Wednesday, February 22, 2017

मालती जोशी जी की स्नेह भरी पाती

आज मैं ऊपर आसमां नीचे....आज बेधड़क ऐसा कह सकती हूँ :) :)

आठवीं में थी तब धर्मयुग में जिनकी कहानी पढ़ी थी और अब तक याद है और बाद में लगातार उनकी कहानियां पढ़ती रही, आज उन प्रिय लेखिका "मालती जोशी दी " का हस्तलिखित पत्र मिला ।
जब हाल में उनसे मिली थी तो उन्हें अपनी किताब भेंट की थी। मुझे कोई अपेक्षा नहीं थी कि वे इसे पढ़ेंगी। मेरी किताब को उनके हाथों का स्पर्श मिला ,मैं उन्हें किताब दे पाई,यही सुख मेरे लिए बहुत बड़ा था। वैसे भी मैं संकोचवश अग्रजाओं से कभी नहीं पूछती कि , 'आपने मेरी किताब पढ़ी, कैसी लगी '।मुझे लगता था,वे लोग तो बड़े लोगों को पढ़ती होंगीं ।
उषाकिरण खान दी से भी नहीं पूछा था। बाद में विजयपुष्पम ने बताया कि वे तुम्हारी किताब का जिक्र कर रही थीं ,तब उनसे बात की । सूर्यबाला दी, उषा दी, मालती दी को मेरी किताब पसंद आई , इस से बढ़कर कोई ईनाम और क्या । वो भी उनलोगों ने खुद से बताया :)

मालती जोशी दी से मिलकर आई थी तो फेसबुक पर सारा विवरण लिख डाला था .

वे दिन याद आते हैं जब धर्मयुग में मालती जोशी जी की कहानी की अगली क़िस्त आने वाली होती थी, बेसब्री से अंक का इंतजार होता था और कहीं जो भाई के हाथ में पत्रिका पहले पड़ गई तो आंसू निकल आते थे। (वो पूरी पत्रिका पढ़े बगैर देता नहीं था :( )
कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि स्कूल-कॉलेज में जिनकी कहानियों की घनघोर प्रशंसिका हुआ करती थी , कभी उनके सामने बैठ कर एक अनौपचारिक सी गोष्ठी में उनके ही श्रीमुख से कहानी सुनने का सौभाग्य मिलेगा। मालती दी की ये अद्भुत कला है , वे बिना देखे पूरे भाव के साथ, मय डायलॉग सहित लंबी लम्बी कहानियाँ सुनाती हैं । और मंत्रमुग्ध से सबलोग एकटक उन पर नज़रे जमाये ,कहानी को आत्मसात करते रहते हैं ।

प्रख्यात पेंटर एवं लेखिका उषा भटनागर जी ने अपने आवास पर छोटी सी गोष्ठी आयोजित की थी, जिसमें मालती जोशी दी, पुष्पा भारती जी, सुधा अरोड़ा जी, सुमित्रा अग्रवाल जी, उर्मिला जी, छाया जी, रागिनी, चित्रा देसाई और मैं अकिंचन भी शामिल हुई ।
मालती दी से मिलते ही मैंने उनकी उस कहानी का जिक्र किया जिसकी नायिका का नाम इतना अच्छा लगा था कि मैंने स्कूल में ही अपना नाम 'रश्मि विधु' रख लिया था ('रविजा' शब्द बाद में मिला ) कथानक थोड़ा बहुत ही याद था ,मालती दी ने तुरंत कहानी का नाम बताया, ' निष्कासन'। उन्होंने पात्रों का नाम रखने में कहानीकारों को आने वाली परेशानियों का भी जिक्र किया कि कैसे हमेशा सजग रहना पड़ता है कि कोई बुरा चरित्र हो तो किसी जानने वाले का नाम ना रखा जाए ।उन्होंने बताया इसीलिये वे बहुत अलग से नाम रखती हैं, अपराजिता, बाँसुरी आदि। मुझे उनकी वो कहानी भी याद आ गई जिसमें लडक़ी का नाम 'बांसुरी' था । एक प्रेम सफल नहीं हो पाया था, लड़की एक हॉस्टल की वार्डेन बन गई थी और उसके हॉस्टल में ही उसके प्रेमी की बेटी 'बांसुरी' रहने आती है (शायद अपनी माँ को खोने के बाद ) बांसुरी के साथ रिश्ते की कश्मकश ही शायद कहानी का मूलभाव था ।मालती दी ने कहानी का नाम बताया, 'एक और देवदास ' (अब ये कहानी ढूंढ कर पढ़नी है) आज शाम उन्होंने दो कहानियां सुनाईं, 'नो सिम्पैथी प्लीज़'। स्त्रियों द्वारा एक पुरुष के मनोभावों को व्यक्त करते हुए कहानियाँ कम ही लिखी जातीं हैं । जब किसी लड़की के प्रेम सम्बन्ध को नकार कर उसकी शादी जबरन किसी और से कर दी जाती है तो सबकी सहानुभूति उस लड़की के साथ होती है ।इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता कि उस पुरुष पर क्या गुजरती है, जिसे पता होता है कि वह अपनी पत्नी का प्रेम नहीं है फिर भी वह रिश्ता निभाए जाता है ।कहानी इसी विषय की तरफ ध्यान दिलाती है।

मालती दी ने "काँच के शामियाने' पढ़कर अपनी टिप्पणी में कितना सच और सार्थक लिखा है, " शिक्षित होने का अर्थ सुसंस्कृत होना नहीं है । डिग्रियाँ मनुष्य को सभ्य नहीं बनातीं। आभिजात्य तो खून में ही होना चाहिए।वो ऊपर से ओढ़ने की वस्तु नहीं है। पौरुषी अहंकार मनुष्य को पशु बना देता है,इसका यह ज्वलंत उदाहरण है ।"
सादर नमन मालती दी 🙏🙏
(मालती जी के सुपुत्र जी का भी बहुत धन्यवाद जिन्होंने पता और फोन नम्बर की अनुपस्थिति में ये पत्र स्कैन कर मुझे मेल किया ।उनके इस प्रयास के लिए उनकी आभारी हूँ )
मालती जोशी जी  एवं पुष्प भारती जी

सुधा अरोड़ा जी और मालती जोशी जी के साथ
पुष्प भारती जी के संग

Thursday, December 15, 2016

श्वेता सोनी की नजर में "काँच के शमियाने "

शायद किसी भी लेखक को लिखते वक्त बिलकुल पता नहीं होता कि उसकी कौन सी कृति पाठकों को भा जायेगी पहले उपन्यास के लिए तो मन ज्यादा ही आशंकित रहता है। 'काँच के शामियाने ' के साथ भी ऐसा ही था ।पर पाठकों का इतना प्यार इसे मिल रहा है कि नतमस्तक हूँ , उनके समक्ष ।

Sweta Soni एक वकील हैं, हाल में ही मेरी फ्रेंडलिस्ट में शामिल हुई हैं ।उन्होंने ये उपन्यास पढ़ा और बहुत दिल से अपनी प्रतिक्रिया दी है ।उनका लिखा पढ़ , उनके कई मित्र भी अब इसे पढ़ने के इच्छुक हैं ।थैंक्यू सो मच श्वेता ।तुमने समय लगा कर पढ़ा भी और फिर इतनी मेहनत से इतना खूबसूरत लिखा भी है ।बहुत शुक्रिया :)

काँच के शामियाने 

दोस्तों, कहीं पढ़ी थी अच्छी बातों का फैलाव अधिक से अधिक होना चाहिए ।सो आज आप सब से साझा कर रहीं हूँ Rashmi ji के पहले उपन्यास "काँच के शामियाने की"...ये हमारे समाज का एक ऐसा आईना है जिसे पढ़ने वाला खुद को इसके किसी एक पन्ने पर जरूर पाएगा। रश्मि जी से मेरी पहचान "वन्दना अवस्थी दी" के पोस्ट से हुई,जहाँ कभी कभार उनके विचार को पढ़ अपने विचार उनसे साझा करती थी।तब तक ये मालूम न था के वो बिहार की बेटी हैं, जो भले स-शरीर मायानगरी में रह रहीं हो परन्तु दिल में अभी भी यहाँ की गलियों के लिए जगह कायम है।आगे जाकर मालूम हुआ ये बहुत अच्छा लिखती भी है।इस उपन्यास में इन्होंने जिस जगह का (पटना) जिक्र किया, वहाँ मेरा मायका है(मेरा गाँव अलग है, पर अब तो जहाँ हमारे परिजन बस गए घर या मायका वही बन गया)इससे पढ़ने की उत्सुकता और भी तीव्र हो गई।मँगा तो जल्द ली पर बीच में त्योहार की तैयारियो में लगी रह गई।कल घर के काम से निपट कर अचानक study room में जाते ही इसपर नजर पड़ गई, और बिना समय गंवाए मै शुरू हो गई।दोपहर को बेडरूम में भी साथ ले गई ये सोच के पढ़ते-पढ़ते अपने आप नींद आ जाएगी, पर हुआ इसका उल्टा..आगे जानने की उत्सुकता इतनी बढ़ती गई के कब शाम के 3:30 हो गए क्या खबर।वो तो स्कूल बस के हौर्न की आवाज से ध्यान बटा, तो बुक मार्क लगाकर बाहर गई।जितनी देर बच्चों को ड्रेसअप कर खाना खिलाने में लगी, उतनी देर बस दूरी बनी रही।पर अब कोई disturbance नहीं चाहती थी, सो data भी off कर दी और टेरेस पर चली गई और फिर से शुरू हो गई...
"काँच के शामियाने"....इस कहानी की नायिका-जया,जो अपने परिवार में सबसे छोटी और सबकी लाड़ली होने के साथ-साथ अपने पिता की राजकुमारी थी।रश्मि जी ने उसकी खुबसूरती की जो बखान की है वो हमें अनसुना और जीवंत लगा जो जया के आँखों के लिए था कि उसकी आँखें गुड़िया सी बेजान नहीं बल्कि चपल मछलियों जैसी चंचल थीं।किताबें उसकी पहली पसन्द थी, और पढ़ लिखकर कुछ बनना उसका मकसद । पर अचानक फूलों की तरह मुस्काने वाली, बासंती हवा की तरह इठलाने वाली, बादलों-सी हल्की और चाँदनी-सी शफ्फाक उसकी जिन्दगी देखते-देखते दर्द के दरिया में तब्दील हो गई, उसके सारे सपने धरे रह गए जब एक रात दिल के गंभीर दौरे ने उसके पिता को हमेशा के लिए उससे दूर कर दिया।अब तो वह, बस आकाश की ओर देखकर रोती और ये सोच खुद चुप भी हो जाती के अगर उपर से बाबूजी देख रहें होंगे तो उन्हें दुःख होगा और फिर माँ को भी सम्भालना था उसे उससे बड़े सबों की शादी हो गई थी और वे सब अपने-अपने परिवार को सम्भालने मे लगें थें जो बाबूजी के तेरहवीं के बाद हीं चले गए थे।
फाईनल इम्तहान खत्म कर वो अपने माँ के साथ अपने बाबूजी के बनाए मकान..जो पटना के कंकड़ बाग में था वही आ कर रहने लगी, क्योंकि सरकारी क्वार्टर बाबूजी के बाद छिन गया।यहाँ वही हुआ जो हर युवा लड़की के जीवन में होता है।राजीव नाम का लड़का न चाहते हुए भी इसकी जिन्दगी में आ गया।बार- बार इसके ठुकराने के बाद भी जाॅब वाला लड़का था सो माँ और भैया ने खुशी से हामी भर दी।
अब इस चिड़िया को नया संसार बसाने के लिए बाबुल का घोंसला छोड़ना पड़ा।जहाँ पग-पग पर उसे नई यातना और ताने दिए जाने लगे,राजीव हर बात पर (पहले) खुद को ठुकराए जाने का बदला लेने लगा।
बहुत देर से हीं सही पर,आखिर एक दिन वो भी आता है, जब जया अपने तीनों बच्चों के साथ मिलकर खुद को साबित करते हुए अपना अस्तित्व कायम करती है।अंत तो बहुत सुखद हुआ, परन्तु रशिम जी ने बीच-बीच में जया के साथ-साथ हमें भी खूब खुब रूलाया।अंत के सुख के एहसास के बाद भी जम के रोयी-ये कहते हुए के काश जया जैसी हर औरत का अंत ऐसा ही सुखद हो।
यह मेरी प्रतिक्रिया कम और उपन्यास के शौकीन मेरे सभी मित्रों से एक सुझाव ज्यादा है के इसे एक बार पढ़ कर जरूर देखें,अगर अभी तक न पढ़ा हो तो।इसकी जीतनी तारीफ करूँ कम है।बहुत बधाई आपको।आपके अगले उपन्यास के इन्तजार में.......श्वेता सोनी । :)

Wednesday, December 14, 2016

फेमिना पत्रिका की 2016 की पठनीय पुस्तकों की सूची में 'काँच के शामियाने '

'फेमिना' पत्रिका के अगस्त अंक में हर विधा की कुछ किताबों का जिक्र किया गया है और इन्हें अवश्य पढ़ने की सलाह दी गई है ।इस सूची में 'काँच के शामियाने' को देखकर अपार ख़ुशी हुई ।शुक्रिया फेमिना :)





नवभारत टाइम्स में 'काँच के शामियाने ' की समीक्षा


बहुत शुक्रिया आभा जी  एवं 'नवभारत टाइम्स' 
आपने कितना सही लिखा है ," साज़िशें नहीं साहस कामयाब होता है ।"




Saturday, October 15, 2016

केरल यात्रा (एर्नाकुलम से मुन्नार ) -- 2

एर्नाकुलम में डिनर के बाद हमने बाहर टहलने की  सोची पर वहाँ सडकों पर बहुत  वीरानी छाई हुई  थी , कार, ऑटो भी नजर नहीं आ रहे थे और रास्ते का भी अंदाजा नहीं था ,इसलिए हम वापस लौट आये .पर मैंने रात में ही सोच लिया था , सुबह जल्दी उठ जाउंगी और कल सुबह अकेली ही निकल पडूँगी .सूरज दादा की चौकीदारी में कैसा डर ।
सुबह -ए-एरनाकुलम
यूँ तो मुंबई के सामने हर शहर ऊँघता हुआ सा ही लगता है पर एरनाकुलम तो जैसे बस जरा सी पलकें खोल ,पलकों की झीरी से ही सुबह का जायजा ले रहा था ।अजनबी शहर की अनजान सड़कों पर घूमना मुझे हमेशा ही प्रिय है ।सुबह साढ़े पांच बजे नींद खुल गई  और छः बजे तक मैं कमरे से बाहर आ गई ।होटल बिलकुल सुनसान था सिर्फ एक स्टाफ दिखा, पर गेट खुला हुआ था ।सामने की सड़क बिलकुल सूनी थी ।आस पास के घरों में भी कोई हलचल नहीं हो रही थी ।रंग बिरंगे फूलों के लॉन वाले खूबसूरत घर थे ।एक घर के बाहर एक बूढी अम्मा पानी डालकर बरामदा धो रही थीं ।एक घर से घण्टी की टुन टुन के साथ मधुर स्वर में श्लोक पढ़ने की आवाज आ रही थी ।(अब ये स्पष्ट करने की जरूरत तो नहीं कि मधुर आवाज़ किसी स्त्री की ही होगी :)।थोड़ी दूर आगे चल कर दाहिने मुड़ जाने के बाद ,थोडा चलने के बाद मुख्य सड़क आ जाती है ।इतना अंदाजा मुझे था ।
इस सड़क पर भी कोई नहीं था और मन हुआ क्यों न थोड़ी जॉगिंग ही कर लूँ ।मुम्बई में तो किसी भी वक्त सड़क या पार्क में ढेरों लोग होते हैं और दौड़ने में संकोच कर जाती हूँ ।पर यहाँ भी टाल गई ।हवा में समाती सांभर की ख़ुशबू नाक में भरते खरामा खरामा मुख्य सड़क पर आ गई और सामने जो देखा ,आश्चर्य में डूब गई ।सड़क झील के किनारे किनारे चल रही थी ।झील में कुछ बड़े नाव लंगर डाले खड़े थे ।हवा में हल्की सी खुनक थी ।ये एक पॉश इलाका लग रहा था ।सड़क की दूसरी तरफ कोर्ट, अस्पताल, कॉलेज, स्कूल बने हुए थे ।एक खस्ता हाल बिल्डिंग के ऊपर लिखा था ,Govt post matric hostel for boys' पहली बार ऐसा लिखा देखा ,post matric के लिए तो कॉलेज ही लिखा जाता है ।(बाद में एक येल्ल्पी में एक इमारत दिखी...जिसपर लिखा था pre matric girls hostel .शायद केरल में pre matric ,post matric कहने का चलन है.)हर प्रदेश में सरकारी भवनों का यही हाल है ।खिड़कियों के सारे शीशे टूटे हुए थे ।दरवाजे नहीं थे पर नीचे कुछ बाइक खड़ी थीं ।यानि ऐसे हाल में भी कुछ लोग रहते ही होंगे ।
मैरीन इंस्टिट्यूट से तीन लड़के बैग टाँगे निकलते दिखे तो उनसे इस कॉलोनी का नाम पूछ लिया ।'फाइन आर्ट एवेन्यू' नाम था इसका ।यथा नाम तथा गुण ।बहुत साफ़ सुथरा और कलात्मक ।एक चौराहे पर काले पत्थर से बनी महात्मा गांधी की बैठी हुई बड़ी सी भव्य मूर्ति लगी हुई थी ।थोड़ी ही दूरी पर एक स्तम्भ पर चारों दिशाओं की तरफ मुँह करती चार घड़ियाँ लगी हुई थीं ।और सब अलग समय पर रुकी हुई ।एक में साढ़े ग्यारह तो दूसरे में पौने तीन बज रहे थे ।यानि घड़ियाँ एक ही समय पर लगाई गईं होंगी पर खराब अलग अलग समय पर हुईं :)
सड़क के किनारे बंजारों के दो तीन परिवार ने डेरा डाले रखा था ।स्त्रियां लम्बी ऊँची सुंदर थीं ।मैंने बच्चे के साथ एक की फोटो ली तो दूसरी भी सुंदर कम्बल में लपेटे अपने बच्चे को लेकर सामने आ गई ।बच्चे का नाम पूछा तो बताया, 'रोहित '
उनसे पूछ ही लिया ,'कहाँ से आये हो?'
'राजस्थान से'
..'इतनी दूर ??'
"हाँ घूमते हुए चले आये '
मैं सोच रही थी राजस्थान से इतनी दूर केरल...ना भाषा समझ में ना आने वाली न खान पान ।पर बंजारों से ये कितना बेवकूफी भरा सवाल था ...वे तो घूमते हुए कहीं भी पहुँच जा सकते हैं ।
थोडा आगे एक बहुत खूबसूरत पार्क था पर करीब करीब खाली ।मैंने गेट से अंदर जाना चाहा तो पाया गेट बन्द है ।तभी दूर से जॉगिंग ट्रैक पर एक सज्जन आते दिखे और मैंने पूछ लिया ,'ये कोई प्राइवेट पार्क है क्या ?' उन्होंने बताया आगे की तरफ का गेट खुला है काफी चलने और कई बन्द गेट पर करने के बाद मेन गेट मिला जिस पर लिखा था ,'Subhash Chandr Bose park' ।कुछ लोग भी दिखे ।शायद यही वजह थी कि इतने कम लोग थे अब जब खुले गेट के लिए इतनी दूर चल कर आना पड़ेगा तो कौन आएगा ।झील से सटा हुआ जॉगिंग ट्रैक था और किनारे बेंच भी लगी हुई थीं ।इक्का दुक्का लोग बेंच पर बैठे थे और थोड़े से लोग टहल रहे
थे ।बहुत ही खुबसूरत जगह थी .

बेटे का फोन आया कि वह भी आ रहा है और मैं पार्क में इधर उधर घूमती उसका इंतज़ार करने लगी ।उसके आने के थोड़ी देर बाद हम भी लौट पड़े ।रास्ते के किनारे पेड़ के नीचे नारियल वालों की दूकान सज रही थी ।पेड़ की शखाओं से बंधे नारियल के गुच्छे भले लग रहे थे ।मुम्बई में मेरी दक्षिण भारतीय सहेलियाँ केरल-कर्नाटक के नारियल की बहुत तारीफ़ करती हैं ।कुछ तो मुम्बई में नारियल पानी पीती ही नहीं कि' हमारे गाँव वाला टेस्ट नहीं' ।मैंने भी बहुत हुलस कर एक नारियल लिया पर या तो बदकिस्मती से मुझे अच्छा नारियल नहीं मिला या शायद ऐसा ही स्वाद होता हो ।मुझे तो मुम्बई वाला नारियल पानी ही पसंद
मुझे उम्मीद थी कि नुक्कड़ पर कहीं फिल्टर कॉफी मिलेगी ।पर एक जगह चाय ही मिली ।दो दिन में सिर्फ एक बार फिल्टर कॉफी नसीब हुई है ।यहाँ भी नेस्कैफे और ब्रू ने ही बाजार जमा लिया है .


होटल में नाश्ता  कर हम तैयार हो गए . नाश्ते में इडली साम्भर ,डोसा, ब्रेड बटर ,कॉर्नफ्लेक्स  के साथ पूरी भाजी  भी थी . पूरी का आकार , पूरी में से आधी कटी हुई पूरी का था . समूचे केरल यात्रा में हर होटल के नाश्ते में  पूरी इसी  शेप की मिली . ऐसी पूरी खिल भी नहीं पाती .मैं नाश्ता के लिए जाते वक्त कभी भी फोन लेकर नहीं जाती (चार्जर में लगा छोड़ देती ) वरना फोटो भी ले लेती.
Kerala Folklore Theatre and Museum at Thevara, Ernakulam सबसे पहले हम कोचीन में ही स्थित 'लोक कला म्यूजियम' में गए . इसे  Kerala Folklore Theatre and Museum at Thevara, Ernakulam कहा जाता है . यह म्यूजियम  George Thaliath और उनकी पत्नी Annie George के 25 वर्ष के प्रयासों का फल है.  65 कुशल बढ़ई और कारीगर ने इसे बनाने  में सात वर्षों का समय लिया. 2009 में इसका उदघाटन हुआ. 

इसकी इमारत तीन मंजिला है और इसका निर्माण 'मालाबार', त्रावणकोर और कोचीन की वास्तुकला के आधार पर हुआ है. इसका प्रवेश  द्वार ही सोलहवीं सदी के तमिलनाडू के एक मंदिर के भग्नावशेष से बना है. पहली मंजिल को Kalithattu, कहा जाता है, इसमें केरल के विभिन्न पारम्परिक और लोक नृत्य जैसे, थेय्यम, कथकली, मोहनीअट्टम, ओट्टान्थुल्ल (Theyyam, Kathakali, Mohiniyattam and Ottanthullal) की वेशभूषा और जेवर रखे गए हैं . दूसरी मंजिल, जिसे कमल पत्र  कहा जाता है , खूबसूरत म्यूरल पेंटिंग्स से सजा हुआ है . इसकी लकड़ी की छत पर अद्भुत कारीगरी की हुई है.जो साठ फ्रेम से मिलकर बना है . यहाँ, मास्क, कठपुतलियाँ, गहने, दीप स्तम्भ, एंटिक वाद्य यंत्र, और लकड़ी ,ब्रोंज, पीतल की कई मूर्तियाँ हैं. पाषाण  युग की कई मूर्तियाँ भी हैं. एक जगह देखा, दसवीं शताब्दी में पुत्र प्राप्ति की मन्नत के लिए लोग कुछ आकृतियाँ चढाते थे . यानि पुत्र प्राप्ति की कामना ,इतनी पुरानी है. 
तीसरी मंजिल पर लकड़ी का सुंदर स्टेज बना अहा है ,जहां रोज साढ़े छः बजे केरल की प्राम्प्रिक कलाओं और नृत्य  की मंच प्रस्तुति होती है. 
प्रवेश शुल्क , प्रति व्यक्ति 100 रुपये है . कैमरा के लिए भी 100 रूपये का टिकट है. म्यूजियम में  मुझे केरल में जन्मी पर कर्नाटक में रहने वाली एक डॉक्टर मिल गई. जो मेरी गाइड बन गई और हर चीज़ विस्तार से बताया . पारम्परिक नृत्य के गहने इतने भारी  थे कि उन्हें पहनकर नृत्य करना कितना मुश्किल होता होगा, सोचकर  ही हैरानी होती है. एक जगह एक मंदिर का दरवाजा सुरक्षित रखा गया  था .जिसकी ऊँचाई बहुत  छोटी थी.  .डॉक्टर साहिबा ने बबताया  कि हमारा समाज मातृ सत्तात्मक  है .मंदिर पर औरतों का अधिकार होता है और उनकी अनुमति से ही कोई मंदिर में प्रवेश कर सकता है, पति भी .पीतल के गुड्डे -गुडिया भी दिखे ,उन्होंने बताया कि शादी मे लड़की को दिए जाते हैं और नवरात्रि में हर घर के गुड्डे गुड़ियों की सफाई की जाती हैऔर उन्हें सजाया जाता है. एक लकड़ी की गोल सी  चीज़ दिखा कर कहा कि इसमें रखकर गरम  चावल परोसा जाता है. वे लोग आज भी अपने घ रों  मे इस्तेमाल करते  हैं . म्यूजियम में एक दूकान भी थी जहां साड़ियाँ, बैग, एंटिक जेवर, नाव की आकृति बहुत कुछ बिक रहा था .जिसे टूरिस्ट यादगार के तौर पर ले जा सकते हैं .
म्यूजियम अच्छी तरह घूमने में दो घंटे लग जाते हैं . 

RAASA Restaurant  -- केरल का पारम्परिक भोजन 

वहाँ से निकलते लंच का वक्त हो गया था. और ड्राइवर हमें एक रेस्टोरेंट में ले गया ,जहां केले के पत्ते पर केरल का पारम्परिक भोजन मिल रहा था . एक सहेली  के घर में ओणम में जितने व्यंजन  खाए थे ,केले के पत्ते पर वे सारे व्यंजन परोसे गए . गुड और अदरक की चटनी, अवियल, रसम, साम्भर , मूंग दाल ,पापड्म और ढेर सारी अलग अलग सब्जियां थीं ,.हर ओणम में सहेली के घर जीमने के बाद भी उनके नाम मुझे कभी याद नहीं हो पाए . दो तरह का पायसम भी था, जिसका स्वाद अद्भुत था . बाद मे भी हम हर जगह  पायसम ढूंढते रहे पर कहीं नहीं मिला. फिर ह्में ख्याल आया उत्तर भारत के किसी होटल में जाकर हम खीर मांगे तो क्या ह्में मिलेगा  :)
खा पीकर हम मुन्नार की तरफ चल दिए . रास्ता बहुत ही खूबसूरत था , घूमती हुई पहाड़ी सडकें और हर तरफ हरियाली .उनके बीच गुलमोहर की तरह कई पेड़ नारंगी रंग के चटख फूलों से लादे हुए. ड्राइवर को भी उनका नाम मालूम नहीं था .कहीं भी एक इंच भी खाली जगह नहीं दिखती .हर तरफ हरा भरा. .शायद इसीलिए इसे God's own country कहा जाता है. रास्ते में दो जगह खूबसूरत झरने भी मिले .

करीब तीन बजे हम होटल 'ब्लैक फ़ोरेस्ट' पहुँच गए .नाम के अनुसार ही बिलकुल घने जंगल के बीच में यह होटल था और पहाड़ की ढलान पर बना हुआ था .पहला होटल ऐसा देखा, जिसमें एंट्री छत की तरफ से थी . छः मंजिल की होटल में छत की तरफ से प्रवेश कर लिफ्ट से नीचे जाना पड़ता है. चौथी मंजिल पर रिसेप्शन और दूसरी मंजिल पर हमारा कमरा था . सुन्दर सी बालकनी भी थी .और पास ही बहते झरने का शोर कमरे तक बदस्तूर पहुँच रहा था . 

Spice Garden Munnar
आज- कल -परसों फूल

कमरे में थोड़ी देर आराम कर हम 'स्पाइस गार्डेन' देखने निकला गए . हल्की सी बारिश शुरू हो गई थी . और हमारे पास छाता नहीं था . .सोच ही रहे थे कैसे घूम पायेंगे कि देखा गार्डेन के ऑफिस के बाहर ढेर सारे छाते रखे हुए हैं . यहाँ  भी प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति 100 रुपये था . एक साठ वर्षीय हंसमुख गाइड हमारे साथ हो लिए और एक एक पेड़ के विषय में विस्तार से बताया. हमने दाल चीनी, काली मिर्च, इलायची, कॉफ़ी, जायफल, अंजीर , कोको और ढेर सारी आयुर्वेदिक औषधियों वाले पौधे देखे . साथ में उन पौधे के गुण भी बताते जा रहे थे . सुनते वक्त तो लग रहा था , सब याद है पर शाम तक सब गड्ड मड्ड हो गया. बस प्रमुख चीज़ें ही याद रहीं.


इलायची के पौधे कि जड़ों के पा स्खूब सारी इलायची फली हुई थी . इसे तैयार करते वक्त पांच किलो इलायची में से एक किलो इलायची ही काम लायक मिलती है. इसकी फसल साल भर होती है. 45 दिनों में एक फसल तैयार हो जाती है. कोको खूब सारे फले हुए थे .इसके बीज्निकाल कर सुखाया जाता है और फिर उस से चॉकलेट बनाई जाती है.
 रुद्राक्ष का पेड़ भी दिखाया .और बताया कि हज़ारों  रुद्राक्ष के फल में से एक 'एकमुखी रुद्राक्ष' मिलता है और उसकी कीमत लाखों में होती है. अन्नानास, नांरगी भी फले हुए दिखे . कई गोल मटोल  संतरे पेड़ से लटक रहे थे .पर उन्हें तोड़ने का मन नहीं हुआ ,जैसा हिमाचल में सेब के बाग़ देख कर हुआ था .शायद इसलिए कि यहाँ एक ही पेड़ था जबकि वहाँ गुलाबी सेब से लदे  सैकड़ों पेड़ थे. इस स्पाइस गार्डेन में हर चीज़ का एक ही पेड़ यक पौधा था, जिसे टूरिस्ट के दर्शनार्थ लगाया गया था .वरना कई एकड़ जमीन में इन सबके पेड़ हैं और हज़ारों लोग उसकी देखभाल में लगे होते हैं . एक  भीनी भीनी खुशबू वाली   छोटे छोटे फूलों की  झाडी थी, जिसे 'आज- कल -परसों' कहते हैं .इस फूल का रंग पहले दिन सफेद, दूसरे दिन नीला और तीसरे दिन हल्का बैंगनी  हो जाता है. 

गार्डेन के एक छोर पर मसालों और आयुर्वेदिक औषधियों की एक दूकान थी . तरह तरह के तेल और दवाइयां थीं वहां . बाल झड़ने की समस्या से तो सभी ग्रस्त रहते हैं . उनकी बातों में आकर हमने भी खूब महंगे तेल ले लिए (अभी घर में किसी ने आजमाना शुरू नहीं किया है ) कुछ मसाले ले लिए . पेमेंट करते वक्त उनलोगों ने बोला कि कार्ड नहीं लेते. अब आजकल लोगों की कैश रखने की आदत खत्म हो गई है. हमारे पास भी लिमिटेड कैश थे . उनलोगों ने कहा, 'पास ही ATM है. ड्राइवर आपको ले जाएगा .' हमें भी अभ्यास है, मुम्बई में हर नुक्कड़ पर ATM मिल जाता है . लिहाजा हमने पास के सारे कैश दे दिए .बाहर आकर जब ड्राइवर से कहा तो उसने बोला...ATM तो टाउन में है, वहाँ जाने में डेढ़ घंटे लगने थे . स्पाइस गार्डेन के बाद हमें 'कथकली और कलारीपयाट्टू (Kalarippayattu ) का शो देखना था . स्पाइस गार्डेन से थोड़ी ही दूर पर 'शो सेंटर' था पर वे लोग भी कार्ड से पेमेंट नहीं लेते थे .लिहाजा हमें टाउन ही जाना पडा. वहाँ भी चार ATM में कैश ही नहीं थे .पांचवे ATM में कैश था पर लंबा क्यू भी . पैसे निकालने जरूरी थे . शो के लिए हम समय पर नहीं पहुँच पाते .

 इसलिए उसी भीगे भीगे से छोटे से मार्केट में घूमते रहे . एक रेस्टोरेंट में गर्म गर्म मिर्ची के भजिये और मसाला चाय पिया  (फिल्टर कॉफ़ी यहाँ भी नहीं मिली ) .बड़ी बड़ी मिर्ची के बेसन में लिपटे भजिये केरल में बहुत मशहूर है. ठेले पर खूब मिलते हैं. ठेलेवाले मिर्ची का तोरण या हार सा सजा कर रखते  हैं . अन्धेरा हो गया था और इन सर्पीली रास्तों से हमें अभी होटल वापस लौटना था . कुछ जगह रास्ते पर बादल उतारे हुए थे और जीरो विजिबिलिटी थी. जैसन ने बताया इन रास्तों पर हमेशा ही  बादल रहते हैं. आगे रास्ता खुल जाएगा . सर्दियों में तो छः बजने के बाद रास्ते बिलकुल बंद हो जाते हैं. शाम ढलने से पहले ही होटल वापस लौटना होता है .
यहाँ एक सीख मिली कि किसी हिल स्टेशन  पर जाएँ तो पर्याप्त कैश रखें .ATM दूर होते हैं और कैश से खाली भी.







नृत्य के जेवर 









गुड्डा गुड़िया




मन्दिर का द्वार 

नरसिंह भगवान 


अन्नानास 


अंजीर 

अंजीर 

काली मिर्च 


गोलमिर्च 

कोको 


इलायची 

जड़ों के पास फले इलाची 


कॉफ़ी बीन्स 


गंधराज पुष्प

भीगा भीगा मुन्नार  शहर