इस पोस्ट को कुछ दिनों पहले ही लिखना था..पर अनेकानेक कारणों से वक़्त नहीं मिला...पर देर से ही सही इसे लिखने की तमन्ना जरूर थी.
युवराज वाल्मीकि अपनी झोपड़ी में
इंग्लैण्ड के हाथों भारतीय क्रिकेट टीम को मिली करारी हार ने खेल प्रेमियों को व्यथित कर रखा था...ऐसे में मरहम का कार्य किया हॉकी में मिली अनापेक्षित जीत ने. लेकिन इस मरहम का प्रयोग कितने लोग कर पाए...क्यूंकि अधिकाँश लोगो को हॉकी की खबर ही नहीं रहती...ना तो अखबार में इसके चर्चे होते हैं ना ही टी.वी. पर (ब्लॉगजगत में हुई हो तो पता नहीं) .12 सितम्बर 2011 को चीन में एशियन हॉकी चैम्पियंस ट्रॉफी के फाइनल मैच में भारत ने पकिस्तान को 4-2 से हराकर चैम्पियंस ट्रॉफी जीत ली. पर इस मैच का सीधा प्रसारण किसी भी चैनल ने नहीं किया क्यूंकि वे क्रिकेट मैच दिखाने में व्यस्त थे
भारतीय क्रिकेट टीम, टेस्ट-मैच श्रृंखला....एक-दिवसीय श्रृंखला...T-20 श्रृंखला हार गयी, पर उसके खिलाड़ी जब भारत लौटे तो हर खिलाड़ी 15 से 20 लाख रुपये कमा चुका था. और यहाँ हमारी हॉकी टीम के खिलाड़ियों की कमाई थी... 300 रुपये दैनिक भत्ते के हिसाब से कुछ हज़ार रुपये (विशवास नहीं होता..पर मैंने अखबार में यही पढ़ा है)
जब टीम जीत कर लौटी तो हॉकी फेडरेशन के सेक्रेटरी ने हर खिलाड़ी को इनामस्वरूप पच्चीस हज़ार रुपये देने की घोषणा की. जब खिलाड़ियों ने इतनी कम राशि लेने से इनकार कर दिया और मिडिया ने भी आलोचना की तब डेढ़ लाख रुपये के इनाम की घोषणा की गयी.
पंजाब सरकार, उड़ीसा सरकार, महाराष्ट्र सरकार ने खिलाड़ियों के लिए इनाम की घोषणा की है लेकिन इस विवाद के बाद. वरना टीम के जीत की खबर सुनते ही किसी ने टीम के लिए किसी इनाम की घोषणा नहीं की. जबकि क्रिकेट टीम को मिली किसी भी जीत पर इनामो की कैसी बारिश की जाती है...यह सब हम हाल के दिनों में देख ही चुके हैं.
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मुंबई के युवराज वाल्मीकि भी इस टीम के सदस्य थे और जीत में भी उन्होंने अहम् भूमिका निभाई. उन्हें महाराष्ट्र सरकार ने दस लाख रुपये देने की घोषणा की है. पर जब उनके बारे में पढ़ा तो पता चला वे एक झोपडी में रहते हैं, जिसमे दरवाजे भी नहीं है..और पक्की छत भी नहीं. पर वो झोपडी कप और शील्ड से सजी हुई है. मैने सोचा दस लाख में मुंबई में तो एक फ़्लैट भी नहीं खरीद सकते वे. खैर..सरकार को थोड़ी शर्म आई है और अब उन्हें मुख्यमंत्री के २% के कोटे से एक फ़्लैट दिया जा रहा है.
इक्कीस वर्षीय युवराज वाल्मीकि की यह सफल यात्रा विश्वास दिलाती है कि कड़ी मेहनत और सच्ची लगन से क्या हासिल नहीं किया जा सकता. मुंबई की मरीन लाइंस में 16/16 की एक झोपडी में युवराज रहते हैं जहाँ पिछले चालीस सालों से बिजली नहीं है. उनके पिता एक ड्राइवर हैं जिनकी मासिक आय 6000 रुपये है. फिर भी उन्होंने युवराज को कॉलेज में पढ़ने भेजा और कभी हॉकी खेलने से नहीं रोका. बल्कि बढ़ावा ही दिया.
नौ साल की उम्र में उनके पहले कोच मर्ज़ाबान पटेल ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें कोचिंग देनी शुरू की. सत्रह साल की उम्र में वे एयर इण्डिया के लिए खेलने लगे .उसके बाद से धनराज पिल्लै, गेविन फरेरा, जोकेम कारवालो ने उन्हें कोचिंग देनी शुरू की. नेशनल टीम के चयन के लिए कोचिंग कैम्प में 110 खिलाडी थे. उसमे से 18 खिलाड़ियों की सूची में अपना नाम देखकर ही वे खुश थे. पर जब पकिस्तान के साथ खेलते हुए पाकिस्तानी टीम के विरुद्ध उन्हें पेनाल्टी शूट का मौका मिला, तो उन्होंने अपने कोच को निराश नहीं किया और गोल करके भारत को बढ़त दे दी और भारत विजयी रहा.
अच्छी बात है कि युवराज इस चकाचौंध से भ्रमित नहीं हुए हैं..और कहते हैं..."अब तो और भी मेहनत करनी है...भारत ओलम्पिक में मेडल ला सका तो मेरा सपना पूरा होगा. "
एक दिलचस्प बात और हुई. युवराज के दादा जी सालो पहले उत्तर-प्रदेश के अलीगढ से मुंबई आए थे. उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे....जो मुंबई में सिर्फ "मराठी माणूस" को ही देखना चाहते हैं..उन दोनों ने भी युवराज वाल्मीकि का सम्मान किया.





