Wednesday, January 12, 2011

"वाइफ स्वाप" बनाम "माँ एक्सचेंज"

हमारे टी.वी. के सारे के सारे रियलिटी शोज़ किसी ना किसी विदेशी चैनल के शोज़ की नक़ल होते हैं...चाहे वो 'कौन बनेगा करोडपति' हो, 'बिग बॉस' हो, या फिर ,'इंडियन आइडल', 'रोडीज', 'मास्टर शेफ', 'जंगल में मंगल' या 'फिअर फैक्टर'. पर एक प्रोग्राम स्टार वर्ल्ड पर देखा करती थी और हमेशा हम फ्रेंड्स चर्चा करते थे कि इस एक शो की नक़ल नहीं की जा सकती. या इस शो पर आधारित कोई शो नहीं बन सकता और वो था  Wife Swap क्यूंकि हमें यकीन नहीं होता था कि भारत में कोई महिला यूँ तैयार हो जायेगी,नितांत किसी अपरिचित के घर में आठ दिन बिताने को. सिर्फ बिताने को ही नहीं,उसके घर की सारी जिम्मेवारी लेने को.

पर जब से सोनी चैनल पर "माँ एक्सचेंज ' प्रोग्राम के प्रोमोज आने लगे, हैरानी हुई कि यहाँ कि महिलाएँ भी तैयार हो गयीं, घर की  अदला-बदली को. आज इसके पहले एपिसोड का प्रसारण था. और मशहूर  मॉडल-अभिनेत्री पूजा बेदी एक मध्यमवर्गीय कॉमेडियन के घर आठ दिनों के लिए शिफ्ट हो गयीं और उनकी पत्नी 'अनुराधा' ,पूजा-बेदी के घर.


प्रोग्राम का फॉरमेट वही है जो  Wife Swap  का था. चार दिन महिला को उस घर के कायदे-क़ानून के अनुसार रहने पड़ते हैं और बाकी के चार दिन वो उस घर के सदस्यों के लिए अपने नियम बनाती है, जिसका पालन उन्हें हर हाल में करना होता है.


लेकिन दोनों प्रोग्राम की समानताएं बस यहीं समाप्त हो जाती हैं. Wife Swap में सचमुच ऐसा लगता था कि अनजान महिला, उस घर में आकर वहाँ के नियम के अनुसार रहने की कोशिश कर रही है. और घर वाले भी उसे उस घर की स्वामिनी  की तरह ही स्वीकार कर रहे हैं. पर जैसे हॉलीवुड फिल्मो के फूहड़ रीमेक बन कर रह जाती हैं...अपनी बॉलिवुड फिल्मे. ठीक वैसा ही ये प्रोग्राम है . इसमें बिलकुल जाहिर हो रहा था कि प्रोग्राम को मसालेदार बनाने के लिए, घर वालों  को निर्देश दिए गए हैं
.
पूजा बेदी के घर , अनुराधा (नई महिला)  के आते ही...पूजा की बेटी की सहेलियाँ आकर जोर-जोर से गाना बजा कर डांस करने लगती हैं. वे लोग अनुराधा के खाने में ढेर सारी मिर्च डाल देती हैं. पूजा की बाई भी उसे नए-नए तरीके से परेशान करती है.

वैसे ही पूजा बेदी के साथ उन कॉमेडियन का व्यवहार भी बहुत ही नकली और ओवर द टॉप लगता है. सहजता नहीं दिखती. अगर निर्माता-निर्देशक ,किसी प्रोग्राम की नक़ल ही करते हैं तो उसका पूरा कांसेप्ट समझ कर ईमानदारी से बनाने की कोशिश क्यूँ नहीं करते? उन्हें भारतीय दर्शक ,इतने बेवकूफ क्यों लगते हैं कि वे subtle comedy  नहीं समझ पायेंगे...या अन्तर्निहित बात उन्हें समझ नहीं आएगी...हर बात जोर-जोर से बोल कर हाव-भाव के साथ दिखानी जरूरी लगती है उन्हें.


अगर इस प्रोग्राम को ईमानदारी से बनाने की कोशिश की गयी होती तो शायद देखने लायक बन पड़ती पर इसमें अपनी सोच का तड़का लगा...बिलकुल ही जायका खराब कर दिया है.  फिर भी मनोरंजन के साधन के नाम पर सिर्फ टी.वी.प्रोग्राम पर ही निर्भर, हमारे देशवासी शायद ये प्रोग्राम भी नियमित देखें   और इसे हिट  बना दे.


दो शब्द पूजा बेदी के लिए. वे अपने कपड़ों..अपने बोलचाल से बिलकुल एक सोशल बटरफ्लाई ही लगती हैं...लेकिन इस प्रोग्राम में भी उनकी warm personality  उभर कर आई है. वे  जिस घर में गयी हैं,वहाँ सचमुच अपनी तरफ से सुधार लाने की और घर के सदस्यों को खुश रखने की कोशिश करती हैं.


मेरे आस पास भी पूजा बेदी के दो प्रशंसक हैं. एक तो मेरी सहेली,राजी जो काफी साल पहले, पूजा का इंटरव्यू लेने गयी थी...और पूजा ने बिना किसी नाज-नखरे के समय दिया था और बिलकुल एक सहेली की तरह बात की थी...अपने हाथ से कॉफी बना कर भी पिलाई थी उसे.

और दूसरा मेरा बेटा, उसके कॉलेज फेस्टिवल में सेलिब्रिटीज़ को आमंत्रित करने की जिम्मेवारी उसे सौंपी गयी थी. उसके अनुभवों  पर एक पोस्ट लिखी जा सकती है. कई सारे बहुत नामालूम  से सेलिब्रिटी ने बहुत रुड्ली बात की और कई लोगो ने बहुत विनम्रता और प्यार से. देवानंद अनजान नंबर देख भी , फोन उठाते हैं, और sing-song way...में थोड़ा गा कर बोलते हैं.."whooo iizz calling.." गेस्ट का आमंत्रण स्वीकार तो नहीं किया पर बात प्यार से की.


पूजा बेदी ने फोन पर भी नम्रता से बात की...अपनी गाड़ी से आयीं. प्रोग्राम से पहले आ गयीं...जल्दी जाने के नखरे नहीं किए. और जब अंकुर ने हाथ मिलाया तो एकदम से चिंता की "तुम्हारा हाथ गर्म क्यूँ है..तुम्हे बुखार लग रहा है" (उसे बुखार था..पर प्रोग्राम की वजह से जाना पड़ा) फिर उसकी तारीफ़ भी की कि ऐसा ही कमिटमेंट होना चाहिए..आदि"


शायद इसी से कहते है, कभी सहजता नहीं छोड़नी चाहिए...कब, हमारा कोई छोटा सा gesture.....हमारी कोई  छोटी सी बात,  किसी के दिल में जगह बना लेती है...हमें खबर भी नहीं होती

सुरेख सीकरी (सूत्रधार), पूजा बेदी अपने बच्चों के साथ, कॉमेडियन  राजू निगम अपने परिवार के साथ

36 comments:

  1. वे सारे कार्यक्रम विदेशी कार्यक्रमों की नक़ल नहीं उनके कॉनसेप्ट का कॉपीराईट जिनके पास है उनसे अधिकार हासिल कर भारतीय परिप्रेक्ष्य में बनाए गये सीरियल हैं... अब यह इस बात पर निर्भरकरता है कि उसे बनाने वाला क्रियेटिव दिमाग़ किसका है और वैसा ही उत्पाद सामने आएगा. अमूमन बिग बॉस और ऐसे जितने भी प्रोग्राम होते हैं उनमें रियलिटी नहीं होती सब स्टेज मैनेज्ड होता है... कौन बनेगा करोड़्पति मैंने लेबनॉन का प्रसारण देखा है और उसके प्रस्तुतकर्ता और अमित जी में ज़रा भी अंतर नहीं, वही शालीनता.
    इसलिये ये सारे कार्यक्रम एक सस्ती लोकप्रियता के लिये टीआरपी का खेल है...

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  2. अजी यह प्रोगराम हमारे यहां करीब दस साल पुराना हो चुका हे, अगर कहे तो आप को इस का लिंक ढुढ कर भेजे,इन ती वी वालो ने शर्म बेच खाई हे, ओर चोरी करते हे

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  3. आप यह शव्द गुगल मे लिखे ओर विडियो ढुढे, तो आप को यह प्रोगराम खुब मिलेगे,जर्मन भाषा मे
    frauentausch = ""वाइफ स्वाप"

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  4. इस धारावाहिक के एड देख कर उत्सुकता तो थी मगर अभी देखा नहीं है इसे ...

    इन धारावाहिकों की नाटकीयता बहुत बोर करती है ...मेरे दो पसंदीदा धारावाहिक भी आजकल नौटंकी करने लगे हैं :)

    किसी भी इंसान की सहजता ही ज्यादा प्रभावित करती है, कृत्रिम व्यवहार से आप कुछ दिनों तक किसी को प्रभावित कर ले , मगर अमिट छाप तो सरल ,सहज व्यवहार ही छोड़ता है , विशेषकर सेलिब्रिटीज़ का ..!

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  5. पता नहीं, क्या उभारने का प्रयास है? विशुद्ध मनोरंजन है, या कोई संदेश भी।

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  6. माया जगत का सच.

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  7. प्रिय,

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  8. आप को बता दू की जल्द ही स्टार प्लस पर Wife Swap भी प्रसारित होने वाला हो प्रोमो शुरू भी हो गये है | मै इन रियलटी शो कभी देखती तो नहीं कभी कभी एक दो झलक या उनके विज्ञापन से पता चलता रहता है की क्या हो रहा है जिससे मुझे साफ लगता है की सभी रियलटी शो में भाग लेने वाले रियल नहीं होते है सभी छोटे मोटे कलाकार होते है जो लाईम लाईट में आने के लिए टीवी पर दिखने के लिए कुछ भी करते है | पर वो अभिनय भी रियल नहीं करते है सब कुछ पहले से तय दिखता है लगता है सब नाटक कर रहे है एक एक दृश्य पहले से तय दिखता है | इन रियलटी शो को कभी भी रियल ना माने |

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  9. @सलिल जी,
    ठीक है...कोई कानूनी कार्यवाही ना कर कर डाले,इस डर से ये लोग कॉपीराईट का अधिकार ले लेते हैं...पर नक़ल तो पूरी की पूरी करते हैं...यहाँ तक कि 'सेट डिजाईनिंग' में ..'लोगो' में...जरा 'अमेरिकन आइडल' और 'इंडियन आइडल' के सेट और 'लोगो' देखिए...ऐसे ही बहुत सारे प्रोग्राम हैं.
    'जस्सी जैसी कोई नहीं ' में तो स्पेनिश प्रोग्राम "Ugly Betti " के चश्मे का फ्रेम तक कॉपी कर लिया था.

    अगर कोशिश करें...जरा दिमाग के घोड़े दौडाएं तो बहुत सारे कांसेप्ट हमारे देश में भी मिल जायेंगे ...पर जब पकी पकाई मिल रही है तो क्यूँ मेहनत करें.

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  10. @अंशुमाला जी,
    ओह!! ये स्टार प्लस पर भी इसी कंसेप्ट का प्रोग्राम....ये तो पता नहीं था...टी.वी. देखना कम ही होता है..पर पूरी तरह बेखबर भी नहीं रहती.
    मुझे भी ऐसा ही लगता है...'रियलिटी शोज़' में भाग लेने वाले 'रियल पीपल' नहीं होते. 'इमोशनल अत्याचार' में तो सारे participants फिल्मों में रोल के लिए संघर्ष करते लड़के-लडकियाँ ही थे.

    "माँ-एक्सचेंज' के प्रोमोज में भी एकाध चेहरे जाने-पहचाने लग रहे हैं.Small time actors ही होंगे. पर दर्शक तो बेवकूफ बनते हैं,ना. उनकी भावनाओं के साथ अच्छा मजाक है...वे बेचारे उनके दुख में दुखी और सुख में सुखी हो जाते हैं.

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  11. भारत में जितने भी रियल्‍टी शो हैं वे वास्‍तव में रियल हैं ही नहीं। सभी में एक बात कॉमन है कि वे पात्रों को बत्‍तमीज होना सिखाते हैं, यहाँ कहें तो जंगली बनाना। भारत की संस्‍कृति का मूल प्रेम है लेकिन इनकी सोच का मूल घृणा है। मैं तो आजकल ऐसे कार्यक्रम देखती ही नहीं, जहाँ केवल झगड़ना सिखाया जाता है।
    आपकी यह बात बहुत अच्‍छी लगी कि हमें हमेशा सहज रहना चाहिए, ना जाने कब और किसे हमारी सहजता अच्‍छी लग जाए।

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  12. पिछले दो साल से टीवी से दूर हूं इसलिए वहां क्‍या चल रहा है,कभी कभार यहां ब्‍लाग में पढ़कर ही पता चलता है। आपकी इस पोस्‍ट से पूजाबेदी का एक नया व्‍यक्तित्‍व सामने आया।

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  13. अच्छा कांसेप्ट है

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  14. कार्यक्रम में नाटकीयता ज़्यादा झलकती है रश्मि जी.

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  15. आपकी यह बात बहुत अच्‍छी लगी कि हमें हमेशा सहज रहना चाहिए, ना जाने कब और किसे हमारी सहजता अच्‍छी लग जाए। धन्यवाद|

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  16. रश्मि जी , हमें तो ये सारे रियल्टी शोज मोस्ट अनरियल लगते हैं ।
    सब ड्रामेबाजी लगती है ।
    जाने जनता क्यों बेवक़ूफ़ बनती है ।
    सेलेब्रिटीज के बारे में तो यह ही लगता है कि सफलता सर चढ़ जाती है इनके ।
    वैसे व्यक्तिगत अंतर तो होता है ।

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  17. मैं तो कोई सीरियल देखता ही नहीं, सिवाय सब टीवी के एक दो प्रोग्राम छोड़कर।
    आप भी क्यों देखती हैं, खास कर तब जब आप उनसे अच्छी कहानियां खुद लिख लेती हैं।

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  18. मैं क्या कहूँ.... टीवी सीरियल्स वैसे भी नहीं देखता... और वैसे भी टीवी खोले हुए ज़माना हो गया... क्या चल रहा है कुछ पता ही नहीं है... लेकिन आपकी पोस्ट पढने के बाद यह ज़रूर लगा कि आपने बहुत ही अच्छा एनालिसिस किया है...

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  19. दो शब्द पूजा बेदी के लिए......इस प्रोग्राम में भी उनकी warm personality उभर कर आई है. वे जिस घर में गयी हैं,वहाँ सचमुच अपनी तरफ से सुधार लाने की और घर के सदस्यों को खुश रखने की कोशिश करती हैं.
    .....
    पूजा बेदी ने फोन पर भी नम्रता से बात की...अपनी गाड़ी से आयीं. प्रोग्राम से पहले आ गयीं...जल्दी जाने के नखरे नहीं किए. और जब अंकुर ने हाथ मिलाया तो एकदम से चिंता की "तुम्हारा हाथ गर्म क्यूँ है..तुम्हे बुखार लग रहा है" (उसे बुखार था..पर प्रोग्राम की वजह से जाना पड़ा) फिर उसकी तारीफ़ भी की कि ऐसा ही कमिटमेंट होना चाहिए..आदि"
    .........

    शायद इसी से कहते है, कभी सहजता नहीं छोड़नी चाहिए...कब, हमारा कोई छोटा सा gesture.....हमारी कोई छोटी सी बात, किसी के दिल में जगह बना लेती है...हमें खबर भी नहीं होती

    मैंने आप की पोस्ट में लिखी ये लाइनें बार बार पढ़ी क्योंकि यह बहुत बढ़िया लिखा है...

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  20. रश्मि बहना,
    तुम्हारे पास रिसोर्सेज़ भी है, क्रिएटिविटी भी है, शार्प ब्रेन भी है...मायानगरी में ठिकाना है...सब कुछ तो टेलरमेड है...पतिश्री खुद इस लाइन को बड़ी बारीकी से समझते हैं...

    टीवी के लिए अपना ही कोई प्रोजेक्ट क्यों नहीं शुरू करतीं...अच्छे कंसेप्ट के लिए बड़े प्रोडक्शन हाउस भी लालायित रहते हैं...

    अगर इंट्रेस्टेड हो तो एक कंसेप्ट मैं बताता हूं, उसे डेवेलप करो...

    जय हिंद...

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  21. बहुत सुन्दर . लोहड़ी और मकर संक्रांति की शुभकामनायें

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  22. सहजता ही ज्यादा प्रभावित करती है!! सटीक निष्कर्ष!!
    उतरायण :मकर सक्रांति,लोहड़ी और पोंगल की शुभकामनायें!! धान्य समृद्धि अविरत रहे।

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  23. @खुशदीप भाई,
    बहुत बहुत शुक्रिया...इतना कुछ देख लिया...आपने मेरे लेखन में.
    मेरी पहली कहानी पढ़ कर भी अपने कहा था, स्क्रिप्ट राईटिंग वगैरह की कोशिश करने के लिए...देखती हूँ.
    सलाह और हौसलाफजाई के लिए फिर से शुक्रिया.

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  24. कई साल पहले अमेरिका में ये प्रोग्राम देखे थे तब मैंने भी यही सोचा था कि इस प्रोग्राम का रीमेक भारत में बनाना मुश्किल होगा ! एक दूसरा प्रोग्राम भी था जो इसी फॉर्मेट पर आधारित था 'द ट्रेडिंग वाईव्ज़' ! भारत में लोग सही अर्थों में नक़ल भी नहीं कर पाते ! मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ !

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  25. दी, मुझे तो लगता है कि अपने यहाँ रियलिटी शोज़ ज्यादा नौटंकी वाले होते हैं. इसलिए मैं तो बस डांस शोज़ देखती हूँ. डी.आई.डी. मेरा फेवरेट है.
    हमारे निर्देशक चाहे हालीवुड की फिल्मों की नक़ल करें या वहाँ के टी.वी. शोज़ की, अपनी बेकार की क्रिएटिविटी डालकर उसे भौंड़ी नक़ल बना देते हैं.

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  26. दिक्कत यह है कि चाहे जैसे भी हों ये सभी प्रोग्राम चल भी जाते हैं।

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  27. खतरनाक रिव्यू है।
    ट्रेलर तो देखे हैं मगर पता नहीं क्यूं शो देखने का मन नहीं कर रहा था। इस आर्टिकल के बाद जरूर देखने का मन कर रहा है

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  28. दीदी मैं तो टी.वी ज्यादा देखता ही नहीं, वैसे अभी घर पे हूँ तो इस सीरियल के प्रोमो देख रहा था कुछ दिनों से...मुझे तो पता भी नहीं था की ये किसी सिरिअल का कॉपी है...वैसे बात तो सही ही है की अधितकर सिरिअल कॉपी ही होते हैं..:)
    वैसे मुझे तो बड़ा अजीब सा सिरिअल लगा...इसलिए मैंने देखा भी नहीं अब तक :)

    अच्छा हाँ, पूजा बेदी कुछ हद तक मुझे भी पसंद है :)

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  29. रश्मि, टीवी के कार्यक्रम बहुत अधिक तो नहीं देख पाती मैं, लेकिन हां "कौन बनेगा करोड़्पति" मेरा
    पसंदीदा कार्यक्रम है. जब इसका प्रसारण हो रहा था, तब मैं नियम से इसे देखती थी. अमिताभ जी का प्रस्तुति करण शालीन और आत्मीय होता है. इसका मूल विदेशी कार्यक्रम मैने देखा नहीं.
    तुम्हारे रिव्यू के बाद एक बार ज़रूर देखूंगी अब. कुछ सेलिब्रिटी भी बहुत अच्छे स्वभाव के और मिलनसार होते हैं. फ़िल्मी कलाकारों से तो कम लेकिन अन्य नामी-गिरामी हस्तियों से अखबार के चलते मुझे भी मुलाकात के मौके मिले, पूजा बेदी की मां-प्रोतिमा बेदी से मेरी मुलाकात खजुराहो डांस फ़ेस्टिवल के समय हुई थी, वे भी बहुत मिलनसार महिला थीं.

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  30. पूंजीवाद मे सबकुछ जायज है । अगर कोई विवाद होता है तो न्यायालय कहता है कि अगर आपको न देखना हो तो टीवी बंद कर ले, कल को ये पोर्न फिल्मे दिखायेंगे और बोलेंगे ना देखना हो तो टीवी बंद कर ले ।

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  31. ईडियट बक्सा न जाने क्या क्या दिखाता है?!

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  32. सचमुच हम बड़े नकलची हैं मगर नक़ल की भी अकल नहीं है -मौलिकता से तो हमारा नाता ही नहीं लगता इन भोंडे सीरियलों को देखकर !

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  33. तौबा तौबा वही शोज ना ..... रियेलिटी, जिसमे परदे में पीछे बहुत बड़े खेल होते है . सब इसारे पर जनता को मुर्ख बनाकर टी. आर. पी. बढवाना और फिर विज्ञापन बटोरना, सब सोंची समझी साजिश है , न की रियेलिटी . अब भला मुझे तो विश्वास नहीं की डोली बिंद्रा जी अपने घर में भी ऐसे गली देती होंगी. चलिए अब इस पोस्ट से पता चला तो एक शो इसका भी जरूर देखेगे.

    आखिरी पंक्तिया बहुत ही प्रेरणाप्रद है. सच कब क्या क्लिक कर जाय इसलिए पोजिटिव एटीटयुद जरुरी है. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति.

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  34. मुझे तो ;लगता है ऐसे शो देखना केवल समय की बर्बादी है। सस्ती लोकप्रियता और पैसे का खेल है। शुभकामनायें।

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