Saturday, January 28, 2012

ईश्वर से बड़ा लेखक कौन ??


अक्सर जब दस-बारह या उस से ज्यादा किस्तों वाली कहनियाँ लिखती हूँ...तो उसके बाद...उस कहानी को लिखने की प्रक्रिया या कहें मेकिंग ऑफ द स्टोरी/नॉवेल....भी लिख डालती हूँ. इन दो किस्तों की कहानी के बाद कुछ लिखने का इरादा नहीं था...पर इस कहानी पर लोगो की प्रतिक्रियायों ने कुछ लिखने को बाध्य...नहीं बाध्य तो नहीं...हाँ, कुछ लिखने की इच्छा जरूर जगाई मन में.

इस कहानी की  थीम कुछ अलग सी थी और मुझे इसे लिखने में थोड़ी हिचकिचाहट भी  थी....कि कहीं ऐसा तो नहीं लगे कि ये कहानी 'बंद दरवाजों का सच 'विवाहेतर संबंधों ' को बढ़ावा दे रही  हो या फिर उसे सही ठहरा रही हो. मन में दुविधा थी और ऐसे में तो दोस्त ही काम आते हैं. वंदना अवस्थी दुबे ,राजी मेनन और रश्मि प्रभा जी से इसके प्लाट की चर्चा की....और तीनो ने ही सुन कर कहा...तुम्हे जरूर लिखना चाहिए. आभार उन सबका. अक्सर इस कहानी में वर्णित जैसे  हालात आते हैं लोगों की जिंदगी में......और इसके लिए अक्सर स्त्री को ही दोषी ठहरा दिया जाता है. पर इसके लिए सिर्फ स्त्री को गलत नहीं कहा  जा सकता...दोषी वे हालात होते हैं. 

कुछ लोगों ने टिप्पणियों में भी कहा और कुछ ने मेल में और बातचीत में भी कहा कि नीलिमा सही वक़्त पर संभल गयी वरना वास्तविक जीवन में ऐसा होता नहीं...लोग भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते और बहक जाते हैं. पर मैं इस से इत्तफाक नहीं रखती. अभी भी हमारे देश में देह की पवित्रता बहुत मायने रखती है. और यह बात पूरे विश्वास से इसलिए भी कह रही हूँ क्यूंकि यह कहानी एक सत्य घटना पर आधारित है. 

मेरी सहेली के पड़ोस में एक महिला रहने आई. साथ में उसके सास-ससुर भी आए थे. उन्होंने मेरी सहेली से कहा ...बहू पहली बार शहर में अकेले पति के साथ रहने आई है, जरा इसका ख्याल रखना. वे लोग अहिन्दीभाषी थे ..महिला को लोगों के साथ घुलने-मिलने में थोड़ा संकोच होता था. सहेली नौकरी करती है...काफी व्यस्त रहती है..फिर भी वह उक्त महिला का हाल-चाल पूछ लिया करती थी...कभी फ्री रहती तो अपने साथ बाज़ार वगैरह ले जाती क्यूंकि उस महिला का पति काफी व्यस्त रहता था...सुबह के गए देर रात को घर आया करता था.
मेरी सहेली ने  गौर किया...सामने वाली बिल्डिंग के टेरेस  से एक लड़का अक्सर उनकी बिल्डिंग की तरफ देखता रहता है....उसने इसे ,ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया...पर एक दिन वह छुट्टी ले घर पर थी तो देखा...वह लड़का उसके पड़ोस में उक्त महिला के घर गया. सहेली ने बाद में उस से पूछा भी...और समझाया भी...कि 'वह दूर ही रहे'..पर उस महिला ने कहा...'वे लोग सिर्फ अच्छे दोस्त हैं.." एकाध बार और सहेली ने उसके घर लड़के को आते देख उसे समझाने की कोशिश की....पर फिर बाद में चुप हो गयी  कि कहीं व्यर्थ की दखलअंदाजी ना लगे. 

इसके बाद घटनाक्रम  ने जो मोड़ लिया..वो अगर मैं कहानी में लिख देती तो नाटकीयता से भरपूर लगता लेकिन ऐसे ही नहीं कहते.. .. "God is  the greatest fiction writer "   उन लोगो का फ़्लैट का ग्यारह महीने का कॉन्ट्रेक्ट ख़त्म हो गया और उक्त महिला के पति ने उसी बिल्डिंग में  फ़्लैट किराए पर ले लिया...जिस बिल्डिंग में वो लड़का रहता था. आस-पास के सैकड़ों बिल्डिंग छोड़कर प्रौपर्टी डीलर ने उसी बिल्डिंग में उस महिला के पति को फ़्लैट दिखाया और उन्हें पसंद भी आ गया. अब वो महिला घबरा गयी...अब उसे लड़के के लक्षण भी ठीक नहीं लग रहे थे. एक ही बिल्डिंग में दूसरे माले पर वो महिला और सातवें माले पर वो लड़का रहने लगा. और वही हुआ जिसका उसे डर था. महिला के अवोइड करने पर वो लड़का समय-असमय उसे फोन करने लगा...और एक दिन जबरदस्ती उसके फ़्लैट में घुस आया....महिला ने किसी तरह भागकर पड़ोस में शरण ली. कह दिया की कोई अजनबी था. वो लड़का सीढियों से ऊपर चला गया. यह सब उसने मेरी सहेली को फोन पर बताया. 

पर बात यहीं ख़त्म नहीं होती. उस बिल्डिंग के लोग काफी चिंता में पड़ गए कि इतनी सिक्युरिटी के बाद भी कोई बाहर से कैसे बिल्डिंग में घुस आया. सोसायटी की मीटिंग हुई...वाचमैन की खबर ली गयी.  उस बिल्डिंग में भी मेरी कई सहेलियाँ रहती हैं...उन सबने मुझसे भी अपनी चिंता बांटी. मुझे अंदर की बात की खबर थी...पर उक्त महिला की खातिर मैने उन्हें सच्चाई नहीं बतायी. 

करीब  पांच वर्ष पहले की घटना  है,यह. उस महिला से मिलना तो दूर मैने उसे कभी देखा भी नहीं...सहेली ने नाम जरूर बताया होगा..पर अब तो वो भी नहीं याद......पर इस पूरे घटनाक्रम ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया कि जरूर वो महिला बहुत अकेलापन महसूस करती होगी...नए  शहर में...कोई दोस्त नहीं....हिंदी-अंग्रेजी  बोलने में कठिनाई..पति व्यस्त रहता होगा.... इसीलिए उसने उस लड़के से दोस्ती की होगी. और इसके लिए उस महिला को बिलकुल गलत नहीं कहा जा सकता. थोड़ी सराहना....थोड़ी केयरिंग... अपनी कहने..दुसरो की सुनने की इच्छा सबके भीतर होती है. 

जबतक उस लड़के ने  मीठी-मीठी बातें की ...उसे अच्छा लगा पर...जब इस से आगे बढ़कर उसने कुछ चाहा तो महिला का संस्कारी मन स्वीकार नहीं कर पाया. अभी भी हमारी संस्कृति में देह की पवित्रता ही अहम् होती  है. और रिश्ते एक निश्चित दूरी पर ही निभाये जाते हैं. इसलिए सिर्फ कहानी में ही नहीं..वास्तविक जीवन में भी लोग भावनाओं पर काबू रखना जानते हैं. 

यह कहानी बहुत ही वास्तविक सी लगती है....इसका थोड़ा श्रेय मेरी सहेली 'राजी' को भी जाता है. रोज मॉर्निंग वॉक पर मैं उस से इसके सीन डिस्कस किया करती थी....और उस से पूछती..ऐसा हो सकता है ना...और वो मुझे आश्वस्त करती. { जबरदस्ती कविता सुनायी जाती है...यह तो सब जानते हैं...पर जबरन कहानी भी सुनायी जाती है,यह सिर्फ राजी जानती है:).. पर मानती नहीं...कहती है..'वो एन्जॉय करती है,सुनना' }

वंदना ने भी सिर्फ आश्वस्त ही नहीं किया...बल्कि कहा था...इसी प्लाट पर मैं भी एक कहानी लिखती हूँ....मैने तो लिख डाला...अब मुझे भी वंदना की कहानी का इंतज़ार है...आप सब भी उस से फरमाइश करते रहिए :)

Thursday, January 19, 2012

बंद दरवाजों का सच (समापन किस्त )


"नीलिमा..तुम मेरी बेटी जैसी हो....मैं तुम्हे बिलकुल ही गलत नहीं समझ रही....इन हालातो में ऐसा हो सकता है...मुझे ही देखो...आज पहला दिन है...बेटे -बहू का फोन भी आ चुका है..पति से भी बात हो चुकी है...पर इतना अकेलापन था....ये कुछ घंटे भी काटना मुश्किल लग रहा था ....तुमने तो महीने काटे हैं ऐसे....मुझे अच्छा लगेगा अगर तुम खुलकर अपने मन की बात मुझसे कहोगी....किसी के कुछ काम आ सकी ये ख़ुशी तो होगी. 

"आंटी आप किसी से ये सब कहेंगी तो नहीं ना..अपनी बहू से...प्लीज़ आंटी..." उसके आवाज़ से डर छलक छलक पड़ रहा था 
"नहीं बेटा....इत्मीनान रखो...मैं किसी से कुछ नहीं कहने वाली.." मैं उठकर उसके पास सोफे पर बैठ गयी....उसे भी लग रहा था, वह संकट की घड़ी में अचानक मेरे पास चली आई..तो सारी बातें बताना उसका फ़र्ज़ है. थोड़ी देर रुक कर... जैसे खुद को ही समझाकर  उसने फिर कहना शुरू किया.

एक दिन मैं गुड़िया को स्कूल बस में चढ़ाकर वापस लौट ही रही थी कि एक आवाज़ आई..'एक मिनट सुनिए.."
मुड कर देखा...वो लड़का ही था, हलके से मुस्कुरा कर आँखें झुका कर जैसे नमस्ते की उसने और बोला.."आपके पास ठंढे पानी की बॉटल है क्या...यहाँ दुकान में ठंढा पानी है ही नहीं.."
मेरी समझ में नहीं आया क्या बोलूँ....पर एकदम से झूठ नहीं कहा गया मुझसे...और मैने कह दिया.."हाँ... है.."
वो मेरे बिना कुछ कहे ही मेरे साथ चलने लगा...इधर-उधर की बातें करता रहा.."अच्छी बिल्डिंग है...साफ़-सफाई है..यहाँ...अच्छा मेंटेन किया है..." 
मैने कुछ भी नहीं बोला......फिर लिफ्ट में अपने बारे में बताने लगा..'वो क्या है ना.....अकेला रहता हूँ...फ्रिज नहीं रखा  मैने...जब ठंढा पानी पीना हो...दुकान से ले लेता हूँ...आज उनके पास थी ही नहीं...और जैसे मेरा गला सूख रहा था...सोचा,आपसे मांग लूँ...आपको बुरा तो नहीं लगा.." 
.मैने ना में सर हिलाया...अब भी मुझसे कुछ कहते नहीं बन रहा था....मैने कमरे का दरवाज़ा खोला...वो बाहर ही खड़ा रहा ..जेब में हाथ डाले...इधर-उधर देखता रहा...जब मैने बॉटल पकडाई तो बोला.."मैं आज शाम को बॉटल लौट दूंगा.."
मैने  घबरा कर कहा.."नहीं..नहीं...आप इसे रख लीजिये...बहुत सारी बॉटल है मेरे पास..." मैं नहीं चाहती थी ,उसे दुबारा आने का बहाना मिले...और वो भी जैसे भांप गया,एक चौड़ी मुस्कान के साथ बोला..."ओके ...थैंक्यू..."..और लिफ्ट का बटन दबा दिया उसने. मैने तुरंत दरवाज़ा बंद कर लिया...डर से मन ही मन काँप गयी थी मैं...ये मेरी जिंदगी में पहला मौका था...जब मैने ऐसे अकेले में किसी अजनबी लड़के से बात की थी

जल्दी से मैने परदे खींच दिए. एक दो दिन मैं खिड़की के पास गयी ही नहीं...मैने गौर किया था...वो शाम को चला जाता था...पता नहीं गए रात को या शायद सुबह लौटता और ग्यारह-बारह बजे तक सोता रहता था. मैं सुबह ही समय निकाल कर कपड़े डाल देती...और शाम ढलने के बाद निकालती. पर कितने दिन??..फिर वही वापस रूटीन शुरू हो गया...अब वह सामने दिख जाता  तो मुस्कुरा भी देता....पर मुझे डर  लगता और मैं वहाँ से हट जाती. ...हालांकि मन को समझाती कि  ' मैं एक बच्ची की माँ हूँ....कोई छोटी लड़की थोड़े ही हूँ...जो डर रही हूँ.' दसेक दिन बीत गए...बस वही...जब कभी सामने दिख जाता, एक मुस्कान उसके चेहरे को छो कर निकल जाती  और एक दिन फिर वही बारह बजे मिला...सीधा ही मुस्कुरा कर पूछा.."हलो..कैसी हैं आप."

"ठीक हूँ.." मेरे मुहँ से इतना ही निकला. शायद फिर से पानी की बॉटल मांगेगा .यही सोच रही थी कि बोला..."आज फिर आपको तंग करने वाला हूँ...बहुत तेज सरदर्द हो रहा है...शायद थोड़ा बुखार भी  है....कोई दवा है क्या...मेडिकल शॉप तक जाने की हिम्मत  ही  नहीं हो रही...यहाँ किसी को जानता नहीं....बस एक आपको चेहरे से पहचानता हूँ...सोचा आपसे ही पूछ लूँ.." 
मैने आँखें उठा कर देखा ..उसके चहरे पर सचमुच दर्द था...आँखें लाल लग रही थीं..फिर मुझसे झूठ नहीं बोला गया..."हाँ.. है..आइये देती हूँ.."

शायद सचमुच उसके सर में बहुत दर्द था..वो रास्ते में कुछ नहीं बोला...लिफ्ट में भी चुप रहा..दरवाजे के बाहर कपाल को हथेलियों से दबाता खड़ा था...और फिर मैने कुछ नहीं सोचा..उसे अंदर बुला लिया...उसने कहा भी..."नहीं.. ठीक हूँ..."
"आ जाइए दो मिनट...कोई बात नहीं...बैठिये.."
वो आकर बैठ गया...मैने दवा और एक ग्लास पानी पकडाया..फिर एकदम से ध्यान आया...उसने कुछ खाया है या नहीं...खाली पेट दवा नहीं खानी चाहिए. पूछा..तो उसने 'ना' में सर हिला दिया और बोला..."कोई बात नहीं..आप बस दवा दे दीजिये."
 पर मैने जिंदगी में आजतक किसी को खाली पेट दवा खाते देखा भी नहीं..घंटो गुड़िया को मनुहार करती हूँ...एक से एक वो फरमाइश करती है...सब पूरा करती हूँ...तभी दवा देती हूँ....सास और माँ के बीमार होने पर भी...जबरदस्ती उन्हें कुछ खिलाकर ही दवा देती थी..इसे ऐसे कैसे खाने दूँ...और मैने सख्ती से कहा..."नहीं...बिस्किट लाती हूँ..बिस्किट खा कर ही दवा लीजियेगा. "

मैं बिस्किट ले आई...उसने बड़े संकोच से एक बिस्किट उठाया..और खा कर दवा खा ली...उसे इस  हालत  में देखकर मेरा सारा संकोच, सारा डर उड़नछू हो गया था और लग रहा था..किसी भी तरह इसे आराम आ जाए. और मैने चाय के लिए पूछ लिया....वो ना कहता हुआ उठ खड़ा  हुआ...पर मैने ही जबरदस्ती की...'दो मिनट में बन जायेगी..पी लीजिये....अच्छा लगेगा " 
वो संकोच से भर उठा.."आप रहने  दीजिये....दवा से आराम आ जायेगा.."

"आप बैठिये....मैं बनाती हूँ.." कहती मैं किचन में चली गयी....चाय लेकर आई तो ऐसे लगा ही नहीं..मैं किसी अजनबी के सामने बैठी हूँ....शायद महीनो से उसका चेहरा देखते रहने के आदी मन ने उसे अपरिचित मानने से इंकार  कर दिया था. 
जिस लड़के से मैं इतना संकोच करती थी...पर्दा खींच दिया करती थी....बातचीत की शुरुआत मैने ही की...और कुछ ही मिनटों  में उसने सब बता दिया...'वो एक कॉल सेंटर में काम करता है...अकेला रहता है.....खाना-पीना बाहर ही खाता है..चाय तक नहीं बनाता'. और मैं उसे किसी पुराने परिचित की तरह सलाह देने लगी...'कम से कम एक हीटर ही रख लीजिये...चाय तो बन सकती है.....कभी मैगी भी बना सकते हैं.."
"वो तो रख लूँ...पर बर्तन भी तो धोना पड़ेगा..फिर चाय के लिए दूध लाओ ..उबालो..वो कहाँ रखो...ये सब झंझट मुझसे नहीं हो पाता "
"हाँ...कभी जिंदगी में किया नहीं होगा ना...घर पर तो राजशाही ठाठ होगी..सबकुछ हाथों में मिलता होगा....." जैसे मैं अपने किसी कजिन को डांट रही थी..
 वो मुस्कुरा कर चुप हो गया...जैसे घर  की यादों में खो गया हो..फिर थोड़ी देर बाद बोला.."सच कहा आपने..एक छोटी बहन है.. ऋचा. ..बहुत ख्याल रखती थी..बिना कहे सब कुछ हाज़िर...कभी-कभी तो मन होता है सब कुछ छोड़कर चला जाऊं...बहुत मिस करता हूँ...सबको..माँ .पापा.. ऋचा .." और अचानक चुप हो गया..लगा जैसे आगे बोलेगा तो गला रुंध जाएगा...या फिर आँखों में पानी आ जायेगा...मैं समझ सकती थी बीमारी में घर बड़े जोरों से याद आता है....मेरी शादी को छः साल हो गए...सासू माँ बहुत अच्छी हैं फिर भी जरा सा बुखार भी आए तो माँ याद आती थी...मैं भी चुप रही.
चाय के बाकी घूँट उसने ख़ामोशी में ही भरे और कप रखकर  खड़ा हो गया..."थैंक्स तो बहुत छोटा सा शब्द है...आपने दवा भी दी..और चाय भी पिलाई...अभी से ही बेटर फील कर रहा हूँ...डोंट हैव एनफ वर्ड्स टु  थैंक यू.....रियली आई मीन इट "

उसके जाने के बाद मन जाने कैसा हल्का-फुल्का हो आया...एक ख़ुशी सी तारी थी...बड़े दिनों बाद इस दैनंदिन एकरसता से अलग कुछ किया था. किसी के काम आई थी...किसी की छोटी सी मदद की थी या फिर बस रूटीन से कुछ अलग किया था...पता नहीं किस बात का संतोष था...पर मैने बड़े मन से साफ़-सफाई की..घर की सजावट बदली...हालांकि सजावट भी क्या बदलनी...बस इधर की चीज़ें उधर कर दो हो गया बदलाव..फ़्लैट में जगह ही कहाँ होती है...हर चीज़ की जगह फिक्स्ड है. बड़े शौक से आलू-पराठे बनाए...'वरना रोज़ दाल-सब्जी रोटी बना कर रख देती थी. कभी नरेश शिकायत भी करते तो कह देती....'इतनी  आरामदायक  लाइफस्टाइल  है, आपकी.. कोई वाक नहीं...एक्सरसाइज़ नहीं..सादा खाना ही ठीक है.' नरेश ने भी शायद अतिरिक्त उत्साह को लक्ष्य किया...एकाध बार मेरी तरफ देखा..पर फिर रिमोट उठा कर चैनल बदलने लगे. मेरे मन में उहा-पोह थी..नरेश को बताऊँ या नहीं...पता नहीं शायद डांट दें...पर आजतक कभी कुछ छुपाया भी नहीं...और मैंने सोचा ,'बता देती हूँ..एक बीमार की मदद की है...अगर डांट भी खाई तो किसी अच्छे काम के लिए "
सोफे पर बैठ कुशन गोद में रख लिया..'सोच ही रही थी कैसे शुरू करूँ कि नरेश का मोबाइल बज उठा...इतना गुस्सा आया...हर बार यही होता है...कुछ भी कहने जाती हूँ और मोबाइल पहले उन्हें अपनी तरफ खींच लेता है...और मैं गुस्से में कुशन फेंक उठ गयी ..गुडिया पर चिल्लाने लगी..'चलो सो जाओ अब..उठने में देर करोगी.." नरेश के चेहरे पर गुस्सा झलक उठा इशारे में कहा.."बात कर रहा हूँ न' और कमरा जोर से बंद कर लिया...

दूसरे दिन मैं बार-बार खिड़की से झांकती आखिर एक बजे के करीब वह नज़र आया...इस बार मुझे उसकी तरफ सीधा देखने में कोई झिझक नहीं हुई. मैने ही हाथ के इशारे से पूछा.."कैसा है अब?"
उसने आँखें बंद कर सर हिलाया..'बिलकुल ठीक..." 
अगर जरा जोर से पूछती तो उस तक आवाज़ जरूर चली जाती पर पता नहीं कितने कानो से होकर गुजरती. थोड़ी देर टेरेस पर टहल कर वह चला गया. मैं भी अपने काम में लग गयी...अब वो लुका-छिपी का खेल बंद हो गया था. दूसरे दिन वह नीचे बस स्टॉप पर फिर मिला और थोड़ा झिझका हुआ था...पहले दिन वाली  आत्मविश्वास से भरी मुस्कराहट मिसिंग थी. गुड़िया की बस जाते ही पास आकर बोला..."आपको शुक्रिया कहना चाहता था...बहुत फायदा हुआ उस दवा से...और हाँ चाय से भी.."
"थैंक्स तो आपने उस दिन ही कह दिया था.."
"हाँ....उस दिन का थैंक्स दवा देने के लिए...और आज का थैंक्स असर करने वाली दवा देने के लिए.." मुस्कुरा रहा था वह.
"अरे..तो अगर दवा असर नहीं करती तो थैंक्स कैंसल.." बड़े दिनों बाद या शायद इस शहर में पहली बार मैं इतना चहक कर बात कर रही थी....
उसने भी शैतानी से कहा...."पता नहीं..."
और मैं जोर से हंस पड़ी...उसने भी साथ दिया...अपनी हंसी की आवाज़ ही बेगानी सी लगी....कितने दिनों बाद मैं खुलकर हंसी थी..."चलिए अपना ख्याल रखिए...." कहती मैं आगे बढ़ गयी....मन तो हो रहा था..फिर से चाय के लिए बुला लूँ...और खूब गप्पे मारूँ...पर इतनी हिम्मत नहीं थी. 
"श्योर मैम एन थैंक्स अगेन.."
उसके फिर से थैंक्स कहने पर गुस्से में  देखा उसे तो वह खिसियानी सी हंसी हंस दिया.

अभी भी वो टेरेस पर नज़र आता...कपड़े उठाते डालते दिख जाता .मैं  मुस्कुरा देती....प्रत्युत्तर में वो भी मुस्कुरा देता...बस. 
और एक सप्ताह भी नहीं गुजरे...कि एक दिन फिर से दिखा.... "हलो..कैसी हैं?"
"ठीक...और आप.."
"ठीsssक  ही हूँ मैं भी"....उसने ठीssक  को लम्बा खींचते हुए कहा....और बोला..'बिटिया बड़ी प्यारी है....क्या नाम है उसका...?" 
"मेघना...घर में उसे गुड़िया बुलाते हैं..."
"है भी बिलकुल गुड़िया सी....अच्छा टाइम पास हो जाता होगा..आपका....देखता हूँ...बहुत चंचल है.."
"हाँ....बहुत शैतान  है...पर स्कूल चली जाती है तो पूरा दिन काटना मुश्किल हो जाता है....बोर हो जाती हूँ,बिलकुल.."
"हम्म....मैं भी बहुत बोर हो रहा था.....पर आप एक बात बताइए...सिर्फ सरदर्द होने पर ही आप चाय पिलाती हैं. '
मैं  मुस्कुरा उठी...पर एकदम से हाँ  नहीं कह सकी....दिल कह रहा था...'हाँ' कह दो..दिमाग कह रहा था..'क्या जरूरत है?' पर इस रस्साकस्सी में जीता दिल ही...'हम्म तो चाय पीनी है आपको.."
'अदरक इलायची डली....पर अगर आप अनकम्फर्टेबल हैं... तो  रहने दीजिये.."
"नहीं..नहीं...कोई बात नहीं...आइये "
कहते मैं आगे तो बढ़ गयी...पर दिमाग कोंचे जा रहा था...'क्या जरूरत थी...मैं उसे जानती ही कितना हूँ....ये ठीक  है क्या'...और दिल उसे बराबर जबाब दिए  जा रहा था...'इसमें गलत भी क्या है....पिछले छः महीने से रोज ही तो दिखता है....घर पर भी आ चुका है...क्या इतना चेहरा नहीं पढ़ सकती...बदमाश तो नहीं दिखता...एक कप चाय पी लेगा...कोई बात करने वाला मिल जाएगा...थोड़ा समय काट जाएगा...इसमें बुराई क्या है..."

मुझे यूँ चुप देख वो बोल पड़ा..."आप रहने दीजिये...लगता है आप कम्फर्टेबल नहीं हैं....वैसे भी एक अजनबी को ऐसे घर में नहीं आने देना चाहिए...बट थैंक्स.. हाँ कहने के लिए....चलता हूँ..."
"आप अजनबी नहीं हैं...और थैंक्स चाय पी कर ही दीजियेगा..." मैने एक निश्चय के साथ कहा.... मन की दुविधा हट चुकी थी.
चाय बनाने गयी तो मन हुआ ब्रेड रौल भी सेंक दूँ....अकेला रहता है..उसे कहाँ मिलता होगा...अभी तो सो कर उठा  है...कुछ खाया भी नहीं होगा...गुड़िया को टिफिन में बना कर दिया था सब कुछ सामने ही पड़ा था पर फिर रुक गयी...उसे कहीं ऐसा ना लगे ज्यादा ही स्वागत कर रही हूँ..और प्लेट  में बस बिस्किट डाल कर ले गयी.

चाय की चुस्कियों के साथ जो बात शुरू हुई..पूरे दो घंटे चली...और मैने उसके बारे में सब जान लिया....ग्रेजुएशन के बाद वो कॉल सेंटर में जॉब करके एम.बी.ए. करने के लिए पैसे जमा कर रहा है. उसके घर में माता-पिता और एक छोटी बहन है. बहन को लेकर बहुत अरमान हैं उसके. माता-पिता को भी जिंदगी के सारे सुख देना चाहता है...खुद भी बड़ा आदमी बनान चाहता है..मेहनत करना चाहता है. यहाँ बिलकुल अकेला है...जानबूझकर ज्यादा दोस्ती भी नहीं करता ..ऑफिस से हर वीकेंड लड़के घूमने-घामने फिल्मे देखने..पिकनिक-पार्टी  का प्लान बनाते हैं..पर यह पैसे बचाने के लिए अक्सर कन्नी काट जाता है.
 बातों बातों में मेरे बारे में  भी उसे काफी कुछ पता चल ही गया कि मायके और ससुराल एक ही शहर में है. शादी के बाद अब तक सास-ससुर के साथ ही थी .अपनी हथेली की रेखाओं की तरह जाना-पहचाना अपना शहर...जहाँ बचपन से अब तक का समय गुजारा...इस बड़े शहर के तौर-तरीके समझ नहीं पा रही थी. 
 उसने आश्वस्त भी किया..."बहुत जल्दी ये शहर भी अपना लगने लगेगा..इस शहर की खासियत है...लोग इसे अपनाएँ या नहीं...यह लोगों को बड़ी जल्दी अपना लेता है. 
"आsss मीन ."
'अरे वाह!
 बड़े दिनों बाद किसी के मुहँ से ये शब्द सुना..."
"मैने भी बड़े दिनों बाद ये शब्द कहा है...." कहते एक उदासी सी तिर  आई आवाज़ में ...उसने भी लक्ष्य किया....थोड़ी देर चुप रहा...फिर बोला..."आप दिन में काफी अकेलापन महसूस करती हैं ना....देखता हूँ...आप कहीं आती -जाती नहीं...सर तो सिर्फ सन्डे को ही दिखते हैं...."
"हाँ..कहाँ जाऊं....आस-पास सब जॉब वाली हैं....और किसी से कोई परिचय नहीं....बस सब्जी लेने जाती हूँ.." चाह कर भी मैं उदासी झटक नहीं पा रही थी...स्वर से..
उसने हँसते हुए कहा..."अगर आप ऐसी ही बढ़िया चाय पिलाती रहें तो मैं कभी-कभी गप्पे लगाने आ सकता हूँ...पर इत्मीनान रखिए रोज नहीं धमकुंगा ."
'आपसे सच में बात करके बहुत अच्छा लगा..." मैने सारा संकोच परे रख कर कह डाला. 
वो मुस्कुरा कर चुप हो गया और बोला..."मुझे भी याद नहीं जमाने के बाद किसी से यूँ खुलकर बातें की हैं...पर अब मुझे जाना होगा....कपड़े साफ़ करने हैं...शाम को ऑफिस की तैयारी करनी है. एन थैंक्स अलॉट..चाय सचमुच बहुत बढ़िया थी..आपको अगर बुरा ना लगे तो मेरा नंबर ले लीजिये....जब भी आपका दिल करे आप एक कॉल कर लीजिये...दिन में तो मैं फ्री ही रहता हूँ...बातें भी हो जायेंगी...और आपको चाय भी नहीं पिलानी पड़ेगी.." 
"आप मुझे इतना कंजूस समझते हैं... "मैने नकली गुस्से से कहा 
"जस्ट जोकिंग बाबा..." उसने जेब से पेन निकाला और एक लौंड्री के बिल पर अपना नंबर लिख कर पकड़ा दिया...नाम लिखा था..'रोहित' 
अब जाकर मुझे ध्यान आया मैं एकदम से माथे से हाथ लगा कर बोल पड़ी..."हे भगवान....मैंने अब तक आपका  नाम तक नहीं पूछा था..."
"ना तो मेरा नाम जानती हैं आप, ना पता....और घर बुलाकर चाय पिला दिया...सोच लीजिये कहीं मैं कोई चोर डाकू निकला तो.." शरारत झलक रही थी उसके स्वर में...मुझे गुस्सा आ गया...जोर से बोली 
"एक्सक्यूज़ मी...मैने आपको नहीं बुलाया था...आप खुद आए थे...और इतना मुझे लोगों की पहचान है.."
उसने मुस्कुरा कर बोला.."सच में..."
उसकी ये मुस्कान मुझे असहज कर गयी....मुझे चुप देख वो सीरियस हो गया और  बोला..." दुनिया में इंसानियत भी कोई चीज़ होती है.....और शायद वही असली पहचान है......जी ' हाथ घुमा कर उसने मेरा नाम पूछा....
'नीलिमा..."
"नीलिमा जी..अपना ख्याल रखें....और जब भी चाहे मुझसे बात कर सकती हैं....फिर थोड़ा रुक कर बोला.."मुझे अच्छा लगेगा ..बाय.."
"बाय..." और वह चला गया.

मैने तुरंत ही उसका नंबर सेव कर लिया....रोज ही स्क्रीन पर नंबर निकाल कर घूरती रहती...और एक दिन नंबर मिला ही दिया...उसकी 'हलो'  सुनते ही घबरा कर फोन रख दिया...
दो मिनट बाद ही फिर उसका कॉल आया...जब मैने अपना नाम बताया तो  चौंक गया...ओह!! ..आss प ..गलती से तो नहीं लग गया...क्यूंकि आपने तुरंत काट दिया था फोन.."
"नहीं अपने आप कट गया था.."
"ओके..क्या कर रही हैं..."
और फिर बातों का सिलसिला चल निकाला...करीब आधे घंटे तक बातें हुईं...फिर मैने फोन रख दिया...

दूसरे दिन साढ़े बारह के करीब एक स्माइली के साथ गुड़ मॉर्निंग का उसका एस.एम.एस आया....और फिर तो यह रूटीन ही हो गया...वो रोज दोपहर में  एक एस.एम.एस करके जता देता कि जाग गया है...फिर कभी मैं फोन कर लेती...कभी वो...कभी-कभी वो मेरा फोन नहीं उठाता और तुरंत ही कॉल बैक करता...मैं समझ जाती सोचता है..सिर्फ मेरे ही पैसे क्यूँ खर्च हों....फिर ये रोज का ही सिलसिला हो गया. रोज फोन करके वो अपनी पूरी बात बताता....उसके बॉस...उसके फ्रेंड्स... साथ काम करने वाली लडकियाँ....सबको मैं जान गयी थी. एक नई दुनिया सी खुल रही थी मेरे सामने...ऑफिस की ऐसी -ऐसी बातें बताता कि मैं दंग रह जाती. लड़कियों का यूँ खुलेआम सिगरेट-शराब पीना मेरे लिए नई बात थी. लिव-इन  रिलेशन के बारे में मैने सिर्फ सुना भर था..उसके ऑफिस के दो कुलीग लिव-इन-रिलेशन में थे. 

मैं भी...गुड़िया का खांसी-जुकाम....उसकी पढ़ाई...स्कूल टेस्ट...प्रोजेक्ट वर्क...सबकी चिंता उसी के साथ बांटती...कभी-कभी नरेश की शिकायत भी कर देती....कि जरा भी ध्यान नहीं देते घर की तरफ .. तो मुझे समझाता...'आपको नहीं पता...इस शहर में ऐसे कम्पीटीशन के युग में सर्वाईव करना कितना मुश्किल है...सर को काम का प्रेशर रहता है...ऑफिस की टेंशन..फिर आप पर उन्हें भरोसा भी है कि आप सब संभाल लेंगी..." 
कभी कभी तो मैं कह भी देती.."तुम उनके दोस्त हो या मेरे...??" 
"दोस्त तो आपका ही हूँ...इसीलिए आपको दुखी नहीं देख सकता...."
उसका इतना कहना मुझे अंदर तक भिगा जाता. इसके पहले कभी किसी ने मेरा इतना ख्याल नहीं रखा था. मेरे सुख-दुख की नहीं सोची थी...मेरी बातें इतनी ध्यान से नहीं सुनी थीं...ना ही अपने जीवन की हर छोटी बड़ी बात शेयर की थी. 
कब आप से तुम पर अ आगई थी..पता ही नहीं चला...उसके लिए आप मेरी जुबान पर चढ़ता ही नहीं..."
अब वो घर पर नहीं आता..हमारी बात फोन पर ही होती. 

गुड़िया कब से पानी-पूरी बनाने की जिद कर रही थी. अक्सर कहती 'हेतल'  की मम्मी हमेशा बनाती है..तुम नहीं बनाती...पर उनलोगों का तो वो रात का डिनर ही हो जाता  . नरेश को ये चाट-पानी पूरी जैसी खट्टी चीज़ीं पसंद नहीं थीं. और गुड़िया तो बस दो-चार ही खाएगी. इतना ताम-झाम करो और फिर रात का पूरा खाना भी बनाओ....इतना झंझट करने का मेरा मन नहीं होता,पर गुड़िया की फरमाइश कब तक टालती. बनाना ही पड़ा. नरेश ने बड़ी मुश्किल से अहसान करके पाँच पानी-पूरी खाई बस...सारा बच गया और मैने रोहित को दूसरे दिन बुला लिया. रोहित ने इतने पसंद से खाया और इतनी तारीफ़ की कि मेरा बनाना सार्थक हो गया. इसके बाद तो कोई भी अच्छी चीज़ बनाती तो रोहित के लिए रख देती....

वो थोड़ी ना-नुकुर भी करता आने में पर जो भी दो बड़े पसंद से खाता और कहता.."आप मेरी आदतें बिगाड़ रही हैं"
"शादी के बाद अपनी बीवी से अच्छी अच्छी चीज़ें बनवा कर खिलाना....हिसाब बराबर हो जायेगा "
वो संजीदा हो जाता.."पता नहीं....कैसी लड़की मिले....डर लगता है कभी-कभी..अगर ना निभे तो.."
"तुम कोई नई बात नहीं कह रहे...सब लड़के शुरू में ऐसे ही डरते हैं....और शादी के बाद बीवी के पालतू बन जाते हैं.."
"एक्सपीरियंस बोल रहा है..." वो मजाक करता..
"हमारी बात छोडो..हमारा जमाना अलग था.."
"आप एक मिनट में छलांग लगा कर दादी माँ का लबादा ओढ़ लेती हैं...जैसे सौ साल बड़ी हैं मुझसे.."
'बड़ी तो हूँ ही..."
"आपकी जल्दी शादी हो गयी...बच्ची आ गयी इसीलिए??...मेरी हमउम्र ही होंगी आप..."
"हाँ, मेरी शादी हो गयी है.... एक बच्ची है...मैं तुमसे बड़ी हूँ...बस  बात ख़तम...." एक-एक शब्द पर जोर देते हुए मैने झूठे रोष से कहा तो वो एकदम से हंस पड़ा...
"'आप एक मिनट में दादी माँ से छोटी सी बच्ची भी बन जाती हैं..."
मन हुआ कुछ उठा कर कुछ दे मारूँ...पर ध्यान आया उसके हाथ में खीर की कटोरी है...गिर जायेगी  और फिर मुझे ही साफ़ करना पड़ेगा.

ऐसी ही बेमतलब की बातों में समय गुजर जाता...अगर पलट कर याद करना चाहो तो याद भी ना आए..क्या बातें की थीं...
"एक दिन उसका फोन आया.."मुझे आपकी मदद चाहिए....प्लीज़ ना मत कहियेगा.."
"काम तो बोलो.."
"नहीं.. पहले आप हाँ कहिए..."
"हाँ बाबा...बोलो तो सही..." और मुझे पता नहीं था..किस बात के लिए मैने हाँ कह दी थी...रोहित का कोई दोस्त उसके शहर जा रहा था और रोहित उसके हाथ से ऋचा के लिए ड्रेस और माँ के लिए साड़ी भेजना चाहता था...खरीदने में मेरी मदद चाहिए थी उसे. मैं एकदम सकते में आ गयी. फोन पर बात करना...कभी-कभार उसका घर आ जाना अलग बात थी...पर साथ में बाज़ार जाना...उसकी ये जिद स्वीकार करना मुश्किल हो रहा था...और वो था कि मान नहीं रहा था..
."आपकी  हेल्प के बगैर नहीं खरीद  पाऊंगा..ऋचा  कितनी खुश हो जाएगी..प्लीज़ बस घंटे भर के लिए...समय निकालिए...अभी तो दो ही बजे हँ...गुड़िया तो छः बजे आएगी..कुल चार घन्टे हैं...प्लीज़..प्लीज़ ....यहीं  से मुझे ऋचा का खुश खुश  चेहरा दिख रहा है...महल्ले  भर को दिखाती फिरेगी..और इतरा कर कहेगी 'मेरे भैया ने भेजा है '

अब मेरे लिए मना करना मुश्किल हो गया. मैने भी कई पहलू से सोचा..'जाने में कोई हर्ज़ तो नहीं...यहाँ कोई मुझे पहचानता भी नहीं...जो रोहित के साथ देख कर उल्टा-सीधा सोचे. फिर मेरा भी फायदा है...खुद के लिए भी कुछ ले लूंगी...आजकल मॉल्स में जाना हो ही नहीं पाता. 
और मैं पास के एक मॉल में रोहित के साथ चली गयी . ऋचा के लिए जींस सेलेक्ट करते समय अचानक रोहित ने कहा.."आप भी क्यूँ नहीं अपने लिए एक जींस ले लेतीं.."
"ना बाबा...मैने तो शादी के  बाद से कभी पहना ही नहीं.."
"तो अब पहन लीजिये...यहाँ कौन से आपके ससुराल वाले हैं.."
"नरेश को भी पसंद नहीं.." मैने बात टालनी चाहिए पर वो पीछे ही पड़ गया...
"आपने जब कभी पहना ही नहीं...तो आपको कैसे पता..उन्हें नहीं पसंद....ऑफिस से आएँ तो उन्हें सरप्राइज़ कर दीजियेगा...जींस-टॉप में दरवाज़ा खोल कर...एकदम रानी मुखर्जी की तरह,...वो फिल्म याद है..'कभी अलविदा ना कहना " 
मुझे हंसी आ गयी....पर वो जान छोड़ने वाला नहीं था..."रानी मुखर्जी ने दरवाज़ा खोला तो उसके ससुर जी सामने थे...आपका तो यहाँ कोई नहीं...इसलिए नो खतरा..अब बस एक लीजिये...और ट्राई कर के देखिए "..
"रोहित, यहाँ तुम ऋचा और माँ के लिए कपड़े लेने आए हो ना..."
" हाँ..तो ऐसा नियम है क्या कि दूसरों के लिए नहीं लिया जा सकता...?"
उस से बहस  ही बेकार थी...चुप ही रही...ऋचा के लिए जींस और टॉप देखते रहे हम...मुझे लगा...बात आई-गयी हो गयी...पर उनमे से ही एक  जींस और टॉप सेलेक्ट कर उसने मुझे पकड़ा दी..."जाइए ट्रायल रूम में ट्राई कर के देखिए "
"रोहित ..प्लीss ज़ .."
"ट्रायल रूम उस तरफ है...और हाँ मुझे भी दिखा लीजियेगा...नहीं अच्छा लगेगा तो बता दूंगा..वरना बेकार में आपके पैसे बर्बाद होंगे ." .मुझे बता कर वो फिर हैंगर में लगे कपड़े देखने लगा...मुझे जाना ही पड़ा.
आइने में जैसे मैं खुद को ही नहीं पहचान पा रही थी...मुझ पर सूट ही कर रहा था...फिर भी आशंकित थी...शायद रोहित कह दे नहीं अच्छा लग रहा..तो झंझट ख़तम...
बाहर निकल धीरे से पुकारा..'रोss हित ."
 देख कर ,रोहित ने  कहा कुछ नहीं..बस तर्जनी और अंगूठे को मिलाकर  इशारा किया...'बढ़िया.'....और किसी फैशन डिज़ाईनर की तरह मुआयना करता रहा..."दिस  पिंक कलर  टॉप इज टू गर्लिश....ब्लू कलर अच्छा लगेगा..और ये टॉप ज्यादा लॉन्ग नहीं है? "
"नहीं...मैं एकदम से शॉर्ट नहीं पहन  सकती "
 "ओके...पर टॉप  ब्लू कलर का ले लीजिये...ज्यादा अच्छा दिखेगा..." और फिर वो कपड़ों के रैक की  तरफ मुड गया.

मुझे अपनी बहनों की याद आ गयी...शादी से पहले ऐसे ही हम एक दूसरे को अपने कपड़े पहन  कर दिखाया करते थे और मीन-मेख भी निकालते..सराहना भी करते...जमाना हो गया...वो सारी आदतें छूट गयी .
ऋचा के लिए कपड़े..माँ के लिए साड़ी लेकर वापस लौटते हुए हम कैफे के सामने से गुजरे और रोहित ने कहा..'एक कप..चलेगी?...अभी तो टाइम है.."

वहाँ बड़ी-बड़ी आरामदायक कुर्सियों पर सब ऐसे फ़ैल कर बैठे थे कि मेरे दुखते पैर ललचा उठे...नथुनों में कॉफी की महक भर रही थी..और दिमाग ने सोचना  बंद कर दिया. मेरे कदम अपनेआप उधर मुड गए. रोहित कॉफी ऑर्डर करने के लिए काउंटर पर ही रुक गया....मैं एक खाली मेज ढूंढ कर बैठ गयी.... यूँ पहली बार मैं इतना निश्चिन्त हो किसी कैफे में बैठी थी. नरेश के साथ जाती तो पूरे समय हम गुड़िया की देखभाल में ही लगे होते. नरेश नाराज़ होते रहते..' उसने ये गिरा दिया है..देखो..उसका मुहँ साफ़ करो.." और गुड़िया का रोना उसकी जिद...नरेश का मूड ख़राब कर देती...वे मुहँ बनाये बैठे रहते...और वहाँ बैठना एक बोझ सा लगने लगता. इस मारे अब बाहर चलने के लिए उनकी खुशामद करना भी छोड़ दिया था...पैसे भी बिगाड़ो और मूड भी खराब करो..
पर मैं आज पूरे आत्मविश्वास के साथ अकेली बैठी थी. खुद को जैसे पहली बार पहचान  रही थी. कोई डर नहीं..संकोच नहीं...इन सारी आधुनिक वेशभूषा में  सजे लड़के-लड़कियों के बीच मैं जरा भी असहज नहीं महसूस कर रही थी. ये इतना बड़ा परिवर्तन कैसे आ गया मेरे व्यक्तित्व में ?..कुछ ही दिनों पहले...अगर भीड़-भाड़ में नरेश आँखों से ओझल हो जाते तो मैं कितना घबरा जाती थी ..बेचैनी से निगाहें उन्हें ढूँढने लगतीं थीं . पर अब तो लगता है...रोहित  साथ ना भी  हो तो भी अकेले कॉफी पी सकती हूँ,यहाँ . आजकल दिल में एक उत्साह सा भरा होता है...कुछ करने की तमन्ना होती है. और यह सब मेरे चेहरे पर भी जरूर दिखाई देता होगा. जब पार्क में गुड़िया के साथ जाती....तो कभी उसके पीछे भागती..कभी दूसरे बच्चे की बॉल उठा उसे दे देती...दूसरी लेडीज़ भी थैंक्यू कहते बात शुरू कर देती हैं. पहले जरूर मेरे चेहरे  पर खीझ, ऊब..नाराज़गी  के मिले-जुले भाव होते होंगे जो अनजान लोगों को भी थोड़ी दूर पर ही रोक देते होंगे. 
एक  दिन उस बच्चे को बस स्टॉप पर आने में देर हो गयी..और मैने बस रुकवा कर रखा...वो बच्चा भागता हुआ आया तो मैने उसे सहारा देकर बस में चढ़ा दिया..पीछे से उसकी थ्री फोर्थ में रहनेवाली माँ ..शुक्रिया कहते नहीं थक रही थी...ऐसे भी बुरे लोग नहीं हैं यहाँ के...एक कोशिश करने की जरूरत है. इन्हीं ख्यालों में  खोयी थी कि रोहित आ गया. उसकी तरफ एक मुस्कान फेंक फिर मैं बाहर देखने लगी...अभी कुछ भी बात करने की इच्छा नहीं हो रही थी...जो  भी बदलाव मेरे साथ हो रहे थे ..उसे बूँद-बूँद महसूस करने की कोशिश कर रही थी. 

थोड़ी देर बाद नज़रें घुमाई तो पाया रोहित भी खोया हुआ सा है. उसकी नज़रों का अनुसरण कर देखा...दूर एक टेबल पर  दो सुन्दर सी लड़कियां बैठीं थीं...उन पर ही उसकी नज़रें जमी हैं. यूँ ही टेबल पर खट-खट किया..तो रोहित चौंक गया...मुझे मुस्कुराते देख...झेंप कर कहा.." लोग कहते हैं लडकियाँ डायटिंग करती हैं...पर वे दोनों कितना सारा खा रही हैं...यही देख रहा था.."
"मैने कब कहा...कि तुम कुछ और देख रहे थे..." हंसी आ गयी थी,मुझे.
"चलिए कॉफी पर कंसंट्रेट कीजिए..." खिसिया कर रोहित बोला...कॉफी आ गयी थी.

रोहित से मुश्किल से दिन में एक घंटे बात होती पर बाकी के तेइस घन्टों को नई उर्जा दे जातीं.कभी-कभी बात नहीं भी होती...फिर भी मैं पहले सा उदास...डिप्रेस्ड नहीं महसूस करती. आज गुड़िया को बस स्टॉप पर छोड़कर कुछ खरीदने गयी तो वहाँ रोहित भी था...हम थोड़ी देर बाहर बात करते रहे...पर बड़ी धूप थी...मैने कहा...." चलो घर पे बैठ कर  बात करते हैं.."
"मुझे कपड़े साफ़ करने हैं...डिटर्जेंट लेने आया था...."
"तुम और तुम्हारे कपड़े....एक वाशिंग मशीन ले लो...बस ऑफिस  के बाद एक ही काम करते  हो..कपड़े साफ़ करना...चलो कोल्ड कॉफी बनाती हूँ...मेरा मन हो रहा है....तुम साथ दे देना.."
आजकल मैं उस पर बहुत रौब भी जमाने लगी थी. रोहित चला आया....

कमरे में ए.सी. चला कर मैं कॉफी बनाने चली गयी....रोहित सी.डी. उलट-पुलट रहा था...." अच्छा इसी सी. डी. की बात कर रही थीं आप....यही ली उस दिन??
"हाँ लगाओ न..बड़ी अच्छी गज़लें हैं .." मैं किचन में से ही चिल्लाई..
कॉफ़ी लेकर आयी तब तक रोहित ने स्विच ढूंढ  कर कर सी.डी. लगा दी थी...
जब जगजीत सिंह की आवाज़ में पुरानी  ग़ज़ल कमरे में तैरने लगी तो रोहित ने सर पर हाथ मार लिया.."ओह! आपलोग भी न....किसी भी कवर में कोई सी.डी. डाल देती हैं...ये नए कवर में पुरानी सी.डी है. "
मैंने उसे रोक लिया..."यही चलने दो न..." 'तुमको देखा तो ये ख्याल आया....." मेरी पसंदीदा ग़ज़ल थी.
कॉफी के घूँट भरते हम गज़लें सुनते रहे...रोहित कपड़ों की चिंता में ही उलझा हुआ था....और मैं उसे डांट रही थी..."क्या ग़ज़लों की वाट लगा रहे हो.."
"अरे वाह .तरक्की...यहाँ की भाषा भी जुबान पर चढ़ गयी."
"जैसा  देश वैसा वेश की जगह जैसा देश वैसी भाषा...चलो बाबा तुम्हारे कपड़े तुम्हारा इंतज़ार कर रहे होंगे"...रोहित भी उठ गया...मैं कप्स उठाने के लिए झुकी ही थी कि .जाने कैसे कारपेट में पैर उलझ गया...
"अरे संभालिये...." रोहित ने गिरने से थाम लिया....और एक सनसनाहट  सी दौड़ गयी नसों में....ये कैसा अनचीन्हा सा अहसास था. महज किसी स्पर्श से  ऐसी सुरक्षा...इतना लगाव महसूस किया जा सकता है...नया था मेरे लिए और मानो खुद पर ही वश नहीं रहा...इस अनजाने अहसास ने अपने गिरफ्त में ले लिया था...और इसके तिलस्म में घिरे हम क्षण भर को अपना अस्तित्व भुला बैठे थे...पता नहीं...पहले रोहित की बाहें  मेरे गिर्द लिपटीं या पहले मेरे हाथ उसके कंधे पर टिके......पर ना मैं नीलिमा रह गयी थी...ना वो रोहित...तिलस्म टूटा...उसने मेरे बालों पर हाथ फेर मेरा चेहरा उठाया और एक दूसरे की आँखों में झांकते ही हमारी पहचान लौट आई..मैने रोहित को धक्का दे दिया...और उसने भी हडबडाकर सॉरी कहते अपने हाथ पीछे कर लिए...इस क्रम में कुर्सी से टकरा गयी...गिरते-गिरते बची..फिर से रोहित ने ओह! कहकर बचाना चाहा और मैने उसे जोर से धक्का दिया...वो मेज से टकरा कर गिरने ही वाला था..किसी तरह उसने मेज थाम लिया और मैं भागती हुई बाहर चली आई...

बाहर आपको देखा तो आपके पास चली आई...पर मैं आपके पास..रोहित से भागकर नहीं आई थी....अपनेआप से भाग कर आई थी...रोहित की हिम्मत नहीं थी...मेरे करीब आने की...पर मुझे अपनेआप से डर लग रहा था..कहीं कमजोर ना पड़ जाऊं.....कहीं वापस ना चली जाऊं....रोहित की छुअन मुझे बुरी क्यूँ नहीं लगी...एकदम से मैने क्यूँ नहीं उसका हाथ झटक दिया...पल भर के लिए ही सही..पर मैं कैसे भूल गयी कि मैं शादी-शुदा हूँ...रोहित तो लड़का है...मैं उस से बड़ी हूँ..समझदार हूँ..फिर ऐसा कैसे होने दिया...मुझे अपनेआप से घिन आ रही है....समझ नहीं पा रही...मैने अपना संयम कैसे खो  दिया....मैं बुरी हूँ..सच में बहुत बुरी हूँ...मुझे रोहित से कभी मिलना ही नहीं चाहिए था...उस से कभी बात ही नहीं करनी चाहिए थी...मैं खुश थी..या दुखी थी..जो भी थी,अपनी दुनिया में थी..वहाँ ये  ग्लानि तो नहीं थी. 

उसकी बड़ी-बड़ी आँखों से टप टप बूँदें टपकने लगीं...दया आ गयी  मुझे..."देखो खुद पर इतनी  कठोर मत बनो....जो हो गया..उसे भूल जाओ...और कुछ ऐसी अनहोनी हुई भी नहीं...तुम दोनों ही समझदार हो..तुरंत संभल गए. अब इसे एक दुस्वप्न की तरह भूल जाओ...जितना तुम्हारी बातों से पता चला है....रोहित भी एक शरीफ लड़का है...वो भी तुम्हारी तरह ही शर्मिंदा हो रहा होगा...किसी को दोष देने की जरूरत नहीं...एक पल था जो गुजर गया..बस अब ये सोचो..ऐसा पल दुबारा ना आए...अच्छा लगा सुन...रोहित की सहायता से ही पर तुमने खुद को पहचान लिया है....तुम्हारा आत्मविश्वास लौट आया है....वो  तुम्हारे भीतर ही था...पर  सोया हुआ था...अब इसे दुबारा सोने मत देना...और अपनी जिंदगी बोझिल..उदासी भरी मत बनाओ...अपनी खुशियों के लिए किसी पर निर्भर मत रहो..पति पर भी नहीं......कोई हॉबी  अपना लो...छोटा-मोटा कोर्स कर लो...खुद को व्यस्त रखो...और कुछ सार्थक करो...किसी भी नई जगह में एडजस्ट करने में समय लगता है..." मैं पता नहीं कब तक उसे भाषण  देती रहती पर जोर-जोर से कहीं दरवाज़ा पीटने और ममी-मम्मी की आवाज़ ने चौंका दिया...

"ओह!!! गुड़िया आ गयी..छः बज गए..." और नीलिमा दुपट्टे से मुहँ पोंछती..उठ कर भागी.
मैं भी पीछे-पीछे उठ कर आ गयी....नीलिमा बेटी को गोद में उठाये उसे प्यार कर रही थी.."अरे आज मेरी बिटिया खुद से आ गयी...बड़ी हो गयी अब तो..."
"और क्या..मैं तो लिफ्ट में भी  भी अकेली आ जाती...पर वो गौरव की मम्मी हमारे फ्लोर तक छोड़ गयीं...पता है..आज गौरव को टीचर ने पनिशमेंट दी...ही ही बड़ा मजा आया...उसने रोली की स्केल तोड़ दी थी..." गुड़िया की बातों का पिटारा खुल चुका था..और उसकी बातें सुनतीं नीलिमा अब सिर्फ एक माँ रह गयी थी. 

अपना दरवाज़ा बंद करते नीलिमा ने आँखों में ही आभार जताया...मैने भी मुस्कुराकर सर हिलाया...और वापस आ कर सोफे पर ढह गयी. दिमाग में हलचल मची थी. मेरे विचार गड्ड-मड्ड हो रहे थे . मेरी सारी सोच की नींव हिल चुकी थी.किन- किन  परिस्थितियों से लोग गुजरते हैं और हम तुरंत जजमेंट पास कर देते हैं. हमें उन हालातों का कुछ पता नहीं होता हम बस परिणाम देखते हैं और फैसला सुना देते हैं... कई नाम याद  आ गए..जिन्हें बदचलन...आवारा...कुलक्षनी जैसे विशेषण दिए गए थे..पर पीछे की कहानी किसी को पता थी??....या किसी ने देखने की कोशिश की??... या देखी भी तो उनकी नज़रों से समझने की कोशिश की??....आसान है किसी पर इलज़ाम लगा देना...उसे बदनाम कर देना..
पर हर किसी को तो एक ही जिंदगी मिलती है...उसे भी जिंदगी के हर रंग को महसूस करने का...हर पल को जीने का अधिकार है...वो अपनी जिंदगी बेरंग ही गुज़ार दे...क्यूंकि उसके लिए समाज द्वारा स्वीकृत मसीहा को कोई दिलचस्पी नहीं रंग - कूची और कैनवास में. हर इंसान के दिल में ये तमन्ना रहती है ..कि  कोई उसे सराहे..उसकी प्रशंसा करे....उसकी सुने....अपनी कहे..और जब ये सब मनोवांछित जगह नहीं मिलता तो मन रस्सी तुड़ा भटकने लगता है ..पर क्या ये भटकन जायज है?... इस भटकन की कोई मंजिल है?...मंजिल नज़र भी आए तो वो मरीचिका सरीखी ही होती है....जो दर्द के सिवा और कुछ नहीं दे सकती...कुछ लोगों को इस दर्द का आभास हो जता है...या उन्हें अपनी भटकन ही सही नहीं  लगती...और वे अपने कदम वापस खींच लेते हैं...लेकिन जो इस से बेखबर रहते हैं...उनकी भटकन को दोष दिया जा सकता है? मैं कोई विचार नहीं बना पा रही थी...मेरे संस्कार...मेरे विचारों को एक जोर का झटका लग चुका था. सुना था यह शहर लोगों की जिंदगी बदल देता है.....आज नीलिमा से मुलाकात ने मेरी सोच को भी पूरी तरह बदल दिया था. यही कल तक शायद मैं इस वाकये को सतही तौर पर देखती और नीलिमा को ही दोषी ठहरा देती...पर जिस तरह से पति की बेरुखी ने उसे निराशा के गर्त में धकेल दिया था और रोहित के साथ ने उसमे आत्मविश्वास भरा....उसे जीने  का सलीका सिखाया...मेरा मन संस्कारी होने पर भी उसे गलत नहीं कह पा रहा था .

Monday, January 16, 2012

बंद दरवाजों का सच


(दस जनवरी को मेरे इस ब्लॉग के दो साल हो गए. जैसा कि मैने पहले भी जिक्र किया है...ये मेरा दूसरा ब्लॉग है, 'मन का पाखी ' ब्लॉग पर सिर्फ कहानियां ही पोस्ट करती हूँ....और कहानियों से इतर जो कुछ भी दिमाग में हलचल मचाये उसे इस ब्लॉग पर उंडेल डालती हूँ.  पर हुआ ये कि अपनी-उनकी सबकी बातों में कहानियाँ  कहीं नेपथ्य में चली गयीं...और अपने लिखे जाने का इंतज़ार ही करती रह गयीं....और उनका इंतज़ार ख़त्म होने को ही नहीं आ रहा था....तो अब मैने निश्चय किया कि कहानियाँ भी इसी ब्लॉग पर पोस्ट करना शुरू कर दूँ...ताकि अब अपनी-उनकी-सबकी बातें कुछ इंतज़ार करना सीख लें..)


आज रवि और शालू दोनों ही ऑफिस चले गए हैं...मुझे आए हुए आठ दिन हो गए..आखिर कब तक छुट्टी ले सकते थे, वे. जिस सूनेपन से डर कर मैं यहाँ आना नहीं चाहती थी...वही सूनापन मेरे चारो तरफ पसरा हुआ था. पर बच्चों की भी जिद, उनका स्नेह..उनका आग्रह.. अपने मन को समझाकर आना ही पड़ा. उनका भी मन था..माँ हमारी नई गृहस्थी देखे..माँ को हम नई जगह दिखाएँ. देख कर ख़ुशी ही हुई...ये कल के बेखबर, बेलौस से बच्चे आज जिम्मेदार गृहस्थ बन चुके हैं. दोनों ने मिलकर अच्छी गृहस्थी जमाई है..लगता ही नहीं....बस छः महीने पहले ही शादी हुई है...किचन- ड्राइंगरूम-बेडरूम..यहाँ तक कि बाथरूम भी सारी सुख-सुविधाओं से लैस. एक हमारा जमाना था...शादी के बाद पहली बार, बस एक बड़ा सा काला बक्सा एक अटैची और एक बेडिंग ले कर आई थी...पति के घर. बर्तन के नाम पर सिर्फ एक ग्लास एक प्लेट और एक पानी का जग था,घर में. हर महीने हम पैसे जोड़-जोड़ कर थोड़े थोड़े बर्तन खरीदते. पलंग,कुर्सी, गैस का चूल्हा, फ्रिज ,टी.वी...इतनी सारी चीज़ें जुटाने में बीस बरस  लग गए थे. हर चीज़ को खरीदने के पीछे की तैयारी... महीनो की प्लानिंग..खरीदने का दिन....सब एक कहानी सा याद है. और इन बच्चों को देखो...इतनी  जल्दी सब जुटा लिया...बताया तो था रवि ने, एंगेजमेंट के बाद से ही दोनों ने सामान जुटाना शुरू कर दिया था और शालू भी तो कमाती है...कौन सा अपनी पसंद की चीज़ खरीदने के लिए उसे रवि का मुहँ देखना था. मुझे  तो लम्बी मनुहार करनी पड़ती थी...उसके बाद भी कई बार पति  मेरी  पसंद को खारिज कर देते थे. वे हैं ही इतने जिद्दी...अभी ही कौन सा साथ आए...बहाना बना कर गाँव चले गए. आज साथ होते तो कम से कम मैं यूँ डांव डांव इस कमरे से उस कमरे तो ना डोलती...उनके चाय -नाश्ते का ख्याल रखने में ही समय निकल जाता. शालू खाना बना कर फ्रिज में रख गयी हैं....रवि ,अवन में गरम करके खाना खाने की ताकीद भी कर गया है...बचपन से वो देखता आ रहा है,.खुद के लिए कुछ करने में मैं हमेशा आलस कर जाती हूँ. पर अकेले खाने का मन नहीं हो रहा. भूख भी तो नहीं लगती...बैठे बैठे भूख भी क्या लगे...कितनी देर से बालकनी में खड़ी थी...पर कुछ नज़र भी तो नहीं आता बालकनी से...जहाँ तक नज़र जाए बस ऊँची-ऊँची  बिल्डिंग्स हैं...और सामने गेट...गेट पर बैठा वाचमैन हाथों पर खैनी मलता..रेडियो सुन रहा है. इन वाचमैन की भी ऐश की नौकरी है...जब भी बालकनी से देखती हूँ...या तो वह रेडियो सुनता रहता है या..पड़ोस की बिल्डिंग वाले से गप्पे लड़ाता रहता है. इक्का-दुक्का औरतें आती-जाती दिख जाती हैं...कोई थैले में सब्जी लिए होती..तो कोई बच्चों की बैग उठाये. शालू बता रही थी, आस-पास ज्यादातर नौकरी वाली ही हैं...वे सब तो शाम को ही नज़र आएँगी,अब.

 वापस ड्राइंग रूम में आ गयी. ये बंद दरवाज़ा देख-देख कर कोफ़्त होती है...ऐसे कैसे लोग सारा दिन दरवाजे बंद कर के बैठ सकते हैं. नीचे आते जाते देखा था ...सारे फ्लैट्स के दरवाजे बंद रहते हैं...और उन बंद दरवाजों के पीछे एक सारा संसार होता होगा. इस शहर को तो बंद दरवाजों का शहर कहना चाहिए. मन बिलकुल ही उद्विग्न  हो उठा..और मैने बाहर का दरवाज़ा खोल दिया....थोड़ा आगे बढ़ कर झाँका तो देखा...गोल-गोल सीढियां दूर तक उतरती चली गयी हैं..मानो किसी तहखाने में जा रही हों...रवि का फ़्लैट  है भी तो नवीं मंजिल पर...देर तक उन सीढियों को ताकती रही तो चक्कर ही आ जायेगा. नज़रे हटाकर आस-पास दौड़ाया तो वही नज़ारा. इस फ्लोर पर चार फ़्लैट थे...बाकी तीनो दरवाजे बंद थे, पता भी नहीं चलता किसी फ़्लैट में  कोई है या यूँ ही दरवाज़ा बंद है...ताला भी तो नहीं लटकता कि पता चले कुछ. बस जोर से खींचो और दरवाज़ा बंद. दरवाजे में ही चाभी  घुमाओ और दरवाज़ा खुल जाएगा..अजीब है सब कुछ. अभी कुछ ही पल हुए थे, मुझे वहाँ खड़े हुए कि सामने वाले फ़्लैट  के भीतर से कुछ  आवाजें आने लगीं...पर सिर्फ तेज़ भागते कदमो की..कुर्सी खडखडाने की....इतनी जोर से मन डर गया...पूरी बिल्डिंग सुनसान...और इस बंद दरवाजे से ये आवाजें...कोई आदमी अपनी पत्नी को पीट तो नहीं रहा...पर चिल्लाने..नाराज़ होने का कोई स्वर नहीं सुनाई पड़ रहा...या कहीं दो बच्चे धमाचौकड़ी मचा रहे हों...या लड़ रहे हों...पर बच्चे इतना चुप रह कर कैसे लड़ सकते हैं. मन हुआ अंदर जाकर दरवाज़ा बंद कर लूँ...पर पैर जैसे वहीँ जम गए थे..इतने में ही भड़ाक से वो दरवाज़ा खुला और एक लड़की सीधी दौड़ती हुई..मुझे भी पार कर मेरे पीछे, मेरे फ़्लैट का दरवाज़ा पकड़ कर हांफती हुई सी खड़ी हो गयी. एक छाया सी दीखी उसके फ़्लैट में और फिर सब शांत...बीस-पच्चीस के आस-पास की उम्र होगी...ख़ूबसूरत सी थी....नीली सलवार कमीज पहन रखी थी..पर दुपट्टा नहीं था...बाल बिखरे हुए थे और वह एक हाथ से दरवाज़ा थामे नीचे सर झुकाए जोर -जोर से हांफ रही थी. 

"क्या हुआ.." मैने पूछा...उसने नज़रें उठा कर मुझे देखा...और उन हिरणी सी बड़ी बड़ी आँखों में तेजी से पानी भरना  शुरू हो गया. होंठ काँप से रहे थे...ध्यान दिया...उसका पूरा बदन ही थरथरा रहा था . मैने उसके कंधे पर हाथ रखा...और उसकी आँखों से धार बंध गयी...तभी उसके फ़्लैट में कुछ आहट हुई...और वह डर कर थोड़ी सी और सिमट गयी...मेरी पीठ थी उसके दरवाजे की तरफ...पलट कर देखा..तो एक छाया सी दीखी जो तेजी से सीढियां उतर गयी...नवीं मजिल से सीढियां??... पर लिफ्ट के लिए उसे मेरे सामने आना पड़ता. मेरा  हाथ अभी भी उसके कंधे पर ही था...हाथ के अंदर ही एक कम्पन सा महसूस हुआ.

"क्या हुआ...बेटी?" ..कौन था ये??..तुम्हारा पति?"

"ना..." उसने सिर्फ सर हिलाया....और कन्धा जोर से हिला..उसने एक सिसकी ली थी.

"ओह! तो कोई अजनबी था...." ..पल भर में अखबारों में पढ़े किस्से आँखों के सामने घूम गए...जिसमे कहीं गैस का सिलेंडर देनेवाला..तो कहीं सामान लाने वाला..घर में अकेली औरत को देख कर छेड़खानी पर उतर आया था. अगर ऐसा कुछ है..तब तो शोर मचा कर उस आदमी को तुरंत पकडवा देना चाहिए.

पर उसने इस बार भी.." ना " कहा..और गर्दन थोड़ी और झुका ली.

अब मैं असमंजस  में थी...ये लड़की ना तो कुछ बोल रही थी...ना वहाँ से हिल रही थी..चुपचाप रोये जा रही थी.
 कुछ पल ऐसे ही  गुजर गए...फिर मैने पूछा.."पानी पियोगी..आओ बैठो थोड़ी देर मेरे पास..."

अब जैसे वो भी होश में लौटी...कुछ पल अनिर्णय की स्थिति में खड़ी  रही...फिर नज़रें झुकाए ही बोली "आती हूँ....चाभी  ले आऊं " .  ऐसी मनःस्थिति में भी उसे ये होश था कि चाभी  नहीं लिया तो उसके फ़्लैट का दरवाज़ा बंद हो जाएगा...और फिर वो बाहर ही रह जायेगी. रवि और शालू मुझे भी कई बार ताकीद कर गए थे...अगर नीचे गार्डेन में जाना तो चाभी  लेना मत भूलना. शालू ने तो अपनी ऑफिस की महिलाओं के कितने सारे किस्से सुना दिए थे कि कैसे कई बार वे महज कूड़ा देने को दरवाजे के बाहर निकलती हैं...और हवा के जोर से दरवाज़ा बंद हो जाता है...नंगे पैर...गाउन में..घर के बाहर...पड़ोसी भी ना हों तो घंटों उन्हें बाहर खड़े रहना पड़ता है....फिर तो चाभी  वाले को बुलाकर नई चाभी बनवानी पड़ती है...मनमाने पैसे ऐंठते हैं ,वे ..कई लोग एक दूसरे के यहाँ अपने घर की चाभियाँ  रखते हैं. अच्छा है..इस महानगर में एक दूसरे पर लोगों का इतना विश्वास तो है. 

चाभी  लाने के साथ उसने दुपट्टा भी ले लिया था..और चेहरा भी धो कर बालों को समेट कर पीछे एक क्लिप लगा ली थी. फिर भी आँखें वैसी ही भरी भरी सी थी...'जाने क्या हुआ है...अपने मन की  बात बताए या ना बताए..पर उस लड़की को उस समय किसी के साथ की सख्त जरूरत थी.' ..

 उसके आते ही मैने कहा.."आओ अंदर आओ..थोड़ी देर बैठो..मैं भी अकेली हूँ...मुझे भी अच्छा लगेगा"
सर झुकाए ही वो सोफे पर बैठ गयी. 
"पानी  लोगी?"
उसने सिर्फ सर हिला कर ना कहा..नज़रें वैसे ही जमीन से लगी रहीं. लगा...बहुत ही असहज महसूस कर रही थी वो...मानो डर रही हो..मैं जाने क्या पूछ लूँ..
मैने कुछ बात करने के गरज से पूछा..." क्या नाम है तुम्हारा.."
"नीलिमा..." फंसी हुई सी आवाज़ निकली.
'बहुत प्यारा नाम है...कब से हो यहाँ.."
"जी..दो साल  हो गए.." सर झुकाए हुए ही जबाब दिया..उसने.
अब और क्या पूछूं....कहीं पुलिस की पूछ-ताछ  सा ना लगे.
 थोड़ी देर ख़ामोशी पसरी रही हमारे दरम्यान..और जैसे उसने भी महसूस किया..और कर्तव्य समझ धीरे से सर उठा कर पूछा..." आपको पहले कभी नहीं देखा...यहाँ "
"हाँ.. मैं हाल में ही आई हूँ...मेरे बेटे-बहू रहते हैं यहाँ...दोनों ऑफिस गए हैं "
"ओह.."..कहकर वो फिर चुप हो गयी...नज़रें फिर जमीन ताकने लगीं...और नीचे ताकते हुए ही उसने जैसे जमीन से ही कहा..." सब नौकरी वाले ही हैं यहाँ.."
मुझे कुछ क्लू मिला..बात करने का..." हाँ..शायद...सुबह-सुबह कई औरतों को ऑफिस जाते देखती हूँ..."
पूछने का मन था...'तुम घर में ही रहती हो?'...पर कहीं उसे बुरा ना लग जाए...ये सोचकर नहीं पूछा...

पर शायद उसने मेरे मन की बात भांप ली...और खुद ही बोल उठी..." मैं तो हाउसवाइफ ही हूँ '

"फिर तो तुम्हे बहुत अकेलापन लगता होगा...कोई मिलने जुलने वाला हो..तो समय अच्छा कट जाता  है.."...बातों के सिरे को मैं हाथ से छूटने नहीं देना चाहती थी.

उसने तड़प कर मेरी तरफ देखा....आँखों में जमे  पानी में  नाराज़गी की एक लहर उठी हो जैसे....  फिर सामने दीवार टोहती हुई बोली..." बहुत ज्यादा अकेलापन है यहाँ...जब हसबैंड  ने यहाँ ज्वाइन किया  तो मैं बहुत खुश हुई थी..इतने बड़े शहर में रहूंगी..कितना नाम सुन रखा था,इस शहर का . आस-पड़ोस वाले भी जल गए थे सुनकर. मुझमे भी जैसे थोड़ा घमंड आ गया था...जब यहाँ फ़्लैट  नहीं मिल रहा था और हसबैंड हमें यहाँ लाने में देर कर रहे थे...तो गुस्से में जल-भुन गयी थी मैं...रोज जैसे दिन गिन रही थी..और अब सोचती हूँ..काश उन्होंने ये नई नौकरी नहीं ली होती...हम वहीँ उस कस्बे में रहते...पैसे कम थे..पर ख़ुशी थी...एक जिंदगी थी."

मैने उसे बोलते रहने दिया.....वो भी जैसे मुझसे नहीं....अपनेआप से कह रही थी सब कुछ......"शुरू शुरू में तो मुझे बहुत अच्छा लगता...इतनी बड़ी -बड़ी बिल्डिंग्स....ये लिफ्ट से आना-जाना ...सुपर मार्केट में शॉपिंग...मॉल्स...शुरू में नरेश घुमाने भी ले जाते...समंदर का किनारा...सब मुझे जैसे  इक सपने सा लगता..पर सपना तो सपना ही होता है..कभी ना कभी आँख खुलनी ही है..और सच्चाई की धरातल पर आना ही है...एक महीना घूमते घामते..घर संवारते बीत गया. फिर बेटी का स्कूल शुरू हो गया."

"तुम्हारी बेटी भी है..."..मैने आश्चर्य से पूछा...मुझे तो वो न्यूली वेड सी लग रही थी..

"हाँ ..पांच साल की... गुड़िया के लिए ही नरेश और भी यहाँ आने को उत्सुक थे. कस्बे का स्कूल उन्हें पसंद नहीं था. वे गुड़िया को बढ़िया स्कूल में पढ़ाना  चाहते थे. स्कूल तो बहुत अच्छा है..पर मेरे लिए बहुत मुश्किल है. टीचर्स के साथ साथ सारे बच्चों की माएँ भी इंग्लिश में ही बात करती हैं और मैं हूँ छोटे शहर की...आदत रही नहीं कभी...कोशिश करते भी एक संकोच सा होता है और जुबान जैसे तालू से चिपक जाती है. इसलिए मेरी दोस्ती भी नहीं हो पाती. वैसे भी यहाँ खुद आगे बढ़कर कोई बात नहीं करता....नहीं तो हमारे यहाँ...कोई नया चेहरा दिखा नहीं कि
लोग सारा इतिहास-वर्तमान खंगाल डालते हैं...मायके ससुराल..परिवार में कौन हैं..पति की नौकरी..यहाँ तक कि पति की तनख्वाह तक पूछ डालते हैं....वो भी खलता था...और यहाँ का अनदेखापन भी खलता है. 
हम  तीन बहने हैं....और फिर पड़ोस की मेरी सहेली पहली कक्षा से लेकर कॉलेज  तक हम साथ पढ़े...कभी खुद आगे बढ़कर दोस्ती करने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई. शादी भी उसी शहर में हुई. पड़ोस के कितने  ही लोगों को मैं पहले से जानती थी. कभी कुछ अजनबीपन लगा ही नहीं.वाहन  गुड़िया को स्कूल-छोड़ने लाने जाती तो कितने ही पहचाने चेहरे मिल जाते....गेट के पास इंतज़ार करते ही कितने लोगो से बात हो जाती.... यहाँ तो गुड़िया के बस स्टॉप पर  ज्यादातर बच्चों के साथ उनकी आया होती हैं ... थोड़े बड़े बच्चे तो अकेले ही आते हैं. बस एक बच्चे की माँ आती है  पर वो घुटनों तक की पैंट और शर्ट पहने मोबाइल फोन पर ही लगी होती है....उस से कुछ बात करने में भी हिचक होती है. गार्डेन में शाम को गुड़िया को लेकर जाती हूँ..वहाँ भी वही माहौल है...सारी लेडीज़ जींस में होती हैं और चिल्ला-चिल्ला कर बच्चों को अंग्रेजी में ही डाँटती रहती हैं. वो तो अच्छा है...बाहर गुड़िया ज्यादा शरारत नहीं करती.....नहीं तो मुझे उसे डांटा भी नहीं जाता.." हल्की सी मुस्कराहट खेल गयी उसके होठों पर. थोड़ी देर पहले का हादसा जैसे भूल गयी थी वह.

मैं भी मुस्कुरा दी..पर कुछ कहा नहीं...नीलिमा के  अंदर जैसे बरसों का गुबार जमा था..." जिंदगी में बहुत सूनापन आ गया था...नरेश सुबह आठ बजे के गए रात के दस बजे आते...थक कर चूर....उसके बाद भी कभी फोन पर लगे होते तो कभी लैप टॉप पर. टोको तो कह देते हैं...'तुम्ही लोगों के लिए सब कुछ कर रहा हूँ...फ़्लैट लेना है...गाड़ी लेनी है...बेटी के हायर एडुकेशन के लिए पैसे जमा करने हैं...काम नहीं करूँगा तो कैसे होगा सब कुछ'...अब बात तो सही ही कहते हैं..मैं क्या कहूँ...सन्डे भी बस सोने और खाने में निकल जाता है. कहीं चलने को कहो तो कह देते हैं...'एक दिन तो आराम करने को मिलता है...आज के दिन मुझे तंग मत किया  करो... यहाँ सारी लेडीज़ अकेले ही सारा काम करती हैं..तुम भी आदत डाल लो'....अब तो आदत पड़ ही गयी है...और काम भी क्या है..जरूरत की सारी चीज़ें तो पास में मिल जाती हैं....मुझे मार्केट गए भी जमाना गुजर जाता है. जाती भी हूँ तो बस गुड़िया के खिलौने या कपड़े लेने.पता नहीं कब से ...खुद के लिए कुछ नहीं लिया..लेकर भी क्या करती ..कहाँ  जाती पहन कर...कोई सखी-सहेली नहीं...कोई रिश्तेदार नहीं. और नरेश यह समझते ही नहीं...उन्हें लगता है...रहने -पहनने -खाने की सुविधा है...पति है..बेटी है..मन लगाने को टी.वी. है..किसी को और क्या चाहिए.." कहते उसका गला रुंध सा गया. मेरा भी मन भर आया..अधिकांशतः पुरुष यही समझते हैं..उन्हें नारी मन की थाह ही नहीं होती...कि दो मीठे बोल...दो पल के साथ के सामने ये सब फीके हैं. 

उसने आंसुओं को अंदर ही घोटने की कोशिश की...और गला साफ़ करते हुए बोली..."पता नहीं आप सब सुनकर क्या सोचेंगी मेरे बारे में.....पर अब भी तो कुछ सोच ही रही होंगी....कि क्या बात हुई...."
सोच तो रही थी...पर उस से  कैसे कह दूँ...या फिर क्या कहूँ...अच्छा हुआ मेरे उत्तर का इंतज़ार किए बिना वो बोल पड़ी..."मेरा यहाँ बिलकुल मन नहीं लगता था...धीरे-धीरे हर काम एक बोझ सा लगने लगा...ना तो घर संभालने का मन होता...ना खुद को संवारने का...पर नरेश का कभी ध्यान ही नहीं जाता... मेज पर धूल पड़ी होती...अखबार बिखरे होते...मैं उधड़ी हुई रंग उड़ी कमीज पहने होती..पर तब भी नरेश नोटिस नहीं करते...कई बार तो मैं जान-बूझ कर उनके सामने एक ही गाउन पहने होती...सुबह धो कर डाल देती..शाम को वही पहन लेती...पूरे एक हफ्ते तक एक गाउन में देख कर भी नरेश ने कुछ नहीं टोका....या शायद उन्होंने गौर  ही नहीं किया . उन्हें सिर्फ थाली में खाना मनपसंद चाहिए था. खाने में नमक-मिर्च कम होने पर जरूर चिल्ला पड़ते...कोई शर्ट या मोज़े नहीं मिलते..तो घर सर पर उठा लेते...समझ ही नहीं आता....वे सचमुच कपड़े ना मिलने पर ही नाराज़ हो रहे हैं या ऑफिस की किसी टेंशन की वजह से....सच क्या था...पता नहीं....पर उनका यह रूप मैने यहीं आकर देखा...जबकि वहीँ पहले सास-ससुर के साथ रहने की वजह से नहीं चिल्लाते  थे या फिर वहाँ इतनी टेंशन ही नहीं थी...कुछ समझ में नहीं आता. गुडिया की देखभाल की भी सारी जिम्मेवारी मुझपर ही डाल दी थी...रात  में आते तो गुड़िया अक्सर सो जाती या नींद में होती...सुबह नरेश ऑफिस जाने की जल्दी में होते...बस आते-जाते उसके गाल थपथपा दिए..इतना सा ही बाप-बेटी का रिश्ता रह गया है...गुड़िया तो अपने कार्टून अपने खिलौनों में मगन रहती है..पर मुझे बहुत खलता है....पर करूँ तो क्या...अगर मैं कभी उसकी पढ़ाई की चर्चा करती तो कहते 'इन सब झंझट में मुझे मत घसीटो...काम का पहले ही बहुत प्रेशर है....और कभी झल्ला पड़ते...' पढ़ी-लिखी बीवी रखने  से क्या फायदा...फर्स्ट स्टैण्डर्ड को भी नहीं पढ़ा सकती?"..पढ़ा तो मैं लेती थी...मैं तो बस उनसे कुछ बात करने के बहाने के लिए चर्चा करती....कि कुछ बात भी हो जाए और वे गुड़िया से भी जुड़े रहें.  ऑफिस की बातें वे करते नहीं....यहाँ पड़ोसी रिश्तेदार कोई है नहीं...जिनके विषय में बात की जाए....पसंद भी एक नहीं हमारी...वे टी.वी. पर या तो न्यूज़ देखते हैं...या फिर अंग्रेजी फिल्मे...जो मेरी समझ में नहीं आतीं. यहाँ आने से पहले भी नरेश मुझसे बहुत बात नहीं करते थे...पर तब लगता था..'अपने माँ-पिता के सामने असहज महसूस करते हैं'...और फिर समय भी कहाँ मिलता था...रात का खाना निबटाते...रसोई समेटते...जब मैं कमरे में आती, नरेश सो चुके होते. इतवार को तो वे देर तक सोते रहते और फिर अपने दोस्तों से मिलने चले जाते....मैं भी अक्सर इतवार को मायके जाने के फिराक में रहती....रोज किसी ना किसी का आना-जाना लगा ही रहता...इसलिए कभी ये कमी महसूस भी  नहीं हुई  कि सिर्फ हम दोनों बैठकर आपस में बातें नहीं करते हैं........यहाँ जब सिर्फ हम दोनों हैं...तो समझ में ही नहीं आता...बात क्या की जाए...बस देह-धर्म पर ही रिश्ते की बुनियाद टिकी है. 

मैं सोच रही थी..'पता नहीं ,ये कितने बंद दरवाजों के पीछे का सच  है...ज़माना बदल गया है...माहौल  बदल गया है...पर इंसान के बदलने में अभी वक़्त है.." और जहाँ दरवाजे खुले रहते हैं वहाँ की कथा भी कितनी अलग है?? कभी इस  तरफ ध्यान नहीं गया..पर आज नीलिमा की बातों ने उस कोने-कतरे में छुपे सच को खींचकर सामने ला खडा किया  था ज्यादातर तो पति-पत्नी के रिश्तों में बस देह-धर्म ही रह गया है. पत्नी घर संभालती है...पति ऑफिस से आकर टी.वी. देखता है या अखबार पढता है...या फिर मिलने-जुलने वालों से गप्पें." चाय दे दो...नाश्ता दे दो...मेरी कमीज़ कहाँ है.....बच्चों के स्कूल की फीस देनी है...अमुक की शादी तय हो गयी है... डॉक्टर के यहाँ जाना है..'पति-पत्नी के बीच बस इन सरीखे संवाद ही कायम होते हैं. उम्र के पडाव निकलते जाते हैं और ये व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है. मन खिन्न हो आया और मैने नीलिमा से सहानुभूति जताई .

"समझ सकती हूँ....ऐसे में दिन बिताना कितना मुश्किल होता है...."

"कोई नहीं समझ  सकता...आंटी...." फिर से उसकी आवाज़ की तुर्शी बढ़ गयी थी. "बहनों..रिश्तेदारों के फोन आते हैं तो एक ईर्ष्या सी होती है,उनके स्वर में...उन्हें इन हालात का क्या पता...." उसने एक गहरी सांस ली और कहना जारी रखा..." मेरे किचन और बेडरूम की खिड़की के सामने एक बिल्डिंग का टेरेस पड़ता है. दोपहर में अक्सर एक लड़के को मैं वहाँ टहलते देखती. कभी-कभी वो मेरी खिड़की की तरफ नज़र उठा कर देखता...मैं पर्दा खींच देती...पर सामने का दरवाज़ा भी बंद और खिड़की पर भी परदे खींच कर कब तक रखती...मेरा दम घुटने लगा था...और मैने परदे हटा दिए...देखना है तो देखे...मुझे क्या..पर जैसे मेरे लिए भी एक खेल सा हो गया था...मैं जब-तब दीवार से सट कर छुपकर देखने की कोशिश करती....वो देख तो नहीं रहा....एकाध बार उसने मुझे झांकते हुए देख भी लिया...हमारी नज़र भी मिल गयी....फिर मैं एकाध दिन जी कड़ा कर उस तरफ देखती भी नहीं...पर वो भी थोड़ा ढीठ हो गया था...जब भी मैं कपड़े फैलाने या उतारने जाती तो देखती वो हाथ बांधे खड़ा नज़रें इधर ही जमाये रहता...आंटी...पता नहीं आप क्या सोचें...पर मैं जैसे यह सब किसी से नहीं कहूंगी तो मेरा सर फट जाएगा....एक दिन कपड़े फैलाते मुझे ध्यान आया...मेरे नाखून तो बड़े टेढ़े-मेढ़े हैं...मैने ढंग से कब से उन्हें शेप नहीं दिया...कितना गँवार समझेगा मुझे...और मैने नेल फाइलर से घिसकर नाखूनों  को शेप दिया...और गहरे गुलाबी रंग की नेलपौलिश भी लगाई...पता नहीं उसने ध्यान दिया या नहीं...पर मैने उस दिन खूब समय लगा कर धीरे-धीरे कपड़े फैलाए. घर में  मैं कभी भी कपड़ों पर ध्यान नहीं देती थी...किसी भी रंग की सलवार किसी भी रंग की समीज पहन लेती थी...बाल भी नहीं संवारती...गुड़िया का स्कूल बारह बजे का है...तब तक तो काम ही ख़त्म नहीं होते...जल्दी से एक क्लिप लगा...उसे छोड़ने को उतर जाती....आने के बाद भी इतना आलस आता....टी.वी. का चैनल सर्फ़ करते...अखबार पलटते ही..कभी यूँ ही छत देखते...छः बज जाते और फिर से मैं जल्दबाजी में वैसे ही भागती उसे लेने. ..पर अब मैं मैचिंग सलवार समीज पहनने लगी थी...बाल अच्छे से कंघी करने लगी थी....आंटी ,मैं ये सब कोई उसे लुभाने के लिए नहीं कर रही थी....ऐसा कुछ भी नहीं था मेरे मन में....बस यही लगता कि बाल बिखेरे ....मुझे उलटे सीधे कपड़े पहने देख,पता नहीं कहीं मुझे गँवार ना समझ ले....आंटी प्लीज़ मुझे गलत मत समझिएगा...मैं बिलकुल भी वैसी लड़की नहीं हूँ......कभी लड़कों की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखा...मेरे महल्ले में भी कई लड़के थे...कुछ ने दोस्ती की कोशिश भी की थी....ग्रीटिंग कार्ड्स भेजे थे...ख़त भेजे थे...पर मैं उन्हें बिलकुल ही इग्नोर कर देती थी...बी .ए. पास किया और शादी हो गयी...नरेश को छोड़कर मैने किसी दूसरे आदमी की तरफ कभी देखा तक नहीं.....पर यहाँ पता नहीं मुझे क्या होता जा रहा था....मैं ऐसे क्यूँ बिहेव कर रही थी...." फिर से उसका गला रुंध गया और वह चुप हो गयी.

क्रमशः 

Tuesday, January 10, 2012

ज़ीरो पोल्यूशन वाला शहर 'माथेरान'


कुछ महीने पहले सहेलियों के साथ मुंबई के पास एक हिल स्टेशन 'माथेरान' गयी थी. जब फेसबुक पर फोटो लगाई तो कई लोगो ने कहा....'तस्वीरें यहाँ देख ली...विवरण तो ब्लॉग पर पढ़ने को मिलेगा." परन्तु मैने कहा.."कुछ ख़ास घटा ही नहीं...सब कुछ आराम से संपन्न हो गया तो क्या लिखूं?" ...दरअसल वहाँ जाते समय मिनी बस में बैठते ही मैने कहा था.."ईश्वर!! कुछ ऐसा ना घटे कि मुझे मुझे कोई पोस्ट लिखनी पड़े..." अक्सर होता यही है...जब कुछ मनोरंजक  या भयावह घटता है..तभी हम उस घटना के विषय में लिखने को उद्धत होते हैं..पर कई सहेलियों  ने मुझसे बहस की 'ऐसा क्यूँ??...कुछ अनचाहा घटेगा तभी लिखोगी?..उन दुष्टों ने मजाक में यह भी कह डाला.."इसका अर्थ तुम अपने अवचेतन में चाहती हो.. कि कुछ ऐसा घटे कि तुम्हे लिखना पड़े " 

उनकी बातों पर मनन कर ही रही थी कि एक अखबारनवीस की नज़र उन तस्वीरों पर पड़ गयी...और उन्होंने आग्रह कर डाला कि ' अब सामाजिक बदलाव हो रहे हैं..महिलाएँ बिना किसी पुरुष संरक्षक  के भी घूमने जाने लगी हैं'...इन सब मुद्दों पर एक आलेख लिख डालूं.." आलेख  लिखा गया...छप भी गया..{एक दूसरे आलेख की फरमाइश भी आ गयी...जो अब तक नहीं लिखी गयी  है :)} परन्तु एक बार ब्लॉग पर लिखने की आदत पड़ जाए तो पत्र-पत्रिकाओं में लिखना कठिन लगने लगता है...शब्द सीमा की वजह से. तब से सोच रखा था unedited version...को ब्लॉग पर डाल दूंगी...पर मौका ही नहीं मिला..और अब पंचगनी ट्रिप पर लिख डाला...'माथेरान' तो वैसे ही मेरी फेवरेट जगह है...नाराज़ हो गया...तो अब बुलाएगा भी नहीं...:)

शायद बचपन से हॉस्टल में रहने के कारण ..दोस्त जल्दी बन जाते हैं. मुंबई में भी कुछ सहेलियों का ग्रुप बन गया ..और हम साथ-साथ  शॉपिंग..फिल्मों के लिए जाने लगे. कुछ ज्यादा समय साथ बिताने की इच्छा हुई..और कभी-कभार दिन भर के पिकनिक का प्रोग्राम भी बनने लगा. हमारी हसरतें और बढीं...और हम दस सहेलियों ने मुंबई से 90 किलोमटर दूर प्रकृति की सुरम्य वादियों में बसे 'माथेरान भ्रमण' की योजना बनाई. पर इस प्लान को हकीकत का रूप देने में पूरा एक साल लग गया. क्यूंकि गृहणियों की कई जिम्मेवारियां होती हैं. कभी बच्चों की परीक्षा...कभी रिश्तेदारों का आगमन...कभी परिवार में कोई शादी-ब्याह..कभी किसी का बीमार पड़ जाना...दस सहेलियों का एक साथ दो दिन का समय निकालना बहुत मुश्किल हो रहा था....किसी तरह अनुकूल समय आया और एक तिथि तय हुई जब सब फ्री थे.

अब दूसरी रूकावट थी...सबके पति की सहमति...अब तक एक ही शहर में घूमने जाने और सुबह जाकर शाम तक वापस लौट आने की व्यवस्था से किसी के घर में कोई आपत्ति नहीं थी. पर ये दो दिन  के लिए...शहर से दूर..जाने की बात  थी. घरवालों को ,हमारी सुरक्षा की  चिंता भी वाजिब थी. ऐसा रिजॉर्ट चुना गया...जिसमे कुछ के पास उसमे पहले भी रुकने के अनुभव थे. कुछ अपनी उम्र का हवाला दिया गया कि अपना ख्याल तो रख ही सकते हैं.   

एक सुबह हम महिलाओं का ये काफिला..अपने सफ़र पर निकल पड़ा. और सुबह घर से निकलने से पहले...सब अपने घर में खाने का इंतजाम कर के आई थीं...किसी ने छोले बनाए थे..किसी ने इडली तो किसी ने आलू पराठे. हमारी मौजूदगी में भले ही बाहर से पिज्जा और नूडल्स मंगवाए जाएँ पर ये महिलाएँ अपराध-बोध नहीं महसूस करना चाहती थीं कि उनकी अनुपस्थिति में बाजार का खाना खाना पड़ा. 

माथेरान भारत का सबसे छोटा हिल-स्टेशन है. 1850 में ब्रिटिश हुकूमत ने हिल स्टेशन का दर्जा दे दिया था . यह समुद्र तल  से करीब २,६२५ फीट की उंचाई पर स्थित है. यह दुनिया के उन गिने-चुने स्थानों में से है ..जहाँ कोई भी सवारी नहीं जाती. बिलकुल जीरो पोल्यूशन है. पैदल ही घूमना होता है. या फिर  घोड़े या हाथ-रिक्शा पर बैठकर. नीचे से रसद और जरूरी सामान भी घोड़े या कुली ही ढो कर लाते हैं. पूरे माथेरान में पक्की सड़क भी नहीं है. बस लाल मिटटी से बने रास्ते हैं  और हैं... हरी-भरी घाटियाँ ..पहाड़..सुरम्य वादियाँ..प्रकृति का अनुपम  सान्निध्य .मुंबई के शोर-शराबे से दूर ,यह जगह बहुत आकर्षित करती है. 

माथेरान के लिए  मिनी बस के रवाना होते ही सबने पत्नी-बहू-माँ का अवतार परे कर दिया..यहाँ बस उनकी अपनी पहचान थी..कभी अन्त्याक्षरी खेली जा रही थी....कभी कोरस में गाने गाए जा रहे थे.. तो कभी अलग-अलग पोज़ में फोटो निकाले जा रहे थे. तीन घंटे का सफ़र कैसे कट गया..पता ही नहीं चला. माथेरान पहुँचने के पहले दो पड़ाव पड़ते हैं...एक निश्चित स्थान से कोई भी भारी गाड़ी आगे नहीं जाती...सिर्फ कार या टैक्सी से ही जाया जा सकता है. हमें भी  मिनी बस छोड़ना पड़ा. महिलाओं को देखकर भी टैक्सी वाले अपनी मनमर्जी का किराया नहीं वसूल सके. कुछ सहेलियाँ अच्छी मराठी जानती हैं. उन्होंने धाराप्रवाह मराठी में अच्छी तोल-मोल की . टैक्सी से पैतालीस मिनट की यात्रा के बाद एक दूसरा पड़ाव आता है...यहाँ से ऊपर कोई वाहन नहीं जाता ..सिर्फ घोड़े या रिक्शे पर ही जाया जा सकता है. बाकी सब तो घोड़े और रिक्शे पर सवार हो लिए पर पैदल चलने की शौक़ीन तंगम,वैशाली,राजी और मैने पैदल ही चलना शुरू कर दिया. रास्ते में कुछ काफी उम्रदराज़ महिलाएँ भी सर पर बड़ी-बड़ी अटैची और बैग उठाये दिखीं. पुरुषों ने तो सर पर तीन तीन अटैची और दोनों बाहों से दो -दो बड़े बैग लटका रखे थे. स्टेशन पर तो फिर भी थोड़ी दूरी ही तय करनी होती है...यहाँ आधे घंटे की चढ़ाई थी...पर इनकी आजीविका का साधन ही यही है.  

मेरे हाथ में एक जूस की बॉटल थी...मैने बैग में ही रखी थी. एक जगह रुक कर हम सबने पिया..थोड़ी सी बची थी...मैने वापस बैग में नहीं रखा और रास्ते में एक बन्दर ने लपक कर  हाथ से जूस की बोतल ले ली. और एकदम एक्सपर्ट की तरह ढक्कन खोल गट-गट करके सारा जूस पी गया. घने जंगल के बीच का  रास्ता...जगह-जगह बिकते अमरुद-इमली- खीरा और अदरक-इलायची वाले ढाबे की चाय ने हमारी वाक को और खुशनुमा बना दिया.

हमने कॉटेज बुक किया था...बाहर बरामदे में कुर्सी पर बैठी बाकी सहेलियाँ हमारे सामान के साथ  हमारा इंतज़ार कर रही थीं....अभी हम अपनी यात्रा का बखान कर ही रहे थे कि एक बन्दर लपक कर आया....और उसने एक बैग की जिप खोलकर एक थैली निकाल ली...उस थैली में कैमरा.. चार्ज़र वगैरह थे....मैने भगाने की कोशिश की तो अपने काले-काले दाँत निकाल कर इतने जोर से गुर्राया कि मैं अपना पर्स फेंक-फांक कर भागी. एक सहेली के हाथ में छतरी थी..उसने छतरी से डराया तब वो भागा...हमने सोचा था...बाहर बैठ कर सुन्दर नजारे देखते हुए चाय पी जायेगी...पर बंदरों के आतंक की वजह से हमें अंदर ही बैठना पडा.

इसके बाद हम माथेरान घूमने निकल पड़े...अधिकाँश लोग छतरी या रेनकोट लाना भूल गए थे. {अनीता ने तो रात में छतरी निकाल कर बैग के पास रखी कि मुझे सुबह लेकर जाना है...और सुबह वहाँ  छतरी पड़ी देख कर गुस्सा होने लगी...घर में कोई भी सामान जगह पर नहीं रखता और छतरी सहेज कर अंदर जगह पर रख आई:)}....मुझे..राजी,वैशाली, तंगम को  तो छतरी लाने का ध्यान भी नहीं रहा. हम सबने वहीँ बाज़ार से बीस- बीस रुपये का रेनकोट  (जो बड़ी सी एक प्लास्टिक की शीट थी...)और पाँच रुपये की टोपी खरीदी और सबने शान से पहनकर तस्वीरें भी खिंचवायीं. इस तरह की हरकतें...परिवारजनों के सामने नहीं हो सकतीं...दोस्तों के साथ ही संभव  है.

किसी भी हिलस्टेशन की तरह...यहाँ भी..हार्ट -पॉइंट..मंकी पॉइंट...हनीमून पॉइंट...लुइज़ा पॉइंट  आदि है...हर पॉइंट से प्रकृति का स्वरूप इतना ख़ूबसूरत लगता कि कदम आगे बढ़ने से इनकार करने लगते. इको पॉइंट पर खूब एक दूसरे का नाम लेकर पुकारा गाया. 

अक्सर हिल स्टेशन में शाम के बाद थोड़ी शान्ति हो जाती है...टूरिस्ट बोर ना हों..इसके लिए रिजॉर्ट वाले रात में आकर्षक कार्यक्रम रखते हैं.  शर्मिला और मैं...पहले भी इस रिजॉर्ट में रुक चुके थे..हमें पता था..यहाँ Karaoke होता है...पर उस दिन तम्बोला का कार्यक्रम था.....हमारी टोली होटल मैनेजर के पास पहुँच गयी..कि हमने तो Karaoke  की वजह से ये होटल चुना...हमें तो वही चाहिए...और वह आधे घंटे के लिए सिर्फ हमारे ग्रुप की खातिर Karaoke  के लिए मान गया था...इसमें  किसी भी गाने का म्युज़िक बजता रहता  है...और सामने स्क्रीन पर गीत के दृश्य के साथ दो दो पंक्तियों में गाने के बोल उभरते रहते  हैं...उन बोलो को पढ़कर म्युज़िक के साथ गाना गाना होता है...गाना ख़त्म होने पर स्क्रीन पर ही मार्क्स भी उभरते हैं...किसी को पच्चीस मिले किसी को सत्तर तो किसी को अडतालीस....पर लुत्फ़ सबने जम कर उठाया.(अच्छा हुआ...आधे घंटे का ही कार्यक्रम था और मेरी बारी आने से रह गयी....वरना मुश्किल हो जाती....वहाँ माइनस में मार्क्स देने का प्रावधान नहीं था :)) ..इसके बाद डिस्को का कार्यक्रम था..... कुछ ने शायद कभी बारात में भी डांस नहीं किया था...पर यहाँ सहेलियों का साथ पाकर एक घंटे तक सब ने जम कर पैर थिरकाए. हमारी मण्डली ने पूरे फ्लोर पर ही कब्ज़ा कर रखा था...हमारी इतनी बड़ी मण्डली देखकर दूसरे गेस्ट दरवाजे से ही लौट गए...दो-तीन महिलाएँ जरूर शामिल हो गयीं...और उनसे  दोस्ती भी हो गयी. 

इतना थके होने के बाद भी नींद कहाँ ..दो  बजे रात तक अन्त्याक्षरी खेली गयी...और इतनी देर से सोने के बावजूद सबलोग सुबह सुबह कोहरे में लिपटी  प्रकृति के दर्शनार्थ निकल पड़ीं . घनघोर जंगल...और चारो तरफ धुंध छाई हुई...फिर भी किसी तरह का डर छू तक नहीं गया...धुंध में लिपटे नैसर्गिक दृश्य कभी छुप  जाते तो कभी आँखों के सामने आ जाते. अनुपम स्वर्गिक दृश्य था. राजी..तंगम..इंदिरा वगैरह तस्वीरें खींचने  -खिंचवाने में व्यस्त थीं...और हम बाकी लोग आगे निकल आए...हमें लगा...लौटने का रास्ता तो एक ही है...काफी देर होती देख...हम रुक-रुक कर उनके नाम की पुकार लगाते रहे...आश्चर्य भी हो रहा था...और गुस्सा भी आ रहा था...कैमरे के साथ इतना भी क्या मशगूल होना...और होटल आ कर देखा...पता नहीं किस रास्ते से वे लोग हमसे पहले ही पहुँच गयी थीं...और सोच रही थीं...हमें इतना वक़्त क्यूँ लग रहा है. 

होटल वापस आकर सबने बड़े भारी मन से पैकिंग की और माथेरान को अलविदा कहा. पर बस में बैठते ही...अगले किसी ऐसे ही भ्रमण की योजना बनने लगी...जिसके कार्यान्वयन में भले ही साल लग जाएँ...पर कार्यान्वित होगा जरूर...क्यूंकि आज की महिलाओं  ने घर की देहरी से बाहर  निकल कर खुद के लिए भी पल दो पल के लिए जीना सीख लिया है.