शनिवार, 6 अगस्त 2011

इक था बचपन...बचपन के प्यारे से दोस्त भी थे...

ब्लॉग ,गुजरे लम्हों को याद करने का एक बहाना सा बन गया है...सारे संस्मरण गुजरी यादों के सागर ही तो हैं....जिनमे डूबना-उतराना मुझे कुछ ज्यादा ही भाता है.


जब फिल्मो से जुड़े संसमरण लिख रही थी...उसी समय सोच लिया था...इसी तर्ज़ पर ..अपने दोस्तों...विद्यालयों  और किताबों से जुड़े संस्मरण भी लिखूंगी...और  'फ्रेंडशिप  डे' से उपयुक्त और कौन सा अवसर हो सकता है...दोस्तों पर लिखने का...
वैसे , इस तरह की पोस्ट लिखने की प्रेरणा 'अभिषेक 'के ब्लॉग से मिली...उसने जितनी अच्छी तरह अपने दोस्तों के बारे में लिखा है...मुझे संदेह है कि मैं उतना अच्छा लिख पाउंगी..पर कोशिश से क्यूँ बाज़ आऊं :)


 मेरी प्रारम्भिक शिक्षा 'रांची' में हुई. 'चिल्ड्रेन्स  एकेडमी' में एडमिशन हुआ था...उन दिनों 'जूनियर के.जी.', 'सीनियर के.जी'. नहीं..'के.जी वन', 'के जी टू' होते थे...इसलिए याद है क्यूंकि  अपनी मौसी -मामा को ऊँची कक्षाओं में और कॉलेज में देख मैं बड़ी निराश होकर कहती.."हम तो अभी के जी.टुइए में हैं..." और इस बात को कई बार दुहराया जाता.
 तब शायद मैं 'के जी टुइए' में थी..तभी एक दोस्त बनी.."मसूदा' सिर्फ नाम ही याद है...चेहरा बिलकुल भी नहीं याद. :( एक बार मैं बुखार के कारण स्कूल नहीं गयी थी...और मसूदा ने चार लाइन  वाली नोटबुक से पेज निकाल दो पंक्ति की एक  चिट्ठी लिखी थी..."डियर रश्मि...हाउ आर यू ..मसूदा " इतने में ही पेज भर गया था. :) और अपने चपरासी के हाथों वो चिट्ठी भेजी...पूरे घर भर में वो चिट्ठी हाथो- हाथ घूमती रही..नाना-मामा-मौसी सब हंस-हंस कर पढ़ते रहे...और सबसे चर्चा करते रहे. और मुझे उनकी ये हरकत बहुत ही अजीब लगी थी( नागवार भी गुजरी  थी) ...कि मेरे नाम की चिट्ठी की इतनी  चर्चा क्यूँ हो रही है...जबकि मेरी मौसी अपने पास में रहने वाली सहेली  को रोज ही कुछ ना कुछ लिखकर मेरे हाथो भेजती थी..'ये किताब भेज दो..तो  वो नोट्स भेज दो..'तब तो उनकी चिट्ठी कोई नहीं पढता...तब नहीं पता था कि ..तीन-चार साल के बच्चों का यूँ आपस में लेटर भेजना बड़ा अटपटा लगा होगा.

मसूदा के पिता का ट्रांसफर हो गया और वो स्कूल छोड़ चली गयी....इसके बाद एक फ्रेंड याद है, 'विनीता' . उस से ज्यादा उसके 'सेंटेड रबर' याद हैं...उसके इरेज़र के किनारे हरे रंग के और सुगन्धित होते थे...और उसकी नज़र बचा मैं उसे सूंघ लिया करती थी...शायद घर पर कभी फरमाईश नहीं की होगी..वर्ना ननिहाल में पूरी कर ही दी जाती..पर नानी ने इतनी  उपदेशात्मक कहानियाँ सुना-सुना कर जैसे ब्रेन वाश ही कर दिया था कि...किसी की नक़ल..बराबरी नहीं करनी चाहिए...ये ..वो..पता नहीं..क्या क्या जिंदगी में नहीं करना चाहिए (हाय!! आज के बच्चे.. ना तो  नानियों को सीरियल देखने से फुरसत  है कि वे कहानियाँ सुनाएँ....ना ही बच्चों को अपने होमवर्क और कार्टून नेटवर्क से कि वे कहानियाँ सुनें ) 

एक बार मेरी मौसी ने मुझे एक सुन्दर सी गुड़िया बना कर दी थी...जरी की साड़ी में लम्बे बालों वाली गहनों से सजी गुड़िया. मैं उसे अपने छोटे से स्टील के बक्से में छुपा, स्कूल ले गयी थी... विनीता को दिखाने.(जब अपने बच्चों के टिफिन बॉक्स उनके स्कूल बैग में डालते उनके खिलौने...दिख जाते थे तो अपने दिन याद आ जाते थे , ये सिलसिला शायद पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है )  विनीता भी अपने बक्से में एक हरे रंग का पत्थर लाई थी मुझे दिखाने के लिए...जो उसके पिताजी कहीं टूर पर गए थे तो लेकर आए थे. मैने उस पत्थर के बदले में वो गुड़िया विनीता को दे दी. बचपन में  मैं कोई टॉम बॉय नहीं थी..पर गुड़ियों से भी कभी नहीं खेलती..इसीलिए शायद गुड़िया से मोह नहीं रहा हो...पर मेरी मौसी आज तक सुनाती है कि इतने प्यार से और इतनी मेहनत से उसने गुड़िया बनाई थी...और मैने पत्थर के एक टुकड़े के बदले में किसी को दे दिया.:)  विनीता काफी दिनों तक हमारे घर में याद की जाती रही ...अपने पुकार के नाम ' बुन्नु' के कारण. मेरी एक मौसी को वो नाम इतना पसंद था कि कई साल बाद अपनी बेटी का नाम उन्होंने 'बुन्नु' रखा...

मेरा छोटा भाई भी जब स्कूल जाने की उम्र का हुआ तो मैं पापा की पोस्टिंग वाले शहर में आ गयी...और एक ही स्कूल में हम दोनों का नाम लिखवाया गया...वहाँ एक ही साल पढ़ी...कुछ दोस्त भी बने...माधुरी..अशोक..हरेकृष्ण..कंचन..पर कुछ ख़ास यादगार नहीं घटा...इतना ध्यान है कि पता नहीं क्यूँ और किस विषय पर ...मैने  एक कार्टून बनाया था और उस पर लिख दिया कंचन...क्लास में सब तो बहुत हँसे थे..पर कंचन बेहद नाराज़ हो गयी थी...और मुझसे बात करना बंद कर दिया था...और वो दिन और आज का दिन...फिर कभी कोई कार्टून नहीं बनाया...कंचन को कभी ये पता भी नहीं चल पाया होगा कि मेरे अंदर के उभरते कार्टूनिस्ट को हमेशा के लिए ख़त्म करने में उसका हाथ है { अब कहने में क्या जाता है...:) }

एक साल के बाद ही पापा का उस शहर  से तो ट्रांसफर हो गया पर कहीं पोस्टिंग नहीं हुई थी...(ये बात प्राइवेट नौकरी वाले समझ ही नहीं पाते कि सरकारी नौकरियों में ऐसा होता है) हमारा साल ना खराब हो इसलिए हमें गाँव भेज दिया गया. और अंग्रेजी स्कूल के थर्ड स्टैण्डर्ड के बाद मेरा नाम सीधा छठी कक्षा  में लिखवा दिया गया. ये कहा जाता था कि अंग्रेजी मीडियम  का स्टैण्डर्ड ऊँचा होता है. मेरे क्लास में सिर्फ चार लडकियाँ थीं और मेरी उम्र से बहुत बड़ी...वे तभी से अपने दहेज़ की  तैयारियों में जुटी हुई  होतीं. गाँव में लडकियाँ थोड़ी बड़ी हुई नहीं कि उन्हें क्रोशिया और सूई धागा थमा दिया जाता था...अपने भावी घर को सजाने संवारने के लिए वे टेबल क्लॉथ...तकिया के खोल..चादरें... फोटो फ्रेम बनने में जुट जातीं.. जिनमे  हनुमान जी...बत्तख..खरगोश वगैरह काढ़े जाते ...दसवीं पास करते ही या स्कूली पढ़ाई के दौरान ही उनकी शादी कर दी जाती....और तब तक बक्सा भर कर उनके हाथ की कारीगरी के नमूने तैयार हो जाते. 

मेरा मन उन दिनों सिर्फ खेलने -कूदने में ही रहता था....लिहाज़ा...तीसरी-चौथी में पढ़ने वाली  बेबी-डेज़ी..अनीता..सुनीता..मीरा..राजकुमार...दीपक..भोला..वगैरह ही मेरे दोस्त होते.. स्कूल से आते ही फ्रॉक  के घेरे में थोड़ा भूंजा डाल कर फांकते हुए लडकियाँ मेरे घर  धमक जातीं. लड़के पैंट के पॉकेट में भूंजा डाले होते. अब शहर से आने के कारण इस तरह फ्रॉक में भूंजा खाना मुझे नहीं रुचता...और उन्हें ये बात अजीब सी लगती. मुझे तैयार होने में थोड़ी देर लगती पर वे लोग इंतज़ार करते...फिर तो अँधेरा होने तक..हमलोग कबड्डी, बुढ़िया कबड्डी... इक्खट दुक्खट..कित-कित  खेला करते....कभी कभी गुल्ली डंडा भी....आस-पास के सारे बच्चे हमारे घर के सामने इकट्ठे होते..और बेतरह शोर मचाते....दादा-दादी कुछ नहीं कहते...लेकिन हमारे यहाँ काम करनेवाली काकी...जरूर कहतीं..'लग गईल ..मैना झोंझ" 

बेबी,डेज़ी...मैं और मेरा भाई 'नीरज' साथ में स्कूल जाया  करते थे. एक बार घनघोर बारिश हो रही थी...हमारे पास रेनकोट थे..पर मुझे पहनने में इतनी शर्म आ रही थी...क्यूंकि बेबी,डेज़ी के पास नहीं थे...वे दोनों केले के बड़े बड़े पत्तों से खुद को ढक कर बारिश से बचने की नाकाम कोशिश करतीं...और मैं सर झुकाए बारिश के पानी से तो बच जाती पर शर्म से पानी पानी होती आगे बढ़ जाती. आज भी...गाँव की उस पगडण्डी पर फ्रॉक में केले के पत्ते ओढ़े वो छोटी सी लड़की आँखों के आगे साकार है. स्कूल में ना के बराबर उपस्थिति होती...और एक क्लासरूम बंद कर के दोनों बहने और कुछ और भीगी हुई लडकियाँ...सिर्फ समीज पहने...खिड़की के पल्ले पर अपने फ्रॉक सूखने को डाल देतीं...और हम उसी क्लास में इक्खट दुक्खट खेलना शुरू कर देते.

एक बार कुछ दोस्तों की आपस में लड़ाई हो गयी. और मैने पता नहीं किस दोस्त का साथ देने के लिए अपने सर की...झूठी कसम खा ली...सबने मेरा विश्वास कर लिया...सुलह हो गयी....लेकिन मैं अंदर से बुरी तरह डर गयी....कि अब मैने झूठी कसम खाई है...अब तो मर ही जाउंगी...और मैं दालान में जाकर चुपके -चुपके रोती..कि मेरे परिवार वाले... मेरे दोस्त..सब मुझे याद करके कितना रोयेंगे..( तब 'मिस'करने जैसे शब्द पता नहीं थे...भाव पर वही थे) पर मरने से डर नहीं लगता क्यूंकि उस समय मेरे लिए मृत्यु का अर्थ था...'आँखे बंद कर सो जाना और मर जाना ' ....रोज रात में यही सोच कर  सोती....कि सुबह तक तो मैं मर जाने वाली हूँ..पर पूरे एक हफ्ते तक...सुबह आँखें  खुलने  पर खिड़की से प्रसाद काका को बाहर झाड़ू लगाते....गाय -बैलों को दाना-पानी देते ....दादा जी को दातुन करते हुए आस-पास वालों से बातें करते देखती तो राहत मिलती  कि अब तक झूठी कसम ने असर नहीं किया है....और तब से ही ये कसम-वसम  मानना छोड़ दिया :)

(वे मेरे सारे दोस्त जहाँ भी हों उनके स्वस्थ-सुखी जीवन के लिए हज़ारों दुआएं...आप सब मित्रों को भी 'फ्रेंडशिप डे' की हार्दिक शुभकामनाएं.)

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

जब यादगार के तौर पर एक कॉफीन के सिवा कुछ नहीं रहता.

अक्सर गरीब देश के लोगो को नौकरी का लालच दे..दूसरे देशों में ले जाने के बारे में हम पढ़ते हैं...हमें उनके हालातो के बारे में भी मालूम होता है...पर सरसरी तौर पर. लेकिन जब इन्ही स्थितियों का शिकार हुए किसी के जीवन के पन्ने एक-एक कर हमारे सामने खुलने लगते हैं...तो लगता है..कहाँ है ईश्वर??


पिछले दिनों टी.वी. पर एक डौक्यूमेंट्री देखी जो दिल दहला गयी. 

पप्पू एक खुशमिजाज़ बंगला देशी युवक है..पढ़ा लिखा है...पर कोई पक्की नौकरी नहीं है.....कविताएँ लिखता है...मधुर गीत गाता है...ट्यूशन पढाता है. घर में सिर्फ  माँ और एक विधवा बहन अपने दो बच्चों के साथ है...पिता को वह बचपन में ही खो चुका है..माँ कपड़े सिल कर गुज़ारा करती है...आर्थिक परेशानियों के बीच जिंदगी की गाड़ी चल रही है..पर परिवार में आपसी प्यार बहुत है...पप्पू  माँ का बहुत ध्यान रखता है...घर में झाड़ू लगा देता है....माँ की साड़ी में कलफ लगा...इस्त्री  कर देता है...माँ से हमेशा कहता है...'अब इतना काम मत किया करो.." बहन के बच्चों की देखभाल करता है...उसके छोटे बेटे को नहलाना -धुलाना-खिलाना सब वही करता है.

एक व्यक्ति उस से दोस्ती गांठता है...उसके घर भी आना-जाना शुरू कर देता है....और अपने मीठे व्यवहार से सबका दिल जीत लेता है. वह पप्पू को सलाह देता है कि उसकी रिक्रूटमेंट एजेंसी के जरिये वो क्यूँ नहीं मलेशिया चला जाता?.. ..वहाँ से वह हर महीने हज़ारों रुपये (टका ) घर भेज सकेगा. बस उसे कुछ पैसों का इंतजाम करना होगा...पप्पू की  माँ के पास कुछ जमीन थी...जिसे उसने कितने बुरे वक़्त आने पर भी नहीं बेचा था....पर अब बेटे के सुखद भविष्य के सपने सच करने के लिए वो जमीन बेच देती है...कुछ क़र्ज़ भी लेती है और पप्पू मलेशिया चला जाता है.

उसके जाने के दिन माँ...पुलाव और खीर बनाती है...पर कवि ह्रदय पप्पू कहता है,..उसे अपने देश का राष्ट्रीय भोजन करना है और वह है...'बासी भात,प्याज और हरि मिर्च' पप्पू कहता है,...विदेश से लौटने के बाद भी वो यही खायेगा. एयरपोर्ट भी वो टैक्सी में नहीं..अपने राष्ट्रीय वाहन साइकिल रिक्शा में जाता है.

इसके बाद काफी दिनों तक पप्पू  की कोई चिट्ठी नहीं आती. उसकी माँ बहने बार-बार रिक्रूटमेंट एजेंसी में जाती हैं...तो वे कहते हैं...जाकिर हुसैन के नाम से एक चिट्ठी आएगी...उसे खोल लेना...अब उन्हें पता चलता है कि पप्पू को फर्जी पासपोर्ट पर ले जाया गया था,जबकि इनलोगों ने उसका असली पासपोर्ट बनवाया  था...
काफी दिनों बाद उन्हें एक कैसेट मिलता है...जिसमे पप्पू ने अपनी सारी राम कहानी टेप करके भेजी है...पूरे डौक्यूमेंट्री  में वो टेप चलती रहती है. पप्पू कहता है..".मैने कोई चिट्ठी इसलिए नहीं लिखी क्यूंकि माँ तुम्हे वो सब सुनकर तकलीफ होती ...पर तुम तो माँ हो...बिना मेरे बताए ही समझ जाओगी,कि मैं तकलीफ में हूँ...इसलिए छुपाने का कोई फायदा नहीं. ..इतने दिनों बाद तुमलोगों से बात करने का मौका मिला है..तो आज मैं तब तक बोलता रहूँगा..जबतक ये कैसेट ख़त्म ना हो जाए.

और पप्पू बताता है कि उन्हें नौकरी का लालच दिया गया पर यहाँ किसी कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरी करवाई जाती है...ईंट ..बड़े बड़े पाइप उन्हें ढोने  पड़ते हैं...मजदूरी कोई नहीं मिलती और खाने के लिए सूखे हुए ब्रेड और  पानी सी दाल  मिलती है. उन्हें खुले में कचरे के पास सोना पड़ता है...एक चादर तक नहीं है बिछाने को...दिनों से वे नहाए नहीं हैं. और एक महीने से ज्यादा उन्हें एक जगह काम नहीं करने दिया जाता क्यूंकि उनके पास....प्रॉपर कागज़ात नहीं हैं. अलग-अलग देशों से लाए मजदूरों को आलू-बैंगन की तरह एक साइट से दूसरे साइट पर बेच दिया जाता है. एक जगह से लाए लोगो को एक साथ नहीं रखा जाता.
अगर ये लोग विरोध करते हैं..तो उन्हें बुरी तरह पीटा जाता है. 


जब इनसब ने मिलकर काफी विरोध किया तो इन्हें थोड़े पैसे दिए जाने लगे...वे सब कम से कम खर्च करते और पैसे बचाते. पर एक दिन पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया...और जेल जाने से बचने के लिए सारे पैसे घूस में दे दिए . पप्पू बीच बीच में बंगला गीत भी गाता  है...जिसमे उसके दिल का दर्द उभर आता है.."काली रात है...अनजान  शहर है...डर लगता है..पर मैं जाऊं कहाँ " जैसे भावार्थ हैं.
 पप्पू कहता है कि जितने पैसे उसे यहाँ आने में लगे हैं..उतना कमाने में उसे शायद २०,३० साल लग जाएँ..पर वो हार नहीं मानेगा..पैसे कमाएगा जरूर.कभी नाराज़ होकर कहता है...."इनलोगों ने हम जीते जागते लोगो का सौदा किया...अपना  घर-परिवार चलाने के लिए...अपने बीवी-बच्चों.. माँ को खुश रखने के लिए पर वे भूल जाते हैं कि जिनका सौदा कर रहे हैं...उनका भी एक परिवार है...माँ.. भाई.. बहन है. कभी निराश होकर ये भी कहता है..'मेरा तो नाम तक अपना नहीं...मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं...जैसे पप्पू मर गया हो....मैं अब एक मृतक  के सामान हूँ." 

पप्पू की माँ- बहने...एजेंसी में जाकर पप्पू की स्थिति बताती हैं और उसे वापस लाने की प्रार्थना करती हैं...तो उन्हें सब पहचानने से इनकार कर देते हैं...बहन उस दोस्त के पैर पकड़ लेती है तो वो इतनी जोर की ठोकर मारता है कि वो कई फीट दूर जाकर गिरती है. बहन बताती है कि मेरे भाई के पास अच्छे कपड़े नहीं थे तो मैने दो बार जाकर रेड क्रॉस में खून बेचा और उसके लिए शर्ट लेकर आई..पर उसे नहीं बताया..और आज उसी भाई के लिए कुछ नहीं कर पा रही" यहाँ भी उनकी हालत बहुत दयनीय हो गयी . मकान का किराया नहीं दे पाने की वजह से मकान मालिक उनकी आजीविका का साधन सिलाई मशीन उठा कर ले गया. 

पप्पू की माँ -बहनों का एजेंसी में जाकर गुहार लगना और कुत्ते की तरह दुरदुराया जाना जारी रहता है. और एक दिन उन्हें बताया जाता है कि उनका बेटा ,अमुक तारीख को वापस आ रहा है.....वे लोग आस-पास सबको ख़ुशी-ख़ुशी बताती हैं...उसके लिए बढ़िया खाना बनाती हैं...और जब एयरपोर्ट जाती हैं तो एक कॉफीन में अपने बेटे का मृत शरीर उन्हें मिलता है. पता चलता है....पुलिस ने पप्पू को शरणार्थी कैम्प में  डाल दिया गया था...और वहीँ प्रताड़ना देकर उसे मौत की  नींद सुला दिया गया. कुछ आंकड़े भी दिखाए गए कि हर साल मलेशिया के विभिन्न शरणार्थी कैम्प में मरने वालों की संख्या सौ से ऊपर ही है.

उसकी बहन ने उस कॉफीन को सम्भाल कर रखा है...क्यूंकि उसके पास उसके भाई की बस वही निशानी है...वो कहती है...मैं पूरा ध्यान रखती हूँ कि इस पर कोई खरोंच ना आजाये ,ये कहीं से टूट ना जाए...क्यूंकि मेरे भाई की यही आखिरी निशानी है..उसका एक कपड़ा...उसकी कोई भी चीज़ हमारे पास यादगार के तौर पर नहीं है. माँ सडकों पर भटकती रहती  है कि कोई भी लड़का मेरे पप्पू जैसा मिले तो मैं उसे पास बुला, दो बातें करूँ....लेकिन वो आंचल से आँखें पोंछते हुए कहती है...'उसे कोई नहीं मिलता.'
डौक्यूमेंट्री में सबसे द्रवित करनेवाला  है...पप्पू की सात वर्षीय भांजी का कथन....शायद अजनबी लोगो के सामने और कैमरे को देख वो अपने आँसू रोकने का  भरसक प्रयत्न करती है..कंपकंपाते होठों से बस इतना कह पातीहै.."मामा को अक्सर सपने में देखती हूँ कि वो सर पर हाथ रखे ,सड़क के पास उदास सा बैठा हुआ है" होंठ वैसे ही कांपते रहते हैं...और एक आँसू गालों पर ढुलक  आता है.

ये सिर्फ बंगलादेश के एक पप्पू या उसके घर की कहानी नहीं है...हमारे देश के भी कितने ही नौजवान ऐसी ही नौकरी के लालच में खाड़ी के देशों में जलालत की जिंदगी बिताने को मजबूर हैं...उनका भी अंत कुछ ऐसा ही होता है...और परिवार वाले भी यही सब भुगतते हैं.

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

कैसा है, हमारे खिलाड़ियों का खान पान ??


हम इंग्लैण्ड से पहला टेस्ट बुरी तरह हार गए और हमारी टीम के दो खिलाड़ी इंजर्ड भी हो गए....क्रिकेट हो..या हॉकी-फुटबौल या फिर टेनिस...बार-बार हमारे खिलाड़ी घायल होते रहते हैं....ऐसा  नहीं है कि विदेशी खिलाड़ी घायल नहीं होते...फिर भी स्टेमिना में तो हमारे खिलाड़ी उनसे मात खा ही जाते हैं और ख्याल आता है....इसकी वजह कहीं बचपन और किशोरावस्था में पौष्टिक आहार की जगह, उनका साधारण खान-पान तो नहीं??

अपने 'मन का पाखी' ब्लॉग पर खेल से सम्बंधित तीन पोस्ट की एक श्रृंखला सी ही लिखी थी. दो तो पहले ही इस ब्लॉग पर पोस्ट कर चुकी हूँ....

सचिन के गीले पॉकेट्स और पचास शतक


गावस्कर के स्ट्रेट ड्राइव का राज़


आज प्रस्तुत है ये पोस्ट


एक बार लगातार चार दिन,मुझे एक ऑफिस में जाना पड़ा. वहां मैंने गौर किया कि एक लड़का 'लंच टाईम' में भी अपने कंप्यूटर पर बैठा काम करता रहता है, लंच के लिए नहीं जाता. तीसरे दिन मैंने उस से वजह पूछ ही ली. उसने बताया कि उसे कभी लंच की आदत, रही ही नहीं क्यूंकि वह दस साल की उम्र से अपने स्कूल के लिए क्रिकेट खेलता था. मुंबई की रणजी टीम में वह ज़हीर खान और अजित अगरकर के साथ खेल चुका है. (उनके साथ अपने कई फोटो भी दिखाए, उसने)क्रिकेट की प्रैक्टिस और मैच खेलने के दौरान वह नाश्ता करके घर से निकलता और रात में ही फिर खाना खाता. उसने एक बार का वाकया बताया कि किसी क्लब की तरफ से खेल रहें थे वे. वहां खाने का बहुत अच्छा इंतजाम था. लंच टाईम में सारे खिलाड़ियों ने पेट भर कर खाना खा लिया और फिर कैच छूटते रहें,चौके,छक्के लगते रहे . कोच से बहुत डांट पड़ी और फिर से इन लोगों का पुराना रूटीन शुरू हो गया बस ब्रेकफास्ट और डिनर. 


भारतीय भोजन गरिष्ठ होता है...पर उसकी जगह सलाद,फल,सूप,दूध,जूस का इंतज़ाम तो हो ही सकता है. पर नहीं ये सब उनके 'फौर्मेटिव ईअर' में नहीं होता, जब उनके बढ़ने की उम्र होती है...तब उन्हें ये सब नहीं मिलता....तब मिलता  है जब ये भारतीय टीम में शामिल हो जाते हैं.मैं यह सोचने पर मजबूर हो गयी कि सारे खिलाड़ियों का यही हाल होगा. क्रिकेट मैच तो पूरे पूरे दिन चलते हैं. अधिकाँश खिलाड़ी,मध्यम वर्ग से ही आते हैं. साधारण भारतीय भोजन...दाल चावल,रोटी,सब्जी ही खाते होंगे. दूध,जूस,फल,'प्रोटीन शेक' कितने खिलाड़ी अफोर्ड कर पाते होंगे.? हॉकी और फुटबौल खिलाड़ियों का हाल तो इन क्रिकेट खिलाड़ियों से भी बुरा होगा.हमारे इरफ़ान युसूफ,प्रवीण कुमार,गगन अजीत सिंह सब इन्ही पायदानों पर चढ़कर आये हैं.भारतीय टीम में चयन के पहले इन लोगों ने भी ना जाने कितने मैच खेले होंगे...और इन्ही हालातों में खेले होंगे.

 




क्या यही वजह है कि हमारे खिलाड़ियों में वह दम ख़म नहीं है? वे बहुत जल्दी थक जाते हैं...जल्दी इंजर्ड हो जाते हैं...मोच..स्प्रेन के शिकार हो जाते हैं क्यूंकि मांसपेशियां उतनी शक्तिशाली ही नहीं. विदेशी फुटबौल खिलाड़ियों के खेल की गति देखते ही बनती है. हमारा देश FIFA में क्वालीफाई करने का ही सपना नहीं देख सकता. टूर्नामेंट में खेलने की बात तो दीगर रही. हॉकी में भी जबतक कलाई की कलात्मकता के खेल का बोलबाला था,हमारा देश अग्रणी था पर जब से 'एस्ट्रो टर्फ'पर खेलना शुरू हुआ...हम पिछड़ने लगे क्यूंकि अब खेल कलात्मकता से ज्यादा गति पर निर्भर हो गया था. ओलम्पिक में हमारा दयनीय प्रदर्शन जारी ही है.

इन सबके पीछे.खेल सुविधाओं की अनुपस्थिति के साथ साथ क्या हमारे खिलाड़ियों का साधारण खान पान भी जिम्मेवार नहीं.?? ज्यादातर भारतीय शाकाहारी होते हैं. जो लोग नौनवेज़ खाते भी हैं, वे लोग भी हफ्ते में एक या दो बार ही खाते हैं. जबकि विदेशों में ब्रेकफास्ट,लंच,डिनर में अंडा,चिकन,मटन ही होता है. शाकाहारी भोजन भी उतना ही पौष्टिक हो सकता है, अगर उसमे पनीर,सोयाबीन,दूध,दही,सलाद का समावेश किया जाए. पर हमारे गरीब देश के वासी रोज रोज,पनीर,मक्खन मलाई अफोर्ड नहीं कर सकते. हमारे आलू,बैंगन,लौकी,करेला विदेशी खिलाड़ियों के भोजन के आगे कहीं नहीं ठहरते. उसपर से कहा जाता है कि हमारा भोजन over cooked होने की वजह से अपने पोषक तत्व खो देता है. केवल दाल,राजमा,चना से कितनी शक्ति मिल पाएगी? 



हमारे पडोसी देश पाकिस्तान में भी तेज़ गेंदबाजों की कभी, कमी नहीं रही. हॉकी में भी वे अच्छा करते हैं. खिलाड़ियों की मजबूत कद काठी और स्टेमिना के पीछे कहीं उनकी उनकी फ़ूड हैबिट ही तो नहीं...क्यूंकि वहाँ तो दोनों वक़्त ... नौन्वेज़ तो होता ही है..खाने में है.

प्रसिद्द कॉलमिस्ट 'शोभा डे' ने भी अपने कॉलम में लिखा था कि एक बार उन्होंने देखा था ३ घंटे की  सख्त फिजिकल ट्रेनिंग के बाद खिलाड़ी.,फ़ूड स्टॉल पर 'बड़ा पाव' ( डबल रोटी के बीच में दबा आलू का बड़ा ,मुंबई वासियों का प्रिय आहार) खा रहें हैं.  इनसबका ध्यान खेल आयोजकों को रखना चाहिए...अन्य सुविधाएं ना सही पर खिलाड़ियों को कम से कम पौष्टिक आहार तो मिले.

स्कूल के बच्चे 'कप' और 'शील्ड' जीत कर लाते हैं.स्कूल के डाइरेक्टर,प्रिंसिपल बड़े शान से उनके साथ फोटो खिंचवा..ऑफिस में डिस्प्ले के लिए रखते हैं. पर वे अपने नन्हे खिलाड़ियों का कितना ख़याल रखते हैं?? बच्चे सुबह ६ बजे घर से निकलते हैं..लम्बी यात्रा कर मैच खेलने जाते हैं..घर लौटते शाम हो जाती है.स्कूल की तरफ से एक एक सैंडविच या बड़ा पाव खिला दिया और छुट्टी. मैंने देखा है,मैच के हाफ टाईम में बच्चों को एक एक चम्मच ग्लूकोज़ दिया जाता है, बस. बच्चे मिटटी सनी हथेली पर लेते हैं और ग्लूकोज़ के साथ साथ थोड़ी सी मिटटी भी उदरस्थ कर लेते हैं. बच्चों के अभिभावक टिफिन में बहुत कुछ देते हैं अगर कोच इतना भी ख्याल रखे कि सारे बच्चे अपना टिफिन खा लें तो बहुत है. पर इसकी तरफ किसी का ध्यान ही नहीं जाता. बच्चे अपनी शरारतों में मगन रहते हैं.और भोजन नज़रंदाज़ करने की नींव यहीं से पड़ जाती है. यही सिलसिला आगे तक चलता रहता है.

अगर हमें भी अच्छे दम-ख़म वाले मजबूत खिलाड़ियों की पौध तैयार करनी है तो शुरुआत बचपन से ही करनी पड़ेगी...ना कि टीम में शामिल हो जाने के बाद.

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

वो धूसर सी मटमैली शाम...

मुंबई, शोर का शहर......जिंदगी भागती सी ही नज़र आती है...पर इसी मुंबई में एक जगह ऐसी भी है....जहाँ जिंदगी थम गयी सी लगती है. पर ये स्थान भी मुंबई का ही एक हिस्सा है , यकीन करना मुश्किल .

यहाँ  कोई आवाज़ ही नहीं.....लोग किसी स्टेच्यु की तरह अपनी स्थान पर ही टिके हुए थे....पास वाली की उपस्थिति से अनजान...अपने ही खयालो में मुब्तिला .....सामने आकश में छाए बादल और ठांठे मारते समुद्र के पानी का रंग भी धूसर सा उदास लग रहा था....जैसे अंदर बैठे लोगो की मनःस्थिति को परिलक्षित कर रहा हो. बारिश के मौसम ने समुद्र  तट पर दूर तक कीचड़ का दलदल फैला दिया  था...जिसे पार कर खुले समुद्र की लहरों तक पहुंचना नामुमकिन सा लग रहा था....ICU यूनिट के बाहर शांत-निश्चल बैठे लोगों को भी अपने परिजनों की स्थिति किसी दलदल में फंसी सी ही लग रही थी..जिस से उनके सही सलामत   उबर आने के लिए सबो के लब पर प्रार्थना थी और डॉक्टर  के दल पर अटूट विश्वास.

पर आज चैतन्य मन से इन सबकी स्थिति का अवलोकन भी मैं इसलिए कर पा रही थी क्यूंकि ICU में भर्ती मेरे भतीजे के स्वास्थ्य में सुधार था...वह खतरे से बाहर था और डॉक्टर ने सिर्फ ऑब्जरवेशन के लिए ICU में रखा हुआ था...वर्ना दो रात पहले मुझे भी अपनी ही खबर नहीं थी....टाईफायड भी इतना खतरनाक  रूप ले सकता है...किसने सोचा था...भतीजे,सनी की पुणे की नई-नई नौकरी लगी...३ जुलाई से सनी को बुखार आने लगा...वो मेरे पास,मुंबई आ गया...यहाँ डॉक्टर ने सारे टेस्ट  करवा कर बताया टाईफायड है..दवा शुरू हो गई....७ जुलाई  को सनी को काफी आराम लगा...बुखार भी कम था...खाना भी अच्छी तरह खाया...टी.वी. देखा...पर अगले  दिन से उसके मोशन में रक्त आने लगा....डॉक्टर ने कहा,टाईफायड में ऐसा होता है...घबराने की बात नहीं...पर कमजोरी की वजह से एडमिट करने की सलाह दी...लेकिन  रात के बारह बजे से उसे जो रक्तस्त्राव शुरू हुआ...कि डॉक्टर -नर्स...हम सब , अपने पंजों पर ही खड़े रहे...डॉक्टर ने कुछ लाइफ-सेविंग ड्रग्स आजमाईं पर  कोई असर नहीं...अब इस हेवी ब्लड लॉस की  वजह से  खून चढ़ाया जाने लगा...और डॉक्टर ने कह दिया...इसे किसी बड़े अस्पताल में शिफ्ट करना होगा.

पतिदेव ने कहा...इसके घरवालों को खबर कर दो...पर खबर करूँ तो किसे??...पिता को ये किशोरावस्था में ही खो चुका था....अकेली माँ....इसके मामा के यहाँ गयीं हुईं थीं...और घर पर सिर्फ मेरे बूढे मौसी-मौसा...मोबाइल पर दोनों के नंबर बारी-बारी से देखती पर कॉल बटन प्रेस करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती...नर्सिंग होम के कॉरिडोर में एक मद्धम सी बत्ती जल रही थी...थोड़ी दूर पर एक  नर्स उंघती सी बैठी थी....सारे पेशेंट सो रहे थे...पति और बेटा भी चुप से बैठे थे...थोड़ी -थोड़ी देर में डॉक्टर अपने कमरे से बाहर आते...'सनी' को चेक करते...कभी नर्स को किसी इंजेक्शन देने के लिए कहते ...कभी पतिदेव को कोई परचा थमाते..."ये इंजेक्शन लेकर आइये"...पतिदेव...बेटे के साथ भागते हुए बाहर की  तरफ बढ़ जाते ...और मेरे नंगे पैर के नीचे की ठंढी जमीन थोड़ी और ठंढी हो मेरा खून सर्द किए जाती..और मैने मोबाईल नीचे रख दिया...उनलोगों को मैं क्या बताउंगी...और वे कितना समझ पायेंगे...सोच लिया,अब सुबह ही खबर की  जायेगी. 

पर वैसी सुबह तो किसी के जीवन में कभी ना आए...डॉक्टर ने सिर्फ दो,चार हॉस्पिटल  के नाम ही बताए...और कहा..तीन-चार घंटे के अंदर इसे वहाँ शिफ्ट कीजिए......पर बड़े हॉस्पिटल में बेड मिलने की सबसे बड़ी परेशानी होती है..कई फोन खटकाये गए....और लीलावती में सनी एडमिट  हो गया....यहाँ भी डॉक्टर के दल ने पहले तो दवा के सहारे ही इलाज़ की कोशिश की...लेकिन कोई फायदा ना होते देख...colonoscopy करनी पड़ी. और पता चला...छोटी आंत में कई ulcers हैं. उसमे से ही कुछ फट गए हैं..जिसकी वजह से इतना रक्तस्त्राव हो रहा है. ulcers का इलाज़ किया गया...और सनी ठीक होने लगा...भाभी  भी पहले तो आठ घन्टे का सफ़र कर बनारस पहुंची...फिर बनारस से पांच घंटे की फ्लाईट से मुंबई...

तीन दिन के जागरण  के बाद....आज मन कुछ शांत था....और अपने आस-पास देखने का होश था. अब लोगो के ग़मगीन चेहरे देख यही सोच रही थी...ईश्वर इनके परिजनों को भी स्वस्थ कर इनके चेहरे से ये गम की छाँव हटा...मुस्कान की धूप खिला दे. पास की ही कुर्सी पर सत्रह -अट्ठारह साल का एक किशोर हाथ में पानी की बोतल लिए बैठा था.उसने पीठ पर से बैग भी नहीं उतारे थे. शायद उसका पहला अनुभव था...सहमा सा...इस वातावरण में खुद को एडजस्ट नहीं कर पा रहा था...जरूर उसके भी परिजन...स्वस्थ हो वार्ड में शिफ्ट होनेवाले होंगे..वर्ना घरवाले किसी जिम्मेदार व्यक्ति को ही भेजते.. सामने उद्विग्न सा एक व्यक्ति कभी बैठता कभी उठ कर टहलने लगता....उसके चेहरे ,हाव-भाव से दुख से ज्यादा परेशानी झलक रही थी.,..शायद प्रेम से ज्यादा कर्तव्य की भावना प्रबल थी. एक कोने में बुर्के में एक महिला...बार-बार बाथरूम जाती और सूजी हुयी लाल-आँखे लिए कोने की तरफ मुहँ करके बैठ जाती...मन होता एक बार उसके कंधे पर हाथ रख...उसका दुख बांटने की कोशिश की जाए...पर फिर उसका कोने में यूँ, मुहँ करके बैठना ही इस बात का संकेत दे जाता  कि वो किसी से बात करने की इच्छुक नहीं है. जरूर  कोई बहुत ही अज़ीज़ होगा...फर्श पर ही दीवार से टेक लगाकर, एक युवक  बैठा था....सफाचट सर....ठुड्डी पर सिर्फ थोड़ी सी दाढ़ी...कानो में छोटी छोटी बालियाँ ....दोनों बाहँ पर बड़े से टैटू...छोटी बाहँ की टी-शर्ट और शॉर्ट्स में किसी फिल्म का विलेन ही लग रहा था. पर चेहरे के भाव उसके इस रूप से बिलकुल मेल नहीं खा रहे थे....माँ बीमार थी...और वो एक छोटा सा घबराया सा बच्चा दिख रहा था....एक स्मार्ट सी लड़की...जींस टॉप पर एक स्टोल डाले एक मोटी सी किताब पढ़ने में तल्लीन थी....उसके सिमट कर सीधे बैठने के तरीके से लग रहा था...उसे ज्यादा चिंता नहीं है....उसका भी कोई अपना...ऑब्जरवेशन के लिए ही होगा...ICU में. तभी उसे मैचिंग स्टोल लेने का भी ध्यान रहा...पर थोड़ी देर में ही स्टोल लेने का कारण पता चल गया....उसने स्टोल खोलकर शॉल की तरह ओढ़ लिया...ए.सी. की ठंढक बढती जा रही थी.
एक दूर किसी शहर से आए सज्जन ऐसे थके हारे से बैठे थे मानो...सबकुछ भाग्य के भरोसे छोड़ दिया है...एक साहब एक कोने में लगातार  फोन पर ऑफिस की समस्याएं सुलझाने में लगे थे...अपनी टाई तक ढीली नहीं की थी...कभी-कभी उनकी आवाज़ तेज़ हो जाती...और बंद शीशे से घिरे उस हॉल में उनकी आवाज़ गूँज जाती तो खुद ही चौंक कर चुप हो जाते. एक तरफ तीन महिलाएं और एक पुरुष पास-पास बैठे थे..चेहरे पर  चिंता की लकीरें...और भीगी आँखे लिए...जैसा कि आए दिन मुंबई के अखबारों में पढ़ने को मिलता है,...पांच दोस्त..(तीन लड़के और दो लडकियाँ) कार लेकर बारिश के मौसम का आनंद  लेने निकल पड़े....और किसकी गलती थी...क्या हुआ...पर कार दुर्घटनाग्रस्त हो गयी....एक बच्चे ने तो वहीँ दम तोड़ दिया...बाकी चार  भी गंभीर रूप से घायल  हो गए...माता-पिता..चिंताग्रस्त सर झुकाए बैठे थे.

गार्ड के पास, एक विदेशी महिला,उसे कुछ समझाने की कोशिश कर रही थी..पर शायद  वो उसकी बता नहीं समझ पा रहा था...जबकि 'लीलावती ' के सारे स्टाफ अंग्रेजी समझ  तो लेते ही थे..कामचलाऊ बोल भी लेते थे...आखिर हताश होकर उसने खीझकर पास ही खड़ी एक लड़की से कहा......".वाई इज ही नॉट लिसनिंग टू मी??" ..उस लड़की ने महिला और गार्ड दोनों के बीच दुभाषिये का काम किया....और उस विदेशी महिला को समझाया कि वो आपका उच्चारण नहीं समझ पा रहा . फिर जैसे ही  उस लड़की ने पूछा..".हाउ इज योर हसबैंड?" वो महिल फूट-फूट कर रो पड़ी...एक अनजान देश...अनजान भाषा...अनजान चेहरे के बीच जिस व्यक्ति के भरोसे आई  थी...वही जीवन और मौत के बीच झूल रहा था..(लेकिन दूसरे दिन जब उस महिला को मुस्कुराते हुए...हाथ में एक पानी की बोतल थामे तेजी से आते देखा...तो लगा...अब उसके पति का स्वास्थ्य जरूर सुधर रहा होगा...)

 माहौल ऐसा ही शांत था...बाहर फैली हल्की मटमैली सी शाम अब गाढे अँधेरे में तब्दील हो रही थी...समुद्र के पानी का रंग  भी किसी काढ़े के रंग सा लगने लगा था...ऐसे में ही पेशेंट को लानेवाली लिफ्ट का दरवाजा खुला...और कुछ लोग भागते हुए एक बेड लेकर आए पर बेड तो खाली नज़र आ रहा था...तभी पास से बेड गुजरा और उस पर एक तीन साल की बच्ची बेसुध पड़ी थी...सबके मुहँ से एक आह निकल गयी...और सबकी दुआओं का रुख उस मासूम  बच्ची की तरफ मुड गया. 
अब तक,वो जरूर अच्छी हो गयी होगी.

इस दरम्यान कुछ अजीबो-गरीब अनुभव भी हुए....अक्सर लोगो से रोजमर्रा की बातें होती है..मौसम..पास-पड़ोस...घर-परिवार की..पर जब कुछ अप्रत्याशित घट जाता है..तो लोगो की सोच अलग सी नज़र आने लगती है. लोगो के फोन आते..."अरे तुम लोगो ने स्थिति संभाल ली...वर्ना अपने बच्चे के लिए कोई कुछ भी कर ले...दूसरे के बच्चे के लिए निर्णय लेना मुश्किल होता है..." अपना या दूसरे का बच्चा!!!....उस वक़्त तो सिर्फ एक बीमार बच्चा सामने दिखता है...और यही कोशिश होती है कि...उसे बेस्ट ट्रीटमेंट दिलवाने की कोशिश में कोई कसर ना रह जाए....कोई सनी का हाल पूछता....और एक पंक्ति के बाद ही शुरू हो जाता..." ये सुनकर तो इतनी घबराहट हुई...मेरे तो हाथ-पाँव कांपने लगे...बुखार चढ़ आया...चक्कर आने लगे" और मैं सनी का हाल बताने की बजाय...उन्हें ही अपना ध्यान रखने की सलाह देने लगती. कोई कहता,'तुम्हारे घर बीमार होकर आया....भगवानका शुक्र है..अच्छा हो गया..." अच्छा है..मैं ज्यादा नहीं सोचती...ये सब कभी दिमाग में आया भी नहीं...और आता भी कैसे..डॉक्टर ने भले ही कह दिया था...तीन-चार घंटे के अंदर किसी तरह बड़े अस्पताल में शिफ्ट कीजिए...cardiac ambulance  की व्यवस्था की  जिसमे एक डॉक्टर मौजूद था, खून और पानी चढाने की व्यवस्था थी... सनी का हिमोग्लोबिन ५% पर आ गया था. पर सनी की चंचलता वैसे ही कायम थी..स्ट्रेचर पर उसे cardiac ambulance  में लाया गया...और उसने एम्बुलेंस  के अंदर से  से चिल्ला कर बोला..."बुआ, मेरी चप्पल वार्ड में ही छूट गयी है...मंगवा  लेना"

दो पंक्तियों में 'लीलावती हॉस्पिटल' के डॉक्टर नर्स का आभार व्यक्त करना भी बहुत आवश्यक  है....वहाँ के डॉक्टर, नर्स को अब स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है...या वे एक दूसरे को देख कर सीखते हैं...पर बहुत ही नम्र...हमेशा होठों पर मुस्कान...बेहद एफिशिएंट और आशावादी......और हर डॉक्टर का व्यवहार  बिलकुल परिवार के एक सदस्य जैसा था...
उनकी कोशिशों से ही सनी इतनी जल्दी घर आ पाया...अब ,उसकी मम्मी भी साथ हैं...सूप...जूस..परहेजी खाना चल रहा है....उसकी तीमारदारी में ही इतने दिनों लगी  हुई थी ..ना कुछ लिखना हुआ...ना किसी के ब्लॉग पर जाना ही हुआ...अब जिंदगी पुरानी रूटीन पर लौट रही है...पर थोड़ी धीमी गति से....

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

हाय!! मेरी आधा किलो भिन्डी :(

जैसा कि मैने पिछली पोस्ट में जिक्र किया था....एक शाम एक फोन आया कि "हम एक न्यूज़ चैनल से बोल  रहे हैं...गैस सिलेंडर की बढ़ी हुई कीमत पर आपकी प्रतिक्रिया चाहिए...कल आपके घर आ  जाएँ, आपके विचार जानने ?"....ऐसे अचानक किसी को भी फोन आए तो उसे उलझन होगी..मुझे भी हुई...और मैने असमर्थता जता दी...कि "मैं तो सिलेंडर इस्तेमाल ही नहीं करती...हमारे यहाँ...गैस की पाईपलाइन है....कैसे अपनी प्रतिक्रिया दूंगी.??"

उधर से स्वर में अतिशय विनम्रता घोल,  फोन करने वाले ने  कहा, " गैस के दाम बढ़ने से, गैस पाइप  लाइन के भी चार्ज बढ़ जाएंगे...उसके बिल पर भी असर पड़ेगा....आप अपने विचार बताइए" एक तो मुंबई में रहकर कान विनम्र स्वर सुनने के आदी  नहीं रहे...समय लगता है प्रकृतस्थ  होने में. एक बार यूँ ही एक फ्रेंड को अल्मोड़ा में फोन किया था और उसकी माता जी ने प्यार से कहा.." वो तो घर पर नहीं है...आपका शुभनाम बेटे " मैं एक  मिनट को कुछ बोल ही नहीं पायी...

यहाँ तो कहेंगे.."आप कौन?" अंग्रेजी में तो लगता है...डांट ही रहे हों.."हूss इज  दिस?"

मैने भी स्वर थोड़ा नम्र किया और पूछा, "आपको मेरा नंबर कहाँ से मिला?" क्यूंकि तब पतिदेव टी.वी. चैनल की नौकरी  छोड़ चुके थे...वैसे भी किसी चैनल में काम करने वालों के परिवार वाले इस तरह, कार्यक्रम में हिस्सा नहीं ले सकते. उसके ये कहने पर मेरे बॉस  ने दिया है..मैने उसके बॉस से बात की...और वे एक दूर के रिश्तेदार निकले. कहने लगे.."एक हफ्ते पहले ही मुंबई ट्रांसफर हुआ है...किसी गृहणी की प्रतिक्रिया लेनी थी...मैं और किसी को जानता नहीं..इसलिए आपका नंबर दे दिया"

 मैने उनसे भी अपनी मजबूरी जताई, " हमारे यहाँ तो गैस की पाईपलाइन है....गैस का सिलेंडर हम नहीं लेते तो कैसे अपनी प्रतिक्रिया दें? "
और उन्होंने भी वही कहा जो उनके असिस्टेंट ने कहा था.

"ठीक है..पर पहले इनसे पूछ लूँ..." (ऐसे समय आदर्श भारतीय  नारी का अवतार धारण करना बड़ा काम आता है )....मुझे पूरी उम्मीद थी कि नवनीत मना कर देंगे क्यूंकि टी.वी.चैनल में उनकी जॉब के दौरान बच्चों  को कई बार सीरियल्स में काम करने के ऑफर मिले थे...पर उनके पिताश्री ने तो सख्ती से मना कर ही दिया था...मुझे भी  मंज़ूर नहीं था . अक्सर देखा है...जिसने भी बचपन में एक बार कैमरे का सामना  किया...उसके जीवन का लक्ष्य फिर 'स्टार' बनना ही रह जाता है. बाल-कलाकार  किन हालातों में काम करते हैं...यह भी बहुत ही करीब से जाना है. एक अवार्ड शो में छोटे बच्चों के नृत्य का कार्यक्रम था और रात के एक बजे 7,8 साल के बच्चे भारी पोशाक और जेवर  से लदे उनींदे से ग्रीन रूम के बाहर पतले से कॉरिडोर में अपनी बारी का इंतज़ार करते फर्श पर बैठे  हुए थे.
एक बार एक रोचक बात हुई...एक सीरियल निर्माता ने लैंडलाइन पर फोन किया..मेरे बेटे ने उठाया ..उन्होंने बेटे से नाम  पूछा...थोड़ी बात की..और कहा.."मेरे सीरियल में काम करोगे?"  उसने मासूमियत से कहा, "पर मैं तो स्कूल जाता हूँ"

हालांकि यहाँ सिचुएशन अलग थी पर मुझे लगा कि नवनीत मना कर देंगे. लेकिन उन्होंने कहा.."इसमें क्या है...आने दो..घर पर"

लेकिन हम तो सिलेंडर खरीदते ही नहीं .." मैने पिटा पिटाया जुमला दुहरा दिया..पर पतिदेव का तर्क अलग था, "इतने ध्यान से कौन देखता है...उसे जरूरत है...आ जाने दो"

उस लड़के ने अपना नंबर दिया था...कि निर्णय ले लूँ तो कॉल बैक करूँ...पर मैने नहीं किया....सोचा..शायद उसे कोई और मिल जाए तो अच्छा....जब सामने पड़ जाए तो ये सब एक झंझट सा ही लगता है (मुझे तो लगा था )

 

पर रात के ग्यारह बजे उसका फोन आया और मैने 'हाँ' कर दी. अब, जब उसने कहा..."सुबह नौ बजे आ जाऊं??" तो मैं बुरी तरह घबरा गयी और  एकदम से ना कर दी...फिर बात को थोड़ा संभाला, "सुबह बहुत काम होता है..आप एक बजे तक आ जाइए. उसने अपनी मजबूरी जताई..." हमें न्यूज़ तैयार कर दिल्ली भेजना  होता है...ग्यारह बजे तक आऊंगा  "

किसी भी महिला को जब किसी के आगमन की खबर मिलती है..तो उसका दिमाग कई मोर्चो पर एकसाथ सक्रिय हो जाता है...कमरा  ठीक करना है..सुबह जल्दी से किचन का काम निबटाना है...कहीं कामवाली आने में देर ना कर दे...और इसके ऊपर , यहाँ क्या  बोलना है...ये भी सोचना था.

 

उसने कहा था...बच्चों से भी  बात करेगा क्यूंकि बजट का असर उनके पॉकेट मनी पर भी तो पड़ेगा (ये उसका तर्क था ) पर बच्चे तो सो चुके थे...छुट्टियाँ चल रही थीं..उन्हें भी सुबह जल्दी उठा कर तैयार होने को कहना पड़ेगा. उसने तो पतिदेव के लिए भी  कहा था,"सर भी रहते तो अच्छा था..." पर इन्होने एकदम से कन्नी काट ली..कि "मुझे जल्दी ऑफिस जाना है "(राम जाने, सच या झूठ )

सुबह तो, मैं जैसे मशीन ही बनी हुई थी...बच्चों को भी बता दिया...और कह दिया..तुमलोग खुद सोच लो..क्या कहना होगा अब मेरे पास टाइम नहीं है...कोई सलाह देने के लिए .
शुक्र था, सारे काम ग्यारह बजे तक ख़त्म हो गए और ठीक ग्यारह बजे, मेरे फ़्लैट की घंटी बजी.

कैमरामैन के साथ एक जाना-पहचान चेहरा था {अब नाम नहीं याद } पहले तो वे लोग कैमरे का एंगल देखते रहे...किधर से लेना है..कैसे लेना है...फिर मुझसे कहा, आप कुछ सब्जी काटते रहिए...उसी दरम्यान आपसे सवाल पूछेंगे. शुक्र था फ्रिज में भिन्डी पड़ी हुई थी,वर्ना लौकी काटना कुछ अजीब लगता ....मैं  थोड़ी सी भिन्डी ले आई...और उसने अपने अंदाज़ में पहले तो कहा..."आज हम रश्मि जी के  घर पर हैं..आइये इनसे जाने कि सिलेंडर के दाम बढ़ जाने से इनके घर के बजट पर क्या असर पड़ेगा ?? आदि....आदि.."....

और मैं शुरू हो गयी..."गैस के दाम  बढ़ने से बहुत कुछ सोचना पड़ेगा...रोज़ स्वीट डिश बनती  थी. अब हफ्ते में एक बार ही बनानी पड़ेगी ...मेहमानों को बुलाने के पहले सौ बार सोचेंगे....पत्ते वाली सब्जी भले ही गुणकारी हो..पर ज्यादा गैस खर्च होती है इसलिए अब नहीं बना सकूंगी..वगैरह...वगैरह..."


पर कैमरामैन ने कहा...ये एंगल ठीक नहीं था...फिर से बोलिए...उसके बाद ये सिलसिला चलता रहा...कभी एंकर ज्यादा झुक जाए...कभी कोई तार फंस जाए...कभी..मेरी भिन्डी फोकस में नहीं आए...और रिटेक होते रहे. इस 4-5 लाइन के लिए 9 रिटेक हुए. और अब समझ में आया कि जब हम सुनते हैं...'किसी फिल्म के फलां सीन के लिए इतने रिटेक हुए तो यही लगता है...कलाकार ने अच्छी एक्टिंग नहीं की...पर कई बार रिटेक के कई अलग-अलग  कारण ही होते हैं.


बस बुरा ये हुआ कि इस चक्कर में मेरी आधा किलो  भिन्डी कट गयी....और भिन्डी  हमेशा धोकर काटी जाती है {कितने पुरुष ब्लोगर्स को ये पता है?
} जबकि मैं तो यूँ ही फ़िज़ में से निकाल कर ले आ रही थी..लिहाज़ा सारी कटी हुई भिन्डी फेंकनी पड़ी
अब बच्चों की बारी थी....बच्चे तो पैदाइशी  अभिनेता होते हैं..मैं तो उनके उत्तर सुनकर हैरान रह गयी. बड़े बेटे ने कहा, " मैं 'बस' से कोचिंग क्लास जाता हूँ...पहले 'बस' आने में देर होती थी तो ऑटो-रिक्शा से आ जाता था. अब तो कितनी भी देर हो, 'बस' का ही इंतज़ार करना पड़ेगा. "

छोटे बेटे ने कहा, "पहले मैं पॉकेट  मनी से पैसे बचाकर शटल कॉक खरीद लेता था...पर अब पॉकेट मनी कम मिलेगी तो शटल कॉक नहीं खरीद पाऊंगा..टूटे हुए शटल कॉक से ही खेलना पड़ेगा "

इनलोगों के भी कई रिटेक हुए..और आखिरकार ढाई  बजे शूटिंग संपन्न हुई.

एक घंटे बाद स्टूडियो से उन रिश्तेदार सुरेश (नाम बदल हुआ है ) का फोन आया..."आपने तो बहुत अच्छा बोला है...अक्सर हाउस वाइव्स बोलने में अटक जाती हैं...हमें एक वाक्य पूरा करने को कॉपी पेस्ट करना पड़ता है".

 मैने कहा, 'शायद मुझे भूल  गए हैं..एक बार बोलना शुरू करूँ..तो फिर बस एडिटिंग का ही चांस बचता है   { इस ब्लॉग के पाठक भी यह बात बखूबी जानते होंगे } किसी ने मेरे लिए लिख भी दिया था..जाने किस खदान से बातें खोद कर लाती है और हम पर उड़ेलती  रहती है   how true 
 

हमेशा की तरह रिश्तेदारों - दोस्तों को  फोन मिला दिया सबने देखा  और फिर उलाहने भी दिए...'ठीक है बाबा...इतना मत सोचो...नहीं आएँगे तुम्हारे घर "
 

{ ये सब बातें..इसलिए लिख दीं...क्यूंकि ये कोई रहस्य नहीं है..सबको अंदाज़ा है कि टी.वी. पर अक्सर ऐसा दिखाते रहते हैं...)

सोमवार, 4 जुलाई 2011

बिजली की तरह कौंध कर विलुप्त हो जाते, वे पल....

आजकल गैस सिलेंडर की कीमत में बढ़ोत्तरी चर्चा का विषय बनी हुई है.  कुछ साल पहले भी सिलेंडर के दाम बढे थे और सबके साथ मैं भी परेशान हो गयी थी...बस ये बात दीगर है कि मेरी परेशानी का सबब कुछ और था. एक शाम  यूँ ही चैनल सर्फ़ कर समय काट रही थी कि एक फोन आया..."हम एक न्यूज़ चैनल से बोल  रहे हैं...गैस सिलेंडर की बढ़ी हुई कीमत पर आपकी प्रतिक्रिया चाहिए...कल आपके घर आ जाएँ, आपका इंटरव्यू लेने?"...मैं तो एकदम से चौंक पड़ी....और यकीन मानिए...यूँ अप्रत्याशित रूप से टी.वी. पर पल भर के लिए ही सही....कुछ बोलने का अवसर ख़ुशी से ज्यादा घबराहट दे जाता है.

जबकि ये पहला मौका नहीं था...कई बार 'पलक झपकाई और गायब' (blink n miss) जैसे अवसर मिलते रहे हैं. कुछ साल पहले पतिदेव Zee t.v. में कमर्शियल वी.पी. के रूप में कार्यरत थे
एक दिन ऑफिस से आए तो मुझे कुछ लिफाफे थमाते हुए कहा, "'गजेन्द्र सिंह' ने 'सारेगामा' प्रोग्राम की रिकार्डिंग  के कुछ पास दिए हैं...आस-पड़ोस में जिसे देना  हो दे देना. "

मैने ऐलान कर दिया....'मैं भी जाउंगी'...पतिदेव  को कुछ आश्चर्य तो हुआ क्यूंकि उन्हें लगता था...'इसमें देखने जैसा क्या है'...साथ काम करनेवालों के लिए सबकुछ बहुत आम होता है.

नियत दिन पर, मैं अपने कुछ रिश्तेदारों सहेलियों के साथ सारेगामा की रिकॉर्डिंग पर गयी. कई बार कैमरे के हद में भी आए हम सब...दूर-दराज़ के नाते-रिश्तेदार टी.वी. पर हमारी झलक देख बड़े  खुश भी हुए. पर मैने तौबा कर ली...क्यूंकि आधे घंटे की रेकॉर्डिंग 3 घंटे में संपन्न हुई...उस तेज रौशनी में चुपचाप एक जगह इतनी देर बैठे रहना एक सजा से कम नहीं लगा. हालांकि कई बातें भी पता चलीं...कि ये स्क्रीन पर  तिरंगा झंडा, फहराता हुआ कैसे दिखता  है. झंडे के नीचे एक पेडस्टल फैन लिटा कर रखा जाता है.

उम्रदराज़  महिलाएँ  'सोनू निगम ' की जबरदस्त प्रशंसक निकलीं . रिकॉर्डिंग शुरू होने में देर होने लगी ..तो वे लोग जोर से आवाजें लगा रही थीं...कि "बस सोनू निगम को बाहर भेज दो...हमलोग एक झलक देख चले जाएंगे..सिर्फ उन्हें देखने ही आए हैं." सोनू निगम ने एक इंटरव्यू में कहा भी था...कि "मेरे पास सबसे ज्यादा पत्र आंटियों के आते हैं...सब मुझे अपना दामाद बनाना चाहती हैं"

इसके बाद कुछ स्पेशल प्रोग्राम और zee awards...वगैरह देखने ही जाया करती थी. कई बार हम देखते हैं, दो एंकर में से कोई एक ही बोलता जाता है..देखनेवालों को लगता है...दूसरे को बोलने का अवसर ही नहीं मिल रहा जबकि असलियत कुछ और होती है. एक प्रोग्राम में ,पल्लवी जोशी के साथ एक मेल एंकर था...वो बार बार अपनी पंक्तियाँ  भूल जा रहा था...और मजबूरी में शो को संभालने के लिए पल्लवी जोशी को उसकी पंक्तियाँ  भी बोलनी पड़ रही थीं. दोनों के मेकअप मैन और हेयर ड्रेसर स्टेज के किनारे ही खड़े थे...एक डायलॉग  ख़त्म होता...और वे दौड़ कर उनके बालों पर ब्रश  और चेहरे पर पाउडर  की परत फेर जाते.

पर किसी भी 'लाइव शो' से 'अवार्ड शो' के रिहर्सल देखना ज्यादा अच्छा लगता. सिर्फ Zee t.v. में काम करनेवालों के परिवार ही होते दर्शकों  में. स्टार्स भी बिना किसी मेकअप के होते और रिहर्सल के बाद बिना किसी नाज़ ,नखरे के हमारे बीच आ कर बैठ जाते. एक शो के पीछे कितनी मेहनत लगती है...वो प्रत्यक्ष देखे बिना नहीं जाना जा सकता. पूरी रात रिहर्सल चलती थी. ज्यादातर उस टीम में लडकियाँ ही होतीं .मैं  तो हैरान रह जाती ,"ये लोग घर कब जाएँगी?" परदे के पीछे से काम करनेवाले अपनी भूख-प्यास-नींद त्याग हफ़्तों से लगे होते. और ये कलाकार भी एयरपोर्ट से सीधा रिहर्सल के लिए आते..कोई रात के दो बजे...कोई सुबह चार बजे.
पर पैसे भी तो लाखो में लेते हैं ये लोग. एक बार एक मजेदार बात हुई.. धुलने में डालने से पहले पतिदेव के पैंट के पॉकेट चेक कर रही थी...उसमे से एक पुर्जा निकला,जिसपर लिखा था...शाहरुख- 80....सलमान-70....माधुरी- 75....करिश्मा -50..अक्षय-50... गोविंदा -- 20  ...पहले तो समझ में नहीं आया..फिर पता चला...ये सब उस अवार्ड शो में भाग लेने की उनकी फीस है, जो लाखो में है.  गोविंदा की फीस सबसे कम थी..जबकि सबसे ज्यादा entertaining गोविंदा ही होते  थे.

एक बार एक म्युज़िक अवार्ड में गयी थी. शो शुरू होने में कुछ वक्त था...कई गायक-गीतकार आ चुके थे...अलका याग्निक...उदित नारायण...जावेद अख्तर और शबाना  आज़मी  ठीक मुझसे अगली पंक्ति में बैठे थे...कई लोग जाकर उनसे बातें कर रहे थे..अपनी मोबाइल से तस्वीरें ले रहे थे...पर मैं संकोच के मारे अपनी जगह से उठी ही नहीं..दरअसल  पतिदेव के डिपार्टमेंट के लोग आस-पास ही चक्कर लगा रहे थे..शायद यह देखने को..."जिस बॉस से वे लोग इतना डरते हैं....वे बॉस किस से डरते हैं {ये बस एक डायलॉग था ...मुझसे कोई नहीं डरता.. }

एक और रोचक बात हुई...कैमरामैन ने शायद मुझे भी कोई सेलिब्रिटी समझ लिया...और कई बार उस प्रोग्राम के दौरान मेरा क्लोज़अप  लिया. बड़ी सी स्क्रीन पर जब ना तब मेरा चेहरा भी दिख जाता.
मुझे पूरा विश्वास था कि जब एडिटिंग के वक़्त पता चलेगा....कि ये कोई सेलिब्रिटी नहीं हैं..तो  जरूर कैंची चल जाएगी. इसीलिए किसी को भी नहीं बताया....पर प्रोग्राम,टेलीकास्ट होने वाली शाम खुद टी.वी. ऑन करके बैठी थी...और हमें एक पार्टी में जाना था. पतिदेव शोर कर रहे थे..."देर हो  रही है"...और मैं  जानबूझकर कभी बिंदी ढूँढने का अभिनय करती तो कभी मैचिंग कड़े......और पाया  कि नहीं...मेरी तस्वीर  एडिट नहीं की थी.


एक बार  हमलोग हरिद्वार-मसूरी-शिमला की ट्रिप पर गए थे. रुड़की से मैने अपनी मौसी की लड़कियों को भी साथ ले लिया था. शाम को हमलोग मसूरी पहुंचे थे और सडकों पर यूँ ही  घूम रहे थे कि पीछे से एक आवाज़ आई "एक्सक्यूज़ मी" देखा तो आधुनिक परिधान में लिपि-पुती एक लड़की  थीं...मेरे मुड़ते ही एक माइक मेरे सामने कर दिया..."आपसे कुछ सवाल पूछने हैं..." और मेरे कुछ कहने के पहले ही..सवालों की झड़ी लगा दी..."अनु मल्लिक से सम्बन्धित 5 सवाल थे. अब सिर्फ अंतिम सवाल ही याद है..." फिल्मफेयर अवार्ड किस फिल्म के लिए मिला था?'"...मैने कहा "बौर्डर " और उसने माइक नीचे कर पास खड़े कुछ लड़कों से कहा," We have  a  winner here " 
पता नहीं कैसे ,मेरे पांचो  जबाब सही थे.

वो लड़के प्रोडक्शन टीम के थे पर किसी कॉलेज के लड़के जैसे ही लग रहे थे.  उसी झुण्ड में से किसी ने एक बैग से एक ताज निकाला और एक सैश जिसपर लिखा था..."BPL  उस्ताद  " और मुझे पहना दिया . और 15,00 रुपये का चेक भी पकड़ा दिया. अब फिर से माइक सामने था...और मुझसे मेरा  परिचय पूछा गया. फिर उसने अन्नू मल्लिक  की फिल्म का एक गाना गाने के लिए कहा. गाने से रिश्ता बस अन्त्याक्षरी तक ही सीमित है...पारिवारिक महफ़िल में भी नहीं गाती...और टी.वी. पर...नामुमकिन...बहने बढ़ावा दे रही थीं..."अरे दो लाइन गुनगुना दो ना..." पर मेरी ना तो ना...आखिर उस एंकर ने ही सुझाया आप सब मिल कर गा दीजिये...और हमने कोरस में गाया.. "संदेशे आते हैं...." शिल्पी ने सामने  जाकर एक फोटो भो ले लिया.                              
:)              

सारा कुछ दस मिनट के अंदर घट गया....अब मुझे ध्यान आया....कार से देहरादून से यहाँ तक आने में तो बाल बिलकुल बिखर गए हैं..चेहरे पर धूल की परत चढ़ी हुई है.......जींस और खादी के कुरते में  पता नहीं कैसी दिख रही हूँ ...पर शायद खादी के कुरते ने ही उस एंकर को मेरी तरफ आकर्षित किया था .

पतिदेव बच्चों के साथ कुछ आगे चल रहे थे...उनलोगों को  कुछ पता भी नहीं चला. हम सब तेज़ कदमो से उन्हें बताने को भागे...जब उन्होंने  पूछा, "टेलीकास्ट कब होगा..?" तब ख्याल आया हमने तो ये पूछा ही नहीं...फिर वापस भागे...संयोग से वे लोग मिल गए और बताया बस दो दिनों बाद.

अब शाम को मसूरी की उस  घूमती हुई रेस्टोरेंट में बैठकर सारे रिश्तेदारों - सहेलियों को कॉल करने का सिलसिला शुरू हुआ { आप सबसे परिचय नहीं था...नहीं तो  कुछ ब्लॉगर्स  को भी फोन लगाया होता } ससुराल वालों को फोन करने में एक हिचक सी भी थी...उनलोगों ने जींस में मुझे कभी देखा  नहीं था.... . सोचा...बातें बनेंगी...... पर बताना भी था. . प्रोग्राम तो आया ही शकल भी..बहुत ज्यादा बुरी नहीं लग रही थी..... ...बस ये हुआ कि उस प्रोग्राम वालों के पैसे बच गए...क्यूंकि चेक मैं किसी किताब में रखकर भूल गयी.

आईला !!!..मैने शुरुआत कुछ और लिखने  को किया था...और कुछ  और ही लिख गयी...कोई नहीं वो अगली पोस्ट में  

बुधवार, 29 जून 2011

पुत्र के विरुद्ध ,पुत्रवधू के पक्ष में पिता की गवाही

पहले भी अखबारों की कुछ  ख़बरें...शेयर करती आई हूँ...आज ही Mumbai   Mirror में कुछ ऐसा पढ़ा कि लगा...ऐसी ख़बरें लोगो के सामने आनी चाहिए .

इसका एक पक्ष तो दुखद सा कटु सत्य  है. अंग्रेजों के इतने साल की गुलामी की वजह से गोरे रंग के प्रति हमारी रुझान आज भी  बनी हुई है. ढेर सारे विज्ञापन भी यही कहते हैं.Fair is Lovely .सामने से जो भी कहें लोग, पर मन ही मन हर कोई एक अदद गोरी बीवी और गोरे बच्चों की कामना रखता ही है. (यहाँ महिलाओं के विषय में जरूर कहूँगी...कि वे लोग  TDH (tall,dark and handsome )पर ही रीझती रहीं हैं और उन्हें पति के सांवले सलोने होने से  कोई शिकायत नहीं होती है }

इस गोरे रंग के प्रति आकर्षण ने एक महिला का जीवन नरक कर डाला. मई 2005 में मुंबई निवासी सत्ताईस वर्षीय लक्ष्मण शिंडे का विवाह हुआ. शादी के तुरंत बाद ही शिंडे अपनी पत्नी को उसके गहरे रंग की वजह से सताने लगा. उसका लोगो के सामने उपहास उड़ाता. कई बार घर से भी निकालने की कोशिश की. पर वो महिला दूसरी लाखों भारतीय महिलाओं की तरह सारी प्रताड़ना चुपचाप सहती रही. परन्तु पत्नी के काले रंग ने शिंडे को उस से शारीरिक सम्बन्ध बनाने से नहीं रोका. लेकिन अगर पत्नी गर्भवती हो जाती तो वह उसे दवा देकर...उसका गर्भपात करवा देता क्यूंकि उसे डर  था, उसके बच्चे भी काले रंग के होंगे और ये उसे बर्दाश्त नहीं था.  बार-बार गर्भपात से उस महिला का स्वास्थ्य गिरने लगा.

उसके बिगड़ते स्वास्थ्य का कारण उसके ससुर को पता चला. उन्होंने इसका विरोध किया और बेटे को समझाना चाहा....बेटे ने उन्हें धमकी दी...पर उन्हें लगा, ऐसे तो उनकी पुत्रवधू जीवित नहीं बचेगी और उन्होंने उसे अपने मायके भेज दिया. करीब एक साल तक वो मायके में रही..उसके पति ने उसकी कोई खोज-खबर नहीं ली. फिर दोनों परिवारों के बुजुर्ग लोगो के समझाने पर अच्छे व्यवहार का वायदा कर,शिंडे अपनी पत्नी को अपने घर लिवा गया. कुछ दिनों तक सब ठीक रहा. पर फिर जल्द ही उसके रंग को लेकर प्रताड़ना शुरू हो गयी. और जब वो फिर से गर्भवती  हुई तो उसपर गर्भपात के लिए दबाव डालने लगा.

उक्त  महिला अपने मायके आ गयी. २००७ में उसने एक बच्ची को जन्म दिया. सबको लगा,बच्ची के जन्म के बाद,शायद वह बदल जाएगा...पर उनकी आशाएं निर्मूल साबित हुईं. शिंडे ने पत्नी और बच्ची से कोई सम्बन्ध नहीं रखा. फिर भी उक्त महिला और उसके परिवार वाले सोचते रहे कि कुछ दिनों बाद शायद उसे अक्ल आ जाए और वो अपनी पत्नी को स्वीकार कर ले.

पर कुछ ही दिनों पहले शिंडे ने दूसरी शादी कर ली. अब महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी है. इन सबमे एक सुखद बात ( जिसने इस पोस्ट को लिखने को प्रेरित किया) ये है कि.उक्त महिला के ससुर ने अपने परिवार वालों की इच्छा के विरुद्ध जाकर  अपने बेटे के विरुद्ध गवाही दी है. पुलिस से कहा है कि..."बेटे ने अपनी पत्नी को बहुत प्रताड़ित किया है और उसे सजा मिलनी चाहिए."

फिलहाल...लक्षम शिंडे फरार है और उसपर 'अपनी पत्नी को प्रताड़ित करने के'...'ब्रीच ऑफ ट्रस्ट के'...'दूसरी शादी करने  के '...'बिना पत्नी  की सहमति के जबरदस्ती गर्भपात करवाने के'  आरोप लगाए गए हैं. पुलिस ने उसे जल्द  ही पकड़ लेने का दावा किया है.

लक्षमण शिंडे पता नहीं कब पकड़ा जाएगा....उसके केस की सुनवाई कितने सालों के बाद होगी...कहा नहीं जा सकता. पर एक ससुर ने आगे बढ़कर अपने बेटे के खिलाफ गवाही दी है. यह एक स्वागतयोग्य दृष्टांत है.

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...