मेरी पिछली पोस्ट सबने बड़े ध्यान से पढ़ी. और काफी मनन करके अपने विचार रखे.सबका शुक्रिया. टिप्पणियों में भी देखा और आपसी चर्चा में भी कई बार लोग कह देते हैं , 'बहू कभी बेटी नहीं बन सकती.' जैसे इस अवधारणा ने गहरी जड़ें जमा रखी हों ,मनो-मस्तिष्क पर. उनलोगों ने अपने आस-पास जरूर ऐसे उदाहरण देखे होंगे जिस से,उनके ऐसे विचार बने.
परन्तु मैने उन कटु प्रसंगों के साथ अपने आस-पास कुछ ऐसे उदाहरण भी देखे हैं, जिन्हें अगर ना शेयर करूँ तो मेरा कॉन्शस ही मुझसे सौ सवाल करेगा.
मेरी एक रिश्तेदार, लन्दन से अपने बेटे बहू के साथ एक महीने के लिए छुट्टियाँ बिताने ,भारत आयीं थीं. आने के एक हफ्ते बाद ही वे कहीं गिर गयीं और उनके पैर में चोट आ गयी. स्थानीय डॉक्टर से इलाज कराया और बिना ज्यादा ध्यान दिए,पेन किलर के सहारे रांची,पटना, कलकत्ता, बैंगलोर, घूमती रहीं. लन्दन जाने से पहले उनके बेटे ने सोचा एक बार मुंबई में चेक-अप करवा लूँ. यहाँ के डॉक्टर ने बोला तुरंत ही सर्जरी करनी पड़ेगी, अंदर नस फट गयी है और जख्म हड्डी तक पहुँच गया तो गैंग्रीन हो जायेगा और पैर ही काटना पड़ेगा. दो दिन बाद ही बॉम्बे हॉस्पिटल में सर्जरी हुई .पर बेटे की छुट्टी नहीं थी.वो लन्दन में ताज होटल में सेकेण्ड इन कमांड है. कुछ बड़े डेलिगेट्स रुकने वाले थे.उसे तुरंत जाना पड़ा. दोनों बेटियों के स्कूल खुल गए,उन्हें भी जाना पड़ा. आज पंद्रह दिन हो गए हैं, सर्जरी के हफ्ते भर बाद स्किन ग्राफ्टिंग की गयी और अभी भी डॉक्टर कुछ नहीं बता रहें,कब डिस्चार्ज करेंगे? बहू अकेले यहाँ सास की सेवा में जुटी है. दोनों बेटियाँ वहाँ रेडी टु इट ,ब्रेड,मैगी के सहारे गुजारा कर रही हैं. होटल की नौकरी ऐसी है कि जब वे मुंबई ताज में थे ,सुबह चार बजे घर आया करते थे.लन्दन में भी सुबह के गए देर रात घर आते हैं.
इकलौता बेटा है,ना कोई बहन ना भाई. लन्दन जाकर भी कोई रिश्तेदार बच्चों का ख्याल नहीं रख सकता ,ना वहाँ काम करने वाली बाई की सुविधा है. यहाँ भी, हॉस्पिटल हमारे घर से काफी दूर है. और सहायता ऑफर करने पर भी उनलोगों ने विनम्रता से मना कर दिया. बेटियाँ अकेले स्कूल जाती हैं,सूने घर में लौटती हैं.खुद अपना ख्याल रख रही हैं.यहाँ' ताज' ने एक कमरा दिया है जहाँ,बहू सिर्फ फ्रेश होने और कपड़े लौंड्री में देने के लिए जाती है. रात में भी वहीँ पतले से अटेंडेंट के लिए रखे बेन्चनुमा कॉट पर सोती है, सास के जोर देने पर भी ताज में नहीं जाती. जबकि उनके पैर पर बस प्लास्टर है..बाकी सब नॉर्मल है. बेड के पास कॉल बटन है...जब चाहे नर्स को बुला सकती हैं.
अब कोई भी बेटी इस से बढ़ कर क्या करती? जबकि बहू का प्रदेश और भाषा दोनों अलग है और सास को ये मलाल भी था कि बेटे ने अपनी जाति में शादी नहीं की. उनकी नौ वर्षीया पोती कहती हैं ,"मम्मा, प्लीज़ डोंट माइंड पर मैं दादी को आपसे थोड़ा ज्यादा प्यार करती हूँ " दादी भी कह रही थीं, सामने खाना आता है तो आँखों में आँसू आ जाते हैं कि वहाँ बच्चे ब्रेड पर गुजारा कर रहें हैं. अब बहू ने बच्चों और दादी को पास आने दिया तभी तो ये स्नेह पनप सका.
मेरी ही बिल्डिंग में रहने वाली एक सहेली है. तीन बेडरूम का फ़्लैट लिया कि ससुर साथ रह सकें. ससुर जी को ड्रिंक की आदत थी. बेटे का ट्रांसफर दूसरी जगह हो गया तो बहू की रोक-टोक अच्छी नहीं लगी और पास के ही अपने फ़्लैट में रहने चले गए. खूब बदपरहेज़ी की और तबियत खराब रहने लगी. रात के तीन बजे फोन करते और ये गाड़ी लेकर अकेली उन्हें देखने जाती. एक बार पुलिस ने भी रोक लिया था. मेरे कहने पर कि 'कम से कम हमें साथ जाने को बुला लिया करो,' कहने लगी, ये तो रोज का किस्सा है,अक्सर दस बजे बारह बजे फोन कर देते हैं, कि" तबियत ठीक नहीं " ससुर को अकेले भी रहना था और अटेंशन भी चाहिए थी. दो साल तक ये सिलसिला चलता रहा. बाद में तीन महीने हॉस्पिटल में रहने के बाद उन्होंने अंतिम साँसे लीं. पूरे समय बहू ने अकेले उनकी देखभाल की. बेटा बस एकाध दिन की छुट्टी लेकर आ पता. यहाँ तो इसी कॉलोनी में उनकी बेटी भी रहती है पर उसने सारी जिम्मेवारी भाभी पर छोड़ रखी थी. बहू ने तो बेटी से भी बढ़कर अपना कर्तव्य निभाया.
एक और सहेली है उसकी सास पहले उसके साथ ही रहती थीं.. ननद को बेटी हुई तो उसकी देखभाल करने अपनी बेटी के पास चली गयीं. ननद नौकरी करती है. ननद की बेटी स्कूल जाने लगी है पर ननद ने उसकी सारी जिम्मेवारी माँ पर छोड़ रखी है और बेटी के जन्म के पहले जैसी ही लापरवाह रहती है. माँ उसे अपनी बहू का उदाहरण देती है. और बहू से बेटी की शिकायत भी करती है. ननद-भाभी भी अच्छी दोस्त हैं.ननद भी कहती है, 'माँ मेरी माँ कम सास ज्यादा है'. ननद का पति भी कुछ नहीं कहता ,यह सोच कि यह माँ बेटी के बीच का मामला है. यही अगर बेटा होता तो अपनी पत्नी को सौ घुडकियां दे चुका होता कि "मेरी माँ क्यूँ रखे,बच्ची का.ख्याल ?" यहाँ भी माँ को बेटी से ज्यादा बहू पर भरोसा है.
माँ-बेटी में मजबूत इमोशनल बौंड होता है.पर अगर रिश्तों को प्यार और समझदारी से निभाया जाए तो बहू के बेटी की जगह लेते देर नहीं लगती. और मुझे लगता है इसमें ज्यादा समझदारी, सास से ही अपेक्षित है क्यूंकि बहू एक तो कम उम्र की होती है, अपना घर छोड़ ,नए परिवेश में आती है. अगर उसे अपनापन मिले तो उसे उस परिवार में शक्कर की तरह घुलने में देर नहीं लगती. पिछली पोस्ट पर शुभम जैन की टिप्पणी पढ़कर इतना अच्छा लगा, "अगर मम्मी नहीं होतीं तो पति के साथ रहना मुश्किल हो जाता" :)
फिर भी ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं,ज्यादा घरं में मन-मुटाव ही देखने को मिलता है. अब इसकी वजह पति और बेटे की अटेंशन पाने की खींचतान होती है या फिर किचन पर वर्चस्व का मुद्दा. हर घर का अलग किस्सा होता है.कई बार तो सास-ससुर की उपेक्षा करती बहू को देख,एक ख्याल आता भी है क्या इनलोगों ने भी उसकी शादी की शुरूआती दिनों में उसे सताया था. क्यूंकि हर महिला इतनी उदारमना नहीं होती कि सबकुछ भुला दे. वही है कि कांच से रिश्ते हैं, बहुत समभाल कर निभाने होते हैं, जरा सी तेज धूप में भी चटख जाते हैं
रिश्ता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रिश्ता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें
यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...
-
गुवाहाटी में जो कुछ भी उस शाम एक बच्ची के साथ हुआ...ऐसी घटनाएं साल दो साल में हमारे महान देश के किसी शहर के किसी सड़क पर घटती ही रहती हैं. ...
-
हिंदी का एक बहुप्रचलित शब्द मुझे पसंद नहीं आता. हालांकि अधिकाँश लोग मेरी सोच से इत्तफाक नहीं रखेंगे .वैसे भी नहीं रखते ,इसलिए चिंता की ...
-
तीसरी पारी पूरी हुई यानि कि तीन साल हो गए ब्लॉगजगत में कदम रखे. बल्लेबाजी चल ही रही है...चौकों-छक्कों का नहीं पता...पर रन तो बनते ही रह...
