Saturday, February 1, 2020

फ़िल्म पंगा : अधूरे सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद

हमारे देश क्या पूरे संसार में ही कुछ वर्ष पहले तक लड़के/लड़कियों के काम सुनिश्चित थे।उन्हें शादी कर घर और बच्चे की देखभाल करनी है और लड़के को नौकरी कर पैसे कमाना है।धीरे धीरे बदलाव आए लड़कियाँ पढ़ने लगीं, नौकरी करने लगीं लेकिन घर और बच्चे की जिम्मेवारी आज भी उनकी ही है।(अपवाद छोड़कर)

पर जब लड़कियाँ पढ़ रही होती हैं,बढ़ रही होती हैं,उनके भी कई शौक होते हैं। वे खेलती हैं, पेंटिंग करती हैं, गाने गाती हैं,लिखती हैं पर फिर वही शादी-बच्चे और सबकुछ बैकसीट पर। पर अगर कोई शादी-बच्चे के बाद भी वापस अपनी कला,अपने खेल में वापस लौटना चाहे तो उसे उसके पूरे परिवार,दोस्त, सहकर्मी सबके सहयोग की जरूरत होती है।खुद पर भी बहुत मेहनत करनी होती  है।समय आगे निकल गया होता है और हर क्षेत्र में बहुत बदलाव आ गए होते हैं। उस लेवल तक खुद को लाने के लिए कड़े परिश्रम की आवश्यकता होती है।

फ़िल्म 'पंगा' एक कबड्डी खिलाड़ी की इसी यात्रा और संघर्ष की कहानी है। पति और समाज ने खेल में उसकी सफलता देखी है ।पर उसके बेटे ने सिर्फ उसका 'मम्मी रूप' ही देखा है। वो एक कड़ी बात कह देता है, 'रेलवे में टिकट ही तो काटती हो।' हालांकि बेटे के मुँह से ये ताना अच्छा नहीं लगता पर आजकल बच्चे ऐसा बोलते हैं और कार्टून देखकर तो उनकी भाषा और लहजा बिल्कुल ही बदल गया है।पर जब बच्चे को पता चलता है कि उसकी माँ राष्ट्रीय स्तर की कबड्डी खिलाड़ी रह चुकी है तो वह उनके कम बैक के लिए बहुत जोर देता है। सेरेना विलयम्स का उदाहरण भी देता है पर एक बात समझ नहीं आई। फ़िल्म के लेखक/निर्देशक ने मैरी कॉम का उदाहरण क्यों नहीं दिया। पश्चिम की तरफ देखने की आदत हमारी जाएगी नहीं 😏

जया निगम के कम बैक की मेहनत बहुत तफ़सील से दिखाई गई है।अक्सर किसी खेल पर बनी फिल्म में खेल कम होता है,इमोशन और ड्रामे ज्यादा होते हैं।पर इसमें बहुत सारा कबड्डी भी है। कंगना की ट्रेनिंग, अड़चनें, असफलता और फिर सफलता सब देखने को मिलती है।
फ़िल्म में एक रोचक दृश्य है। किसी की दमित इच्छाएं, अवचेतन में किसी भी रूप में निकल सकती हैं। सबलोग फिल्म देखने जाएंगे नहीं, इसलिए बता देती हूँ ,जया नींद में लात चलाती हैं। तो नए-नवेले पतियों, पत्नी की इच्छा रोकने की कोशिश मत करना।और लड़कियों तुम्हें भो आइडियाज मिल गए हैं 😀

पति के रूप में जस्सी गिल का काम बहुत अच्छा है।फ़िल्म देखकर ही सही ऐसे संवेदनशील,समर्पित, हेल्पफुल,प्यार करने वाले पतियों की संख्या में इज़ाफ़ा हो तो बेहतर :)  नीना गुप्ता माँ के छोटे से रोल में हर दृश्य में अपनी छाप छोड़ जाती हैं। सिनेमा अब निरूपा राय वाली माँ के इमेज से बहुत आगे निकल गया है। माँ अपनी ज़िंदगी भी जीती है, बेटी से असहमति भी दिखाती है और समय पड़ने पर उसकी सहायता भी करती है।हालांकि बच्चे के मुँह से नानी का मजाक कुछ अच्छा नहीं लगता। हर बच्चा अपनी नानी के बहुत करीब होता है (जैसा मैंने अब तक देखा है)।
ऋचा चड्ढा ने बिंदास दोस्त की भूमिका बहुत अच्छी निभाई है । सिर्फ लड़के ही नहीं, अब लड़कियाँ भी अपना सबकुछ छोड़कर अपनी सहेली की सहायता के लिए आ सकती हैं।

फ़िल्म क्वीन से ही 'कंगना रनौत' ने साबित कर दिया है कि वे बड़ी कुशलता से पूरी फिल्म अपने कंधे पर ढो सकती हैं। माँ-खिलाड़ी हर रोल में उनका अभिनय बहुत सहज है। अब उनकी फैन फॉलोइंग भी जबरदस्त हो गई है। मेरी एक फ्रेंड जिसे फिल्मों में खास रुचि नहीं है, उसने जैसे ही सुना कि नायिका कंगना रानौत है, ना उसने फ़िल्म का नाम पूछा ना विषय और फ़िल्म देखने को तैयार हो गई।

'निल बटे सन्नाटा' के बाद निर्देशक 'अश्विनी अय्यर तिवारी' की फ़िल्म 'पंगा' से पता चलता है,उनमें  छोटे छोटे क्षण पकड़ने की अद्भुत क्षमता है। फ़िल्म में जरा भी बोझिलता नहीं है। पूरी फिल्म में एक खुशनुमा अहसास छाया रहता है। उनसे आगे भी ऐसी फिल्मों की उम्मीद बनी रहती है जहाँ स्त्री कभी भी आस नहीं छोड़ती और डिप्रेशन में नहीं जाती बल्कि हर हाल में ज़िन्दगी जीना नहीं छोड़ती।

ये फ़िल्म महिलाओं से ज्यादा पुरुषों को देखनी चाहिए। महिलाएं तो अपनी इच्छाएं/सपने जानती ही हैं। पुरुषों को प्रेरणा लेनी चाहिए कि किस तरह वे उनके सपने पूरे करने में सहायक हो सकते हैं ।

Sunday, January 12, 2020

फ़िल्म 'छपाक' : तेज़ाब बोतल से पहले दिमाग में आता है

मैंने एसिड सर्वाइवर्स से सम्बन्धित कुछ आलेख लिखे हैं. जिसे Alok Dixit ji    ने शेयर भी किया था . बहुत पहले से लक्ष्मी अग्रवाल , अंशु राजपूत से जुडी हुई हूँ. इनका हौसला, जिंदगी जीने का ज़ज्बा हमेशा ही प्रेरणा देते हैं. जब लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन पर 'छपाक' फिल्म बन रही थी,तभी से इसके रिलीज़ होने का इंतज़ार शुरू हो गया था . और संयोग ऐसे जुटे कि जल्दी से इसे देख भी लिया. इस तरह की फ़िल्में सबको जरूर देखनी चाहिए ताकि आमजन सोचने पर मजबूर हो जाए ,ये कैसे वहशी समाज में हम रह रहे हैं जहाँ एक लडकी के 'ना' की ऐसी सजा उसे दी जाती है.

'छपाक' फिल्म का विषय इतना गम्भीर होते हुए भी यह फिल्म बिलकुल भी बोझिल नहीं है. एसिड से बिगड़े हुए चेहरे के साथ एक लड़की कैसे अपना दर्द भुलाकर  आम सा जीवन जीने की ज़द्दोज़हद में लगी होती है, पूरी फिल्म इसी पर आधारित है. एसिड से जलते शरीर की दर्द भरी चीखें आपके अंतस को झकझोर देती हैं. पर मालती सिर्फ अपनी किस्मत पर रोते बिसूरते हुए नहीं बैठती बल्कि आगे बढ़कर अपने जीवन की बागडोर अपने हाथों में लेती है, कोर्ट में पेश होकर अपराधी को सजा भी दिलाती है और एसिड की खुलेआम बिक्री पर रोक लगाने के लिए PIL भी दाखिल करती है. मालती खुशनसीब है कि उसकी मालकिन उसके इलाज का खर्च उठाती हैं, वकील उसका साथ देती हैं, उसकी हिम्मत बढाती हैं .पर सभी लडकियां इतनी किस्मतवाली नहीं हैं. फिल्म में ही एक लडकी मालती से कहती है, " दीदी आपकी सात सर्जरी हुई तब आपको ऐसा चेहरा मिला. हमारी दूसरी सर्जरी के ही पैसे नहीं जुट रहे." सभी एसिड सर्वाइवर्स के इलाज का खर्च सरकार को उठाना चाहिए ,आखिर अपने नागरिकों को सुरक्षा देने की जिम्मेवारी सरकार की है. एसिड की बिक्री पर बैन लगाने के बावजूद भी यह कैसे सहज उपलब्ध हो जा रहा है और मासूमों की जिंदगी तबाह किये जा रहा है ??

एसिड एक लडकी पर फेंका जाता है पर उसकी झुलसन में पूरा परिवार झुलस जाता है. एक सामान्य जिंदगी जीते, हंसते-खेलते परिवार की सारी जिंदगी उलट पुलट जाती है. इस गम से उबरने में मालती के पिता शराब में डूब जाते हैं. भाई उपेक्षित हो जाता है, समाज के उपहास भरे तानों से डिप्रेशन में जाकर गम्भीर बीमारी लगा बैठता है. फिर भी इन सबसे अगर मालती टूट जाती तो ये उस अपराधी की जीत होती . अपने ऊपर किये किसी भी जुल्म का जबाब यही है कि घुटने ना टेके जाएं, जुल्म के बावजूद अपना सामान्य जीवन जारी रखा जाए, हंसना-बोलना-खुश रहना ना छोड़ा जाए तो ये उस आतातायी की सबसे बड़ी हार होती है.

फिल्म में बड़े subtle तरीके से दिखाया गया है कि इनलोगों को सिर्फ कोरी सहानुभूति की नहीं बल्कि आर्थिक संबल की ज्यादा आवश्यकता है. मालती अपना इंटरव्यू लेने वालों से भी पूछ लेती है, 'उनके यहाँ कोई नौकरी है ? ' NGO के संचालक से भी पहला सवाल यही करती है, 'सैलरी कितनी मिलेगी ?". जागरूकता फैलाना,विरोध करना,  न्याय के लिए आवाज़ उठाना सब अपनी जगह सही है पर अपना और अपने परिवार का पेट पालने का प्रश्न पहला होता है.
लडकियों का तन मन झुलस जाता है पर नारी सुलभ इच्छाएं तो यथावत रहती हैं. जब मालती डॉक्टर से भोलेपन से पूछती है, 'मेरा कान बना सकते है ?' (उसे झुमके पहनने का बहुत शौक है ) तो दर्शकों के भीतर कुछ दरक जाता है. फिल्म में एक जगह मालती दृढ़ता से कहती है, "उसने सिर्फ मेरा तन बिगाड़ा है .मेरा मन वैसा अहि है.उसपर कोई असर नहीं हो सका "

फिल्म के अंत में आंकड़े पढ़कर एक सदमा लगता है .2013 के बनिस्पत 2017 में एसिड फेंकने की घटना में दुगुनी बढ़ोत्तरी हो गई है. फिल्म में आखिरी दर्ज घटना 7 दिसम्बर 2019 की है . Anshu Rajput ji के स्टेटस में देखा ..कल यानी 11 जनवरी 2020 को ही लखनऊ में तेरह साल की एक बच्ची के ऊपर तेज़ाब फेंका गया है. लडकियाँ आगे बढ़ रही हैं, घर से निकल रही हैं, सर झुकाकर किसी का भी प्रेम निवेदन स्वीकार नहीं कर रहीं, ना कहना सीख रहीं हैं और उसकी ऐसी भीषण सजा भुगत रही हैं. मुंबई प्लेटफार्म पर प्रियंका राठौर के साथ हुए हादसे का पूरा अपडेट रोज पढ़ती थी. नेवी ज्वाइन करने के लिए मुंबई आने वाली प्रियंका के ऊपर उसके पडोसी लड़के ने सिर्फ इसलिए एसिड फेंक दिया क्यूंकि वो नकारा और आवारा था और उसके घरवाले उसे प्रियंका का उदाहरण देते थे . टेढ़े मेढ़े अक्षरों में लिखी  प्रियंका की वो चिट्ठी अखबार में भी पढ़ी थी, जहां वो अपने बिगड़े हुए चेहरे के साथ भी सिर्फ ज़िंदा रहना चाहती थी ताकि पैसे कमा कर अपने पिता की मदद कर सके. पर वो जान गंवा बैठी.

फिल्म का एक डायलॉग है , "किसी को नेस्तनाबूद कर देने का, तबाह कर डालने का ,बर्बाद कर देने का ख्याल पहले दिमाग में आता  है तब उसके बाद एसिड की बोतल हाथों में आती है " इसलिए दिमाग का इलाज़ ज्यादा जरूरी है. ऊँची जाति वाले निम्न जाति की लडकियों को सबक सिखाने के लिए उनपर एसिड फेंक देते हैं. और ऐसे जघन्य कृत्य में कोई जेंडर विभेद नहीं है. मालती के ऊपर एसिड एक लडकी ही फेंकती है. 'लक्ष्मी अग्रवाल' के एक इंटरव्यू में भी सुना था कि उन्हें लड़कियों से ही ज्यादा ताने मिलते हैं.पूरे समाज की मानसिकता ही विकृत हो चली है.

मेघना गुलज़ार ने बहुत ही संवेदनशील फिल्म बनाई है .दीपिका पादुकोण ने इसे मेघना गुलज़ार के साथ प्रोड्यूस भी किया है. दीपिका ने जिस तरह  पूरी फिल्म में अपने चेहरे पर एसिड विक्टिम का मेकअप किये रखा,उसकी तारीफ़ के लिए शब्द नहीं हैं. जनता से जो प्यार उन्हें मिला है, ऐसी फिल्मों में काम कर वे सूद समेत वापस कर रही हैं (और बदले में और प्यार पा रहीं हैं ) .मालती के संघर्ष में मितभाषी साथी के रूप में विक्रांत मैसी ने बहुत अच्छा काम किया है. सभी सह कलाकार अपने रोल को जीते हुए प्रतीत होते हैं. पूरी फिल्म में टुकड़ों में बजता गीत बहुत कर्णप्रिय है.

Sunday, August 25, 2019

फिल्म मिशन मंगल ; एक समीक्षा


मंगल मिशन ' फिल्म पर ज्यादातर नकारात्मक  प्रक्रियाएं मिलीं. कुछ ने तो कहा कि फ्री में टोरेंट पर बढ़िया प्रिंट मिले तब भी न देखो.  पर मैं तो कभी किसी की सुनती नहीं, इसलिए थियेटर में देखने चली गई. पर फिल्म देखने के बाद आभास हो गया कि वे लोग ऐसा क्यूँ कह रहे थे. जिन्हें विषय पर केन्द्रित, तकनीकी रूप से उन्नत, अंग्रेजी फ़िल्में देखने की आदत होगी, उन्हें यह फिल्म बहुत निराश करेगी बल्कि एक मजाक ही लगेगी. लेकिन आमजन जो ज्यादातर मनोरंजन के लिए फ़िल्में देखते हैं, उनके लिए यह एक जरूरी फिल्म है. फिल्म को मनोरंजक बनाते हुए जरूरी जानकारी भी देने की कोशिश की गई है. ये अलग बात है कि फिल्म में बॉलीवुड मसाला डालने के चक्कर में सब घालमेल हो गया है और इसी वजह से सिनेमा के गम्भीर दर्शक चिढ गए हैं. लेकिन फिर भी लोगों तक सरल भाषा में ‘मंगल ग्रह अभियान’ की मोटी मोटी बातें पहुँचाने की कोशिश की गई है.

मंगलयान की सफलता पर हमसबने उस मिशन में शामिल महिलाओं की तस्वीरें लगाई थीं और गौरवान्वित भी हुए थे .यह पूरी फिल्म मंगल मिशन को सफल बनाने के उनके संघर्ष,लगन, जुनून के इर्द गिर्द बुनी गई है. 2010 में जब राकेश धवन( अक्षय कुमार) के नेतृत्व में ISRO की एक टीम रॉकेट लौंच करने में असफल हो जाती हैं तो उन्हें सजा के तौर पर मंगल अभियान की तैयारी के लिए भेज दिया जाता है. जिसके लिए न कोई स्पष्ट योजना है, ना बजट और ना ही अनुभवी वैज्ञानिकों की टीम उन्हें मिलती है. वैज्ञानिक तारा (विद्या बालन ) जो उस असफलता के लिए खुद को दोषी मानती हैं, राकेश धवन का पूरा साथ देती हैं. उनकी टीम में चार और महिलाएं और दो पुरुष शामिल होते हैं . सब मिलकर रोजमर्रा के जीवन की छोटी छोटी घटनाओं से प्रेरणा लेकर अभियान को सफल बनाने में जुट जाते हैं. पैसे की अतिशय कमी की वजह से खर्च कम करने के लिए कई तरह के जुगाड़ लगाए जाते हैं.(जिसमें भारतीय माहिर हैं 😊 ) राकेश धवन बजट की बात पर १९६३ में पहले रॉकेट प्रक्षेपण का उदाहरण देते हैं, तब भी पैसे इतने कम थे कि रॉकेट के अलग अलग पार्ट, साइकिल और बैलगाड़ी पर ढो कर ले जाए गए थे . काम करने का जुनून हो तो रास्ते खुद ब खुद निकलते चले आते हैं. कई अडचनों को पार करते हुए एक हॉलीवुड फिल्म की बजट से भी कम बजट में भारत, मंगल ग्रह के ऑर्बिट में प्रथम प्रयास में ही सफलतापूर्वक सेटेलाइट भेजने वाला,पहला देश बन जाता है. ये सारी तकनीकी बातें भी बहुत सरलता से दर्शकों तक पहुंच जाती हैं.

फिल्म ‘मंगल अभियान पर केन्द्रित है पर निर्माता-निर्देशक की रूचि फिल्म में इस अभियान से इतर वैज्ञानिकों की निजी जिंदगी दिखाने की है जो पूरी तरह उनकी कल्पना पर आधारित है. दर्शकों को बांधे रखने के लिए कोई मसाला छोड़ा नहीं गया, सास-बहू की नोंक-झोंक, घर-बाहर एक साथ सम्भालती सुपर वूमन, तलाक के बाद अकेली मुस्लिम लडकी को घर मिलने की परेशानी, एक आज़ाद-ख्याल लडकी का सिगरेट फूंकना और बॉयफ्रेंड बदलना, एक कुंवारे चम्पू लडके का बाबाओं के चक्कर लगाना, विदेश में बसे बेटे द्वारा बूढ़े माँ-बाप की उपेक्षा, एक आर्मी ऑफिसर का घायल होना, सब शामिल है. देशभक्ति का तड़का भी भरपूर है.  पर पता नहीं एकाध जगह फूहड़ हास्य भी शामिल करने की क्या मजबूरी थी.

इन सबके बावजूद यह फिल्म देखी जानी चाहिए. जिन लोगों ने विस्तार से मंगलयान के अभियान के विषय में नहीं पढ़ा, शायद उनकी रूचि जागेगी . फिल्म में दी गई थोड़ी सी जानकारी से उनका मन नहीं भरेगा वे सब कुछ जानना चाहेंगे. क्या पता कोई बच्चा वैज्ञानिक बनने का सपना भी देखने लगे और पढाई में मन लगाए ( हो सकता है ये उम्मीद कुछ ज्यादा लगे पर उम्मीद ही तो है ) .
फिल्म में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका विद्या बालन की है जो उन्होंने बखूबी निभाई है. अक्षय कुमार 
कभी कभी कुछ ज्यादा ही ड्रामेटिक लगते हैं. शरमन जोशी, थ्री इडियट्स के बाद से ही चम्पू लडके के रोल में टाइप्ड हो गए हैं पर अभिनय सहज ही था . सभी कलाकारों ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया.
गीत-संगीत की गुंजाइश इस फिल्म में नहीं थी फिर भी डिस्को का एक लचर सा निरर्थक  दृश्य रचा अगया है. छायांकन बहुत सुंदर है.

मंगल अभियान की सफलता का सारा श्रेय इसरो के वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम को है. पर फिल्म तो चैरिटी या शौक के लिए नहीं बनाई गई है. वैज्ञानिकों के संघर्ष पर फिल्म बनाकर पैसे कमाने हैं, शायद कर मुक्त करवाने की लालसा में अंत में मोदी जी का भाषण भी शामिल किया गया है. या फिर पार्टी विशेष के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखानी हो पर इस फिल्म में बहुत असम्बद्ध सा लगता है.

फिल्म सुपर थर्टी : अदम्य जीवट,साहस,लगन की कहानी

बच्चों की गर्मी छुट्टियों में पटना जाती थी, उन्हीं दिनों IIT का रिजल्ट आता था. फ्रंट पेज पर सुपर थर्टी के बच्चों का रिजल्ट होता और सब की जुबान पर इसी की चर्चा होती थी. मुझे भी डिटेल जानने की इच्छा हुई. कुछ डॉक्यूमेंट्रीज़ देखे .एक दृश्य, हमेशा के लिए आँखों के समक्ष ठहर गया, साधारण से कपड़ों में दो बच्चे एक मोटी सी किताब खोले, उसमें से गणित के सवाल बना रहे हैं. उनके बीच एक कटोरी में भुने चने रखे हैं, बीच बीच में दो-चार दाने मुंह में डाल लेते हैं. अपने बच्चों के पीछे उनकी पसंद की चीज़ें लेकर मनुहार करती, घूमती माँ के लिए ये देखना बहुत कष्टकर था. मैंने ब्लॉग पर भी विस्तार से एक पोस्ट लिखी थी. कुछ लोगों ने मुझे कुछ लिंक मेल किये कि “ये खबरें पढ़िए , सुपर थर्टी के बारे में सबकुछ सच नहीं है. उसके संचालक आनन्द कुमार एक और कोचिंग इंस्टिट्यूट चलाते हैं और उसके पैसे से सुपर थर्टी के बच्चों को पढाते हैं.अपनी दूसरी कोचिंग क्लास के उत्तीर्ण बच्चों को भी सुपर थर्टी के क्लास से उत्तीर्ण बता देते हैं.” ऐसा अगर वे करते भी हो तब भी इतने सारे गरीब बच्चों को मुफ्त भोजन-आवास के साथ शिक्षा भी मुहैया कराना कम बड़ी बात नहीं. अगर सुपर थर्टी के किसी बच्चे ने IIT की परीक्षा नहीं भी उत्तीर्ण की, कोई दूसरा कम्पीटीशन पास किया होगा. उसमें पढने के प्रति रूचि तो जगाई क्यूंकि गरीबों के पास शिक्षा छोड़कर ,अपनी किस्मत संवारने का कोई दूसरा साधन नहीं है.

फिल्म की घोषणा होते ही उसके रिलीज़ होने की प्रतीक्षा शुरू हो गई. बहुत पहले देख भी ली थी पर अनेकानेक कारणों से जल्दी कुछ लिख नहीं पाई. ऋतिक रौशन को आनन्द कुमार के रोल में देखने के प्रति मैं भी आशंकित थी. पर फिल्म देखते हुए उनकी कदकाठी, रूपरंग सब घुल मिल जाते हैं. बिहारी एक्सेंट भी नहीं है लेकिन फर्स्ट हाफ में कहानी इतनी बाँध कर रखने वाली है कि अलग से ध्यान नहीं जाता . कैम्ब्रिज में एडमिशन मिल जाने के बाद भी,पैसे की कमी की वजह से आनन्द कुमार इंग्लैण्ड नहीं जा पाते .पैसों के इंतजाम के लिए पिता के साथ दर दर भटकना, दर्शकों की आँखें नम कर जाता है. आनन्द कुमार के किसी इंटरव्यू में भी एक नेता की कही बात सुनी थी. इसे फिल्म में हू ब हू लिया गया है. गोल्ड मेडलिस्ट आनन्द कुमार जब नेता जी से कहते हैं, “आपने गोल्ड मेडल देते हुए कहा था , जब कभी जरूरत हो तो मेरे पास मदद के लिए आ जाना “. पंकज त्रिपाठी बिलकुल नेताओं वाले अंदाज में कहते हैं, “हाँ हाँ मैंने आपको जरूर बुलाया होगा. मैं सब युवा लोगों को बुलाता हूँ. “ फिर जब आनन्द कुमार हिम्मत कर कहते हैं, “मुझे इंग्लैण्ड जाना है ,पैसे की जरूरत है “ नेता जी बोलते हैं...” जाओ...जरूर जाओ...इंग्लैण्ड ,अमेरिका, जर्मनी, चीन कहीं भी जाओ...पर पैसे के फेर में मत पड़ो...पैसा बहुत बुरी चीज है. और विदेश जाकर अपने देश की मिटटी को मत भूलना. ये मिटटी तुम्हारी माँ है...आदि आदि “ नेताओं के वही रते रटाये जुमले हैं. प्रसंग कोई भी हो, समस्या कोई भी हो उन्हें वही जुमले बोलने हैं.

आनन्द कुमार विदेश नहीं जा पाते. उनके पिता की मृत्यु हो जाती है. माँ पापड़ बेलने लगती है और आनन्द कुमार साइकिल पर पापड़ बेच कर घर का खर्च चलाते हैं. उन्हें एक कोचिंग क्लास में पढ़ाने का ऑफर मिलता है .वे पढाने लगते हैं, घर के हालात सुधरने लगते हैं. पर जब एक बच्चे को पैसे की कमी की वजह से उस कोचिंग क्लास में एडमिशन नहीं मिलता तो आनन्द कुमार को अपना समय याद आने लगता है.

वे गरीब बच्चों को मुफ्त में कोचिंग देने का फैसला लेते हैं. उन गरीब बच्चों को जिनके पास पढने का कोई साधन नहीं है, पर गणित में रूचि है ,अपने पास रख कर दोनों समय का खाना खिला कर IIT की तैयारी करवाते हैं. रोजमर्रा के जीवन के उदाहरण देकर मैथ्स -फिजिक्स-केमिस्ट्री इस तरह समझाते हैं कि इन विषयों में बच्चों की रूचि जागती है, खौफ नहीं होता. यह कहकर उनमें विश्वास भरते हैं कि "अब राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा, जो हकदार है वही राजा बनेगा ।"
इस मुहिम में तमाम अडचनें आती हैं....पैसे की कमी, बच्चों की जरूरतें, दूसरी कोचिंग क्लास चलाने वालों के लगातार हमले. पर आनन्द कुमार की माँ, भाई, बच्चे और कुछ सच्चे दोस्त हमेशा उनके साथ खड़े रहते हैं. माँ अपनी देखरेख में बच्चों के लिए खाना बनवाती हैं.

फिल्म में माँ और पिता के बीच की छोटी-मोटी नोंक झोंक बहुत प्यारी लगती है. अमूमन इस उम्र में और उस वर्ग में पति-पत्नी में आपसी संवाद ही बहुत कम होते हैं. पर गरीबी से आक्रांत परिवार में इन दृश्यों को डालकर निर्देशक ने फिल्म की बोझिलता कम करने की कोशिश की है. 

फिल्म के प्रति दर्शकों को आकृष्ट करने के लिए फिल्म में बहुत सारा बॉलीवुड मसाला भी डाला गया है. एक छोटा सा प्रेम प्रसंग भी है. जो नकली नहीं लगता पर नब्बे के दशक में नायिका आजकल के चलन वाले अनारकली सूट और बड़े बड़े इयररिंग्स में थोड़ी अलग थलग दिखती है. ( नेता जी भी जनता दरबार में घर से एलोवेरा जूस मंगवा कर पीते हैं, जिसका १९९२ में प्रचलन नहीं था पर शायद इसे क्रिएटिव लिबर्टी कहते हैं जो जरूरी हो जाता है पर हमें तो खटक जाता है  )

सेकेण्ड हाफ में फिल्म थोड़ी बनावटी लगने लगती है. अंग्रेजी स्कूल में पढने वाले छात्रों के साथ सुपर थर्टी के बच्चों के घुलने मिलने के लिए जो सिचुएशन तैयार की गई है, वो गले नहीं उतरती. वैसे ही आनंद कुमार को गोली लगने पर जब दूसरे कोचिंग क्लास वाले उन्हें जान से मारने के लिए अस्पताल पर हमला करते हैं और बच्चे विज्ञान के प्रयोगों से जिस तरह उनका सामना कर उन्हें हराते हैं, वो भी एक बच्चों के फिल्म के लिए तो बहुत प्रेरणादायी है पर एक गम्भीर फिल्म में नहीं जमा. ये चीज़ें और भी कई तरह से दिखाई जा सकती थीं....पर इस अत्यधिक ड्रामे ने फिल्म को कमजोर कर दिया .

अक्सर बायोपिक में अंत में जिनपर फिल्म बनाई गई है ,उन्हें भी परदे पर अलग से दिखाते हैं. फिल्म के अंत में इंतज़ार ही कर रही थी पर आधे स्क्रीन पर ऋतिक रौशन और आधे पे आनन्द कुमार की झलक भर दिखाई देती है.वो भी कुछ सेकेंड्स के लिए . मुझे लगा था, सुपर थर्टी से पास हुए कुछ बच्चों के भी चेहरे और उनके दो शब्द सुनने को मिलेंगे ,पर अनावश्यक ड्रामे में ही फिल्म की लम्बाई इतनी बढ़ गई कि इन सबकी गुंजाइश ही नहीं रही .( पर भला हो यू ट्यूब का, वहाँ सब मौजूद है 😊 )

फिर भी एक साधारण से व्यक्ति ने जिस जीवट, साहस और लगन से सैकड़ों गरीबों की किस्मत बदल दी और कितनों की प्रेरणा बने. उनकी कहानी देखने योग्य है. कई राज्यों में इसे करमुक्त करके सरकार ने सराहनीय कार्य किया है. स्कूल के बच्चों को भी जरूर दिखाई जानी चाहिए.

Monday, August 5, 2019

मनाली का मनु मंदिर

पहली बार कोई टी वी शो देखते हुए लगा कि अगर पलकें झपकाई या गर्दन घुमाई तो कुछ मिस हो जाएगा . एपिक चैनल पर सभ्यता की शुरुआत से सम्बन्धित कार्यक्रम में मनाली का  मनु मंदिर दिखा रहे थे और विशेषज्ञों द्वारा मंदिर से जुडी कथा भी बता रहे थे .

अभी अभी ये मंदिर देख कर लौटी हूँ  ,स्मृतियाँ भी ताजा थीं. एक कथा के अनुसार ,'ब्रह्मा के एक दिन को कल्प कहते हैं। एक कल्प में 14 मनु हो जाते हैं। एक मनु के काल को मन्वन्तर कहते हैं। वर्तमान में वैवस्वत मनु (7वें मनु) हैं। वैवस्वत मनु एक दिन दक्षिण की एक नदी तृप्ति धारा में स्नान कर रहे थे तो एक छोटी मछली ,उनके हाथों में आ गई . वे मछली को नदी में छोड़ने लगे तो मछली ने कहा ,'मुझे बड़ी मछली खा जायेगी . आप मुझे अपने घर ले चलिए ' मनु ने मछली को घर में लाकर एक घड़े में डाल दिया . मछली बड़ी होने लगी तो उसे तालाब में और फिर समुद्र में डाल दिया .मछली ने कहा कि शीघ्र ही जल प्रलय आने वाला है ,आप एक नाव में सृष्टि के बीज लेकर बैठ जाइएगा .मैं नाव को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दूंगी . प्रलय आने पर मनु सप्तऋषियों को और सृष्टि के बीज लेकर नाव में बैठ गए और मछली ने हिमालय की  तरफ एक ऊँचे स्थान पर नाव को लेजाकर 'ह्म्प्ता पर्वत' से बांध दिया . प्रलय शांत होने पर सप्तऋषियों ने यज्ञ कर एक नारी का निर्माण किया ,जिसे श्रद्धा कहा गया .और मनु एवं श्रद्धा ने मानव सन्तति को आगे बढ़ाया . सप्तऋषियों  ने सृष्टि के बीज से सृष्टि की रचना की.
 मनाली शहर का नाम मनु + आलय = मनुआलय का ही अपभ्रंश है .

वहां, महाराष्ट्र के ही कुछ टूरिस्ट मिले उसमे से एक अंकल जी मंदिर के रखरखाव से बहुत नाराज़ थे .पुजारी से कह रहे थे कि वे लोग सिर्फ पैसे लेते हैं, पीतल की मूर्तियों को चमकाते नहीं .सारी मूर्तियाँ काली पड़ गई हैं . मूर्तियों पर  प्लास्टिक के फूल की माला चढ़ाई हुई थी ,वह भी उन्हें नागवार गुजर रहा था , बोल रहे थे ,"एक ताजे फूल की माला तो चढ़ा ही  सकते हैं आपलोग ,इतने पैसे मिलते हैं आपलोगों को '

आज की अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करती पीढ़ी Adam and Eve को ज्यादा जानती है . उनका प्रश्न था , "हम मनु की संतान हैं ,ऐसा कहा जाता है . मनु और श्रद्धा की सन्तान है ऐसा क्यूँ नहीं कहा जाता ? श्रद्धा का नाम Eve की  तरह बराबरी में क्यूँ नहीं लिया जाता ?"
अब इसका उत्तर तो मेरे पास  नहीं .
मंदिर के अंदर चित्र खींचने की मनाही थी .हमने सिर्फ बाहर से ही ली पर नेट पर अंदर की तस्वीरें भी मौजूद हैं .
मनु मंदिर ,वशिष्ठ मंदिर और हिडिम्बा मंदिर की कुछ तस्वीरें .




Tuesday, June 18, 2019

एक सफर : कॉर्पोरेट से किसानी तक

वो ऑरकुट का समय था, किसी बुक कम्युनिटी में Hemanshu Joshi से मुलाक़ात हुई थी ,किसी विषय पर बहस से शुरुआत हुई होगी,जिसमें हम दोनों ही प्रवीण हैं 😀. फिर तो सिलसिला चल निकला, हिमांशु मेरी पेंटिंग्स में मीन-मेख निकालता और मेरी सारी फ्रेंड्स उस से उलझ जातीं,.वो सबके सामने अकेले ही मोर्चा सम्भाले रहता. इन सबसे अलग भी हिमांशु के विषय में पता चला, वो दुबई में रहता है, आई.टी. प्रोफेशनल है. काफी जिंदादिल है. मैराथन में भाग लेता है. (11 फुल मैराथन और 24 हाफ मैराथन में भगा ले चुका है ) .अच्छा वक्ता है .Toastmasters international ( a public speaking forum )में नियमित भाग लेता है . एक दिन उसने यूँ ही कहा कि वो गाँव वापस आ जाना चाहता है. वहां आकर खेती करेगा . देर तक वो अपनी योजनाओं के विषय में बातें करता रहा. लेकिन मैं बहुत बेमन से सुन रही थी, मुझे पता था सब विदेशों में रहने वाले ऐसा ही कहते हैं, कोई नहीं लौटता. मैंने अपनी सहेलियों से कहा भी ,'आज बहुत पकाया हिमांशु ने ' 

ये 2008-9 की बात थी. उसके बाद हिमांशु भी अपने कैरियर वगैरह में व्यस्त हो गया, मैं अपने लिखने-पढने में.

2016 में अचानक एक फोन आया .हिमांशु ने अपने अंदाज़ में कहा, 'अस्सलाम वालेकुम....मैं आपकी मुंबई में हूँ. ' 2015 के दिसम्बर में उसके पिता गम्भीर रूप से बीमार पड़े . हिमांशु सोचता रहा, 'माता-पिता हल्द्वानी में अकेले हैं , वृद्ध हैं, बीमार हैं .मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ....सिर्फ पैसे कमा रहा हूँ और खर्च कर रहा हूँ.' 2016 की फरवरी में उसने अपनी हाई-प्रोफाइल जॉब छोड़ दी और हमेशा के लिए हल्द्वानी आ गया. मैंने हिमांशु से आग्रह किया कि वो अब तक के अपने अनुभव लिख कर भेजे .ताकि इसे पढ़कर लोग प्रेरणा भी ले सकें और यह भी जानें कि कुछ युवा सिर्फ पैसों के पीछे नहीं भागते , परिवार-समाज को कुछ वापस देने की कोशिश भी करते हैं.
हिमांशु ने अंग्रेजी में लिख कर भेजा है ,जिसका मैंने हिंदी रूपांतरण किया है.

हिमांशु :


कृषि का मुझे कोई अनुभव नहीं था .पिता वैज्ञानिक , दोनों बहनें भी शिक्षा क्षेत्र से जुडी हुई .खेती बाड़ी से किसी का कोई रिश्ता नहीं. पर मैंने एक कोशिश करने की सोची. मेरे खेत, घने साल वृक्ष के जंगल के पास हैं , जिन्हें मैंने नाम दिया, ' Forest side farm' . मैंने ऐसे अनाज की खेती करने की सोची, जिन्हें बिलकुल प्राकृतिक तरीके से उगाया जाए. उनमें कोई केमिकल नहीं हो . जिसे मैं अपने परिवार और अपने आस-पास के लोगों को बिना किसी चिंता के दे सकूं और कोई अपराधबोध ना हो . Forest side farm' के पास दो कॉटेज भी बनाए हैं .जहां लेखक/कलाकार /प्रकृति से प्यार करने वाले या शहर के शोर शराबे से दूर लोग आकर कुछ दिन रह सकें.

दिसम्बर 2017 में पहली फसल लाही (एक तरह का सरसों ) की उगाई. फसल अच्छी हुई पर उन्हें बेचना मुश्किल. मैंने कोई भी केमिकल यूज़ नहीं किया था .इसलिए मेरी इच्छा थी कीमत ज्यादा मिले. लेकिन व्यापारियों को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता था. आखिरकार तीन महीने के इंतज़ार के बाद सामान्य मूल्य पर ही फसल बेचनी पड़ी. लाही की वजह से मसूर की फसल में देरी हुई और मसूर की बहुत कम पैदावार हुई ,निराशा तो हुई पर काम जारी रखना था .

मैंने उत्तराखंड में Avocado का सबसे बड़ा orchard लगाने का भी प्लान किया. avocado पांच साल में फल देने लगता है. साथ ही अमरूद के पेड़ भी लगाए जो दो साल में फल देते हैं. अक्टूबर 2017 में कर्नाटक जाकर avocado के180 पौधे लाए .पर अनुभवहीनता, पौधों के रखरखाव में कमी की वजह से सिर्फ दस पौधे बचे बाक़ी सब सूख गए. फिर भी आम,लीची,अमरूद, निम्बू का बाग़ लगाया है.

अगस्त 2018 में भट और कुलथी लगाई .जिसकी फसल एक क्विंटल से भी ज्यादा हुई. नवम्बर 2018 में गेंहू, चना, मसूर, राजमा,लगाया। फसल अच्छी हुई. मुझे ख़ुशी हुई कि जमीन ऊपजाऊ हो रही है.

मुझे कई लोगों से प्रेरणा मिली जिनमें प्रमुख हैं, ;गोपाल उप्रेती ( सेब उत्पादक ), डॉक्टर एस.एन. मौर्या (रिटायर्ड वाईस चांसलर ), डॉक्टर विशाल सोमवंशी (वैज्ञानिक, पूसा, दिल्ली ), डॉक्टर ए.के.सिंह (जॉइंट डायरेक्टर पंतनगर यूनिवर्सिटी ) दीपक मिश्रा ( एक डेयरी फार्मर ), पूर्वी सरकार ( बिजनेस कन्सल्टेंट ) और भी कई लोगों ने मानसिक सहारा दिया .

माँ मेरी एक बिग सपोर्ट है .पर वे थोड़ी नाखुश भी हैं कि मैंने अपनी इतनी अच्छी नौकरी छोड़ दी और अब तेज धूप में अपना बदन जला रहा हूँ . वे हेमशा चिंता करती हैं कि धूप में लगातार काम करने से मेरी त्वचा काली पडती जा रही है. 

इतने दिनों की खेती में ये सीख मिली :
1. बाज़ार में केमिकल डले अनाज और प्राकृतिक रूप से उपजाए अनाज में कोई फर्क नहीं किया जाता. किसान को बहुत ही कम पैसे मिलते हैं.
2. एक ही फसल को बेचना कठिन होता है क्यूंकि उसकी मात्रा बहुत ज्यादा होती है और होलसेल मार्केट में पैसे बहुत कम मिलते हैं.
3. स्वयं उपयोग करने वाले लोग व्यक्तिगत तौर पर बहुत ज्यादा मात्रा में नहीं खरीदते.
4. खाद बहुत महंगा होता है और इसी वजह से फसल की कीमत बढ़ जाती है.
5.कृषि व्यापार नहीं हो सकता, यह जीने का तरीका है ( agriculture is not a business.It is a way of life )
6.छोटे किसान, मुहल्ले/शहर के लोग हमारे जैसे छीटे किसान की सहायता करते हैं क्यूंकि उन्हें साफ़ और केमिकल रहित अनाज चाहिए होता है.
7. यू ट्यूब मेरा अकेला गुरु है. मैं ज्यादातर चीज़ें वहीँ से सर्च करके सीखता हूँ. मेरे दोस्तों ने भी बहुत सपोर्ट किया है.

आगे के लिए सोचा है ---
अपनी जमीन की क्वालिटी प्राकृतिक रूप से बढ़ाऊंगा . अगर मिटटी में biomass अधिक होगा तो जमीन ज्यादा ऊपजाऊ होगी. ज्यादा पानी सोखेगी.इस तरह सिंचाई की जरूरत कम पड़ेगी.
अलग अलग फसल उगाऊंगा, यह जमीन और फसल दोनों के लिए अच्छा होगा. सीधा खरीदार तक पहुँच पाऊँगा. मंडी में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
प्रकृति पर ज्यादा निर्भर करूंगा . खेती को ज्यादा जटिल नहीं बनाउंगा .
हमारे क्षेत्र के किसानों को कम से कम केमिकल के इस्तेमाल के लिए प्रेरित करूंगा.
हिमांशु को अपने कार्य में सफल होने की ढेरों शुभकामनाएं !!  







Wednesday, May 29, 2019

दस वर्षों के बाद,वंदना अवस्थी से पहली मुलाकात

"ये मेरी बहुत अच्छी दोस्त/अच्छे दोस्त हैं " कहते अब एक हिचक सी Bहोती है। समय का रुख कब बदल जाता है, और लोग अच्छे दोस्त से सिर्फ दोस्त,फिर परिचित और फिर अपरिचित तक की यात्रा कब पूरी कर लेते हैं, आभास भी नहीं हो पाता। फिर भी नज़र का बजरबट्टू लगाकर कहने का मन है, पिछले दस वर्षों से वंदना अवस्थी दुबे  से दोस्ती एक समरेखा पर चलती आ रही है, फिंगर्स क्रॉस्ड चलती भी रहेगी। और विडम्बना ये कि अब तक हम मिले नहीं थे। कुछ सुयोग ही नहीं जुट पाया। अचानक एक दिन मैसेज आया..."22 मई को मैं पटना पहुँच रही हूँ, मुलाकात हो पाएगी? " वंदना को अंदाज़ा था कि मई के अंतिम सप्ताह में मुंबई लौटती हूँ। और उसका अंदाज़ा बिल्कुल सही था।

वंदना अपनी दीदी -जीजाजी के नए घर के गृहप्रवेश समारोह में शामिल होने पटना आई हुई थी। और मैं गाँव से बरक्स पटना मुम्बई जाते हुए एक दिन के लिए पटना में रुकनेवाली थी।

24 को वंदना से मिलना तय हुआ। सुबह आठ बजे की गाड़ी बुक कर दी थी। ताकि दोपहर में वंदना से मिल लूँ और शाम को उषाकिरण दी, भावना,वीणा, नीलिमा दी से मुलाकात हो जाये। गाँव में यूँ भी बहुत जल्दी सुबह हो जाती है। मैं और माँ जल्दी से तैयार  हो गए। पर सबकुछ सोचे हुए तरीके से हो जाये फिर लिखने का मसाला कहाँ से मिले :D । समय निकलता जा रहा था,गाड़ी का अता -पता ही नहीं, ड्राइवर फोन ही ना उठाये। गाड़ी के मालिक को फोन किया तो उसने कहा, 'गाड़ी तो सुबह ही निकल गई है पर ड्राइवर फोन नहीं उठा रहा।'आखिर ग्यारह बजे के करीब ड्राइवर महाराज ने मेहरबानी की और बताया, " वैशाली में हमारा गाड़ी धर लिया है, पेपर सब ले लिया है।हमको आते हुए तीन- चार बज जाएंगे " लो जी अब तो पटना पहुँचते आठ बज जाते,किसी से भी मिलना नहीं हो पाता। :( ।खैर गाँव में आप मुश्किल में हो तो पूरा गाँव मदद करने को सक्रिय हो जाता है। पास में रहने वाले रंजन,अभिषेक ने कई फोन घुमाए...रंजन की कार सजी धजी हुई सुबह ही दूल्हा दुल्हन को लेकर लौटी थी।रात भर का जागा ड्राइवर सो रहा था। खैर दूसरे ड्राइवर का इंतज़ाम हुआ।कार की फूल पत्तियां साफ की गईं और हम 1 बजे पटना के लिए निकले। पटना की सखियों माफी🙏 हमें ये शाम वंदना के नाम करनी पड़ी 😊.

 मैं घर का गेट ढूंढ ही रही थी कि चेहरे पर हज़ार वाट की मुस्कान लिए, एक उजली सी दुबली-पतली काया नमूदार हुई। वंदना की दीदी ,जीजाजी ,उनकी दोनों बेटियाँ शैली और संज्ञा बड़े प्यार से मिलीं। हमेशा बिहार से बाहर रहने के बावजूद दोनों बेटियों ने बिहार के संस्कार के मुताबिक पाँव छूकर प्रणाम किया
  पढ़ाकू दस वर्षीय नाती ऋतज बार बार पूछ लेता, "चाय बनाऊँ ?😊 "।उसने दो दिन पहले ही चाय बनानी सीखी थी और दो बार बिल्कुल परफेक्ट चाय बनाकर पिलाई । बहुत ही आलीशान बड़ा सा घर है, उसकी एक दीवार पर गुणी बिटिया संज्ञा ने बहुत ही सुंदर म्यूरल बनाया है। ऋतज और वंदना ने भी पूरी करने में मदद की।(तस्वीर ज़ूम कर के देखें,जहाँ कोई गलती नज़र आये जरूर वंदना ने की होगी 😛 )

मैंने अनुमति लेकर झट तस्वीर ले ली ,स्कूल की दीवार पर ऐसा बना सकती हूँ (कहीं कुछ अच्छा देखूं तो स्कूल का ही ख्याल रहता है  :) )

एक मजे की बात हुई...वंदना जैसे ही मेरा परिचय देते हुए कुछ बताने लगती, दीदी कहतीं, 'हां पता है हमें...फोटोज़ भी देखे थे " :) दीदी-जीजाजी भी फेसबुक पर हैं और मेरी पोस्ट पढ़ते रहते हैं। आखिर वंदना ने खीझकर कह दिया,'लो भई , इनलोगों को तो सब पता है...कुछ बताने की जरूरत ही नहीं।"😀
हम और वंदना बातें करते रहे और अर्चना दी हमारी कैंडिड फोटोज़ खींचती रहीं। वंदना के मम्मी पापा से भी मिली। पापा सौम्य-स्नेहिल और मम्मी तो बिल्कुल गुड़िया सी हैं।प्यार से गले लगा लिया । उन्होंने तीन वर्ष पूर्व मेरा उपन्यास 'काँच के शामियाने ' पढ़ा था और उन्हें पूरी कथानक याद थी। मेरे लिए सुखद आश्चर्य था,वंदना की दोनों दीदियों ने भी मेरा उपन्यास पढ़ रखा था। (और काँच के शामियाने इतना ईर्ष्यालु है,चाहता है सिर्फ उसकी ही चर्चा हो , मैं कहानी संग्रह 'बन्द दरवाजों का शहर' दीदी के लिए लेकर आई थी पर उसने गाड़ी में ही छुड़वा दी :( )
मुझे एक पल को भी लगा ही नहीं, मैं किसी अनजान घर में आई हूँ या सबसे पहली बार मिल रही हूँ। जब आंटी से विदा लेने गई तो उन्होंने कब चुपके से दुपट्टे के कोने में रुपये बांध दिए,मुझे पता ही नहीं चला। पता चलने पर भी आंटी के आशीर्वाद को तो नत होकर ग्रहण करना ही था।मुझे और वंदना को तो दस वर्ष का कोटा पूरा करना था, हमारी गप्पें ही खत्म ना हों। बीच बीच में शर्बत,चाय,मिठाई,नमकीन की सप्लाई होती रही। संज्ञा ने कहा , "यहाँ पास में बहुत अच्छी चाट मिलती है, पार्सल मंगवाती हूँ।आपलोग ए. सी. में बैठकर आराम से खाइए।" पर हमारा पुराना प्यार जाग उठा था। कंकड़बाग में मेरे चाचा और मामा रहते थे। रिटायरमेंट के बाद पापा भी कुछ समय रहे थे। मेरा बहुत जाना-पहचाना इलाका था। वंदना भी गर्मी छुट्टियों में अक्सर अपनी दीदी के पास आया करती थी। कोने पर मशहूर शालीमार स्वीट्स की चाट और लस्सी की याद ही हमारे मुँह में पानी ला रहै था। और हम दोनों सबसे विदा ले चाट खाने चल दिये।

कॉलेज के दिनों की तरह हमने रिक्शा या ऑटो नहीं लिया कि पैदल चलते देर तक साथ रह पायेंगे 💝। सबकी अजीब निगाहों की परवाह ना करते हुए दुकान की फोटो खींची गई,वंदना ने बड़े पोज़ वोज़ दिए 😀 ।
पर शालीमार जाकर एक सबक मिला, 'पुरानी यादों के साथ कृपया कोई छेड़छाड़ ना करें । उन लम्हों को दुबारा जीने की कतई कोशिश ना करें। दिल के कोने में उनकी खूबसूरत याद संजो कर रखें और जब तब झांक कर आहें भर ले। वरना दिल इतनी जोर से टूटेगा कि वे यादें फुर्र कर उड़ जाएंगी।'

सबसे पहले तो चाट खाने की व्यवस्था ने ही निराश किया। पहले दुकान के अंदर ही टेबल लगे होते और आप शांति से चाट खा सकते थे। अब दुकान बहुत बड़ा हो गया है, ढेरों मिठाई-नमकीन-चॉकलेट सजे थे और टेबल बाहर लगी थी। सड़क की चिल्ल-पों सुनते ,गर्मी से बेहाल होते आप चाट खाइए। हमने पुराने प्रेम की खातिर वो भी मंजूर किया । पर दिल टूटना तो अभी बस शुरू हुआ था, काउंटर पर बैठे लड़के ने बताया अब लस्सी नहीं मिल्कशेक मिलता है (बढ़नी मारो,इस मिल्कशेक को...समझने वाले इसका अर्थ समझ जाएंगे :) )
चाट की शकल ही कुछ नहीं जंच रही थी और मुँह में रखते ही स्वाद ने रही सही कसर भी पूरी कर दी। कहीं नमक बहुत ज्यादा, कहीं मिर्च तेज.....दही भी खट्टी। बड़ी मुश्किल से दो चार चम्मच खा कर हमने पूरी प्लेट छोड़ दी।
 आइसक्रीम खा कर मुँह का स्वाद बदलने की सोची पर अब दूध के जले हम छाछ भी फूंक रहे थे। कोई भी जाना-पहचाना नाम नहीं दिखा तो ये इरादा भी मुल्तवी किया और एक छोटी बोतल माज़ा से संतोष किया।
तीन घण्टे गुजर गए थे पर महसूस हो रहा था,हमने तो कुछ बात ही नहीं की :) । खैर, मिलने की शुरुआत तो हुई....अब मिलते रहेंगे।

    


 



  



फ़िल्म पंगा : अधूरे सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद

हमारे देश क्या पूरे संसार में ही कुछ वर्ष पहले तक लड़के/लड़कियों के काम सुनिश्चित थे।उन्हें शादी कर घर और बच्चे की देखभाल करनी है और लड़के...