Thursday, September 23, 2010

बहू और बेटी के बीच का घटता -बढ़ता फासला.

मेरी पिछली पोस्ट सबने बड़े ध्यान से पढ़ी. और काफी मनन करके अपने विचार रखे.सबका शुक्रिया. टिप्पणियों में भी देखा और आपसी चर्चा में भी कई बार लोग कह देते हैं , 'बहू कभी बेटी नहीं बन सकती.' जैसे इस अवधारणा ने गहरी जड़ें जमा रखी हों ,मनो-मस्तिष्क पर. उनलोगों ने अपने आस-पास जरूर ऐसे उदाहरण देखे होंगे जिस से,उनके  ऐसे विचार बने.

परन्तु मैने उन कटु  प्रसंगों के साथ अपने आस-पास कुछ ऐसे उदाहरण भी देखे हैं, जिन्हें अगर ना शेयर करूँ तो मेरा कॉन्शस ही मुझसे सौ सवाल करेगा.

मेरी एक रिश्तेदार, लन्दन से  अपने बेटे बहू के साथ एक महीने के लिए छुट्टियाँ बिताने ,भारत आयीं  थीं. आने के एक हफ्ते बाद ही वे कहीं गिर गयीं और उनके पैर में चोट आ गयी. स्थानीय  डॉक्टर से इलाज कराया और बिना ज्यादा ध्यान दिए,पेन किलर के सहारे रांची,पटना, कलकत्ता, बैंगलोर, घूमती रहीं. लन्दन जाने से पहले उनके बेटे ने सोचा एक बार मुंबई में चेक-अप करवा लूँ. यहाँ के डॉक्टर ने बोला तुरंत ही सर्जरी करनी पड़ेगी, अंदर  नस फट गयी है और जख्म हड्डी तक पहुँच गया तो गैंग्रीन  हो जायेगा और पैर ही काटना पड़ेगा. दो दिन बाद ही  बॉम्बे हॉस्पिटल में सर्जरी हुई .पर बेटे की छुट्टी नहीं थी.वो लन्दन में ताज होटल में सेकेण्ड इन कमांड है. कुछ बड़े डेलिगेट्स रुकने वाले थे.उसे तुरंत जाना पड़ा. दोनों बेटियों के स्कूल खुल गए,उन्हें भी जाना पड़ा. आज पंद्रह दिन हो गए हैं, सर्जरी के हफ्ते भर  बाद स्किन ग्राफ्टिंग की गयी और अभी भी डॉक्टर कुछ नहीं बता रहें,कब डिस्चार्ज करेंगे? बहू अकेले यहाँ सास की  सेवा में जुटी है. दोनों बेटियाँ वहाँ रेडी टु  इट ,ब्रेड,मैगी के सहारे गुजारा कर रही हैं. होटल की नौकरी ऐसी है कि जब वे मुंबई ताज में थे ,सुबह चार बजे घर आया करते थे.लन्दन में भी सुबह के गए देर रात घर आते हैं.

इकलौता  बेटा है,ना कोई बहन ना भाई. लन्दन जाकर भी कोई रिश्तेदार बच्चों का ख्याल नहीं रख सकता ,ना वहाँ काम करने वाली बाई की सुविधा है. यहाँ भी, हॉस्पिटल हमारे घर से काफी दूर है. और सहायता ऑफर करने पर भी उनलोगों ने विनम्रता  से मना कर दिया. बेटियाँ अकेले स्कूल जाती हैं,सूने घर में लौटती हैं.खुद अपना ख्याल रख रही हैं.यहाँ' ताज'  ने एक कमरा दिया है जहाँ,बहू सिर्फ फ्रेश होने और कपड़े लौंड्री में देने के लिए जाती है. रात में भी वहीँ पतले से अटेंडेंट के लिए रखे बेन्चनुमा कॉट पर सोती है, सास के जोर देने पर भी ताज में नहीं जाती. जबकि उनके पैर पर बस प्लास्टर है..बाकी सब नॉर्मल है. बेड के पास कॉल बटन है...जब चाहे नर्स को बुला सकती हैं.

अब कोई भी बेटी इस से बढ़ कर क्या करती? जबकि बहू का प्रदेश और भाषा  दोनों अलग है और सास को ये मलाल भी था कि बेटे ने अपनी जाति में शादी नहीं की. उनकी  नौ वर्षीया  पोती कहती हैं ,"मम्मा, प्लीज़ डोंट माइंड पर मैं दादी को आपसे थोड़ा ज्यादा प्यार करती हूँ " दादी भी कह रही थीं, सामने खाना आता है तो आँखों में आँसू आ जाते हैं कि वहाँ बच्चे ब्रेड पर गुजारा कर रहें हैं. अब बहू ने बच्चों और दादी को पास आने दिया तभी तो ये स्नेह पनप सका.

मेरी ही बिल्डिंग में रहने वाली  एक सहेली है. तीन बेडरूम का फ़्लैट लिया कि ससुर साथ रह सकें. ससुर जी को ड्रिंक की आदत थी. बेटे का ट्रांसफर दूसरी जगह हो गया तो बहू की रोक-टोक अच्छी नहीं लगी और पास के ही अपने फ़्लैट में रहने चले गए. खूब बदपरहेज़ी की और तबियत खराब रहने लगी. रात के तीन बजे फोन करते और ये गाड़ी लेकर अकेली उन्हें देखने जाती. एक बार पुलिस ने भी रोक लिया था. मेरे कहने पर कि 'कम से कम हमें साथ जाने को बुला  लिया करो,' कहने लगी, ये तो रोज का किस्सा है,अक्सर  दस बजे बारह बजे फोन कर देते हैं, कि" तबियत ठीक नहीं " ससुर को अकेले भी रहना था और अटेंशन भी चाहिए थी. दो साल  तक ये सिलसिला चलता  रहा. बाद में तीन महीने हॉस्पिटल में रहने के बाद  उन्होंने  अंतिम साँसे  लीं. पूरे समय बहू ने अकेले उनकी देखभाल की. बेटा बस एकाध दिन की छुट्टी लेकर आ पता. यहाँ तो इसी  कॉलोनी में उनकी बेटी भी रहती है पर उसने सारी जिम्मेवारी भाभी पर छोड़ रखी थी. बहू ने तो बेटी से भी बढ़कर अपना कर्तव्य निभाया.

एक और सहेली है उसकी सास पहले उसके साथ ही रहती थीं.. ननद को बेटी हुई तो उसकी देखभाल करने अपनी बेटी के पास चली गयीं. ननद नौकरी करती है. ननद की बेटी स्कूल जाने लगी है पर ननद ने  उसकी सारी जिम्मेवारी माँ पर छोड़ रखी है और बेटी के जन्म के पहले जैसी ही लापरवाह रहती है. माँ उसे अपनी बहू का उदाहरण देती है. और बहू से बेटी की शिकायत भी करती है. ननद-भाभी भी अच्छी दोस्त हैं.ननद भी कहती है, 'माँ मेरी माँ कम सास ज्यादा है'. ननद का पति भी कुछ नहीं कहता ,यह सोच कि यह माँ बेटी  के बीच का मामला है. यही अगर  बेटा होता तो अपनी पत्नी को सौ घुडकियां दे चुका होता कि "मेरी माँ क्यूँ  रखे,बच्ची का.ख्याल ?" यहाँ भी माँ को बेटी से ज्यादा बहू पर भरोसा है.

माँ-बेटी में मजबूत इमोशनल बौंड होता है.पर अगर रिश्तों को प्यार और समझदारी से निभाया जाए तो बहू के बेटी की जगह लेते  देर नहीं लगती. और मुझे लगता है इसमें ज्यादा समझदारी, सास से ही अपेक्षित है क्यूंकि बहू एक तो कम उम्र की होती है, अपना घर छोड़ ,नए परिवेश में आती है. अगर उसे अपनापन मिले तो उसे उस परिवार में शक्कर की तरह घुलने में देर नहीं लगती. पिछली पोस्ट पर शुभम जैन की टिप्पणी पढ़कर इतना अच्छा लगा, "अगर मम्मी नहीं होतीं तो पति के साथ रहना मुश्किल हो जाता" :)

फिर भी ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं,ज्यादा घरं में मन-मुटाव ही देखने को मिलता है. अब इसकी वजह पति और बेटे की अटेंशन पाने की खींचतान होती है या फिर किचन पर  वर्चस्व का मुद्दा. हर घर का  अलग किस्सा होता है.कई बार तो सास-ससुर की उपेक्षा करती बहू को देख,एक ख्याल आता भी है क्या इनलोगों ने भी उसकी शादी  की शुरूआती दिनों में उसे सताया था. क्यूंकि हर महिला इतनी उदारमना नहीं होती कि सबकुछ भुला दे. वही है कि कांच से रिश्ते हैं, बहुत समभाल  कर निभाने होते हैं, जरा सी तेज धूप में भी चटख जाते हैं

43 comments:

गजेन्द्र सिंह said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति .......

(क्या अब भी जिन्न - भुत प्रेतों में विश्वास करते है ?)
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_23.html

महफूज़ अली said...

यहाँ सबने तो ध्यान से पढ़ी.... और मैं ध्यान से पढने के बावजूद भी अच्छा कमेन्ट नहीं कर पाया.... पर इस बार का संस्मरण रुपी पोस्ट बहुत अच्छी लगी... तीनों इन्सीडेंटस अपने आप में यूनिक हैं... दरअसल होता क्या है ना कि ... देखिये... बहू-बेटी की नींव तो शादी के वक़्त ही डल जाती है... अब साइकोलॉजिकल फैक्टर देखिये... कि ... जिस बेटे को माँ ने तीस साल तक पाला... उसकी शादी होती है... तो क्या होता है ना... कि शादी के बाद जो डिमांड वो अपनी माँ से करता था... वोही डिमांड अब वो अपनी बीवी से करता है.... पानी लाओ... कपडे लाओ... रुमाल लाओ... खाना लाओ... चड्डी लाओ....बनियान लाओ..... और भी कई सारे काम वो अपनी बीवी से ही करवाता है... ज़ाहिर सी बात है.. कि जो माँ उसे तीस सालों से उसकी फरमाइशों को पूरा कर रही थी... तो उसे क्या लगेगा... उसे तो यही लगेगा ना कि बहू ... ने आते ही बेटे पर कब्ज़ा जमा लिया... और यहीं से कॉन्फ्लिक्ट शुरू होता है... जबकि यहाँ सारी गलती बेटे की है... वो माँ का साइकोलॉजिकल स्टेटस नहीं समझ पाता है... और सबसे बड़ी बात उसकी सेक्सुयल भड़ास तो बीवी से ही निकलेगी.... तो वो सारा इम्पौरटैंस बीवी को ही देने लगता है... और यहाँ माँ गलत समझ लेती है.. वो सारी भड़ास बहू पर ही निकालती है... कि उसके आते ही सब बदल गया... यहाँ बेटे का काम होता है कि वो माँ-और बीवी में ताल-मेल बैठाये. . ... ऐसे ही सिचुएशंस पर माँ जो होती है वो बहू को अपनी प्रतिद्वंदी समझती है... और उसे मेंटल दर्द देना शुरू करती है...सारा खेल अटेंशन पाने का है... माँ को अब बेटे का अटेंशन चाहिए... त वो सारे काम करेगी जिससे कि बेटे का अटेंशन उस पर आ जाये.....अब यहाँ बहू का रोल बेटी की तरह होना चाहिए... जो कि ना के ही बराबर होता है... क्यूँ? क्यूंकि वो अपने मायके से यह सीख कर ही आती है कि बेसिकली सास सब खराब होतीं हैं... तो अब ज़रा सा सास ने कुछ बोल दिया ... तो राईवलरी में आ खडी होतीं हैं... तो यहाँ लड़की की माँ का रोल यह होता है कि वो लड़की के मन में सास टाइप का ख्याल निकले... और यही सीख दे ,..... कि सास भी माँ ही होती है... अगर बेटा मानसिक तौर पर डेवलप है तो वो कभी भी ऐसी कोई सिचुएशन लाएगा ही नहीं... जिससे कि कॉन्फ्लिक्ट हो... और बहू ... का रोल भी यही होता है कि वो सास में अपनी माँ को देखे... और उनके मेंटल स्टेटस को समझे... और जब ऐसा हो जायेगा... तो सब ठीक हो जायेगा... और इसमें सारा रोल ना सास का होता है ...ना बहू का.... वो पूरा रोल बेटे का होता है...

शोभना चौरे said...

रश्मिजी
आपने बहुत आदर्श उदाहरण दिए है और ऐसा भी होता है और होता रहा है की बहू ही सास की सेवा करती करती है क्योकि बेटी तो अपने घर में रहती है अपनी सास के साथ |बात है मन से जुड़ने की |और आपने अपनी पिछली पोस्ट में जिक्र भी किया था की अगर सास ज्यादा प्यार करती हैतो मनो वैज्ञानिकों का कहना है की बहू को अपनी माँ छिनने का डर रहता है |समाज में हर जगह अपवाद होते है और जहाँ आर्थिक रूप से अगर सास समर्द्ध है तो नजारा अलग होता है |मध्यम वर्ग जिस पर जिम्मेवारिया बहुत रहती है आर्थिक सुद्रढ़ होने की , बच्चो की पढाई की इस गला काट प्रतियोगिता के दौर में ,सामाजिकता निभाने की ,(जहाँ उसके मित्रो से ज्यादा रिश्तेदार रहते है )नोकरी की सुरक्षा और भी कई कारण होते है वजह होती है अपेक्षाओ की , वही इन सम्बन्धो में मधुरता नहीं आ पाती |हमारा समाज इतनी विविधताओ से भरा है की हर परिवार की अपनी मान्यताये अपनी सीमाए होती है |

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

हमको भी कई बार अपने सास ससुर को अटेण्ड करने का मौक़ा मिला है उनके बीमारी के समय, और तब जब उनका एक बेटा अमेरिका में और दूसरा उदयपुर में है... हम बस एक दामाद का फर्ज़ निभाए और कहे भी कि दामाद बेटा नेहीं हो सकता है... आपका सब उदाहरण सही है, हर जगह मिल सकता है ..लेकिन रस्मी जी, बहू बहू होती है.. बेटी नहीं... ऊ लोग बहू का ही तो कर्तव्य निभाई... बेटी भी कहीं बहू बनकर अपना फर्ज निभा रही होगी... दरसल ई बहू बेटी के बीच का कम होता फासला नहीं है, सास बहू के बीच का कम होता फासला है...

shikha varshney said...

यार आपने क्या हिडन कैमरा लगा रखे हैं आस पड़ोस में ? ही ही ही
सही कहा कितने सारे उदहारण भरे पड़े हैं हमारे आस पड़ोस में ही बस देखने वाली नजर चाहिए.रिश्ते मन से बनते हैं बस नीयत होनी चाहिए .
अच्छी और सकारात्मक पोस्ट.
@ महफूज़ ! तुम सास बहु रिश्तों के काउंसलर बन जाओ कुछ तो भला होगा समाज का :)

rashmi ravija said...

@नहीं शिखा,कोई हिडेन कैमर नहीं लगाया .....एक तो रिश्तेदार ही हैं और बाकी दोनों सहेलियाँ...अब सहेलियों की बातें तो पता होती हैं ना...जैसे तुम्हे मेरी पता है..और मुझे तुम्हारी :)

रेखा श्रीवास्तव said...

इसमें सिर्फ एक की समझदारी से काम नहीं चलता दोनों को इसमें बराबर सोचना पड़ता है, बहू करती रहे और सास इसके बाद भी बेटी के गुण गाये या फिर किसी और के तो बात बिगाड़ जाती है और यही बात बहू के लिए भी है, मान के बराबर सास को भी समझे और उसे वही अपनत्व दे की उसको ये अहसास न हो की उसका बेटा छिना जा रहा है , लेकिन ये मनोवैज्ञानिक सत्य है की अपने अधिकार को वह छीनता हुआ महसूस करती है और ये उसकी समझदारी है की वह इस के साथ कैसे तालमेल बैठती है. वैसे ये स्थिति दोनों के ऊपर होती है. ये फासले सिर्फ १-२ प्रतिशत ही इस तरह से गुजरते हैं जैसे की इस में वर्णित है. अन्यथा शेष तो वही सास बहू के तालमेल में कुछ न कुछ लगा ही रहता है.

Mired Mirage said...

:) :D
यह बहुत सही है! बबुआ, अपन चड्डी बनियान स्वयं ही काहे नहीं ले लेत हो! काहे बिना बात चड्डी बनियान खातिर शत्रुता बढ़ाते हो! यदि यह सब काम शुरू से ही स्वयं करते रहो तो इन्हें करने के लिए किन्हीं दासी मानसिकता की स्त्रियों में युद्ध नहीं होगा ना ही तनातनी! धनय हैं ये सास बहू जो चड्डी बनियान देने के लिए आपस में उलझ पड़ती हैं! और हाँ धन्य हैं वे चड्डी बनियान भी! उन्हें तो ठाकुर द्वारे पर रखकर पूजा जाना चाहिए!
अब जिन स्त्रियों की औकात चड्डी बनियान सप्लाई को लेकर भिड़ने की हो तो उनपर क्या कहा जाए सिवाय यह कि धन्य हों ये स्त्रियाँ व ये चड्डी बनियान व इनके धारक व इनसे उपजी डाह!
घुघूती बासूती

दीपक 'मशाल' said...

इतने सारे उदाहरण दे दिए आपने.. कोई कैसे नहीं मानेगा.. लेकिन मुझे लगता है कि सास-बहू के बीच मधुर संबंधों के लिए विचारशील और शिक्षित होना भी बहुत जरूरी है..

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
आभार, आंच पर विशेष प्रस्तुति, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पधारिए!

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-2, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

महफूज़ अली said...

हा हा हा हा हा हा हा हा हा ..........

नहीं आंटी....धन्य हैं वो औरतें... जो आदमियों को ये आदतें लगातीं हैं.... अब आदमी तो होता ही नालायक है पैदाइशी ... उसे तो स्त्री को पूजने से मतलब है... अब चाहे वो माँ हो बीवी.... :)

महफूज़ अली said...

हा हा हा हा हा हा हा हा हा ..........

नहीं आंटी....धन्य हैं वो औरतें... जो आदमियों को ये आदतें लगातीं हैं.... अब आदमी तो होता ही नालायक है... उसे तो स्त्री को पूजने से मतलब है... अब चाहे वो माँ हो या बीवी.... :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज तो बहुत प्रेरणा देते हुए उदाहरण दे कर पोस्ट बनायीं है ...चाहते तो सभी ऐसा हैं और जब बेटे कि शादी करते हैं तो भी बहुत अरमान होते हैं ...आज पहले जैसी बात भी नहीं रही ..कम से कम पढ़े लिखे लोगों में ...काफी सामंजस्य स्थापित किया जाता है ...इससे पहले ही किसी पोस्ट पर तुमने लिखा था कि यदि मानसिक तनाव हो तो अलग रहना ही उचित है ...

खैर वो सब अलग बात ...यदि बहु सास की बीमारी में सेवा करती है तो शायद सास ने भी उसको अपनापन दिया होगा ...और यह हमेशा प्यार ही नहीं होता यह कर्तव्य की भावना भी होती है ...जब अकेला बेटा है कोई और देखभाल के लिए है नहीं तो यदि तब भी सेवा न की जाये तो समाज क्या कहेगा ? हाँ तुमने जो उदाहरण दिए हैं इनमें स्नेह भी दिखाई दे रहा है ...
वैसे भाई बात सीधी है जैसा बोओगे वैसा ही फल मिलेगा ...हर घर की परिस्थितियां अलग होती हैं ..हर इंसान की सोच अलग होती है ...सास बहू के रिश्ते में अहम भूमिका बेटे की होती है ...
अभी समझ में आने वाली बात नहीं है..जब तुम सास बनोगी तब इन रिश्तों को समझ सकोगी :):)

अच्छी पोस्ट

डॉ टी एस दराल said...

रश्मि जी , आपकी इस पोस्ट को पढ़कर तो वे बहुएं भी सास ससुर की सेवा करने लगेंगी जो दूर दूर रहती हैं ।
एक बढ़िया प्रेरणात्मक पोस्ट ।
हिन्दुस्तान में तो ऐसी बहुएं भी होती हैं । यह हमारी संस्कृति का ही फल है ।

H P SHARMA said...

अच्छा सब्जेक्ट है. एक ललित निबंध लिखने की कोशिस कर रहा हूँ.

saas - bahoo - betee
_________________
हर लडकी किसी ना किसी की बेटी जरूर होती है, लेकिन जरूरी नहीं कि हर लडकी सास बने. अधिकतर बेटियाँ पदोन्नत होकर किसी और घर में बहू भी बन जाती हैं, लेकिन उसके लिए सास एक के साथ एक गिफ्ट में पति के साथ मिलती है.

कहीं कहीं ऐसा भी होता है कि किसी सास की बहू (बड़े घराने में शादी) बनने के लिए समझदार बेटियाँ सास का स्तर देखके उसके लल्लू पप्पू टाइप लड़के से शादी कर लेती हैं. जो ज्यादा समझदार होती हैं वो खूब जानती हैं कि लड़के ज्यादातर लल्लू पप्पू ही होते हैं उनको जेंटल मैन तो उन जैसी समझदार महिला ही बनाती हैं. बेटी होना बहुत आसान है बहू होना भी पर अच्छी बहू होना थोडा मुश्किल है, पर अच्छी सास होना समझो नामुमकिन नहीं तो आसान भी नही है. अधिकतर खराब बहू अच्छी बेटियाँ होती हैं ऐसे ही अधिकतर खराब सास अधिकतर अच्छी माँ. सास होने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नही करना पड़ता. बेटे का जिस दिन सर फिर जाये और उसे कोई सिरफिरी मिल जाये तो चाहे अनचाहे बेटे की माँ सास बन ही जाती है. जाते जाते अच्छी सासें ना केवल अच्छी सास होती हैं वरन अच्छी माँ भी सावित होती हैं. ऐसे ही अच्छी बहू भी अच्छी बहू ही नही अच्छी बेटी भी सावित होती हैं

Rangnath Singh said...

लोकतांत्रिक भावना के विकास के साथ ही हर तरह के निजी स्पेस में तरलता आएगी। ऐसा मुझे लगता है।

राज भाटिय़ा said...

आप की यह लेख बहुत ध्यान से पढा,कभी कभी सास्म भी बहुत गलती कर बेठती है, ओर कभी कभी बहु भी अपने घर मै अपनी मां या किसी हादसे को देख कर या मां बाप के बहकावे मै आ कर सास से पंगा लेती है,किस्मत से ही समझदार हो तो गाडी पटरी पै चलती है.
मेरे बच्चे अभी १९,२० साल के हे, ओर हमारी दिली इच्छा है कि कोई भारतियां लडकी हो तो अच्छा है, लेकिन हमे भारत से ही लोग कहते है कि... बाबा आज की भारतिया लडकी आप की गोरिया से भी दस कदम आगे है, इस लिये अगर बच्चे किसी गोरी को ले आये तो बहुत अच्छा है :) इन सब बातो के मायने यही है कि आज की पीढी को बिगाडने के हम लोग ही कही ना कही हक दार है, ओर दोष बच्च्ओ को देते है

राज भाटिय़ा said...

@ महफूज़ अली जी आप की बात सही है, धन्य है वो महिलाये जो भाग भाग कर यह सब काम बहुत प्यार से करती है, जेसे हमारी बीबी ने हम बाप बेटो को बिगाड रखा है, वेसे मुझे अपने बारे भी पता नही होता कि कोन सी कमीज पहनी है ओर मेरे कपडे कहां पडे है, या मेरे बच्चो के कपडे उन्हे नही पता, ओर हमारी बीबी सुबह सब से पहले जाग जाती है, ओर फ़िर सब काम मशीन की तरह करती है, सब की फ़रमाईश सेकिंड मै पुरी

डॉ महेश सिन्हा said...

ये सास बहू केवल हिंदुस्तान में होती है !!
वैसे क्या औरतें ही लड़ती हैं

चन्द्र कुमार सोनी said...

इसका कोई एक कारण नहीं हैं. कुछ कारण --
कुछ किस्मत की बात हैं,
कुछ भगवान् का आशीर्वाद या शाप हैं,
कुछ पिछले जन्मो का फल हैं,
आदि-आदि.

अगर उपरोक्त कारणों को ना भी स्वीकारा जाए तो कई कारण हैं जैसे --
शुरुवात ही गलत होना यानी तनाव (लड़ाई या बहसबाजी) होना,
पुरुषों में संपत्ति या किसी अन्य कारणों से आपस में ना बनना,
स्त्रियों में वर्चस्व की लड़ाई या सम्मान कम होना,
किचन को लेकर माहौल खराब रहना,
ग़लतफ़हमियाँ (पुरुष और स्त्री वर्ग में कोई एक या दोनों) होना,
आदि-आदि.

बहुत अच्छा विश्लेषण किया हैं आपने.
आपकी मेहनत को सलाम.
बहुत उम्दा लिखने के लिए......
हार्दिक धन्यवाद.
WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

वाणी गीत said...

माँ-बेटी में मजबूत इमोशनल बौंड होता है.पर अगर रिश्तों को प्यार और समझदारी से निभाया जाए तो बहू के बेटी की जगह लेते देर नहीं लगती...

सही कहा है तुमने ...मगर अक्सर ऐसा होता नहीं है ...
दोनों के अपने- अपने पूर्वाग्रह होते हैं ....
मां की डांट को जितनी सहजता से हमलोग सह लेते हैं , सास की नहीं ...
माँ को बेटी कुछ कह दे तो वह उसे प्रतिष्ठा का नहीं सवाल बनाती , मगर अगर बहू प्यार से भी कुछ कह दे तो वह बुरा लग जाता है ...
मगर सबसे बड़ा सच ये है कि हम हिन्दुस्तानी भावुकता को त्यागने लगे हैं , पैसा और सुख -सुविधा ज्यादा मायने रखने लगा है ...ऐसी सासुओं तक की दुर्गति होते देखी है जिन्होंने अपनी बहुओं को प्रसव के लिए कभी मायके तक नहीं जाने दिया, खुद सब कार्य किया ...वहीँ ऐसी सासु भी हैं जो एक बेटे के विशेष प्रेम में पूरे परिवार को ताक पर रख देती हैं , मगर जब उसका भी विवाह हो जाए तो वह भी बुरा लगने लगता है ...मगर अब कुछ कह नहीं सकती क्यूंकि सिर्फ उसके लिए ही उन्होंने पूरे परिवार को दर- बदर कर दिया होता है , हर तरह के उदाहरण हैं ...उम्र बढ़ने के साथ काफी कुछ दिख समझ रहा है ...!

Sadhana Vaid said...

बहुत सारगर्भित पोस्ट है रश्मि जी ! हर घर की स्थितियाँ अलग होती हैं और हर इंसान की सोच अलग होती है ! किन्ही दो उदाहरणों को समरूप नहीं कहा जा सकता ! यह सारी समस्या अपनी सोच और समझदारी की है ! दरअसल फिल्मों और टी वी में दिखाई जाने वाली अतिरंजित घटनाओं और कुछ विशिष्ट किस्म के साहित्य ने कई लडकियों के मन को इतना प्रदूषित कर दिया है कि उनके मन में सास-ननद, जेठ-जिठानी और ससुराल के सभी सदस्यों के प्रति एक दुराग्रह सा गहरी जड़ें जमा लेता है जिसके कारण वे ससुराल पक्ष के व्यक्ति की उचित सलाहों को भी कभी सकारात्मक रूप से नहीं ले पातीं ! इसी तरह कम समझदार सासें भी पूर्वाग्रहों के चलते बहू के हर काम में और उसकी कही हर बात में नकारात्मकता ढूंढ कर खुद भी त्रस्त रहती हैं और उसे भी प्रताडित अपमानित करती हैं ! अपने मन को उदार बनाने की आवश्यकता है ! जब दोनों को एक दूसरे की सदाशयता पर पूरा भरोसा हो जाएगा यह झगडा भी समाप्त हो जाएगा और एक दूसरे के प्रति प्यार, विश्वास और हमदर्दी की भावना जन्म लेगी ! जिनमें यह समझदारी और सामंजस्य पैदा हो चुका है वे समाज के लिये उदाहरण और प्रेरणा का स्त्रोत बन रहे हैं ! बहुत विचारोत्तेजक आलेख ! शुभकामनाएं !

प्रवीण पाण्डेय said...

जो बहुयें की घर में पूरी तरह घुल मिल जाती हैं, वही दो परिवारों और सभी सम्बन्धों के बीच सेतु का कार्य करती हैं। यह कार्य केवल बहू के ही रूप में किया जा सकता है। प्रसंग बहुत ही उपयोगी हैं, सबके लिये।

ali said...

@ रश्मि जी ,
मेरे ख्याल से ये सब पीढ़ी द्वय के व्यक्तित्व और परिवार के हालात पर निर्भर करता है !

@ जीबी,
आज काफी नाराज़ लग रही हैं आप :)

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
मशीन अनुवाद का विस्तार!, “राजभाषा हिन्दी” पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

abhi said...

दी, मैंने दोनों तरह के रिश्ते देखें हैं अपने आस परोस में..एक तो वो जहाँ सास-बहु का प्रेम इसी तरह का है..और दूसरा वो जहाँ झगड़े बेवजह और गलत होते हैं..लेकिन हाँ ऐसे रिश्ते कम ही पाए जाते हैं जहाँ इस कदर आपसी प्रेम हो.
तीनो उदाहरण बहुत अच्छे थे.


कल से ही आपकी ये पोस्ट को अलग टैब में खोल के रखा था...पढ़ नहीं पाया था..अभी पढ़ा :P

ajit gupta said...

हम कब तक सास-बहु के रिश्‍तों को ही लिखते रहेंगे? मुझे लगता है कि कभी-कभी ससुर-दामाद के रिश्‍तों को भी लिखना चाहिए। यदि उनको साथ रहना पड़े तो क्‍या हो? या जो साथ रहते हैं वे कैसे रहते हैं? या फिर बाप-बेटे के रिश्‍तों को भी लिखना चाहिए।

पी.सी.गोदियाल said...

महफूज़ अली said...
हा हा हा हा हा हा हा हा हा ..........

नहीं आंटी....धन्य हैं वो औरतें... जो आदमियों को ये आदतें लगातीं हैं.... अब आदमी तो होता ही नालायक है पैदाइशी ... उसे तो स्त्री को पूजने से मतलब है... अब चाहे वो माँ हो बीवी.... :)

BAHUT KHOOB... HA.HA.HA.HA.HA

संजय भास्कर said...

इसमें सिर्फ एक की समझदारी से काम नहीं चलता दोनों को इसमें बराबर सोचना पड़ता है,

वन्दना said...

बेहद सारगर्भित आलेख्………………आज ऐसा होने लगा है क्योंकि सब इसकी महत्ता समझने लगे हैं बस अभी इसका प्रतिशत कम है मगर धीरे धीरे सब मे बदलाव आकर रहेगा।

शुभम जैन said...

सही कहा दी बेटी और बहु के बीच एक ऐसी लकीर खेंच दी गयी है जो शायद ही कभी मिट सके | लेकिन एक परिवार को जोड़ कर रखने की जिम्मेदारी काफी हद तक बहु की ही होती है, ये काम और भी ज्यादा आसन हो जाता है अगर इस जिम्मेदारी को निभाने में उसकी सास, पति और बाकि के ससुराल वाले भी उसका थोडा साथ दें |

राजेश उत्‍साही said...

जी पढ़ लिया।

anitakumar said...

मुझे ऐसा लगता है कि इंसानों को माथे पे लगे रिश्ते के लेबल से न आंका जाए। अगर हम एक दूसरे को सिर्फ़ इंसान के रूप में देखें( सास बहू, नर नारी, इत्यादि नहीं ) तो रिश्तों में मधुरता आ जाती है। पर ये दोनों पक्षों को करना होता है। सिर्फ़ एक ही लेबल हो माथे पर- मानवता और दोस्ती। अहम से अहम रिश्ते में भी दोस्ती का अंश सर्वोपरी है फ़िर वो संबध पति से हों या सास से। तो फ़िर सब को सिर्फ़ दोस्त ही क्युं न बना लो। कम से कम मैं तो ऐसा ही करती हूँ, पता नहीं सही करती हूँ या गलत्…जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए

गजेन्द्र सिंह said...

सही कहा है
बहुत ही बढ़िया लगा लेख पढ़कर ........

कृपया इसे भी पढ़े :-
क्या आप के बेटे के पास भी है सच्चे दोस्त ????

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत बढिया विषय चुना है तुमने रश्मि. आज बहुत से ऐसे परिवार हैं, या मैं कहूं कि मेरे परिचित परिवारों में से अधिकांशत: परिवारों में बहुएं बेटियों की तरह रहती हैं, और अपने परिवार का खयाल रखती हैं. मेरे ही घर में देख लो. मेरी सास जी अपने बेटे से ज़्यादा भरोसा मुझ पर करती हैं, बल्कि कहती भी हैं कि मेरी तो ये बहू और बेटा दोनों है. शादी के बाद मेरे ससुर जी सूट खरीद के लाये, केवल इसलिये कि बहू को साड़ी में दिक्कत होती होगी...

रंजना said...

बहुत बहुत आभार आपका इस सुन्दर प्रेरणादायी पोस्ट के लिए...
असल में ये उदहारण यदि सब ध्यान में रखें तो सास बहू में तकरार की गुंजाइश बहुत कम बच जायेगी...
कोई भी रिश्ता यदि सह अस्तित्व पर आधारित रहेगा तो मधुर होगा ही...सारी चिख चिख की जड़ अहम् ही है,चाहे वह जो भी पाले..
वैसे तुलनात्मक रूप में सास बहू ननद भाभी आदि के रिश्ते जो बदनाम थे कि ये कभी अच्छे नहीं हो सकते...काफी अच्छे होते जा रहे हैं...यह बड़ा ही सुखद है..

mukti said...

मुझे लगता है कि हर लड़की शादी के बाद ससुराल में सामंजस्य बिठाने की कोशिश करती ही है. दोनों ओर से थोड़ी कोशिश की जाए तो सब ठीक-ठाक ही चलता है. वैसे मैंने आज तक ना खलनायिका बहू देखी है और ना ही प्रताड़क सास. थोड़ी-बहुत खटर-पटर तो हर जगह होती है.
और हाँ ये आदमियों को पंगु बना देने की औरतों की आदत मुझे नहीं अच्छी लगती. ऐसा करके वो अपना और उनका दोनों का नुक्सान करती हैं क्योंकि जब आदमियों को अकेले रहना पड़ता है, तो असहाय सा महसूस करने लगते हैं.

अरुणेश मिश्र said...

रोजमर्रा के उदाहरणोँ से आपने समाज के सत्य को प्रस्तुत किया ।
प्रशंसनीय ।

रवि धवन said...

मैं पहले ही इसे पढ़ चुका था। मगर उस समय बिना कुछ कहे निकल गया। सभी के कमेंट पढ़े, मजेदार हैं। मैं तो यही कहूंगा, बंदे को हमेशा सरेंडर करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

दीपक 'मशाल' said...

जन्मदिन पर आपकी शुभकामनाओं ने मेरा हौसला भी बढाया और यकीं भी दिलाया कि मैं कुछ अच्छा कर सकता हूँ.. ऐसे ही स्नेह बनाये रखें..

Apanatva said...

bahut preranadayak post.......
bahut accha laga blog par aakar.......
ise bahu ka tyag kum aseem pyar aur shruddha ma ke prati samajhane ka man ho raha hai.......

kai vaar jab hum kisee ke liye kuch karte hai to shayad isliye bhee ki vaisaa karke hume bhee sukh sukun milta hai.........
Aabhar

दिगम्बर नासवा said...

आपकी बात से बहुत हद तक सहमत हूँ ... आज फिर से ये दौर वापस आ रहा है और बहुएँ परिवार में अपना कर्तव्य एक बेटी की तरह निभा रही हैं ... दरअसल बीच का कुछ दौर ऐसा आया था जब सासों की ज़्यादती बढ़ गयी थी ... वजह जो भी रही हो ... पर शिक्षा का असर या तेज़ी से आता बदलाव आज फिर से रिश्तों में मिठास वापस ला रहा है ... मैने भी ऐसे बहुत से परिवार अपने आस पास देखें हैं और बहुत अच्छा लगता है मिला जुला परिवार देख कर ....

शरद कोकास said...

बढ़िया विचार मंथन है ।