Thursday, May 19, 2011

जब आसमान कुछ ज्यादा करीब लगता था !!

पिछली पोस्ट में की गयी पत्रिकाओं में छपे आलेखों और पत्रों के जिक्र ने जैसे मुझे यादों की वादियों में धकेल दिया और अभी तक मैं उनमे ही भटक रही हूँ. कई लोगों ने उन  आलेखों और पत्रों के बारे में भी पूछा, वाणी गीत  ने जानना भी चाहा कि "उत्सुकता भी है कि तुमने बाद में इतने सालों लिखना क्यों छोड़ दिया "
सोचा आपलोगों को भी उन वादियों की थोड़ी सैर करा दूँ.


दसवीं उत्तीर्ण कर कॉलेज में कदम रखा ही था. स्कूल हॉस्टल के जेलनुमा माहौल के बाद, कॉलेज में आसमान कुछ ज्यादा करीब लगता. धूप नहलाती हुई सी....हवा सहलाती हुई सी और फिजां गुनगुनाती हुई सी प्रतीत होती.  मौलिश्री के पेड़ के नीचे बैठ गप्पें मारना, किताबें पढना, कमेंट्री सुनना हम सहेलियों का प्रिय शगल था. उसी दौरान एक पत्रिका 'क्रिकेट सम्राट' के सम्पादकीय पर नज़र पड़ी. पूरे सम्पादकीय में अलग अलग तरह से सिर्फ यही लिखा था कि 'लड़कियों को खेल के बारे में कुछ नहीं मालूम, उन्हें सिर्फ खिलाड़ियों से मतलब होता है'. मुझे बहुत गुस्सा आया क्यूंकि मेरी  खेल में बहुत रूचि थी. क्रिकेट,हॉकी,टेनिस कभी खेलने का मौका तो नहीं मिलता पर इन खेलों से सम्बंधित ख़बरों पर मेरी पूरी नज़र रहती. मुझे सब चलती फिरती 'रेकॉर्ड बुक' ही कहा करते थे.


यूँ तो दोनों छोटे भाइयों को क्रिकेट खेलते देख,मन तो मेरा भी होता खेलने को. पर मैं बड़ी थी. छोटी बहन होती तो शायद जिद भी कर लेती,"भैया मुझे भी खिलाओ" पर मैं बड़ी बहन की गरिमा ओढ़े चुप रहती. एक बार, मेरे भाई की शाम में कोई मैच थी और उसे बॉलिंग की प्रैक्टिस करनी थी. उसने मुझसे बैटिंग करने का अनुरोध किया. मैंने अहसान जताते हुए,बल्ला थामा. भाई ने बॉल फेंकी,मैंने बल्ला घुमाया और बॉल बगल वाले घर को पार करती हुई जाने कहाँ गुम हो गयी. भाई बहुत नाराज़ हुआ,मुझे भी बुरा लगा,ये लोग कंट्रीब्यूट करके बॉल खरीदते थे. ममी पैसे देने को तैयार थीं पर भाई ने जिद की कि बॉल मैंने गुम की है,मुझे अपनी गुल्लक से पैसे निकाल कर देने पड़ेंगे. शायद बॉल गुम हो जाने से ज्यादा खुन्नस उसे अपनी बॉल पर सिक्सर लग जाने का था. वो मेरी ज़िन्दगी का पहला और आखिरी क्रिकेट शॉट था

अखबार भी मैं हमेशा पीछे से पढना शुरू करती थी. क्यूंकि अंतिम पेज पर ही खेल की ख़बरें छपती थीं. इस चक्कर में एक बार अपने चाचा जी से डांट भी पड़ गयी. उन्होंने किसी खबर के बारे में पूछा और मेरे ये कहने पर कि अभी नहीं पढ़ा है. डांटने लगे,"लास्ट पेज पढ़ रही हो और अभी तक पढ़ा ही नहीं है?"
इस पर जब मैंने 'क्रिकेट सम्राट' में लड़कियों पर ये आरोप देखा तो मेरा खून जलना स्वाभाविक ही था. मैंने एक कड़ा विरोध पत्र लिखा और उसमे संपादक की भी खूब खिल्ली उडाई क्यूंकि हमेशा अंतिम पेज पर किसी खिलाडी के साथ, उनकी खुद की तस्वीर छपी होती  थी.सहेलियों ने जब कहा ,'ये पत्र तो नहीं छापेगा ' तो मैंने दो और पत्र, एक नम्र स्वर में और एक मजाकिया लहजे में लिखा और 'रेशु' और अपने निक नेम 'रीना' के नाम से भेज दिया. एड्रेस भी एक रांची, मुजफ्फरपुर और समस्तीपुर का दे दिया. सारी 'डे स्कॉलर' सहेलियों को नए अंक चेक करते रहने के लिए कह रखा था. हमारी केमिस्ट्री की क्लास चल रही थी और शर्मीला कुछ देर से आई. उसने 'में आई कम इन' जरा जोर से कहा तो हम सब दरवाजे की तरफ देखने लगे. शर्मीला ने मुझे 'क्रिकेट सम्राट' का नया अंक दिखाया और इशारे से बताया 'छप गयी है'. अब मैं कैसे देखूं?..मैं सबसे आगे बैठी थी और शर्मीला सबसे पीछे और 45 मिनट का पीरियड बीच में . नीचे नीचे ही पास होती पत्रिका मुझ तक पहुंची. देखा,एक अलग पेज पर मेरे तीनो पत्र छपे हैं,और एक कोने में संपादक की क्षमा याचना भी छपी है .फिर तो डेस्क के नीचे नीचे ही पूरा क्लास वो पेज पढता रहा और मैडम chemical equations सिखाती रहीं
दो महीने बाद छुट्टियों में घर जा रही थी. ट्रेन में सामने बैठे एक लड़के को 'क्रिकेट सम्राट' पढ़ते हुए देखा. जैसे ही उसने पढ़ कर रखी,मैंने अपने हाथ की मैगज़ीन उसे थमा,उसकी पत्रिका ले ली. {आज भी मुझे किताबें या पत्रिका मांगने में कोई संकोच नहीं होता.फ्रेंड्स के घर में कोई किताब देख निस्संकोच कह देती हूँ,पढ़ कर मुझे देना,इतना ही नहीं,रौब भी जमाती हूँ,इतना स्लो क्यूँ पढ़ती हो, जल्दी खत्म करो :)}.मिडल पेज पर देखा संपादक ने बाकायदा एक परिचर्चा आयोजित कर रखी थी."क्या लड़कियों का क्रिकेट से कोई वास्ता है??" पक्ष और विपक्ष के कई लोगों ने मेरे लिखे पत्र का उल्लेख किया था. अब मैं किसे बताऊँ? पापा,बगल में बैठे एक अंकल से बात करने में मशगूल थे, बीच में टोकना अच्छा नहीं लगा. यूँ भी छपने पर पापा ने ज्यादा ख़ुशी नहीं दिखाई थी. गंभीर स्वर में बस इतना कहा था 'ये सब ठीक है,पर अपनी पढाई पर ध्यान दो" उन्हें डर था कहीं मैं साइंस छोड़कर हिंदी ना पढने लगूँ. मैंने चुपचाप उसे पत्रिका वापस कर दी,ये भी नहीं बताया कि इसमें जिस 'रश्मि रविजा' ('रविजा'  तखल्लुस तब से है ) की चर्चा है,वो मैं ही हूँ. जान पहचान वाले लड़कों से ही हमलोग ज्यादा बांते नहीं करते थे,अनजान लड़के से तो नामुमकिन था.(ये बात, मुंबई की मेरी सहेलियाँ  बिलकुल नहीं समझ पातीं.)


वह पत्रिका फिर मुझे नहीं मिली पर इससे मेरे आत्मविश्वास को बड़ा बल मिला. मेरा लिखा सिर्फ  छपता ही नहीं, लोग पढ़ते भी हैं और याद भी रखते हैं. फिर तो मैं काफी लिखने लगी.खासकर 'धर्मयुग','साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के युवा जगत में मेरी रचनाएं अक्सर छपती थीं.जब पहली बार 100 रुपये का चेक आया तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. छप जाना ही इतनी बड़ी बात लगती.....इसके पैसे भी मिलेंगे, ये तो सोचा ही नहीं था. पर मुझे ख़ास ख़ुशी नहीं होती. चेक तो बैंक में जमा हो जाते.कैश होता तो कोई बात भी थी.


लोगों के पत्र आने भी शुरू हो गए. एक बार जयपुर से एक पोस्टकार्ड मिला. लिखा था,"मैं 45 वर्षीय पुरुष हूँ,मेरे दो पुत्र और तीन पुत्रियाँ हैं,आपका साप्ताहिक हिदुस्तान में छपा लेख पढ़ा,अच्छा लगा,वगैरह वगैरह. हमलोग,नियमित रूप से सिर्फ 'धर्मयुग', 'सारिका' और 'इंडिया टुडे ' लेते थे. अबतक तो वह अंक बुकस्टॉल  पर भी नहीं मिलता. मैंने एक बार, पड़ोस के एक लड़के को..धूप सेंकते हुए...'साप्ताहिक हिन्दुस्तान'  पढ़ते देखा था. (कॉलेज में मेरी सहेलियां कहा करती थीं,'रश्मि को किताबों की खुशबू आती है...किसी ने कितनी भी छुपा कर कोई किताब रखी हो,मेरी नज़र पड़ ही जाती.) वे लोग नए आये थे,हमारी जान पहचान भी नहीं थी. मैंने नौकर को कई बार रिहर्सल कराया कि कैसे क्या कहना है और उनके यहाँ भेजा. आज तक नहीं पता उसने क्या कहा,पर उस लड़के ने 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के 3 , 4 अंक भेज दिए. कई दिन तक सब मुझे चिढाते रहें,'और तुम्हारा वो 45 वर्षीय मित्र कैसा है?"


पूरे भारत से ही पत्र आते थे पर अल्मोड़ा, इंदौर और नागपुर के पत्र कुछ ख़ास लगते क्यूंकि मेरी प्रिय लेखिका,शिवानी,मालती जोशी और सूर्यबाला के शहर से होते.(अब क्या बताऊँ...शरद कोकास जी की कविता पर लिखी पुस्तक के विमोचन समारोह में लेखिका 'सूर्यबाला' जी भी आनेवाली थीं...किन्ही कारणवश नहीं आ पायीं...उनसे मिलकर ,मेरा तो जीवन सफल हो जाता.)


 जबाब तो खैर मैने कभी किसी भी पत्र का नहीं दिया. सुदूर नाइजीरिया से जब किसी ने लिखा था,'पापी पेट के वास्ते यहाँ पड़ा हूँ' तो उसपर बड़ी दया आई थी. इनमे से कुछ पत्र जेनुइन भी होते. एक बार 'धर्मयुग' में मेरा एक संस्मरण छपा था जिसमे मैंने लिखा था,'घर में बहुत सारे मेहमान होने की वजह से मैं एक छोटे से कमरे में सो रही थी जो पुरानी किताबों, पत्रिकाओं से भरा हुआ था. एक टेबल फैन लगाया था. आधी रात को अचानक नींद खुली तो देखा टेबल फैन के पीछे से छोटी छोटी आग की लपटें उठ रही थीं. भगवान ने वक़्त पर नींद खोल दी वरना कमरे में आग लग जाती " इस पर चंडीगढ़ से एक लड़के ने अपने पत्र में बाकायदा उस कमरे का स्केच बनाया था और लिखा था कि कमरा छोटा होने की वजह से प्रॉपर वेंटिलेशन नहीं होगा.और आग की लपटों के साथ धुआं भी निकला होगा. जिससे आपका गला चोक हो गया होगा और नींद खुल गयी. इसमें भगवान का कोई चमत्कार नहीं है.'धर्मयुग' वालों ने भी यह नहीं सोचा था और मेरे संस्मरण का शीर्षक दे दिया था "जाको राखे  साईंयां  "


पर इन फैनमेल्स ने मेर अहित भी कम नहीं किया. पता नहीं मेरी कहानियाँ छपती या नहीं. पर मैंने डर के मारे कभी भेजी ही नहीं. (और अब आलस के मारे नहीं भेजती..) सोचा,इतने रूखे-सूखे सब्जेक्ट पर लिखती हूँ तब तो इतने पत्र आते हैं.पता नहीं कहानी छपने पर लोग क्या सोचें और क्या-क्या  लिख डालें.


हमलोग गिरिडीह में थे, वहां जन्माष्टमी में हर घर में बड़ी सुन्दर झांकी सजाई जाती. मेरे पड़ोस में छोटे छोटे बच्चों ने एक शहर का दृश्य बनाया था. सड़कों का जाल सा बिछाया था. पर हर सडक पर छोटे छोटे खिलौनों की सहायता से कहीं जीप और ट्रक का एक्सीडेंट, कहीं पलटी हुई बस तो कहीं गोला बारी का दृश्य भी दर्शाया था. यह सब देख मैंने एक लेख लिखा,'बच्चों में बढती हिंसा प्रवृति' और मनोरमा में भेज दिया.काफी दिनों बाद एक आंटी घर आई थीं,जन्माष्टमी की चर्चा चलने पर मैं उन्हें ये सब बताने लगी. उन्होंने कहा, 'अरे! ऐसा ही एक लेख मैंने मनोरमा में पढ़ा है' और मैं ख़ुशी से चीख पड़ी, 'अरे वो छप भी गया'.आस पास सब मुझे 'रीना' नाम से जानते थे.'रश्मि' नाम किसी को पता ही नही था. आंटी  ने दरियादिली दिखाई और वो पत्रिका मुझे हमेशा के लिए दे दी...(जिसे मैने बाद में खो दी )


दहेज़ मेरा प्रिय विषय था और कहीं भी मौका मिले मैं उसपर जरूर लिखती थी. एक बार शायद 'रविवार' में एक लेख लिखा था.'लडकियां आखिर किस चीज़ में कम हैं कि उसकी कीमत चुकाएं'. लेख का स्वर भी बहुत रोष भरा था. पापा व्यस्त रहते थे,उन्हें पत्रिका पढने की फुर्सत कम ही मिलती थी. हाँ, अखबार का वे एक एक अक्षर पढ़ जाते थे (आज भी). एक बार वे बीमार थे और समय काटने के लिए सारी पत्रिकाएं पढ़ रहे थे. उनकी नज़र इस लेख पर पड़ी और उन्होंने ममी को आवाज़ दी, 'देखो तो जरा, आजकल लड़कियां क्या क्या लिखती हैं' ममी ने बताया ,'ये तो रीना ने लिखा है'  मैं जल्दी से छत पर भाग गयी,कहीं बुला कर जबाब तलब ना शुरू कर दें.पर पापा ने कोई जिक्र नहीं किया.एक बार उन्होंने मेरा लेखन acknowledge किया था जब किसी स्थानीय पत्रकार ने उन्हें धमकी दी थी कि वो पत्रकार है...उनके खिलाफ लिखेगा "  पापा ने  जबाब में कहा था ,'मुझे क्या धमकी दोगे,मेरी बेटी नेशनल मैगजींस में लिखती है' (ये बात भी पापा ने नहीं, उनके प्यून ने बतायी थी)


फिर धीरे-धीरे एक एक कर सारिका ,धर्मयुग,साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सब बंद होने लगे. मैं भी घर गृहस्थी में उलझ गयी. मुंबई में यूँ भी हिंदी के अखबार-पत्रिकाएं बड़ी मुश्किल से मिलते हैं....मिलते हैं...ये भी अब जाकर पता चला...वरना ब्लॉग्गिंग से जुड़ने के पहले मुझे पता ही नहीं था .... हिंदी से रिश्ता ख़तम सा हो गया था. अब ब्लॉग जगत की वजह से वर्षों बाद हिंदी पढने ,लिखने का अवसर मिल रहा है. and I am loving it .


(ये पोस्ट भी पिछली पोस्ट के बाद २००९ में ही लिखी थी...वैसे भी...अलग-अलग ब्लोग्स पर पोस्ट किये गए अपने पसंदीदा पोस्ट्स को इसी ब्लॉग पर ,एक जगह इकठ्ठा करने की इच्छा है...उन दिनों काफी कम लोगो को ही मेरे ब्लॉग की खबर थी...अधिकाँश लोगो के लिए यह नयी पोस्ट सी ही है )

52 comments:

  1. देश की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिक 'हंस ' ने पिछले साल एक स्तम्भ शुरू किया है 'जिन्होंने मुझे बिगाड़ा'... और वो स्तम्भ मैं नियमित पढने की कोशिश करता हूँ... बड़े रचनाकार होते हैं उनमे... लेकिन सच कहूँ.. जितना इस संस्मरण ने प्रभवित किया हंस के स्तम्भ के संस्मरण ने नहीं..... आगे कुछ नहीं कह सकता..

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  2. रोचक है संस्मरणों की रेल हम यात्रा कर रहे है ज़ारी रखिये ... किताबो की खुशबू ...हा हा हा
    मैंने भी बालहंस के अंक खोये है जिनमे बचपन में मेरी कहानी कविताएं छापी थी ...अनमोल

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  3. tumhari yaatra prabhawit to karti hi hai, main to tahedil se tumhari lekhni ka loha maanti hun

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  4. साहस भरा संस्मरण है, सहज व्यक्तित्व विकास सा प्रवाहमय।
    यह पल आपके जीवन के खूबसूरत अवसर है।

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  5. बेहद रोचक संस्मरण

    किताबों की खुश्बू वाला मामला तो अपने साथ भी है और विरासत में बिटिया को भी

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  6. सहज,धाराप्रवाह,रोचक संस्मरण.पढकर आनंद आया और यह पता ही नहीं चला कि कब लेख पूर्ण हों गया.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.
    मेरे ब्लॉग पर आपका इंतजार है.

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  7. मैंने पहली बार पढ़ा और यक़ीनन दूसरी बार भी होता तो उतना ही अच्छा लगता। सहज-सरल और मीठा है ये लेखन। किताबों की खूब सारी खुशबुएँ याद हो आयीं।

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  8. कैफ़ियत पसंद आई.
    बेहद संयत सी...
    माहौल तो था ही तुम्हारे आसपास, जो तुम्हें लेखन की ओर अग्रसर करता,और कुछ को तुम ख़ुद create कर लेती थीं... फ़िर शिवानी, सूर्यबाला और मालती जोशी को पढ़ना... वह भी एक साहित्यिक माहौल ही था न...!
    फिल्म समीक्षाएं भी तुम्हारी रुचिकर होती है.

    कुछ लोग बेहतर जिंदगी जीते है और बहुत बेहतर लिखते भी हैं, कुछ बेतरतीब जिंदगी
    जीते हैं, फ़िर भी बढ़िया लिखते हैं...कुछ शोहरत में जीते हुए भी काफी मौलिक लेखन
    करते हैं...

    रश्मि जी, तुम्हारा लेखन और सामाजिक सरोकार क़ाबिले क़द्र है. और आने वाले समय में
    पर्याप्त मौलिक लेखन तुमसे मिलता रहे यही अपेक्षा...

    खेल की बात करें तो, सच में तुम्हारे सिक्सर से भैय्या ज़रूर आहत हुए होंगे...

    मेरी शुरू की जॉब रेलवे में थीं. वहां मेरे साथ हमारे शहर के नामी all rounder क्रिकेटर
    भी जॉब करते थे. शाम पांच बजे हम ऑफ़िस के पीछे वाली संकरी गाली में आधा घंटा
    क्रिकेट खेलते थे(सीज़न बोल से)...एक दिन, जो एहतियात बरतनी चाहिए थी वह उन्हों ने न बरती और खेल के दौरान मैंने देखते ही देखते अपनी कसी स्पिन बोल से उन्हें दो बार बोल्ड कर दिया...!(मेरे लिए भी यह अप्रत्याशित सा था). पर उनकी हालत तो भीगी बिल्ली सी हो गई..."इस जंतु सरीखे बोलर नें मुझे दो बार बोल्ड किया ?" वह इतना खिसियाये की बाद के कई दिनों उन्हों ने मुझसे बात तक न की...

    मुंशी प्रेमचंद की 'गुल्लीडंडा' कहानी ज़रूर से पढ़ लेना...इसी रुग्ण भावना को उन्हों ने अपनी इस कहानी में पिरोकर साकार किया है...चिर स्मरणीय किया है...

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  9. तुम्हारी रोचक शैली प्रभावित करती है…………शानदार संस्मरण्। ऐसे ही किताबें पढने का शौक रहा है मुझे भी जैसे तुम्हें। कहीं भी कुछ भी मिल जाये बस पढने बैठ जाती थी और आज भी कुछ हद तक ऐसा ही हाल है।

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  10. हमने तो खूब क्रिकेट खेला और स्‍कूल और कॉलेज की टीम में खो-खो और बॉलीबाल में टूर्नामेंट में भी गए। खेल का माहौल तो हमारे मोहल्‍ले में हमारे कारण ही था। बस चले तो आज भी खेल के मैदान पर उतर जाएं। सूर्यबालाजी मेरी भी पसंदीदा रही हैं, उनसे न्‍यूयार्क में विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन में मिलना हुआ था। मुझे उनका व्‍यंग्‍य आज भी याद है जो उन्‍होंने "उसकी रोटी" फिल्‍म पर धर्मयुग में लिखा था। मैंने उन्‍हें बताया था कि मुझे वह व्‍यंग्‍य आज भी गुदगुदाता है। कई बार मन होता है मुम्‍बई में उनसे मिलने का, लेकिन इस बार तुम्‍हारे साथ मिलना तय हुआ। अभी उनका अमेरिका प्रवास पर अपनी पोती अन्‍ना के साथ के संस्‍मरण "अहा जिन्‍दगी" में प्रकाशित हुए थे बहुत ही श्रेष्‍ठ थे। अच्‍छा लगा संस्‍मरण।

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  11. @अजित जी,
    रुकिए पता करती हूँ...वो कहाँ रहती हैं...फिर साथ ही चलते हैं,उनसे मिलने.....मुझे भी उनकी कितनी ही कहनियाँ...संस्मरण...आलेख..अब तक याद हैं.

    बस चले तो आज भी खेल के मैदान पर उतर जाएं।

    आपके इस वाक्य ने कुछ याद दिला दिया...पिछले साल....हम सहेलियों ने 'नेट बॉल ' खेलना शुरू किया.....कई महिलाएँ जुड़ गयीं.....कोच हमारे खेल से इतने प्रभावित हुए कि 'महिलाओं के नेट बॉल टूर्नामेंट' आयोजित करने का प्लान कर लिया पर ढेर सारे..लेकिन....लेकिन जुड़ते गए....और अब तो खेलना भी छूट गया...:(

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  12. बहुत ही अच्छा संस्मरण बिल्कुल धाराप्रवाह कही रुकने का चांस ही नहीं | वैसे ब्लॉग लिखने से पहले रश्मि जी आप ने कितने साल पहले से लिखना पढ़ना छोड़ दिया था ,किन्तु छूटने के बाद भी लेखन पर आप की पकड़ बनी हुई है | मैंने लगभग तीन साल के लिए छोड़ा था और लगा की मुझे न तो अब कही की कोई खबर है और न ही अब दुबारा कभी लिख पाऊँगी एक साल से ऊपर हो गए ब्लॉग में लिखते किन्तु अब भी उतना अच्छा नहीं लिख पा रही हूँ |

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  13. बढ़िया क्रिकेट संस्मरण । लेखन आपका बचपन से ही शौक रहा , यह जानकर अच्छा लगा ।
    सुन्दर धाराप्रवाह लिखती हैं आप ।

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  14. @GGS
    पढ़ने का माहौल तो घर में बचपन से ही मिला...धर्मयुग....Illustrated Weekly जैसी पत्रिकाएं तो मेरे जन्म से पहले से ही घर में आती थीं.

    बचपन..नंदन..पराग..चंदा मामा पढ़ते गुजरा..

    'महाभारत' मैने आज तक नहीं पढ़ी...पर शायद 'चंदामामा' में महाभारत की कहानियों की श्रृंखला निकलती थी...वो कहनियाँ आज तक याद हैं और वहीँ से 'महाभारत' से परिचय हुआ.

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  15. @अंशुमाला जी,
    दिल थाम कर बैठिये...बेहोश होने के पूरे चांसेज हैं...:)
    पूरे १८ साल.....
    ना तो हिंदी की कोई किताब पढ़ी ना कोई पत्रिका......और लिखने का तो सवाल ही नहीं.

    लेकिन मैने पढना कभी नहीं छोड़ा....अंग्रेजी की पत्रिकाएं और किताबें खूब पढ़ीं...यानि कि साहित्य से दूर नहीं रही. शायद भाषा सिर्फ एक माध्यम है....भाव एक से ही होते हैं..

    और माशाल्लाह आप बहुत ही अच्छा लिखती हैं...मुझे नहीं लगता,आपके लेखन पर इस अंतराल से कोई फर्क पड़ा होगा....

    अपना लिखा,कब-किसे पसंद आता है :)......मुझे खुद ही हज़ार कमियाँ दिखती हैं...अपने लेखन में.

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  16. इस लेख को पढकर पुरानी यादें ताजा हो गयी .. बढिया संस्‍मरण !!

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  17. सचमुच अपने देश का आसमान बहुत करीब लगता है...स्कूल कॉलेज के दिन जैसे भूल ही गए..दुनिया के इस कोने की बन्द खिड़की की दरारों से जब जब मौका मिला उस तरफ की दुनिया को देखने की कोशिश हमेशा रही.... ब्लॉग के माध्यम से तो जैसे पूरी खिड़की खुल गई....धाराप्रवाह पढ़ने लगो तो रुकने को जी न चाहे...कमाल का धमाल करती हैं... अभी तो बहुत कुछ पढ़ना है यहाँ...
    किताबों पर याद आया कि छुट्टियों में भारत आने से पहले एक नोटिस निकलता लाइब्रेरी के लिए किताबें लाने का... बस उन्हीं का सहारा होता चाहे फिर वे स्कूल से ही जुड़ी हुई होती...

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  18. बढ़िया क्रिकेट संस्मरण

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  19. अपना पहले लिखा-छपा भी यहां लगाने पर विचार करें.

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  20. बहुत ही अच्छा संस्मरण इस लेख को पढकर पुरानी यादें ताजा हो गयी ...

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  21. रीना जी!

    आपने लिखना क्यूं छोड़ा था?
    ..

    पता में समस्तीपुर और मुज़फ़्फ़रपुर तो ठीक था, रांची का क्यूं दे दिया था?
    ...

    आप अपने फ़ैन्स के पत्रों का जवाब क्यूं नहीं देती थीं?
    ..

    ये कुछ और इसी तरह के कई प्रश्न हैं जो इस आलेख के माध्यम से बीते वर्षों में गुज़रते वक़्त मन में आए।

    कोई आलेख या संस्मरण पढ़ते वक़्त अगर उससे भावात्मक रूप से जुड़ जाए पाठक तो समझिए कि वह सफल है। और जब उसपर अपने संस्मरण सुनाने लगे तब तो बेहद सफल।

    अब आपके इस आलेख पर लिखने का और लिखते रहने का मन बन गया है।

    अऊंगा फिर ... फिर और फिर सुनाने।

    फिलहाल यही कि ...

    मैं जो अखबार पकड़ा (पहली बार) और पीछे से पढ़ने की आदत लगी तो आज भी पीछे से ही पढ़ता हूं, और सिर्फ़ उन्हीं एक-दो पृष्ठों तक का पढ़ना ही है आज भी मेरा अखबार पढ़ना है।

    एक और ... जब मुझे पहली छपाई के १५ रुपए मिले थे तो मैं जा कर एक बैडमिंटन का रैकेट खरीद लाया था, और उससे क़रीब ७-८ साल तक खेलता रहा।

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  22. बहुत सुंदर संस्मरण, सरिता, गर्ह शोभा, ओर कई पत्रिका हम ने यहां मगवाई थी, फ़िर बीबी के पास समय कम होने लगा उन्हे पढने का, मेरे पास तो बिलकुल भी समय नही होता था, इस लिये बंद कर दी, धन्यवाद

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  23. @ मनोज जी,
    रश्मि जी तक तो ठीक है...ये रीना जी....कोई नहीं कहता....बहुत ही अजीब लगता है,सुनने में :) .

    नहीं लिख पाने की वजह तो बता ही दी.

    समस्तीपुर में पापा की पोस्टिंग थी....मुजफ्फरपुर में मेरा कॉलेज और रांची...मेरा ननिहाल...और जन्मस्थान भी...दुनिया की सबसे प्यारी जगह...क्यूँ नहीं देती नाम :)

    भरोसा ही नहीं था कि वे सचमुच मेरे लेखन के फैन थे...इसीलिए कभी जबाब नहीं दिया...:)

    आप कितने लकी थे....कैश मिले आपको...मुझे भी चेक की जगह...पैसे मिले होते...तो कितनी किताबें खरीद चुकी होती...उन दिनों कहीं से भी पैसे मिलें...'किताबें ' ही खरीदी जाती थीं.......'सारा आकाश'...'आधे-अधूरे' ...मैक्सिम गोर्की की 'मदर' आदि....सब पैसे बचा कर ख़रीदे गए थे...इस लिस्ट में कुछ नाम और जुड़ जाते .

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  24. पढ़ते ही चले गये...रीना...रश्मि को....बड़ा पुराना सिलसिला है. अच्छा लगा कि ब्लॉग ने इसे पुनः स्थापित किया.

    सुन्दर और रोचक संस्मरण.

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  25. सच कहूं तो आपके इस संस्‍मरण से आपकी लेखन यात्रा की जानकारी भर मिली। पर लेखन के तौर पर इसने प्रभावित नहीं किया। शायद उसकी जरूरत भी नहीं। इसमें दी गई जानकारी मुझे नोट्स की तरह लगी। मेरा सुझाव है कि इन बातों को विस्‍तार से फिर से लिखना चाहिए। जैसा कि आपने खुद लिखा है आपकी यह पोस्‍ट 2009 की है। मुझे इसमें वह रवानगी नहीं दिखी जो आपकी आजकल लिखी जा रही पोस्‍टों में नजर आती है।
    पुरानी पोस्‍टों को फिर से लगाने का विचार अच्‍छा है,पर उन्‍हें इस नजर से एक बार जरूर देख लेना चाहिए।

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  26. दोनों भाग रोचक रहे। निष्कर्ष यह निकला कि आसमान तो अभी हाल झुक जायेगा, कहने भर की देर है।

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  27. हाँ हाँ.. अपने मुंह मियां मिट्ठू बनिए.. अब कोई तारीफ़ नहीं कर रहा है तो खुद ही अपनी तारीफ़ करते रहिये..
    पहले तो अपना सही सही नाम बताईये.. रीना..मीना..टीना.. याssss..... रविज़ा.... :)

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  28. इस तरह छपने रहना , फिर 18 साल बाद फिर से उसी प्रवाह में लिख पाना , आश्चर्यजनक और प्रेरणादायक है ... क्या पता कभी मैंने भी पढ़ा हो तुम्हे...कभी -कभी लगता है ना दुनिया कितनी छोटी है , कहाँ के लोंग कहाँ जाकर मिल जाते हैं ..
    पत्रों के जवाब क्यों नहीं दिए , समझा जा सकता है ...
    किताबों की खुशबू बेचैन करती है ,बस पढने को मिल जाए किसी भी तरह ...
    गूगल को धन्यवाद देना चाहिए फिर से ऐसी प्रतिभाशाली लेखिका से परिचय के लिए ...
    हमेशा की तरह रोचक संस्मरण !

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  29. @राहुल जी,
    अधिकांशतः मैं समसामयिक विषयों पर लिखती थी....एक ट्रेन यात्रा का संस्मरण जो साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपा था ,उसे यहाँ पोस्ट किया था

    http://rashmiravija.blogspot.com/2010/04/blog-post_19.html

    कहानियाँ तो तब की लिखी....'मन का पाखी' पर पोस्ट की है...अब भी चार-पांच कहानियाँ लिखी रखी हैं...उन्हें टाइप करके पोस्ट करना बाकी है.

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  30. @राजेश उत्साही जी,
    हमलोग तो बस लिख कर पोस्ट कर देते हैं....गुण-दोष तो आप पारखी लोग ही बताते हैं...
    आगे से ध्यान रखूंगी.

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  31. @ PD
    ये सब ब्लॉग्गिंग के तकाज़े हैं....अपने मुहँ मियाँ मिट्ठू बनना...तुम बच्चे हो...नहीं समझोगे...:) trade secret है :)

    और तुम 'रीना दी' कह सकते हो....सारे छोटे भाई बहन यही कहते हैं..:)

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  32. @वाणी,
    अब ये 'प्रतिहशाली ' कह कर embarrass मत करो...दो-चार टिप्पणियाँ कहीं टपक जाएँगी..."ऐसे प्रतिभाशाली कैसे कह दिया...कूड़ा-करकट लिखती हैं....विरोधियों की फौज कम नहीं...:)"

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  33. आठ्ठारह साल! रिप वॉन विंकल जैसी हस्ती हैं आप!
    वैसे ब्लॉगिंग की बदौलत हिन्दी से पुन: जुड़ने वाले हम सभी रिप वॉन विंकल हैं! जमाने बाद सो कर जगे!
    संस्मरण बहुत अच्छा लगा।

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  34. बहुत मजेदार रहा संस्मरण. पुराणी यादों का पूरा खजाना खोल दिया. बहुत सुंदर शुभकामनायें. आशा है अब निरंतरता बनी रहेगी.

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  35. पढ़कर बहुत अच्छा लगा, अतिशय बधाई। आप भविष्य में भी जन मानस को यूँ ही प्रभावित करती रहें।

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  36. ये सभी पत्रिकाएं एक एक कर बंद हो गयीं -लगता है अपुन का भी औचित्य अब खत्म हुआ ...

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  37. रविजा से तो मैं आपको मुसलमान समझता रहा काफी दिनों :)

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  38. बाप रे!!किसी भी सुपर फास्ट ट्रेन के सफर की तरह रही यह यात्रा.. दुआ है कि यह यात्रा यूं ही अनवरत चलती रहे!!

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  39. हम तो सब से कहते हैं....... "भाई अगर आपको ब्लॉग जगत में कुछ बेहतरीन पढने की इच्छा हो तो यहाँ पढ़ ले" ...... हम जैसे बाल-ब्लोगर्स भी लिखना सीखेंगे कभी आपके लेख पढ़ते पढ़ते .. यकीन है .. पक्का यकीन :)

    मेरा रीसेन्ट फेवरेट आपका लेख "बारूद के ढेर में खोया बचपन" है

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  40. और हाँ ..... आपके लिखे लेख मुझे किसी अच्छी पत्रिका पढने का सा ही एहसास दिलाते हैं

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  41. @अरविन्द जी,
    क्या फर्क पड़ता है...हिन्दू हों या मुस्लिम या इसाई यहाँ तो हम अपने लेखन के माध्यम से जाने जाते हैं.

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  42. बहुत दिलचस्प श्रंखला चल रही है आपकी स्मृति यात्रा की ! बहुत मज़ा आ रहा है ! व्यस्तता की वजह से कुछ देर से पढ़ पाती हूँ लेकिन पढती ज़रूर हूँ ! आप लिखती ही इतना अच्छा हैं कि बिना पढ़े रहा ही नहीं जाता ! मेरी बधाई और शुभकामनायें स्वीकार करिये और अगली पोस्ट ब्लॉग पर डालने की तैयारी में जुट जाइये जल्दी से !

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  43. प्रवाहमयी लगा आपका अपनी लेखन यात्रा को बताता संस्मरण..... बधाई अपने आत्मविश्वास को कायम रखने की.... सतत लेखन की शुभकामनायें ....

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  44. मेरे लिये भी नई पोस्ट है

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  45. संस्मरण आपके हम भी पढ़ रहें हैं लेकिन संस-मरण में यह "मरण "शब्द क्यों हैं ,संस्मरण तो बड़े सजीव होतें हैं हाड मांस के होते हैं .

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  46. मुझे ये संस्मरण पढ़ कर लग रहा है कि प्रियंका चोपड़ा वाले एड की कैचलाइन बदलवाने के लिए एड एजेंसी को लिखूं...

    Why should girls have all the fun ?

    जय हिंद...

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  47. यह संस्मरण अच्छा लगा ....शुभकामनायें आपको ! बेहतर है की सब पुराने लेख एक जगह पर हों , इससे न केवल आपको बल्कि पाठकों को भी आसानी होगी ! शुभकामनायें !!

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  48. रश्मि जी - आपके इस ब्लॉग पर पहली बार आई हूँ | बहुत धाराप्रवाह और सेल्फ कांफीडेंस भरा लिखती हैं आप | क्या साइड पर जो खूबसूरत पेंटिंग्स हैं - वे आपकी अपनी बनायी हुई हैं?

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  49. @सच है ,मगर फिर भी फर्क तो पड़ता ही है -अब इतना आयेडियलिस्तिक भी नहीं रह गया जीवन !

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  50. अपनी अतीत की गलियों में हमें भी सैर का मौका देने के लिए आभार...

    खूब रोचक ढंग से संस्मरण लिखा है आपने...

    आपकी ब्लॉग यात्रा सफल और सुखद रहे,यही मनोकामना है...

    सुन्दर लेखन के लिए शुभकामनाएं...

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