाए . कोई परेशानी नहीं बाबा....बस ऐसे ही कुछ बात करनी है
आज तो मेरे सितारे खुल गए ...तुम्हे मुझसे बात करनी है ?? जो सामने देख कर भी मुहं घुमा लेती है आज उसे मुझसे बात करनी है...ओह!! सचमुच यकीन हुआ, खुदा है इस जहां में वरना मेरी दुआ कैसे क़ुबूल हो जाती...
अब ये डायलॉगबाज़ी बंद करो...तुम्हारे आने के बाद कॉफ़ी पर मिलते हैं..चलो गुडनाईट
अरे !! इतनी जल्दी क्या गुडनाईट...अभी तो बात की शुरुआत है..फिर मुलाक़ात होगी और फिर...
मैं सोने जा रही हूँ..गुडनाईट
मैं परसों आ रहा हूँ तन्वी...सीधा ऑफिस ही आउंगा उसके बाद मिलते हैं...गुडनाईट एन यू प्लीज़ टेक केयर...बाय इस बार सचिन का स्वर गंभीर था .
यू टू...बाय तन्वी ने फोन रख दिया पर अब आँखों में नींद कहाँ थी. पहली बार सचिन से इस  तरह खुलकर बात हुई थी और दोनों ही अपनेआप तुम पर आ गए थे . शायद उसके लगातार आते मैसेज ने आप वाली अजनबियत हटा दी थी .देर रात तक ताने बाने बुनती रही कि कैसे बात की शुरुआत करेगी क्या क्या बताएगी, सचिन का क्या रिएक्शन होगा.

सचिन दोपहर बाद ऑफिस में आया . बाल बिखरे हुए थे . चेहरे पर थोड़ी परेशानी की लकीरें दिख रही थीं अब वे सचमुच थीं या तन्वी की कल्पना कहना मुश्किल था. दूर से ही उसकी तरफ बड़ी गहरी नज़रों से देखते हुए बहुत ही अपनेपन से मुस्कुरा दिया .लेकिन उसकी डेस्क के पास नहीं आया ,शायद उसकी असहजता भांप रहा था . छः बजे के करीब उसके पास आकर धीरे से बोला, “कहीं इरादा बदल तो नहीं दिया ?”
उसने भी मुस्करा कर सर हिला कर कह दिया .
फिर कहाँ चले कॉफ़ी के लिए
वो बीन्स एंड बियोंड ‘ है न ..ऑफिस से ज्यादा दूर भी नहीं.
दूर के लिए कोई बात नहीं, कार लेकर आया हूँ...अब इतनी मुश्किल से मौक़ा मिला है ,जितनी देर का साथ मिल जाए ,घर भी  छोड़ दूंगा ..इसी बहाने घर भी देख लूंगा...फिर तो जब मन हुआ डोरबेल बजायी जा सकती है शरारत से मुस्कराया सचिन .
तन्वी ने त्योरियां चढ़ाईं तो हंस दिया  ,”मजाक था बाबा ..समझा करो .अब सब समेटो मैं बाहर इंतज़ार कर रहा हूँ .
सचिन के जाने के बाद तन्वी सोचती रह गयी, पहली बार ऐसे भरपूर नज़र डाली थी सचिन के चेहरे पर सचमुच दिलकश है मुस्कान उसकी..इसीलिए लडकियां मरी जाती हैं..फिर कंधे उचका दिए..उसे क्या , आज तो उसे सब बता देगी फिर सच जानकार सचिन खुद ही उस से सौ फीट की दूरी रखेगा

सचिन कार में वेट कर रहा था .जगजीत सिंह की नज़्म बज रही थी, “बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी...”तन्वी कहने वाली थी ,’मेरी फेवरेट नज़्म है यह ‘ फिर खुद को ही झिड़क दिया, “वह दोस्ती बढाने नहीं, ख़त्म करने आयी थी. फिर एक ठंढी सांस भी ली, “अब बात दूर तलक क्या जायेगी...हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म हो जायेगी .सचिन ड्राइव करते हुए चुप सा था. शायद उसके भी मन में चल रहा था, क्या कहने वाली है वह रास्ते में बस ट्रैफिक मौसम की बाते होती रहीं. जब बीन्स एंड बियोंडनिकल गया तो तन्वी ने उसकी तरफ देखा .सचिन ने सड़क पर नज़रें जमाये हुए ही कहा, ‘यहाँ बहुत भीड़ होती है...आगे चलते हैं न सुकून से दो पल बैठेंगे

अच्छी जगह चुनी थी सचिन ने, बड़े बड़े आरामदायक चेयर्स थे . हलकी सी रौशनी थी और लोग भी बहुत ज्यादा नहीं. वो भी पैर फैलाकर रिलैक्स होकर बैठी थी . बस बात कैसे शुरू करे यही सोच रही थी . 
सचिन ने मेन्यु कार्ड पर नज़र घुमाते हुए पूछा , “क्या लोगी...
बस कॉफ़ी...
चिली टोस्ट ट्राई करो बड़ी अच्छी होती है यहाँ की" कहते उसने चिली टोस्ट और और कॉफ़ी ऑर्डर कर दिया था .तन्वी ने बात जारी रखने को कहा, ‘अक्सर आते हो यहाँ ?”
अब कहाँ वक़्त मिलता है..महीनों बाद आया हूँ, कॉलेज के दिनों में अक्सर आता था
गर्ल फ्रेंड्स के साथ ?” उसने छेड़ा
हाँ, गर्लफ्रेंड्स के साथ...जलन हो रही है ? “ सचिन ने भी हंस कर उसी सुर में जबाब दिया .
मुझे क्यूँ जलन होगी ? “,उसने तेजी से कहा .
हाँ, तुम्हे क्यूँ जलन होगी...ऐसा है ही क्या हमारे बीच सचिन कुछ गंभीर हो गया था .
तन्वी को सूझा नहीं क्या जबाब दे ..अच्छा हुआ उसी वक़्त कॉफ़ी आ गयी.
टोस्ट कुतरते कॉफ़ी के घूँट भरते दोनों ही चुप थे सचिन शायद इंतज़ार कर रहा था ,वो अपनी बात शुरू करे
आखिर तन्वी ने बात शुरू की , “सचिन तुम्हारे एस.एम.एस आते हैं..मैं रिप्लाई नहीं करती...मुझे अच्छा नहीं लगता
मुझे भी ये अच्छा नहीं लगता ...सचिन ने कप रखते हुए उसकी आँखों में सीधा देख मुस्कराते हुए कहा. 
वो थोड़ी असहज हो गयी लेकिन फिर संभाल लिया खुद को , “ देखो इसकी एक वजह है ...मैं सिंगल नहीं हूँ
ओह! आई सी...
नहीं मेरा मतलब सिंगल तो हूँ..पर वैसी सिंगल नहीं ...एक्चुअली आयम अ डीवोर्सी
सो ??”..सचिन ने कंधे उचका दिए
तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ता ???” उसे अचरज हुआ
क्या फर्क पड़ना चाहिए ...और ये बात मुझे पता है “ सचिन ने कंधे उचका दिए .
क्याsss ??..वो जैसे आसमान से गिरी . तुम्हे कैसे पता ??”
मैडम हमलोग इन्डियन हैं और हमारा फेवरेट टाईमपास है गॉसिप...याद नहीं पर किसी ने बहुत पहले ही बताया था
और तुम्हे लगा ये तो अवेलेबल है ,इसपर चांस मारा जा सकता है ?“ ये जानकार कि सचिन को ये बात पहले से पता है तन्वी को बहुत गुस्सा आ रहा था
व्हाssट ??..सचिन इतने जोर से चौंका कि थोड़ी कॉफ़ी उसके पैंट पर छलक ही गयी .
हाँ !! तुमने यही सोचा ये तो डीवोर्सी है...अकेली रहती है....इसके साथ टाईमपास किया जा सकता है ...रात बिरात मैसेज भेजा जा सकता है ऑफिस में उसके पीठ पीछे लोग उसकी बातें करते हैं ये जान उसे बहुत गुस्सा आ रहा था और वो इसका बदला सचिन से ले रही थी.
तन्वी..आयम सॉरी... आयम रियली रियली सॉरी...मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊं मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा...और मुझे भी नहीं पता तुम मुझे इतना अवॉयड करती थी फिर भी मुझे तुमसे बात करना ,अच्छा लगता था. पता नहीं तुम्हे देख कर क्यूँ लगता कि तुम एक शांत झील सी हो, एक सीमित दायरे में कैद जबकि तुम्हे एक चंचल नदी बनकर बहना चाहिए. मैसेज इसलिए भेजता कि कहीं भी कुछ अच्छा  देखता तो मुझे तुम्हारा ख्याल आ जाता. मन होता ,वो जगह तुम्हारे साथ देखूं, बस इतनी सी बात है तन्वी और कुछ नहीं
यही होता है... डीवोर्सी के साथ अवेलेबल का टैग अपने आप लग जाता है....इसीलिए मैं सबसे इतनी दूरी बना कर रखती हूँ और देखो तुम्हें भी मालूम था फिर भी तुम मेरे करीब आने की कोशिश करते रहे, मुझसे दोस्ती बढाते रहे तन्वी की आँखें छलछला आयीं .
सचिन कुछ कहने जा रहा था पर उसकी भीगी आँखें देख चुप हो गया , कुर्सी से पीठ टिका दी ...एक गहरी सांस ली...फिर पूछा , “तो तुम क्या चाहती हो...मैं तुमसे दूर रहूँ ??”
हाँ ..आँखों में जलते हुए आंसू लिए हुए जैसे बच्चों की तरह एक जिद से कहा .
ठीक है डन.... अब नो मैसेजेस...नो बातचीत.. दूर रहूँगा, तुमसे ..इतनी बड़ी बात कह दी...बहुत हर्ट किया है मुझे...ऐसा कैसे सोच लिया तुमने...सचिन ने हैरानी से सर हिलाया
क्यूंकि यही सच है ...वो कड़वी होती जा रही थी .
फिर सचिन ने वेटर के बिल लाने का भी इंतज़ार नहीं किया काउंटर पर जाकर बिल चुकाया . वो भी साथ ही उठ आयी.
 बाहर निकल कर तन्वी ने कहा ,”मैं ऑटो ले लूंगी..
ओके.. कहता सचिन आगे बढ़ कर ऑटो रोकने लगा . ऑटो में बैठते हुए , सचिन की तरफ देखने की हिम्मत नहीं हुई तन्वी की ..बाय भी नहीं कहा...उसकी आँखें तो गंगा जमुना बनी हुई थीं.
घर आकर भी देर तक रोती रही . पर समझ नहीं पा रही थी ,वो तो सचिन को खुद से दूर रहने के लिए कहने गयी थी. सचिन ने उसकी बात मान भी ली ,फिर भी क्यूँ उसके आंसू यूँ उमड़े चले आ रहे थे .
***

सचिन ने अपना वायदा निभाया भी. उसकी तरफ कभी देखता भी नहीं , ऑफिस में भी थोडा बुझा बुझा सा रहता, लोगो ने भी नोटिस किया तो उसने टाल दिया..अरे, इतना टूर रहता है,यार ...आज यहाँ, कल वहाँ थक जाता हूँ पर अब तन्वी की नज़रें हर वक़्त सचिन पर रहतीं. वो कब टूर पर जा रहा है, कब वापस आ रहा है, सारी  खबर रहती उसे. मोबाइल कंपनी वालों का भी कोई मेसेज आता तो चौंक जाती , और फिर सचिन के पुराने मैसेज कई कई बार पढ़ती. अपने उस दिन के व्यवहार का गिल्ट उसके मन में घर कर गया था . वो सचिन को कुछ और कहना चाहती थी पर कुछ और ही कह गयी. उसने सारा दोष सचिन पर डाल दिया ,जबकि इतना वो भी जानती थी ,सचिन के मन में ऐसा ख्याल नहीं रहा होगा. पर तन्वी को समझ नहीं आ रहा था, यह जानते हुए भी कि वह एक डीवोर्सी है सचिन उस से प्यार कैसे कर सकता है? जबकि वो हैंडसम है, काबिल है, उसे कितनी ही सिंगल लडकियां मिल जायेंगी. फिर ये भी सोचती ,अगर सचिन सचमुच सिर्फ उसके साथ टाइम पास करना चाहता था तो फिर उसके बात करने से मना करने पर इतना उदास क्यूँ रहने लगा है?और तन्वी ने सोचा, उस से मिलकर ,अपने उस दिन के व्यवहार के लिए माफ़ी तो मांग ही लेनी चाहिए. उसे अपनी बीती ज़िंदगी की सारी बातें बता देगी कि क्यूँ वह इतनी कड़वी हो गयी थी.
और उसने सचिन को मैसेज कर दिया..क्या बहुत नाराज़ हो ?“
मैं तुमसे कभी नाराज़ नहीं हो सकता...इस जनम में तो नहीं सचिन का जबाब पढ़ फिर से उसकी आँखें भर आयीं .
कल, चलें कॉफ़ी पीने ?“
ठीक है एक स्माइली के साथ सचिन का सादा सा जबाब आया ,फिर से कोई मजाक कर के वो रिस्क नहीं लेना चाहता था .

ऑफिस के बाद सचिन उस दिन की तरह ही कार में उसका वेट कर रहा था . पर आज गाड़ी में कोई ग़ज़ल या गाना नहीं बज रहा था हलके से मुस्कुरा कर उसने उसके लिए दरवाजा खोल दिया .
बैठते ही तन्वी ने कहा.. सॉरी मुझे वो सब नहीं कहना चाहिए था...मैं कुछ ज्यादा ही बोल गयी ..
कोई बात नहीं...मैं समझता हूँ ..
सचिन मुझे तुमसे ढेर सारी बातें करनी है...
बोलो..आयम ऑल इयर्स जरा सा मुस्कुरा कर उसकी तरफ देख फिर नज़रें सड़क पर जमा दीं.
छोडो कहीं नहीं जाते हैं ...लॉन्ग ड्राइव पर चलो..यहीं प्राइवेसी है ..मैं सब बताती हूँ
ठीक है..”..इतना बोलने वाले सचिन के दो दो शब्द के जबाब तन्वी को बड़े अजीब लग रहे थे पर वो समझ रही थी..वो बहुत हर्ट है और अब कुछ भी बोलकर मुसीबत में नहीं पड़ना चाहता .

वो चुन चुन कर सुनसान रास्ते पर धीरे धीरे गाड़ी घुमाता रहा और तन्वी परत दर परत अपनी ज़िन्दगी के गुजरे लम्हे उसके सामने खोलती गयी . सचिन ध्यान से सुन रहा था जब कभी उसकी तकलीफ से बहुत आहत होकर उसकी तरफ देखता तो तन्वी सामने नज़रें टिका देती. पति से अलग होकर अकेले रहने की बात तक पहुँचते पहुँचते तन्वी की आवाज़ आंसुओं में डूब चुकी थी . सचिन ने एक किनारे गाड़ी लगाकर, तन्वी का सर अपने कंधे से टिका लिया. आंसुओं से चिपके उसके बाल समेट कर पीछे कर दिए और उसका सर सहलाते हुए बस इतना कहा, “भरोसा कर सकती हो तो इतना भरोसा करो मुझपर, अब इसके बाद एक आंसू नहीं आने दूंगा तुम्हारी आँखों में ..बहुत झेल लिया तुमने, अब और नहीं, मेरे होते अब और नहीं ..तन्वी थोड़ी और पास सिमट आयी , आज तक सब कुछ उसने अकेले झेला था ,सारी लड़ाई अकेले लड़ी थी ,अब तक कोई उसकी तकलीफ को यूँ अपनी तकलीफ समझ दुखी नहीं हुआ था. और तन्वी ने अपनी आँखें मूँद लीं . सब कुछ कह कर उसका मन हल्का हो गया था .साड़ी कडवाहट आंसुओं में धुल चुकी थी और अब उसका मन बीते दिनों के गहरे अँधेरे से निकल कर ,इस निश्छल प्रेम की नर्म रौशनी के स्वागत के लिए तैयार था .

(समाप्त )

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