शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

खेलप्रेमियों का नया चहेता : युवराज वाल्मीकि

इस पोस्ट को कुछ दिनों पहले ही लिखना था..पर अनेकानेक कारणों से वक़्त नहीं मिला...पर देर से ही सही इसे लिखने की तमन्ना जरूर थी.

इंग्लैण्ड के हाथों भारतीय क्रिकेट टीम को मिली करारी हार ने खेल प्रेमियों को व्यथित कर रखा था...ऐसे में मरहम का कार्य किया हॉकी में मिली अनापेक्षित जीत ने. लेकिन इस मरहम का प्रयोग कितने लोग कर पाए...क्यूंकि अधिकाँश लोगो को हॉकी की खबर ही नहीं रहती...ना तो अखबार में इसके चर्चे होते हैं ना ही टी.वी. पर (ब्लॉगजगत में हुई हो तो पता नहीं) .12 सितम्बर 2011 को चीन में एशियन हॉकी चैम्पियंस ट्रॉफी के फाइनल मैच में भारत ने पकिस्तान को 4-2  से हराकर चैम्पियंस ट्रॉफी जीत ली. पर इस मैच का सीधा प्रसारण किसी भी चैनल ने नहीं किया क्यूंकि वे क्रिकेट मैच दिखाने में व्यस्त थे 

भारतीय क्रिकेट टीम, टेस्ट-मैच श्रृंखला....एक-दिवसीय श्रृंखला...T-20  श्रृंखला हार  गयी, पर उसके खिलाड़ी जब भारत लौटे तो हर खिलाड़ी 15 से 20 लाख रुपये कमा चुका था. और यहाँ हमारी हॉकी टीम के खिलाड़ियों की कमाई  थी... 300 रुपये दैनिक भत्ते के हिसाब से कुछ हज़ार रुपये (विशवास नहीं होता..पर मैंने अखबार में यही पढ़ा है) 

जब टीम जीत कर लौटी तो हॉकी फेडरेशन के सेक्रेटरी ने हर खिलाड़ी को इनामस्वरूप पच्चीस हज़ार रुपये देने की घोषणा की. जब खिलाड़ियों ने इतनी कम राशि लेने से इनकार कर दिया और मिडिया ने भी आलोचना की तब डेढ़ लाख रुपये के इनाम की घोषणा की गयी. 
पंजाब सरकार, उड़ीसा सरकार, महाराष्ट्र सरकार ने खिलाड़ियों के लिए इनाम की घोषणा की है लेकिन इस विवाद के बाद. वरना टीम के जीत की खबर सुनते ही किसी ने टीम के लिए किसी इनाम की घोषणा नहीं की. जबकि क्रिकेट टीम को मिली किसी भी जीत पर इनामो की कैसी बारिश की जाती है...यह सब हम हाल के दिनों में देख ही चुके हैं.

                                                              युवराज वाल्मीकि अपनी झोपड़ी में 
मुंबई के युवराज वाल्मीकि भी इस टीम के सदस्य थे और जीत में भी उन्होंने अहम् भूमिका निभाई. उन्हें महाराष्ट्र सरकार ने दस लाख रुपये देने की घोषणा की है. पर जब उनके बारे में पढ़ा तो पता चला वे एक झोपडी में रहते हैं, जिसमे दरवाजे भी नहीं है..और पक्की छत भी नहीं. पर वो झोपडी कप और शील्ड से सजी हुई है. मैने सोचा दस लाख में मुंबई में तो एक फ़्लैट भी नहीं खरीद  सकते वे. खैर..सरकार को थोड़ी शर्म आई है और अब उन्हें मुख्यमंत्री के २% के कोटे से एक फ़्लैट दिया जा रहा है.

इक्कीस वर्षीय युवराज वाल्मीकि की यह सफल यात्रा विश्वास दिलाती है कि कड़ी मेहनत और सच्ची लगन से क्या हासिल नहीं किया जा सकता. मुंबई की मरीन लाइंस में 16/16 की एक झोपडी में युवराज रहते हैं जहाँ पिछले चालीस सालों से बिजली नहीं है. उनके पिता एक ड्राइवर  हैं जिनकी मासिक आय 6000 रुपये है. फिर भी उन्होंने युवराज को कॉलेज में पढ़ने भेजा और कभी हॉकी खेलने से नहीं रोका. बल्कि बढ़ावा ही दिया. 

नौ साल की उम्र में उनके पहले कोच मर्ज़ाबान पटेल ने उनकी प्रतिभा को पहचाना  और उन्हें कोचिंग देनी शुरू की. सत्रह साल की उम्र में वे एयर इण्डिया के लिए खेलने लगे .उसके बाद से धनराज पिल्लै, गेविन फरेरा, जोकेम कारवालो ने उन्हें कोचिंग देनी शुरू की. नेशनल टीम के चयन के लिए कोचिंग कैम्प में 110 खिलाडी थे. उसमे से 18 खिलाड़ियों की सूची में अपना नाम देखकर ही वे खुश थे. पर जब पकिस्तान के साथ खेलते हुए पाकिस्तानी टीम के विरुद्ध उन्हें पेनाल्टी शूट का मौका मिला, तो उन्होंने अपने कोच को निराश नहीं किया और गोल करके भारत को बढ़त दे दी और भारत विजयी रहा. 

अच्छी बात है कि युवराज इस चकाचौंध  से भ्रमित नहीं हुए हैं..और कहते हैं..."अब तो और भी मेहनत करनी है...भारत ओलम्पिक में मेडल ला सका तो मेरा सपना पूरा होगा. "

एक दिलचस्प बात और हुई. युवराज के दादा जी सालो पहले उत्तर-प्रदेश के अलीगढ से मुंबई आए थे. उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे....जो मुंबई में सिर्फ "मराठी माणूस" को ही देखना चाहते हैं..उन दोनों ने भी युवराज वाल्मीकि का सम्मान किया. 

बुधवार, 14 सितंबर 2011

ज़िन्दगी एक मिस्ले सफ़र है ..

कल सलिल वर्मा जी के ब्लॉग पर उनका, उनकी बिटिया द्वारा लिया गया ख़ूबसूरत साक्षात्कार पढ़ा....और मुझे कुछ याद आया...कि मेरे ब्लॉगजगत में आने के कुछ ही दिनों बाद....कुलवंत हैपी जी ने अपने ब्लॉग पर एक श्रृंखला शुरू की थी...जिसमे वे लोगो के साक्षात्कार लेते थे...उसी क्रम में मुझसे भी कुछ सवाल पूछे थे...{इस ब्लॉगजगत ने सारे शौक पूरे कर दिए...अब वास्तविक दुनिया में तो कोई इंटरव्यू  लेने से रहा..:)}आज जब कई दिनों बाद उसे दुबारा पढ़ा तो लगा...अब दो साल होने को आए हैं..इस ब्लॉगजगत में पर सब वैसा ही है.
ब्लॉगर  मित्र राजेश उत्साही जी ने एक बार मुझसे कहा था कि मैने अपनी पेंटिंग  के विषय में कभी कुछ नहीं लिखा....वैसे तो हर पेंटिंग की अपनी एक कहानी है..पर यहाँ पेंटिंग की शुरुआत  के विषय में बताने का अवसर मिला...और भी मन की कई सारी बातें हैं, जो लगा यहाँ शेयर करनी चाहिए.

प्रस्तुत है वही साक्षात्कार बिना किसी फेरबदल के. 


कुलवंत हैप्पी : आपने अपनी एक पोस्ट में ब्लॉगवुड पर सवालिया निशान लगाते हुए पूछा था कि ब्लॉग जगत एक सम्पूर्ण पत्रिका है या चटपटी ख़बरों वाला अखबार या महज एक सोशल नेटवर्किंग साईट? इनमें से आप ब्लॉगवुड को किस श्रेणी में रखना पसंद करेंगी और क्यों?


रश्मि रविजा : सबसे पहले तो आपको शुक्रिया बोलूं "आपने मेरा नाम सही लिखा है" वरना ज्यादातर लोग 'रवीजा' लिख जाते हैं। वैसे I dont mind much ....टाइपिंग मिस्टेक भी हो सकती है, और जहाँ तक आपके सवाल के जबाब की बात है। तो मैं पोस्ट में सब लिख ही चुकी हूँ। हाँ, बस ये बताना चाहूंगी कि ब्लॉगजगत को मैं एक 'सम्पूर्ण पत्रिका' के रूप में देखना चाहती हूँ। मेरे पुराने प्रिय साप्ताहिक 'धर्मयुग' जैसा हो, जिसमें सबकुछ होता था, साहित्य, मनोरन्जन, खेल, राजनीति पर बहुत ही स्तरीय। और स्तरीय का मतलब गंभीर या नीरस होना बिलकुल नहीं है। वह आम लोगों की पत्रिका थी और उसमें स्थापित लेखकों के साथ साथ मुझ जैसी बारहवीं में पढ़ने वाली लड़की को भी जगह मिलती थी।
मेरा सपना ब्लॉगजगत को उस पत्रिका के समकक्ष देखना है क्यूंकि मैं 'धर्मयुग' को बहुत मिस करती हूँ.


कुलवंत हैप्पी : आपके ब्लॉग पर शानदार पेंटिंगस लगी हुई हैं, क्या चित्रकला में भी रुचि रखती हैं?

रश्मि रविजा : वे शानदार तो नहीं हैं पर हाँ, मेरी बनाई हुई हैं। और मैं अक्सर सोचती थी कि अगर मैं कोई बड़ी पेंटर होती तो अपनी 'चित्रकला' शुरू करने की कहानी जरूर बताती। अब आपने पेंटिंग के विषय में पूछ लिया है, तो कह ही डालती हूँ। बचपन में मुझे चित्रकला बिलकुल नहीं आती थी। सातवीं तक ये कम्पलसरी था और मैं ड्राईंग के एक्जाम के दिन रोती थी। टीचर भी सिर्फ मुझे इसलिए पास कर देते थे क्यूंकि मैं अपनी क्लास में अव्वल आती थी।

चित्रकला के डर से ही बारहवीं तक मैंने बायोलॉजी नहीं, गणित पढ़ा। पर इंटर के फाइनल के बाद समय काटने के लिए मैंने स्केच करना शुरू कर दिया, क्योंकि तब, खुद को व्यस्त रखने के तरीके हमें खुद ही इजाद करने पड़ते थे। आज बच्चे, टीवी, कंप्यूटर गेम्स, डीवीडी होने के बावजूद अक्सर कह देते हैं। "क्या करें बोर हो रहें हैं," पर तब हमारा इस शब्द से परिचय नहीं था। कुछ भी देख कर कॉपी करने की कोशिश करती. अपनी फिजिक्स, केमिस्ट्री के प्रैक्टिकल्स बुक के सारे खाली पन्ने भर डाले। मदर टेरेसा, मीरा, विवेकानंद, सुनील गावस्कर...के अच्छे स्केच बना लेती थी.

फिर जब एम.ए. करने के लिए मैं होस्टल छोड़ अपने चाचा के पास रहने लगी तो वहाँ कॉलेज के रास्ते में एक पेंटिंग स्कूल था। पिताजी जब मिलने आए तो मैंने पेंटिंग सीखने की इच्छा जताई, पर बिहार में पिताओं का पढ़ाई पर बड़ा  जोर रहता है। उन्होंने कहा,'एम.ए.' की पढ़ाई है, ध्यान से पढ़ो। पेंटिंग से distraction हो सकता है ,पर रास्ते में वह बोर्ड मुझे, जैसे रोज बुलाता था और एक दिन मैंने चुपके से जाकर ज्वाइन कर लिया। हाथ खर्च के जितने पैसे मिलते थे, सब पेंटिंग में लग जाते। उस दरमियान अपने लिए एक क्लिप तक नहीं ख़रीदा. कभी कभी रिक्शे के पैसे बचाकर भी पेंट ख़रीदे और कॉलेज पैदल गई...पर जब पापा ने मेरी पहली पेंटिंग देखी तब बहुत खुश हुए।

ये सारी मेहनत तब वसूल हो गई, जब दो साल पहले मैं अपनी एक पेंटिंग फ्रेम कराने एक आर्ट गैलरी में गयी...और वहाँ SNDT कॉलेज की प्रिंसिपल एक पेंटिंग खरीदने आई थी। उन्हें मेरी पेंटिंग बहुत पसंद आई और उन्होंने मुझे अपने कॉलेज में 'वोकेशनल कोर्सेस' में पेंटिंग सिखलाने का ऑफर दिया। मैं स्वीकार नहीं कर पाई, यह अलग बात है क्यूंकि मेरा बडा बेटा दसवीं में था। शायद ईश्वर की मर्जी है कि मैं बस लेखन से ही जुड़ी रहूँ।

कुलवंत हैप्पी : लेखन आपका पेशा है या शौक, अगर शौक है तो आप असल जिन्दगी में क्या करती हैं?
रश्मि रविजा : लेखन मेरा शौक है। मैं मुंबई आकाशवाणी से जुड़ी हुई हूँ। वहाँ से मेरी वार्ताएं और कहानियाँ प्रसारित होती हैं। और असल ज़िन्दगी में, मैं क्या क्या करती हूँ, इसकी फेहरिस्त इतनी लम्बी है कि आप बोर हो जाएंगे, सुनते सुनते :)

कुलवंत हैप्पी : आपकी नजर में ब्लॉगवुड में किस तरह के बदलाव होने चाहिए?
रश्मि रविजा : व्यर्थ के विवाद ना हों, सौहार्दपूर्ण माहौल हमेशा बना रहें। कोई गुटबाजी ना हो. सबलोग सबका लिखा पढ़ें और पसंद आने पर खुलकर प्रशंसा-आलोचना  करें। हाँ एक और चीज़...लोग अपना 'सेन्स ऑफ ह्यूमर' जरा और विकसित कर लें तो अच्छा...कई बात मजाक समझ कर छोड़ देनी चाहिए..उसे भी दिल पे ले लेते हैं।

कुलवंत हैप्पी : क्या आप आपकी नजर में ज्यादा टिप्पणियोँ वाले ब्लॉगर ही सर्वश्रेष्ठ हैं या जो सार्थक लिखता है?
रश्मि रविजा : ऐसा नहीं है कि ज्यादा टिप्पणियाँ पाने वाले ब्लॉगर सार्थक नहीं लिखते। यहाँ पर कुछ ऐसे लोग भी  हैं, जो 
बहुत अच्छा लिखते हैं, लेकिन उनको टिप्पणियाँ ना के बराबर मिलती है। ऐसे में उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए।

कुलवंत हैप्पी : "मन का पाखी" में आपने नए साल पर उपन्यास लिखना शुरू किया है, क्या आप अब इस ब्लॉग पर निरंतर उपन्यास लिखेंगी?
रश्मि रविजा : सोचा तो कुछ ऐसा ही है कि अपने लिखे, अनलिखे, अधूरे सारे उपन्यास और कहानियां, सब अपने इस ब्लॉग में संकलित कर दूंगी। ज्यादा लोग पढ़ते नहीं या शायद पढ़ते हैं, कमेंट्स नहीं करते। पर मेरा लिखा सब एक जगह संग्रहित हो जाएगा। इसलिए जारी रखना चाहती हूँ, ये सिलसिला।

कुलवंत हैप्पी : आपको ब्लॉगवुड की जानकारी कैसे मिली, और कब शुरू किया?
रश्मि रविजा : 'अजय ब्रह्मात्मज' जी के मशहूर ब्लॉग "चवन्नी चैप" के लिए मैंने हिंदी टाकिज सिरीज के अंतर्गत हिंदी सिनेमा से जुड़े अपने अनुभवों को लिखा था। लोगों को बहुत पसंद आया। कमेन्ट से ज्यादा अजय जी को लोगों ने फोन पर बताया और उन्होंने मुझे अपना ब्लॉग बनाने की सलाह दे डाली। 'मन का पाखी' मैंने 23 सितम्बर 2009को शुरू किया और 'अपनी उनकी सबकी बातें' 10 जनवरी 2010को.


कुलवंत हैप्पी : "मंजिल मिले ना मिले, ये गम नहीं, मंजिल की जुस्तजू में, मेरा कारवां तो है" आप इस पंक्ति का अनुसरण करती हैं?
रश्मि रविजा : ऑफ कोर्स, बिलकुल करती हूँ। सतत कर्म ही जीवन है, वैसे अब यह भी कह सकती हूँ "तलाश-ओ-तलब में वो लज्ज़त मिली है....कि दुआ कर रहा हूँ, मंजिल ना आए"।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसा लम्हा, जब लगा हो बस! भगवान इसकी तलाश थी?
रश्मि रविजा : ना ऐसा नहीं लगा, कभी...क्योंकि कुछ भी एक प्रोसेस के तहत मिलता है, या फिर मेरी तलाश ही अंतहीन है, फिर से मंजिल से जुड़ा एक शेर ही स्पष्ट कर देगा इसे "मेरी ज़िन्दगी एक मिस्ले सफ़र है ...जो मंजिल पर पहुंची तो मंजिल बढा दी."

आपका बहुत बहुत शुक्रिया...मुझे इतने कम दिन हुए हैं, ब्लॉग जगत में फिर भी...मेरे विचार जानने का कष्ट किया और मेरे बारे में जानने की जिज्ञासा जाहिर की। आपने कहा था, जिस सवाल का जबाब ना देने का मन हो, उसे छोड़ सकती हूँ। पर देख लीजिए मैंने एक भी सवाल duck नहीं किया। आपके सवालों से तो बच जाउंगी पर ज़िन्दगी के सवाल से भाग कर कहाँ जाएंगे हम?

बुधवार, 7 सितंबर 2011

पीक आवर्स" में मुंबई लोकल ट्रेन में यात्रा

(गणपति उत्सव की गहमागहमी और आकाशवाणी के तकाजों ने कुछ इतना व्यस्त कर रखा है कि ब्लॉगजगत में कुछ लिखने-पढने का समय ही नहीं मिल पा रहा...और आकाशवाणी ने याद दिला दी इस पोस्ट की जिसे दो वर्ष पहले' मन का पाखी ' ब्लॉग पर पोस्ट किया था और इस ब्लॉग पर री-पोस्ट करने की सोच ही रही थी.....  तो मौका भी है और दस्तूर भी फिर  चल पड़िए मेरे साथ मुंबई-लोकल की यात्रा के लिए )

मुंबई में रहनेवाले आम लोगो का कभी न कभी लोकल ट्रेन से वास्ता पड़ ही जाता है..वैसे सुना तो है  कि नीता अम्बानी भी साल में एक बार अपने बच्चों को लोकल ट्रेन में सफ़र करने के लिए जरूर भेजती थीं ..ताकि वे जमीन से जुड़े रहें. मुझे तो वैसे भी लोकल ट्रेन बहुत पसंद हैं. कार की यात्रा बहुत बोरिंग होती है,अनगिनत ट्रैफिक जैम...सौ दिन चले ढाई कोस वाला किस्सा. इसलिए जब भी अकेले जाना हो या सिर्फ बच्चों के साथ,ट्रेन ही अच्छी लगती है. और ऐसे समय पर जाती हूँ जब ट्रेन में आराम से जगह मिल जाती है. चढ़ने उतरने में परेशानी नहीं होती.

वैसे जब बच्चे छोटे थे तो अक्सर काफी एम्बैरेसिंग भी हो जाता था. एक बार अकेले ही बच्चों के साथ जा रही थी...बच्चे अति उत्साहित.हर स्टेशन का नाम जोर जोर से बोल रहे थे..शरारते वैसी  हीं और सौ सवाल, अलग. छोटे बेटे कनिष्क ने बगल वाली कम्पार्टमेंट करीब करीब खाली देख पूछा "वो कौन सी क्लास है?".
मैंने कहा,"फर्स्ट क्लास".
"हमलोग उसमे क्यूँ नहीं बैठे"
"उसका किराया,ग्यारह गुना ज्यादा है. और यहाँ आराम से जगह मिल गयी है"(सेकेण्ड क्लास का अगर 10 रुपये होता है तो फर्स्ट क्लास का 110 रुपये ,लेकिन  पास बनवाने पर बहुत सस्ता पड़ता है और ऑफिस ,कॉलेज जाने वाले,पास लेकर फर्स्ट क्लास में ही सफ़र करते है)

फिर उसने पूछा,'ये कौन सी क्लास है.?"
मैंने कहा "सेकेण्ड"
"थर्ड क्लास कहाँ है?"
"थर्ड क्लास नहीं होता"

कुछ देर सोचता रहा फिर चिल्ला कर बोला,"अच्छा !! थर्ड क्लास में तो हमलोग पटना जाते हैं",(उसका मतलब थ्री टीयर ए.सी.से था )पर मैंने कुछ नहीं कहा,सोचने दो लोगों को कि मैं थर्ड क्लास में ही जाती हूँ.अगर एक्सप्लेन करने बैठती तो चार सवाल उसमे से और निकल आते.

जब मैंने 'रेडियो स्टेशन' जाना शुरू किया तो नियमित ट्रेन सफ़र शुरू हुआ..मेरी रेकॉर्डिंग
हमेशा दोपहर को होती,मैं आराम से घर का काम ख़त्म कर के जाती और चार बजे तक वापसी की ट्रेन पकडती. स्टेशन से एक सैंडविच लेती,एक कॉफ़ी और आराम से हेडफोनपर  गाना सुनते,कोई किताब पढ़ते.एक घंटे का सफ़र कट जाता.

एक दिन मेरी दो रेकॉर्डिंग थी.अक्सर जैसा होता है..लेट हो रही थी,मैं...आलमीरा खोला तो एक 'फुल स्लीव' की ड्रेस सामने दिख गयी.सोचा,चलो वहां का ए.सी.तो इतना चिल्ड होता है कोई बात नहीं.'शू रैक' खोला और सामने जो सैंडल पड़ी थी,पहन कर निकल गयी.ऑटो में बैठने के बाद गौर किया कि ये तो पेन्सिल हिल की सैंडल है. पर फिर लगा..स्टेशन से दस मिनट का वाक ही तो है.और मुझे कभी ऊँची एडी की सैंडल में परेशानी  नहीं होती.इसलिए चिंता नहीं की.

एक रेकॉर्डिंग के बाद.रेडियो ऑफिसर ने यूँ ही पूछा, "आप कुछ ज्यादा वक़्त निकाल सकती हैं,रेडियो स्टेशन के लिए?"मैंने कहा..."हाँ..अब बच्चे बड़े हो गए हैं तो काफी वक़्त है मेरे पास".मुझे लगा कुछ और असाईनमेंट देंगे. उन्होंने कहा,"फिर प्रोडक्शन असिस्टेंट के रूप में ज्वाइन कर लीजिये. क्यूंकि हमारे प्रोडक्शन असिस्टेंट ने किसी वजह से रिजाइन कर दिया है. आप अब यहाँ के सारे काम समझ गयी हैं".मैं कुछ सोचने लगी.ये मौका तो बडा अच्छा था. मुझे यहाँ के लोग और माहौल भी अच्छा लगता था. समय भी था पर एक समस्या थी. मेरा बेटा दसवीं में आ गया था. बोर्ड के एक्जाम के वक़्त यूँ घर से दूर रहना ठीक होगा?...यही सब सोच रही थी कि उन्होंने मेरी ख़ामोशी को 'हाँ' समझ लिया (मेरे बेटे का फेवरेट डायलौग ,जब भी उसकी किसी अनुपयुक्त मांग  पर गुस्से में चुप रहती हूँ तो कहता है.'आपकी ख़ामोशी को मैं हाँ समझूं ?:)")..यहाँ भी मेरी चुप्पी को हाँ समझ लिया गया. श्रुति नाम की एक अनाउंसर से उन्होंने रिक्वेस्ट किया, इन्हें जरा 'लाइब्रेरी','ट्रांसमिशन रूम'.'ड्यूटी रूम' सब दिखा दो. मुंबई का आकाशवाणी भवन काफी बडा है. दो बिल्डिंग्स हैं. स्टूडियो और ऑफिस अलग अलग. एक तिलस्म सा लगता है. श्रुति ने भी बताया कि जब वे लोग ट्रेनिंग के लिए आए थे तो एक लड़के ने आग्रह किया था,"प्लीज, हमें सबसे पहले ऑफिस का एक नक्शा दे दीजिये. पता ही नहीं चलता कौन सा दरवाजा खोलो और सामने क्या आ जायेगा.लिफ्ट,स्टूडियो,या ऑफिस."

श्रुति के साथ घूमते हुए अब मेरे पेन्सिल हिल ने तकलीफ देनी शुरू कर दी थी.और स्टूडियो भ्रमण जारी ही था. ट्रांसमिशन रूम में देखा,ऍफ़,एम् की एक 'आर. जे.'एक गाना लगा,सर पर हाथ रखे किसी सोच में डूबी बैठी है. मैंने सोचा ,अभी गाना ख़त्म होगा और ये चहकना शुरू कर देगी.सुनने वालों को अंदाजा  भी नहीं होगा,अभी दो पल पहले की इसकी गंभीर मुखमुद्रा का.

राम राम करके स्टूडियो भ्रमण ख़त्म हुआ, तो मेरी जान छूटी. मेरी रेकॉर्डिंग रह ही गयी. अब तो मन हो रहा था...सैंडल उतार कर हाथ में ही ले लूँ.. आकाशवाणी भवन से निकल...नज़र दौड़ाने लगी कहीं कोई 'शू इम्पोरियम' दिख जाए तो एक सादी सी चप्पल खरीद लूँ.पर ये 'ताज' और 'लिओपोल्ड कैफे' का इलाका था. यहाँ बस बड़े बड़े प्रतिष्ठान ही थे. कोई टैक्सी वाला भी इतनी कम दूरी के लिए तैयार नहीं होता.(इस इलाके में ऑटो नहीं चलते)खैर ,दुखते पैर लिए किसी तरह स्टेशन पहुंची और आदतन एक सैंडविच और कॉफ़ी ले ट्रेन में चढ़ गयी.सारी सीट भर गयीं थी....सोचा चलो कुछ देर में कोई उतरेगा तो सीट मिल ही जाएगी..मैं आराम से पैसेज में एक सीट से पीठ टिका खड़ी हो गयी.यह ध्यान ही नहीं रहा कि ये ऑफिस से छूटने का समय है,भीड़ का रेला आता ही होगा.क्षण भर में ही कॉलेज और ऑफिस की लड़कियों का रेला आया  और  एक एक इंच जगह भर गयी. मैं तो बीच में पिस सी गयी..हाथ की सैंडविच तो धीरे से बैग में डाल दिया.पर कॉफ़ी का क्या करूँ?चींटी के सरकने की भी जगह नहीं थी कि दरवाजे तक जाकर फेंक सकूँ. उस पर से डर की कहीं गरम कॉफ़ी किसी के ऊपर एक बूँद,छलक ना जाए .फुल स्लीव में गर्मी से बेहाल....पसीने से तर बतर मैंने गरम गरम कॉफ़ी गटकना शुरू कर दिया. मुंबई के लोग कभी भी किसी को नहीं टोकते वरना देखने वालों के मन में आ ही रहा होगा,'ये क्या पागलपन कर रही है'.पर सबने देख कर भी अनदेखा कर दिया.अब ग्लास का क्या करूँ.?धीरे से बैग में ही डाल लिया. बैग में दूसरी स्क्रिप्ट पड़ी थी...पर होने दो सत्यानाश....कोई उपाय ही नहीं था.

.ट्रेन अपनी रफ़्तार से दौड़ी जा रही थी.हर स्टेशन पर उतरने वालों से दुगुने लोग चढ़ जाते,मैं थोड़ी और दब जाती.और सीटों पर बैठे लोग तो सब अंतिम स्टॉप वाले थे. मेरी स्टाईलिश सैंडल के तो क्या कहने.जब असह्य हो गया तो मैंने धीरे से सैंडल उतार दी.पर मुंबई की महिलायें अचानक मेरी हाईट डेढ़ इंच कम होते देख भी नहीं चौंकीं. पता नहीं नोटिस किया या नहीं.पर चेहरा सबका निर्विकार ही था.तभी मेरे बेटे का फोन आया.और हमारी बातचीत में दो तीन बार रेकॉर्डिंग शब्द सुन,पता नहीं पास बैठी लड़की ने क्या सोचा.झट खड़ी होकर मुझे बैठने की जगह दे दी.(शायद मुझे कोई गायिका समझ बैठी:)..मैं बिना ना नुकुर किये एक थैंक्स बोल कर  बैठ गयी.और सैंडल धीरे से सीट के अन्दर खिसका दिया.मेरा भी अंतिम स्टॉप ही था.सब लोग उतरने लगे पर मुझे बैठा देख,चौंके तो जरूर होंगे,पर आदतन कुछ कहा नहीं.सबके उतरते ही मैंने झट से सैंडल निकाले और पहन कर उतर गयी.

पर मेरा ordeal यहीं ख़त्म नहीं हुआ था.स्टेशन से बाहर एक ऑटो नहीं. बस स्टॉप की तरफ नज़र डाली तो सांप सी क्यू का कोई अंत ही नज़र नहीं आया. मेरे साथ एक एयर होस्टेस भी खड़ी थी.उसे भी मेरी तरफ ही जाना था.संयोग से किसी कार्यवश ऑफिशियल कार की जगह 'पीक आवर्स' में लोकल से आना पड़ा था,उसे..बेजार से हम खड़े थे... खाली ऑटो भी तेजी से निकल जा रहें थे. एक पुलिसमैन पर नज़र पड़ते ही,उस एयर होस्टेस ने शिकायत की. पर उसने एक शब्द कुछ नहीं कहा. मुझे बडा गुस्सा आया,ये लोग तो हमारी सहायता के लिए हैं.और इनकी बेरुखी देखो.पर जैसे ही 'ग्रीन सिग्नल' हुआ.उस पुलिसमैन ने बड़ी फ़िल्मी स्टाईल में चश्मा उतार जेब में रखा और एक रिक्शे को हाथ दिखा रोका,और आँखों से ही हमें बैठने का इशारा किया.बोला फिर भी एक शब्द नहीं. औटोवाला कुड़ कुड़ करता  रहा ,मुझे  उस तरफ  नहीं  जाना था  .पर हम दोनों कान में तेल डाले बैठे रहे .

दूसरे दिन का किस्सा भी कम रोचक नहीं. मैंने घर आकर हर पहलू से विचार किया और सोचा,इस ऑफर को स्वीकार नहीं कर सकती. यहाँ कामकाजी महिलायें बच्चों के बोर्ड एक्जाम आते ही एक महीने की छुट्टी ले,घर बैठ जाती हैं.और मैं अब ज्वाइन करूँ? रेडियो में इतनी छुट्टी तो मिल नहीं सकती.लिहाज़ा ये अवसर भी खो देना पड़ा...
{जब बड़ा बेटा दसवीं में था..एक कॉलेज में वोकेशनल  कोर्स के अंतर्गत...पेंटिंग सिखाने का ऑफर मिला था..जिसे भी नहीं स्वीकार कर सकी थी ...ईश्वर भी शायद ऐसे वक़्त अवसर प्रदान कर मेरा इम्तहान ही लेते हैं :(} दूसरे दिन बिलुकल  सादी सी चप्पल और आरामदायक कपड़े पहन,कर 'ना' कहने को गयी. एक 'एलीट' स्कूल के बच्चे आए हुए थे और एक नाटक की रेकॉर्डिंग चल रही थी. मुझे देखते ही उस ऑफिसर ने थोडा बहुत समझाया और मुझ पर सारी जिम्मेवारी सौंप चलता बना. मुझे मुहँ खोलने का मौका ही नहीं दिया. इन टीनेजर्स बच्चों ने पच्चीस मिनट के प्ले की रेकॉर्डिंग में तीन  घंटे लगा दिए.एक गलती करता सब हंस पड़ते. दस मिनट लग जाते,शांत कराने में..फिर बीच में किसी को खांसी आती,छींक आती,प्यास लगती तो कभी बाथरूम जाना होता. उन बच्चों के साथ आए टीचर भी परेशान हो गए थे...पर बेबसी जता रहे थे कि डांट भी नहीं सकता...करोड़पतियों...ट्रस्टियों के  बच्चे हैं...जिनके अनुदान से स्कूल चलता है. 

जब अपनी रेकॉर्डिंग ख़त्म करके, मैंने इस ऑफर को स्वीकार करने में अपनी असमर्थता जताई तो ऑफिसर  हैरान रह गए,बोले..'पहले क्यूँ नहीं बताया.?' क्या कहती,आपने मौका कब दिया.?' कोई बात नहीं' कह कर मन ही मन कुढ़ते अपनी दरियादिली दिखा दी.

आज फिर पीक आवर्स था.पर इस बार अपनी ड्यूटी ख़त्म कर श्रुति भी साथ थी. मैं स्टेशन पर उसे बता ही रही थी कि महिलायें भी चलती ट्रेन में दौड़कर चढ़ती हैं. श्रुति ने कहा,',हाँ चढ़ना ही पड़ता है,वरना सीट नहीं मिलती' तभी ट्रेन आ गयी...और श्रुति भी दौड़ती हुई चलती ट्रेन में चढ़ गयी. मेरी हिम्मत तो नहीं थी,पर ईश्वर को कुछ दया आ गयी.और ट्रेन रुकने पर चढ़ने के बावजूद मुझे बैठने की जगह मिल गयी.पर श्रुति से मैं बिछड़ गयी थी और हमने नंबर भी एक्सचेंज नहीं किया था.दरअसल, मैं अक्सर अपना प्रोग्राम ही सुनना भूल जाती हूँ. श्रुति ने कहा था.अनाउंस करने से पहले वो sms कर याद दिला देगी.पर मुझे इतना पता था कि स्टेशन आने से एक स्टेशन पहले ही गेट के पास खड़ा होना पड़ता है क्यूंकि ट्रेन सिर्फ आधे  मिनट के लिए रूकती है.अगर आप गेट के पास ना खड़े हों तो नहीं उतर पाएंगे. श्रुति का स्टेशन आने से पहले मैं भी गेट के पास पहुँच गयी और नंबर एक्सचेंज किया. श्रुति ने जोर से जरा आस पास वालों को सुनाते हुए ही कहा...'हाँ आपके प्रोग्राम की अनाउन्समेंट से पहले,फ़ोन करती हूँ आपको'. मैं मन ही मन मुस्कुरा पड़ी.चाहे कितने भी मैच्योर हो जाएँ हम.आस पास वालों की आँखों में अपनी पहचान देखने की ललक ख़त्म नहीं होती.

रविवार, 28 अगस्त 2011

खाया-पिया ..अघाया मध्य वर्ग

इस जन आन्दोलन में कुछ जुमले बहुत उछले कि ये आन्दोलन,खाए-पिए-अघाए लोगो का है....मध्य वर्गीय लोगो का है.


सर्वप्रथम अगर ये वर्ग अघाया हुआ है तो इसे  किसी आन्दोलन को समर्थन देने की क्या जरूरत है? धूप-बारिश में सड़कें नापने की क्या जरूरत ? सिर्फ टेलिविज़न में चेहरा दिखाने की चाह तो उन्हें सडकों तक नहीं खींच लाई थी....क्यूंकि भले ही चौबीसों घंटे टी.वी. कैमरे चालू थे लेकिन जिस तरह हज़ारों लोग किसी रैली का हिस्सा बनते थे ,उन्हें मालूम था कि उनका चेहरा टी.वी. में नहीं दिखने वाला.कई इलाकों में तो टी.वी. कैमरे थे भी नहीं फिर भी लोगो ने रैलियाँ निकालीं....सभाओं में शामिल हुए. और इस वर्ग को अगर टी.वी. में आने का इतना ही शौक होता तो उसे वो माध्यम पता है जिसकी वजह से वे टी.वी. में आ सके. ऐसा भी नहीं है कि उनकी जिंदगी इतनी बोरिंग थी कि बस मन-बहलाव के लिए वे इस आन्दोलन में शामिल थे. यह पढ़ा-लिखा वर्ग....हर स्तर पर भ्रष्टाचार से इतना तंग आ गया है कि उसे आवाज़ उठाने की जरूरत महसूस हुई और अन्ना का आन्दोलन एक जरिया बना,अपनी बात कहने का. रोज़ अखबार में करोड़ों के घोटाले की खबर ...वर्त्तमान  संसद  में 76 सांसदों का यानि कि 14% सांसदों का हत्या,  अपहरण, बलात्कार में लिप्त होना....भारत का निरंतर सर्वाधिक भ्रष्ट देश की रैंकिंग में नीचे की तरह उन्मुख होना...इन्हें उद्वेलित कर गया. (Transparency International's corruption index के अनुसार 2010 में भारत का स्थान  87 था ...2009 में 84 था और दस साल पहले 69 था.)

हाँ , इस वर्ग पर किराए की ही सही पर सर पर छत है और ये वर्ग भूखा भी नहीं है. लेकिन क्या इतना काफी है? वो भूखा नहीं है...इसलिए उसे आवाज़ उठाने का हक़ नही है? उसकी और जरूरतें नहीं हैं??  कई लोगो की प्रतिक्रियाएँ देखीं कि इस आन्दोलन से किसान-मजदूर नहीं जुड़े हैं...इसलिए ये आन्दोलन व्यर्थ है. अगर इस आन्दोलन से थोड़ा भी फर्क पड़ेगा...लोगो के भ्रष्ट आचरण पर थोड़ा भी अंकुश लगेगा तो इसका लाभ, सबको एक सामान मिलेगा. जो लोग ये शिकायत कर रहे हैं कि  पिछड़ा वर्ग इसमें शामिल नहीं है...तो उन्हें खुद आगे आना चाहिए था...उन्हें भी इसमें सम्मिलित करने की कोशिश करनी चाहिए थी.

वे अगर सचमुच उनकी स्थिति से इतने ही व्यथित हैं तो उन्हें अन्ना की तरह किसी गाँव में जाकर एक गाँव के लोगों को आत्म-निर्भर ..खुशहाल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए. जितने लोग इस आन्दोलन का मज़ाक उड़ा रहे हैं या इस पर उंगलियाँ  उठा रहे हैं...वे लोग एक-एक गाँव ही क्यूँ नहीं अपना लेते?....आखिर 'अन्ना हजारे' के पास भी संकल्प-शक्ति के सिवा और कुछ भी नहीं था. वे लोग कहेंगे , हमारा काम तो अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण करना है...फिर दूसरे लोग किसी तरह का प्रयत्न कर रहे हैं तो उसपर ऊँगली क्यूँ उठाना??...उन्हें निर्देश क्यूँ देना...कि इस मुद्दे के लिए नहीं फलां मुद्दे के लिए आन्दोलन करो. अगर वे कुछ गलत कर रहे हैं तो उन्हें टोकने का पूरा हक़ है  अन्यथा क्या मध्य वर्ग को उनकी चिंता नहीं है? पर यहाँ भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठायी जा रही है ..जिसपर अंकुश से सबों को  राहत मिलेगी. यह एक दिन में नहीं होगा पर कहीं से शुरुआत तो करनी  ही पड़ेगी.

 हालांकि आरोप लगाने वालों ने जरूर कमरे में बंद होकर ही आन्दोलन देखा है.....वर्ना मैने अपनी आँखों से ऑटोवालों ...सब्जी-मच्छी बेचने वाले/वालियों को स्वेच्छा से इस आन्दोलन का हिस्सा बनते देखा है. ऑटो वाले किसी को सभा में छोड़ने आते और फिर वापस नहीं जाते...सड़क के किनारे ऑटो खड़ा करके  सभा में शामिल होते. इसी तरह , वे लोग रैलियों में भी शामिल हुए . जो समय नहीं दे पाते वे लगातार अपने पैसेंजर से इस विषय पर चर्चा करते देखे जाते. यह आन्दोलन स्वतः स्फूर्त था/है...इसमें सब अपने विवेक से शामिल हुए . इतना जरूर है कि मध्यम वर्ग की स्थिति रोज़ कुआं -खोदने और पानी पीने वाली नहीं है...और इसीलिए वे ज्यादा समय इस आन्दोलन को दे सके...तो इसके लिए उन्हें शर्मिंदा होना चाहिए??.....अफ़सोस प्रकट करना चाहिए??

किसी भी आन्दोलन के प्रति उदासीन रहनेवाले इस वर्ग ने इस आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया...इसकी एक ख़ास वजह ये भी है कि इसका नेतृत्व और आह्वान  साफ़-सुथरी छवि वाले लोग कर रहे हैं. सबको ये भरोसा है कि वे अपने किसी व्यक्तिगत लाभ या...प्रसिद्धि पाने के लिए ये आन्दोलन नहीं कर रहे. वे सचमुच समाज में एक बदलाव लाना चाहते हैं और जनता का भला चाहते है.

अन्ना हजारे जी का अनशन उनकी गांधीवादी छवि....और बार-बार शांतिपूर्ण आन्दोलन की अपील  , इस आन्दोलन के शांतिपूर्ण होने का कारण रही ही. पर इसका श्रेय इसमें भाग लेने  वाले लोगो को भी जाता है कि....बस शान्ति से वे सडकों पर आए और सभा की..कहीं कोई आगजनी..पत्थर-बाजी...किसी तरह का संपत्ति नुकसान या  बाज़ार  बंद नहीं हुआ. इतना अनुशासन-बद्ध होना,स्व-विवेक से ही संभव है.....किसी छड़ी के जोर पर नहीं किया जा सकता 

नेता सिर्फ निम्न वर्ग और उच्च  वर्ग की ही फ़िक्र करते हैं  क्यूंकि उच्च वर्ग से उन्हें पैसे मिलते हैं  और निम्न वर्ग से वोट. मध्य वर्ग की उन्हें कभी फ़िक्र नहीं रही. और इसीलिए मध्य वर्ग भी हमेशा उदासीन रहा. एक वजह ये भी थी...अब तक अधिकांशतः मध्य वर्गीय लोग, वे थे जो सरकार नौकरियों में थे. और अपनी जीविका के साधन और पेंशन के लिए सरकार पर निर्भर थे . इसलिए सरकार के विरुद्ध जाने की हिम्मत भी उन्हें कम ही होती थी. अब जो नया मध्यम वर्ग उभरा है उसका एक बड़ा वर्ग  सिर्फ सरकार पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर नहीं है और जो निर्भर हैं वे भी सरकार से अपनी गाढ़ी कमाई से भरे गए टैक्स का लेखा-जोखा पूछने की हिम्मत रखते हैं. 

हर प्रायोजित आन्दोलन किसी ना किसी वर्ग से सम्बंधित रहा है....लेकिन यहाँ सोशल नेटवर्किंग साइट...एस.एम.एस. के जरिये बिना किसी जाति-वर्ग भेद के लोग स्वेच्छा से एकजुट  हुए. अन्ना हजारे जी ने मंच से 'देश की युवा शक्ति' का शुक्रिया कहा..परन्तु सीनियर सिटिज़न ने भी इस आन्दोलन में बहुत ही अहम् भूमिका निभाई है. हमारे इलाके में ज्यादातर उम्रदराज़ लोग ही सम्मिलित थे. कॉलेज जाते बच्चों...कोचिंग क्लास से निकलते बच्चों से वे बस दो शब्द कहते थे.."बेटा...हमलोगों ने तो बहुत भुगत लिया...अब कोशिश है कि तुमलोगों को इतनी करप्शन ना देखनी पड़े...इसके लिए कुछ करना चाहिए"  और वे बच्चे मैकडोनाल्ड का बर्गर और CCD की कॉफी का मोह छोड़ कर उनकी बात ध्यान से सुनते और  शामिल हो जाते. टी.वी. ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई....स्टेज पर यूँ अन्ना हजारे को दूसरों के लिए भूखा-प्यासा देख कितने ही लोगो के गले से निवाला उतरना मुश्किल हो जाता और वे भी आन्दोलन में शामिल होने को निकल पड़ते.

टी.वी. पहले भी कुछ ऐतिहासिक घटनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका है. कहा जाता है..मशहूर 'बर्लिन की दीवार' गिरवाने में टेलिविज़न का भी हाथ था. पूर्व जर्मनी के लोग बार-बार टी.वी. पर पश्चिम जर्मनी के लोगों का रहन-सहन देख कर ही अपने ही देश के दो टुकड़े करती उस दीवार को गिराने पर आमादा हो गए.


अन्ना हजारे के आन्दोलन ने  एक उत्प्रेरक का कार्य जरूर किया है..अब मध्य वर्ग जाग गया है....और अपनी शक्ति भी पहचान गया है. वो अपने देश को जीने के लिए एक बेहतर स्थान बनाने के लिए कटिबद्ध है. मध्य वर्ग की संख्या 1996 के 26  मिलियन  से बढ़कर,अब 160  मिलियन  और 2015 में  267 मिलियन हो जाने का अनुमान है. यानि जनसँख्या का 40% तो सरकार और नेताओं के लिए बेहतर होगा कि वे मध्य वर्ग की अस्मिता को पहचान लें क्यूंकि ये वर्ग  ,उन्हें सत्ता सौंपेगा...पावर  देगा तो पलट कर सवाल भी करेगा. 

बुधवार, 24 अगस्त 2011

तुम्ही सो गए दास्तां कहते कहते...




अभी बस दो दिनों पहले ही,मैने  एक फ्रेंड का स्टेटस देखा,...जिसमे उन्होंने लिखा था.." कई  दिनों से एक मित्र ऑनलाइन नहीं दिख रहा था...उसका कोई कमेन्ट भी किसी के स्टेटस पर नहीं दिख रहा था तो मुझे लगा कहीं मुझे ब्लॉक तो नहीं कर दिया...खोज-बीन करने पर पता चला ..वो अब इस दुनिया में नहीं है...." उस दिवंगत मित्र के प्रोफाइल का लिंक भी था....उस पर भी क्लिक कर उसे देखा और एक सिहरन दौड़ गयी,नसों में....मेरे लिए नेट के द्वारा किसी की मृत्यु के बारे में जानने का ये पहला मौका था. कितने ही सवाल उठे मन में....इनका प्रोफाइल तो वैसे ही रहेगा...कितने ही लोग...किसी नाम को सर्च करने के दौरान इस प्रोफाइल पर क्लिक करेंगे. शायद उनकी एल्बम  भी देखेंगे और उन्हें पता भी नहीं चलेगा ,ये हँसता मुस्कुराता आदमी अब इस दुनिया में नहीं है.,....क्या पता कोई किसी फोटो, कविता  की पंक्तियों के साथ टैग कर ले....कोई किसी ग्रुप का सदस्य बना ले...कोई फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दे...
              
इस तरह की बातें ही चल रही थीं दिमाग में और आज सुबह ही 'डा.अमर कुमार जी ' के देहावसान की खबर पढ़ी और स्तब्ध रह गयी....उन्हें भी बस नेट के माध्यम से ही जानने का मौका मिला था...सबकी तरह मैने भी उन्हें...उनकी अपने विशेष स्टाइल में लिखी...बेबाक टिप्पणियों से ही पहचाना था.

मेरी कहानी पर उन्होंने पहली बार  टिप्पणी की थी...और लिखा था.." मुझे ये उषा प्रियंवदा की 'रुकोगी नहीं राधिका' की याद दिलाती है.." मैं तो अभिभूत हो गयी थी...किसी नवोदित लेखक /लेखिका का उत्साहवर्द्धन करना वे खूब जानते थे. मैने जब उन्हें शुक्रिया कह कर  मेल भेजा 
(जैसा आलस्यवश अक्सर मैं नहीं करती और लोग नाराज़ हो जाते हैं  )..उनका बहुत ही प्यार भरा उत्तर आया...जिसमे मुझे उन्होंने "सद्यः स्नेही , कह कर संबोधित किया था...और बताया था कि वे टिप्पणी नहीं करते पर पढ़ते हमेशा  से हैं. मैं तुम्हारे पितृतुल्य हूँ...कुछ ऐसा भी लिखा था...." मुझे एक नया शब्द मिला.."सद्य स्नेही..' इस से पहले मैने ये शब्द नहीं सुना था. और मैं निश्चिन्त हो गयी कि उनकी पारखी नज़रें मेरे लेखन से गुजरती रहती हैं.  मेल से ही संपर्क बना रहता .और वे मुझे हमेशा..'सद्य स्नेही 'कहकर ही संबोधित करते....पर अब ....


जब कभी मेरे किसी पोस्ट से असहमत हुए तो असहमति भी जताई और मेरा स्पष्टीकरण पाकर संतुष्ट भी हो गए...शर्मीला इरोम वाली पोस्ट पढ़कर बहुत खुश भी हुए....और इस पोस्ट पर अपनी टिप्पणियों से लोगो का शंकानिवारण भी किया....मॉडरेशन पर वे अपनी असहमति जताते रहते थे और मैने सोच लिया था 'मॉडरेशन की मजबूरियों 'पर एक पोस्ट लिखूंगी...जिसकी शुरुआत उनके ही किसी कमेन्ट से करुँगी...और उनसे आग्रह करुँगी कि वे अपनी प्रतिक्रिया दें....अब शायद वो पोस्ट कभी ना लिखी जाए...


उनका कद ही कुछ ऐसा था कि उनके कुछ लिखे पर प्रतिकार करने में भी झिझक सी होती थी. एक जगह उन्होंने मेरा नाम "रश्मि ववेजा" लिख दिया था....और मुझे उन्हें ध्यान दिलाने की हिम्मत नहीं हुई...जबकि कोई रश्मि को रश्मी या रविजा को रवीजा लिखे तब भी मैं तुरंत टोक देती हूँ.



अभी हाल में ही उनकी बाल-मजदूर पर लिखी एक पोस्ट में फिल्म  'स्टेनली का डब्बा' का जिक्र पढ़कर मैने भी उस फिल्म के बारे में लिख डाला...और उसके बाद से ही उनका ब्लॉग नियमित रूप से देखने लगी थी...जिनमे एक पोस्ट में उन्होंने लिखा था...."अपने ब्लोगिंग कैरियर से क्रमबद्ध अवसान की इस बेला ...."


और मैने टिप्पणी की थी,...."ये अवसान क्यूँ....हमने तो अभी आपको पढना शुरू किया है....आपका ये ब्लोगिंग कैरियर निर्बांध  यूँ ही चलता रहे..नए पाठक जुड़ते रहें..."


हाँ!!  दादा...हमने तो ब्लॉग जगत से नाता नहीं तोड़ने का आग्रह किया था और आपने  इस जगत से ही नाता तोड़ लिया..



शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

हंगामा है क्यूँ बरपा...बस एक फिल्म ही तो है ,"आरक्षण"


पिछले कुछ दिन...सबकी तरह हमारे भी बहुत ही व्यस्त रहे....बड़े करीब से जनतंत्र की धड़कन  सुनने को मिली. आगे क्या होगा...ये तो किसी को नहीं पता...पर लोगों को अपने अंतर की आवाज़ का अहसास तो हुआ..कि वो आज भी जिंदा है...बुलंद है...और  ग्लास हाउस में रहने वालों को सुनने के लिए मजबूर कर सकती है.

स्कूल के दिनों में ही ये पंक्तियाँ लिखी थीं....काश!!  इस बार ये सच ना हों

तूफ़ान तो आया  बड़े  जोरों  का,  लगा  बदलेगा  ढांचा
मगर चंद  पोस्टर,जुलूस और नारों के सिवा क्या हुआ

हर मुहँ को रोटी,हर तन को कपडे,वादा तो यही था
दि
ल्ली जाकर जाने उनकी याददाश्त को क्या हुआ


इस बीच, मौका लगा तो फिल्म,'आरक्षण' भी देख डाली. काफी विवाद हुए, हैं, इस फिल्म को लेकर....ब्लॉग पर पोस्ट्स भी जरूर लिखी गयीं होंगी..पर कुछ घरेलू व्यस्तताओं की वजह से, ना तो मैं ब्लॉग पर इस फिल्म के विषय में कुछ पढ़ पायी ना ही..अखबारों में. अच्छा ही हुआ...मेरे ऊपर कोई विचार हावी नहीं हो पाए. 

पर मेरी समझ में नहीं आया...इतना हंगामा किस बात पर??...'आरक्षण' हमारी दुनिया का सच तो है ही...क्यूँ है??...होना चाहिए?? ..नहीं होना चाहिए??..इस पर सबके दीगर विचार हैं और इस फिल्म में अलग-अलग पात्रों ने ..इन्ही विचारों को स्वर दिया है,बस इतना ही.
 ये सारे मुद्दे हमारे समाज में विद्यमान हैं...और इन पर खूब  बहसें भी होती हैं... प्रकाश झा ने बड़ी कुशलता से इन सारे मुद्दों की एक झलक इस फिल्म में दे दी है. पूरी फिल्म, इसी मुद्दे पर आधारित नहीं है. लेकिन अपनी तरफ ध्यान आकृष्ट कर सोचने को जरूर मजबूर करती है.

फिल्म वही बरसो पुराने  बॉलिवुड फौर्मुले....."बुराई पर अच्छाई की जीत" पर आधारित है. और इसे दर्शाने का माध्यम चुना गया है..मशरूम की तरह उगते कोचिंग क्लासेज़ को. एक मोटी रकम लेकर ये कोचिंग क्लासेज़ बच्चों और उनके अभिभावकों के मन में एक सुनहरे भविष्य का ख्वाब बो देते हैं और इसी की वजह से कॉलेज में अध्यापक पढ़ाते नहीं. 
पिछड़े वर्ग के कमजोर विद्यार्थियों का पक्ष लेने के आरोप में एक कॉलेज के प्रिंसिपल 'अमिताभ बच्चन, को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ता है. विलेन बने 'मनोज बाजपेई ' अब नए प्रिंसिपल हैं और बिलकुल फ़िल्मी स्टाईल में धोखा देकर... अमिताभ के घर में ही अपना कोचिंग इंस्टीच्यूट चलाते हैं.( एक ही शहर में रहते हुए ये प्रिंसिपल साहब को पता नहीं चलता, आश्चर्य का विषय है. :)) 



प्रिंसिपल का बंगला छोड़ने के बाद,अमिताभ अपने परिवार के साथ एक तबेले में जाकर आस-पास के गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने लगते हैं. इसकी प्रेरणा अवश्य ही "पटना ' के सुपर थर्टी क्लासेज़ से ली गयी है. यहाँ तक कि नाम भी 'सुपर तबेला' क्लासेज़ रखा गया है. 



शायद लोगों को इस सुपर थर्टी क्लासेज़ के बारे में पता होगा...



पटना में  'आनंद कुमार'   नामक एक सज्जन ने 2002 में एक कोचिंग क्लास की स्थापना की, जिसमे गरीब वर्ग के ३० मेधावी बच्चों को वे चुनते हैं. 
सुपर थर्टी के आनंद कुमार  

और फिर उन्हें मुफ्त में रहने, खाने  और पढ़ने की सुविधा प्रदान करते हैं. आनंद कुमार   की माँ 'जयंती देवी' इन सब बच्चों के लिए खाना बनाती हैं. ये सारे बच्चे मजदूरों के..खोमचे वालों के..रिक्शा खींचने वालों के बच्चे हैं. 2002 में जब उन्होंने इस कोचिंग संस्थान की शुरुआत की थी, तब से अब तक 242 छात्र आई.आई.टी. की परीक्षा में सफल रहे हैं. 2008 से पूरे तीस  के तीस  बच्चे आई.आई .टी. की  परीक्षा में सफल आते रहे हैं. 



2003 से 2006 तक छात्र, आनंद कुमार के घर के पास एक टीन के शेड में पढ़ते थे, इसके बाद उन्होंने अपने स्कूल में उन्हें शिफ्ट कर दिया जहाँ वे इन बच्चों के ऊपर आने वाले खर्च को पूरा करने के लिए अपेक्षाकृत संपन्न बच्चों को कोचिंग देते हैं. 

आनंद कुमार, एक जाने-माने गणितज्ञ  हैं...उनके पेपर्स कई अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हो चुके हैं. 1994 में उन्हें कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से 'रिसर्च' का ऑफर आया था. पर पैसों की कमी की वजह से वे नहीं जा सके. और उसके बाद से ही उन्होंने संकल्प कर लिया कि वे कुछ ऐसा करेंगे कि पैसे के अभाव में गरीब मेधावी बच्चे उच्च शिक्षा से वंचित ना हों और उन्होंने 'सुपर थर्टी' की परिकल्पना कर ली. पर सरकार से और बड़े बड़े उद्योगपतियों से मिली मदद की पेशकश  को उन्होंने ठुकरा दिया है.
इस कोचिंग क्लास को Times Magazine ने  " Best of  Asia 2010 "चुना है.

( किसी विदेशी फिल्म मेकर द्वारा सुपर थर्टी पर बनाई गयी documentary   भी देखी थी..जिसमे उस टिन शेड के आस-पास बेतरह गन्दगी बिखरी पड़ी थी...और होस्टल में दो बच्चे अपनी अपनी किताब खोले पढ़ रहे थे. बीच में एक कटोरी में भुने चने रखे थे...जिसे दोनों बीच-बीच में खा रहे थे..)

अमिताभ बच्चन भी इसी तर्ज़ पर सैफ अली खान, प्रतीक बब्बर और अपनी बेटी के साथ मिलकर बच्चों को मुफ्त कोचिंग देते हैं. बच्चों के अच्छे रिजल्ट देखकर 'मनोज बाजपेई' की कोचिंग क्लास से भी सारे बच्चे 'सुपर तबेला ' क्लासेज़ का रुख कर लेते हैं. अब कुछ नेताओं के साथ मिलकर इस तबेले को तुडवा कर एक सरकारी गोदाम बनवाने की साजिश की जाती है. 

और आजकल देश की सड़कों पर जो दृश्य देखे जा रहे हैं...वे ही परदे पर साकार हो रहे थे. हज़ारों की तादाद में लोग निहत्थे बुलडोज़र के सामने खड़े हो जाते हैं. इस विशाल जनमानस को देख, नेता-व्यवसायी-भ्रष्ट प्रिंसिपल का नेक्सस बेबस हो जाता है. और तभी कॉलेज कि ट्रस्टी हेमा मालिनी अवतरित होती हैं और सबकुछ ठीक हो जाता है.

परन्तु अगर प्रकाश झा, कोचिंग क्लास की पढ़ाई की तुलना में कॉलेज में दी जाने वाली शिक्षा की श्रेष्ठता साबित करते...तो समाज की असली भलाई होती पर वे एक फिल्म बना रहे थे...जिसे सफल बनाने के लिए बहुत सारे कम्प्रोमाइज़ करने पड़ते हैं. फिल्म के दिखाए जाने वाले प्रोमोज में भी बस आरक्षण से सम्बंधित दृश्य ही बार-बार दिखाए 
जा रहे हैं..

फिल्म कई जगह बेहद संवेदनशील हो जाती है और दर्शकों का मन द्रवित कर जाती है.

अमिताभ बच्चन के अभिनय की प्रशंसा के लिए अब शब्द मिलने मुश्किल हैं...पिछड़ी जाति के सैफ अली खान...को जिसे बचपन से उन्होंने सहारा दिया था,उच्च शिक्षा लिए अमेरिका भी भेजा...उसे जब कॉलेज का अनुशासन भंग करने के लिए डांट कर गेट आउट कहते हैं...तो गुस्से से भरा चेहरा पल भर में असीम दर्द में तब्दील हो जाता है...कॉलेज छोड़ते समय पलट कर उस कॉलेज को देखना... सारे भाव बिना एक शब्द बोले ही व्यक्त हो जाते हैं. 

दीपिका आजकल के युवा बच्चों की तरह..अपने आदर्शवादी पिता को बहुत कुछ कह जाती हैं कि उन्होंने विश्वास कर घर अपने दोस्त के बच्चों को दे दिया...और अब बेघर हो गए. उसे एक ग्रेस मार्क नहीं लेने  दिया..और वो मेडिकल में जाने से वंचित रह गयी...पर बाद में पछताते हुए वो जब पीछे से अमिताभ को जकड़ कर रोती है तो हॉल में कई आँखें गीली हो जाती हैं.



'आरक्षण' के विषय पर सैफ और दीपिका में दूरी आ जाती है...तो  दोनों के उदास चेहरे ...अँधेरा...बारिश और बैकग्राउंड में बजता गीत..हॉल में सन्नाटा  सा ला देते हैं.


एक और बड़ा प्यारा सा दृश्य है फिल्म ,का..जहाँ अमिताभ सुबह चार बजे उठ कर कुछ बच्चियों को रिविज़न करवाने जाते हैं...कमरे में एक तरफ पिता सोए हुए हैं.....जिस तख़्त पर माँ सो रही हैं..उसी पर एक किनारे अमिताभ बैठ कर उन  बच्चियों को पढ़ाते  हैं. (मैने तो नहीं देखा...पर अपने गाँव के एक शिक्षक के बारे में सुना है वे यूँ ही चार बजे उठ जाते थे और बोर्ड के इम्तिहान की तैयारी करनेवाले बच्चों के घर का चक्कर लगाते थे और खिड़की से आती हुई आवाज़ से अंदाजा लगाते थे कि वे बच्चे पढ़ रहे हैं या नहीं..जिस घर की खिड़की से आवाज़ नहीं आई फिर तो वे नहीं...उनकी छड़ी बोलती थी )



अमिताभ की पत्नी के रूप में तन्वी आज़मी और बेटी के रूप में दीपिका 

पादुकोणे का अभिनय बहुत ही सहज है. सैफ ऐसे intense role  में 

अच्छे लगते हैं और अच्छा निभाया है उन्होंने. सम्पान घर के युवा..छात्र प्रतीक बब्बर के रोल पर ज्यादा मेहनत नहीं की गयी हैं. मनोज बाजपेयी ने तो भ्रष्ट प्रिंसिपल का रोल कुछ ऐसे निभाया है...कि दर्शक नफरत करने लगें उनसे. 

निर्देशन अच्छा है....पर स्क्रिप्ट थोड़ी ढीली है...इंटरवल के बाद फिल्म  धीमी हो जाती  है. इस फिल्म में गीत -संगीत की ज्यादा गुंजाईश नहीं थी..पर 'मौका..मौका...गीत होठों पर चढ़ने वाला है. 

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

भाई-बहन के निश्छल स्नेह के कुछ अनमोल पल

राखी आ गयी....और हमेशा की तरह....ये दिन तो भाई-बहनों का ही है...ये एक दिन ऐसा है... जब भाई सात समंदर पार हो....कितना भी व्यस्त हो, किसी काम में आकंठ डूबा हो...बहन की याद आ ही जाती है और कैसे नहीं आएगी?? बहन इतने दिल से जो याद करती है  


ब्लॉग जगत में अभी दो साल भी पूरे नहीं हुए..पर छोटे (बड़े भी) बहन - भाइयों का स्नेह भरपूर मिला. इन आभासी बहन-भाई के रिश्ते पर बड़ी बहसें होती हैं....ना जाने कितनी पोस्ट लिखी जा चुकी हैं. कईयों का कहना है कि किसी मंसूबे के तहत..टिप्पणी पाने के उद्देश्य से ये रिश्ते बनाए जाते हैं....अब उनलोगों की  ऐसी सोच की कोई वजह होगी...पर मैं कैसे मानूं ??...जब मेरे अनुभव  बिलकुल ही अलग हैं. 


जब कोई मेल भेजते हुए अचानक दीदी लिख जाता है....और मेरे ख़ुशी प्रकट करने पर कहता है.....मैं अनजाने में ही 'दीदी' लिख गया...फिर दुबारा पढ़ा, तो ध्यान आया 'दीदी' लिखा है....फिर मैने उसे ऐसे ही रहने दिया. 


कितने ही लोग..दीदी,रश्मि दी या 'रश्मि बहना' कहते हैं...पर ना तो मैं उनकी सारी पोस्ट पर नियमित हूँ...और ना ही वे मेरी हर पोस्ट पर आते हैं.फिर टिप्पणियों की लेन-देन  की बात कहाँ से आई?? 


मैं तो इन भाइयों के स्नेह से इतनी अभिभूत हूँ कि शब्द नहीं मिलते...जब 'रवि धवन' शादी की बारात लेकर निकल रहा होता है..और मेरा आशीर्वाद लेने के लिए फोन करता है...मुझे बैंड की आवाज़ भी सुनाई देती है..और मैं डांट देती हूँ..."ये समय मिला है..तुम्हे फोन करने का??....मेरा आशीर्वाद सदा साथ है...अभी फोन रखो "

एक और ब्लोगर भाई...फेरों से उठता है....और फोन मिलाता है...मेरे पूछने पर कि सारी रस्मे हो गयीं?..कहता है...बस अभी-अभी पूरी हुई हैं. मुझे फोन पर लोगों की हलचल सुनाई देती है...और मैं कहती हूँ...'फोन रखो बाद में बात करती हूँ'...वो अपनी 'सद्द्यविवाहिता  दुल्हन' से भी बात करवाता है...और उसे मजाक में 'मिसेज' का संबोधन देने वाली मैं पहली होती हूँ...दुल्हन का  लाल चेहरा मुझे हज़ारों मील दूर बैठे भी 
दिखाई दे जाता है...:)


और मैं अपने इन भाइयों से अब तक मिली नहीं हूँ . 

ओह!! अब अपने किस्से ही सुनाती रहूंगी तो आप सब बोर हो जायेंगे...लीजिये कुछ दूसरे भाई-बहनों की प्यार भरी बातें पढ़िए...पिछले 
साल पोस्ट की थी....पढ़ रखी हो तो दुबारा पढ़िए...अच्छी लगेंगी..:)
 

हम मध्यमवर्गियों का इतिहास में कहीं नाम नहीं होता पर रस्मो-रिवाज़,त्योहार,परम्पराएं..एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इन्ही के द्वारा हस्तांतरित की जाती है. राखी में भी बहने बड़े शौक से राखी खरीदती हैं या खुद बनाती हैं, मिठाइयां  बनाती हैं,भाई शहर में हुआ तो राखी बाँधने जाती हैं  वरना दिनों पहले ,राखी पोस्ट की जाती है, भाई भी उसी स्नेह से इसका प्रतिदान करते हैं.

पर जब भाई -बहन का यही प्यार निम्न वर्ग और उच्च  वर्ग में देखने को मिलता है तो बड़ी सुखद अनुभूति होती है.

एक बार मैं अपने दादा जी के पास गाँव गयी हुई थी.देखा हमारी गायें चराने वाला चौदह -पंद्रह वर्ष का एक किशोर, मेरे दादा जी से सौ  रुपये मांग रहा है (तब वह एक बड़ी रकम थी ) कुछ दिन बाद उसकी माँ ने बताया कि शिवराम अपनी बहन 'प्रमिला' से मिलने पहली बार उसके ससुराल गया .प्रमिला चावल का पानी निकाल रही थी (भोजपुरी में कहें तो मांड पसा रही थी )..उसने जैसे ही सुना, भाई आया है, ख़ुशी में उसका ध्यान बंट गया और गरम पानी से उसका हाथ जल गया. शिवराम अंदर गया तो देखा,उसकी बहन पुआल पर सोती है. घर आकर वह अपनी माँ से बहुत झगडा कि ऐसी जगह उसकी शादी कर दी कि उसका हाथ जल गया और वह पुआल पर सोती है. उसने मेरे दादाजी से एडवांस पैसे लिए और एक चौकी खरीद,बैलगाड़ी पर लाद, अपनी बहन के ससुराल पहुंचा आया.

ऐसा ही प्यार हाल में देखा. मेरी कामवाली मराठी  बाई, 'माँ बीमार है' कहकर एक दिन अचानक गाँव चली गयी.उसकी बहन काम पर आने लगी तो बताया कि उसके पति ने बहुत मारा-पीटा है..इसीलिए वह चली गयी है. करीब दस दिन बाद वह वापस आई, उसने कुछ नहीं बताया तो मैने भी नहीं पूछा...अचानक उसके थैले में से मोबाइल बजने लगा.मैने यूँ ही पूछ लिया ,'नया मोबाइल लिया?"

तब उसने सारी बात बतायी कि यह सब सुनकर ,उसका भाई चार लोगों के साथ गाँव से आया और उसके पति की अच्छी धुनाई की (कितने मध्यमवर्गीय भाई हैं जिन्होंने यह सुन, अपने जीजाजी को दो झापड़ रसीद किए हों कि मेरी बहन पर हाथ क्यूँ उठाया ?..खैर..) एक कमरा किराये पर ले उसका सारा समान वहाँ शिफ्ट किया और बहन को एक मोबाइल खरीद कर दिया कि जब भी जरूरत हो,बस एक फोन कर ले .इसका  परिणाम भी यह हुआ कि उसका पति खुद माफ़ी मांगता हुआ साथ रहने आ गया.

भाई-बहन का ऐसा  ही निश्छल स्नेह ,उच्च वर्ग में देख भी आँखें नम हो जाती हैं.

अमिताभ बच्चन जब कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान भयंकर रूप से बीमार  पड़े थे ,उन्हीं दिनों राखी भी पड़ी थी और डॉक्टर के मना करने के बावजूद ,अमिताभ बच्चन ने 'सोनिया गांधी' और रमोला (अजिताभ की पत्नी ) की राखी कलाई से नहीं उतारी थी. बाद में सोनिया गाँधी और अमिताभ बच्चन  के सम्बन्ध मधुर नहीं रहें.पर जब तक निश्छल प्रेम था,उसे नज़रंदाज़ कैसे किया जा सकता है? पता नहीं कितने लोगों को पता है,सोनिया गाँधी की शादी ,हरिवंश राय बच्चन के घर से हुई थी ,मेहंदी,हल्दी की रस्म वहीँ अदा की गयी थी और इसी नाते अमिताभ से भाई का रिश्ता बना.

संजय दत्त से सम्बंधित घटना बहुत ही द्रवित करनेवाली है. एक प्रोग्राम में उनकी बहन प्रिया बता रही थीं. संजय दत्त सबसे बड़े थे,इसलिए दोनों बहनों को हमेशा इंतज़ार रहता कि राखी पर क्या मिलेगा,वे अपनी फरमाईशें भी रखा करतीं.पर जब संजय दत्त जेल में थे,उनके पास राखी पर देने के लिए कुछ भी नहीं था. उन्हें  जेल में कारपेंटरी और बागबानी  कर दो दो रुपये के कुछ कूपन मिले थे. उन्होंने वही कूपन , बहनों को दिए. जिसे प्रिया ने संभाल कर रखा था और उस प्रोग्राम में दिखाया. सबकी आँखें गीली हो आई थीं.

ऋतिक रौशन का किस्सा कुछ अलग सा है. उनका और उनकी बहन सुनयना के कमरे तो अलग अलग थे पर उन्हें बाथरूम शेयर करना पड़ता था. ऋतिक रौशन को सफाई पसंद थी जबकि टीनएज़र लड़कियों सी सुनयना  के क्रीम, लोशन,क्लिप्स, नेलपौलिश इधर उधर बिखरे होते. उनका रोज झगडा होता. फिर सुनयना  की शादी हो गयी.ऋतिक जब दूसरे दिन  बाथरूम में गए तो एकदम साफ़ झक झक करता बाथरूम  देख हैरान रह गए.और इतनी  याद आई बहन  की कि तौलिया आँखों से लगाए बाथरूम के फर्श पर ही बैठ रोने लगे. 


ये थे भाई बहनों के निश्छल स्नेह के कुछ खट्टे-मीठे पल.

मेरे सारे भाइयों  को दुनिया की ढेssssssssर  सारी खुशियाँ मिलें.

सफलताओं के शिखर हो,उनके कदमो तले
हर डाली पर जीवन की,नव पुष्प खिले,
दीपों की माला सी, पाँत खुशियों की जगमगाए
सुख,समृधि, शांति ,से उनका दामन भर जाए 
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फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...