Wednesday, July 22, 2015

गुरुदत्त एवं गीतादत्त के रिश्तों पर आधारित नाटक : 'गर्दिश में तारे'

कला सिनेमा प्रेमी में शायद ही कोई ऐसा होगा ,जिसकी दस मनपसन्द फिल्मों में गुरुदत्त की किसी फ़िल्म का नाम न हो।उनकी फ़िल्में मील का पत्थर समझी जाती है ।एक बेहद संवेदनशील निर्देशक ,कलाकार के रूप में उनके लाखों प्रशन्सक हैं।और जब कोई व्यक्ति मशहूर होता है तो उसके प्रोफेशनल ज़िन्दगी से पर्दे हटाकर ,उसके व्यक्तिगत जीवन में झाँकने की भी लगातार कोशिश चलती रहती है ।
और जब परदा हटता है, तो अपने प्रिय कलाकार को अति साधारण कमजोरियों से युक्त जान , प्रशंसक निराश ही होते हैं ।कुछ ऐसा ही सच दिखाने की कोशिश की है ,"गर्दिश में तारे " नाटक के निर्देशक 'सैफ हैदर हसन' और प्रोड्यूसर 'मनहर गांधी' ने ।साहिर और अमृता की प्रेमकहानी पर उन्होंने एक नाटक पेश किया था ,'एक मुलाक़ात '। तीन मशहूर असफल प्रेम कहानियों पर आधारित नाटकों की trilogy बना रहे हैं ।उसमें दूसरी कड़ी ,गुरुदत्त और गीत दत्त की प्रेमकहानी पर आधारित है। हालांकि इस नाटक में पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं पर घटनायें सारी सच्ची हैं ।

अब तक वहीदा रहमान और गुरुदत्त के अफेयर के विषय में पढ़ा था ।गीता दत्त से मुलाक़ात,प्यार ,शादी का किस्सा अनजाना ही था और नाटक देखने के बाद भी अनजाना ही रहा ।क्यूंकि नाटक शादी के बाद की उनकी ज़िन्दगी पर केंद्रित है ।

गीता दत्त की आवाज़ के जादू में बंधकर गुरुदत्त ने उनसे प्यार किया था ।बहुत मुश्किल से गीता दत्त की माँ ने शादी की इज़ाज़त दी ।पर शादी के बाद वे एक टिपिकल पति की तरह चाहते थे कि अब गीता दत्त गाना छोड़कर सिर्फ घर और बच्चे सम्भालें ।गीता दत्त को सिर्फ गुरुदत्त की फ़िल्म में ही गाने की इज़ाज़त थी ।गीता दत्त का कलाकार मन घुटने लगा ।गुरुदत्त नई नई फ़िल्में बनाकर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते रहे और गीतादत्त गाना छोड़कर शराब में डूबती गईं ।उनका मन कभी गृहस्थी और बच्चों की देखभाल में नहीं लगा ।और इस बात से चिढ़कर गुरुदत्त उन्हें काले नीले निशान की सौगात देते रहे ।

गुरुदत्त नई अभिनेत्री की तरफ आकृष्ट हुए तो गीत दत्त,उनके ही लेखक मित्र के प्यार में पड़ गईं । 'कागज़ के फूल ' फ़िल्म की असफलता , घर का तनाव, नई अभिनेत्री की बेरुखी ने मिलकर गुरुदत्त को आत्महत्या की तरफ धकेला तो कुछ वर्ष बाद शराब ने गीता दत्त की जान ले ली ।शराब ने उनकी आवाज़ तो पहले ही खराब कर दी थी ।

नाटक में गुरुदत्त का यह निगेटिव पक्ष रखते हुए ,निर्देशक की कोशिश रही कि गीता दत्त को और भी नकारात्मक दिखाए ।हमारे देश में कोई स्त्री अगर अपने बच्चों और गृहस्थी की परम्परागत तरीके से देखभाल नहीं करती तो बुरी औरत यूँ ही बन जाती है ।गुरुदत्त की आत्महत्या की जांच करने आये पुलिस इंस्पेक्टर के साथ फ्लर्ट करती गीता दत्त को दिखाना बिलकुल गले नहीं उतरा ।

नाटक के शुरू में ही पुलिस इंस्पेक्टर को अपना परिचय देते हुए गीता दत्त कहती हैं ," मैं अपने माँ बाप के कई सपने साकार करने का ख्बाब देखने वाली बेटी ।
एक लूज़र माँ
एक फ्लॉप बीवी
एक एवरेज ऐक्ट्रेस
एक बेमिसाल गायिका हूँ "

यूँ तो पात्रों के नाम काल्पनिक थे पर घटनाओं में लोगों के असली नाम लिए जाते हैं ।जब राजकपूर के साथ गुरुदत्त ने सत्यजीत रे की 'पाथेर पांचाली' देखी और दोनों ने अफ़सोस किया कि उनका फ़िल्म निर्माण बेकार है अगर ऐसी कोई फ़िल्म नहीं बनाई ।दिलीप कुमार का भी जिक्र है कि कैसे ज्यादा पैसे की मांग को लेकर वादे के बाद भी वे शूटिंग के लिए नहीँ आए और फ़िल्म छोड़ दी ।

छत से लटकता बड़ा सा झूमर ,ग्रामोफोन पर गूंजती गीत दत्त की आवाज़ ,शराब की बोतलें और पास पड़ा रॉकिंग चेयर उस वक्त का माहौल रचने में कामयाब हुए हैं ।आरिफ ज़कारिया और सोनाली कुलकर्णी ने अच्छा अभिनय किया है ।पर फिल्मों में हमेशा संजीदा से धीमे बोलते गुरुदत्त की छवि कुछ और ही बनी हुई थी जो निजी ज़िन्दगी में जोर जोर से बोलते और थोड़े हाइपर गुरुदत्त से मेल नहीं खाती थी ।
स्क्रिप्ट इतनी ढीली ढाली थी कि अच्छा निर्देशन भी नाटक में कोई जान नहीं ला सका ।

पुलिस के सद्कार्य

पुलिस के कार्यों की यूँ तो काफी आलोचना की जाती है ,उसके भी अपने कारण होंगे पर धूप-बारिश-सर्दी में दिन रात ड्यूटी निभाते ट्रैफिक पुलिस, कॉन्स्टेबल के लिए सबके मन में सम्मान ही जागता है . हाल में ही मेरे दोनों बेटे मुहम्मद अली रोड गए थे ,जहाँ रमजान के दिनों में बाज़ार और खाने-पीने के स्टाल पूरी रात खुले होते हैं.. दोनों की जुबां पर एक ही बात थी, 'सैल्यूट टू मुंबई पुलिस. पूरी रात , पुलिस मैन, महिला कॉन्स्टेबल ,इतनी सारी भीड़ मैनेज कर रहे थे, लोगों की सहायता कर रहे थे, उन्हें रास्ता बता रहे थे. '

जब झमाझम बारिश में कार के शीशे चढ़ाए महफूज़ होकर गाने सुनते हुए ड्राइविंग का आनंद उठाया जाता है ,उस वक्त ये पुलिसमैन रेनकोट पहने बीच रास्ते में खड़े बैरियर लगाए ,गाड़ियों की जांच कर रहे होते हैं .(और मुम्बई की बारिश में कोई रेनकोट,छतरी काम नहीं आती..पूरी तरह भीगना ही होता है )
मुझे भी एक सुखद अनुभव रहा ,इनके कार्य का .

जिस रास्ते पर मैं मॉर्निंग वॉक के लिए जाती हूँ . कुछ कुछ दूरी पर चार परिवार को सडक पर रहते हुए देखती हूँ. एक बिल्डिंग के पीछे दीवार से लग कर एक लंबा सोफा रखा है ,और आस-पास कुछ बोरियाँ और सामान बिखरे रहते हैं .सुबह ईंट के चूल्हे पर एक महिला खाना बनाती रहती है और बहुत ही स्नेहिल पिता अपने बच्चों के साथ खेलते रहते हैं. कभी भागते पिता के पीछे बच्चे दौड़ते रहते हैं..पिता भाग कर सोफे पर लेट जाते हैं और फिर बच्चे उन्हें गुदगुदी करने लगते हैं. फिर पिता एक एक बच्चे को हवा में उछाल उछाल कर खेलाते हैं . दुसरे राउंड में देखती हूँ , पिता और तीनों बच्चे एक थाली घेर कर बैठे होते हैं और कुछ खाते रहते हैं. लगभग रोज ही ऐसे दृश्य होते हैं.

थोड़ी दूर पर एक बहुत ही साफ़ सुथरी झोपडी है, जिसके अंदर और बाहर लाल दरी बिछी होती है, वहाँ भी एक महिला खाना बनाती रहती है और कुछ पुरुष आस-पास बैठे होते हैं. एक बुजुर्ग अखबार पढ़ते रहते हैं...कुछ बच्चे पास खेलते रहते हैं.

कुछ दूरी पर एक पेड़ के नीचे एक दक्षिण भारतीय अम्मा बड़ी सी बिंदी लगाए अपने दो युवा बेटे और पति के साथ रहती हैं . सुबह, सारे पुरुष खुले आकाश के नीचे अक्सर सोये रहते हैं..अम्मा कुछ उठा रख रही होती हैं. उस से आगे बढ़ने पर फुटपाथ पर एक बूढी अम्मा..एक मध्य आयु की महिला, दो किशोर लड़के और एक पुरुष रहते हैं. बूढी अम्मा को मॉर्निंग वॉक वाले, नियमित पैसे, नाश्ता, कपड़े देते हैं .बाकी सब कचरा बीनते हैं . उन्हीं के पास एक दिन एक बिलकुल साफ़ कपड़े पहने ,बढ़िया से बाल बनाए ,एक महिला को अख़बार पढ़ते देखा . फिर उन्हें अक्सर वहीँ बैठे देखने लगी . कई बार कुछ पूछने की इच्छा हुई .पर संकोच हो गया कि जब कोई मदद नहीं कर पाउंगी तो फिर सिर्फ कहानी सुनने के लिए क्या जाऊं .

बारिश का मौसम सडक पर रहने वालों के लिए कहर बन कर आता है. मौसम की पहली बारिश हुई थी, तभी ये सारे जगह वीरान हो गए, उनलोगों ने दूसरे ठिकाने ढूंढ लिए होंगे. कुछ मौसम खुला और मैं वॉक के लिए गई तो उन महिला को अकेले बैठे, अखबार पढ़ते देखा . 'अपूर्व' जिस आश्रम में बच्चों को पढ़ाने जाता है ,वहाँ बेघर लोगों के लिए रहने की व्यवस्था भी है. मैंने सोचा, उन्हें बारिश में कोई जगह नहीं मिल पाई होगी तो शायद कुछ मदद कर पाऊं .

पूछने पर बताया ,' "वे बारहवीं पास हैं . तीस वर्ष की हैं. माता-पिता और एक भाई के साथ रहती थीं .कुछ प्रॉपर्टी विवाद में पडोसी रिश्तेदारों ने पिता को शराब में जहर मिला कर पिला दिया . जब इन लोगों ने पड़ोसियों को भला-बुरा कहा तो रिश्तेदारों ने तीनों को बहुत मारा . माँ और भाई की तो अस्पताल में मृत्यु हो गयी . इन्हें भी दो महीने अस्पताल में रहना पडा .जब ठीक होकर वापस गईं तो पाया ,रिश्तेदारों ने इनके घर पर कब्जा कर लिया था. इन्हें फिर से बहुत मारा. ये वापस हॉस्पिटल में रहीं . ठीक होने के बाद वापस उस तरफ नहीं गईं. अब सडक पर रहती हैं , कचरा बीन कर पेट पालती हैं . जब मैंने पूछा, 'पढ़ी लिखी हैं , कोई नौकरी क्यूँ नहीं करतीं " .कहने लगीं ,मार की वजह से उनके सीने में हमेशा दर्द रहता है. वे देर तक खड़ी नहीं रह सकती, काम नहीं कर
पातीं. '
जब मैंने उन्हें आश्रम के बारे में बताया तो कहने लगीं ," एक दूसरा आश्रम है, जिसमे कमरा लेने के लिए एक फॉर्म भरना पड़ता है . पुलिस स्टेशन में फॉर्म भर कर दिया है .पर कोई सुनवाई नहीं हो रही .प्लीज़ आप पुलिस वालों से बात करो न..उन्हें कहो, मेरे फॉर्म पर कार्यवाई करे .और मुझे कमरा दिलवाए .मैंने अंग्रेजी में फॉर्म भरा है "

मैंने उन्हें आश्वासन दिया , सोच ही रही थी ,शायद पुलिस स्टेशन जाकर बात करनी पड़े कि बाइक पर दो पुलिसमैन गश्त लगाते दिख गए .(चेन खींचने की घटनाओं की वजह से सुबह पांच बजे से ही गश्त शुरू हो जाती है )
मैंने उन्हें सारी बात बताई .उन्होंने इस मामले को देखने का आश्वासन दिया .

वो महिला मुझे फिर नहीं दिखीं . एक दिन वॉक कर ही रही थी कि एक बाईक बिलकुल पास आकर रुकी .पुलिसवाले को देख कर थोड़ा सा चौंक ही गई थी कि उन्होंने बताया ,'मैडम उन्हें आश्रम में जगह मिल गई " .मैं एक थैंक्स ही कह सकती थी . थोड़ी झिझक भी हुई कि मैंने उस पुलिसमैन से बात की थी ,पर चेहरा नहीं पहचान पाई, हमलोग वर्दी ही देखते हैं, चेहरे पर ध्यान ही नहीं जाता


लेखन ,बालू पर लकीरें खींचने जैसा नहीं ,शिलालेख जैसा होना चाहिए ---- अमृतलाल नागर

पुष्पा भारती जी ,धर्मवीर भारती का आलेख पढ़ते हुए
हिंदी की स्थिति ,उसकी लोकप्रियता को लेकर हमेशा चिंता बनी रहती है . पर कल शाम, जिस तरह साहित्य प्रेमियों ने एकाग्र होकर, चार घंटे तक प्रख्यात लेखक ' अमृतलाल नागर ' के जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में 'चौपाल' द्वारा आयोजित कार्यक्रम का आनंद लिया, वह अविस्मरणीय है. दर्शकों में बहुत सारे युवा चेहरे देख हिंदी के प्रति उम्मीद बंधती है.

कार्यक्रम का संयोजन बहुत ही श्रमपूर्वक और सुरुचिपूर्ण तरीके से किया गया था .अतुल तिवारी जी ने अमृतलाल जी की पौत्री ऋचा नागर (जो अमेरिका के एक कॉलेज में प्राध्यापक हैं )के सहयोग से 'अमृतलाल नागर' से जुड़ी हर छोटी बड़ी सामग्री को एकत्रित कर कार्यक्रम में प्रस्तुत किया . दूरदर्शन द्वारा बनाई एक छोटी फिल्म भी दिखाई गई जिसके अंत में नागर जी कहते हैं ," मुझे छोटे बड़े हर तरह के पुरस्कार मिले पर ये पुरस्कार लेखक को मिले ,व्यक्ति को नहीं .इसलिए व्यक्ति को घमंड नहीं करना चाहिए "इस तरह लेखक को अपने व्यक्तित्व से अलग कर कौन देखता है. हर चित्र में नागर जी बहुत झुककर पुरस्कार ग्रहण करते दिख रहे थे .पुरस्कार के प्रति उनका सम्मान झलक रहा था .आजकल तो पुरस्कार लेते वक़्त गर्व का भाव ही ज्यादा दिखता है.

अचला नागर जी ने बड़े प्यार से अपने बाबूजी को याद किया ,जब वे मथुरा में रेडियो स्टेशन में नौकरी कर रही थीं तो उनके पिताजी उनके पास आकर रहे थे वे सूरदास पर एक किताब लिखना चाह रहे थे पर शुरू नहीं कर पा रहे थे .वे मथुरा की गलियों में भटकते रहते . और आखिर एक दिन कहा, 'मेरे लिखने के स्थान का इंतजाम करो, सूर ने मुझे अपनी ऊँगली पकड़ा दी है ' कोई भी किताब लिखने से पहले वे गहन शोध करते थे . और अनुभवजनित लेखन पर जोर देते थे. उनका कहना था कल्पना भी करो तो उसमे वास्तविकता के पुट होने चाहिए . अचला जी ने अपनी माताश्री 'बा' को भी नम आँखों से याद करते हुए कहा, 'बा' ने उन्हें सारी सांसारिक जिम्मेवारियों से मुक्त कर रखा था . घर का खर्च कैसे चलता है , नागर जी को कोई अहसास नहीं था . वे जब तब किसी के लिए भोजन ,किसी के लिए मिठाइयों की फरमाईश कर देते थे .पर कभी नहीं जान पाए कि इनका इंतजाम कैसे होता है . इसीलिए वे 'बा' को तीन चौथाई अमृतलाल नागर कहा करते थे .

1940 में नागर जी ,मुंबई फिल्म लेखन के लिए आ गए. कई सुपर हिट और प्रयोगधर्मी फ़िल्में लिखीं. पैसे भी बहुत अच्छे मिलते थे पर उनका लेखक मन बेचैन रहता .वे कहते,' ये लेखन बालू पर लकीरें खींचने जैसा है ,जबकि लेखन तो शिलालेख सा होना चाहिए .और वे 1947 में लखनऊ वापस आ गये. 'बा'ने भी उनके इस निर्णय में पूरा साथ दिया और कहा, 'अब तक राम जी चलाते थे आगे भी राम जी चलाएंगे '
'बा' की इच्छा थी कि वे सुहागन ही इस दुनिया से जाएँ पर नागर जी कहते ,'ठीक है ,पर मेरे जाने से पांच मिनट पहले ,क्यूंकि फिर मेरा काम कैसे चलेगा . पर बा दो वर्ष पूर्व ही चली गईं . अचला जी ने लेखकों की बेबसी का भी जिक्र किया कि वे माँ के अंतिम दर्शन नहीं कर सकीं . क्यूंकि ट्रेन की टिकट नहीं मिली और तब वे हवाई जहाज का टिकट अफोर्ड नहीं कर सकती थीं .जबकि उनकी लिखी फिल्म 'निकाह' और कई फ़िल्में सुपर हिट हो चुकी थीं. किसी भी फिल्म की नींव लेखक ही खड़े करते हैं ,पर शोहरत और पैसे अभिनेता/ निर्माता निर्देशक को मिलता है.
पुष्पा भारती जी एवं अचला नागर जी

'बा' की मृत्यु के बाद उनके छोटे बेटे शरद नागर ने उनका सारा लिखा हुआ सहेजा . एक साल पहले उनका देहावसान हो गया. वे अपने अंतिम दिनों में भी बेचैन रहते थे कि बाबूजी की जन्मशती आ रही है, कैसे समारोह के इंतजाम होंगे . अचला जी ने विह्वल होकर कहा, 'छोटे भैया देखिये ,बाबूजी से प्यार करने वालों ने कितना शानदार कार्यक्रम बनाया है'

राजेन्द्र गुप्ता जी ने उनके उपन्यास 'कोठेवालियां' के कुछ अंश पढकर सुनाये . नागर जी इसपर शोध करने के लिए कई गायिकाओं, उनकी माताओं से उनके गाँव जाकर मिले और सामग्री इकठ्ठा की थी.

अस्सी वर्षीया पुष्पा भारती जी ने अपनी ओजस्वी वाणी में धर्मवीर भारती का लिखा ,'उजास की धरोहर' आलेख पढ़ा जिसमे धर्मवीर भारती ने बा को याद करते हुए उनकी शादी में सहबाला ना बन पाने का दुःख जाहिर किया है. अमृतलाल नागर और बा के विवाह की स्वर्ण जयंती पर भारती जी ने उन दोनों की पुनः शादी का प्रस्ताव रखा था और कहा था कि सहबाला मैं बनूँगा .पर किसी कारणवश नहीं जा पाए लेकिन अचला जी के हाथों सुहागा की पिटारी, चूड़ी ,आलता ,सिंदूर आदि और एक शॉल भेजा था .पूरे समारोह में 'बा' वही शॉल ओढ़े रहीं और सबको बतातीं 'मेरे देवर-देवरानी ने बंबई से भेजा है' . पुष्पा जी ने ये भी बताया कि जब भारती जी और उनके विवाह की आलोचना करते हुए सभी साथी दूर हो गए थे तब सिर्फ नागर जी और भगवतीचरण वर्मा जी ने ही उनका साथ दिया और लोगों के मन से उन दोनों के प्रति विद्वेष भी दूर किया .

सूरज प्रकाश जी ने जिक्र किया कि नागर जी जब अपने तख्त पर लिखने बैठते तो 'बा' से कह देते कोई मेरे विषय में पूछे तो उन्हें कह देना ,'मैं कानपुर गया हूँ ' पर जब कोई आत्मीय आ जाते तो वे उन्हें आवाज़ दे बुला लेते. 'बा' खीझ जातीं, 'मुझे झूठा ठहरा दिया' तो वे कहते "तुमने झूठ कहाँ कहा, ये तख्त कानपुर ही तो है, ये लोग कानपुर में ही बैठे हैं "

अमृतलाल नागर जी का परिवार
शेखर सेन ,'अमृतलाल नागर ' को अपना गुरु मानते हैं. उनकी किताब 'मानस का हंस' का कई कई बार पाठ किया है. उनकी किताबों पर आधारित तुलसी और सूरदास नाटक लिखा है. दोनों नाटकों के छोटे मार्मिक अंश प्रस्तुत किये और खूब तालियाँ बटोरीं .

अंत में नागर जी की पौत्री ऋचा नागर ने अपने दादा जी से जुडी कई स्मृतियाँ साझा कीं . बा के जाने के बाद दो साल वे दादा जी के बहुत करीब रहीं .तब नागर जी 'करवट' उपन्यास लिख रहे थे और उन्होंने ऋचा जी को महल्ले की औरतों के घर जाकर उनसे गीतों में प्रयुक्त होनेवाली गालियाँ नोट करने के लिए कहा था . हर उपन्यास पर वे इतनी मेहनत करते थे .
मुम्बई से नागर जी अपने बच्चों को पत्र लिखते थे और बड़े सरल शब्दों में शिक्षाप्रद बातें कह जाते थे .बड़े बेटे कुमुद नागर को लिखा ,तुम्हारी नानी तुम्हारा यज्ञोपवीत करवाना चाहती हैं . जनेऊ के तीन धागे ,गीता, बाइबल और कुरान से हैं और उनमें गाँठ लगाईं जाती है ताकि तीनों धर्मग्रन्थों की शिक्षा ग्रहण की जाए .तुम्हें कौन सा यज्ञोपवीत स्वीकार है .सर मुंडा कर पूजा करने वाला या ये वाला ?"
छोटे पुत्र शरद नागर को लिखा ,' अभिवादन में हमेशा 'जय हिन्द' कहा करो. इस से किसी जाति का बोध नहीं होता"
ऋचा जी ने इस तरह की कई बातों का उल्लेख किया . कार्यक्रम के समापन पर नागर जी का पूरा परिवार स्टेज पर उपस्थित हुआ , उनकी दोनों बेटियाँ ,छोटे भाई के बेटे -बहुएं, पौत्र - पौत्री , नाती नातिनें सब आये थे . अचला जी ने सबका परिचय करवाया .
पुष्प जी के साथ मैं

पुष्पा भारती जी ने अतुल तिवारी जी को बधाई देते हुए मंच से ही कहा ,' इतने साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लिया है. पर यह सबसे बढ़िया कार्यक्रम था '
इतने सुंदर कार्यक्रम के अवलोकन के साथ ही 'पुष्पा भारती' जी से मिलना मेरे लिए बड़ी उपलब्धि रही .धर्मयुग से जुड़ी कई बातें हुईं . अचला जी ने भी कहा ,'अब वैसी पत्रिका कहाँ ' पुष्पा जी ने इतने प्यार से कह डाला, 'घर पर आओ कभी, खूब बातें होंगी ' सहजता से अपना फोन नम्बर भी दे दिया ,जब मैं नम्बर नोट करने लगीं तो बोलीं, ' बेटा, कैसे तुमलोग इतने बड़े फोन हैंडल कर लेती हो ' ऐसा कहतीं वे बिलकुल मेरी चाची-मौसी सी लग उठीं

Tuesday, May 5, 2015

गुलज़ार से छोटी सी मुलाकात : ब्लॉग वापसी का बायस



दोस्त न हों तो हमारा क्या हो
25 अप्रैल ,शनिवार की सुबह (जब मेरे घर में आधी रात होती है क्यूंकि उसकी पहली रात के 2 बजे शाम के छः बजते हैं ) मैंने आराम से तीनो अखबार पढ़े और फिर घर के काम काज में लग गई. दोपहर में रोजी के साथ शॉपिंग जाना था . एक बजे के करीब सीमा का फोन आया ," मुंबई मिरर  में देखा , आज 4 बजे इनफिनिटी मॉल में गुलज़ार की एक बुक लांच है ,चलना है ?"

अखबार तो मैंने पूरा पढ़ा था पर आखिर के विज्ञापन वाले पन्ने  पढने की आदत ही नहीं ,ये जरूरी सूचना भी छूट गई थी. पर मैंने 'हाँ 'कहने में एक पल भी नहीं लगाया . रोज़ी की तरफ से भी  खुद ही सोच लिया कि उसकी बोलने-पढने-लिखने की भाषा इंग्लिश है तो क्या हिंदी आर्ट फ़िल्में उसे पसंद आती हैं .ये प्रोग्राम भी अच्छा लगेगा .
अब मशीनी रफ्तार में काम निबटा ढाई बजे निकल गई . पर मुंबई की ट्रैफिक ,पौने चार बजे पहुंची तो शुक्र मनाया लेकिन मॉल के गेट बंद ,यानि पार्किंग फुल .सडक के किनारे जहाँ जगह  मिली वहाँ से टर्निंग थी. पूरा डर था गाड़ी tow हो जायेगी . गज़ब की असमंजस, गुलज़ार को रु ब रु देखने  का अवसर और हम बेबस .लगा लौट ही जाना पड़ेगा .सीमा को फोन किया ,जो दूसरी तरफ से आने वाली थी .उसने बताया, उन्होंने जान बूझकर एक गेट बंद कर रखा है , पार्किंग मिल जायेगी पर थोड़ी दूर जाकर यू टर्न लेकर दूसरी गेट से आना पड़ेगा . इन सबमे चार बज गए और मैंने घोर स्वार्थी बन प्रार्थना की कि गुलज़ार की गाड़ी भी ट्रैफिक में फंस जाए और वे देर से आयें .


कभी कभी स्वार्थी होना अच्छा होता है :)...गुलज़ार और विशाल भारद्वाज को आने में देर हुई और तब तक आराम से मैं सीमा के रोके हुए सीट पर दूसरी कतार में टेबल के बिलकुल सामने आसन जमा चुकी थी. गुलज़ार ,विशाल भारद्वाज और बुक के  एडिटर 'शांतनु .' आये और सामने बैठ गए . कोई ताम झाम नहीं .न बुके से स्वागत , न फोटो खिंचवाने का दौर . बिलकुल दस कदम की दूरी पर धवल कुरते पैजामे में धवल कांति वाले गुलज़ार बैठे थे .आँखों पर सुनहरी कमानी का  चश्मा, हाथ में काली बेल्ट वाली घड़ी , होठों पर हल्का स्मित लिए वे आयोजक द्वारा दिया जा रहा अपना परिचय सुन रहे थे और मैं सोच रही थी ,यहाँ सारे गुलज़ार के फैन्स ही इकट्ठे हैं. कौन उनके बारे में नहीं जानता .क्यूँ टाइम वेस्ट कर रहा है. गुलज़ार को माइक पकडाए . और वही हुआ , गुलज़ार ने अपनी छोटी कविताओं के संग्रह 'प्लूटो 'के विषय में बताया कि क्यूँ इसका नाम प्लूटो रखा है.
"'प्लूटो' से जब प्लैनेट का रुतबा छिना तो मुझे बहुत दुख हुआ. अपने सोलर सिस्टम का सबसे छोटा ग्रह-प्लूटो. साइंसदान कभी उसे प्लैनेट मान लेते हैं, कभी निकाल देते हैं. प्लूटो कहीं न कहीं मुझे अपने जैसा लगता है. मुझे तो बहुत पहले घरवालों ने अपनों में गिनना छोड़ दिया था. कहा- "बिजनेस फैमिली में यह मिरासी कहां आ गया" जहां मैं  जन्मा, वहां का भी नहीं रहा. लोग भी कभी शायर मानते हैं तो कभी कह देते हैं कि "अरे कहां, वह तो फिल्मीं गाने लिखता है" इसलिए मैंने अपनी सारी छोटी-छोटी नज़्मों को प्लूटो के नाम कर दिया, हिंदी में यह पहले ही प्रकाशित हो चुका है .इसका अंग्रेजी अनुवाद निरुपमा दत्त ने किया है ."


उसके बाद गुलज़ार अपनी सोज़ भरी आवाज़ में छोटी छोटी नज्मों की बौछार से सबको  भिगोते रहे .उनके पढने का अंदाज ए बयाँ कुछ ऐसा था, मानो  रूह से महसूस करके पढ़ रहे हों और वो नज्म सबकी रूह तक पहुँच रही थी. श्रोताओं के उपर से गुजरती उनकी निगाह एक उड़ते हुए पल को मेरे ऊपर भी पडती और ऐसा लगता वो पल वहीँ फ्रीज़ हो जाए . कुछ अपनी प्रसिद्ध नज्में भी पढ़ीं ..'मुझको भी एक तरकीब सिखा दे ,यार जुलाहे...' और भी कई . फिर उन्होंने कहा ,अब विशाल भारद्वाज भी कुछ सुनाएँ . पर विशाल भारद्वाज ने कविता नहीं...गुलज़ार से अपने रिश्ते के विषय में बताया कैसे वे अपना मानस पुत्र मानते हैं . शांतनु    ने भी गुलज़ार से अपनी पहली मुलाक़ात और अपने सम्बन्धो का जिक्र किया .
एक बुक स्टोर में यह प्रोग्राम था .सारी कुर्सियां भर चुकी थीं और काफी लोग खड़े थे .फेमिना की एडिटर रह चुकी 'सत्या शरण' बिलकुल हमारे पास खड़ी थीं .गुलज़ार की नजर उन पर पड़ी और वे उनसे कहीं बैठने का आग्रह करने लगे. पर यहाँ तो सब गुलज़ार के फैन की हैसियत से आये थे,एक समान थे .एक व्यक्ति ने पीछे से उठ कर कुर्सी देनी भी चाही,पर वे नहीं बैठीं .फिर आयोजकों ने ही एक एक्स्ट्रा कुर्सी भिजवाई .
गुलज़ार की कविता पाठ के दौरान जब आयोजक लोगों से ताली बजाने को कहते तो बीच में ही रुक कर गुलज़ार ने झिडक दिया था ,"लोगों को अच्छा लगेगा तो वे खुद बजायेंगे...ये कोई मदारी का खेल नहीं हो रहा कि आप ताली बजाने को कह रहे हैं. " और फिर जब बीच बीच में तालियाँ  बजतीं तो आयोजक से कहते, "देखिये आपने नहीं कहा न..फिर भी लोग ताली बजा रहे हैं " आयोजक बेचारा झेंप जाता .बीच बीच में फोटो लेने वाले और रेकॉर्डिंग करने वाले को भी टोक देते ,"प्लीज़ बंद कर दीजिये ...ये आपके पास भी नहीं रहने वाला, फेसबुक या यू  ट्यूब पर चला जाएगा ,बेहतर है ध्यान से सुने " .मैं बिलकुल सामने ही थी,इसलिए ऐसी हिमाकत नहीं की थी. शुरू में ही कुछ फोटो लेकर फोन रख दिया था .गुलज़ार ने ये भी कहा,"वो एक कहावत है .."बहू को कहा जाता है, बेटी को सुनाने के लिए "ऐसा ही सोचिये और सबलोग बंद कर दीजिये .


इसके बाद आया असली सरप्राइज़ कि आपलोग गुलज़ार साब से सवाल पूछ सकते हैं. हाथ उठायें . मैंने ये तो सोचा ही नहीं था .जल्दी से दिमाग चलने लगा, क्या पूछा जाए और मैंने हाथ उठा दिया . तीसरा नम्बर ही मेरा था .गुलज़ार की लिखी एक लाइन मुझे बहुत पसंद है, "मुश्किल है, आकाश पर चलना, तारे पैरों में चुभते हैं " मैंने फेसबुक और ब्लॉग पर भी लोगों से पूछा था कि इसकी अगली लाइन या पूरी नज़्म बताएं ' कोई नहीं बता पाया था और ईश्वर ने मौक़ा दिया कि सीधा लिखने वाले से ही पूछ लिया जाए . वे बोले, " नज़्म तो नहीं है ...न कोई गीत है. ये एक त्रिवेणी की अंतिम लाइन है पर मुझे याद नहीं आ रहा " फिर विशाल भारद्वाज की तरफ मुड़ कर बोले,.." ये आपका जिम्मा रहा ,आप वो त्रिवेणी ढूंढ कर इन्हें भेज दीजिये " (जैसे विशाल भारद्वाज को दूसरा काम नहीं :) ) फिर उन्होंने आगे बोला, " ये त्रिवेणी तो नहीं याद पर त्रिवेणी कैसे लिखना शुरू किया, ये आपको बताता  हूँ . दो पंक्तियाँ  होती हैं और तीसरी पंक्ति दोनों को सम अप करती है .जैसे गंगा -जमुना सरस्वती . कमलेश्वर जब सारिका के सम्पादक थे तो उन्होंने सारिका में छापना शुरू किया. लोगों को पसंद आया तो इसके संग्रह भी निकले. "
मैंने थोडा ढीठ बनकर ये भी कह दिया ,"पर ये विधा आपसे शुरू होकर आप तक ही रह गई है ...और लोग नहीं लिखते " इस पर गुलज़ार ने कहा, "पाकिस्तान में बहुत प्रचलित है, वहां बहुत लोग लिखते हैं. बाकायदा 'त्रिवेणी सम्मेलन ' होता है. " फिर मेरे आग्रह पर एक त्रिवेणी भी सुनाई (जो मैं बिलकुल भूल गई हूँ ) .मुझसे कहा, 'मेरे किसी त्रिवेणी संग्रह में ढूंढिए वो त्रिवेणी मिल जायेगी" .तब तक एक लड़की ने हाथ उठा कर एक त्रिवेणी संग्रह दिखाया (औटोग्राफ लेने के लिए लाइ होगी ) गुलज़ार ने कहा, 'इन्हें दे दीजिये प्लीज़ ' मैं शुक्रिया कह कर बैठ गई . वो त्रिवेणी संग्रह पीछे से मुझ तक आ गई. दूसरे सवाल-जबाब के दौरान मैं एक एक पन्ना पलट गई.पर उसमे नहीं था .गुलज़ार भी एकाध बार इधर देख लेते थे कि मिली क्या आखिर में मैंने निराशा से हाथ से इशारा किया की नहीं है. तो उन्होंने खुलकर मुस्करा  कर जैसे आश्वस्त किया कोई बात नहीं "
(जब फेसबुक पर इसका जिक्र किया तो मेरी एक नियमित पाठक और छोटी बहन सी ‘नेहा शर्मा’ ने बताया ये पंक्तियाँ फिल्म आस्था के एक गाने की हैं . दोनों पंक्तियाँ ये हैं .
'मुश्किल है आकाश पे चलना तारे पैरों में चुभते हैं
सपनों में सोकर देखा है,सपने आँख में कब रूकते हैं!'
थैंक्स नेहा, वहां होती तो गुलज़ार सुन कर खुश हो जाते, किसी ने इतने धयान से सुना और याद रखा है. वे तो हज़ारों नज़्म लिख चुके हैं,कितना याद रखेंगे )

वो गुलज़ार का सीधा मेरी  तरफ देखते हुए बोलना, वक़्त जैसे वहीँ फ्रीज़ हो गया है रूह उन्हीं लमहों में अटकी हुई है "
अच्छा हुआ मैंने जल्दी हाथ उठा दिया . सिर्फ पांच सवाल ही लिए गए ,उसके बाद किताब पर टोग्राफ लेने के लिए क्यू बन गई. मैं गुलज़ार की ' रात पश्मीने की  ' ले गई थी .इन अंग्रेजी में अनूदित नज्मों की किताब खरीदने की जरूरत नहीं थी पर मैंने ये सोचकर ले लिया, बच्चे तो गुलज़ार की उर्दू मिश्रित हिंदी समझ  नहीं पायेंगे. शायद इसे कभी पढ़ें .गुलज़ार अपनी 'एक रात पश्मीने की ' देख शायद ज्यादा खुश हुए उस पर बड़ा सा हस्ताक्षर किया. तारीख भी डाली .

उसके बाद मैं उनके पीछे जाकर खड़ी हो गई .एक लड़की ने फोटो खिंचवाने के लिए पूछा, पर बड़े प्यार से वे बोले, "अच्छा नहीं लगता...रहने दो " उनकी बहू  को बोलकर बेटी को सुनाने वाली बात याद थी .मैंने भी फिर आग्रह नहीं किया. एक तरफ विशाल भारद्वाज खड़े होकर बड़े आराम से सबसे बातें कर रहे थे ,फोटो खिंचवा रहे थे . सीमा बार बार बोल रही थी, 'गुलज़ार  जबतक साइन कर रहे हैं, उनसे बातें करते हैं...फोटो खींचते हैं " पर मैं हिली ही नहीं .गुलज़ार का आभा मंडल कुछ ऐसा था  कि निकलने का मन ही नहीं हो रहा था .
सभी किताबों पर साइन कर गुलज़ार उठे सीधा विशाल भारद्वाज को कुहनी से पकड़ा और प्रवेश द्वार की तरफ चल दिए . सॉरी सीमा , विशाल भरद्वाज के साथ तुम्हारी तस्वीर रह ही गई :(
यूँ तो गुलज़ार के चमकते चेहरे  , दमदार आवाज़ पर उम्र की कोई छाया तक नहीं थी पर चलते हुए गुलज़ार के कदम कुछ कमजोर से लगे .और तब अहसास हुआ अस्सी बसंत देख चुके हैं वे. पर शायद देर तक बैठे रहने का असर हो क्यूंकि हाल में ही  उन्होंने अपने क्लब का टेनिस टूर्नामेंट जीता है .ईश्वर उन्हें लम्बी उम्र दे .

हम सबको घर जाने की जल्दी थी. पर इतने शानदार अनुभव को एक कॉफ़ी पर डिस्कस न किया जाए तो कैसे चैन आये. कॉफ़ी पीते मैंने सीमा से कहा , 'तुम्हारी अच्छी आदत है, मैं तो अखबार  के पिछले चार पन्ने छोड़ ही देती हूँ ..पढ़ती भी नहीं "
सीमा ने कहा, "अरे मैं कहाँ पढ़ती हूँ ...वो तो अखबार रख कर मैं कुछ करने लगी तभी पंखे की हवा से पन्ने पलट गए और मैंने गुलज़ार की तस्वीर देखी तो वो खबर पढ़ी और तुम्हे फोन किया :)
तो सीमा को ये सूचना देने के लिए, रोजी को मेरे साथ वहां तक आने के लिए और हाँ, पंखे को भी पन्ना पलटने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद :)