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गुरुवार, 23 सितंबर 2010

बहू और बेटी के बीच का घटता -बढ़ता फासला.

मेरी पिछली पोस्ट सबने बड़े ध्यान से पढ़ी. और काफी मनन करके अपने विचार रखे.सबका शुक्रिया. टिप्पणियों में भी देखा और आपसी चर्चा में भी कई बार लोग कह देते हैं , 'बहू कभी बेटी नहीं बन सकती.' जैसे इस अवधारणा ने गहरी जड़ें जमा रखी हों ,मनो-मस्तिष्क पर. उनलोगों ने अपने आस-पास जरूर ऐसे उदाहरण देखे होंगे जिस से,उनके  ऐसे विचार बने.

परन्तु मैने उन कटु  प्रसंगों के साथ अपने आस-पास कुछ ऐसे उदाहरण भी देखे हैं, जिन्हें अगर ना शेयर करूँ तो मेरा कॉन्शस ही मुझसे सौ सवाल करेगा.

मेरी एक रिश्तेदार, लन्दन से  अपने बेटे बहू के साथ एक महीने के लिए छुट्टियाँ बिताने ,भारत आयीं  थीं. आने के एक हफ्ते बाद ही वे कहीं गिर गयीं और उनके पैर में चोट आ गयी. स्थानीय  डॉक्टर से इलाज कराया और बिना ज्यादा ध्यान दिए,पेन किलर के सहारे रांची,पटना, कलकत्ता, बैंगलोर, घूमती रहीं. लन्दन जाने से पहले उनके बेटे ने सोचा एक बार मुंबई में चेक-अप करवा लूँ. यहाँ के डॉक्टर ने बोला तुरंत ही सर्जरी करनी पड़ेगी, अंदर  नस फट गयी है और जख्म हड्डी तक पहुँच गया तो गैंग्रीन  हो जायेगा और पैर ही काटना पड़ेगा. दो दिन बाद ही  बॉम्बे हॉस्पिटल में सर्जरी हुई .पर बेटे की छुट्टी नहीं थी.वो लन्दन में ताज होटल में सेकेण्ड इन कमांड है. कुछ बड़े डेलिगेट्स रुकने वाले थे.उसे तुरंत जाना पड़ा. दोनों बेटियों के स्कूल खुल गए,उन्हें भी जाना पड़ा. आज पंद्रह दिन हो गए हैं, सर्जरी के हफ्ते भर  बाद स्किन ग्राफ्टिंग की गयी और अभी भी डॉक्टर कुछ नहीं बता रहें,कब डिस्चार्ज करेंगे? बहू अकेले यहाँ सास की  सेवा में जुटी है. दोनों बेटियाँ वहाँ रेडी टु  इट ,ब्रेड,मैगी के सहारे गुजारा कर रही हैं. होटल की नौकरी ऐसी है कि जब वे मुंबई ताज में थे ,सुबह चार बजे घर आया करते थे.लन्दन में भी सुबह के गए देर रात घर आते हैं.

इकलौता  बेटा है,ना कोई बहन ना भाई. लन्दन जाकर भी कोई रिश्तेदार बच्चों का ख्याल नहीं रख सकता ,ना वहाँ काम करने वाली बाई की सुविधा है. यहाँ भी, हॉस्पिटल हमारे घर से काफी दूर है. और सहायता ऑफर करने पर भी उनलोगों ने विनम्रता  से मना कर दिया. बेटियाँ अकेले स्कूल जाती हैं,सूने घर में लौटती हैं.खुद अपना ख्याल रख रही हैं.यहाँ' ताज'  ने एक कमरा दिया है जहाँ,बहू सिर्फ फ्रेश होने और कपड़े लौंड्री में देने के लिए जाती है. रात में भी वहीँ पतले से अटेंडेंट के लिए रखे बेन्चनुमा कॉट पर सोती है, सास के जोर देने पर भी ताज में नहीं जाती. जबकि उनके पैर पर बस प्लास्टर है..बाकी सब नॉर्मल है. बेड के पास कॉल बटन है...जब चाहे नर्स को बुला सकती हैं.

अब कोई भी बेटी इस से बढ़ कर क्या करती? जबकि बहू का प्रदेश और भाषा  दोनों अलग है और सास को ये मलाल भी था कि बेटे ने अपनी जाति में शादी नहीं की. उनकी  नौ वर्षीया  पोती कहती हैं ,"मम्मा, प्लीज़ डोंट माइंड पर मैं दादी को आपसे थोड़ा ज्यादा प्यार करती हूँ " दादी भी कह रही थीं, सामने खाना आता है तो आँखों में आँसू आ जाते हैं कि वहाँ बच्चे ब्रेड पर गुजारा कर रहें हैं. अब बहू ने बच्चों और दादी को पास आने दिया तभी तो ये स्नेह पनप सका.

मेरी ही बिल्डिंग में रहने वाली  एक सहेली है. तीन बेडरूम का फ़्लैट लिया कि ससुर साथ रह सकें. ससुर जी को ड्रिंक की आदत थी. बेटे का ट्रांसफर दूसरी जगह हो गया तो बहू की रोक-टोक अच्छी नहीं लगी और पास के ही अपने फ़्लैट में रहने चले गए. खूब बदपरहेज़ी की और तबियत खराब रहने लगी. रात के तीन बजे फोन करते और ये गाड़ी लेकर अकेली उन्हें देखने जाती. एक बार पुलिस ने भी रोक लिया था. मेरे कहने पर कि 'कम से कम हमें साथ जाने को बुला  लिया करो,' कहने लगी, ये तो रोज का किस्सा है,अक्सर  दस बजे बारह बजे फोन कर देते हैं, कि" तबियत ठीक नहीं " ससुर को अकेले भी रहना था और अटेंशन भी चाहिए थी. दो साल  तक ये सिलसिला चलता  रहा. बाद में तीन महीने हॉस्पिटल में रहने के बाद  उन्होंने  अंतिम साँसे  लीं. पूरे समय बहू ने अकेले उनकी देखभाल की. बेटा बस एकाध दिन की छुट्टी लेकर आ पता. यहाँ तो इसी  कॉलोनी में उनकी बेटी भी रहती है पर उसने सारी जिम्मेवारी भाभी पर छोड़ रखी थी. बहू ने तो बेटी से भी बढ़कर अपना कर्तव्य निभाया.

एक और सहेली है उसकी सास पहले उसके साथ ही रहती थीं.. ननद को बेटी हुई तो उसकी देखभाल करने अपनी बेटी के पास चली गयीं. ननद नौकरी करती है. ननद की बेटी स्कूल जाने लगी है पर ननद ने  उसकी सारी जिम्मेवारी माँ पर छोड़ रखी है और बेटी के जन्म के पहले जैसी ही लापरवाह रहती है. माँ उसे अपनी बहू का उदाहरण देती है. और बहू से बेटी की शिकायत भी करती है. ननद-भाभी भी अच्छी दोस्त हैं.ननद भी कहती है, 'माँ मेरी माँ कम सास ज्यादा है'. ननद का पति भी कुछ नहीं कहता ,यह सोच कि यह माँ बेटी  के बीच का मामला है. यही अगर  बेटा होता तो अपनी पत्नी को सौ घुडकियां दे चुका होता कि "मेरी माँ क्यूँ  रखे,बच्ची का.ख्याल ?" यहाँ भी माँ को बेटी से ज्यादा बहू पर भरोसा है.

माँ-बेटी में मजबूत इमोशनल बौंड होता है.पर अगर रिश्तों को प्यार और समझदारी से निभाया जाए तो बहू के बेटी की जगह लेते  देर नहीं लगती. और मुझे लगता है इसमें ज्यादा समझदारी, सास से ही अपेक्षित है क्यूंकि बहू एक तो कम उम्र की होती है, अपना घर छोड़ ,नए परिवेश में आती है. अगर उसे अपनापन मिले तो उसे उस परिवार में शक्कर की तरह घुलने में देर नहीं लगती. पिछली पोस्ट पर शुभम जैन की टिप्पणी पढ़कर इतना अच्छा लगा, "अगर मम्मी नहीं होतीं तो पति के साथ रहना मुश्किल हो जाता" :)

फिर भी ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं,ज्यादा घरं में मन-मुटाव ही देखने को मिलता है. अब इसकी वजह पति और बेटे की अटेंशन पाने की खींचतान होती है या फिर किचन पर  वर्चस्व का मुद्दा. हर घर का  अलग किस्सा होता है.कई बार तो सास-ससुर की उपेक्षा करती बहू को देख,एक ख्याल आता भी है क्या इनलोगों ने भी उसकी शादी  की शुरूआती दिनों में उसे सताया था. क्यूंकि हर महिला इतनी उदारमना नहीं होती कि सबकुछ भुला दे. वही है कि कांच से रिश्ते हैं, बहुत समभाल  कर निभाने होते हैं, जरा सी तेज धूप में भी चटख जाते हैं

मंगलवार, 4 मई 2010

प्यारी सी मुलाकात 'शिखा वार्ष्णेय' के साथ


यूँ तो शिखा से मिले एक महिना बीत गया. पर मैं इंतज़ार कर रही थी कि वो वापस लन्दन आकर ब्लॉग की दुनिया में लौटे तभी यह संस्मरण पेश करूँ. अभी लिखने बैठी तो लगा अरे..सब कुछ तो वैसा ही ताज़ा सहेजा हुआ है, मस्तिष्क में ,जैसे कल मिले हो
.

                  शिखा की प्यारी सी बिटिया सौम्या और दुलारा सा बेटा वेदान्त

शिखा को पहले उसके दिए, अपनत्व भरे कमेन्ट से जाना...फिर कब कैसे हमारी दोस्ती की बेल बढती गयी और हमने ब्लॉग से ज्यादा समय चैट  पर बिताना शुरू कर दिया पता ही नहींचला. दो,तीन महीने पहले ही शिखा ने बताया कि वो जब भारत आएगी तो दो दिन के लिए मुंबई में भी रुकेगी...और जब पता चला उसकी बहन गोरेगांव में रहती हैं...जो मुंबई के लिहाज से मेरे घर से बहुत नजदीक है...तब  मैंने सबको डिनर पर बुलाना चाहा पर  शिखा श्योर नहीं थी क्यूंकि उसे, उसके पति का कार्यक्रम नहीं मालूम था ,और उसे कई लोगों से मिलना था. मैंने कहा 'कोई बात नहीं..मैं आ जाउंगी मिलने'...और बस शिखा की बांछे खिल गयीं, "सच...ऐसा हो सकता है..फिर तो कोई मुश्किल ही नहीं." मैंने कहा तुम्हारी बहन के घर के पास ही कहीं कॉफ़ी शॉप में मिलते हैं और शिखा ने कहा, " DONE "

शिखा की रात की मुंबई की फ्लाईट थी और हम दोपहर में चैट कर रहें थे. उसने कहा था, वह मुंबई पहुँच कर फोन करेगी कि कब मिलना है...और इधर तीन दिन मैंने शिखा के लिए फ्री रखे थे. और संयोग कुछ ऐसा बना कि इन्हीं तीन दिनों में यहाँ, मेरी सहेलियों ने भी कई प्लान बना लिए (ये सब शिखा को अब तक नहीं मालूम ) गुरुवार को मूवी और शुक्रवार को मेरे यहाँ गेट टूगेदर . मैंने कहा  'नहीं..मेरी सहेली आने वाली है,लन्दन से, मैं फ्री नहीं हूँ.' जिनका ब्लॉग जगत से परिचय नहीं वे लोग पूछने भी लगीं...".ये नयी सहेली कौन सी आ गयी?"...मैंने कहा "है एक स्पेशल :)"

शाम चार बजे  के करीब, एक सहेली, "सोना '  के यहाँ  बैठी चाय ही पी रही थी कि शिखा का फोन आ गया, "अभी दो घंटे पहले आई हूँ...और बस आज शाम ही फ्री हूँ...फिर नवी मुंबई जाना है..वहाँ से फिर कहीं और.. क्या आप  आधे घंटे में आ सकती हैं , मिलने.?".बस ऐसे, जैसे चप्पल पैरों में डालो  और निकल पड़ो.. मैं तुरंत कुछ फैसला नहीं कर सकी और कहा, 'बाद में फोन करके बताती हूँ'. पर मेरी सहेली सोना को तो जैसे  मुहँ मांगी मुराद मिल गयी. उसे पता चल गया कि आज अगर रश्मि मिल लेती है तो फिर मूवी LSD और गेट टुगेदर के  प्लान में भी कोई व्यवधान नहीं आएगा. और  उसने जैसे मुझे पुश करके ही भेज दिया .वैसे सोचने के बाद भी मैं यही फैसला लेती  पर उसने तो मुझे सोचने का भी मौका नहीं दिया. लगी सिफारिश करने ,"इतनी दूर से आई है...आज मिल लो..वरना मिल भी नहीं पाओगी ..आते ही फोन किया तुम्हे वगैरह..वगैरह"....उसका  वश चलता तो शायद वहीँ से मुझे सीधा भेज देती. पर घर आकर भी तो सबकुछ देखना था. घर आई...थोड़े बचे  काम निबटाये ,बच्चों को instructions दिए, पतिदेव को फोन खटकाया और चल दी ,शिखा से मिलने.
 
शिखा  की सहेली गौरी, गौरी  के सुपुत्र, शिखा और मैं  

अब इतनी जल्दबाजी में तय हुआ कि कॉफ़ी शॉप का आइडिया हमने ड्रॉप कर दिया और उसकी बहन के घर ही मिलना तय हुआ. वैसे शिखा के पति पंकज और बहन 'निहा' उसे चिढ़ा भी रहें थे 'आखिर कौन सी फ्रेंड है  जिस से कॉफ़ी शॉप में मिलना है ...हम तो पहले देखेंगे  तब तुम्हे जाने देंगे " हम दोनों को पता था कि घंटी बजेगी तो दरवाजे के बाहर मैं और अंदर शिखा ही होगी .वरना शायद भीड़ में देखा होता तो थोड़ी सी मुश्किल होती पहचानने में. फोटो से बिलकुल तो नहीं पहचाना जा सकता( वैसे, हम दोनों ही फोटो से ज्यादा अच्छे दिखते हैं,ऐसा लोग कहते हैं, हम नहीं :)  हा हा हा ) वहाँ शिखा और पंकज जी के कॉमन फ्रेंड एक कपल पहले से बैठे हुए थे. अब शिखा दो साल बाद अपने देश आई थी, सिर्फ दो,तीन घंटे हुए थे  और  अपनी बहन से ,पुरानी दोस्त से और मुझसे मिल रही थी,इसलिए इतनी एक्साईटेड  थी और नॉन -स्टॉप बोल रही थी या फिर हमेशा ऐसे ही बोलती है ये तो दो,चार बार मिलने पर पता चलेगा :)...वैसे राजधानी एक्सप्रेस मैं भी हूँ. इसलिए हम दोनों को देखकर लग ही नहीं रहा था पहली बार मिल रहें थे.

उसकी बहन का नाम 'निहा' मुझे बहुत पसंद है .मैंने शिखा को पहले ही बताया था कि उसका नाम मैं किसी कहानी में इस्तेमाल कर लूंगी .शिखा ने शायद उसे यह बता दिया था कि क्यूंकि वह कह रही थी, "मैं तो रोयल्टी  लूंगी " मैंने कहा "ले लेना..१०% कमेंट्स  तुम्हारे. यहाँ तो बस वही कमाई है." शिखा की कविताओं की सबसे बड़ी प्रशंसक और आलोचक भी वही है. अच्छा पोस्टमार्टम  किया उसकी कविताओं का.( पर मजाक में.) वहाँ उपस्थित बाकी लोगों को ब्लॉग की कोई जानकारी नहीं थी.हम उनका ज्ञानवर्धन कर रहें थे कि यहाँ कविता,कहानियाँ,संस्मरण...ज्ञान,राजनीति खेल, हर विषय पर आलेख मिलेंगे. ..साथ ही यहाँ की पौलिटिक्स, गुटबाजी, बहसों के बारे में भी बताते जाते कि सब कुछ वास्तविक संसार जैसा ही है. गहरी दोस्ती भी है और लोग नापसंद  भी करते हैं एक दूसरे को. वे लोग आश्चर्य से मुहँ में  उंगलियाँ दबा लेते ,"हाँ!!...देखा भी नहीं एक दूसरे को..कभी मिले भी नहीं...फिर भी नापसंद  ??"

निहा..लगातार हमारी  आवभगत में लगी थी..पहले ठंढा पेश किया फिर नमकीन, ढोकले और बमगोले जैसे बड़े बड़े रसगुल्ले. शिखा की बिटिया 'सौम्या' बड़ी प्यारी है . शिखा ने कहा," पहले उछल रही थी कि मैंने तो रश्मि आंटी  से बात भी  की है.अब क्यूँ शर्मा रही हो..बात करो " (एकाध बार चैट  की है,उसके साथ ) बेटा वेदान्त भी बहुत भोला-भाला है और दोनों तस्वीरों से ज्यादा छोटे लगते हैं. बच्चों से ज्यादा बात नहीं हो पायी. वे भी अपने दोस्तों में मस्त थे और हम भी कहाँ तैयार थे अपनी बातों से ब्रेक लेने को. पंकज जी बीच बीच में बोल उठते 'आप लोगों को अलग से बातें करनी है तो कमरे में जाकर आराम से बातें कीजिये.' शिखा ने बिंदास कहा, 'ना ना वो सब तो हम नेट पर कर लेते हैं.' मेरे मन में आया थोड़ा उन्हें परेशान करूँ ये कह कर कि 'कुछ बचा ही नहीं अलग से बात करने को' पर फिर छोड़ दिया .

बातों बातों में २ घंटे निकल गए .मुझे लौटना भी था और मुंबई की ट्रैफिक में घिरने का अंदेशा भी....सो उठना पड़ा. निहा के पति ने कहा.."अच्छा तो आप लोग ब्लॉगर्स  हैं.?" हम दोनों ने एक सुर में कहा ..."एक्चुअली वी आर राइटर्स " और सबकी समवेत हंसी के बीच बाय कहा एक दूसरे को.

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...