ब्लॉग ,गुजरे लम्हों को याद करने का एक बहाना सा बन गया है...सारे संस्मरण गुजरी यादों के सागर ही तो हैं....जिनमे डूबना-उतराना मुझे कुछ ज्यादा ही भाता है.
मेरी प्रारम्भिक शिक्षा 'रांची' में हुई. 'चिल्ड्रेन्स एकेडमी' में एडमिशन हुआ था...उन दिनों 'जूनियर के.जी.', 'सीनियर के.जी'. नहीं..'के.जी वन', 'के जी टू' होते थे...इसलिए याद है क्यूंकि अपनी मौसी -मामा को ऊँची कक्षाओं में और कॉलेज में देख मैं बड़ी निराश होकर कहती.."हम तो अभी के जी.टुइए में हैं..." और इस बात को कई बार दुहराया जाता.
जब फिल्मो से जुड़े संसमरण लिख रही थी...उसी समय सोच लिया था...इसी तर्ज़ पर ..अपने दोस्तों...विद्यालयों और किताबों से जुड़े संस्मरण भी लिखूंगी...और 'फ्रेंडशिप डे' से उपयुक्त और कौन सा अवसर हो सकता है...दोस्तों पर लिखने का...
वैसे , इस तरह की पोस्ट लिखने की प्रेरणा 'अभिषेक 'के ब्लॉग से मिली...उसने जितनी अच्छी तरह अपने दोस्तों के बारे में लिखा है...मुझे संदेह है कि मैं उतना अच्छा लिख पाउंगी..पर कोशिश से क्यूँ बाज़ आऊं :)
मेरी प्रारम्भिक शिक्षा 'रांची' में हुई. 'चिल्ड्रेन्स एकेडमी' में एडमिशन हुआ था...उन दिनों 'जूनियर के.जी.', 'सीनियर के.जी'. नहीं..'के.जी वन', 'के जी टू' होते थे...इसलिए याद है क्यूंकि अपनी मौसी -मामा को ऊँची कक्षाओं में और कॉलेज में देख मैं बड़ी निराश होकर कहती.."हम तो अभी के जी.टुइए में हैं..." और इस बात को कई बार दुहराया जाता.
तब शायद मैं 'के जी टुइए' में थी..तभी एक दोस्त बनी.."मसूदा' सिर्फ नाम ही याद है...चेहरा बिलकुल भी नहीं याद. :( एक बार मैं बुखार के कारण स्कूल नहीं गयी थी...और मसूदा ने चार लाइन वाली नोटबुक से पेज निकाल दो पंक्ति की एक चिट्ठी लिखी थी..."डियर रश्मि...हाउ आर यू ..मसूदा " इतने में ही पेज भर गया था. :) और अपने चपरासी के हाथों वो चिट्ठी भेजी...पूरे घर भर में वो चिट्ठी हाथो- हाथ घूमती रही..नाना-मामा-मौसी सब हंस-हंस कर पढ़ते रहे...और सबसे चर्चा करते रहे. और मुझे उनकी ये हरकत बहुत ही अजीब लगी थी( नागवार भी गुजरी थी) ...कि मेरे नाम की चिट्ठी की इतनी चर्चा क्यूँ हो रही है...जबकि मेरी मौसी अपने पास में रहने वाली सहेली को रोज ही कुछ ना कुछ लिखकर मेरे हाथो भेजती थी..'ये किताब भेज दो..तो वो नोट्स भेज दो..'तब तो उनकी चिट्ठी कोई नहीं पढता...तब नहीं पता था कि ..तीन-चार साल के बच्चों का यूँ आपस में लेटर भेजना बड़ा अटपटा लगा होगा.
मसूदा के पिता का ट्रांसफर हो गया और वो स्कूल छोड़ चली गयी....इसके बाद एक फ्रेंड याद है, 'विनीता' . उस से ज्यादा उसके 'सेंटेड रबर' याद हैं...उसके इरेज़र के किनारे हरे रंग के और सुगन्धित होते थे...और उसकी नज़र बचा मैं उसे सूंघ लिया करती थी...शायद घर पर कभी फरमाईश नहीं की होगी..वर्ना ननिहाल में पूरी कर ही दी जाती..पर नानी ने इतनी उपदेशात्मक कहानियाँ सुना-सुना कर जैसे ब्रेन वाश ही कर दिया था कि...किसी की नक़ल..बराबरी नहीं करनी चाहिए...ये ..वो..पता नहीं..क्या क्या जिंदगी में नहीं करना चाहिए (हाय!! आज के बच्चे.. ना तो नानियों को सीरियल देखने से फुरसत है कि वे कहानियाँ सुनाएँ....ना ही बच्चों को अपने होमवर्क और कार्टून नेटवर्क से कि वे कहानियाँ सुनें )
एक बार मेरी मौसी ने मुझे एक सुन्दर सी गुड़िया बना कर दी थी...जरी की साड़ी में लम्बे बालों वाली गहनों से सजी गुड़िया. मैं उसे अपने छोटे से स्टील के बक्से में छुपा, स्कूल ले गयी थी... विनीता को दिखाने.(जब अपने बच्चों के टिफिन बॉक्स उनके स्कूल बैग में डालते उनके खिलौने...दिख जाते थे तो अपने दिन याद आ जाते थे , ये सिलसिला शायद पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है ) विनीता भी अपने बक्से में एक हरे रंग का पत्थर लाई थी मुझे दिखाने के लिए...जो उसके पिताजी कहीं टूर पर गए थे तो लेकर आए थे. मैने उस पत्थर के बदले में वो गुड़िया विनीता को दे दी. बचपन में मैं कोई टॉम बॉय नहीं थी..पर गुड़ियों से भी कभी नहीं खेलती..इसीलिए शायद गुड़िया से मोह नहीं रहा हो...पर मेरी मौसी आज तक सुनाती है कि इतने प्यार से और इतनी मेहनत से उसने गुड़िया बनाई थी...और मैने पत्थर के एक टुकड़े के बदले में किसी को दे दिया.:) विनीता काफी दिनों तक हमारे घर में याद की जाती रही ...अपने पुकार के नाम ' बुन्नु' के कारण. मेरी एक मौसी को वो नाम इतना पसंद था कि कई साल बाद अपनी बेटी का नाम उन्होंने 'बुन्नु' रखा...
मेरा छोटा भाई भी जब स्कूल जाने की उम्र का हुआ तो मैं पापा की पोस्टिंग वाले शहर में आ गयी...और एक ही स्कूल में हम दोनों का नाम लिखवाया गया...वहाँ एक ही साल पढ़ी...कुछ दोस्त भी बने...माधुरी..अशोक..हरेकृष्ण.. कंचन..पर कुछ ख़ास यादगार नहीं घटा...इतना ध्यान है कि पता नहीं क्यूँ और किस विषय पर ...मैने एक कार्टून बनाया था और उस पर लिख दिया कंचन...क्लास में सब तो बहुत हँसे थे..पर कंचन बेहद नाराज़ हो गयी थी...और मुझसे बात करना बंद कर दिया था...और वो दिन और आज का दिन...फिर कभी कोई कार्टून नहीं बनाया...कंचन को कभी ये पता भी नहीं चल पाया होगा कि मेरे अंदर के उभरते कार्टूनिस्ट को हमेशा के लिए ख़त्म करने में उसका हाथ है { अब कहने में क्या जाता है...:) }
एक साल के बाद ही पापा का उस शहर से तो ट्रांसफर हो गया पर कहीं पोस्टिंग नहीं हुई थी...(ये बात प्राइवेट नौकरी वाले समझ ही नहीं पाते कि सरकारी नौकरियों में ऐसा होता है) हमारा साल ना खराब हो इसलिए हमें गाँव भेज दिया गया. और अंग्रेजी स्कूल के थर्ड स्टैण्डर्ड के बाद मेरा नाम सीधा छठी कक्षा में लिखवा दिया गया. ये कहा जाता था कि अंग्रेजी मीडियम का स्टैण्डर्ड ऊँचा होता है. मेरे क्लास में सिर्फ चार लडकियाँ थीं और मेरी उम्र से बहुत बड़ी...वे तभी से अपने दहेज़ की तैयारियों में जुटी हुई होतीं. गाँव में लडकियाँ थोड़ी बड़ी हुई नहीं कि उन्हें क्रोशिया और सूई धागा थमा दिया जाता था...अपने भावी घर को सजाने संवारने के लिए वे टेबल क्लॉथ...तकिया के खोल..चादरें... फोटो फ्रेम बनने में जुट जातीं.. जिनमे हनुमान जी...बत्तख..खरगोश वगैरह काढ़े जाते ...दसवीं पास करते ही या स्कूली पढ़ाई के दौरान ही उनकी शादी कर दी जाती....और तब तक बक्सा भर कर उनके हाथ की कारीगरी के नमूने तैयार हो जाते.
मेरा मन उन दिनों सिर्फ खेलने -कूदने में ही रहता था....लिहाज़ा...तीसरी-चौथी में पढ़ने वाली बेबी-डेज़ी..अनीता..सुनीता..मी रा..राजकुमार...दीपक..भोला..वगै रह ही मेरे दोस्त होते.. स्कूल से आते ही फ्रॉक के घेरे में थोड़ा भूंजा डाल कर फांकते हुए लडकियाँ मेरे घर धमक जातीं. लड़के पैंट के पॉकेट में भूंजा डाले होते. अब शहर से आने के कारण इस तरह फ्रॉक में भूंजा खाना मुझे नहीं रुचता...और उन्हें ये बात अजीब सी लगती. मुझे तैयार होने में थोड़ी देर लगती पर वे लोग इंतज़ार करते...फिर तो अँधेरा होने तक..हमलोग कबड्डी, बुढ़िया कबड्डी... इक्खट दुक्खट..कित-कित खेला करते....कभी कभी गुल्ली डंडा भी....आस-पास के सारे बच्चे हमारे घर के सामने इकट्ठे होते..और बेतरह शोर मचाते....दादा-दादी कुछ नहीं कहते...लेकिन हमारे यहाँ काम करनेवाली काकी...जरूर कहतीं..'लग गईल ..मैना झोंझ"
बेबी,डेज़ी...मैं और मेरा भाई 'नीरज' साथ में स्कूल जाया करते थे. एक बार घनघोर बारिश हो रही थी...हमारे पास रेनकोट थे..पर मुझे पहनने में इतनी शर्म आ रही थी...क्यूंकि बेबी,डेज़ी के पास नहीं थे...वे दोनों केले के बड़े बड़े पत्तों से खुद को ढक कर बारिश से बचने की नाकाम कोशिश करतीं...और मैं सर झुकाए बारिश के पानी से तो बच जाती पर शर्म से पानी पानी होती आगे बढ़ जाती. आज भी...गाँव की उस पगडण्डी पर फ्रॉक में केले के पत्ते ओढ़े वो छोटी सी लड़की आँखों के आगे साकार है. स्कूल में ना के बराबर उपस्थिति होती...और एक क्लासरूम बंद कर के दोनों बहने और कुछ और भीगी हुई लडकियाँ...सिर्फ समीज पहने...खिड़की के पल्ले पर अपने फ्रॉक सूखने को डाल देतीं...और हम उसी क्लास में इक्खट दुक्खट खेलना शुरू कर देते.
एक बार कुछ दोस्तों की आपस में लड़ाई हो गयी. और मैने पता नहीं किस दोस्त का साथ देने के लिए अपने सर की...झूठी कसम खा ली...सबने मेरा विश्वास कर लिया...सुलह हो गयी....लेकिन मैं अंदर से बुरी तरह डर गयी....कि अब मैने झूठी कसम खाई है...अब तो मर ही जाउंगी...और मैं दालान में जाकर चुपके -चुपके रोती..कि मेरे परिवार वाले... मेरे दोस्त..सब मुझे याद करके कितना रोयेंगे..( तब 'मिस'करने जैसे शब्द पता नहीं थे...भाव पर वही थे) पर मरने से डर नहीं लगता क्यूंकि उस समय मेरे लिए मृत्यु का अर्थ था...'आँखे बंद कर सो जाना और मर जाना ' ....रोज रात में यही सोच कर सोती....कि सुबह तक तो मैं मर जाने वाली हूँ..पर पूरे एक हफ्ते तक...सुबह आँखें खुलने पर खिड़की से प्रसाद काका को बाहर झाड़ू लगाते....गाय -बैलों को दाना-पानी देते ....दादा जी को दातुन करते हुए आस-पास वालों से बातें करते देखती तो राहत मिलती कि अब तक झूठी कसम ने असर नहीं किया है....और तब से ही ये कसम-वसम मानना छोड़ दिया :)
(वे मेरे सारे दोस्त जहाँ भी हों उनके स्वस्थ-सुखी जीवन के लिए हज़ारों दुआएं...आप सब मित्रों को भी 'फ्रेंडशिप डे' की हार्दिक शुभकामनाएं.)









