Tuesday, April 26, 2016

निदा फाजली की नज्मों, गजलों, यादों में डूबी एक शाम

मन के हर मौसम ने मुखरित होने के लिए जिनसे शब्द उधार मांगे ,उनकी याद में 'चौपाल' द्वारा आयोजित प्रोग्राम करीब पांच घंटे तक चला और साहित्य जगत के कई दिग्गज मंत्रमुग्ध हो उनसे जुड़े संस्मरण ,उनकी नज़्म ,गज़लें सुनते रहे. 'निदा फाजली 'के प्रति अगाध प्यार ही सबको खींच लाया था .

प्रोग्राम का आगाज़ 'विष्णु शर्मा जी ने अपनी दमदार आवाज़ में किया . उन्होंने निदा फाजली के कई मशहूर शेर जोशीले अंदाज़ में पढ़े . 'शकील आज़मी' ने निदा फाजली के आरम्भिक जीवन और उनसे अपनी दोस्ती पर प्रकाश डाला. निदा फ़ाज़ली के वालिद जो खुद भी शायर थे ने उनका नाम 'मुक़्तदा हसन 'रखा था .'निदा फ़ाज़ली' इनका लेखन का नाम है. निदा का अर्थ है स्वर/ आवाज़ . फ़ाज़िला क़श्मीर के एक इलाके का नाम है जहाँ से निदा जी के पुरखे आकर दिल्ली में बस गए थे, इसलिए उन्होंने अपने उपनाम में फ़ाज़ली जोड़ा .

निदा फाज़ली छोटी उम्र के थे तभी कौमी दंगों से तंग आकर उनका पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया .पर उन्होंने जाने से इनकार कर दिया और दूर जाकर छुप गए . पूरे परिवार के चले जाने के बाद वे अपने घर में गए और वे कहते थे , "घर के अंदर जाने और फिर बाहर आने के दरम्यान मुझमें बहुत कुछ बदल चुका था ". वे १९६४ में काम की तलाश में मुम्बई आये और धर्मयुग, ब्लिट्ज़ (Blitz) जैसी पत्रिकाओं, समाचार पत्रों के लिए लिखने लगे. उनकी सरल और प्रभावकारी लेखन शैली ने शीघ्र ही उन्हें सम्मान और लोकप्रियता दिलाई। पर पैसों की कमी बनी रही .

रोज शाम साहिर लुध्यानवी के घर उनकी बैठक भी होतीं. खाना और पीना भी होता और उन्हें साहिर की शायरी सुन कर दाद देनी पड़ती (पता नहीं ये बड़े शायरों/लेखकों का क्या शगल है .रविन्द्र कालिया जी ने भी अपनी आत्मकथा 'ग़ालिब छूटी शराब' में लिखा है .वे इलहाबाद में थोड़े दिनों के लिए 'उपेन्द्रनाथ अश्क ' के यहाँ रहते और खाना खाते थे .बदले में रोज शाम उन्हें उनकी रचनाएँ सुननी पड़तीं ) एक शाम नशे में 'निदा फाजली' ने साहिर की किसी शायरी में कई कमियाँ निकाल दीं .अब साहिर नाराज़ हो गए .(हम सब साहिर के प्रशंसक हैं, पर सच तो सच है ) निदा फाजली को बिना खाना खाए घर से निकल जाना पड़ा पर साहिर ने उनकी जेब में कुछ रुपये डाल दिए थे कि उन्हें भूखा ना रहना पड़े. लेकिन साहिर की नाराज़गी कम नहीं हुई थी .जब आर.डी. बर्मन ने निदा फाजली की एक गजल किसी फिल्म के लिए ली तो साहिर ने उनसे मना करवा दिया. आर.डी.बर्मन ने कुछ रुपये देकर माफी मांग ली . एक मुशायरे में भी जब दोनों को आमंत्रित किया गया था तो साहिर ने कह दिया,'निदा फाजली' को बुलाया जाएगा तो वे शिरकत नहीं करेंगे . ( जिन शायरों के प्रति दिल में इतना सम्मान होता है, उनकी ऐसी बातें कष्ट पहुंचाती हैं पर फिर ये भी यकीन होता है कि वे एक इंसान ही हैं, कोई भगवान नहीं ) 'शकील आज़मी' ने निदा फाजली के विषय में भी कहा कि उनकी पहली किताब की भूमिका निदा फाजली ने लिखी थी पर उसके विमोचन में वे वायदा कर के भी नहीं आये .शायद किसी और मुशायरे में ज्यादा पैसों का आमन्त्रण आ गया था . जबकि एक मुशायरे में सभी नए लोगों को श्रोता हूट कर दे रहे थे . 'शकील आज़मी' भी आमंत्रित थे .पर आयोजकों ने श्रोताओं का मूड देख, उन्हें मंच पर बुलाने का इरादा त्याग दिया .लेकिन निदा फाजली अड़ गए कि शकील आजमी को मौक़ा नहीं दिया जायेगा तो वे भी मंच पर नहीं आयेंगे .

निदा फाजली की  पत्नीश्री  'मालती जोशी', उनके दोहे गाती हुई.
'अब्दुल अहद साज़' जी ने निदा फाजली की रचनाओं पर विस्तार से चर्चा की . निदा फाजली की रचनाओं पर कबीर, सूर, मीरा का बहुत प्रभाव पडा है. उनका अध्ययन बहुत गहन था . उनकी रचनाओं में साम्प्रदायिक सद्भाव धड़कता रहता है. उनके मशहूर शेर
"घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो, यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये " पर मुल्लाओं ने उन्हें घेर लिया था कि 'क्या वे बच्चे को अल्लाह से बड़ा मानते हैं ?'.इस पर निदा फाजली का जबाब था ,'मस्जिद इन्सान ने बनाया है जबकि बच्चे को अल्लाह ने. '
रचनाओं का जिक्र सुन सुन कर यूँ लग रहा था ,निदा फाजली की हर रचना करीब करीब याद है .उनकी अपनी बेटी के जन्म पर लिखी प्यारी सी पंक्तियाँ सबके चहरे पर बरबस मुस्कान ले आईं .

निदा फाजली की पत्नीश्री 'मालती जोशी' का संस्मरण 'नेहा शरद' ने बहुत ही भाव भरे स्वर में आत्मीयता से पढ़ा .'मालती जोशी' फिल्मों में काम करने की इच्छुक थीं.उन्हें मानस मुखर्जी (गायक शान के पिता ) ने एक फिल्म के लिए साइन किया जिसकी पटकथा निदा फाजली लिख रहे थे . निदा फाजली और मालती जोशी एक ही बिल्डिंग में रहते थे . फिल्म निर्माण से सम्बंधित बातचीत मालती जोशी के फ़्लैट में ही होती थी. लेकिन वो फिल्म बंद हो गई . दोनों उस बिल्डिंग से शिफ्ट हो कहीं और रहने चले गए . मालती जोशी का एक एक्सीडेंट हो गया और उन्होंने फिल्मों में एक्टिंग का ख़याल छोड़, गायन अपना लिया . उन्हीं दिनों 'निदा फाजली' की लिखी और जगजीत सिंह -चित्रा सिंह की गाई ग़ज़ल ,
' दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है, खो जाये तो सोना है' बहुत मशहूर हुआ ."
मालती जोशी को ये ग़ज़ल बहुत पसंद आई थी और वे उस शायर से मिलना चाहती थीं . एक दिन एक बैंक में निदा फाजली से मुलाक़ात हुई तो पता चला वे पास में ही रहते हैं और ये उनकी ही गजल है . दोस्ती पुनः परवान चढ़ी .निदा फाजली अकेले रहते थे .मालती जोशी ,उनका ख्याल रखने लगीं. और एक दिन निदा फाजली ने ये नज़्म उन्हें सौंप कर प्रपोज़ कर दिया .
"मुमकिन है सफर हो आसान;
अब साथ भी चलकर देखें!"
इस गजल का अंतिम शेर है
,"अब वक्त बचा है कितना जो और लड़ें दुनिया से
दुनिया की नसीहत पर भी थोडा सा अमल कर देखें "
मालती जी को काम के सिलसिले में तीन महीने के लिए बहरीन जाना पड़ा...दूरियों ने नजदीकियां और बढ़ा दीं. उनके लौटने पर दोनों ने शादी कर ली .एक प्यारी सी बेटी 'तहरीर' का जन्म हुआ. मालती जी बताती हैं, वे ज्यादा से ज्यादा वक्त अपनी स्टडी में गुजारते थे .दुनियादारी से कोई मतलब ना था . चेक पर बिना पूछे साइन कर दिया करते . उनके जाने के बाद माँ-बेटी की दुनिया बिलकुल ही सूनी हो गई पर निदा जी के शेर ने ही उन्हें सहारा दिया ,
" अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये "

मशहूर पटकथा और संवाद लेखक जावेद सिद्दकी ने भी निदा फाज़ली से जुड़ी अपनी प्यारी यादें शेयर कीं . उनके संघर्ष के दिनों का भी बयां किया. उन दिनों निदा फाजली के एक शेर (जो एक आधुनिक कविता के दौर का था ) की काफी आलोचना की गई थी
सूरज को चोंच में लिए मुर्गा खड़ा रहा
खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई

निदा फाजली की बिटिया 'तहरीर '
जिसका अर्थ था कि प्रकृति ने तो सुबह का उजाला कर दिया, पक्षी भी जग गए पर इंसान ने पर्दा खींच कर रात कर लिया. इसे सही अर्थों में नहीं लिया गया .जावेद सिद्दकी ने भी अपने एक कॉलम में इसका काफी माखौल उड़ाया कि यह किस किस्म का शेर है . फिर एक दिन उन्होंने एक किताब की दुकान में दुकान के मालिक से एक हैरान परेशान नौजवान को शिकायत करते सुना कि अमुक से हमारे पैसे देने के लिए कह दीजियेगा '
जावेद सिद्दकी ने जब माजरा पूछा तो पता चला, ' एक करोडपति को मुशायरे में जाने का शौक था पर उन्हें शेर कहने नहीं आते थे. वो नौजवान निदा फाजली हैं जो उनके लिए शेर लिखते और बदले में पैसे मिलते थे '.जावेद सिद्दकी उन करोडपति साहब को जानते थे और उनके शेर बहुत पसंद भी करते थे .अब उन्हें पता चला कि असल में वो सब निदा फाजली का लिखा है, जिनकी शायरी का वे मजाक उड़ा चुके हैं. उन्होंने निदा फाजली का लिखा ढूंढ कर पढ़ना शुरू किया और फिर उनकी आपस में अच्छी दोस्ती भी हो गई .

चौपाल के दूसरे सत्र में निदा फाजली की रचनाओं का गायन था .कुलदीप जी और उनकी टीम ने उनकी रचनाओं को इतने तरन्नुम में इतना डूब कर गाया कि रोमांच हो आया .
'गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड धानी दे मौला "
"बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ "
भूपेन्द्र मिताली भी आये थे. भूपेन्द्र ने सदाबहार ग़ज़ल ,' कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता..." अपनी पुरसोज़ आवाज़ में गाई . भूपेन्द्र पर उम्र हावी होने लगी है .उन्हें डगमग क़दमों से चलते देख , एक कसक सी होती है पर आवाज़ वैसी ही दमदार है .

प्रोग्राम के बीच में ही सफेद कुरते में एक ऊँचे पूरे व्यक्तित्व के सज्जन आये और कोने में खड़े हो गए .एक बार लगा, 'तलत अज़ीज़' हैं. फिर लगा नहीं वे तो बहुत युवा हैं...इनकी दाढी और बालों में भी कहीं कहीं सफेदी झलक रही थी. पर मैं भूल गयी थी , 'तलत अज़ीज़' का एक प्रोग्राम बिलकुल सामने बैठ कर देखा था पर सोलह साल पहले . वे 'तलत अज़ीज़' ही थे और उन्होंने स्टेज से थोड़े स्टार वाले नखरे भी दिखाए . वे निदा फाजली की एक गजल गाना चाहते थे पर वह उनके आई पैड में नहीं था . एक लड़का मोबाइल में लेकर आया तो तलत अज़ीज़ ने फरमाया, 'उन्हें हिंदी पढने नहीं आती...वे सिर्फ उर्दू में लिखा पढ़ते हैं '.(दसवीं तक तो हिंदी पढी ही होगी ) .उन्होंने गुजारिश की कि कोई उर्दू में लिख कर उन्हें ये गजल दे . प्रोग्राम शुरू हुए चार घंटे हो चुके थे और इन सबमे कीमती समय नष्ट हो रहा था . निदा फाजली की कोई भी गज़ल सुना देते और इतनी तैयारी तो उन्हें पहले से कर के आनी चाहिए थी .आखिर शकील आजमी ने उन्हें वो गजल उर्दू में लिख कर दी तब उन्होंने गाया ," जिंदगी ने सब कुछ दिया पर दिया देर से..." इस से पहले उनसे जुड़े कुछ संस्मरण और कुछ ग़ज़लें भी गाईं .

घनश्याम वासवानी. जसविंदर ने उनकी मशहूर गज़लें गाईं .
मालती जोशी जी ने निदा फाज़ली के दोहे गाये. मालती जी ने बताया दुनिया को रुखसत कहने से कुछ ही दिनों पहले निदा जी ने एक बहुत ही सामयिक दोहा कहा था ,"
"गंगा जी के घाट पर करे जुलाहा बात,
वादा करके सो गए क्यूं अच्छे दिन रात "

इस कार्यक्रम में एक कमी खलती रही .यूँ तो वहाँ उपस्थित सभी लोग निदा साहब की तस्वीर से वाकिफ थे . ज्यादातर लोग मिल चुके थे और रूबरू सुन भी चुके थे . फिर भी स्टेज पर उनकी एक तस्वीर होनी चाहिए थी . युवावस्था से लेकर अंतिम दिनों तक की तस्वीरों का कोई कोलाज़ होता तो और बेहतर. जिनके विषय में सुन रहे होते हैं, जिनकी रचनाओं का पाठ हो रहा होता है.उनकी तस्वीर पर भी नजर पड़ती रहे तो उस महान हस्ती की उपस्थिति का अहसास होता रहता है. हो सकता है , ये सिर्फ मुझे ही खला हो वरना 'चौपाल' द्वारा आयोजित कार्यक्रम पूरी तरह मुकम्मल होते हैं और बेहतरीन अनुभवों से समृद्ध कर जाते हैं ।
भूपिंदर

तलत अज़ीज़



Friday, April 22, 2016

'काँच के शामियाने ' पर गंगा शरण सिंह जी के विचार

गंगा शरण सिंह उन गिने चुने लोगों में से हैं जो विशुद्ध पाठक हैं. वे लगतार पढ़ते रहते हैं और करीब करीब
सारी प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ उन्होंने पढ़ रखी हैं. वे जिनके लेखन से प्रभावित होते हैं ,उन लेखकों से फोन पर या मिलकर लम्बी साहित्यिक चर्चा भी करते हैं. लोग दर्शनीय स्थलों की यात्रा पर जाते हैं, वे कभी कभी लेखकों से मिलने के लिए यात्रा पर निकलते हैं . उन्होंने 'काँच के शामियाने ' पढ़कर उसपर अपने विचार रखे, बहुत आभारी हूँ.

                               "कांच के शामियाने"
फेसबुक और अन्य तमाम स्त्रोतों से मिलती निरंतर प्रशंसा और पाठकीय प्रतिक्रिया देखकर उपरोक्त उपन्यास पढ़ने की जिज्ञासा बढ़ जाना स्वाभाविक था। एक सहज सा कौतूहल मन में जागता था कि आखिर क्या होगा इस रचना में कि जो भी पढ़ता है वो इसके रचनाकार से बात करने को तड़प उठता है।
कुछ समय बाद जब ये उपन्यास उपलब्ध हुआ उस वक़्त मैं किसी और किताब को पूरा करने में व्यस्त। कुछ दिन बीत गए। एक दिन रात को अचानक किताब उठा लिया और सोचा कि चलो दो चार पृष्ठ पढ़कर देखते हैं। पर एक बार आग़ाज़ हुआ तो फिर ये सफ़र अंजाम पर जाकर ही थमा। ये करिश्मा रश्मि रविजा की लेखनी का है जो चंद पृष्ठों में ही मन को बाँध लेती है। बेहद सरल किन्तु अद्भुत आत्मीय भाषा का संस्पर्श एक बहुत ही दुखद और दिल दहला देने वाले कथानक को जिस तरह की रवानी देता है, वो हिन्दी कथा साहित्य में आजकल विरल सा है क्योंकि इन दिनों शिल्प और कला के नाम पर ऐसे ऐसे लेखकों को प्रोमोट किया जाता है जिनको पढ़कर सर धुनने स्थिति बन जाती है।
ये उपन्यास पढ़ते समय बरबस मुझे कभी सूर्यबाला जी याद आती रहीं तो कभी मालती जोशी जी, क्योंकि ये ऐसी लेखिकाएँ हैं जिन्होंने अपनी सरल और सहज रचनाओं से एक पूरी पीढ़ी को समृद्ध किया। तथाकथित महान आलोचकों की कृपा दृष्टि भले ही इन्हें न मिली पर पाठकों का भरपूर प्यार व आदर इन्हें नसीब हुआ।
कथा में ऐसी तमाम सारी संभावनाएं थी जहाँ कथानक के बहाने भाषा अभद्र हो सकती थी पर रश्मि जी ने क्षण भर के लिए भी अपनी शब्द-निष्ठा को नहीं गँवाया। कथा के सारे चरित्र इस तरह से चित्रित किये गए हैं कि जीवन्त हो उठे हैं। बेहद घमण्डी और क्रूरता की पराकाष्ठा को छूते पति का घृणित किरदार हो या अवसरवादी सास ससुर, स्वार्थी बड़ा देवर या स्नेही छोटा देवर, नायिका की माँ, बहनें और कहानी में आये हुए अन्य सभी पात्रों का चित्रण तन्मयता से हुआ है।
उपन्यास के आखिरी पृष्ठों में नायिका और उसके बच्चों के वार्तालाप एवं उनके परस्पर रागात्मक सम्बंन्धों की ऊष्मा से आँखें बरबस भर आती हैं।
एक सार्थक, सुन्दर और मार्मिक उपन्यास के सृजन हेतु रश्मि जी को हार्दिक शुभकामनाएं। आप जैसे लिखनेवालों को देखकर भविष्य के प्रति मन आशान्वित होता है

Monday, March 14, 2016

साहित्यिक पत्रिका 'पाखी' में 'काँच के शामियाने' की समीक्षा

साहित्यिक पत्रिका 'पाखी' में 'कलावंती सिंह जी' द्वारा ' काँच के शामियाने' की समीक्षा ।प्रेम भारद्वाज जी एवम् कलावंती जी आपका बहुत आभार .

Sunday, March 13, 2016

अतुल श्रीवास्तव जी की नजर में 'काँच के शामियाने '

Atul Shrivastava ji एक प्रखर पत्रकार हैं . उनका बहुत बहुत आभार ...उन्होंने इतने ध्यान से उपन्यास पढ़कर उसकी बारीकियों को समझा और उस पर प्रकाश डाला है ...पुनः बहुत शुक्रिया

                                                  काँच के शामियाने


क्या ऐसा होता है?
क्या वास्तव में ऐसा होता है?
जवाब भीतर से ही आ गया... हाँ, हो सकता है... होता ही है!!
हर स्त्री के भीतर कहीं न कहीं एक जया होती है, किसी में कम तो किसी में ज्यादा
और हर पुरूष के भीतर एक राजीव होता है, किसी में कम तो किसी में ज्यादा
और जब अतिरेक की स्थिति आती है तो फिर ऐसे ही "काँच के शामियाने" बनते हैं
एक पुरूष सबसे जीत सकता है, पर अपने अहम से नहीं... अपने अहम से जीतने की कोशिश में वह सब कुछ हार जाता है
विवाह के प्रस्ताव को जब जया ने पहली बार ठुकराया तो यह राजीव के पुरूषत्व पर प्रहार था और फिर जब उसकी शादी जया से होती है, यदि उसने इसे अपना सौभाग्य मान लिया होता तो न "काँच के शामियाने" बनते और न टूटते, पर उसने उस प्रस्ताव के ठुकराने की बात मन के भीतर कुंठा की तरह बसा रखा था और फिर वो सब हुआ... जो राजीव को खलनायक बना गया
जया, कभी मजबूत होती, कभी कमजोर हो टूटने के कगार पर पहुँच जाती और फिर चट्टान की तरह अडिग हो जाती... जया, उसने एक संदेश दिया कि लड़ते रहो, समय से और खुद से, पलायन जरूरी नहीं, लड़ना जरूरी है... जया, यदि उसने राजीव को मुक्त कर दिया होता तो शायद राजीव अभागा ही कहलाता, पर उसने ऐसी परिस्थितियाँ पैदा की कि अपने बच्चों के भविष्य के निर्माण में उसे भी भागीदार बनने का मौका मिला, भले ही अनमने मन से
काव्या, अपने भाग्य से हार मान चुकी जया को नया साहस, नई ताकत और नई राह दिखाने का काम क्या काव्या ने नहीं किया... हाँ उसी ने किया
कहते हैं इंसान के जीवन की सबसे बडी़ पाठशाला उसके साथ बीतने वाले लम्हे होते हैं... हमारे साथ बीतने वाली घटनाएँ, हमारी परिस्थितियाँ हमें परिपक्व करती हैं, वो सब सिखाती हैं, जो हम कहीं और नहीं सीख पाते
मैं मरना नहीं चाहती
मैं जीना चाहती हूँ
खूब बडी़ होना चाहती हूँ
और पूरी दुनिया को बताना चाहती हूँ कि मेरी मम्मी कितनी अच्छी है
कितनी तकलीफ झेलकर उसने हमें बडा़ किया है
पर भैय्या तो मरने को तैयार है। फिर मैं क्या करूँ
लेकिन मेरा मरने का मन नहीं है
सच कहूँ तो जया की पूरी ताकत लौटाने का काम किया सात साल की काव्या की कापी में लिखे इन शब्दों ने... झकझोर दिया सच में...
हर धूप के बाद छाँव आता है
हर रात के बाद सुबह होती है
हर दुख के सिक्के के पीछे सुख भी होता है
छाँव आया, सुबह हुई, सुख लौटा... क्या हुआ कि देर हुई... पर काँच के शामियाने फिर से जुड़ ही गए...
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रश्मि जी का उपन्यास "काँच के शामियाने" नारी की पीडा़ और उसके संघर्ष की को लेकर 17 खंडों में पिरोई गई एक बेहतरीन कृति है... उनको इस उपन्यास के लिए शुभकामनाएं....
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अब कुछ अपनी,
रश्मि जी की कलम से बहुत समय से परिचित हूँ, सो जब उनके उपन्यास की पहली झलक देखी, जितनी जल्दी हाथों में आ जाए, इसी जुगत में लग गया, लिंक मिलते ही पहले आनलाईन बुक करने की कोशिश की, पर जब तकनीकी दिक्कत के कारण ऐसा नहीं कर पाया तो रश्मि जी को यह बात बताई। उन्होंने खुद ही मेरे पते पर किताब भेज दी और इसी बीच मैं कोशिश करता रहा... एक दिन सफल हो गया...जब उनको बताया मैंने किताब आर्डर कर दिया तो उन्होंने जानकारी दी कि आपको मैंने किताब भेज दी है और शायद एक दो दिन में मिल भी जाएगी
उनकी भेजी किताब मिल गई और कुछ अंतराल के बाद मेरी बुक की हुई किताब भी आ गई
जिस किताब के लिए इतनी बेसब्री थी, उसे पढ़ ही नहीं पा रहा था, ये काम की व्यस्तता की मजबूरी थी।
इसी बीच विदेश दौरा भी आ गया, सोचा अब पूरी पढ़ लूंगा... ट्रेन में यह किताब हमसफर की तरह साथ रही, हवा में भी कुछ पन्ने पढे़ और फिर ब्रेक हो गया... कल ही रात पढ़ने बैठा... कुछ पन्नों के बाद नींद सताने लगी, इसी बीच वो पन्ना सामने आया जिसमें काव्या की लिखी लाईनें थीं और फिर पूरा उपन्यास खत्म कर ही छोडा़...
समीक्षा की तो समझ नहीं, पर उपन्यास पढ़ जो महसूस किया, उसे शब्दों में पिरोने की कोशिश की है...

Tuesday, February 23, 2016

काँच टूटे उन पन्नों पर...और किरचें कहीं और जाकर चुभे --- प्रियंका गुप्ता

                                                                                                                                                                                                    
प्रियंका गुप्ता एक युवा लेखिका हैं. खूब सारा लिखती हैं. पत्रिकओं में अखबारों में लगातार छपती रहती हैं .
और इनका लिखा बहुत पसंद किया जाता  है . इनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं .
काँच के शामियाने पर इतना बढ़िया लिखने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया :)


काँच के शामियाने-(रश्मि रविजा)-
मन में चुभी किरचें...उफ़!
यूँ तो किताब छप कर हाथ में आते ही रश्मि जी से मैने कहा था...जल्दी ही पढ़ती हूँ...फिर बताती हूँ...। पर उस समय कुछ ऐसी परिस्थितियाँ आई कि चाह कर भी मैं तुरन्त इस उपन्यास को नहीं पढ़ पाई...और पहली फ़ुर्सत मिलते ही जैसे ही इसे पढ़ने लेकर बैठी, जाने कितने सालों बाद पहले के दिनों की तरह एक बैठक में ही सारा उपन्यास पढ़ गई...। आखिरी पन्ना बन्द करने के कुछ ही पलों बाद मैने रश्मि जी को सिर्फ़ एक शब्द में अपनी प्रतिक्रिया दी थी...awesome...
वैसे तो एक लेखक-पाठक के बीच किसी भी रचना के असर को जानने के लिए (मेरे हिसाब से ) महज इतना संवाद ही पर्याप्त था, पर फिर भी जाने क्यों लगा, इस उपन्यास पर अगर कुछ और नहीं कहा तो अन्दर कुछ भरा रह जाएगा...। कहने को तो यह एक कहानी है, पर फिर भी बेहद अपनी-सी...। मेरे ख़्याल से जया महज एक नाम नहीं, एक पात्र भर नहीं है...वो तो जैसे इस सारी क़ायनात की ऐसी औरतों का प्रतिबिम्ब है जो रोज़-ब-रोज़ ऐसे ही किसी नरक से गुज़रते रहने को अभिशप्त हैं...। अत्याचार जया पर होते हैं, उसकी टीस पाठक के कलेजे को बींध जाती है...। सबसे अच्छी बात यह है कि जया सब कुछ सहने के बावजूद हारती नहीं है, हारना चाहती ही नहीं...। वह लड़ने को तैयर है...। परिवार से, समाज से, राजीव से...और शायद अपने आप से भी...।
मुझे लगता है जया जैसी औरतों की लड़ाई सबसे पहले अपने भीतर शुरू होती है...। इस लड़ाई में हर ऐसी औरत को सबसे पहले खुद से जूझते हुए जीतना होता है...। बाहरी लड़ाई तो बहुत बाद में आती है...। जया-राजीव के रूप में रश्मि जी ने बहुत सारे सामाजिक ताने-बाने को पूरी जीवन्तता से उजागर कर दिया है...। भारतीय समाज की न जाने कितनी औरतों ने यही सब झेला है। इस उपन्यास में कपोल-कल्पना जैसा तो कुछ है ही नहीं...। हर दूसरी आम लड़की की तरह जया भी मायके में अपनी सारी तकलीफ़ें सिर्फ़ इस लिए छुपाती है ताकि उनको कोई दुःख न हो...। पर क्या फ़ायदा...? उसके दुःख-तक़लीफ़ें जान कर भी उसकी माँ-भाई क्या करते हैं...? उनकी हर कोशिश तो यही होती है न कि उनकी अपनी बहन/ बेटी अपनी ज़िन्दगी की इतनी बड़ी लड़ाई एक दरिन्दे के हाथों हार जाए...।
सच कहूँ तो रश्मि जी की तरह मैं भी यही मानती हूँ कि राजीव को जानवर कहना भी उन बेज़ुबानों का अपमान होगा...। इस एक वाक्य में सब कुछ शीशे की तरह साफ़ झलक जाता है न...। सबसे अच्छी बात यह...जया अपनी लड़ाई खुद लड़ती है और जीतती भी है...। अगर वह ऐसा न करती तो शायद मैं एक पाठिका के तौर पर राजीव से ज़्यादा जया से नफ़रत कर बैठती...।
इस उपन्यास को पढ़ना एक पीड़ा से गुज़रने सरीखा है...एक ऐसी पीड़ा जो आग में तपते हुए सोने को महसूस होती होगी...। पर उस पीड़ा में कुन्दन बन कर और भी मूल्यवान हो जाने का जो सकून होता होगा, यह वैसी ही एक यात्रा है...। इसे पढ़ते हुए मैं ‘मैं’ रह ही नहीं गई थी...। मुझे नहीं मालूम मैं उस वक़्त कौन थी...। मैं तो जया हो गई थी...उसकी हर लड़ाई खुद लड़ते हुए...डरते हुए कि अगले ही पल कहीं वो हार न जाए...। उसके आँसू अपने गालों पर बहता महसूस करते हुए...। उसके भीतर की आग में खुद जलते हुए, एक अनोखे आक्रोश और ऊर्ज़ा से परिपूर्ण...सिर्फ़ एक औरत...।
मेरे विचार से रश्मि जी के लेखन की सार्थकता तो इसी बात से साबित हो जाती है जब उसका पाठक उनके पात्रों के साथ एकाकार हो जाए...। काँच टूटे उन पन्नों पर...और किरचें कहीं और जाकर चुभे...।

Wednesday, February 10, 2016

"काँच के शामियाने ' पर आर. एन. शर्मा जी के विचार


आर.एन.शर्मा जी एक बहुत ही सजग और गंभीर पाठक हैं . उन्हें पढने का बहुत शौक है . दुनिया के हर भाषा की  अधिकाँश विख्यात किताबें वे पढ़ चुके हैं और लगातार पढ़ते रहते हैं .
उनकी इस उपन्यास पर प्रतिक्रिया  खास मायने रखती है .
बहुत आभार आपका.
                                                                      


 काँच के शामियाने

'कांच के शामियाने'...उपन्यास पढ़ने के बाद अभी तक उसके कई चरित्र, जया-राजीव-संजीव-रूद्र आदि, दिमाग में घूम रहें हैं।

सोचता हूँ कोई इतना क्रूर और निर्दयी कैसे हो सकता है। न सिर्फ राजीव और उसके घरवाले [संजीव को छोड़] , बल्कि जया के इर्द गिर्द जो समाज है उसने भी जया की जिंदगी को नर्क बना दिया और कैसे जया भी इतना शारीरिक और मानसिक अत्याचार बर्दाश्त करती रही इतने लंबे समय तक महज़ इसलिए की उसके अपने घरवाले और आस पास के लोग क्या कहेंगे। पूरे उपन्यास में कम से कम 150 पृष्ठ तक यही कहानी है जो पाठक को अंदर तक न सिर्फ छू जाती है बल्कि हिला डालती है। कई घटनाएं आँखे नम कर जातीं है।सहानुभूति जैसा शब्द शायद छोटा है, लगता है की जया को खुद जाकर इस दलदल से निकाल लाएं। बाद की कहानी जया के साहस और उसके 3 समझदार बच्चों की कहानी है। दिन तो उसके पलटने ही थे पर बहुत समय लग गया। अंत में एक सुखद अहसास छोड़ गया...

बहुत समय पहले रश्मि जी की एक कहानी " छोटी भाभी" पढ़ी थी। पता नहीं क्यों " कांच के शामियाने" पढ़ते समय " छोटी भाभी" रह रह के याद आती रही। लगता नहीं की कोई कहानी पढ़ी जा रही है।यही रश्मि जी के लेखन का कमाल है।

रही बात भाषा की, हिंदी के साथ भोजपुरी का प्रयोग न सिर्फ अच्छा लगा बल्कि उसके होने से पटना, सीतामढ़ी और बिहार के दूर दराज़ इलाकों और वहां के रीत रिवाजों से पाठक अच्छी तरह वाकिफ हो सका। वहां की स्थानीय भाषा होने से वहां के सामजिक परिवेश की अच्छी झलक देखने को मिली। वैसे भी रश्मि जी के शब्दों और शैली का चयन बे मिसाल है।

इतने अच्छे उपन्यास के सृजन के लिए वे बधाई की पात्र हैं।

Friday, February 5, 2016

कुमार प्रशांत श्रीवास्तव की 'काँच के शामियाने 'से रोचक मुलाक़ात


कहानी लिखने वालों के साथ, अक्सर कहानियाँ भी घटित होती हीहैं . एक ऐसा ही कुछ रोचक वाकया हुआ .

 एक सज्जन, जिन्हें किताबें पढने का शौक है ,और जो अक्सर ऑनलाइन किताबें मंगवाते रहते हैं. अमेजन से दो किताबें मंगवा रहे थे तो उनकी नजर 'कांच के शामियाने' पर पड़ी . उन्हें किताब के नाम ने आकर्षित किया और उन्होंने किताब ऑर्डर कर दी .(और मुझे कुछ लोगों से फीडबैक मिला था कि नाम बड़ा पुराना सा है, सत्तर के दशक का लगता है, कोई कूल नाम होना चाहिए .एक हफ्ते तक मैं कुछ सोच में थी पर फिर अपने सूत्र वाक्य, 'सुनो सबकी करो अपने मन की' पर अमल करते हुए यही नाम रहने दिया )बाद में भी कई लोगों ने लिखा कि सबसे पहले उन्हें उपन्यास के नाम ने ही आकृष्ट किया .

उन्हें किताब पसंद आई ,एक ही सिटिंग में पढ़ ली उन्होंने और फिर मुझे मैसेज करने को मुझे फेसबुक पर ढूँढा तो पता चला उनके और मेरे दो म्युचुअल फ्रेंड्स हैं. उनकी पत्नी की मामी मेरी भी फ्रेंडलिस्ट में हैं .उन्होंने तुरंत अलका को फोन लगा कर पूछा ,'आप रश्मि रविजा को कैसे जानती हैं' अलका इस पर क्या कहे क्यूंकि हमारी जब तक फोन पर बात नहीं होती, हमारा दिन शुरू नहीं होता. वो मेरी छोटी बहन है यानि कि Kumar Prashant Srivastava की पत्नी पूजा के मामा की शादी मेरे मामा की बेटी से हुई है. :)


प्रशांत जी ने किताब पर अपनी प्रतिक्रिया भेजी है .: "Aaap ka novel kaanch ke shamiyane padha.. maine ek bar shuru kiya to yakin maniye bina khatm kiye ruk nahi paya..just abhi finish kiya hai. Last page tak aate aate mai khud emotional ho gaya.... I must say grt work.. Waiting for ur next novel.
. As i am only a reader not a good writer, so can't express my feelings about this novel in so many words, but i want to say that its contents have so much emotions which can make its place in best seller group very soon. Now about the story ...

जो कि शुरुआत में ये दिखाती है कि एक लड़की की शादी आज भी घर के सिचुएशन और एक रुढीवादी सोच ( लड़का अच्छा खाता -कमाता है, और क्या चाहिए ) पर निर्भर है. और कहानी में एक पुरुष का अहम् उसकी जिद ,एक परिवार की स्वार्थपरक इच्छाएं , दोहरा मापदंड ,फिर एक स्त्री (महिला) के दुःख दर्द और संघर्ष और अंत में अपनी पहचान बनाने के संघर्ष और प्रयास, सब कुछ है, इसमें .एक पाठक के अंदर के बहुत से इमोशन, इसको पढ़ते हुए जाग जाते हैं. शुरू में दुःख, क्रोध, फिर दर्द,दया और अंत में ख़ुशी के आंसू > मुझे इसमें जो बहुत अच्छा लगा, उसमे सेपहला तो ये है कि जो एक माँ का अपने बच्चे को जन्म देने का जुनून और ज़ज्बा और दूसराइसका समापन .

जिस तरह से माँ और बच्चे के लाड़ -दुलार किया गया है, वो मन को हर्षित कर देता है. "

यह प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुत मायने रखती है क्यूंकि यह एक ऐसे पाठक कीप्रतिक्रिया है , जो फेसबुक, ब्लॉग किसी भी माध्यम से मुझसे कनेक्टेड नहीं थे .और उहोने किताब का नाम पहले पढ़ा, लेखिका का बाद में .
बहुत शुक्रिया प्रशांत जी ,आपने और कुछेक मित्रों ने मेरे मन से ये वहम भी दूर कर दिया कि पुरुषों को ये किताब शायद पसंद ना आये.