Wednesday, November 17, 2010

आज जानिये,शाहिद मिर्ज़ा, विवेक रस्तोगी, रवि धवन, राजेश उत्साही, इस्मत जैदी,राम त्यागी और मेरे भी :( बचपने के किस्से

शाहिद मिर्ज़ा जी की शरारत  

मेरे एक परिचित नसीम खान (नाम बदला हुआ है) अपनी बेग़म (जो घर से बाहर हमेशा बुर्के में रहती हैं) के साथ ईद की खरीददारी करते हुए बाज़ार में मिल गए. दुआ सलाम के दौरान एकाएक मुझे शरारत सुझी,
और बड़ी संजीदगी के साथ नसीम ख़ान से पूछा- ’भाभी के पास कई बुर्के हैं क्या’
उनका जवाब भी इसी अंदाज़ में मिला ’हां कई हैं....क्यों?”
मैंने कहा- ”बस ऐसे ही पूछ लिया....वो परसो आप बाइक से जा रहे थे तो भाभी को सुरमई रंग के बुर्के में देखा था”
मेरी इस शरारत पर वो बस हलके से मुस्कुरा दिए और खरीददारी में मशगूल हो गए.
तब तो बात आई-गई हो गई, लेकिन रात में नसीम भाई का फोन आया...कहने लगे ये तुमने हमारे घर में क्या हंगामा करा दिया....लो तुम ही समझाओ अपनी भाभी को....परसो मेरे साथ कौन थी और कैसे बुर्के में थी...
अब क्या बताएं..कि भाभी को ये समझाने में कितनी मशक्कत करनी पड़ी कि यूंही मज़ाक किया था.  
चलते चलते अपना एक शेर भी हाज़िर है-
 
सुनाते रहना परियों की कहानी
ये बचपन उम्र भर खोने न देना


 अगले ब्लॉगर्स मीट में सब विवेक जी से अपनी आइसक्रीम दूर ही रखें.

मैं तो बेटे के साथ ही बच्चा बन जाता हूँ, और हम दोनों की सबसे मनपसंद चीज है मीठा, फ़िर वह कुछ भी हो बस मीठा होना चाहिये जैसे कि गुड़, चाकलेट, केक, मिठाई, आईसक्रीम कुछ भी।
 

मैं अपने मीठे में से शेयर करना बिल्कुल पसंद नहीं करता हूँ और न ही मेरा बेटा, परंतु जब भी आईसक्रीम आती है तो मेरा बेटा फ़टाफ़ट अपनी आईसक्रीम खत्म कर लेता है, और फ़िर हमें प्रवचन देता है कि अपनी चीजें शेयर करके खानी चाहिये, हम हर बार अपनी आईसक्रीम शेयर कर लेते हैं।
विवेक जी अपने सुपुत्र हर्ष के साथ

एक दिन फ़िर आईसक्रीम आई तो हमने जल्दी जल्दी अपनी आईसक्रीम खत्म कर ली और फ़िर अपनी चम्मच बेटे के पास लेकर पहुँच गये कि चलो अब हमसे अपनी आईसक्रीम शेयर करो, बेटे हमारा मुँह देख रहा था और फ़िर चुपचाप अपनी आईसक्रीम में से १-१ बाईट खिलाता रहा, फ़िर जब बहुत ही अति हो गई तो हमसे बोला कि नहीं बच्चे शेयर नहीं करते केवल बड़े शेयर करते हैं।

हम भी अपनी चम्मच लेकर उनकी आईसक्रीम के पास डटे रहे कि नहीं हम तो शेयर करके ही खायेंगे। और जब तक आईसक्रीम खत्म नहीं हो गई तब तक अपने बेटे के साथ बच्चा बनकर उसकी आईसक्रीम खाते रहे।
 
रवि धवन के हनुमान  बम और अनार बम
 

ब्लॉग सभा में सबके सामने अपनी ही ठांय करना मजेदार लग रहा है। साथ ही बच्चों वाले काम के बारे में बताते-बताते यह भी महसूस किया अब आगे से कुछ न कुछ बच्चों वाले काम करते ही रहना है। क्या पता, फिर से ठांय करनी पड़ जाए। और कोई कह दे 'तू बच्चा है क्या।'
 
'हाल में तो कुछ नहीं किया। चार माह पूर्व मैं अपने चार साल के भतीजे और ढाई साल की भतीजी को लेकर पार्क में घूमने चला गया। भतीजे को प्यार से हनुमान बम और भतीजी को अनार बम कहकर बुलाते हैं। नाम से पता चल गया होगा कि दोनों कितने खतरनाक होंगे। तो जी, पार्क में पहुंचते ही दोनों ने दौड़ लगाना, दूसरों के पाले में घुसकर सामान उठाकर लाना और हल्ला मचाना शुरू कर दिया। मुझे भी जाने क्या सुझा, मैं भी उनके साथ घुटनों पर रेस लगाने लगा। अपने साथ लाया सारा सामान चॉकलेट, पॉपकॉर्न और फुलवडिय़ां पूरे पार्क में हम तीनों ने बिखेर कर रख दी। कुछ मिनटों बाद मुझे लगा कि कुछ गड़बड़ है यार। इधर-उधर देखा तो आसपास के लोग हमें घूर रहे थे। मैंने सोचा, बेटा गड़बड़ हो गई इन शैतानों के चक्कर में। मैंने चुपके से पार्क में बिखरे सामान को समेटा और दोनों को स्कूटी पर बैठाकर वापस घर लौटने में ही समझदारी दिखाई।  एक ने तो बोल ही दिया था 'पागल' हैं तीनों। पर मेरे नजरिए में वो पागलपन के कुछ पल बड़े मजेदार थे।
 
दीदी आपकी परिचर्चा ने अंतर्मन को झकझोर दिया। हमारे दोनों बम भले ही आज शैतानियां कर रहे हैं। पर दोनों का
 बचपना भी कब तक रहेगा। वो भी एक दिन हमारी तरह {समझदार (?)} हो जाएंगे।

 इस्मत जैदी का अहद ए तिफ़्ली .....


अरे रश्मि जी ! ये तो आप ने मेरा प्रिय विषय  याद दिला दिया ,ये जीवन का  वो दौर है जिसे हम प्रतिदिन ,प्रतिपल याद करना  और जीना चाहते हैं लेकिन ज़िम्मेदारियों और हालात के बोझ तले 
ये सुखद एहसास दबने लगता है ,फिर भी मैं तो अक्सर ही जीवन के इन बहुमूल्य क्षणों को जीने की कोशिश करती रहती हूं ,जब मेरा बच्चा छोटा था तो उस के बहाने से मैं ग़ुब्बारे लाया करती थी जब कि उसे कभी शौक़ नहीं था और मैं उस के बहाने से खेलती थी ,आज भी मैं खिलौनों की दुकानों की ओर आकर्षित हो जाती हूं 
मैं गोवा में हूं और यहां बारिश बहुत होती है ,बरसात के मौसम में हमारे यहां  काग़ज़ों का बहुत इस्तेमाल होता है कश्तियां बनाने  के लिये ,हालांकि यहां बारिश का पानी रुक नहीं पाता लेकिन फिर भी मैं बारिश के तेज़ होते ही जल्दी जल्दी काग़ज़ी कश्तियां ले कर नीचे भागती हूं और अगर थोड़ी दूर भी उसे बहता हुआ देख लूं तो जो  ख़ुशी मिलती है वो बयान नहीं कर सकती ,
मुझे ऐसी कोई ’एक’ बात याद  नहीं  जो मैं यहां लिख सकूं ,क्योंकि जब भी समय मिला मैंने अपना बचपन जीने की कोशिश की  कभी बारिश में नाव चला कर कभी ग़ुब्बारे  और छोटी छोटी कारें खेल कर ,कभी अपने बच्चे के प्रोजेक्ट का नन्हा सा घर बना कर ,कभी उस के साथ उस के खेलों में हिस्सा लेकर ,बस अलग अलग वक़्तों में अलग अलग तरीक़े अपना कर 
मेरा मानना है कि जीवन के अंतिम क्षणों तक हर व्यक्ति में एक बच्चा छिपा होता है जो उसे समय समय पर अपने होने का एहसास दिलाता रहता है  ,अब ये हम पर निर्भर है कि हम उसे जगा कर रखें या थपक थपक कर सुला दें ,अगर जगा कर रखेंगे तो ये हमें रोने नहीं देगा , हमें परेशानियों में भी ख़ुश रहने की शक्ति  देगा ,मेरी कोशिश तो यही होगी कि इस जज़्बे को हमेशा सहेज कर रखूं 

 हैप्पी बर्थडे राजेश उत्साही जी (बिलेटेड ही सही )
बात तबकि है जब हम तीसरी कक्षा में पढ़ते थे। मप्र के मुरैना जिले की सबलगढ़ तहसील के एक छोटे से रेल्‍वे स्‍टेशन इकडोरी पर पिताजी की नियुक्ति थी। गांव कोई दो-तीन किलोमीटर दूर था स्‍टेशन से। गांव का नाम रघुनाथपुर था। रेल्‍वे स्‍टेशन के आसपास बस स्‍टाफ के चार पांच परिवार ही रहते थे।
 यह वह दौर था जब चम्‍बल के बीहडों में माधोसिंह और मोहरसिंह जैसे दस्‍यु सरदारों के नाम से सारा इलाका कांपता था। सो हर गांव में सुरक्षा के लिए पुलिस की एक अतिरिक्‍त टुकड़ी हमेशा रहती थी।
 दिवाली की रात थी। हम रेल्‍वे प्‍लेटफार्म पर फटाके फोड़ने में जुट थे। पिताजी ने ग्‍वालियर से रस्‍सी बम लाकर दिए थे। सुनसान होने के कारण फटाकों की आवाज बहुत तेज गूंज रही थी।  मैंने एक बाद एक करके आठ दस बम फोड़ डाले।
 थोड़ी देर बाद क्‍या देखता हूं कि पांच-छह पुलिस वालों का दल गांव की तरफ से दौड़ता चला आ रहा है। जब दल पास पहुंचा तो मुझे देखकर उन्‍होंने कहा, ‘अरे मुन्‍ना तुम हो।’ मैंने सोचा भला इन्‍हें मेरा नाम कैसे पता चला। बचपन में मुझे घर में मुन्‍ना ही कहा जाता था। ये तो बाद में समझ आया कि छोटे लड़कों को मुन्‍ना और लड़कियों को मुन्‍नी सामान्‍य तौर पर कहा जाता है।
 खैर मुझे कुछ बात समझ में नहीं आई। तभी उनमें से एक बोला,  ‘मुन्‍ना अब फटाके चलाना बंद कर दो।’
 मैंने कहा, ‘क्‍यों।’
 ‘अरे बेटा गांव वाले समझ रहे हैं कि डाकू आ गए हैं। सब डर के मारे अपने अपने घरों में बंद हो गए हैं। तुम्‍हारे फटाकों की आवाज सुनकर वे अपनी पूजा-पाठ भी भूल गए हैं।’ उनकी बात सुनकर मैं फटाके चलाना भूल गया।
 कोई दिवाली याद रहे न रहे पर यह दिवाली भुलाए नहीं भूलती। और मित्रों आप में से कई जान चुके होंगे और जिन्‍होंने न जाना हो वे जान लें कि अपन चाचा जी से एक दिन पहले पैदा हुए थे। यानी 13 नवम्‍बर को। तो अपन को हैप्‍पी बर्थ डे बोलना मांगता
  
बच्चों के साथ बच्चों सी शरारत राम त्यागी जी की 
 
यहाँ निकुंज की soccer क्लास के अंत के दिन (हर सीजन के ) ये लोग पेरेंट और बच्चों के बीच एक गेम रखते हैं, किसी का पिता तो किसी की माँ तो किसी के ग्रांड पेरेंट्स एक पक्ष में रहते हैं तो बच्चे दूसरे पक्ष में ! उस दिन बच्चों के उत्साह देखने का रहता है , और हम लोग भी अपनी पूरी ताकत जीत के लिए झोंक देते हैं पर बच्चों की टीम हमें जीतने ही नहीं देती एक भी बार - इस समय जब निकुंज (और अन्य) बच्चों की टीम जीतती है तो हार में भी खुशी का वो अहसास होता है जिसको शब्दों की सीमा में नहीं बाँध सकता !
 
जब बच्चो के साथ WII गेम खेलता हूँ तो बस दोनों बाप बेटो में जो लड़ाई होती है उसका शोर तो बगल वाले घर तक भी जाता है और तब मेरी पत्नी को कहना ही पडता है की डैडी से मत लड़ो वो तो बच्चों से भी ज्यादा बच्चे हो जाते हैं,  जब निकुंज जीतने वाला होता है तो उसको  चिड़ा चिड़ा कर हराने में जो मजा आता है उसको क्या बयां करूँ, हाँ अंत में स्पोर्ट्स में हार मेरी ही होती है पर ये हार भी निराली होती है - आनंद देने वाली हार 
 
एक बचपन का किस्सा याद आ रहा है,  तब शायद में और मेरी बुआ का लड़का दोनों ही आठवीं कक्षा में थे, दो भाई एक कक्षा में थे तो ज़रा दादागिरी भी चलती थी. एक बार मास्साब को कक्षा के दरवाजे पर खड़े होकर उनके सेवक बनकर बोल दिया कि पधारिये महाराज !!  और पूरी क्लास हंस पड़ी फिर क्या था मास्साब का गुस्सा असमान पर और मुंह लाल , जड़ दिए कई डंडे और तमाचे धडाधड  :(  ऐसे तैसे पीरियड पूरा हुआ  तो जब मास्साब निकल गए तो जैसा होता है कि एक लडके ने चिडाने के कोशिश करी तो तब तो कुछ नहीं बोला, और बाद में मैं और मेरा भाई उसे बाहर दोस्त बनाकर ले गए और उसकी धुनाई कर दी , लड़का गोरे रंग का था तो मुंह लाल हो गया और बाटा के जूतों के निशान साफ उसकी व्यथा परिलक्षित कर रहे थे , बाद में घर तक बात आई तो घर पर फिर हम दोनों की खिंचाई हुई  - अब सोचता हूँ तो बड़ा मजाकिया किस्सा लगता है :-)  
 
तंगम और राजी 
मेरी  नहीं, ये सब 'राजी' और 'तंगम' की कारस्तानी थी

जब भी कोई कह देता है..'बिलकुल बच्चों जैसी हरकतें हैं'....' बच्ची हो बिलकुल ' तो एक पल को ठिठक कर अपना बड़ों वाला लबादा ओढ़ लेती हूँ फिर पता नहीं कब वो लबादा खिसक जाता है और युज़ुअल सेल्फ में लौट  आती हूँ.... अगली बार टोके जाने तक :)

पर ये बचपना खासकर तब अपने शिखर पर होता है जब सिर्फ सहेलियों या  कजिन्स या  बच्चों का साथ हो. पिकनिक जाने पर दौड़कर झूला लूट लेना, बच्चों वाली see-saw पर जबरदस्ती किसी तरह बैठ जाना और एक सहेली को ऊपर ही टंगे रहने देना...चाहे वो कितना भी चिल्लाये. कोरस में गाना गाना तो चलता ही रहता है.
अभी हाल में ही कुछ सहेलियाँ और  बच्चे एक वाटर पार्क में गए. वहाँ हमारी शरारतें  देख, बच्चे दूर छिटक गए. शायद ईश्वर से मना रहें थे कि कोई पूछ ना बैठे, ये आपकी  मॉम्स हैं ??  :) (अब बड़े हो गए हैं तो उन्हें अपनी freedom भी चाहिए होंगी.)

वहाँ हमने wave pool  में गोल घेरा बनाकर घूमते हुए सारे नर्सरी राइम्स गा डाले. ऊँची ऊँची तेजी से घूमती राइड्स पर जोर से चिल्लाने की छूट भी थी. अब उम्र हो गयी है तो क्या , डर तो लगता ही है. पर पति और बच्चों के साथ उस तरह तो नहीं चिल्ला पाते, सहेलियों के साथ तेज आवाज़ में चीखते रहें और डर भी इतना कम हो गया कि २,३, बार एक ही राइड पर गए.{ आपलोग  भी आजमा सकते हैं...जोर से चिल्लाते रहने पर सचमुच डर नहीं लगता :)} पर सबसे मजा हमने लेज़ी रिवर में किया (लेज़ी रिवर एक लम्बा  सा पूल होता है जिसपर आप एक बड़ी सी ट्यूब पर अधलेटे से  होते हैं और वह धीरे धीरे बहती रहती है) वहाँ हम सबने एक दूसरे के हाथ पकड़ एक लम्बी सी चेन बना ली और किसी को भी आगे आने ही नहीं देते थे. दरअसल हमारे ग्रुप को देख, बाकी लोगों के चेहरे पर भी लम्बी सी मुस्कान खींची हुई थी.
पद्मजा,लवीना,शर्मीला,मैं और वैशाली


इस तरह के मौके तो अक्सर आ ही जाया करते हैं पर कभी कभी ये बचपन वाली हरकतें बहुत एम्बैरेसिंग भी हो जाती हैं. हम सहेलियों की एक आदत है. किसी का बर्थडे हो तो बाकी सब एक साथ 'हैपी बर्थडे '  गाकर उसे विश करते हैं. कभी-कभी सड़क के किनारे बच्चों के स्कूल बस का इंतज़ार करते हुए भी. दूर से ही बर्थडे गर्ल को आते देख  ,हम गाना शुरू कर देते हैं . हमारे बच्चे मुहँ फेर कर खड़े हो जाते हैं. एक बार मैं और 'राजी' कार से मॉर्निंग वाक के लिए गए थे (अब, इसमें हंसने जैसा क्या है...जब ज्यादा फल सब्जी  लानी हो तो कार लेकर जाना ही पड़ता है ) अपनी वाक  ख़त्म कर, सारी खरीदारी कर हम घर की तरफ आने लगे तो याद आया, आज 'वैशाली' का बर्थडे है. बस मैने किनारे गाड़ी खड़ी की और ध्यान नहीं दिया कि वो जगह सीनियर सिटिज़न की थी ( यहाँ जगह जगह शेड बने हुए हैं, वहाँ कुछ बेंच और अखबार सीनियर सिटिज़न के लिए रखे  होते हैं )जैसे ही मोबाइल का   स्पीकर ऑन कर हम दोनों ने 'हप्पी बर्थडे' गाना शुरू किया .दो बुजुर्ग गाड़ी के सामने आ कर कुछ - कुछ  बोलने लगे. अंदर जाने का रास्ता कार ने ब्लॉक कर रखा था . शीशे ऊपर होने की वजह से सुनायी तो नहीं दे रहा था. पर आँखों  और हाथों की मुद्राओं से लग रहा था, वे बड़े गुस्से में हैं. अब बीच में गाना कैसे रोकें? खैर जल्दी से गाना ख़त्म कर  विश किया, सुना भी दिया ,'तेरी वजह से डांट पड़ रही है' और गाड़ी लेकर भागी. ऐसे ही महिला ड्राइवर बदनाम होती हैं..दो बातें और जुड़ गयीं.

शर्मीला, वैशाली,मैं,तंगम और अनीता
पर सबसे ज्यादा अंक ले गयी, तंगम के साथ की गयी हरकत ने. उस दिन 'राजी' (हमारी योगा टीचर ) के बिल्डिंग की लिफ्ट बंद थी और योगा क्लास में सिर्फ मैं और तंगम थे. सातवीं मंजिल से हमें सीढियां उतर कर आना था. दो सीढ़ी उतरते ही मैने तंगम को टोका, "क्या बच्चों जैसा  धप धप करके चल रही हो....बहुत आवाज़ कर रही हैं तुम्हारी चप्पलें" उसने शैतानी से थोड़ी और आवाज़ की .मैं  हंसने लगी  तो मेरा हाथ पकड़ कर बोली, "लेट्स, डू इट टुगेदर " और फिर हम दोनों, बच्चों की तरह चप्पल  फटकारते धप धप आवाज़ करते सीढियां उतरने लगे. हर फ्लोर पर  सशंकित हो देखते ,'अभी कोई दरवाजा खुलेगा'. और अपनी स्थिति का ख्याल ना कर हम सामने वाले का सोचने लगते कि वे बच्चों की जगह दो महिलाओं को देखेंगे तो क्या हालत होगी उनकी ?. पर किस्मत अच्छी थी, एक भी दरवाज़ा नहीं खुला और हंसी से दोहरे होते हम बिल्डिंग से बाहर निकल आए. वाचमैन भी हमें हैरानी से देख रहा था.ग्राउंड फ्लोर से एक आंटी भी पर्दा खिसका कर देखने लगी, 'इन पागलों सी हंसी का राज़ क्या है'

पर ये सारा आइडिया तंगम का था, मेरा नहीं ,(तंगम  के बनाए स्वादिष्ट केक और चौकलेट्स की तस्वीरें इस लिंक पर देखी  जा सकती  हैं) हाँ! इस परिचर्चा का आइडिया  मैने चुरा लिया वहाँ से.

{आप सबका बहुत बहुत शुक्रिया, इस 'परिचर्चा' को सफल बनाने के लिए.
आप  लोगों ने समय  निकाल कर अपने संस्मरण हमसे बांटे  और फिर सबने पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया भी दी. सबको कोटिशः धन्यवाद .

अब यह परिचर्चा इतनी पसंद आई तो फिर आपलोग तैयार रहें...कभी भी कोई सवाल आपके इनबॉक्स में टपक पड़ेगा :)}

50 comments:

  1. बहुत मजेदार किस्से हैं और क्यूट भी. अब चाहे कोई इन्हें पागलपन कहे या अतिशयोक्ति .जो है वह तो है. मन बच्चा है तो अक्सर बालपन पर आ ही जाता है.बहुत प्यारा रहा ये बाल दिवस का सफर .आभार रश्मि!

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  2. शाहिदजी , किसी का घर फोड़ना अच्छी बात नहीं है ...:)
    विवेकजी को कैसे कहे कि बच्चों की आइसक्रीम शेयर न करें ...

    इस्मत जी कन्नी काट गयी ...एक शरारत तो बयान करनी ही थी !

    चप्पलों की धम -धम सुनकर कोई नहीं आया ...मुंबई है ना ...एक साथ एक जैसी इतनी सरी फ्रेंड्स (पहले तो मुझे लगा कि सब बहने हैं)और हंगामा ना हो ...वो सार्वजनिक स्थान हो या घर ...
    योगा करने से काफी दुबली हो गयी हो:):)

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  3. अच्छा रहा बचपने का यह सफ़र ...!

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  4. @मैडम वाणी,
    योगा पिछले ५,६ साल से करती हूँ...ना तो वजन घटता है ना ही बढ़ता है..और पता है एक बुजुर्ग जैसी समझदार सहेली से यही शिकायत की तो उसने दुबले होने का मूल मन्त्र बताया Be less Happy
    हा हा हा ये कहाँ संभव है.

    इसलिए चलता रहता है....हाँ , किसी फोटो में दुबली किसी में मोटी लगती हूँ..पर परवाह कैसी :)

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  5. बचपन के दिन भी क्या दिन थे.... ता ता थाई ता ता थाई.
    सुन्दर प्रस्तुति.

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  6. @वाणी
    अरे तुम्हे थैंक्स कहना तो भूल ही गयी....तुमने तो दिल खुश कर दिया, इनमे कोई कैथोलिक,कोई मलयाली ,कोई तमिल,मराठी है..और तुमने चैट में ही पूछा था..तुम कितनी बहने हो??...wowwwwwwww:) :)

    पर वे बहनों से रत्ती भर भी कम नहीं :)

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  7. अपनी शरारतें को सोच कर ही सबकी शरारतें जानने की सोची और लगता है की सब एक बार अपराधी से अपनी शरारतों को स्वीकार कर खुश हो रहे हैं. पूरी परिचर्चा में मजा आ गया.फिर कभी ऐसे ही.

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  8. दी, आपकी ये परिचर्चा बड़ी मजेदार रही. सोचा था कि अपने भी कुछ अनुभव भेजूँ. फिर सोचा कि सारी पोस्ट सिर्फ मेरे ही किस्सों से भर जायेगी. क्योंकि मैं तो अभी बच्ची हूँ ना :-)

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  9. @मुक्ति

    कोई नहीं चलो...थैंक्स फॉर द आइडिया.....कुछ ही दिनों में तुम बच्चों की शरारतों का कच्चा चिट्ठा जुटाने की कोशिश करती हूँ ....पर सच कहूँ तो डर लग रहा है..पता नहीं आज की पीढ़ी वाले तुमलोग क्या क्या शरारतें करते होगे...हम लोंग तो सीधे साधे थे बेचारे से च्च च्च :)

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  10. @ वाणी जी, हमने तो बस रंग की बात छेड़ी थी...
    चलिए आगे ’उनके’ साथ ऐसा नहीं होगा (हाहाहा)

    विवेक जी, रवि जी और इस्मत साहिबा के अनुभव भी मज़ेदार रहे...
    रश्मि जी, ये चप्पलों की ’छप छप’ अलग ही ’छाप’ छोड़ गई...
    बहुत अच्छा रहा ये आयोजन...बधाई.

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  11. आपकी सुरुचिपूर्णता और सृजनात्मक सोच की यह बेजोड़ परिचर्चा बहुत ही खुशनुमा और यादगार माहौल बनाकर संपन्न हुई-ऐसा उत्साहपूर्ण समूह आयोजन बस आपके ही वश का था -सफल संयोजन पर की बधाई!

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  12. बचपन के किस्‍से तो नानी दादी की कहानियों की तरह हैं वे खत्‍म होने का नाम ही नहीं लेते। और भला हों भी कैसे क्‍योंकि मजेदार जो होते हैं।

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  13. नमस्ते दीदी।
    आपका यह प्रयोग काफी बढिय़ा रहा। मजेदार तो यह रहा कि मैंने यहां यही आइडिया अपने अखबार में प्रयोग कर लिया। हमने पूरे हरियाणा में प्रसिद्ध लोगों के बचपने का पैकेज लगाया। मैंने संपादक जी को बताया कि यह आइडिया ब्लॉग से आया है। रश्मि दीदी ने दिया है। सो, बधाई उनको बनती है।
    तो बधाई स्वीकार कीजिए।
    थैंक्यू अगेन
    आपका
    रवि

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  14. @ रवि
    थैक्स कैसा....दीदी भी कहते हो और थैंक्स भी...ये तो ठीक नहीं..:)

    चलो किसी काम तो आया ये आइडिया....हरियाणा के धीर -गंभीर दिग्गजों का भी बचपना पता चल गया होगा...जो मुस्कान ले आया होगा,पाठकों के चेहरों पर.

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  15. हा हा :) किस्से सभी मजेदार रहे..
    विवेक भैया के साथ तो हम भी आइसक्रीम शेयर करेंगे...:)

    और आपके किस्से का तो मुझे यकीन हैं की और भी बहोत सारे होंगे...ये तो बस ट्रेलर था :)
    एक पूरी इतनी ही लंबी पोस्ट लिखनी चाहिए थी आपको अपने बारे में..

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  16. हा हा हा.. वो तो आपको हम भी बच्ची ही बोलते हैं.. :D
    सारी कहानी बच्चों जैसे ही चहक चहक कर जो सुनाती हैं.. गुस्सा भी बच्चों जैसी ही है आपकी.. :P

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  17. टपके का इंतजार है।
    इस्‍मत जैदी जी से मिलवाएं
    मैं 4 दिसम्‍बर तक गोवा में हूं
    चाहता हूं मिलूं

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  18. शानदार-सफ़ल आयोजन के लिये बहुत-बहुत बधाई. बहुत श्रमसाध्य कार्य है ये, तुमने कर दिखाया है, और बखूबी किया है. आज भी सबके किस्से मज़ेदार लगे. और हां शाहिद जी, आइन्दा ऐसा बचपना बिल्कुल ना कीजियेगा :) वो तो भाभी जी समझदार निकलीं जो समझाने से समझ गईं :)
    इस्मत, तुम्हारी तरह हमने भी खूब कश्तियां तैराईं हैं बारिश में, लेकिन अब तो यहां कश्ती तैराने लायक
    पानी ही नहीं बरसता :(
    रश्मि, तुम्हारा हालिया बचपना खूब भाया. मज़ा आया सबके बचपने में.

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  19. रश्मि जी! बहुत ही ख़ूबसूरत आयोजन! एक साथ कितने मुन्ना मुन्नी निकल आए.. शरारत, चुहल, बचपना और सबसे बड़ी बात जो खो गया उसे दुबारा पाना, यादों की गलियोण से खोजकर निकालन!! ऐसे आयोजन होते रहें, यही कामना है.. पुनः बधाई!!

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  20. रश्मि जी बहुत कामयाब रहीं आप अपनी इस ख़ूबसूरत कोशिश में
    वाह शाहिद साहब ,आप का बचपना तो ख़ान साहब को भारी पड़ गया ,
    विवेक जी ,मुझे तो बेचारे बच्चे पर दया आ रही है
    रवि जी,सही कहा आपने कि
    वो भी एक दिन हमारी तरह {समझदार (?)} हो जाएंगे
    राजेश जी , जन्म दिन मुबारक हो
    रश्मि जी आप के ब्लॉग पर तस्वीर में जो निश्छल हंसी है वो प्रतीक है आप के बच्चों जैसे साफ़ हृदय की
    बहुत बहुत बधाई

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  21. कल लगभग पूरे दिन लाईट नहीं रही तो इन सस्मरणों की यह किश्त इस समय पढ़ रही हूँ ! क्या बताऊँ कि कितनी बेसब्री से इंतज़ार था इन्हें पढने का ! सबके अनुभव बहुत ही मजेदार हैं ! मुझे विवेक जी के बेटे से बहुत सहानुभूति है, शाहिद जी से बहुत सावधानी बरतने की ज़रूरत है दोस्तों को, राजेशजी के पटाखों ने तो गाँव भर में दहशत ही फैला दी, रवि जी और इस्मत जी के संस्मरण भी शानदार हैं और आपकी शरारतों के किस्से तो बेमिसाल हैं ! झूलों पर फुल वॉल्यूम में गाना और सीढ़ियों पर चप्पलें फटकार कर शोर मचाते हुए उतरना आपकी मस्त मंडली के मन में छिपे बच्चों से बखूबी परिचित करा रहा है ! आपका आयोजन बहुत सफल रहा रश्मि जी ! ब्लॉग जगत के इतने 'बच्चों' से मिल कर हार्दिक प्रसन्नता हुई ! आपका बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद !

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  22. ओए PD ...अनूप शुक्ल जी का असर हो गया है,क्या??...जब कभी कमेन्ट करते हैं...मेरे गुस्से और बहस की ही बात करते हैं...उनके पास तो वजह है, ऐसा कहने की...वो चिट्ठाचर्चा वाली बात वो ज़िन्दगी में कभी भूलने वाले नहीं...

    पर आपके पास क्या वजह है,जनाब??.....तुमसे कब गुस्सा किया??...वो क्या है,ना...मैं गुस्से में नहीं होती....पर विरोध जता देती हूँ..तो सबको लगता है, गुस्से में हूँ...चल कोई नहीं....पर अब बदलने के कोई चांसेज भी नहीं हैं :(:(,वो कहते हैं,ना

    "उम्र गुज़री मयखाने में ग़ालिब
    अब आखिरी वक्त में क्या ख़ाक मुसलमां होंगे"
    (हो सकता है,शेर बिलकुल सही ना हो,पर मुझे ऐसा ही याद है :))

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  23. ब्लागजगत में परस्पर सौहार्दमय वातावरण बढाती एक अच्छी श्रंखला के लिए हार्दिक शुभकामनायें !

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  24. This comment has been removed by the author.

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  25. वाणी जी की पहली और दूसरी टिप्पणी से सहमत!

    वाणी जी ने मुन्ना जी को शायद इसलिए छोड़ दिया कि पुलिस वालों ने भी छोड़ दिया था :)

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  26. @अली जी वाणी जी ने हमें छोड़ा नहीं है। बल्कि हमीं छूट गए हैं। मेरा मतलब है रश्मि जी की यह बचपन एक्‍सप्रेस प्‍ले
    टफार्म से छूट गई थी। जब वह हमारी नजरों के सामने से गुजरी तो हम लपककर उसमें लटक गए। फिर तो रश्मि जी को एक्‍सप्रेस रोककर हमें उसमें बिठाना ही पड़ा।
    जी हां मित्रो हम बचपन एक्‍सप्रेस छूटने के लगभग घंटे भर बाद उसमें सवार हुए। इसलिए उसके पहले जो दर्शक इसे देखने आए होंगे उन्‍हें हम नजर ही नहीं आए। तो फिर वे हमारे बारे में कैसे जानते।

    तो रश्मि जी और सभी पाठकों का बहुत आभार।

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  27. @राजेश उत्‍साही
    लीजिए उत्साही जी, आपने ही दे दिया स्पष्टीकरण पर ये एक्सप्रेस ट्रेन कहाँ??...ये तो टॉय ट्रेन है....कहीं भी कभी भी रुक सकती है...खुद ही देख लीजिये 'राम त्यागी 'जी अभी अभी सवार हुए हैं :)
    आज सुबह उनका संस्मरण मिला...

    और अब शायद इस 'परिचर्चा ' को सफल कहा जा सकता है जिसे पढ़ सबका मन मचल उठे बचपन या बचपने की गलियों में घूमने को

    एक बार फिर सबका तहे दिल से शुक्रिया

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  28. देखिये, एकदम बच्चों जैसे सफाई देने आ गई ना.. :P

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  29. ओह रश्मि मै तो भूल ही गयी थी अपनी बात भेजना। सभी के बचपन को देख कर बहुत आनन्द आया । ये बचपन फिर लौट कर क्यों नही आता?
    बहुत अच्छी लगी सब की शरारतें। बधाई।

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  30. बहुत बढिया अन्दाज़ रहा …………पसन्द आया।

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  31. रश्मिजी ,
    आनद आ गया सबके बचपन की मीठी बाते पढ़कर |
    इस मीठी परिचर्चा के लिए आपका ह्रदय से आभार |

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  32. @PD

    तुम सोच रहें हो मैं कुछ बोलूँ
    पर मैं कुछ नहीं बोलूंगी....:)

    नर्सरी में ही टीचर चिल्ला कर कहती थी Put your finger on your lips

    So am keeping my finger on my lips

    हम कुछ बोलेंगे ही नहीं.:)

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  33. अच्छा ही हुआ की यह टॉय ट्रेन देर से देखने आये ...सबके संस्मरण बहुत अच्छे लगे ...अच्छी रही यह परिचर्चा ....अलग अलग अंदाज़ के बड़े बच्चे और उनका संस्मरण मुस्कान दे गया ...आभार

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  34. बच्चा बन कर जीना कितना अच्छा लगता है .... काश वो दिन दुबारा आ पाते ....

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  35. ब्लागिंग के नाम पर कब तक कूड़ा करकट पढायेंगी आप सबको ?आप ये सब कूड़ा करकट पढाना प्लीज़ बंद कर दीजिए नहीं तो आप पर ही एक ब्लॉग बना देंगे लोग |जिनमे सामग्री यही होगी कि रश्मि रविजा ने आज क्या उल्टा किया |

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  36. @ प्रशांत (PD)
    खुश हो...कि कोई इन सबके इतने सुन्दर बचपन की यादों को कूड़ा करकट कह गया

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  37. नाह! खुश हैं आपके कमेन्ट पर और आपकी तरक्की पर.. क्योंकि कहा गया है कि अगर आपने विरोधी बनाने शुरू कर दिए हैं मतलब आप सफल हो रहे हैं.. :)

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  38. @प्रशांत
    फिर तो ठीक है...थैंक्यू सो मच...

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  39. दीदी,

    एक दम मस्त पोस्ट है :)

    अपुन के पास भी बहुत सारी बातें हैं बताने को पर .......... सब बातों में अपुन सबको परेशान करता हुआ ही नजर आएगा , सुनने का है क्या ??:)

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  40. ओहो ! फिर कमेन्ट मोदेरेशन ओन कर दिया :(

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  41. सच कहूँ तो अंतिम भाग में बहुत आनन्द आया। काश! मैं भी कुछ बचपना कर पाता...
    'a' मेरा मतलब 'A' रेटिंग की फिल्में बच्चों को नहीं दिखाते। हटा दीजिए।

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  42. दीदी,

    पता नहीं क्या पढ़ कर याद आया, जब भी तबियत खराब होती है कितने भी स्वादिष्ट और कीमती पकवान पेश की जाए, टेस्ट बिगड़ा हुआ ही लगता है [अपनी ही जीभ का स्वाद बिगड़ने की वजह से ], हाँ बच्चों को इस बात का अंदाजा नहीं हो पाता की ये तबियत खराब होने से होता है वो तो बस कह देते हैं "खाना बेकार बनाया है" :))

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  43. दीदी,

    पता नहीं क्या पढ़ कर याद आया, जब भी तबियत खराब होती है कितने भी स्वादिष्ट और कीमती पकवान पेश की जाए, टेस्ट बिगड़ा हुआ ही लगता है [अपनी ही जीभ का स्वाद बिगड़ने की वजह से ], हाँ बच्चों को इस बात का अंदाजा नहीं हो पाता की ये तबियत खराब होने से होता है वो तो बस कह देते हैं "खाना बेकार बनाया है" :))

    जानबूझ कर दो बार कमेन्ट कर रहा हूँ :)

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  44. अब ब्लॉग पर कमेन्ट करने या ब्लॉग पर कमेन्ट रहने की मिनिमम क्वालिफिकेशन ये होनी / करनी चाहिए

    १. कमेन्टकर्ता का ब्लोगर होना अथवा
    २. प्रोफाइल पूरी होना अथवा
    ३. कमेन्ट के साथ पूरा परिचय

    कोई इसमें कुछ सुधार करना चाहें तो कर सकते हैं :)


    विषयांतर लगे तो मेरा ये कमेन्ट हटाया जा सकता है :(

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  45. प्रशान्त तुम कभी तो ओरिजनल सोचा करो रे..
    फिल्म गुरु का डायलोग चिपका रहे हो..उसमे भी अभिषेक(हम नहीं ऊ एक्टर अभिषेक) यही बात बोला था..

    कितना समझाते हैं रे तुमको...

    (रश्मि दी, आपको पहले ही आगाह कर दे रहा हूँ, यहाँ पर प्रशान्त पे बमों की बरसात होने वाली है...तो आप भी संभल के रहिएगा)

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  46. और वैसे कुरा करकट कहने वाले भाईसाहब छुपे से हैं :)
    अरे हुजुर सामने आइये, चलिए सी.सी.डी में कोफ़ी पीते हैं...के.एफ.सी. में चिकन तोड़ते हैं...फिर बात करेंगे भईया...

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  47. रश्मि बहना जी,
    पहले लेटलतीफी के लिए माफ़ी...बालदिवस के लिए तुम्हारा ई-मेल मिला था...आज करता हूं कल करता हूं... यही कर रहा था कि दीवाली वाले दिन पापा चले गए...सारे कर्मकांड कर निपटा तो बाल दिवस भी निकल चुका था और डेडलाइन भी...अब नार्मल हूं लेकिन तुम्हारी पोस्ट नहीं आ रही है...

    जय हिंद...

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  48. ब्लॉगरों का बचपन/ना देखना/पढना अच्छा लगा।

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