Friday, February 5, 2016

कुमार प्रशांत श्रीवास्तव की 'काँच के शामियाने 'से रोचक मुलाक़ात


कहानी लिखने वालों के साथ, अक्सर कहानियाँ भी घटित होती हीहैं . एक ऐसा ही कुछ रोचक वाकया हुआ .

 एक सज्जन, जिन्हें किताबें पढने का शौक है ,और जो अक्सर ऑनलाइन किताबें मंगवाते रहते हैं. अमेजन से दो किताबें मंगवा रहे थे तो उनकी नजर 'कांच के शामियाने' पर पड़ी . उन्हें किताब के नाम ने आकर्षित किया और उन्होंने किताब ऑर्डर कर दी .(और मुझे कुछ लोगों से फीडबैक मिला था कि नाम बड़ा पुराना सा है, सत्तर के दशक का लगता है, कोई कूल नाम होना चाहिए .एक हफ्ते तक मैं कुछ सोच में थी पर फिर अपने सूत्र वाक्य, 'सुनो सबकी करो अपने मन की' पर अमल करते हुए यही नाम रहने दिया )बाद में भी कई लोगों ने लिखा कि सबसे पहले उन्हें उपन्यास के नाम ने ही आकृष्ट किया .

उन्हें किताब पसंद आई ,एक ही सिटिंग में पढ़ ली उन्होंने और फिर मुझे मैसेज करने को मुझे फेसबुक पर ढूँढा तो पता चला उनके और मेरे दो म्युचुअल फ्रेंड्स हैं. उनकी पत्नी की मामी मेरी भी फ्रेंडलिस्ट में हैं .उन्होंने तुरंत अलका को फोन लगा कर पूछा ,'आप रश्मि रविजा को कैसे जानती हैं' अलका इस पर क्या कहे क्यूंकि हमारी जब तक फोन पर बात नहीं होती, हमारा दिन शुरू नहीं होता. वो मेरी छोटी बहन है यानि कि Kumar Prashant Srivastava की पत्नी पूजा के मामा की शादी मेरे मामा की बेटी से हुई है. :)


प्रशांत जी ने किताब पर अपनी प्रतिक्रिया भेजी है .: "Aaap ka novel kaanch ke shamiyane padha.. maine ek bar shuru kiya to yakin maniye bina khatm kiye ruk nahi paya..just abhi finish kiya hai. Last page tak aate aate mai khud emotional ho gaya.... I must say grt work.. Waiting for ur next novel.
. As i am only a reader not a good writer, so can't express my feelings about this novel in so many words, but i want to say that its contents have so much emotions which can make its place in best seller group very soon. Now about the story ...

जो कि शुरुआत में ये दिखाती है कि एक लड़की की शादी आज भी घर के सिचुएशन और एक रुढीवादी सोच ( लड़का अच्छा खाता -कमाता है, और क्या चाहिए ) पर निर्भर है. और कहानी में एक पुरुष का अहम् उसकी जिद ,एक परिवार की स्वार्थपरक इच्छाएं , दोहरा मापदंड ,फिर एक स्त्री (महिला) के दुःख दर्द और संघर्ष और अंत में अपनी पहचान बनाने के संघर्ष और प्रयास, सब कुछ है, इसमें .एक पाठक के अंदर के बहुत से इमोशन, इसको पढ़ते हुए जाग जाते हैं. शुरू में दुःख, क्रोध, फिर दर्द,दया और अंत में ख़ुशी के आंसू > मुझे इसमें जो बहुत अच्छा लगा, उसमे सेपहला तो ये है कि जो एक माँ का अपने बच्चे को जन्म देने का जुनून और ज़ज्बा और दूसराइसका समापन .

जिस तरह से माँ और बच्चे के लाड़ -दुलार किया गया है, वो मन को हर्षित कर देता है. "

यह प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुत मायने रखती है क्यूंकि यह एक ऐसे पाठक कीप्रतिक्रिया है , जो फेसबुक, ब्लॉग किसी भी माध्यम से मुझसे कनेक्टेड नहीं थे .और उहोने किताब का नाम पहले पढ़ा, लेखिका का बाद में .
बहुत शुक्रिया प्रशांत जी ,आपने और कुछेक मित्रों ने मेरे मन से ये वहम भी दूर कर दिया कि पुरुषों को ये किताब शायद पसंद ना आये.

Tuesday, February 2, 2016

"काँच के शामियाने' पर कलावंती सिंह जी की टिप्पणी

कलावंती सिंह जी एक संवेदनशील कवियत्री और जानी मानी समीक्षक हैं . उनकी कवितायें और पुस्तकों की समीक्षा प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं. उनका बहुत आभार  ,उन्होंने इस उपन्यास पर अपनी प्रतिक्रिया दी .

रश्मि रविजा का उपन्यास काँच के शामियाने अभी अभी पढ़कर उठी हूँ। सरल भाषा शैली मे लिखा गया एक अत्यंत रोचक उपन्यास । बहुत दिनों बाद कोई ऐसी चीज पढ़ी जहां बौद्धिकता का आतंक नहीं है । मुझे लगता है कि ऐसे पारिवारिक उपन्यासों का बहुत प्रचार प्रसार होना चाहिए ताकि लोग इसे पढ़कर मनोरंजन और शिक्षा दोनों पा सकें।

आज भी परिवार ही किसी व्यक्ति को सुरक्षा और सम्मान दे सकता है अच्छे बुरे वक़्त में उसके साथ खड़ा रहता है। एक पारिवारिक जीवन है और उसकी विसंगतियों की कहानी है यह । आज स्त्री शिक्षा और स्त्री सशक्तिकरण, संपति का अधिकार जैसे तमाम आंदलनों के बावजूद समाज में स्त्री की असली स्थिति क्या है? अपने लिए नौकरी करने या उसमें आगे बढ्ने के तमाम साल औरत को अपने बच्चे बड़े करने में लग जाते हैं। घर में किए गए कार्यों का कोई मोल नहीं। संवेदनशील लड़कियों को दोहरी मार झेलनी पड़ती है। लोग योग्य लड़कियों से विवाह तो करना चाहते है पर उसे सम्मान देना नहीं जानते। हर समय नीचा दिखाते हैं। पुरुष विवाह के बाद उसे जैसे चाहे रखे । मायके के लोग भी कभी उसको मायके के घर को अपना समझने नहीं देते। 

मेरे आस पास की कितनी ही लड़कियों का चेहरा मैंने इस उपन्यास में देखा।

रश्मि रविजा ने बहुत छोटे छोटे डिटेल्स को बहुत ही सूक्ष्मता से पकड़ा है और लिखा है।

Wednesday, January 27, 2016

मोनिका शर्मा की कलम से 'काँच के शामियाने' का आकलन

'डा. मोनिका शर्मा' एक प्रखर पत्रकार हैं .रोज ही किसी ना किसी प्रतिष्ठित अखबार में उनके आलेख प्रकाशित होते हैं . सामयिक ,सामाजिक एवं जनकल्याण सम्बन्धी विषयों पर उनकी लेखनी खूब चलती है. इसके अलावा वे अर्थपूर्ण कवितायें भी लिखती हैं. हाल में ही उनका कविता संग्रह  '  'देहरी पर अक्षांश ' प्रकाशित हुआ है . उन्हें अनेक बधाइयां .
 अपने ब्लॉग 'परिसंवाद' पर वे निरंतर विचारोत्तेजक आलेख लिखती रहती हैं .




                                                                        "काँच के शामियाने "
भीतरी शक्ति के निखरने की कहानी
कभी कभी किसी किताब को पढ़ना उसे जीने जैसा भी होता है । उस कहानी में शब्द जिन परिस्थितियों को उकेरते हैं उन्हीं के मुताबिक मनोभाव प्रभावित हैं । इसीलिए पन्नों से गुज़रते हुए कभी कुछ सवाल जन्म लेते हैं तो कई बार गुस्सा भी आता है । सवाल, हमारे सामाजिक-पारिवारिक हालातों को लेकर दस्तक देते हैं जो बरसों से जस के तस हैं और गुस्सा उन जटिल अनकहे अबोले नियमों के लिए जो केवल महिलाओं के लिए ही बने हैं । कई बार तो बचपन से लेकर वैवाहिक जीवन तक उन्हीं के तले सहमी सी ज़िंदगी को जीते हुए पूरा जीवन बीत जाता है लड़कियों का । घर बदल जाता है । नए रिश्ते जुड़ जाते हैं । बहुत कुछ पीछे छूट जाता है लेकिन उलझने ज़रूर बरकरार रहती हैं उम्रभर । जीवन की इन्हीं दुश्वारियों और अपनों से मिली तल्ख़ियों के बीच जूझते हुए कई बार हौसला दम तोड़ देता है तो कई बार एक स्त्री अपना नया अस्तित्व रचती है । जिन अपनों के लिए समझौते करते हुए जीती है उन्हीं अपनों के लिए कभी शक्तिस्वरूपा बन कठोर निर्णय भी लेती है ।
आज रश्मि रविजा का उपन्यास 'कांच के शामियाने' पढ़कर ख़त्म किया । यह उपन्यास स्त्री की इसी जद्दोज़हद को लिये है जो टूटती तो कई बार है पर बिखरती नहीं । हाँ, इस संघर्ष में वो निखर ज़रूर जाती है । पर जया के लिए सब कुछ इतना सरल नहीं रहा । जी हाँ, यही नाम है उपन्यास की नायिका का, जिसकी कहानी हमें हमारे समाज की उन परिस्थतियों से रूबरू करवाती है जो कमोबेश हर लड़की के हिस्से आती हैं ।
एक वाक्य में कहूँ तो जया के साथ वही हुआ जैसा अक्सर होता है । यानि मायके में जो गुण कहे जाते थे वो ससुराल में किसी के लिए ध्यान देने वाली बात ही नहीं रहे । मायके में जिसे आत्मविश्वास कहा जाता था ससुराल में सब उसे उदंडता समझते थे । शादी क्या हुयी मानो उसकी काबिलियत और व्यक्तित्व का कोई मायना ही नहीं रहा । घर के सदस्यों को छोड़ भी दें तो स्वयं उसके जीवनसाथी का व्यवहार भी उसे मान-सम्मान देने वाला ना था । पढ़ते हुए कई बार यही लगा कि अपनी जीवनसंगिनी के प्रति किसी इंसान का ऐसा रवैया कैसे हो सकता है ? इतनी नकारात्मकता और बेवजह की नाराजगी आखिर किसलिए भरी थी राजीव के व्यवहार में । कई जगह उसके इस दुर्व्यवहार को भोगती जया की हालत देखकर गुस्सा भी आता है और पीड़ा भी होती है । उपन्यास की घटनाएँ इतनी जीवंत लगती हैं कि ससुराल वालों का लालची और अपमानजनक व्यवहार आँखों के सामने दिखता है । यह सब होते हुए भी ध्यान देने वाली बात यह है कि लेखिका ने इस बात का ख़ास ख्याल भी रखा है कि परम्पराओं और परिवार के नियमों से बंधी पढ़ी लिखी लड़कियाँ भी किस कदर हर जुर्म सहने की हिम्मत जुटा लेती है । पीड़ा और अपमान सहती जाती हैं, सहती जाती हैं । लेकिन उनके अपने तो मानो उनकी परीक्षा लेने की सोचकर बैठे होते हैं । ना थकते हैं ना रुकते हैं । तभी तो वे हँसती खिलखिलाती और जीवन से जुड़े सुन्दर सपने मन में संजोने वाली लड़की के मर्म को अंदर तक चोट पहुँचाने में कामयाब भी होते हैं ।
तभी तो मन में सवाल भी उठते हैं कि लड़की की शादी से पहले लड़के की नौकरी और कमाई ही क्यों देखी जाय । भावी दूल्हे का व्यवहार और विचार कैसा है यह भी तो देखना चाहिए । साथ यह भी कि अगर लड़के वाले पहल कर दें तो लड़की वाले कृतार्थ होकर बस उनकी बात मान लें, ऐसा क्यों ? क्यों नहीं सोचा जाता कि शादी के बाद अगर दोनों की मानसिकता ही मेल नहीं खाती तो साझा जीवन जीया कैसे जायेगा ? जया के मामले में यही हुआ। नतीजतन उसकी शादीशुदा ज़िन्दगी केवल दुखों की सौगात बनकर रह गयी । पति का गुस्सा और घर वालों का स्वार्थपरक व्यवहार झेलना उसकी नियति बनकर रह गया । बना ख़ता के सज़ा की तरह ये जीवन उसके हिस्से आया । हमारे परिवेश की असलियत को उजागर करते इस उपन्यास में अपनों बेगानों से ऐसे हालातों में अक्सर जो मिलता है जया को भी वही मिला । नसीहतें और हर हाल में अपने घर को बचाये रखने की सलाह । लेकिन पढ़ते हुए लगा रहा था कि जया का घर बसा ही कहां हैं ? वैवाहिक जीवन में जो सम्मान, संभाल और प्रेम होना चाहिए वो कहीं दूर दूर तक नहीं था । हर पन्ने को पढ़ते हुए लगा कि जया ऐसा जीवन क्यों जिए जा रही है जो उसे तो खोखला कर ही रहा है उसके बच्चों से भी बचपन छीन रहा है । अमानवीय व्यवहार का धनी राजीव ना अच्छा पति बना और न ही पिता । इसीलिए बच्चों की भी दुर्दशा ही हो रही थी उस घर में । आखिर कब तक बर्दाश्त करेगी जया ? मन में कितनी पीड़ा हुई यह देखकर कि यह सहनशीलता उसका सब कुछ छीन रही थी ।
खैर, कहानी के नए मोड़ पर पढ़ने वाले को भी कुछ हिम्मत मिलती है जब जया अपनी बेटी की मासूम चाह और उम्मीदें जानकर कहीं भीतर तक हिल जाती है। इन नन्ही आशाओं को जानकर वो ख़ुद नया हौसला पाती है और अपना आशियाना बसाने की सोचती है । हालाँकि हमारे समाज में ऐसे निर्णय भी आसानी से ना तो सराहे जाते हैं और ना ही समझे जाते हैं पर जया का अडिग रहना वाकई स्त्रीत्व की शक्ति की गहराई समझाता है । जो महिला पत्नी थी तो शक्तिहीन सी सब सहती रही वो बतौर माँ हिम्मत का प्रतिमान लगने लगती है । यहाँ पाठक के मन में भी ख़ुशी दस्तक देती है कि चलो पति की क्रूरता बर्दाश्त करने का सिलसिला तो थमेगा अब। सुखद यह कि आगे होता भी यही है । एक बार हिम्मत बंधती है तो फिर बंधती ही चली जाती है । सार्थक सन्देश मिलता है कि क़दम बढ़ाये तो जाएँ, राहें भी निकलेंगीं । प्रवाहमयी भाषा और आम से शब्दों में गुंथे जीवंत अहसास उपन्यास की सबसे बड़ी ख़ासियत हैं । जो ना केवल पढ़ने वाले को बांधे रखते हैं बल्कि पाठक को अपने साथ बनाये रखते हैं । संवादों को पढ़ते हुए लगता है जाने कितने आँगन ऐसे हालातों के गवाह बने हैं और आज भी बन रहे हैं । इस उपन्यास की सफलता और सतत लेखन के लिए रश्मि जी को हार्दिक शुभकामनायें |

Thursday, January 21, 2016

काँच के शामियाने ' पर घुघूती जी के विचार

Ghughuti Basuti जी ,ब्लॉग  जगत में और अब फेसबुक पर भी अपने प्रखर विचार को दृढ़ता से रखने के लिए मशहूर एक जाना पहचना नाम हैं . अपने  चर्चित ब्लॉग   घुघूती बासूती   में उन्होंने कई महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर  आलेख लिखे हैं . ब्लॉग पर उनके प्यारे संस्मरण और अर्थपूर्ण  कवितायें भी पढ़ी जा सकती हैं .
 इस उपन्यास के बहाने बहुत जरूरी सवाल उठाया है कि आखिर माता-पिता किसी भी तरह लड़की को दूसरे के हवाले कर छुट्टी पा लेना क्यूँ चाहते हैं ?'
हर हाल में उसे ससुराल में निभाने की सीख दी जाती है .अगर लड़की लगातार प्रताड़ित होते हुए अपनी जान भी दे दे तो उसके माता-पिता उसकी मौत पर दो बूँद आंसू बहा लेंगे पर समय रहते ,उसे उस प्रताड़ना से छुटकारा दिलाने की कोशिश नहीं करेंगे .
स्थिति बदल रही है पर यह बदलाव समुद्र में एक बूँद जैसा है...बाकी समुद्र का पानी वैसा ही खारा है. 
बहुत आभारी हूँ ,आपने इतना गहरा विश्लेषण किया .बहुत बहुत शुक्रिया

                                                                      काँच  के  शामियाने 

यह एक ऐसी कहानी है जो किसी भी स्त्री समानता में विश्वास रखने वाले को ही नहीं, स्त्री को मानव मानने वाले तक के हृदय को निचोड़ कर रख देगी। इस कहानी को पढ़ते समय जितना आक्रोश अपने समाज पर, उसके दोहरे मापदंडों पर आता है उससे भी अधिक भारतीय माता पिता पर आता है। हर पीड़ित, चाहे दहेज पीड़ित, मार पीड़ित, तिरस्कृत स्त्री के पीछे उसका साथ न देने वाले माता पिता की भी गजब भूमिका रहती है।

यह कहानी है एक स्त्री की, एक आम भारतीय स्त्री की, जिसे परिवार तब तक वयस्क नहीं होने देता जब तक विवाह न हो जाए। परिवार लाड़ दुलार देगा किन्तु मासूमियत बनी रहनी चाहिए। सांसारिकता और चतुराई जिसे अंग्रेजी में स्ट्रीट स्मार्ट होना कहते हैं, जिसके चलते व्यक्ति आने वाली विपदा को भाँप सकता है, उससे अपना बचाव करने में सक्षम हो सकता है, वे नहीं होने चाहिए। उसका निरा अभाव विवाह से पहले स्त्री के गुण माने जाते हैं। वह पढ़ाई में तेज हो, कलाओं में कुशल हो, गृहकार्य में दक्ष हो किन्तु महत्त्वाकांक्षी न हो। नौकरी करे, महत्त्वाकांक्षाएँ पाले तो पति और ससुराल की अनुमति से और उनके अनुरूप। उसका व्यक्तित्व और इच्छाएँ पति के व्यक्तित्व और इच्छाओं का विस्तार भर हों। वह बिना रंग का, बिना आकार का द्रव्य हो जो जिस बर्तन में डाल दिया जाए उसका आकार और रंग ले सके।

कहानी की नायिका जया से भी यही सब अपेक्षाएँ की गईं और उससे भी आगे बढ़कर बहुत कुछ। उसे बिना आकार बिना रंग का द्रव्य न केवल पति और ससुराल वालों ने माना, जिसे जब तब जैसे मन किया आकर मथ दिया, किन्तु उसकी अपनी माँ ने भी उसे यही माना। इस उपन्यास की कथा का सबसे दुखद पहलू पति और ससुराल का दुर्व्यवहार नहीं है अपितु उसके अपने परिवार का रवैया है। ससुराल वालों की तरह वे बुरे नहीं हैं किन्तु बेटी की व्यथा से अधिक उनके लिए जैसे तैसे उसके बोझ से मुक्त रहना है। जरा सा भी, रेशे भर भी दामाद में मानवता दिख जाए तो उस ही का सहारा लिए वे जया के प्रति किसी भी कर्त्तव्य या ग्लानि से अपने को मुक्त कर लेते हैं। विधवा माँ इतनी भी असहाय नहीं है। जया के पिता का मकान है, जिसमें जया का भी हिस्सा होना चाहिए। किन्तु माँ का असहायता ओढ़ना मुझ माँ को भीतर तक झकझोर गया।

जया पर क्रोध आ सकता है कि प्रतिकार क्यों नहीं करती। किन्तु जब जन्म से ही प्रतिकार न करने की घुट्टी पिलाकर बेटियों को बड़ा किया जाए तो क्रोध पिघल जाता है।
बहुत से पाठकों को लग सकता है कि जया का पति इतना धूर्त और बुरा क्यों और कैसे हो सकता है। प्रायः हमारे समाज में इसके लिए भी पत्नी को ही दोष दिया जाता है, कि तुम क्रोध मत दिलाओ, तुम ही कुछ गलत करती होगी जो वह तुम्हें पीटता है। अर्थात उसे क्रोध करने का अधिकार और स्त्री को महसूस करने का, हिलने डुलने का भी अधिकार नहीं। साँस रोके रहे, शब्द बाहर न निकलने दे ताकि कोई बात इस विशिष्ठ मानव को बुरी न लग जाए।

लेखिका ने जया के पति का अच्छा मानसिक विश्लेषण भी किया है। घर का लाड़ला पहला पौत्र होने के कारण दादी का वर्षों उसे गोद में लिए घूमना, उसकी जिद को पूरा करने के लिए आधी रात को भी अपनी बहू से उसका मन पसन्द पकवाना आदि। इस पुरुष को तो जन्म से ही यह सिखाया गया कि स्त्री उसकी इच्छापूर्ती का साधन मात्र है। इसी पाठ को और जिद को वह जीवन भर गाँठ बाँधकर चला। इसी जिद में उसने जया से विवाह रचाया, इसी जिद में उसने जया को शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक रूप से तोड़ा और तहस नहस किया।

यह तो जया के भीतर की जिजिविषा थी, उसकी आन्तरिक शक्ति थी जिसे एक बार बेटी ने अपने जीने की चाह दिखाकर जागृत कर दिया और जया एक दयनीय अमानवीय जीवन से अपनी लगन, मेहनत और कलम के माध्यम से पुनः मानव जीवन ही नहीं जी अपितु सम्माननीय जीवन जी सकी। एक बार जब उसे राह दिख गई तो वह राह की हर रुकावट को या तो हटाती गई या उसकी बगल से अपने लिए मार्ग बनाती चली गई।

उपन्यास लगातार बाँधे रखता है। भाषा, शैली और कहानी सभी मजबूत हैं। लेखिका की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि जया हमें अपने ही बीच की कोई सहेली, बेटी नजर आती है। हम उससे इतना जुड़ जाते हैं कि उसका दुख हमें दुखी कर जाता है और उसकी सफलता उल्लसित। उसे जरा सा सहारा देता स्वयं असहाय, बड़े भाई के कोपभाजन से सहमा छोटा देवर और महरी हमें देवदूत प्रतीत होते हैं। हम उनके मानवीय व्यवहार से ही इतने द्रवित हो जाते हैं जैसे उन्होंने कोई असम्भव काम कर दिया हो क्योंकि कई घरों में यह तिनके का सहारा भी नहीं मिलता।
सच है कि जया जितना कष्ट भोगने का दुर्भाग्य सबके हिस्से नहीं आता। किन्तु हमारी पीढ़ी की और छोटे कस्बों और गाँवों की कम ही स्त्रियाँ ऐसी होंगी जिन्होंने मायके में यह ब्रह्म वाक्य न सुना हो कि 'यह या वह मायके में नहीं विवाह के बाद अपने घर में करना' और विवाह के बाद यही वाक्य बदल कर 'यह सब (जिसमें हँसना, उत्तर देना, अपने मन का खाना, पहनना कुछ भी शामिल हो सकता है) हमारे घर नहीं चलता, तुम्हारे मायके में चलता होगा।' 'यहाँ रहना है तो हमारे रीति रिवाज अनुसार चलो' कभी कहा जाता है कभी अनकहे ही समझा दिया जाता है।

देर सबेर हर स्त्री को बचपन और यौवन में यह आभास हो ही जाता है कि उसका कोई घर नहीं है, यदि है तो एक काँच का शामियाना जो कभी भी दरक कर उसे लहूलुहान ही नहीं बेघर कर सकता है।

रश्मि रविजा बधाई की पात्र हैं कि भावनाप्रधान होते हुए भी उनका यह उपन्यास बहुत कुछ सकरात्मक और ठोस बातें सिखा जाता है। यदि पाठक इससे कुछ भी सीख सकें तो बहुत सी बेटियों का जीवन नर्क होने से बच सकता है।
घुघूती बासूती

Wednesday, January 13, 2016

एकल जयपुर यात्रा -- 2

मेरे पास  जयपुर  घूमने के लिए दो दिन थे . पहले  तो जयपुर दर्शन यानि एक दिन का ट्रिप करने का प्लान किया . कई मिनी बसें  चलती हैं जो ग्रुप में कुछ लोगों को एक दिन में जयपुर के मुख्य दर्शनीय स्थलों की सैर  कराती  हैं . मैंने  भी एक ट्रेवल एजेंसी को फोन कर अपनी सीट बुक कर दी . जब लोकेशन  पूछा  कि आपका ऑफिस  कहाँ है और कैसे पहुंचा जा सकता है  तो एक बार फिर जयपुर के लोगों की सहज आत्मीयता का परिचय मिला .उन्होंने कहा, 'आपका होटल मेरे घर और ऑफिस के बीच में है, मैं आपको सुबह होटल से पिक कर लूंगा '

सुबह एक अजनबी के कार में बैठने पर संकोच तो हो रहा था पर जब सोलो ट्रिप करनी हो तो ये सब संकोच त्यागने पड़ते हैं . जल्द ही उनका ऑफिस  आ गया . .धीरे धीरे लोग इकट्ठे हो रहे थे और जब सब आ गए तो हमारी यात्रा शुरू हो गई . एक गाइड महाशय  भी साथ थे ,जिन्होंने  सबसे पहले उद्घोषणा की ,'आपकी बाईं तरफ 'राजमंदिर सिनेमा हॉल' है, उसकी तारीफ़ में कुछ कशीदे भी काढ़े .कुछ लोग उतर कर उस सिनेमा हॉल की भी फोटो लेने लगे. सुबह का वक्त था...गेट बंद था ,सूना सा हॉल था .मैं तो खैर नहीं गई, ना ही फोटो खींचे .
बिड़ला मंदिर 
अगला पड़ाव था ,'बिडला मंदिर ' .  मोती डोंगरी पहाड़ी के नीचे स्थित सफेद संगमरमर से बना ये विशाल मंदिर बहुत ही भव्य और खुबसूरत है .  इसे 1988 में बिड़ला ग्रुप ने बनवाया है .इसे लक्ष्मी नारायण मंदिर भी कहा जाता है. ग्रुप के ज्यादातर लोग ,फोटो खिंचवाने में व्यस्त हो गए थे .आजकल किसी भी दर्शनीय स्थल या किसी मनोहारी प्राकृतिक दृश्य को खुली आँखों से देख,उसकी खूबसूरती में डूब जाने का चलन कम ही देखा जाता है, ज्यादातर लोग उस दृश्य के साथ अपनी फोटो खिंचवाने में ही रूचि रखते हैं . अकेले घूमने का एक फायदा ये  भी है कि काफी गौर से सबकुछ देखने का मौक़ा मिल जाता है. मन्दिर से निकलते  वक्त काले लहंगे दुपट्टे में राजस्थानी महिलाओं का एक समूह आता दिखा. उनकी वेशभूषा मुझे बहुत रोचक लगी. मैंने फोटो खींचने की इच्छा जाहिर की तो वे ख़ुशी ख़ुशी तैयार हो गईं और आगे बढ़ गई महिलाओं को भी आवाज़ दे बुला लिया .पूछने परा बताया, 'हमारे देस में इसी रंग के कपड़े पहनते हैं ' मुझे उनकी फोटो लेते देख काफी लोग पास आकर उनसबकी  फोटो लेने लगे. वे सब भी  एकदम स्टार वाली फीलिंग के साथ पोज देने लगीं :) 
म्यूजियम 
इसके बाद हमारी बस म्यूजियम पहुंची . जयपुर का म्यूजियम 1887 में  ही जनता के लिए खोल दिया गया था  . इस विशाल संग्रहालय में करीब 19,000 ऐतिहासिक वस्तुएं हैं . राजा महाराजों के पुराने अस्त्र - शस्त्र , उनके परिधान , धातु, हाथी-दांत, मिटटी से बनी वस्तुएं ,आभूषण , कपडे, आदिवासी जनजाति के परिधान ,लम्बे सुराहीदार सिरेमिक पॉट , बहुत कुछ है देखने और गुनने लायक . दुनिया ने  कहाँ से शुरुआत की और कैसे कैसे प्रगति करती गई, अच्छी झलक मिली वहां . उस वक्त की कारीगरी भी देखती ही बनती है. म्यूज़ियम में जाने के टिकट लगते हैं. 

हमारी बस में एक छोटे बच्चे के साथ एक कपल ,तीन लड़के और एक दक्षिण भारतीय कपल थे,जिनसे कुछ बातें हुई थीं . उन तीन लड़कों में से एक टिकट लेने जा रहा था .उसने कहा, 'आपकी टिकट  भी ले आता हूँ ' टिकट का इंतज़ार करते बातें होने लगीं और पता चला, वे लड़के रांची से जयपुर, रेलवे की कोई परीक्षा देने आये हैं .मैंने बड़े होने का रौब जमा दिया , ' परीक्षा देने आये हो और घूम रहे हो..पढ़ना चाहिए न ' वे झेंपे से कहने लगे, 'कितना पढेंगे ...बहुत सी परीक्षाएं दे रहे हैं और दो साल से सिर्फ पढ़ ही रहे हैं . बिहार झारखंड में आज भी ज्यादा लड़के साल दर साल ,प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियां ही करते हैं .उनके पास नौकरी के दूसरे विकल्प हैं ही नहीं.
जंतर -मंतर 
म्यूजियम के बाद,हमारी बस ,जन्तर-मंतर और सिटी पैलेस पहुंची . जनत मंतर यानि वेधशाला .
जयपुर की वेधशाला सबसे विशाल एवं विश्व विख्यात हैं। . महाराजा सवाई जयसिंह ने सन 1718 में इस वैधशाला की आधार शिला रखी। .इस ज्‍योतिष यंत्रालय में समय की जानकारी, सूर्योदय, सूर्योस्‍त एवं नक्षत्रों की जानकारी प्राप्‍त करने के उपकरण हैं। .यहाँ स्थित सम्राट यंत्र विश्व की सबसे बडी सौर घड़ी  मानी जाती ह .2010 में यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज की  सूचि में शामिल किया है . .

सिटी पैलेस 

सिटी पैलेस ,जन्तर मंतर  के सामने ही है . सिटी पैलेस का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1729 से 1732 ई. के मध्य कराया था .कहा  जाता है  "शहर के बीच सिटी पैलेस नहीं, सिटी पैलेस के चारों ओर शहर है।"   शहर के बहुत बड़े हिस्से में स्थित सिटी पैलेस के दायरे में बहुत-सी इमारतें आती थीं। इनमें चंद्रमहल, सूरजमहल, तालकटोरा, हवामहल, चांदनी चौक, जंतरमंतर, जलेब चौक और चौगान स्टेडियम शामिल हैं। वर्तमान में चंद्रमहल में शाही परिवार के लोग  करते हैं। शेष हिस्से शहर में शुमार हो गए हैं और सिटी पैलेस के कुछ हिस्सों को संग्रहालय बना दिया गया है। संग्रहालय में जयपुर  के राजाओं, रानियों, राजकुमारों और राजकुमारियों के वस्त्र संग्रहित किए गए हैं। इसी चौक के उत्तरी-पश्चिमी कोने में एक बरामदे में जयपुर की प्रसिद्ध कलात्मक कठपुतलियों का खेल दिखाने वाले कलाकार गायन के साथ अपनी कला का प्रदर्शन कर पर्यटकों का मनोरंजन करते हैं। चौक के उत्तरी ऊपरी बरामदे में सिलहखाना है। ऐसा स्थान, जहां अस्त्र शस्त्र  रखे जाते हैं। यहां 15 वीं सदी के सैंकड़ों तरह के छोटे-बड़े, आधुनिक प्राचीन शस्त्रों को बहुत सलीके से संजोया गया है। सबसे आकर्षक है, इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया  द्वारा महाराजा रामसिंह को भेंट की गई तलवार, जिस पर रूबी और एमरल्ड का बहुत सुंदर  काम है .
इसके बाद आमेर किला जाना था , जहां थोड़ी  दूर तो बस  गई पर उस  से आगे जीप या  छोटी  गाड़ी में जाना था . बस में छोटे छोटे ग्रुप बन गए थे .हम अपने ग्रुप के साथ एक जीप में सवार हो गए.

आमेर किला 

आमेर किला पर्यटकों का ख़ास आकर्षण है .यह मुगलों और हिन्दुओं  के वास्तुशिल्प का अद्भुत   नमूना है। राजा मानसिंह जी ने 1592 में इसका निर्माण आरंभ किया था। महल को बनाने में लाल पत्थरों और सफ़ेद मार्बल का बहुत अच्छे से उपयोग किया गया है. इस किले में  दीवान-ए-आम' ,दीवान-ए-ख़ास ,, भव्य शीश महल  जय मंदिर तथा सुख निवास शामिल हैं,  महल के पीछे से जयगढ दिखाई देता है। किले के झरोखे से जहां कभी रानियाँ झांकती  होंगी . पर्यटक झाँक कर  अपनी तस्वीरें खिंचवा रहे थे .पल भर को शाही अहसास महसूस करने का हक तो सबको है ..

राजस्थान शिल्प 
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एक बड़े शो रूम के सामने  सब्जियों से निर्मित रंग और ब्लॉक प्रिंटिंग का भी प्रदर्शन दिखाया गया .उसी दूकान में जयपुरी रजाई, राजस्थानी पारम्परिक वस्त्र और साज सज्जा के सामान भी मिल रहे थे .काफी लोगों ने खरीदारी की .

जलमहल 

रास्ते में ही मानसागर झील में स्थित खूबसूरत 'जलमहल' है  . 1596 ई. में गंभीर अकाल पडने पर तत्कालीन अजमेर  के शासक ने पानी की कमी को दूर करने के लिए बांध का निर्माण करवाया था, ताकि पानी को जमा किया जा सके. बाँध को बाद में 17वीं सदी में एक पत्थर की चिनाई संरचना में परिवर्तित किया था.  यूं तो जल महल का निर्माण 1799 में हुआ था.  लेकिन इस महल का जीर्णोद्धार महाराजा जयसिंह  ने करवाया था. जलमहल मध्‍यकालीन महलों की तरह मेहराबों, बुर्जो, छतरियों एवं सीढीदार जीनों से युक्‍त दुमंजिला और वर्गाकार रूप में निर्मित भवन है. पर्यटक दूर से ही इस खुबसूरत महल का अवलोकन कर सकते हैं .

गैटोर

इस भ्रमण का अंतिम पडाव. गैटोर था . गैटोर  एक ऐतिहासिक स्थल  है. यहाँ नाहरगढ़़ क़िले की तलहटी में दिवंगत राजाओं की छतरियाँ निर्मित हैं। 'गैटोर' यानि 'गए का ठौर ' .पुरातत्व महत्त्व की अनेक वस्तुएँ यहाँ पाई गई हैं.  प्राचीन राजाओं की समाधि-छतरियाँ आदि यहाँ के उल्लेखनीय स्मारक हैं। ये राजस्थान की प्राचीन वास्तुकला  के सुन्दर उदाहरण हैं .इन छतरियों में सीढ़ीदार चबूतरे के चारों ओर का भाग पत्थर की जालियों से बना हुआ  है और केन्द्र में सुंदर खंभों पर छतरियों का निर्माण किया गया है। यहाँ एक अद्भुत शान्ति चारों तरफ फैली होती है .

अब तक शाम हो गई थी और मैं होटल वापस आ गई . होटल में रूफ टॉप रेस्टोरेंट था . और वहाँ शाम सात बजे से दस बजे तक  राजस्थानी लोकगीत और लोकनृत्य के कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते थे .अकेले घूमने पर एक सबसे बड़ी मुसीबत खाने पीने की होती है .स्त्रियों की डायट वैसे  ही थोड़ी कम होती है और कुछ भी ऑर्ड करने पर पूरा खत्म करना मुमकिन नहीं होता . मैंने सोचा सूप और सलाद ही मंगवाती हूँ . पर शायद स्वादिष्ट व्यंजनों के इस शहर में  कोई सलाद ऑर्डर नहीं करता होगा . क्यूंकि सलाद के नाम पर मिले मोटे मोटे कटे प्याज, खीरा और टमाटर के कुछ टुकड़े .पर लोकनृत्य का आनन्द लेते हुए उस खुले आसमान के नीचे बैठ कर प्याज कुतरना भी अच्छा ही लगा .दूसरी मेजों पर ज्यादातर विदेशी कपल  ही बैठे थे .और वे ग्लास  से कोई कड़वा द्रव्य सिप कर रहे थे .महिलायें , बीच
बीच में नर्तकी के साथ ठुमके लगा आतीं . 

जयपुर शहर में स्थित मुख्य दर्शनीय स्थल देख चुकी थी . जयगढ़ का किला और नाहरगढ़ का किला ,शहर से थोड़ी दूरी पर थे और वहाँ कोई कार हायर करके ही जाया जा सकता था .थोड़ी असमंजस की  स्थिति थी पर फिर मन को समझाया , ऐसे तो बहुत कुछ देखने से रह जाएगा . होटल में बात की तो उन्होंने कहा, उनके अपने कार और ड्राइवर हैं, और पूरी तरह सुरक्षित है. किसी डर की कोई बात नहीं .

दूसरे दिन सुबह सुबह किचन से कॉल आया कि कल आपने नाश्ता नहीं किया . भूल ही गई थी कि पैकेज में सुबह का नाश्ता भी शामिल था . बुफे था , नाश्ते में कॉर्न फ्लेक्स, ब्रेड बटर ,इडली डोसा, पूरी भाजी ,जूस, कॉफ़ी सब कुछ था .अभी लोग किसी स्त्री को अकेले रेस्टोरेंट में नाश्ता करते देखने के आदी नहीं हुए हैं .आस-पास के टेबल वाले स्त्री-पुरुष सब एक नजर जरूर डाल लेते थे ,हाँ घूरते नहीं थे. इतना इत्मीनान काफी था .

जयगढ़ दुर्ग 

नाश्ते के बाद मैं जयगढ़ दुर्ग के लिए निकल पड़ी . जयगढ़ दुर्ग अरावली पहाड़ियों में स्थित है . जंगल के बीच से जाती सर्पीली घुमावदार सडक बहुत ही खुबसूरत थी . हाल में ही कोई त्यौहार सम्पन्न हुआ था .क्यूंकि रास्ते भर रास्ते के किनारे पत्थरों के उपर छोटी छोटी मूर्तियाँ रखी दिखीं . मूर्तियों का विसर्जन ना करके उन्हें इस तरह जंगल में पत्थरों के ऊपर रख देना भी एक अच्छा प्रयास है . रास्ते की खूबसूरती और भी बढ़ जाती है. जगह जगह कई सुंदर पक्षी और मोर भी दिखे . जयगढ़ दुर्ग में अच्छी भीड़ थी. किसी स्कूल के बच्चे आये हुए थे और हर चीज को बड़े गौर  से देख रहे थे .उनमें फोटो खींचने की होड़ नहीं थी .
  
जयगढ़ किला, जयपुर का सबसे ऊंचा किला है.यह नाहरगढ की सबसे ऊंची पहाड़ी चीलटिब्बा पर स्थित है. इस किले से जयपुर के चारों ओर नजर रखी जा सकती थी.  यह किला आमेर शहर की  सुरक्षा को मजबूत करने के लिए 1726 में महाराजा जयसिंह द्वितीय ने बनवाया था . उन्हीं के नाम पर इस किले का नाम जयगढ़ पड़ा। मराठों पर विजय के कारण भी यह किला जय के प्रतीक के रूप में बनाया गया. यहां लक्ष्मीविलास, ललितमंदिर, विलास मंदिर और आराम मंदिर आदि सभी राजपरिवार के लोगों के लिए अवकाश का समय बिताने के बेहतरीन स्थल थे.यहां रखी दुनिया की सबसे विशाल तोप भी लगभग 50 किमी तक वार करने में सक्षम थी। जयगढ़ दुर्ग के उत्तर-पश्चिम में सागर झील व उत्तर पूर्व में आमेर महल और मावठा है। यह भी कहा आजाता है कि महाराजा सवाई जयसिंह जब मुगल सेना के सेनापति थे तब उन्हें लूट का बड़ा हिस्सा मिलता था .उस धन को वे जयगढ़ में छुपाया करते थे . इस दुर्ग में धन गड़ा होने की संभावना के चलते कई बार इसे खोदा भी गया .

जयगढ़ और आमेर महल के बीच एक लम्बी सुरंग है इस सुरंग का भी ऐतिहासिक महत्व है। यह सुरंग एक गोपनीय रास्ता था  जिसका इस्तेमाल राजपरिवार के लोग एवं विश्वस्त कर्मचारी जयगढ़ तक पहुंचने में किया करते थे . जयगढ़ किले तक इस सुरंग की  लम्बाई 600 मीटर है .जबकि बाहर से जाने पर यह दूरी 11 किलोमीटर है. विश्व की खूबसूरत इमारतों में जयगढ़ किले का नाम भी है.

नाहरगढ़ दुर्ग 

जयगढ़ दुर्ग से नाहरगढ़ दुर्ग का रास्ता भी बहुत खू बसूरत है. नाहरगढ़ का किला, जयपुर  को घेरे हुए अरावली पर्वतमाला के ऊपर बना हुआ है। नाहरगढ़ का निर्माण एक साथ न होकर कई चरणों में हुआ। महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने इसकी नींव रखी, प्राचीर व रास्ता बनवाया, इसके बाद सवाई रामसिंह ने यहां 1868 में कई निर्माण कार्य  कराए। बाद में सवाई माधोसिंह ने 1883 से 1892 के बीच यहां लगभग साढ़े तीन लाख रूपय खर्च कर महत्वपूर्ण निर्माण कराए और नाहरगढ़ को वर्तमान रूप दिया. महाराजा माधोसिंह द्वारा कराए गए निर्माण में सबसे आलीशान इमारत है-माधवेन्द्र महल.  वर्तमान में जो दो मंजिला इमारत जयपुर शहर के हर कोने से दिखाई देती है वह माधवेन्द्र महल ही है।  यह महल महाराजा माधोसिंह ने अपनी नौ रानियों के लिए बनवाया था।  इनमें दो महलों के सेट बिलकुल एक जैसे हैं . जो राजा की पटरानियों के थे .वे दोनों पटरानियाँ बहनें थीं . बाकी के सात महल (आधुनिक अपार्टमेन्ट जैसे ) बिलकुल एक जैसे हैं . इनमें राजा द्वारा जीत कर लाई गईं रानियाँ रहती थीं . हर महल की  रसोई, दासी के रहने की व्यवस्था अलग थी .  महल में एक मुख्य राजकक्ष है जो सभी नौ महलों से एक गलियारे के साथ जुड़ा है. नाहरगढ़ का दुर्ग लम्बे समय तक जयपुर के राजा-महाराजाओं की आरामगाह और शिकारगाह भी रही. यहाँ एक किंवदंती है कि कोई एक नाहर सिंह नामके राजपूत की प्रेतात्मा वहां भटका करती थी। किले के निर्माण में व्यावधान भी उपस्थित किया करती थी। अतः तांत्रिकों से सलाह ली गयी और उस किले को उस प्रेतात्मा के नाम पर नाहरगढ़ रखने से प्रेतबाधा दूर हो गयी थी. किले के पश्चिम भाग में “पड़ाव” नामका एक रेस्तरां भी है जहाँ खान पान की पूरी व्यवस्र्था है। यहाँ से सूर्यास्त बहुत ही सुन्दर दिखता है .

अब अकेले घूमते हुए मुझे थोड़ी हिम्मत आ गई थी . मैंने अब तक कुछ शॉपिंग  नहीं की थी .अगले दिन तो शादी में शामिल होने रिसॉर्ट जाना था .फिर तो मौक़ा मिलता नहीं और मैंने ड्राइवर से कहा, हवामहल के नीचे जो दुकानों की कतार है, वहीँ मुझे छोड़ दे .मैं बाद में खुद ऑटो लेकर आ जाउंगी .फिर तो इत्मीनान से एक सिरे से दूसरे सिरे तक घूमते हुए ढेर सारी छोटी मोटी  चीज़ें खरीदीं , शीशे  जड़ा झोला,, बांधनी के दुपट्टे , चादरें ,वॉल पीस, लाख की चूड़ियां . सेल्समैन की वाक्पटुता भी देखते बन रही थी . विदेशी पर्यटकों से स्पेनिश, इटैलियन ,फ्रेंच में भी बातें कर रहे थे . एक 3XL साइज़ वाले सज्जन ने फरमाईश की ,उन्हें टी शर्ट पर 'गांडी ' की फोटो चाहिए थी .सेल्समैन ने कई टीशर्ट दिखाए पर उन्हें गांधी ही चाहिए थे . 
वहाँ एक चीज़ अखर गई, कोई ऐसी जगह नहीं थी, जहां बैठकर एक कप चाय पी जा सके . लौटते समय ,मुझे  साइकिल रिक्शा मिला . जयपुर की  सडकों पर आहिस्ता आहिस्ता घूमते हुए  जयपुर भ्रमण का समापन  हुआ.   . 

Wednesday, December 23, 2015

पहली एकल जयपुर यात्रा --1

पिछले वर्ष  इन्हीं दिनों जयपुर यात्रा पर  गई थी ,उन दिनों उपन्यास  पूरा करने के लिए फेसबुक ब्रेक पर थी और फिर इस वर्ष लाहुल स्पीती ट्रिप से लौटी तो उस उपन्यास के प्रकाशन की तैयारियों में व्यस्त रही .दोनों यात्राओं के संस्मरण लिखना रह ही गया जबकि मैं तो एक बार लोकल से यात्रा कर आती हूँ ,वो भी लिख डालती हूँ :).
पहले जयपुर यात्रा संस्मरण जो मेरे जीवन की पहली सोलो ट्रिप थी 
मेरे कॉलेज की  फ्रेंड सीमा की बेटी  की शादी जयपुर में थी . उसने तुरंत ही मुझे फोन कर आमंत्रित किया. आजकल शादी कि डेट तय होते ही लोग बता देते हैं क्यूंकि काफी पहले बता देने पर प्लेन के टिकट बहुत कम कीमत में मिल जाते हैं .सीमा ने मेरे पतिदेव से भी आने का आग्रह किया  और आशा के विपरीत ह्मेशा व्यस्त रहने वाले पतिदेव ने आने के लिए हामी भर  दी . सीमा कटिहार में केन्द्रीय विद्यालय में प्रिंसिपल है. बेटी बैंगलोर में जॉब करती है .लडका भी बैंगलोर में है ,पर उसके सभी रिश्तेदार जयपुर के आस -पास हैं.. इसलिए उनकी इच्छा थी कि जयपुर से ही शादी हो . सीमा ने जयपुर में ही एक रिजॉर्ट बुक किया था और हमें वहीँ शादी अटेंड करनी थी. मेरे पतिदेव ने प्लान बनाय कि हमलोग दो दिन पहले ही जयपुर चलते हैं, जयपुर घूम लेंगे और फिर रिसॉर्ट में शिफ्ट होकर शादी में शामिल  हो जायेंगे . उन्होंने नेट पर ढूंढकर  पूरी  तरह राजस्थान के पारम्परिक साज सज्जा से सुसज्जित  होटल उम्मेद पैलेस बुक कर दिया . दो महीने पहले ही सारी बुकिंग हो गयी .और फिर हम अपने रोजमर्रा के कार्यों में व्यस्त हो गए .

जाने से ठीक एक हफ्ते पहले पता चला, पतिदेव को उन्हीं दिनों कुछ बहुत जरूरी काम है ,जिन्हें टाला नहीं जा सकता .इसलिए वे नहीं जा पायेंगे . टिकट  कैंसल करनी पड़ेगी.पहले तो मैंने सोचा...अपनी टिकट  भी कैंसल करवा देती हूँ .दो दिन बाद जाकर सीधा शादी में ही  सम्मिलित हो जाउंगी .अकेले जाने में कोई समस्या नहीं थी .ज्यादातर अकेले ही ट्रेवल करती हूँ . पर बच्चे पीछे पड़ गए , आजकल छोटी  छोटी  लडकियां यूरोप तक अकेले घूम कर आ रही हैं और तुम दो दिन जयपुर घूमने  से डर रही हो. अपना देश, अपनी भाषा...वे लोग तो अनजान देश में अनजान भाषा के बीच घूम आती हैं और तुमसे उम्र में आधी है .कुछ सोच विचार कर मैंने भी सोचा ,'ये अनुभव भी ले ही लेती हूँ...उम्र जल्द ही दस्तक देने लगेगी और इस तरह के अनुभव से महरूम रह जाउंगी और मैंने टिकट कैंसल नहीं किया .

उसके बाद के दिन तो रोमांच में ही बीते .नया शहर ,बिलकुल अकेले घूमना...सारे अनजान चेहरों के बीच, यह सब सोच थोडा मन सशंकित भी होता पर कुछ बोल नहीं सकती थी . घर में तो सब हंसी उड़ाते कि कौन सी बड़ी बात है., दुनिया भर में लडकियां अकेली घूम रही हैं . राम राम करके वो दिन भी आ पहुंचा , दस बजे की फ्लाइट बदलकर दो बजे की हो गई यानि जयपुर पहुँचते शाम हो जानी  थी और फिर उस दिन कहीं भी घूमना सम्भव नहीं था .थोड़ी निराशा भी हुई  कुछ और समय मिल गया .एयरपोर्ट पर अपनी फ्लाईट का इंतजार करते उत्तर के शहरों से आते लोगों को देख रही थी. सब कोट मफलर, स्वेटर में सजे हुए थे .जिसे  जाते ही उतार देने  वाले थे,मुंबई में तो पंखा चल रहा था . आजकल तो ट्रेन में भी लोग बातें नहीं करते ,प्लेन में तो यूँ भी गर्दन टेढ़ी किये बैठे रहते हैं .मैंने भी एक किताब खोल ली थी .जब स्नैक्स आया तो पाया विंडो सीट पर बैठा लड़का सो रहा था . बीच में एक बड़ा सोफिस्टीकेटेड सा  लड़का बैठा था ,जिसे उसे जगाने में कोई रूचि नहीं दिखी .पर मुझे लग रहा था, बिचारे को अफ़सोस ना हो, उसका नाश्ता छूट गया .मैंने बीचवाले लड़के से आग्रह किया कि उसे जगा दे .बड़ी अनिच्छा से उसने दो बार ऊँगली से ठक ठक कर उसे जगाया . फिर थोड़ी देर बाद मेरी किताब पर कहा कि उसकी पढी हुई है, बड़ी अच्छी किताब है ' .फिर तो बातें होने लगीं और पता चला...मेरा बेटा जिस कम्पनी में काम करता है वो भी उसी में है, पर उस से काफी सीनियर है .बैंगलोर में पोस्टेड है और अब जयपुर में कैम्पस इंटरव्यू लेने जा रहा है . शादी शुदा है और उसका एक बेटा भी है. आजकल सब अपनी उम्र से कम ही दिखते हैं .


जयपुर एयरपोर्ट से बाहर निकल अपने नाम की तखती ढूँढने लगी क्यूंकि होटल से पिक अप बुक किया हुआ था .पर वहां दो तख्ती देख  चौंक गई. एक मेरे नाम की और  एक मेरे पतिदेव  के नाम की .एक बार तो चौंक ही गई ...मुझसे झूठ बोला क्या उन्होंने और किसी दूसरी फ्लाईट से आ रहे हैं  .पर तुरंत ही ये सोच उलटे पैर लौट गया ,ऐसा कुछ करना  उनके वश की बात नहीं .मैं अपने नाम की तख्ती वाले  ड्राइवर की तरफ बढ़ गई और उसके पास खड़े दुसरे ड्राइवर से कहा कि वे नहीं आ रहे . अब वो पूछने लगा...'आप उन्हें जानती हैं ?' इसका क्या उत्तर हो ,जब उसे बताया कि मेरे पतिदेव का नाम है...पर वे नहीं आ रहे तो दोनों ड्राइवर मुस्करा कर कहने लगे , हमलोग बात कर ही रहे थे कि ये दोनों लोग जरूर एक दुसरे को जानते होंगे ,एक ही सरनेम है . मुम्बई से बाहर आते ही सबसे पहले यही बात ध्यान में आती है ,अपरिचित भी बड़े आराम से बातें करते हैं .वरना वहां बिना किसी काम के या काम से अलग अनजान  लोग शायद ही दो बातें करें . अब वे पूछ रहे थे ,"पर  दो गाड़ी क्यूँ बुक की ?"
मैं समझ गई  कि दो महीने पहले होटल की बुकिंग करते हुए भी अपने नाम से पिक अप करने के लिए गाड़ी बुक कर दी होगी और भूल गए .जब मैं अकेले जाने लगी तो फिर से मेरे नाम से गाड़ी बुक कर दी . पर मुझे इस लापरवाही पर इतनी खीझ हो रही थी कि मैंने फोन करके पूछा भी नहीं ,अपने नाम की तख्ती वाले ड्राइवर से कहा, गाड़ी लेकर आइये .वो तो चला गया ...दूसरा ड्राइवर घबराया हुआ था कि अब पैसे कौन देगा .उसने होटल फोन किया .होटल से पतिदेव को फोन गया और फिर उनका फोन मेरे पास आया कि दुसरे ड्राइवर को भी पैसे दे देना . यानि अब एक अकेले मेरे लिए दो दो इनोवा खड़ी  थी :)

इंटरनेट से होटल तो बुक कर लेते हैं .पर दूरी का अंदाजा नहीं होता . ये उम्मेद पैलेस ,शहर के बिलकुल दूसरे छोर पर है. यानि पहले ही दिन मैंने एक छोर से दूसरे छोर तक शहर को नाप लिया. मुंबई की  बेहिसाब ट्रैफिक और जनसमुद्र के सामने तो कोई भी शहर शांत ही प्रतीत होता है.  खूब चटख रंग की साड़ियाँ,सलवार कुरते में सजी महिलायें अच्छी लग रही थीं . होटल पहुँचते शाम हो गई थी .
होटल बहुत खुबसूरत था . पीतल जड़े किले के दरवाजे सा गेट .अंदर की साज सज्जा भी कुछ रजवाड़े सी  . बड़े बड़े शीशे, पीतल के गागर , दीवारों पर उकेरे भित्तिचित्र , जालीदार झरोखे .कमरे में एंटीक फर्नीचर . सोफे टी वी के साथ एक कोने में नक्काशीदार कुर्सी के साथ एक राइटिंग टेबल भी और टेबल पर पुराने चलन  का एक लैम्प. अब तो हाथ से लिखना छूट  ही गया है, वरना वहाँ लेखन का पूरा माहौल  था .
शाम हो चुकी थी ,होटल एक रिहाईशी  इलाके में था ,बाज़ार के बीच में नहीं कि निकल कर एक चक्कर लगा लिया जाए .घर से फोन पर सबने कहा ,'क्या होटल में रहने के लिए गई हो...बाहर निकल कर थोडा घूम आओ कहीं. पर मैंने सोच लिया था , कल सुबह ही जाउंगी .ऊपर रूफ टॉप रेस्टोरेंट था ,बस सोचा खुली छत पर डिनर का आनन्द लिया जाएगा . एक चाय और एक प्लेट भजिया ऑर्डर किया और अकेले घूमने में सबसे बड़ी मुसीबत  खाने  पीने  की ही  होती  है.  .इतना सारा भजिया था कि मेरा तो डिनर ही हो जाता .अब मैंने सोचा ,सफर में बाल बिलकुल बिखर गए थे ,जरा कंघी कर लूँ .और बस हो गई मुसीबत . सामान में कंघी मिले ही ना .अब तो मैं बुरी तरह घबरा गई .कल सुबह घूमने जाना है और बिना कंघी किये कैसे जाउंगी . सारा बैग उलट  पुलट कर देख लिया पर कंघी नहीं मिली .

अब मुझे बाहर जाना ही पड़ा . रिसेप्शन पर पूछा तो  बताया गया ,बस पास में ही एक जनरल स्टोर है,वहां सब कुछ मिल जाएगा .उस अनजान  शहर में हलके ह्ल्के घिरते अंधियारे में घूमना एक अलग ही अनुभव था . उंघती हुई सी कॉलोनी थी . सुंदर लॉन वाले बड़े  खुले खुले प्राइवेट मकान और उनके बंद गेट . कॉलोनी की  सडक पर इक्का दुक्का कोई आता -जाता दिख जाता . कभी कोई गाड़ी आती दिखती , बड़ा सा गेट मुंह खोल गाड़ी को लील जाता और फिर गेट का मुंह बंद .थोडा रोमांच और हलकी सी सिहरन भी हो रही थी पर खुद को अजनबी भी नहीं दिखाना था ,इसलिए थोड़ी लापरवाही ओढ़े  चारों तरफ देखते चलती जा रही थी. किसी दूकान के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे . काफी दूर जाने पर बाईं  तरफ एक बैनर दिखा, "यहाँ फ्रेश ड्राई फ्रूट्स मिलता है" .ऐसा लग रहा था किसी गैराज में कोई दूकान है. मैंने सोचा वहां पूछने पर पता चल जाएगा .जब जाकर देखा तो वो एक छोटा मोटा सुपर स्टोर सा ही था .जरूरत का हर समान मौजूद था .चाहे कितनी भी आभिजात्य कॉलोनी हो पर सामान्य चीज़ों की  दरकार तो सभी को होती है. मैंने उसे बोल भी दिया , ये दूकान के बाहर 'यहाँ ड्राई  फ्रूट्स मिलता है', ऐसा बैनर क्यूँ लगाया हुआ है? ,लोगों को धोखा  हो सकता है . बोला, 'नहीं जी यहाँ सबको पता है ' .हाँ उसे कहाँ अंदाजा होगा कि मुम्बई से कोई उसके यहाँ कंघी खरीदने आ जाएगा :) ( दूसरे दिन पता नहीं कहाँ से कूद कर  कंघी बिलकुल सामने आ  गई ,मानो घर वालों के संग मुझे बाहर भेजने की साजिश में शामिल थी )

जाते  वक्त  जो  बेचैनी और हल्का सा डर था वो गायब हो  चुका था और अब मैं वो शांत ,धूसर अँधेरा  एन्जॉय  कर रही थी .पर होटल कुछ जल्दी ही  आ गया . 

Tuesday, December 22, 2015

'कांच के शामियाने ' पर गीताश्री जी की टिप्पणी

गीताश्री जी , साहित्य  जगत में एक जाना माना नाम हैं . उनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं . साहित्यिक पत्रिकाओं में उनकी कहानियां नियमित प्रकाशित होती हैं. 'बिंदिया' पत्रिका की  सम्पादक रह चुकी हैं. साहित्यिक आयोजनों में उनकी नियमित भागेदारी रहती है, आजकल 'प्रसिद्ध लेखकों से मंच पर संवाद' कार्यक्र्म होस्ट करती हैं .
 'कांच के शामियाने' पर उनकी प्रतिक्रिया अपने ही लेखन में विश्वास बनाए रखने को प्रेरित करती  है.
गीताश्री  का बहुत आभार :)

                                                             कांच के शामियाने 

रश्मि रविजा के इस उपन्यास को पढ़ना जैसे एक लड़की के स्वप्न, संघर्ष और यातना का पीछा करने जैसा...
अपनी तस्वीर देखना और डूब डूब जाना उन दिनों में जहां से शुरु होता है एक लड़की का इस बीहड़ वन में दुरुह सफर...

"कांच के शामियाने" में एक लड़की रहा करती है. कभी झील में बदलती है तो कभी पहाड़ी नदी बन जाती है. चंबा की चिड़ियां अक्सर कांच में चोंच मारा करती है. उसकी कोशिशों का दौर थमता नहीं. खुरदुरे यथार्थ का कड़वा स्वाद लेती हुई वह लड़की अक्सर उम्मीद की तरह झांकती है शामियाने से बाहर. जहां कैद है वहां सहरा से दिन और अंधें कूंए सी रातें ही होंगी न ! वह कहीं भी महफूज नहीं कि जीवन की ये तल्खियां और दुश्वारियां उसे धीरज नहीं धरने देते. दुख से दोस्ती करने वाली वह लड़की देखती है बार बार सपने .

रश्मि रवीजा के उपन्यास की वह लड़की अब तक मेरी चेतना में रहती आई है. पहली बार उसे दर्ज होते देखा. कांच के भीतर की छटपटाहट उस लड़की से कितनी मिलती है...जिसे मैं बचपन से अब तक साथ लिए घूम रही हूं...!
यह वही लड़की है जो मेरे मोहल्ले में रहा करती थी बिना पिता के घर में. दुनियाभर के वहशत उसका पीछा करते थे और वह अपने आप में सिमटती चली जाती थी. उसे हर कोई अपने शीशे में उतार लेना चाहता है. घरवाले बोझ समझ कर उसे जल्दी निपटा देना चाहते हैं.

वह सिर झुका कर निपटने देती है खुद को. शायद बेहतर की उम्मीद में कि बंजर में फूल खिला सके. उपन्यास की मुख्य पात्र जया पर गुस्सा भी आया.थोडा संघर्ष तो करती. इतनी आसानी से अपने जीवन का समर्पण कैसे कर दिया? दुख कहां खत्म होते हैं जल्दी. वे पसरते चले जाते हैं थिर पानी पर शैवाल की तरह. जया का दुख विस्तार लेता चला जाता है. एक निरीह लड़की के ऊपर एक मर्द के अहंकार की विजयगाथा चलती रहती है. लड़की की आंखें गरीब के झोपड़े में बरसात की तरह टपकती रहती हैं.

फिर गुस्सा आता है मुझ जैसे पाठक को. मैरिटल रेप और डोमेस्टिक वायलेंस झेलते हुए वह मुझसे दूर होती जा रही है. वह लड़की से औरत में बदल रही है और दो बच्चों की मां भी बन गई.

और सहते सहते एक दिन उसकी सहनशक्ति खत्म ! उसे अपने अस्तित्व का बोध हुआ और वह उस विवाह रुपी कैद को छोड़ कर बाहर निकल आई. आर्थिक निर्भरता ने उसमें आत्मविश्वास भर दिया और वह लड़ सकी ! खुद को कविता में अभिव्यक्त कर सकी. सारे पहरे यकायक हट गए और उसके अरमानों को आकाश मिल गया. अब वह सुकून से है.

रश्मि रविजा के इस उपन्यास में एक लड़की की जीवन यात्रा है. बिहार के परिवेश की जीवंत और सच्ची कथा है. सुधा अरोड़ा ने सटीक लिखा है कि "इसमें एक स्त्री के बहाने से उन बेशुमार स्त्रियों के संघर्ष को बयान किया गया है जिन्हें उनका सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक हक ताउम्र नहीं मिलता. एक पढ़ा लिखा पति भी पितृसत्तात्मक समाज के लूप-होल का फायदा उठाते हुए उस पर साधिकार कहर ढ़ाता चला जाता है और स्थितियों को प्रतिकूल पाकर गिरगिट की तरह रंग बदलता है. जाहिर है स्त्री के लिए विवाह संस्था एक शोषण संस्था बन चुकी है. "

सुधा जी से सहमत होते हुए कुछ और जोड़ना चाहती हूं कि कई बार कस्बे की लड़कियों के लिए विवाह भी मुक्त करता है. ऐसे समाज में आजीवन अविवाहित रहने का फैसला बहुत आसान नहीं. आर्थिक निर्भरता आते आते कई लड़कियां निपटा दी जाती हैं. जया के सामने कोई विकल्प नहीं. विवाह से उसकी मुक्ति जल्दी नहीं, देर से हुई. तब तक उसके अरमां निकल गए.

रश्मि...बहसतलब कथानक है! नायिका के साथ सहज संबंध बनने के वाबजूद मैं उद्वेलित रही.  एक अच्छा उपन्यास ! बधाई !