Tuesday, February 4, 2014

स्मृतियों में बसा वसंत पंचमी का दिन

सरस्वती पूजा का दिन तो स्मृतियों में यूँ बसा हुआ है कि हर साल यह दिन बीते दिनों को याद करते हुए ही गुजरता है. सबसे पहले तो अपना ब्लॉग खंगाला कि वसंत-पंचमी के संस्मरण भी जरूर लिखे होंगे कहीं , पर शायद इसी वर्ष ,यह संस्मरण  लिखने का दिन मुक़र्रर था . 

बिहार में दुर्गा पूजा जैसी ही सरस्वती पूजा मनाने की भी धूम होती है. चमक-दमक भले ही थोड़ी उन्नीस हो पर उत्साह वैसा ही होता है. हर गली-नुक्कड़, मोहल्ले और करीब करीब हर स्कूल  में सरस्वती जी की प्रतिमा स्थापित की  जाती है .बड़े उत्साह  से पूजा की जाती है . सुन्दर कपड़ों में सजे  लड़के-लड़कियों की  टोली सरस्वती जी के दर्शन के लिए आती-जाती दिख जाती है.   उन दिनों ,पूजा से एक दिन पहले मंडप की सजावट करते हुए ,रात भर  लाउडस्पीकर पर गाने बजाये जाते थे  . (अब का नहीं पता ). हमारे समय में तो जनवरी सेशन होता था यानी कि जनवरी में नयी क्लास में जाते थे . सरस्वती पूजा तक शायद ही किसी स्कूल में ढंग से पढाई शुरू होती हो. पूरा स्कूल ही वसंत-पंचमी की तैयारियों में संलग्न होता था .

अक्सर महल्ले के बच्चे भी मिलकर किसी एक जगह सरस्वती जी की प्रतिमा बिठाते हैं .कुछ लोग अपने घरों में भी उनकी मूर्ति ला कर पूजा  करते हैं, (जैसा महाराष्ट्र में गणेशोत्सव में करते हैं .) मैं सातवीं में थी तो हमने भी हमउम्र बच्चों के साथ सरस्वती पूजन करने की  शुरुआत की .तब हर घर से दो दो रुपये के चंदे जमा करते थे , मूर्ति लाना ,प्रसाद बनाना सबकुछ उन पैसों में ही हो जाता था . मेरे और पड़ोस में रहनेवाली  प्रतिमा दी के सम्मिलित छत पर मूर्ति बिठाते .सबलोग अपनी अपनी माँ की रंग-बिरंगी साड़ियाँ लाते और उनसे ही सजावट करते . लाल -पीले कागज़ के तोरण बनाए जाते . शाम से ही सरस्वती जी के सामने अपनी अपनी कला का  प्रदर्शन शुरू हो जाता. संगीत-नृत्य -नाटक का रंगारंग कार्यक्रम होता . पर सब कुछ बच्चों के बीच ही. पूजा की तैयारियों से लेकर विसर्जन तक सारा काम हम बच्चे ही संभालते .बस विसर्जन के लिए जीप देकर , ऑफिस के प्यून, वाचमैन को साथ कर दिया जाता . आठवीं में मैं हॉस्टल में चली गयी फिर भी सरस्वती पूजा से पहले जरूर आ जाती . 

पर जब मैं दसवीं में थी तो बहुत सारी जिम्मेवारी मेरे ऊपर भी  थी और स्कूल के सरस्वती पूजन में शामिल होने का उत्साह भी था . मैं अपने महल्ले की पूजा में सम्मिलित नहीं हुई थी और बाद में पता चला , महल्ले के लड़के-लड़कियों में घमसान हो गया था . अब उम्र में सब थोड़े से बड़े हो  गए थे और थोड़े शैतान भी. हमेशा की तरह ही सबने मिल कर पूजा की तैयारी की . लड़कों ने दुसरे महल्ले में  और भी कई  जगह जाकर अच्छा चन्दा इकठ्ठा किया था . इन  पैसों से  अच्छे प्रसाद का इंतजाम भी हुआ .जहाँ पहले प्रसाद में सिर्फ बुंदिया (सूखी मीठी बूंदी ) और थोड़े से फल होते थे ,इस बार अच्छी  मिठाइयां थीं .  इस बार मूर्ति छत पर नहीं ,एक खाली पड़े क्वार्टर में बिठाई गयी थी ..देर रात तक सबने मिलकर सजावट की .सुबह पूजा भी हुई पर सुना इसके बाद लड़कियों ने लड़कों को सिर्फ एक एक दोना प्रसाद देकर, चलता कर दिया और  पूजा की सारी बागडोर अपने हाथों में ले ली . विसर्जन के समय भी लड़कों को साथ नहीं ले गयीं .और क्वार्टर में ताला लगा गयीं ,जिसमे बचा हुआ प्रसाद भी रखा हुआ  था . अब लड़के  शान्ति से ये सब सह जाएँ ऐसा कभी हुआ है ,भला . इधर लडकियां विसर्जन के लिए गयीं और लड़के ताला तोड़ कर क्वार्टर के अन्दर  . इस ग्रुप में ज्यादातर भाई-बहन ही थे, जो अब  अलग-अलग खेमों में बंट गए थे  . सारा प्रसाद लाकर महल्ले में बाहर ही स्टूल पर रखा गया, लड़कों ने खुद खाए लोगों को बांटे  और नाच-गा कर खूब धमाल किया . लड़कियों के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा .लडकियां  वापस लौटीं तो स्टूल पर रखे खाली परात-टोकरी और गाते-नाचते लड़कों की टोली ने उनका स्वागत किया. लड़कियों ने खूब झगडा किया और लड़के उन्हें चिढाते रहे . मामला बराबरी का ही था . उन दिनों किसी भी घर के बड़े बिलकुल ही इन बातों में नहीं पड़ते थे .ये लोग खुद ही आपस में सुलझा या उलझा लिया करते थे .

हमारे स्कूल की पूजा भी  बहुत शानदार होती थी . स्कूल में खेल के मैदान के एक सिरे पर सीमेंट-ईंट का परमानेंट स्टेज बना हुआ था .चार दिन पहले से ही कुछ बंगाली लडकियां उसपर अल्पना  बनाना शुरू कर देतीं  .अल्पना में  बड़े से शंख और मछली की आकृति जरूर होती . स्टेज से लेकर गेट तक सुर्खी (ईंट का बुरादा ) की एक चौड़ी सड़क बनाई जाती .रेड कार्पेट जैसा कुछ हालांकि वो चलने के लिए नहीं सिर्फ शोभा के लिए होता था .उसपर 'चॉक पाउडर'  से फूल -पत्ती उकेरा जाता .(वसंत पंचमी के बाद हम हॉस्टल वाले उस सुर्खी से एक-दो बार होली जरूर खेलते .सारी लड़कियों को पकड पकड़ कर उनपर वो सुर्खी डाली जाती और फिर हमें सामूहिक सजा मिलती . ) प्रसाद भी बहुत अच्छा होता था दो मिठाई, फल मीठी बूंदी होती थी . पूरे दिन दर्शन करने वालों का तांता लगा होता और हम लड्कियाना प्रसाद बांटने में लगी होतीं.

स्कूल हो या कॉलेज कभी भी मैं सरस्वती पूजा से पहले वाली रात नहीं सोयी . सजावट का काम या  फलों को काटने का या फिर कागज़ के प्लेटों में प्रसाद लगाने का .,पूरी रात जागकर किये जाते और फिर सुबह सुबह नहा धोकर फिर से हाज़िर .एक क्लासरूम से डेस्क हटाकर प्रसाद लगाने का काम होता. कागज़ के प्लेटों की लम्बी लम्बी कतार हुआ करती थी. हॉस्टल में रहने वालों को मिठाई के दर्शन भी  मयस्सर नहीं थे फिर भी श्रद्धा ऐसी थी कि कभी किसी लड़की ने मिठाई का एक टुकडा भी मुहं में नहीं डाला (यहाँ, लड़कों पर ऐसा विश्वास नहीं किया जा सकता ...लडकों को बुरा लगे तो लगे पर सच यही है ...... पूजा के लिए रखे लड्डुओं का भोग लगाने की कथा खुद कई लड़के सुना चुके हैं ) एक सफ़ेद रंग का हल्का मीठा पानीदार फल होता था ,शायद नामा इसका केसर था .बेर और यह फल प्रसाद में जरूर होते थे .  उस वर्ष ,सरस्वती -पूजा के दिन अचानक से तेज आंधी-तूफ़ान आ गया था और पंडाल गिर गया. बहुत सारी लडकियां अपनी किताबें लेने पंडाल की तरफ भागीं क्यूंकि हम रात में ही कठिन विषय वाली किताबें सरस्वती जी के आस-पास रख देते थे कि शायद उसमें थोड़ी विद्या आ जाए और उस कठिन विषय को आसान बना  जाए . शायद दसवीं में आने से मैं थोड़ी जिम्मेदार हो गयी थी. . मैंने भागकर मेन स्विच ऑफ कर दिया था. प्रिंसिपल और टीचर्स से काफी तारीफ मिली और इनाम का वायदा भी . जो नहीं मिला ,बाद में सब भूल-भाल गए :(

लड़कियों  के बीच सरस्वती-पूजा का एक जबरदस्त आकर्षण होता था ,साड़ियाँ पहनने का  मौक़ा मिलने का .ज्यादातर लडकियां उस दिन साड़ी पहनती . हफ़्तों पहले ,माँ-मौसी-चाची या फिर पड़ोस वाली आंटी की साड़ियों में से पीले रंग की साड़ियों की चयन-प्रक्रिया शुरू हो जाती.  टेंथ वाली तो सारी लडकियां ही साडी पहनतीं पर मुझमे थोड़ी खडूसियत शुरू से ही है. मैं साड़ी नहीं पहनती थी जबकि हॉस्टल की ही किसी टेंथ की लड़की को साडी पहनकर पूजा पर बैठना होता था .पूजा पर बैठने का मन तो था पर साडी पहनना गवारा नहीं था .पूजा वाले दिन टीचर्स, डे स्कॉलर लडकियां सब हैरान थीं क्यूंकि उन्हें यही अपेक्षा थी कि मैंने  ही साडी पहनकर पूजा की होगी. पर एक अच्छी बात ये हुई कि जिस लड़की ने साडी पहनकर पूजा की, उसे स्कूल में सब पहचान गए .

टेंथ के बाद ही मैं स्कूल-कॉलेज के सरस्वती-पूजा समारोह में ही शामिल होने लगी . हॉस्टल में ही रहती, घर नहीं आती. इसलिए एक रोचक अवलोकन से वंचित रह गयी . पहले, कैशोर्य की सीढियों पर कदम  रखते ही लड़के-लड़कियों के अलग ग्रुप हो जाते थे . उनका बातचीत करना, मिलना-जुलना, साथ खेलना सब बंद . सरस्वती-पूजा ऐसा मौक़ा होता था जब मिलकर हाल-ए-दिल सुनाये जाते . हमारे महल्ले की एक लड़की ने ने तो यही मौक़ा चुना था ,घर से वह सज-धज कर पूजा देखने निकली पर देवघर में जाकर शादी के बंधन में बंध गयी . बाद में लड़की के घरवालों ने ये रिश्ता स्वीकार कर लिया था . लड़का तो सीधा बहु लेकर ही अपने घर पहंचा था . फिल्म 'हासिल' में भी कुछ ऐसा ही दृश्य फिल्माया गया है, जहाँ लड़की साडी पहनकर अपनी सहेली के यहाँ सरस्वती पूजा में जाती है और फिल्म का हीरो जो अब तक सिर्फ उसके रिक्शा के पीछे पीछे अपनी सायकिल पर उसके घर तक जाता था .पहली बार हिरोइन से वहीँ मिलता है.


दिल्ली -मुम्बई में तो सरस्वती-पूजा सिर्फ टी.वी. या नेट से ही पता चलता है. बच्चे जब बहुत छोटे थे तो स्कूल में उन्हें पीले कपडे पहन कर जाना होता था .यहाँ वसंत-पंचमी का अर्थ पीत-वस्त्र धारण करना ही है. कई ऑफिस में भी ये ड्रेस कोड होता है. 

अब तो यही सोच कर खुश हो लेती हूँ,  मेरे पास इस विशेष दिन की मधुर यादें तो हैं .

आप सबको वसंत पंचमी की अनेक शुभकामनाएं !!

16 comments:

  1. "हम रात में ही कठिन विषय वाली किताबें सरस्वती जी के आस-पास रख देते थे कि शायद उसमें थोड़ी विद्या आ जाए. "

    अरे इस नुस्खे का पता होता तब तो परीक्षा में मेहनत करने की जरूरत ही ना पड़ती :)

    ReplyDelete
  2. मैंने भी सरस्वती पूजा बिहार ( आज के झारखंड ) जाकर ही देखी. हम तो वसंत पंचमी ही मनाते थे. पीले वस्त्र और मंदिर में बच्चों की तरह तरह की प्रतिस्पर्धाएँ होती थीं.

    ReplyDelete
  3. दुर्गा पूजा , सरस्वती पूजा दोनों का ही उल्लास कम नहीं होता था। दूसरी स्कूलों में झांकिया देखें भी जाते था। राजस्थान में तो विद्यालयों में भी इतनी धूम नहीं होती , हमारी स्मृतियों में तो है , बच्चे तो जानते भी नहीं !

    ReplyDelete
  4. बंगाल क्षेत्र में तो उत्साह देखते ही बनता है।

    ReplyDelete
  5. सुंदर स्मृतियाँ ...शुभकामनायें

    ReplyDelete
  6. कितना कुछ याद दिला दिया आपने.. एक्दम ऐसा लगा कि हमारे बचपन और स्कूल के दिन वापस आ गए!

    ReplyDelete
  7. प्यारा पोस्ट...... बचपन में मनाए गए अपने घर बिहार में सरस्वती पूजा की याद ताजा हो गयी.. बिल्कुल हम सब भी इसी तरह स्कूल में मानते थे... टेंथ में पूजा के दिन साड़ी पहन के जाना होता था और भी सारी बाते ....

    ReplyDelete
  8. वसंत पंचमी के बहुत सुन्दर संस्मरण.आज भी बहुत ज्यादा फर्क तो नहीं आया है,सिवाय तड़क-भड़क के और विसर्जन पर डीजे की धुन पर नाचते हुड़दंगियों के.
    नई पोस्ट : प्रकृति से मानव तक

    ReplyDelete
  9. इतनी श्रद्धा से पूजती थीं तभी तो माँ सरस्वती की इतनी कृपा है तुम पर !!!
    हम भी बचपन से अपनी किताबें पूजा में रखते थे....खुद पर confidence नहीं था इसलिए सभी रख देते थे,यहाँ तक की सिलेबस भी :-)
    माँ देर सारे काजू किशमिश दाल कर पीले मीठे चावल बनाती थीं....
    आज कल हम बच्चों की पुस्तकें रख देते हैं पूजा में,....पीला पहन लेते हैं....पीले फूल और लड्डू चढ़ा कर माँ की full कृपा की आस लगाये रहते हैं !!
    :-)
    well crafted post !!
    अनुलता

    ReplyDelete
  10. जीवन की मधुर यादें, आनंद दायक हैं !

    ReplyDelete
  11. हमने तो दुबई में भी बसंत पंचमी मनाई इस बार ...
    त्यौहार को मनाना तो दिल की बात है ... उत्साह हो तो सब कुछ हो जाता है ...

    ReplyDelete
  12. आपके यादों की पिटारी देखकर अच्छा लगा. पुरानी यादें हमेशा सुखद होती हैं...

    ReplyDelete
  13. बहुत प्यारा संस्मरण है रश्मि..

    ReplyDelete
  14. बहुत सुन्दर पोस्ट दीदी :)

    ReplyDelete
  15. वैसे ये तो याद है इस पोस्ट को मैंने पढ़ा था...ये वाला भी और इसके पहले की जो पोस्ट है, रस्मों वाली...वो भी....लेकिन मेरा कमेन्ट नहीं..या तो गया नहीं होगा या फिर मेरी गलती....थोड़ा जल्दबाजी में रहा हूँगा तो कमेन्ट पोस्ट होने के पहले शायद ब्राउज़र टैब बंद कर दिया हूँगा....एनीवे, आज पढना है आपका ही ब्लॉग...समय निकाल कर :)

    ReplyDelete
  16. आँखों के आगे सारा खाका खींच के रख देती हैं आप...बहुत अच्छा लगा इसे पढ़ के...|

    ReplyDelete

लाहुल स्पीती यात्रा वृत्तांत -- 6 (रोहतांग पास, मनाली )

मनाली का रास्ता भी खराब और मूड उस से ज्यादा खराब . पक्की सडक तो देखने को भी नहीं थी .बहुत दूर तक बस पत्थरों भरा कच्चा  रास्ता. दो जगह ...