Tuesday, August 9, 2016

बुधिया सिंह : बॉर्न टू रन

हमारे आस पास कुछ बच्चे ऐसे जरूर होते हैं जिनमें जन्मजात प्रतिभा होती है ,जरूरी है कि उस प्रतिभा को पहचान कर उसे निखारा और संवारा जाए. यह अकेले पेरेंट्स के वश का नहीं है .स्कूल,सरकार और खेल संगठनों की जिम्मेवारी है कि वे इस प्रतिभा को अच्छी ट्रेनिंग और पूरी सुविधाएं प्रदान करें .तभी भविष्य में देश को अच्छे खिलाड़ी मिलेंगे और अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में कुछ मेडल भारत की झोली में भी गिरेंगे . पर होता है, इसके बिलकुल विपरीत .पहले तो प्रतिभा पहचानी नहीं जाती ,संयोगवश कोई विलक्षण प्रतिभा सामने आ गई तो उसे ट्रेनिंग नहीं मिलती, अगर किसी कोच ने स्वयं मेहनत कर ट्रेन करने की जिम्मेवारी ले भी ली तो सरकार और तमाम संगठन उसकी राह में सौ अडचनें डालते रहते हैं
.
'बुधिया सिंह' नाम का छोटा बच्चा हम सबको याद होगा. पर उसकी असाधारण प्रतिभा को उभरने का कोई मौक़ा नहीं दिया गया .
“बुधिया सिंह : बॉर्न टू रन” फिल्म के रिलीज का दिन जानबूझकर ओलम्पिक के एक दिन पहले चुना गया ताकि हम एक पल को रुकें और सोचें . 2002 में जन्मे बुधिया को चार वर्ष की उम्र में उसकी माँ , अत्यंत गरीबी के कारण एक फेरीवाले को महज 800 रूपये में बेच देती है . जब एक जुडो इंस्ट्रक्टर ‘विरंची दास’ जो समाजसेवी भी हैं को पता चलता है तो वे 800 रुपये चुका बुधिया छुडा लाते हैं .वे जुडो क्लास के साथ एक अनाथालय भी चलाते हैं, उसमें अन्य बच्चों के साथ बुधिया को भी रख लेते हैं. एक दिन गाली देने पर बुधिया को सजा देते हैं कि ग्राउंड के चक्कर लगाओ और जबतक मैं न कहूँ, रुकना नहीं. सजा देकर वे अन्य काम से बाहर चले जाते हैं, जब पांच घंटे बाद लौटते हैं तो पाते हैं, बुधिया अब भी वैसे ही चक्कर लगा रहा है .डॉक्टर को दिखाने पर डॉक्टर बताते हैं , उसका शरीर बिलकुल नॉर्मल है .
कोच उसे मैराथन के लिए ट्रेन करना शुरू कर देते हैं और पांच साल की उम्र में बुधिया सिंह 48 मैराथन पूरी कर लेता है . टी वी पर अखबारों में बुधिया की खबरें दिखाई जाती हैं और वह स्टार बन जाता है .विदेशों में भी खबर पहुँचती है ,और बाल कल्याण वाले सक्रिय हो जाते हैं . विरंची दास के तौर तरीके ,उनके गुस्सैल स्वभाव से उडीसा सरकार का बाल कल्याण विभाग भी नाराज़ रहता है , और बुधिया के दौड़ने पर रोक लगा दी जाती है . कई सरकारें और खेल संघ बुधिया के लिए कई हजारों का ईनाम घोषित करते हैं . बुधिया की माँ को लगता है, कोच को सारे पैसे मिलते हैं .और वह विरंची दास पर बुधिया को मारने पीटने, अत्याचार का आरोप लगा देती है .जबकि सारे इनामों की घोषणा महज घोषणा थी, सारे चेक बाउंस कर गए थे .बुधिया को कोच के पास से लेकर एक सरकारी स्कूल के होस्टल में रख दिया जाता है . सिर्फ उडीसा में ही नहीं, पूरे देश को बुधिया की प्रतिभा का पता था पर उडीसा से लेकर देश का कोई भी खेल संगठन बुधिया की कोई खोज खबर नहीं लेता . अगर बुधिया की ट्रेनिंग जारी रखी जाती ,अच्छी कोचिंग दी जाती तो आज इस रियो ओलम्पिक २०१६ में भारत का भी एक मैराथन रनर होता .शायद कोई मेडल भी ले आता. . .स्कूल में बुधिया को कोई विशेष ट्रेनिंग नहीं उपलब्ध करवाई गई और आज वो एक आम छात्र बन कर रह गया है .
पर ये अकेली बुधिया की कहानी नहीं है...जाने कितनी प्रतिभाएं सही देख रेख के अभाव में यूँ ही मुरझा कर विलीन हो गईं . हमारे यहाँ एक और प्रवृत्ति है, जल्दी से जल्दी सबकुछ पा लेने की . विरंची दास का भी बुधिया को इतना ओवर एक्सपोजर देना और रेकॉर्ड बनाने के लिए इस तरह दौड़ने के लिए विवश करना कहीं से सही नहीं ठहराया जा सकता. पांच वर्ष के बुधिया को ‘भवनेश्वर’ से ‘पूरी’ 70 किलोमीटर की दूरी तक दौड़ने के लिए तैयार किया गया . 7 घंटे तक लगतार दौड़ते हुए ६५ किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद बुधिया बेहोश हो गया . जाहिर है, इस खबर के बाद उसके दौड़ने पर बैन लगना ही था . ‘विरंची दास’ उसे अकेले में ट्रेन करते रहते और सही उम्र पर लाइम लाईट में लाते तो सही होता . दुर्भाग्यवश , एक गैंग्स्टर ने 2008 में विरंची दास की हत्या कर दी .इसे पोलिटिकल मर्डर भी कहा गया है .

फिल्म ‘मनोज बाजपेई और बाल कलाकार ‘मयूर पाउले’ के कंधों पर है. मनोज बाजपेई हर फिल्म के साथ अभिनय के नए कीर्तिमान बनाते जा रहे हैं .ओडिया एक्सेंट में उनका डायलॉग बोलना, कभी एक जल्दबाज, गुस्से वाले हार्ड टास्क मास्टर और कभी बुधिया के साथ खेलते एक कोमल दिलवाले गार्जियन सारा अभिनय ,अभिनय ही नहीं लगता .जब होस्टल में बुधिया से मिलने जाते हैं, वह दृश्य बहुत मार्मिक है . मयूर पाउले तो साक्षात् बुधिया ही लगता है .एक पल को महसूस नहीं होता, वो एक्टिंग कर रहा है. भोर में बुधिया का दौड़ना...पुल के नीचे बहती नदी और लहरों पर चमकती उगते सूरज की किरणें, बहुत सुंदर छायांकन है.फिल्म में एक अच्छी बात ये है कि सरकार की कमियाँ दिखाई गई हैं तो कोच विरंची दास की कमजोरियां भी छुपाई नहीं गई हैं . एक छोटे बच्चे को इतनी कड़ी ट्रेनिंग देना , अपनी बात पर अड़े रहना, किसी की ना सुनना सब ईम्नादारी से दिखाया गया है .
बुधिया की कहानी और खेल संघों, सरकार की गंदी राजनीति सामने लाने के लिए लेखक निर्माता निर्देशक सौमेंद्र पाढ़ी (Soumendra Padhi ) बधाई के पात्र हैं . फिल्म थोड़ी धीमी है और कुछ कुछ डाक्यूमेंट्री सी है. पर बोरियत बिलकुल नहीं होती .

Tuesday, August 2, 2016

'काँच के शामियाने ' पर मंजू रॉय जी की टिप्पणी



Manju Roy ji अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापिका हैं ।उन्होंने विश्व साहित्य पढ़ रखा है और पढ़ाती भी हैं । 'काँच के शामियाने ' पर उनकी प्रतिक्रिया पढ़ते वक्त मन थोडा आशंकित भी था और यह जानने की उत्सुकता भी थी कि उन्हें किताब कैसी लगी ।उन्हें किताब पसंद आई, ये देख सचमुच धन्य हो गई मैं :)

'बिहार की बेटी का एक कृतज्ञता ज्ञापन है ये किताब.'..यह पढ़कर तो नतमस्तक हूँ, मंजू दी
आप जैसी विदुषी की प्रतिक्रिया...लिखने का उत्साह भी बढ़ाती है और एक गहरी जिम्मेवारी का भी अहसास कराती है. ..बहुत शुक्रिया आपका...स्नेह बनाए रखें :)

'काँच के शामियाने '

दो दिन पूर्व रश्मि रविजा द्वारा लिखित उपन्यास,काँच के शामियाने की प्रति मिली।कॉलेज में कुछ व्यस्तता के बावजूद जल्दी से उपन्यास ख़त्म किया,जो मेरी पुरानी आदत है।

उपन्यास पढ़कर ऐसी अनुभूति हुई कि कितनी ही जया मेरे इर्द गिर्द हैं जो उपन्यास की नायिका की तरह परिवार,समाज और बच्चों की सोंचते सोंचते काफी समय बाद साहस करती हैं एक ऐसे विवाह से बाहर आने की जहाँ उन्हें दुःख,पीड़ा,अपमान,अवमानना,शारीरिक प्रताड़ना और आंसुओं के सिवा कुछ नहीं मिला।मुझे लगता रहा जया ने इतनी देर क्यों की, फिर लगा इसके लिए हम और हमारा समाज जिम्मेवार है जो एक लड़की को घुट्टी में यही पिलाता है कि तुम्हारा ससुराल ही तुम्हारा घर है और शादी को बचाये रखने की जिम्मेदारी औरत की है,मर्द की नहीं।एक लड़की तब तक बर्दाश्त करती है जब तक उसके दर्द की इन्तहा न हो जाये।

जया के पति राजीव की तरह काफी पुरुष हैं जो इस एहसास के साथ बड़े हुए हैं कि वो लड़का है,जिसके लिए सात खून माफ़।कमाऊ पूत के अवगुण परिवार नहीं देखता।

उपन्यास में वर्णित जगहें,हाजीपुर,सीतामढ़ी,बेगुसराय,खगड़िया सब इर्द गिर्द हैं मेरे और वहां मैं जाती रही हूँ।
रश्मि ने जिस बारीकी से कॉलोनी लाइफ का चित्रण किया है वह काबिलेतारीफ है।देसी बोली जो इधर बोली जाती है,वह कहानी को और प्रमाणिक बनाती है।

मुम्बई रहकर भी रश्मि ने अपने प्रदेश को अपनी यादों में बसा रखा है,बिहार की बेटी का एक कृतज्ञता ज्ञापन है ये किताब।इसे पढ़ कर यदि एक जया भी अपनी जिंदगी को दुबारा शुरू करने की हिम्मत कर ले तो वो रश्मि की कामयाबी होगी। हमें अपनी बेटियों को बताना होगा कि हम उन्हें भार नहीं समझते और उनके हर फैसले में उनके साथ हैं।बेटियाँ इस दुनिया की खूबसूरती हैं।उम्मीद है रश्मि की दूसरी किताब जल्द ही सामने होगी।

बहुत बहुत बधाई,रश्मि, तुमने एक बेटी होने का फर्ज बहुत खूबसूरती से अदा किया है।

Thursday, July 28, 2016

कहाँ गुम हुआ लाखों का सावन (प्रभात खबर में कवर स्टोरी )


'प्रभात खबर 'की पत्रिका सुरभि में मेरी लिखी कवर स्टोरी

जब तपती धरती पर बारिश की फुहारें पड़ती है और ठंढी हवाएं चलने लगती हैं तो सबके मन प्राण शीतल हो जाते हैं. शायद ही कोई ऐसा हो, जिसके चहरे की तनी रेखाएं कोमल ना पड़ जाएँ और चेहरे पर मुस्कराहट लिए वह ‘सावन’ का स्वागत ना करे. यही खुशनुमा अहसास दिलाने के लिए फिल्मों में भी सावन के गीत शुमार किये जाते रहे हैं . पहले पारिवारिक फ़िल्में ज्यादा बनती थीं और उसमे सुख दुःख ,मिलन-विछोह जैसी भावनाएं समान रूप से समाहित रहती थीं . कभी मिलन तो कभी विरह को सावन के गीतों के माध्यम से व्यक्त किया जाता था . दरअसल सावन एक मूड को परिलक्षित करता है ,एक माहौल के निर्माण का. जब प्रिय पास नहीं हो और उसकी याद दिल में जागे ,ऐसे में सावन का मौसम हो तो रिमझिम बारिश के साथ विरह ज्वाला और भी तेज हो जाती है. और फिल्म निर्देशक एक प्यारे से गीत के साथ ऐसे दृश्य को जीवंत कर देते हैं .
1944 में ‘रतन’ फिल्म में दीनानाथ मधोक का लिखा और जोहराबाई अम्बालावाली का गाया यह गीत बहुत पसंद किया गया .संगीत निर्देशन नौशाद का था और यह फिल्म उनकी पहली म्यूजिकल हिट मानी जाती है.
“रुमझुम बरसे बदरवा ,मस्त ह्वायें आईं

पिया घर आजा, आजा ओ मेरे राजा

सावन कैसे बीते रे ,मैं यहाँ तुम कहाँ  
हमको याद ना आये रे, याद सताए तेरी “

महाकवि कालीदास ने सावन के बादलों से बिनती की थी कि वह कवि की दशा का बयान ‘कवि पत्नी’ से करे . वैसे ही 1955 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘आज़ाद ‘ में मीनाकुमारी सावन के बादलों से याचना करती है. राजेन्द्र कृष्ण के बोलों को संगीत से संवारा ‘सी रामचन्द्र ‘ ने ,आवाज़ कंठ कोकिला लता मंगेशकर की
जा री जा री ओ कारी बदरिया

मत बरसो री मोरी नगरिया

परदेस गए हैं सांवरिया

1960 में आई फिल्म जिसका नाम ही था ‘बरसात की रात ‘ .इस फिल्म में भी नायिका की शिकायत है,
‘गरजत बरसत सावन आयो रे

लायो ना संग हमारे बिछड़े बलमवा

सखी क्या करू हाय .
साहिर लुध्यान्वी के शब्दों को रोशन ने ऐसे संगीत में बाँधा कि यह गीत अमर बन गया है.

सावन के गीतों में केवल अपने प्रिय को ही नहीं .अपने बिछड़े गाँव , झूले झूलती सखियाँ ,लहलहाते खेत सबको याद किया जाता है. 1963 में रिलीज़ हुई फिल्म बंदिनी का यह गीत आज भी आँखें भिगो देता है .शैलेन्द्र के मर्मस्पर्शी शब्दों को सचिन देव बर्मन ने उतने ही मार्मिक धुन में बाँधा है. आशा भोंसले की आवाज़ में गाया यह ग़ीत सबके मन में एक टीस जगा जाता है .
“अबके बरस भेज भैया को बाबुल

सावन में लीजो बुलाये रे “

सावन के गीतों में केवल विरह-विछोह ही नहीं व्यक्त होता ,जब प्रिय पास हों तो सावन का मौसम मन में उमंगे जगा देता है. हर्ष और उल्लास में लिपटे मन के लिए सावन में यह पृथ्वी स्वर्ग सी सुंदर बन जाती है .जाहिर है, ऐसे मनोभावों को व्यक्त करने वाले गीत भी अलग मिजाज़ के होंगे .आज भी बारिश की पहली फुहार पड़ते ही 1960 की फिल्म ‘परख’ का यह गीत दिलो-दिमाग पर दस्तक दे जाता है . शैलेन्द्र के लिखे इस गीत की धुन बनाई है सलिल चौधरी ने और गाया है लता मंगेशकर ने
“ ओ सजना बरखा बहार आई

रस की फुहार लाई

नयनों में प्यार लाई ...ओss सजना “
मोहम्मद रफ़ी और गीता दत्त की आवाज़ में 1960 कि ही फिल्म काला पत्थर का यह गीत बहुत ही खुशनुमा सा है
"रिमझिम के तराने लेकर आई बरसात
याद आये किसी से वो पहली मुलाक़ात "

1958 में फिल्म ‘चलती का नाम गाड़ी ‘ का भी एक चुलबुला सा गीत है, ‘इक लड़की भीगी भागी सी ...सोई रातों में जागी सी “घनघोर बारिश हो रही है और उसमें मधुबाला की कार खराब हो जाती है .मेकैनिक किशोर कुमार के नटखटपन और भीगी हुई मधुबाला के दिव्य रूप ने इस गीत को अमर कर दिया है. स्क्रीन पर देखने और स्क्रीन से अलग सुनने में भी यह गीत बहुत प्यारा लगता है. मजरूह सुलतानपूरी ने लिखा, किशोर कुमार ने गाया और एस.डी. बर्मन ने इसे सुरों में ढाला है.

1955 में बनी फिल्म ‘श्री चार ४२० ‘ के इस गीत में बारिश का जिक्र नहीं है .परन्तु गीत सुनते ही एक छाता के अंदर भीगते राजकपूर और नर्गिस की छवि साकार हो जाती है .रास्ते से रेनकोट पहने तीन बच्चे गुजरते हैं जो राजकपूर के बेटे-बेटी ही थे .मन्ना डे और लता मंगेशकर ने शैलेन्द्र के लिखे गीत को गाया है और संगीत शंकर जयकिशन का है .
“प्यार हुआ ,इकरार हुआ है
प्यार से फिर क्यूँ डरता है दिल
कहता है दिल ,रस्ता मुश्किल

मालूम नहीं है, कहाँ मंजिल “
1960 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘बरसात की रात’ के इस गीत में बारिश का ही जिक्र है पर फिल्माए गए दृश्य में बरसात कहीं नहीं है .बल्कि नायक एक रेडियो स्टेशन पर नज्म पढ़ रहा है और नायिका रेडियो पर सुन रही है पर गीत सुनते हुए श्रोता की आँखों में बरसते सावन में एक भीगी लडकी की छवि ही तैर जाती है.
“जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात

एक अनजान हसीना से मुलाकात की रात “

सावन के सुहाने मौसम पर आधारित कई गीत आये पर 1967 की फिल्म ‘मिलन ‘ के इस गीत को अतिशय लोकप्रियता मिली .इस गीत में सावन के महीने का पूरा सौन्दर्य उभर आया है .
”सावन का महीना पवन करे शोर

जियरा झूमे ऐसे जैसे बनमा नाचे मोर “

सावन में सिर्फ प्यार, मिलन, विरह जैसी भावनाएं ही नहीं मचलती बल्कि संगी साथियों संग झूला झूलने , मेहँदी लगाने, गीत गाने ,मेले जाने के लिए भी मन उमगता है .1967 की फिल्म ‘आया सावन झूम के ‘ के इस गीत में इसी ख़ुशी का इजहार है ,
“बदरा छाये कि झूले पड़ गए

हाय कि मेले लग गए

कि आया सावन झूम के”

प्रेमी जोड़े जब सपनों की  दुनिया में खोकर अपने घर की कल्पना करते हैं तब भी मनभावन सावन को जरूर याद रखते हैं .’ 1970 की फिल्म जीवन मृत्यु का यह गीत बहुत ही कर्णप्रिय है
झिलमिल सितारों का आंगन होगा

रिमझिम बरसता सावन होगा “
1970 की ही फिल्म ही “अभिनेत्री” का नटखट सा यह गीत बहुत मधुर है .
ओ घटा सांवरी

थोड़ी थोड़ी बावरी

हो गई है बरसात क्या

हर सांस है बहकी हुई

अबकी बरस ये बात क्या “
1979 में फिल्म मंजिल का यह गीत “रिमझिम गिरे सावन.. सुलग सुलग जाए मन “जैसे हर बरखा प्रेमी के दिल की बात कहता प्रतीत होता है . इसी वर्ष रिलीज़ हुई फिल्म ‘जुर्माना ‘ का यह गीत भी बहुत बहुत मधुर है ,”सावन के झूले पड़े हैं...तुम चले आओ “

आने वाले वर्षों में फिल्म का स्वरुप बदलता गया .पारिवारिक  फिल्मों की जगह एक्शन और प्रतिशोध की फिल्मों ने ले ली . गीत-संगीत का रुप भी बदल गया . अब तेज संगीत पर गाने की धुनें बनने लगीं .गीत के बोल गौण हो गए .और इसका असर सावन पर आधारित गीतों पर भी पड़ा. फिल्मों से सावन का माहौल गायब होने लगा .पर बारिश फिर भी बनी रही . 1982 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘नमकहलाल ‘ का यह गीत बहुत मशहूर हुआ पर सुमधुर गीतप्रेमियों को नहीं लुभा सका
“आज रपट जाएँ तो हमें न उठइयो

हमें जो उठइयो तो खुद भी रपट जीयो “

ऐसा ही गीत 1983 की फिल्म बेताब का भी है बारिश में भीगते नायक नायिका हैं पर गीतों की वो खूबसूरती गायब है
“बादल यूँ गरजता है, डर कुछ ऐसा लगता है
चमकी चमक के लपक लपक के

ये बिजली हम पर गिर जायेगी “

अब फिल्मों में बारिश भी होती, गीत गाते नायक नायिका भी भीगते ,पर गीत कालजयी नहीं बन पाता .1994 में आई फिल्म ‘मोहरा’ का ये गीत उस वक्त फिल्म के साथ बहुत हिट हुआ था .
“टिप टिप बरसा पानी 
पानी ने आग लगा दी “
अब ज्यादातर फिल्मों की पृष्ठभूमि शहर की होती .गीतों में झूले, लहलहाते खेत ,घुमड़ते बादल गायब होने लगे . सडकों पर बरसते पानी का ही दृश्य फिल्माया जाता . 1997 में फिल्म ‘दिल तो पागल है ‘ में शाहरुख और माधुरी बच्चों एक साथ झमाझम बरसते पानी में ये गाना गाते हैं
“कोई लडकी है ,जब वो हंसती है

बारिश होती है

छनर छनर छुम छुम “

फिर भी बीच बीच में कुछ सुमधुर गीत आये .गुलज़ार का लिखा फिल्म इजाज़त का गीत ...
छोटी सी कहानी से

बारिशों के पानी से

सारी वादी भर गई “
सुरेश वाडेकर की सोज़ भरी आवाज़ में गाया शिव हरी के संगीत से सजा फिल्म ‘चांदनी’ का यह गीत बहुत ही कर्णप्रिय है
“लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है “
‘गुरु’ फिल्म का गीत ‘बरसों रे मेघा बरसों ‘ का फिल्मांकन और गीत दोनों ही बहुत खुबसूरत हैं .
फिल्म ‘फ़ना’ ...बूंदों की साजिश है ‘ भी बारिश को बखूबी चित्रित करता है .
पिछले तीन दशक  से हमारे समाज की रूपरेखा भी बदल गई है . लोग गाँव छोड़कर शहरों में बसने लगे हैं .आपसी रिश्ते- नाते-दोस्त कम होते जा रहे हैं .अब पहले सा प्यार ,अपनापन ,दोस्ती जैसी भावनाएं जिंदगी से विदा हो गईं हैं इंसान अपने आप में सिमटता जा रहा है. जिंदगी मशीनी होती जा रही है और इन सबका अक्स हमारी फिल्मों पर भी नजर आया .

फिल्मों से गाँव , लहलहाते ,खेत हरियाली गायब हो गई .अब फिल्मों में दौड़ती गाड़ियां, आग उगलते हथियार, आक्रोश से भरा हीरो और पश्चिमी धुन पर थिरकते ढाई सौ लोगों के साथ नृत्य करते नायक नायिकाएं ही नजर आने लगे. इन फिल्मों में सावन के गीतों की गुंजाइश ही नहीं बची . जब नायिका बादल को उलाहना देती है , नायक बारिश में भीगी अपनी प्रेमिका को याद करता है या कोई बहन अपने पिता से सावन में अपने भैया को भेजने की अर्ज करती है. अब फिल्मों में ऐसी सिचुएशन ही नहीं होती .सब कुछ इंस्टैंट और तेज गति से होने लगा है .अब बारिश  पर गीतकार ,संगीतकार से ज्यादा कैमरामैन का प्रभाव नजर आता है. ढेर सारे छाते के बीच लम्बा रेनकोट पहने  कोई खूनी,  घनघोर बारिश के बीच हुआ मर्डर ..पानी के साथ बहता खून या फिर पारदर्शी वस्त्रों में नाचती नायिका. ...इन सबके बीच,पहले वाली कोमल भावनायें नज़र नहीं आती ,जिसपर आधारित गीत अमर  हो जाते थे .

और जब विछोह का दर्द या मिलन की खुशी गीतों में नहीं होती तो वे गीत दिल की गहराइयों में अपनी जगह नहीं बना पाते. यही वजह है कि पुराने गीतों के तुलना में आज के गीत बहुत फीके नजर आते हैं और जब तक फिल्म चलती है, तभी तक गीत भी बजते हैं और फिर गुमनामी के अँधेरे में खो जाते हैं .

आजकल के युवा मीका सिंहके इन गीतों पर थिरक रहे हैं .जिसमें बस सावन शब्द के लिए ही प्रयुक्त किया गया है .इस से सजीले सावन का कोई सम्बन्ध नहीं .
सावन में लग गई आग
दिल मेरा हाय

निश्चय ही फिल्मों में या उनके गीतों में पहले वाली मधुरता अब नहीं रही . वैसे तो फिल्म ‘दिल दिया दर्द लिया ‘ के इस गीत का ही अनुसरण करना चाहिए . दिलीप कुमार और वहीदा रहमान पर यह खुबसूरत गीत फिल्माया गया है
“सावन आये या ना आये  
जिया जब झूमे सावन है “

रागिनी मिश्रा एवं पूजा सिंह की नजर में कांच के शामियाने

 रागिनी मिश्रा ,तुमने तो निःशब्द कर दिया ।सुबह चार बजे उठ कर घर का काम खत्म करने के बाद स्कूल की प्रिंसिपल का जिम्मेवारी भरा कर्तव्य निभा, फिर एक ही सिटिंग पूरा उपन्यास भी पढ़ लिया ।पाठकों का यही प्यार बस मेरी पूँजी है और गहरी जिम्मेवारी का भी आभास करवाती है ।'शिवानी' जैसी प्रसिद्ध लेखिका का जिक्र पढ़कर तो कानों को हाथ लगा लिया , उन जैसा शतांश भी लिख पाऊं तो धन्य समझूँ खुद को ।
तुम्हें बहुत शुक्रिया और स्नेह :)

                 कांच के शामियाने


आदरणीय रश्मि दी!.

स्कूल से लौटते ही "काँच के शामियाने" आज दोपहर १ बजे मिली, ...खाना खाने के बाद से पढ़ना शुरू किया | रोज दोपहर में थक जाने के कारण सो जाती थी लेकिन किताबों का पुराना शौक और नयी किताब का हाथ में आना और उस पर आपका सशक्त लेखन..... सोने पे सुहागा| ५ बजकर ४० मिनट पर पूरी किताब शब्द ब शब्द पढकर समाप्त की, या यूं कहूं कि "जया" के जीवन की यात्रा पूरी की |
 कभी कभी लगा कि "शिवानी" का कोई प्रसिद्ध उपन्यास पढ रही हूँ | इस पुस्तक की विशेष बात कि इसने पूरा बांधकर रखा मेरे चंचल मन को..... तो गंभीर पाठक की बात ही क्या| अन्त में मेरे जैसा मस्त व्यक्ति रोया भी | 
आप वाकई प्रशंसा और बधाई की पात्र हैं|

पूजा सिंह 
 
 कुछ ही महीने पहले पूजा विवाह बंधन में बंधी है . उसकी एंगेजमेंट , शादी, की तस्वीरें देखती रहती थी .फिर एक दिन अचानक इनबॉक्स में मैसेज मिला, 'मैंने भी कांच के शामियाने ' मंगवा अली है...जल्दी ही पढ़ती  हूँ . मुझे लगा, अभी तो इसकी शादी हुई है, किसी और के जीवन की इतनी कडवी हकीकतों से क्या रूबरू होना...लिहाजा मैंने अपनी ही किताब के लिए कहा...'अभी रहने दो...बाद में कभी पढ़ लेना '...पर वो नहीं मानी...और एक दिन उसके वाल पर ये स्टेटस था :)
थैंक्यू पूजा...इतने प्यारे संदेश और फोटो के लिए :)


                      कांच के शामियाने

 
 रश्मि  दी जब आपने कहा था कि बहुत सुखद नहीं है आराम से पढ़ना तो मैंने सोचा की तभी पढूंगी जब एक सिटींग में पढ़ लूँ। आज पढ़ लिया, पता नहीं कितनी बार रोई पर सबसे ज्यादा रोना आया जब जया काव्या की नोटबुक पढ़ती है।

अगर मैं अपनी जेनेरेशन की लड़की मानकर जया को देखती तो बहुत गुस्सा आता उसपर की क्यों सहा इतना, तीन बच्चे क्यों पैदा किये। पर जैसे ही मैं उसे अपने अपने पूर्वी उत्तर प्रदेश के छोटे से कस्बे से जोड़कर देखती हूँ तो पाती हूँ की ये कोई एक कहानी नहीं है, ऐसी कितनी जया को तो मैं पर्सनली जानती हूँ।

बहुत अच्छी सी किताब के शुक्रिया आपका

Tuesday, July 26, 2016

कारगिल हीरो कैप्टन विजयंत थापर

Rashmi Ravija's photo.'कारगिल हीरोज़' पर लिखी एक अंग्रेजी किताब के कुछ चैप्टर का हिंदी अनुवाद किया था ।हिंदी में यह किताब कब और कहाँ से प्रकाशित हुई इसकी कोई सूचना नहीं मिली ।पर कुछ लोगों तक उन जाबांजों की कहानी और उनके विजय अभियान का विवरण पहुंचा होगा ।इतना सन्तोष ही काफी है ।उन सभी वीरों को शत शत नमन

उसी अनुवाद में से 'कैप्टन विजयंत थापर' पर लिखे आलेख का अंश ।

कैप्टन विजयंत थापर का जन्म 26 दिसंबर 1976 को हुआ था। उस वक्त उनके पिता कर्नल वी .एन.थापर की पोस्टिंग पठानकोट में बख्तरबंद ब्रिगेड ( armoured brigade ) के हेडक्वार्टर्स में थी। उनकी माँ तृप्ता थापर एक शिक्षिका हैं। उस ब्रिगेड के रेजिमेंट में उन दिनों विजयंत नामक टैंक थे। उन्हीं टैंक के नाम पर उनके माता-पिता ने उनका नाम विजयंत रखा ।
विजयंत जिनके घर का नाम रॉबिन था की शिक्षा देश के विभिन्न शहरों में हुई।शिक्षा पूरी करने के बाद 1997 में इन्डियन मिलटरी एकेडमी (IMA ) द्वारा जेंटलमैन कैडेट के रूप में उनका चुनाव हो गया। 23 दिसंबर 1998 को ग्वालियर में कैप्टन विजयंत ने अपनी बटालियन 2 RAJ RIF को ज्वाइन किया .उन्हें जम्मू और कश्मीर जाने का आदेश मिला, जहाँ की घाटी में काउंटर इंसरजेंसी ऑपरेशन की ट्रेनिंग दी जा रही थी ।
कारगिल में पाकिस्तान घुसपैठ रोकने के लिए सेना ने अपनी तैयारी शुरू कर दी ।
2 RAJ RIF की बटालियन को 25 मई 1999 से सोनमर्ग में ट्रेनिगं दी जाने लगी। ताकि 16000 फीट की उंचाई पर स्थित टोटोलिंग रिज़ पर किये जाने वाले युद्ध के लिए वे खुद को ढाल सकें।
'कैप्टन विजयंत भी ' टोटोलिंग टॉप' पर विजय पताका फहराने वाले सैनिक दल के सदस्य थे जिस अभियान का नाम था "बरबाद बंकर " और इसके तहत भारतीय सेना ने 12/13 जून 1999 को पाकिस्तानी सेना के उत्तरी लाईट इन्फेंट्री द्वारा कब्ज़ा किये बंकर को नेस्तनाबूद कर विजय हासिल की थी।
यह भारतीय सेना की पहली विजय थी। सैनिक बहुत ही खुश और जोश में भरे हुए थे। कैप्टन विजय भी अति उत्साहित थे। टोटोलिंग टॉप पर अधिकार जमाने के बाद 20 जून 1999 को इस यूनिट को एक पहाड़ी इलाका 'जिसे "ब्लैक रॉक्स " का नाम दिया गया पर आक्रमण करने की जिम्मेवारी सौंपी गयी। यह इलाका 'टाइगर हिल ' और "टोटोलिंग टॉप " के बीच में था। इसे इलाके को भी तीन भागों में विभक्त किया गया। "नौल' (Knoll ) , "थ्री पिम्पल्स (Three Pimples) , और लोन हिल (Lone Hill ) . "A " कम्पनी को जिसका संचालन मेजर आचार्य और कैप्टन विजयंत कर रहे थे , नॉल (Knoll) पर कब्ज़ा करने की जिम्मेवारी सौंपी गयी . नॉल पाकिस्तानियों का बहुत ही सुरक्षित ठिकाना था और अस्त्र-शास्त्रों का बड़ा भण्डार भी था। इस ठिकाने तक पहुँचने का रास्ता बहुत ही संकरा सा था और जिसपर लगातार गोलियों की बौछार होती रहती थी। ये रास्ता बहुत ही घुमावदार था और इसके दोनों तरफ गहरी घाटियाँ थीं।
कैप्टन विजयंत के प्रिय मित्र मेजर आचार्य ने विजयंत के प्लाटून को इस आक्रमण का नेतृत्व करने की जिम्मेवारी सौंपी। दुश्मन के ठिकाने से 800 मीटर की दूरी पर से उन्होंने अपने बटालियन द्वारा गोलीबारी करके विजयंत की यूनिट को कवर देने का प्लान भी बनाया। जिस से दुशमनो को अपना सर छुपाना पड़े और कैप्टन विजयंत के प्लाटून के बढ़ते कदम उन्हें नज़र न आयें।
कैप्टन विजयंत ने अपने प्लाटून द्वारा आक्रमण का समय 8 बजे रात को तय किया। इसे H -Hour कहा गया। यह पूर्णिमा की रात थी और कैप्टन विजयंत को लगा, चंद्रमा की रौशनी में उनकी यूनिट दुश्मन के ठिकाने तक पहुँच जायेगी। परन्तु दुश्मनों की तरफ से भारी गोलीबारी की गयी .प्लाटून के चारो तरफ दुश्मनों के आर्टिलरी फायर गोले बरसने लगे .और प्लाटून के कदम वहीँ रुक गए। भारतीय सैनिक जान बचाने के लिए तितर-बितर हो गए।
कमांडिंग ऑफिसर दूर से ही इस आक्रमण का जायजा ले रहे थे . उन्हें लगा, ये आक्रमण बुरी तरह से असफल हो गया। कैप्टन विजयंत और उनकी प्लाटून दिया गया टास्क पूरा नहीं कर पायी।
यह सब देखकर कैप्टन विजयंत बहुत आहत हुए और अपनी जान की सुरक्षा की परवाह किये बिना गोलियों की बौछारों के बीच इस चट्टान से उस चट्टान पर जम्प करते हुए अपने साथियों को आवाजें लगाते रहे ,उनका उत्साह बढाते रहे, उनमे जोश भरते रहे .आखिरकार वे उस बटालियन के 19 लोगो को जमा करने में सफल हो गए। उनके मित्र मेजर आचार्य इस युद्ध में शहीद हो गए थे ।
मेजर आचार्य की शहादत ने कैप्टन विजयंत को दुश्मनों से बदला लेने के लिए प्रतिबद्ध कर दिया। अब उनके लिए रुकना बिलकुल असम्भव था। वे बिलकुल तीखी चढ़ाइयों वाले संकरे रास्ते पर किसी तरह बढ़ रहे थे। चारो तरफ दुश्मन के तोप बंदूकें आग के गोले बरसा रहे थे . उनके द्वारा फेंके हुए ग्रेनेड के शेल, कैप्टन विजयंत और इन सैनिकों के आस-पास गिर रहे थे . आखिरकार नॉल (Knoll ) पर उन्हें पैर जमाने को थोड़ी सी जगह मिल गयी।
कैप्टन विजयंत जिन्हें सब प्यार से रॉबिन बुलाते थे , ने देखा नायक तिलक सिंह अकेले एक लाईट मशीनगन (LMG ) लेकर दुशमनो पर गोलियां बरसा रहा है। उन्होंने एक शहीद हुए साथी की मशीनगन उठायी और बीस मीटर की दूरी से दुश्मनों पर आक्रमण जारी रखा। दोनों तरफ से गोलियां चलनी जारी थीं। आधी रात के बाद युद्ध में थोडा सा ठहराव आया। रॉबिन उठकर दुश्मनों के ठिकाने की तरफ भागे उसी वक़्त दुशमनों ने उनपर गोलियों की बौछार कर दी। रॉबिन के हाथ पेट में कई गोलियां लगीं,फिर भी वे रेंगते हुए दुश्मनों पर हथगोले फेंकते रहे .और अपने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी। पर उनकी शहादत बेकार नहीं गयी। उनके बलिदान से प्रेरणा पाकर उनकी बटालियन के सैनिक दुशमनो के ठिकाने पर पहुँच गए और दुश्मनों को मार गिराया। नॉल (Knoll ) बेस पर भारतीय सेना ने अधिकार कर लिया।
दुशमनो के विरुद्ध इतनी अभूतपूर्व वीरता दिखाने और उन्हें परास्त करने के लिए कैप्टन विजयंत को मरणोपरांत 'वीर चक्र ' प्रदान किया गया

जम्मू काश्मीर में , 'काउंटर इंसरजेंसी ऑपरेशन' के दौरान कैप्टन विजयंत से जुड़ी एक बहुत ही मार्मिक घटना हुई जिसने सबके दिल में उनके लिए विशेष जगह बना ली । 'ट्रास' गाँव' के एक स्कूल में कैप्टन विजयंत, एक छोटी सी लड़की से मिले। रुखसाना छः सात साल की एक बच्ची थी जिसके पिता एक गरीब मजदूर थे . आतंकवादियों ने सेना के मुखबिर होने के शक में बहुत ही बेदर्दी से रुखसाना की माँ और रुखसाना की आँखों के सामने ही उसके पिता का क़त्ल कर दिया। इस घटना से रुखसाना को ऐसा शॉक लगा कि उस छोटी सी बच्ची की आवाज ही चली गयी।

उस वक़्त कैप्टन विजयंत का दल उस स्कूल के पास ही ठहरा हुआ था . उस बच्ची की ऐसी हालत देखकर विजयंत का ह्रदय पिघल गया और उन्होंने उस बच्ची से दोस्ती कर ली। वे ज्यादा से ज्यादा समय उस बच्ची के साथ बिताने लगे . उसके साथ खेलते, उसे चौकलेट देते, मिठाई देते . कैप्टन विजयंत के इस प्यार भरे व्यवहार का असर हुआ और लड़की ने धीरे धीरे वापस बोलना शुरू कर दिया। जब उन्हें घर जाने की छुट्टी मिली तो उन्होंने अपनी माँ से कहा , एक छोटी बच्ची के लिए कुछ कपडे खरीद कर रखें। वे जब वापस ड्यूटी पर लौटेंगे तो लेते आयेंगे। पर दुर्भाग्यवश, लड़ाई छिड़ गयी और कैप्टन विजयंत की छुट्टी कैंसल हो गयी। वे घर नहीं जा सके। उन्होंने अपने माता-पिता को चिट्ठी लिख कर कहा कि अगर वे युद्ध से जीवित न लौटें तो रुखसाना के लिए वे लोग हर महीने 50 रुपये भेज दिया करें।

कैप्टन विजयंत के शहीद हो जाने के बाद उनके माता-पिता , उनकी इस इच्छा का सम्मान करते हुए नियमित रूप से रुखसाना को पैसे भेजते रहे। दस साल के बाद रुखसाना ने कैप्टन विजयंत के माता-पिता से उनके दिल्ली स्थित नोएडा वाले फ़्लैट में मिलकर उनकी नियमित मदद का शुक्रिया अदा किया .

Sunday, July 10, 2016

'काँच के शामियाने' पर 'कुसुम पालीवाल जी ' की टिप्पणी

'कुसुम पालीवाल जी 'कनाडा में अपनी नवासी के आगमन की तैयारियों में व्यस्त थीं और बीच बीच में मैसेज करती रहतीं, 'किताब ले आई हूँ, पर पढ़ नहीं पा रही ' .मैंने कहा, 'पहले तो बिटिया और नवासी की देखभाल कीजिये ,उनके सामीप्य का आनन्द उठाइए ,किताब कहाँ भागी जा रही ' उनकी बिटिया और नन्ही परी को बहुत[ बहुत प्यार एवं आशीष :)
भारत आने के बाद उन्होंने किताब पढी और अपने विचार भी व्यक्त किये.....आपका बहुत बहुत शुक्रिया
" काँच के शामियाने "
दोस्तों ....रश्मि रविजा के इस उपन्यास को आज खत्म किया इसमें जया एक ऐसा पात्र है जो किसी न किसी रूप में हर घर में विद्दमान है । हमारे समाज का एक हिस्सा ... आज भी जया की तरह जिन्दगी बसर कर रहा है ये कहना गलत न होगा ।
जया एक ऐसी लडकी ...जिसने माँ के घर में नाज नखरों से जिन्दगी बसर की हो और ससुराल में बिल्कुल अलग परिवेष में पहुँच कर किस तरह अपनी जिन्दगी को जहन्नुम होते देख कर , उन रूढिवादी संस्कारों से जकडे लोगों के बीच अपने आत्म सम्मान की धज्जियों के टुकडों को बार - बार समेंटते हुए जिन्दगी को मौके दे रही थी कि शायद आज नहीं तो कल तो बदलेगें उसके दिन ......जहाँ का वातावरण न उसके अनुरूप था और न ही उसके मन के अनुरूप । वहाँ उसको एक ऐसे व्यक्ति के साथ जीवन यापन करना है ........जिसको पत्नी नहीं .. सिर्फ औरत का शरीर चाहिए क्षुधा पूर्ती हेतु ।
जया एक एेसा पात्र है जिसके लिए मन में दया उपजती है कि कोई इतनी जिल्लत कैसे सह सकता है .. वो भी उस पुरूष के द्वारा जो खुद पढा -लिखा तो है लेकिन अपनी पितृसत्त्तात्मक समाज के दकिया नूसी ख्यालात और पुरूष प्रधानी सत्ता को अपने से अलग नहीं कर सका ....और उसके इसी सोच का नतीजा जया भुगतती रही ।
जया डरपोक या निर्बल नहीं है वो जो भी जिल्लत सह रही है तो सिर्फ इस कारण कि बचपन से लडकी को यही समझाया जाता रहा है कि तुम्हारा घर वही है उस घर की जिम्मेदारी तुम्हारी है , अब वो लडकी जया किस तरह अपनें ससुराल वालों की बुराई पक्ष को बताये मायके में , सब सह रही है फिर भी जी रही है अपने बच्चों के भविष्य की खातिर ।
किताब पढ़कर पता चलता[ है, जाया ने किस तरह समाज के दोगले लोगो के बीच संघर्ष करके अपने बच्चों को बनाया और अपने लिए एक मुकाम हासिल किया ।

रश्मि के इस उपन्यास में हर लडकी कहीं न कहीं , कुछ धटनाऔ में अपने को खड़ा पायेगी इस उपन्यास की यही सार्थकता है ।
रश्मि को बधाई है ....कि उन्होने नारी का एक सशक्त पहलू प्रस्तुत किया है .....कि नारी ही है ..जो तमाम तकलीफो के बावजूद भी हिम्मत नही हारती है ।

Tuesday, July 5, 2016

हैप्पी बर्थडे अंकुर

ब्लॉग, अब सबकुछ सहेजने कर रखने के काम ही आने लगा है . पिछले चार साल से बेटों के जन्मदिन पर उनकी कुछ शरारतों का फेसबुक पर जिक्र करती रहती हूँ .अब लगा, ये रोचक किस्से क्रमवार यहाँ सहेज लेने चाहिए:)
ये जनाब एक डिफरेंट टाइम ज़ोन में रहते हैं...जब सब सो रहे होते हैं ये जागते हैं...और जब चिड़ियाँ गीत गा कर सारी दुनिया को जगा रही होती हैं तो ये उसमे अपने खर्राटे का सुर मिलाते हैं. फुटबॉल खेलते हैं..नाटकों में भाग लेते हैं..गिटार बजाते हैं...और जब परीक्षा सर पर आए तो रात रात भर जागकर काली कॉफी और मैगी के सहारे थोड़ी सी पढ़ाई भी कर लेते हैं.
जब लगातार फोन पर घंटे टाइप करते देख माँ ने कहा."लगता है...गर्ल-फ्रेंड आ गयी है ,लाइफ में ' तो फोन सामने कर दिखा दिया..'इस गर्ल-फ्रेंड का नम ट्विटर है...कई फिल्मो के प्रीमियर शो के टिकट...क्रिकेट मैच -रॉक कंसर्ट्स के टिकट..टी-शर्ट्स,स्केट बोर्ड ..जीत चुके हैं,ट्विटर पर फिर भी एक महंगा गिटार जीतने की ललक धडाधड करवाती रहती है.
 

चुनिन्दा आर्ट फिल्मे ही देखते हैं...और फिल्मे देख, रोने में जरा नहीं शर्माते...बल्कि बड़े फख्र से कहते हैं..'कैंसेरियन तो रोतडू होते ही हैं' .टी.वी. पर पसंदीदा कार्यक्रम है...' मास्टर शेफ' और सिर्फ प्रोग्राम देख देख कर ही खुद को बढ़िया शेफ समझने लगे हैं...माँ को टिप्स देते रहते हैं. वैसे मैगी..ऑमलेट..सैंडविच..पिज्जा बना लेते हैं...एक बार बढ़िया चॉकलेट केक भी बनाया था .पर अगर मूड ना हो तो एक कप चाय बनाने के लिए कहने पर भी मासूमियत से पूछते हैं..."कैसे बनाते हैं,चाय?" माँ भी इतनी ढीठ है...हर बार चाय की विधि बात देती है...जिसे ये अगली बार सुविधानुसार भूल जाते हैं.

कभी मूड हो तो घर का कोना-कोना शीशे सा चमका देते हैं (साल में एक बार )...आठवीं क्लास से दिवाली पर घर के सामने रंगोली यही बनाते हैं. पर दूसरी क्लास से ही माँ सिखा रही है..'अपने कपड़े जगह पर रखो' ये नहीं सीखा. कपड़े हमेशा फर्श पर फेंके हुए ही मिलते हैं.एक बार माँ ने पुरानी लौंड्री बास्केट हटा दी..और दूसरी अभी लाई नहीं थी..दो दिन में हकलान कर दिया.."कमरे में लौंड्री बास्केट नहीं है..कपड़े कहा रखूँ?" जब माँ ने कहा..लौंड्री बास्केट में तो कपड़े आज तक नहीं रखे..तो जबाब मिला..'लौंड्री बास्केट रहता था कमरे में तो कम से कम इतना पता रहता था..कपड़े किस दिशा में किधर फेंकने है..अब कुछ समझ में ही नहीं आता'
वैसे आज इनकी इतनी बातें क्यूँ कर रही हूँ...क्यूंकि आज इनका ..यानि मेरे बड़े सुपुत्र हैं..जन्मदिन है...
जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो अंकुर

पिछले कुछ दिनों से इनकी ज़िन्दगी ने 180 डिग्री का टर्न ले लिया है. कहाँ वो लापरवाह सा थ्री-फोर्थ और
चप्पल में घूमना,और अब प्रेस की हुई शर्ट को दुबारा प्रेस करना और मैचिंग मोज़े का ख्याल,माँ पीछे पड़ी रहती थी, 'हेयर कट लो' और अब ऑफिस से लौटकर नौ बजे रात को बाल कटवाने जाना ,दिन रात हेड फोन लगाए लैपटॉप पर गाने सुनना और फ़िल्में देखना, गए युग की बात लगती है. पर इनकी माँ की ज़िन्दगी ने 360 डिग्री का टार्न ले लिया है, जहां से चली थी वहीँ पहुँच गयी, जब ये छोटे थे, इन्हें सुबह उठा कर इनका लंच पैक कर ऊँगली थामे स्कूल बस के स्टॉप तक पहुंचाना और आज भी सुबह उठाना,टिफिन पैक करना और ऊँगली थाम कर नहीं पर कार से ही सही, कम्पनी के बस स्टॉप तक छोड़ कर आना .
आज जनाब ने छुट्टी ली, सब खुश हो गए 'जन्मदिन परिवार के साथ बिताने का इरादा है ' पर असल वजह थी कि ऑफिस में सब घेर कर केक कटवायें और हैप्पी बर्थडे गायें , ये पसंद नहीं .पर हमसबने ने तो घर में ही जोर से हैप्पी बर्थडे गाकर बिल्डिंग वालों को गाकर बता ही दिया 
 
 
अंकुर जब फर्स्ट स्टैण्डर्ड में था एक दिन घर आकर बोला, 'मिस ने डायरी में कुछ लिखा है ' मैंने डरते हुए डायरी खोली कि जरूर कुछ शिकायत होगी पर ये लिखा था कि उसने १०० मीटर में गोल्ड मेडल जीता है. मेरे ये पूछने पर कि 'रेस में फर्स्ट आये तुम ?' उसने कंधे उचका दिए ,'वो तो कई बार आया '. कई राउंड हुए होंगे उसके बाद फाइनल .पर उसे ये सब समझ में नहीं आया. उसके बाद स्कूल में रेस में कभी गोल्ड, कभी सिल्वर कभी ब्रोंज़ भी मिलते रहे . 'लॉन्ग जम्प' में महाराष्ट्र का रेकॉर्ड भी ब्रेक किया (शायद अब भी उस कैटेगरी का रेकॉर्ड उसके ही नाम है. करीब सात साल बाद उस स्पोर्ट्स डे के चीफ गेस्ट, कहीं बाहर मिले और अंकुर को पहचान कर ये बताया )
स्कूल -कॉलेज के दिन ख़त्म हो गए .नौकरी में आ गया रेसिंग भी ख़त्म हो गयी पर दौड़ना ख़त्म नहीं हुआ .आज भी कम्पनी की बस दौड़ कर ही पकड़ी जाती है .शिफ्ट वाली ड्यूटी में ऑफिस कार गेट के पास आती है फिर भी ये जनाब दौड़ते हुए ही जाते हैं क्यूंकि हमेशा लेट हो रहे होते हैं :)
बस यूँ ही दौड़ते हुए नयी मंजिलें तय करते रहें यही आशीर्वाद है . जन्मदिन पर ढेरों शुभकामनाएं !!



आजकल बिल्डिंग के वाचमेन कार को धोने-पोंछने का काम करते हैं. उन्हें कुछ अतिरिक्त आमदनी हो जाती है और कार भी साफ़-सुथरी रहती है. रोज तो वे बाहर से ही धो-पोंछ कर साफ़ करते हैं ,इतवार के दिन चाबी ले जाकर अंदर से भी सफाई करते हैं. एक इतवार को वाचमैन ने कार में से पांच जोड़ी चप्पलें निकाल कर दीं. ये सारी चप्पलें मेरे बड़े सुपुत्र 'अंकुर (किंजल्क ) ने कार में छोड़ी हुई थीं . उसे सुबह सवा सात बजे निकलना होता है .और रात दो के पहले सो नहीं सकता . सुबह दौड़ते-भागते तैयार होता है और जूते हाथ में ले, कार में जाकर पहनता है. चप्पलें वहीँ छोड़ देता है, और पैरों से लग कर चप्पल सीट के नीचे . छोटा भाई , अलग परेशान , सारी चप्पलें कहाँ गायब होती जा रही है.
स्कूल-कॉलेज में भी यूँ ही दौड़ते-भागते तैयार हुआ करता था और मैं सोचती थी नौकरी में जाएगा तब शायद समय पर सोना-उठना हो जाए .पर अब भी वही हाल .पर शुक्र यही है कि बाकी सारे काम बखूबी करता है , आज उसके जन्मदिन पर यही शुभकामनाएं और आशीर्वाद है कि यूँ ही अपने कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा करते हुए कामयाबी की सीढियां चढ़ता रहे (और समय पर तैयार भी हुआ करे :) )

Rashmi Ravija
July 5, 2016  
11 hrs · 

महानगरों में ऑफिस दूर हो तो जल्दी निकलना पड़ता है और अक्सर नाश्ता कुर्बान हो जाता है. अंकुर भी सुबह हाथों में एक सेब लेकर घर से निकलता है. मैं हमेशा ध्यान रखती हूँ, घर में सेब की आपूर्ति बनी रहे .पर एक शाम आठ बजे देखा, सेब नहीं हैं .अब बाहर जाने का मन नहीं था .पतिदेव वॉक के लिए निकल गए थे .और वे कभी फोन लेकर नहीं जाते ,शायद इसी डर से कि मैं कोई काम न बता दूँ :)
छोटा बेटा रोज की तरह ,दोस्तों से मिलने चला गया था ,पता नहीं उसके पास उतने पैसे थे या नहीं फिर मैंने सोचा जिसे सेब खानी है, उसी को कहा जाए .उसके आने के रास्ते में ही डी मार्ट के सामने कतार से फल के ठेले वाले खड़े होते हैं .
मैंने उसे फोन किया, "डी मार्ट की तरफ से ही आओगे ना...एक किलो सेब लेते आना "
थोड़ी देर बाद फोन आया ," डी मार्ट में तो कोई फल है ही नहीं. इनलोगों ने फल-सब्जियां रखनी बंद कर दी है "
"तुम्हें अंदर जाने को किसने कहा....बाहर भी तो मिलते हैं ."
"ओह..ओके..हाँ "
इन जनाब को ईश्वर थोड़ी व्यावहारिक बुद्धि भी प्रदान करे ,इसी कामना के साथ जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं !!