रविवार, 18 मई 2014

बदलता वक़्त

शाम होने को आयी थी. नीला आकाश सिन्दूरी हो चुका था .पक्षी कतार में चहचहाते हुए अपने घोंसले की तरफ लौट रहे थे . वातावरण में उमस सी थी. रत्नेश शर्मा घर के बरामदे पर कुर्सी पर बैठे हाथ में पकडे अखबार से अपने चेहरे पर हवा कर रहे थे . सुबह से अखबार का एक एक अक्षर पढ़ चुके थे .बहुत कुछ दुबारा भी . और कुछ करने को था नहीं. सोचे सड़क पर ही चहलकदमी कर आयें पर पहना हुआ कुरता –पैजामा  धुल धुल कर छीज़ गया था .रंग भी मटमैला पड़ गया था .उन्हें उठ कर कुरता बदलने में आलस हुआ और कुरता बदलें भी क्यूँ , सिर्फ निरुद्देश्य भटकने के लिए . अब कोई उत्साह भी तो नहीं रह गया . पर एक समय था जब हर वक्त कलफ लगे झक्क सफ़ेद कुरते पैजामे में रहते थे .व्यस्तता भी तो कितनी थी. हर वक़्त किसी न किसी का आना-जाना लगा रहता था .कितनी योजनायें बनाने होती थीं .कितना हिसाब-किताब करना होता था . अब तो काम ही नहीं रह गया ,वरना उनके जैसा कर्मठ व्यक्ति अभी यूँ खाली बैठा होता .

छात्र जीवन से ही वे एक मेधावी छात्र थे . उनकी प्रतिभा देख रिश्तेदार, स्कूल के अध्यापक सब कहते , “वे  एक बड़े अफसर बनेंगे पर रत्नेश शर्मा की अलग ही धुन थी. उनके कस्बे में कोई स्कूल नहीं था. वे चार मील साइकिल चलाकर स्कूल जाते . गर्मी में स्कूल से लौटते वक्त दोपहर को भयंकर लू चलती .सर पर तपता सूरज और नीचे गरम धरती .उसमे ही पसीने से तरबतर हो वे तेजी से पैडल मारते जाते. जाड़े के दिनों में सुबह स्कूल जाते वक्त ठंढी हवा तीर की तरह काटती .कानों पर कसकर मफलर लपेटा होता. पैरों में मोज़े पहने होते फिर भी ठिठुरते पैर साइकिल पर पैडल मारने में आनाकानी करते .

वे हमेशा सोचते काश उनके कस्बे में ही स्कूल होता तो उन सबको उतनी तकलीफ नहीं उठानी पड़ती . स्कूल के इतनी दूर होने की वजह से कई लड़के अनपढ़ ही रह गए .कुछ लोगों के माता-पिता को अपने बच्चों उतनी दूर भेजना गवारा नहीं था .कुछ बच्चे ही शैतान थे .वे घर से तो निकलते स्कूल जाने के नाम पर लेकिन बीच में पड़ने वाले बगीचे में ही खेलते रहते और शाम को घर वापस . दो तीन महीने बाद उनके माता-पिता को बच्चों की कारस्तानी पता चल जाती और फिर वे उन्हें किसी काम धंधे में लगा देते और स्कूल भेजना बंद कर देते. लड़कियों को तो माता-पिता स्कूल भेजते ही नहीं. जिन्हें पढने में रूचि होती वे अपने भाइयों की सहायता से ही अक्षर ज्ञान प्राप्त कर लेतीं और अपना नाम लिखना और चिट्ठी पत्री लिखना-पढना  सीख जातीं. बस इतना ही उनके लिए काफी समझा जाता और उन्हें घर के काम काज, खाना बनाना , सिलाई-कढाई यही सब सिखाया जाता.

रत्नेश शर्मा के मन में स्कूल के दिनों से ही एक सपना पलने लगा कि वे अपनी पढाई पूरी करने के बाद अपने कसबे में स्कूल खोलेंगे और वहाँ के बच्चों को शिक्षा प्रदान करेंगे . स्कूली शिक्षा के बाद उन्हें, उनके पिताजी ने शहर के कॉलेज में पढने के लिए भेजा. उनके साथ के सारे लड़के कॉलेज के बाद किसी नौकरी करने और फिर शादी करके शहर में ही बस जाने का सपना देखते .वे अपने कसबे में वापस लौटने की सोचते भी नहीं . पर रत्नेश शर्मा का सपना बिलकुल अलग था .शुरू में उन्होंने अपने मित्रों से अपने मन की बात बतायी भी तो उनका मजाक उड़ाया जाने लगा . फिर उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा . जब बी.ए. करने के बाद उन्होंने घर पर यह बात बतायी तो पिता बहुत निराश हुए . लेकिन रत्नेश शर्मा अपने विचारों पर दृढ रहे तो पिता ने भी उनका साथ दिया. उनका पुश्तैनी मकान बहुत बड़ा था और उतने बड़े मकान में बस रत्नेश शर्मा का ही परिवार रहता था . उनके चाचा शहर में नौकरी करते थे और वही मकान बना कर बस गए थे . उनकी एक बहन की शादी हो गयी थी और इतने बड़े मकान में बस तीन प्राणी थे . मकान के एक हिस्से में उन्होंने स्कूल खोलने की सोची . 

जब कस्बे के लोगों ने उनका ये विचार सुना तो बहुत खुश हुए और सबने यथायोग्य अपना सहयोग दिया. तब जमान ही ऐसा था . पूरा क़स्बा एक परिवार की तरह था . किसी कि बेटी की शादी हो , सब लोग मदद के लिए आ जाते . मिल जुल कर काम बाँट लेते . स्कूल के लिए भी कुछ ने मिलकर कुर्सी बेंचों का इंतजाम कर दिया. कुछ ने ब्लैकबोर्ड लगवा दिए . कुछ ने पेंटिंग करवा दी .अपने साथ ही एक दो मित्रों को उन्होंने स्कूल में पढ़ाने के लिए राजी कर लिया और स्कूल की शुरुआत हो गयी. शुरू में तो बहुत कम बच्चे आये . पर धीरे धीरे रत्नेश शर्मा और उनके मित्रों की मेहनत रंग लाई. लगन से पढ़ाने पर उनके स्कूल के बच्चों का रिजल्ट बहुत अच्छा होने लगा और धीरे धीरे बच्चों की संख्या में वृद्धि होती गयी . लडकियां भी पढने आने लगीं . आस-पास के कस्बों से भी बच्चे आने लगे . रत्नेश शर्मा एक सुबह से स्कूल की देखभाल में लग जाते और देर रात तक सिलेबस बनाते, बच्चों की प्रगति का लेखा-जोखा बनाते . पास के शहर से सामान्य ज्ञान की किताबें लाते. पढ़ाई को किस रोचक बनाया जाए ,इस जुगत में वे लगे होते.

चार साल निकल गए और इस बार दसवीं में इस स्कूल के आठ बच्चे थे . बच्चों से ज्यादा रत्नेश शर्मा को परीक्षाफल की चिंता थी और जब रिजल्ट निकला तो आठों बच्चों को फर्स्ट डिविज़न मिला था और दो बच्चे मेरिट में भी आये थे . इस स्कूल के नाम का डंका दूर दूर तक बजने लगा. रत्नेश शर्मा का आत्मविश्वास और बढ़ा .स्कूल को अनुदान मिलने लगा . पास की जगह में नए कक्षाओं का निर्माण हुआ . नए शिक्षक इस स्कूल में पढ़ाने को इच्छुक होने लगे . अब इस स्कूल के बच्चे आगे चलकर इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई करने लगे .जब उनका मेडिकल और इंजीनियरिंग में चयन हो जाता तो वे अपन पुराने स्कूल को नहीं भूलते और स्कूल में मिठाई का डब्बा लेकर जरूर आते. रत्नेश शर्मा की आँखें नम हो जाती ,मन गद गद हो जाता और अपने छात्रों की सफलता पर सीना गर्व से फूल जाता .

रत्नेश शर्मा की शादी हो गयी . और नीलिमा उनकी जीवनसंगिनी बन कर आ गयी . नीलिमा का गला बहुत ही मधुर था और वे चित्रकला में प्रवीण थीं. वे खुद रूचि लेकर स्कूल में संगीत और चित्रकला सिखातीं . समय के साथ वे जुड़वां बेटे और बेटी के माता-पिता भी बने . बेटे का नाम रखा राहुल और बेटी का रोहिणी .
स्कूल दिनोदिन प्रगति कर रहा था .समय बीतता जा रहा था . उनके कस्बे में अब नए नए दफ्तर और बैंक खुलने लगे थे .शांत कसबे में अब भीड़-भाड़ होने लगी थी . जहाँ इक्का दुक्का कार हुआ करती थी अब ट्रैफिक जाम होने लगा था .कस्बा शहर का रूप लेने लगा था . गर्मी की छुट्टियां चल रही थीं और वे स्कूल के अगले सत्र का सिलेबस बनाने में जुटे हुए थे .उनके कानों में उड़ती हुई खबर पड़ी कि पास के शहर के एक बड़े अंग्रेजी स्कूल का एक ब्रांच उनके कस्बे में भी खुलने वाला है. उन्हें ख़ुशी ही हुई, अच्छा है उनके स्कूल पर बहुत ज्यादा भार पड़ रहा था .कुछ बच्चे उस स्कूल में चले जायेंगे .पर जब गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुला तो उन्होंने पाया , उनके स्कूल के आधे बच्चे उस अंग्रेजी स्कूल में चले गए थे . नयी चमकदार बिल्डिंग थी. चमचमाती हुई स्कूल बस. लोग इस चमक-दमक के प्रलोभन में आ गए थे .पर उन्होंने फ़िक्र नहीं की .वे बहुत लगन से पढ़ाते हैं. उनके स्कूल के बोर्ड का रिजल्ट भी अच्छा होता है. बच्चे मन से पढेंगे .

पर उनकी आशा-निराशा में बदलती गयी . हर साल स्कूल के कुछ बच्चे उस स्कूल में चले जाते और उनके स्कूल में नए एडमिशन कम होने लगे .एक दिन तो राहुल भी जिद करने लगा कि महल्ले के सारे दोस्त अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते हैं, वो भी वहीँ पढ़ेगा ,अंग्रेजी में बोलना सीखेगा . एक दिन उन्होंने बहाने से आस-पास रहने वाले और उस स्कूल में पढने वाले बच्चों को बुलाकर उनका टेस्ट लिया तो पाया कि बस ऊपरी चमक दमक ही है. बच्चों का मैथ्स और अंग्रेजी का ग्रामर बहत ही कमजोर है. उस स्कूल के दसवीं का रिजल्ट भी अच्छा नहीं आया फिर भी लोगों को ज्यादा परवाह नहीं थी. बच्चा अंग्रेजी के दो-चार शब्द बोल रहा है. कड़क युनिफौर्म में बस में बैठकर स्कूल जाता है ,यही देख लोग संतुष्ट हो जाते . खूब धूमधाम से वार्षिक प्रोग्राम मनाया जाता .लोग बताते ,एक महीने से स्कूल में पढ़ाई नहीं वार्षिक प्रोग्राम की ही तैयारी चलती रहती .शानदार स्टेज बनवाया जाता ,किराए पर कॉस्टयूम ,नृत्य-गीत सिखाने वाले बुलाये जाते . खूब रौनक होती . जबकि उनके स्कूल में तो प्रांगण में ही उन्होंने एक सीमेंट का चबूतरा बनवा रखा था .जिसे स्टेज के रूप में काम में लाया जाता .सारी तैयारी शिक्षक और बच्चे ही मिल कर करते .कपडे भी बच्चे अपने घर से या आस-पड़ोस से मांग कर पहनते . नीलिमा की निगरानी में सारी तैयारी होती . रामायण के अंश , हरिश्चंद्र ,बालक ध्रुव की कथा का मंचन किया जाता . इतने छोटे बच्चों की अभिनय कला देख वे अभिभूत हो जाते . रंग बिरंगी साड़ियों का लहंगा बना जब छोटी छोटी बच्चियां लोक नृत्य करतीं तो समां बंध जाता . पर उन्होंने सुना कि उस अंग्रेजी स्कूल में फ़िल्मी संगीत पर तेज नृत्य किये जाते हैं .और आजकल के बच्चों को वही अच्छा लगता . रोहन अपने दोस्तों से सीख कभी कभी नीलिमा और रोहिणी के सामने वो डांस करके दिखाता .वे हंसी से लोट पोट होती रहतीं पर अगर उनकी आहट भी मिल जाती तो सब चुप हो जाते और रोहन वहाँ से चला जाता . वह अब कम से कम उनके सामने आता .उन्हें अपना बेटा ही खोता हुआ नज़र आ रहा था .पर वे दिल को तसल्ली देते ,उनका एक ही बेटा नहीं है .स्कूल के सारे छात्र उनके बच्चे हैं, उन्हें सबकी चिंता करनी है .

राहुल के अन्दर आक्रोश भरने लगा था और इसे व्यक्त करने का जरिया उसने अपनी पढ़ाई को बनाया .वह अपनी पढ़ाई के प्रति लापरवाह होने लगा. रत्नेश शर्मा स्कूल के काम में इतने  उलझे होते कि नीलिमा के बार बार कहने पर भी राहुल पर विशेष ध्यान नहीं दे पाए .वहीँ बिटिया रोहिणी बिना शिकायत किये उनके स्कूल में ही बहुत मन से पढ़ती. वे नीलिमा से कह देते , “रोहिणी भी तो राहुल की क्लास में ही है, उसे भी कहाँ पढ़ा पाता हूँ वो कितने अच्छे नंबर लाती है.” नीलिमा कहती, “सब बच्चे अलग होते हैं ,उन्हें अलग तरीके से ध्यान देने की जरूरत है .” पर स्कूल की चिंता में उलझे वे इस बात की गंभीरता को नहीं समझ पाते .रोहिणी दसवीं में भी मेरिट में आयी . राहुल सेकेण्ड डिविज़न से पास हुआ .अब शहर जाकर कॉलेज में एडमिशन कराना था . उनका बहुत मन था ,दोनों बच्चों को होस्टल में रख कर पढ़ाएं .पर अब पैसों की कमी बहुत खलने लगी थी .वे अपने वेतन का बड़ा हिस्सा भी स्कूल की जरूरतें पूरी करने में खर्च कर देते . नीलिमा उनकी मजबूरी समझती थी. उसने रोहिणी को शहर में रहने वाली अपनी बहन के पास भेजकर पढ़ाने का प्रस्ताव रखा .उन्होंने बहुत बेमन से हामी भरी .रोहन को कम से कम खर्चे में हॉस्टल में रह कर पढ़ाने का इंतजाम किया .उस पूरी रात वे सो नहीं पाए .अपने बच्चों के लिए वे उच्च शिक्षा और जरूरी सुविधाएं भी नहीं जुटा पा रहे हैं . वर्षों पहले लिया गया उनका निर्णय क्या गलत था ? उन्होंने भी नौकरी की होती तो आज ऊँचे पद पर होते और अच्छे पैसे कमा रहे होते .पर फिर उन्होंने  सर झटक दिया ,वे इतना स्वार्थी बन कर कैसे सोच सकते हैं ? इस स्कूल के माध्यम से कितने ही बच्चों को शिक्षा मिली, उनका जीवन संवर गया . अपने बच्चों को थोड़ी विलासिता की वस्तुएं नहीं जुटा सके तो इसका अफ़सोस नहीं करना चाहिए .

वक़्त गुजरता गया . उनका मन था रोहिणी भी पढ़ लिख कर आत्मनिर्भर हो जाए तभी उसकी शादी करें .वो पढने में तेज थी .कम्पीटीशन पास कर बड़ी अफसर बन सकती थी . पर फिर उनकी मजबूरी आड़े आ गयी .बी ए. के बाद राहुल ने दिल्ली जाकर पढने की इच्छा व्यक्त की और उन्हें उसे वहां भेजने के लिए पैसे का इंतजाम करना पड़ा. रोहिणी ने विश्वास दिलाया,उसके पास किताबें हैं.वो घर पर रहकर ही तैयारी करेगी .पर इसी बीच उनके एक पुराने मित्र ने अपने बेटे के लिए बिना किसी दान दहेज़ के रोहिणी का हाथ मांग लिया .नीलिमा ने उन्हें बहुत समझाया कि हमारे पास पैसे नहीं हैं और बिना पैसे के ही इतना अच्छा घर वर मिल रहा है .आपके मित्र हैं , बिटिया शादी के बाद भी पढ़ लेगी .रोहिणी ने भी निराश नहीं किया . अफसर तो नहीं बन पाई पर बी.एड की पढाई की और फिर शिक्षिका बन गयी . राहुल भी किसी प्राइवेट कम्पनी में है .अपने खर्च के पैसे निकाल लेता है .घर बहुत कम आता है, आता भी है तो उनसे दूर दूर ही रहता है. नीलिमा से ही उसके हाल चाल मिलते हैं .


धीरे धीरे उनके स्कूल में बच्चे बहुत ही कम हो गए .कुछ गरीब घर के बच्चे जो अंग्रेजी स्कूल की फीस नहीं दे सकते थे .बस वही आते. उनके स्कूल के शिक्षक भी ज्यादा वेतन पर उस अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाने चले गए . बच्चे कम हो गए. फीस नहीं जमा हो पाती. स्कूल की मरम्मत भी नहीं हो पाती स्कूल की हालत खस्ता होती गयी. अब पहले वाली रौनक भी नहीं रही. अपनी आँखों के सामने अपने सपनों को परवान चढ़ते और फिर यूँ धीरे धीरे बिखरते देख , रत्नेश शर्मा का ह्रदय रो देता .ऐसे ही  बुझे मन से बैठे थे कि दरवाजे के सामने एक कार रुकी . उन्हें लगा कोई किसी का पता पूछ्ने आया है .वरना उनके यहाँ कौन आएगा .एक सज्जन अपने एक छोटे से बेटे के साथ उतरे और उनके घर की तरफ ही बढ़ने लगे . रत्नेश शर्मा उठकर कर खड़े हो गए . वे सज्जन उनके पैरों तक झुक आये और अपने बेटे को बोला, “मास्टर जी को प्रणाम करो ,आज जो कुछ भी हूँ इनकी पढ़ाई की वजह से ही हूँ . आपने पहचाना नहीं मास्टर साब मैं जितेन ,मैंने मेडिकल किया और फिर विदेश चला गया. अपने देश लौटा तो सबसे पहले आपकी चरणधूलि लेने चला आया . मैंने अपने बेटे को आपके बारे में बहुत कुछ बताया है.कितनी मेहनत से आप पढ़ाते थे . शाम को अचानक हमारे घर आ जाया करते थे,देखने कि हमलोग घर पर पढ़ रहे हैं या नहीं. “ रत्नेश शर्मा की आँखें धुंधली हो आयीं . मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती . उनका खोया आत्मविश्वास फिर से जागने लगा . वे दुगुने जोश से भर गए. जितने बच्चे हैं उनके स्कूल में, उन्हें ही मन से पढ़ाएंगे . किसी की ज़िन्दगी बना पायें इस से ज्यादा और क्या चाहिए उन्हें .

मंगलवार, 6 मई 2014

क्या दिल्ली क्या लाहौर : दोनों का दर्द यकसाँ

कभी  रेस्तरां में बैठ कर अकेले कॉफ़ी पी थी और उन अनुभवों पर यहाँ एक पोस्ट भी लिख डाली थी. उस पोस्ट पर अंशुमाला  ने कमेन्ट किया था , "कभी अकेले सिनेमा जाकर भी देखिये, अच्छा अनुभव रहेगा " पर मुझे लगा ये मैं कभी नहीं कर पाउंगी पर जब 'लक्ष्मी ' जैसी कई कला फ़िल्में देखने से छूट गयीं (ये फ़िल्में बस एक हफ्ते ही थियेटर में रहती और जब तक फ्रेंड्स के साथ प्लान बने वे निकल जातीं ) तो सोचा अब अकेले ही फ़िल्में देखना शुरू करना होगा पर अब कानों को पांच बार हाथ लगा लिया. 'आर्ट मूवी  तो कभी अकेले नहीं देखनी '. एक फ्रेंड के साथ 'क्या दिल्ली क्या लाहौर ' देखने का प्लान हुआ. हम लोग समय से ही निकले पर जगह जगह रास्ते की  खुदाई ने ट्रैफिक जाम कर रखा था. देर तो हो ही गयी थी, मेरी फ्रेंड टिकट लेने के लिए थियेटर के सामने ही उतर गयी और मैं अकेले बेसमेंट में गाडी पार्क करने चली गयी कि समय की बचत होगी. वहाँ से भागते हुए हम सीधा थियेटर का दरवाजा खोल अन्दर जाने को हुए कि एक अटेंडेंट ने रोक दिया, 'अभी फिल्म शुरू नहीं हुई है, दरवाजा बंद है ' हमने आस-पास नज़र दौडाई हमारे सिवा वहां कोई नहीं था . तब पता चला हम दोनों ही हैं बस. हम अन्दर गए ,अब सीट नंबर क्या देखना था. अटेंडेंट ने भी कहा ,"जहां मर्जी हो  बैठ जाइए " और उसने पीछे इशारा किया कि फिल्म शुरू करो.  हम दोनों हंस रहे थे कि एक तो गोल्ड क्लास लाल रंग का  आरामदायक  recliners sofa ...हमारे लिए बिलकुल प्राइवेट स्क्रीनींग  हो गयी ये  तो. वो अटेंडेंट उत्साह में आकर हमलोगों को दिखाने लगा ,ऐसे बटन दबाईएगा तो सीट ऊपर आ जायेगी (जैसे हमें नहीं मालूम ) और कहते मेरी सीट ऊपर कर दी. तब तक परदे पर राष्ट्रगीत शुरू होने का सन्देश आया. मैं चिल्लाई , "नीचे करो सीट ,मुझे खड़े होना है ".'जन गण मण' के बाद सीधा फिल्म ही शुरू हो गयी . अब हम दो लोगों के लिए क्या विज्ञापन वाली रील चलाते . फिल्म शुरू होने के बाद हमलोग बिलकुल फिल्म में  में खो गए . अहसास भी नहीं रहा कि हॉल भरा हुआ है या खाली . फिल्म शुरू होने के दस मिनट बाद एक सज्जन आये . उसके दस-पंद्रह मिनट बाद एक और सज्जन आये और बड़ी मशक्कत से मोबाइल की  रौशनी में अपना सीट नंबर ढूंढ कर बैठ गए. उन्हें अँधेरे मे पता नहीं चल पाया कि हॉल तो बिलकुल खाली है . पर पता नहीं क्या सोच कर वे फिल्म देखने आये थे ,दस मिनट देखने के बाद ही फिल्म छोड़ निकल गए . (अपनी   टिकट के पैसे का भी मोह नहीं किया ) आधे घंटे बाद एक कपल आये और कुल मिलकर हम पांच लोगों ने ये फिल्म देखी . वो अटेंडेंट बीच बीच  में आकर हमें देख जाता कि हम ठीक तो हैं .

यह फिल्म भारत-पकिस्तान विभाजन की पीड़ा को दर्शाती है. दोनों ही तरफ एक से लोग हैं एक सी उनकी समस्याएं हैं .फिर भी एक दुसरे के दुश्मन बने बैठे हैं. फिल्म में सिर्फ दो मुख्य पात्र हैं और उनके संवादों के जरिये ही फिल्म आगे बढती है. युद्ध के बीच अपनी अपनी सेना की  टुकड़ियों में ये दोनों ही बचे हुए हैं .रहमत अली(विजय राज ) को हिदुस्तानी चौकी से एक फ़ाइल चुरानी है और समर्थ (मनु ऋषि )उस चौकी की रक्षा में अकेला ही तैनात है. दोनों ही एक दुसरे की तरफ बन्दूक ताने एक दुसरे को भला बुरा कहते हैं,गालियाँ  देते हैं और उन्हीं बातों में पता चलता है कि  रहमत अली ,तीस साल दिल्ली में गुजार कर अब पकिस्तान की फ़ौज में भर्ती हो गया है और  समर्थ, पैंतीस साल लाहौर में बिता कर अब भारत की  फ़ौज में बावर्ची बन गया है. दोनों ही अपने अपने वतन , वहां के लोग, वहाँ की  गलियों को शिद्दत से याद करते हैं जो अब उनके लिए बेगाना हो गया है . रहमत अब पकिस्तान में है पर ,उसकी सारी यादें दिल्ली  से जुडी हुई हैं और उसे दिल्ली  ही अपनी लगती है . समर्थ अब भारत में है, पर उसकी  जड़ें लाहौर में है ,लाहौर ही उसे अपना और दिल्ली बेगाना लगता है.

दोनों ही देशों की सेना के  जवान एक से हैं. घर पर बूढ़े माता-पिता , बीवी बच्चे हैं .उनके  बैग में  बेटे के खिलौने हैं .जेब में बीवी--बच्चों की तस्वीर है .दोनों देशों के राजनीतिज्ञ आरामदायक कमरों में बैठे बिसातें चलते रहते हैं और जलती धूप ,हड्डियाँ जमाती सर्दी में जवान भूखे-प्यासे लड़ते रहते हैं .

युद्ध की  निरर्थकता के साथ ही यह फिल्म इस त्रासदी को भी उजागर करती है ,जिससे लाहौर से आये लोग भारत में और दिल्ली से गए लोग पकिस्तान में जूझते  रहते हैं . फिल्म में दो और पात्र हैं जो बहुत बाद में आते हैं और दोनों भारत और पकिस्तान के मूल निवासी हैं .वे लोग दुसरे मुल्क से आये लोगों को गद्दार समझते हैं, उनपर भरोसा नहीं करते जबकि ये लोग अपना सब कुछ लुटा कर जिस मुल्क में रहते हैं उसे ही अपना समझते हैं पर उन्हें हमेशा शक की निगाह से देखा जाता है .

 कथ्य और अभिनय के अलावा फिल्म के और किसी पक्ष को उभारने की कोशिश नहीं की गयी है. लोकेशन  फिल्मांकन, गीत संगीत कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है . पर फिल्म पूरे समय बांधे रखने में सक्षम है गुलज़ार की आवाज़ में उन्ही की कविता की पंक्तियों से फिल्म शुरू होती है

लकीरें हैं तो रहने दो ,
किसी ने रूठकर गुस्से में शायद खींच  दी थीं
इन्हीं को अब  बनाओ पाला
और आओ अब कबड्डी खेलते हैं ..

 विजय राज ने अपनी पहली निर्देशित फिल्म में लीक  से हटकर कुछ करने की कोशिश की है. चारों पात्र का अभिनय सराहनीय है .

( साढ़े चार  साल हो गए ब्लॉग शुरू किये  पर दो पोस्ट के बीच कभी इतना लंबा अंतराल नहीं आया. ऐसा नहीं कि विषय नहीं आये दिमाग में , कहानी लिखी हुई रखी  है, सामयिक विषयों, फिल्मों पर लिखना था पर वही फेसबुक की महिमा .वहाँ एक पैराग्राफ लिख  दिया . कई बार लम्बा  विमर्श भी  हो गया और उस विषय को विस्तार मिल गया पर  ब्लॉग सूना ही रह गया .इसलिए इस बार सोचा पहले ब्लॉग पर ही लिखूंगी फिर फेसबुक  अपडेट )

गुरुवार, 6 मार्च 2014

एक रचनात्मक सांझ

गत रविवार २ मार्च २०१४ को गोरेगांव मुम्बई में 'अवितोको साहित्य संध्या 'के तहत  एक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन हुआ. हर महीने के प्रथम रविवार को  ऐसे एक आयोजन की  योजना है ,जहाँ साहित्य के प्रत्येक  विधा ,कहानी -कविता-नाटक-संगीत पर विमर्श हो, सृजनधर्मियों को  एक प्लेटफॉर्म  मिले जहां वे आपस में मिलजुल कर साहित्यिक गतिविधियों ,समाजक स्थितियों सहित अन्य विषयों पर चर्चा कर  पायें . इस गोष्ठी का आयोजन 'अजय ब्रह्मात्मज एवं विभा रानी' के निवास स्थान पर हुआ. इस आयोजन में दो युवा कथाकाकारों की  कहानी का पाठन  होने वाला था और कहानी लेखक भी वहां उपस्थित रहने वाले थे . हर लिखने-पढने में रूचि रखने वालों को इस तरह के साहित्यिक समागम की प्रतीक्षा रहती है. 

मुझे भी इस आयोजन में शामिल होने की आतुरता से प्रतीक्षा  थी . मैं समय से कुछ पहले ही पहुँच गयी और मुझे लगा शायद  सबसे पहले पहुँचने वाली मैं ही हूँ.पर वहाँ काफी लोग पहले से उपस्थित थे, मोहल्ला लाइव के अविनाश दास,  सिने अभिनेता 'प्रणय नारायण, युवा कथाकार सारंग उपाध्याय (जिनकी कहानी का पाठन होने वाला  था ) सचिन श्रीवास्तव और कई लोग उपस्थित थे . जब विभा रानी ने सबसे परिचय कराने के क्रम में कहा, 'ये अविनाश हैं' और 'ये रश्मि हैं' तो हमलोगों ने एक दूसरे को रस्मी नमस्ते कहा फिर जब उन्होंने आगे जोड़ा ये रश्मि रविजा हैं तो अविनाश जी ने रविजा पर जोर देते हुए कहा 'ओह ये  रश्मि रविजा हैं' और तब मैंने भी पहचान कर कहा, 'अच्छा तो आप अविनाश दास हैं' .ब्लॉग के माध्यम से बहुत पहले ही परिचय हो चुका था पर पहली बार मिले थे और सिर्फ फर्स्ट नेम से नहीं पहचान पाए थे .

विभा रानी ने भी एक रोचक घटना का जिक्र किया ,काफी लोग अब भी  नहीं जानते कि प्रसिद्द फिल्म समीक्षक 'अजय ब्रह्मात्मज 'और लेखिका ,कवियत्री, मंच कलाकार विभा रानी  पति -पत्नी हैं. (मुझसे भी कई लोग पूछ चुके हैं ) पत्र-व्यवहार के जमाने में 'ज्ञानरंजन 'जी से विभा जी और अजय जी दोनों का पत्रव्यवहार होता था .एक बार ज्ञानरंजन जी ने विभा रानी को पत्र  लिखा कि 'अजय ब्रह्मात्मज भी शायद आपके घर के आस-पास ही रहते हैं उन्हें अमुक सन्देश दे दीजियेगा "
विभा रानी ने जबाब दिया कि 'वे उनके घर में ही रहते हैं और उनके पति हैं' . ज्ञानरंजन जी पत्र पढ़कर बहुत देर तक हँसते रहे कि उन्होंने पता पढ़ कर ये तो जान लिया था कि दोनों जन आस-पास ही रहते हैं पर फ़्लैट नंबर पर ध्यान नहीं दिया था :)

    धीरे धीरे फिल्म, टी.वी.पत्रकारिता, थियेटर से जुड़े लोग आते गए जिनमे सुदेशना द्विवेदी, शेषनाथ पांडे ,श्रीराम डाल्टन ,दीप्ति मिश्र,रवि शेखर,विनु विनय, श्याम डांगी,संजय झा मस्तान ,प्रेम शुक्ल,राम गिरधर, रवि वैद्य ,शशि शर्मा, निवेदिता बौंठियाल, सरिता हुसैन आदि  प्रमुख हैं. समय पर कार्यक्रम शुरू हुआ विभा रानी ने कार्यक्रम की रुपरेखा बतायी और परिचय का दौर शुरू हुआ . सबने अपना परिचय दिया . प्रखर पत्रकार सुदेशना द्विवेदी,जो धर्मयुग से जुडी हुई थीं और धर्मयुग की  सह सम्पादक रह चुकी थीं ,पुरानी  परिचित और बहुत अपनी सी लगीं क्यूंकि धर्मयुग मेरा सबसे  अज़ीज़ रहा है और पढने-लिखने में जो भी थोड़ी बहुत रूचि है इसका पूरा  श्रेय धर्मयुग को ही है. प्रणय नारायण ने 'सारंग उपाध्याय की कहानी 'नीम की पत्तियां ' पढ़ीं . अविनाश दास ने इस कार्क्रम के लाइव प्रसारण की व्यवस्था की थी और  कई लोगों द्वारा यह कार्यक्रम लाइव देखा जाने लगा . 

'नीम की पत्तियाँ '  कहानी की नायिका एक अधेड़ स्त्री 'दया' है जो अपनी तीन किशोरी बेटियों के साथ नीम के पत्तों के गट्ठर लेकर ट्रेन से मुंबई के बाज़ार में बेचने के लिए आती है. ट्रेन में उसे तरह तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है. उसे तीन युवा बेटियों की भी चिंता लगी रहती है. इस पूरी ट्रेन यात्रा का और दया की  मनस्थिति का बहुत ही सूक्ष्मता से वर्णन किया गया है. ऐसा लगता है हम भी ट्रेन के उसी डब्बे में सवार होकर सबकुछ महसूस कर पा  रहे हैं. कहानी का अंत बहुत ही प्रभावशाली  है और बदलते हुए सामाजिक परिदृश्य से रूबरू करवाता है जब दया की बेटी अपनी माँ की तरह टी टी को रिश्वत में कुछ रुपये नहीं बल्कि रिजर्वेशन का टिकट देती है और इतनी विषम परिस्थितियों में भी अपनी लड़कियों को मुस्कुराते देख दया के चेहरे पर भी मुस्कान आ जाती है. " कहानी  पर सबने अपने विचार रखे और कई लोगों ने बताया कि उनलोगों ने भी ट्रेन में महिलाओं को इस तरह की परेशानियों का सामना  करते देखा है .इतना तो निश्चित है अब जब बाज़ार में स्त्रियाँ दातुन , पत्ते या लकड़ी बेचती दिखेंगी तो यह कहानी  जरूर याद आएगी और यह ख्याल भी जरूर आएगा कि  लोगों की जरूरत पूरी करने और अपने लिए दो पैसे कमाने  के लिए ये स्त्रियाँ इतनी परेशानियां उठाती हैं .(शायद इनसे अब मोल-भाव भी कम की जाए ) . सारंग उपाध्याय से इस कहानी  की रचना प्रक्रिया के विषय में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि कई बार उन्होंने अपनी यात्रा में इन स्त्रियों को भाग भाग  कर ट्रेन में चढ़ते और टी.टी. की डांट सुनते देखा है. वहीँ से उपजी  है यह कहानी .

इसके बाद 'श्रीराम डाल्टन' ने गौरव सोलंकी की कहानी ," बच्चों के पहुँच से दूर " पढ़ी . यह कहानी एक बच्चे की कहानी  है जो अपने घर में ही काफी विसंगतियां देखता है. बच्चा ,अपनी  माँ के साथ बहुत खुश है पर माँ दूसरे बच्चे को जन्म देते वक़्त बीमार पड़ जाती है और उसकी देखरेख के लिए मौसी आ जाती है. उसकी मौसी और उसके पिता में अवैध रिश्ता कायम हो जाता है और पिता चौकीदारी  के लिए बच्चे को एक रुपया देकर कमरे के बाहर बिठा कर रखता है. एक दिन बच्चा उत्सुकतावश कमरे में झाँक  लेता है तो पिता  बुरी तरह उसकी पिटाई करते हैं. माँ रजाई में मुहं छुपा कर रोती रहती है .बच्चे को अपने माता-पिता दोनों के प्रति आक्रोश है कि पिता अपनी गलती छुपाने के लिए उसकी पिटाई करते  हैं और माँ उसकी रक्षा नहीं  कर पाती . फिर माँ ठीक हो जाती है, मौसी की बेईज्जति करके उसे वापस भेज देती है. फिर सबकुछ पहले जैसा हो जाता है ये तीनो लोग समान्य रूप से रहने लगते हैं पर बच्चा  इसे स्वीकार नहीं कर पाता. उसे महसूस होता है कि यह सब नकली है . और एक दिन, एक पुडिया जिसमे चूहे मारने की दवा थी और जिसपर लिखा था 'बच्चों के पहुँच से दूर रखें ',अपने पिता के दूध के ग्लास में डाल देता है .पिता की मृत्यु हो जाती है और बच्चा पुलिस के डर से कह देता है कि उसने माँ को दूध में उस पुडिया में से कुछ डालते हुए देखा था . बच्चा अपने कारनामे के इतने भयंकर परिणाम की गंभीरता नहीं समझता है पर वह अपनी तरह से अपना आक्रोश प्रकट करता है " 

कहानी के अंत ने सबको चौंका दिया और इस पर काफी चर्चा हुई . सबका मानना था कि बच्चों को कोई गंभीरता से नहीं लेता . इस विषय पर चिंता व्यक्त की गयी कि बच्चों को केंद्र में रखकर उनकी मनस्थिति को पढ़कर बहुत कम रचनाएं हुयी हैं. बल्कि बच्चों के लिए भी न कहानियाँ  लिखी जाती हैं न ही फिल्मे बनती हैं . थियेटर से जुडी 'सरिता हुसैन ', ने चिंता व्यक्त की कि वे बच्चों के लिए कोई नाटक करना भी चाहती हैं तो उन्हें पंचतंत्र की कहानियों की शरण लेनी पड़ती है क्यूंकि बच्चों के लिए कुछ नहीं लिखा जा रहा . अजय ब्रह्मात्मज जी से भी पूछा गया कि "बच्चों के लिए फ़िल्में क्यूँ नहीं बनती ?" अजय जी ने बताया कि 'फिल्म निर्माण एक बहुत ही महँगी प्रक्रिया है और बच्चों की फिल्म बनाकर पैसे नहीं कमाए जा सकते इसीलिए फ़िल्मकार कोशिश नहीं करते .'गौरव ने इसकी रचना प्रक्रिया के विषय में बताया कि अपने छात्र जीवन में ही उन्होंने एक खबर पढ़ी थी कि एक पिता अपनी बेटी को एक रुपया देकर दरवाजे के बाहर चौकीदारी के लिए बैठा देता था . उस लड़की के मन में क्या भाव आते होंगे .यही सब सोच गौरव को इस कहानी  को लिखने की प्रेरणा मिली . 

इधर साहित्य चर्चा होती रही और एक सुयोग्य मेजबान का धर्म निभाते हुए अजय ब्रह्मात्मज जी ने सबके लिए चाय बनायी . 

सभी लोगों ने  एक रचनात्मक सांझ उपलब्ध करवाने के लिए .विभा रानी और अजय ब्रह्मात्मज का ह्रदय से धन्यवाद किया .सभी लोग आपस में मिलकर और एक साहित्यिक चर्चा के रसास्वादन का अवसर पाकर बहुत प्रसन्न थे . अगली बैठक में कवितायें पढ़ी जायेंगी और उनपर चर्चा होगी. अभी से ही उस शाम का इंतज़ार शुरू हो गया है .  

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

सपने जो सिर्फ सपने न रह जाएँ

पता नहीं कितने मित्रों ने यह सपना बांटा है कि उनकी तमन्ना है कि कुछ पैसे कमा लेने के बाद वे अपने गाँव  चले जायेंगे और वहां नए वैज्ञानिक तरीके से खेती-बाड़ी करेंगे . हाल में मेरे सुपुत्र ने भी कहा, " मैं जानता हूँ ,तुम हंसोगी सुनकर पर मैं कुछ दिनों बाद देहरादून में जाकर रहूँगा और बच्चों को पढ़ाऊंगा " मैंने हंसी छुपाते हुए कहा , "देहरादून क्यूँ...यहाँ भी बच्चों को पढ़ा सकते हो.." नहीं...मुझे पहाड़ पसंद है.." फिर मेरा वही रटा रटाया जबाब था कि "देखेंगे  नौकरी ,प्रमोशन ,के कुचक्र में ऐसे उलझोगे कि याद भी नहीं रहेगा, ऐसा कभी सोचा भी था तुमने ." 

और गलत मैंने भी नहीं कहा, करीब पांच साल पहले, एक मित्र ने बहुत पकाया था ( यही शब्द उपयुक्त है ). बाकायदा अपनी योजना बतायी थी..एक ट्रैक्टर खरीदूंगा ,गाँव में सौर्य ऊर्जा से बिजली का उत्पादन होगा...फलों के बाग़ लगाऊंगा..वगैरह वगैरह . और  आज वे विदेश में हैं .छुट्टियों में अपनी पत्नी श्री के साथ स्विट्ज़रलैंड और पेरिस की  सैर पर जाते हैं. 

एक मित्र आज भी कहते हैं..."बस कुछ दिन और नौकरी करनी है ,फिर तो अपने घर जाकर खेती,बागबानी  करूँगा  " मैं कह देती हूँ ,"खेती तो आज भी कर सकते हैं...अभी क्यूँ नहीं चले जाते " तो उनका कहना है,"जिन सुविधाओं का आदी हो चुका हूँ उन्हें जुटाने के लिए पहले पैसे तो कमा लूँ...इंटरनेट, अखबार ,किताबों के लिए पैसे चाहिए .इनके बगैर मैं नहीं जी सकता " इनके सपने भी कितने फलित होते हैं ,देखने में ज्यादा देर नहीं. वे विवाहयोग्य उम्र के हो चुके हैं और घर वालों का दबाव शुरू हो चुका है.

अपनी सहेलियों से जिक्र किया तो दबी सी कसक उनकी आवाज़ में भी उभरी . कॉलेज के दिनों में हमने भी ऐसे सपने देखे थे कि पहाड़ पर एक झोपड़ी बना कर रहेंगे या लहलाहते खेतों के बीच मिटटी का घर होगा. 

कई लोग नौकरी करते वक्त ,सरकारी क्वार्टरों में ही जीवन गुजार देते हैं. अपना घर नहीं बनवाते क्यूंकि रिटायरमेंट के बाद गाँव में जाकर खेती  संभालने की योजना रहती है. लेकिन जब योजना को कार्यान्वित करने  का समय आता है तो उन्हें आभास होता है कि गाँव में बिजली नहीं रहती,और अब टी.वी. ,फ्रिज़ ,इंटरनेट के बिना जीना संभव नहीं. पत्र-पत्रिकाएं नहीं मिलतीं. बातें करने के लिए अपने मानसिक स्तर के लोग नहीं हैं, खेती करना इतना आसान नहीं. और वे शहर  में ही एक फ़्लैट खरीद कर बस जाते हैं. 

पर सवाल यह भी है कि इस तरह के ख़याल लोगों के मन में आते क्यूँ हैं ,आँखों में  ऐसे सपने उगते  क्यूँ हैं ? कुछ तो आदर्शवाद ,जीवन में कुछ सार्थक करने की तमन्ना रहती है . कुछ इसलिए भी क्यूंकि ज़िन्दगी में कदम रखने के बाद कुछ सोचने-समझने लायक हुए नहीं कि उसके पहले ही कवायद शुरू हो जाती है ,पढ़ाई करो...अच्छे नंबर लाओ, अच्छी डिग्री हासिल करो, नौकरी करो , शादी करो, बच्चों का लालन-पालन , उनकी शिक्षा दीक्षा के लिए पैसे जमा करो, घर बनवाओ ,अपने बुढापे के लिए पैसे सहेजो, बीच बीच में वैकेशन  पर जाओ, त्यौहार मनाओ , बीमारी का इलाज करवाओ  और फिर इस दुनिया से कूच कर जाओ. पीढ़ी दर पीढ़ी इसी सेट पैटर्न पर दुनिया चलती रहती है. पर  मानव मन इनकी पकड़ से छूटने को छटपटाता रहता है. इन सारे नियम कायदों को धता बता कर अपने मन का कुछ करने की तमन्ना मन में पलती रहती है. और तभी ऐसे इन्द्रधनुषी सपने आँखों में सज जाते  हैं. 

कुछ लोग , इन नियमों से हटकर अपने नियम खुद बनाते हैं...अपने सपने पूरे करते हैं ...अपनी शर्तों पर जीवन जीते हैं पर उन्हें कभी भी समाज से सहयोग,प्रशंसा ,समर्थन नहीं मिलता .शायद ईर्ष्यावश कि जो हम नहीं कर पाए ,दूसरा  कैसे कर ले ?? किसी लड़की ने शादी नहीं की , नौकरी कर रही है ,अच्छे  पैसे कमा रही है..घूम रही है..अपने मन का खा -पी-पहन रही है पर नहीं पूरे समाज के पेट में दर्द होने लगता है. उसने शादी नहीं की...माँ नहीं बनी ..उसका नारी जीवन निरर्थक .घुट्टी में पिला दी जाती है."नारी जीवन की सार्थकता तो बस 'माँ' बनने में है.".  माँ बनना जीवन की एक ख़ूबसूरत अनुभूति है पर नारी जीवन का एकमात्र लक्ष्य यही नहीं होना चाहिए. लड़के-लड़की शादी न करें ,बच्चे न पालें तो पूरा समाज इसी चिंता में  घुला जाता है, उनके बुढापे का सहारा कौन बनेगा ?? जबकि असलियत ये है कि आजकल ज्यादातर वृद्ध माता-पिता अकेले ही ज़िन्दगी गुजार रहे होते हैं, बच्चे या तो सुदूर किसी शहर में होते हैं या विदेश में .  

इन सारी सीमाओं के बीच भी सपने पलते रहने चाहिए ...सपने देखे नहीं जायेंगे तो पूरे कैसे होंगे :).

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

स्मृतियों में बसा वसंत पंचमी का दिन

सरस्वती पूजा का दिन तो स्मृतियों में यूँ बसा हुआ है कि हर साल यह दिन बीते दिनों को याद करते हुए ही गुजरता है. सबसे पहले तो अपना ब्लॉग खंगाला कि वसंत-पंचमी के संस्मरण भी जरूर लिखे होंगे कहीं , पर शायद इसी वर्ष ,यह संस्मरण  लिखने का दिन मुक़र्रर था . 

बिहार में दुर्गा पूजा जैसी ही सरस्वती पूजा मनाने की भी धूम होती है. चमक-दमक भले ही थोड़ी उन्नीस हो पर उत्साह वैसा ही होता है. हर गली-नुक्कड़, मोहल्ले और करीब करीब हर स्कूल  में सरस्वती जी की प्रतिमा स्थापित की  जाती है .बड़े उत्साह  से पूजा की जाती है . सुन्दर कपड़ों में सजे  लड़के-लड़कियों की  टोली सरस्वती जी के दर्शन के लिए आती-जाती दिख जाती है.   उन दिनों ,पूजा से एक दिन पहले मंडप की सजावट करते हुए ,रात भर  लाउडस्पीकर पर गाने बजाये जाते थे  . (अब का नहीं पता ). हमारे समय में तो जनवरी सेशन होता था यानी कि जनवरी में नयी क्लास में जाते थे . सरस्वती पूजा तक शायद ही किसी स्कूल में ढंग से पढाई शुरू होती हो. पूरा स्कूल ही वसंत-पंचमी की तैयारियों में संलग्न होता था .

अक्सर महल्ले के बच्चे भी मिलकर किसी एक जगह सरस्वती जी की प्रतिमा बिठाते हैं .कुछ लोग अपने घरों में भी उनकी मूर्ति ला कर पूजा  करते हैं, (जैसा महाराष्ट्र में गणेशोत्सव में करते हैं .) मैं सातवीं में थी तो हमने भी हमउम्र बच्चों के साथ सरस्वती पूजन करने की  शुरुआत की .तब हर घर से दो दो रुपये के चंदे जमा करते थे , मूर्ति लाना ,प्रसाद बनाना सबकुछ उन पैसों में ही हो जाता था . मेरे और पड़ोस में रहनेवाली  प्रतिमा दी के सम्मिलित छत पर मूर्ति बिठाते .सबलोग अपनी अपनी माँ की रंग-बिरंगी साड़ियाँ लाते और उनसे ही सजावट करते . लाल -पीले कागज़ के तोरण बनाए जाते . शाम से ही सरस्वती जी के सामने अपनी अपनी कला का  प्रदर्शन शुरू हो जाता. संगीत-नृत्य -नाटक का रंगारंग कार्यक्रम होता . पर सब कुछ बच्चों के बीच ही. पूजा की तैयारियों से लेकर विसर्जन तक सारा काम हम बच्चे ही संभालते .बस विसर्जन के लिए जीप देकर , ऑफिस के प्यून, वाचमैन को साथ कर दिया जाता . आठवीं में मैं हॉस्टल में चली गयी फिर भी सरस्वती पूजा से पहले जरूर आ जाती . 

पर जब मैं दसवीं में थी तो बहुत सारी जिम्मेवारी मेरे ऊपर भी  थी और स्कूल के सरस्वती पूजन में शामिल होने का उत्साह भी था . मैं अपने महल्ले की पूजा में सम्मिलित नहीं हुई थी और बाद में पता चला , महल्ले के लड़के-लड़कियों में घमसान हो गया था . अब उम्र में सब थोड़े से बड़े हो  गए थे और थोड़े शैतान भी. हमेशा की तरह ही सबने मिल कर पूजा की तैयारी की . लड़कों ने दुसरे महल्ले में  और भी कई  जगह जाकर अच्छा चन्दा इकठ्ठा किया था . इन  पैसों से  अच्छे प्रसाद का इंतजाम भी हुआ .जहाँ पहले प्रसाद में सिर्फ बुंदिया (सूखी मीठी बूंदी ) और थोड़े से फल होते थे ,इस बार अच्छी  मिठाइयां थीं .  इस बार मूर्ति छत पर नहीं ,एक खाली पड़े क्वार्टर में बिठाई गयी थी ..देर रात तक सबने मिलकर सजावट की .सुबह पूजा भी हुई पर सुना इसके बाद लड़कियों ने लड़कों को सिर्फ एक एक दोना प्रसाद देकर, चलता कर दिया और  पूजा की सारी बागडोर अपने हाथों में ले ली . विसर्जन के समय भी लड़कों को साथ नहीं ले गयीं .और क्वार्टर में ताला लगा गयीं ,जिसमे बचा हुआ प्रसाद भी रखा हुआ  था . अब लड़के  शान्ति से ये सब सह जाएँ ऐसा कभी हुआ है ,भला . इधर लडकियां विसर्जन के लिए गयीं और लड़के ताला तोड़ कर क्वार्टर के अन्दर  . इस ग्रुप में ज्यादातर भाई-बहन ही थे, जो अब  अलग-अलग खेमों में बंट गए थे  . सारा प्रसाद लाकर महल्ले में बाहर ही स्टूल पर रखा गया, लड़कों ने खुद खाए लोगों को बांटे  और नाच-गा कर खूब धमाल किया . लड़कियों के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा .लडकियां  वापस लौटीं तो स्टूल पर रखे खाली परात-टोकरी और गाते-नाचते लड़कों की टोली ने उनका स्वागत किया. लड़कियों ने खूब झगडा किया और लड़के उन्हें चिढाते रहे . मामला बराबरी का ही था . उन दिनों किसी भी घर के बड़े बिलकुल ही इन बातों में नहीं पड़ते थे .ये लोग खुद ही आपस में सुलझा या उलझा लिया करते थे .

हमारे स्कूल की पूजा भी  बहुत शानदार होती थी . स्कूल में खेल के मैदान के एक सिरे पर सीमेंट-ईंट का परमानेंट स्टेज बना हुआ था .चार दिन पहले से ही कुछ बंगाली लडकियां उसपर अल्पना  बनाना शुरू कर देतीं  .अल्पना में  बड़े से शंख और मछली की आकृति जरूर होती . स्टेज से लेकर गेट तक सुर्खी (ईंट का बुरादा ) की एक चौड़ी सड़क बनाई जाती .रेड कार्पेट जैसा कुछ हालांकि वो चलने के लिए नहीं सिर्फ शोभा के लिए होता था .उसपर 'चॉक पाउडर'  से फूल -पत्ती उकेरा जाता .(वसंत पंचमी के बाद हम हॉस्टल वाले उस सुर्खी से एक-दो बार होली जरूर खेलते .सारी लड़कियों को पकड पकड़ कर उनपर वो सुर्खी डाली जाती और फिर हमें सामूहिक सजा मिलती . ) प्रसाद भी बहुत अच्छा होता था दो मिठाई, फल मीठी बूंदी होती थी . पूरे दिन दर्शन करने वालों का तांता लगा होता और हम लड्कियाना प्रसाद बांटने में लगी होतीं.

स्कूल हो या कॉलेज कभी भी मैं सरस्वती पूजा से पहले वाली रात नहीं सोयी . सजावट का काम या  फलों को काटने का या फिर कागज़ के प्लेटों में प्रसाद लगाने का .,पूरी रात जागकर किये जाते और फिर सुबह सुबह नहा धोकर फिर से हाज़िर .एक क्लासरूम से डेस्क हटाकर प्रसाद लगाने का काम होता. कागज़ के प्लेटों की लम्बी लम्बी कतार हुआ करती थी. हॉस्टल में रहने वालों को मिठाई के दर्शन भी  मयस्सर नहीं थे फिर भी श्रद्धा ऐसी थी कि कभी किसी लड़की ने मिठाई का एक टुकडा भी मुहं में नहीं डाला (यहाँ, लड़कों पर ऐसा विश्वास नहीं किया जा सकता ...लडकों को बुरा लगे तो लगे पर सच यही है ...... पूजा के लिए रखे लड्डुओं का भोग लगाने की कथा खुद कई लड़के सुना चुके हैं ) एक सफ़ेद रंग का हल्का मीठा पानीदार फल होता था ,शायद नामा इसका केसर था .बेर और यह फल प्रसाद में जरूर होते थे .  उस वर्ष ,सरस्वती -पूजा के दिन अचानक से तेज आंधी-तूफ़ान आ गया था और पंडाल गिर गया. बहुत सारी लडकियां अपनी किताबें लेने पंडाल की तरफ भागीं क्यूंकि हम रात में ही कठिन विषय वाली किताबें सरस्वती जी के आस-पास रख देते थे कि शायद उसमें थोड़ी विद्या आ जाए और उस कठिन विषय को आसान बना  जाए . शायद दसवीं में आने से मैं थोड़ी जिम्मेदार हो गयी थी. . मैंने भागकर मेन स्विच ऑफ कर दिया था. प्रिंसिपल और टीचर्स से काफी तारीफ मिली और इनाम का वायदा भी . जो नहीं मिला ,बाद में सब भूल-भाल गए :(

लड़कियों  के बीच सरस्वती-पूजा का एक जबरदस्त आकर्षण होता था ,साड़ियाँ पहनने का  मौक़ा मिलने का .ज्यादातर लडकियां उस दिन साड़ी पहनती . हफ़्तों पहले ,माँ-मौसी-चाची या फिर पड़ोस वाली आंटी की साड़ियों में से पीले रंग की साड़ियों की चयन-प्रक्रिया शुरू हो जाती.  टेंथ वाली तो सारी लडकियां ही साडी पहनतीं पर मुझमे थोड़ी खडूसियत शुरू से ही है. मैं साड़ी नहीं पहनती थी जबकि हॉस्टल की ही किसी टेंथ की लड़की को साडी पहनकर पूजा पर बैठना होता था .पूजा पर बैठने का मन तो था पर साडी पहनना गवारा नहीं था .पूजा वाले दिन टीचर्स, डे स्कॉलर लडकियां सब हैरान थीं क्यूंकि उन्हें यही अपेक्षा थी कि मैंने  ही साडी पहनकर पूजा की होगी. पर एक अच्छी बात ये हुई कि जिस लड़की ने साडी पहनकर पूजा की, उसे स्कूल में सब पहचान गए .

टेंथ के बाद ही मैं स्कूल-कॉलेज के सरस्वती-पूजा समारोह में ही शामिल होने लगी . हॉस्टल में ही रहती, घर नहीं आती. इसलिए एक रोचक अवलोकन से वंचित रह गयी . पहले, कैशोर्य की सीढियों पर कदम  रखते ही लड़के-लड़कियों के अलग ग्रुप हो जाते थे . उनका बातचीत करना, मिलना-जुलना, साथ खेलना सब बंद . सरस्वती-पूजा ऐसा मौक़ा होता था जब मिलकर हाल-ए-दिल सुनाये जाते . हमारे महल्ले की एक लड़की ने ने तो यही मौक़ा चुना था ,घर से वह सज-धज कर पूजा देखने निकली पर देवघर में जाकर शादी के बंधन में बंध गयी . बाद में लड़की के घरवालों ने ये रिश्ता स्वीकार कर लिया था . लड़का तो सीधा बहु लेकर ही अपने घर पहंचा था . फिल्म 'हासिल' में भी कुछ ऐसा ही दृश्य फिल्माया गया है, जहाँ लड़की साडी पहनकर अपनी सहेली के यहाँ सरस्वती पूजा में जाती है और फिल्म का हीरो जो अब तक सिर्फ उसके रिक्शा के पीछे पीछे अपनी सायकिल पर उसके घर तक जाता था .पहली बार हिरोइन से वहीँ मिलता है.


दिल्ली -मुम्बई में तो सरस्वती-पूजा सिर्फ टी.वी. या नेट से ही पता चलता है. बच्चे जब बहुत छोटे थे तो स्कूल में उन्हें पीले कपडे पहन कर जाना होता था .यहाँ वसंत-पंचमी का अर्थ पीत-वस्त्र धारण करना ही है. कई ऑफिस में भी ये ड्रेस कोड होता है. 

अब तो यही सोच कर खुश हो लेती हूँ,  मेरे पास इस विशेष दिन की मधुर यादें तो हैं .

आप सबको वसंत पंचमी की अनेक शुभकामनाएं !!

बुधवार, 29 जनवरी 2014

ये रस्में कैसी कैसी


पहले मुझे लगा यह विषय बहुत ही पुरातनपंथी सा है . वर्तमान युग में लोगों की ऐसी सोच नहीं हो सकती परन्तु पिछली पोस्ट पर आयी टिपण्णी देख लगा,अब भी कई लोग यही सोचते  है कि स्त्रियों का श्रृंगार सिर्फ पुरुषों को आकृष्ट करने के लिए या  उनके लिए ही होता है . उन टिप्पणीकर्ता का कहना था ,"आप भी सोचिये.... स्त्रियाँ क्यों सजती है, संवरती है , क्यों आकर्षक दिखने का प्रयत्न करती है .. एक ऐसे समाज की कल्पना कीजिये जहाँ सिर्फ स्त्रियाँ ही स्त्रियाँ हो , कोई पुरुष नहीं दूर दूर तक नहीं .. क्या स्त्रियाँ वैसे ही सजेगी , वैसे ही संवरेंगी " मैंने उन्हें विस्तार से जबाब दे दिया था और इस विषय को वहीँ छोड़ दिया था . पर अभी हाल में ही एक शादी में सम्मिलित होने का मौक़ा मिला . शादी की रस्मों में एक रस्म वर-वधू  द्वारा सात वचन लेने की रस्म भी होती है . वहाँ पंडित जी ,एक वचन का बड़े विस्तार से वर्णन कर रहे थे , " पति ही पत्नी का श्रृंगार है, अगर वह दूर देश जायेगा तो वचन लो कि तुम श्रृंगार नहीं करोगी क्यूंकि तुम्हारा श्रृंगार अब सिर्फ पति के लिए है " 

पास बैठी एक सहेली ने बताया कि उसके एक परिचित की मृत्यु हो गयी थी उनके श्राद्ध में भी पंडित जी उनकी  पत्नी को यही सब कह रहे थे , "तुम्हारा श्रृंगार चला गया , तुम्हे अब बिलकुल सादगी से रहना होगा, सादा जीवन बिताना होगा...तुमने पिछले जनम में न जाने कैसे पाप किये हैं कि यह दिन देखना पड़ा..आदि अदि " उसकी छोटी सी बच्ची माँ के पास बैठी सब सुन रही थी . 
घर के बहुत लोगों को ये सब सुन कर बहुत बुरा लगा होगा, पर माहौल कुछ ऐसा होगा कि पंडित को किसी को टोकते नहीं बना होगा. 

कई समारोह -पूजा में शामिल होने का मौक़ा मिला है और मैंने अक्सर देखा है कि सारे लोग पंडित जी की बात ध्यान से सुनते हैं और शायद खुद को केंद्र में पाकर अधिकाँश पंडित जी लोगों की वाक्यचातुरता भी  बढ़ जाती है .वे अपने तरीके से  रस्मों की  वृहद व्याख्या करने में लग जाते हैं .

पर लोगों की मानसिकता भी ऎसी ही है . हमारे शेरो-शायरी, कविता ,गीत में भी इस बात का बहुत ही प्रचार किया गया है, "सजना है मुझे सजना के लिए..." जैसे गाने सबकी जुबान पर होते हैं . वैसे इन सबमें  में आंशिक सत्यता भी है.  जब प्यार में हो तो एक दूजे के लिए सजना-संवारना अच्छा ही लगेगा . पर यह बात  दोनों पक्षों पर लागू होती है. कोई लड़का भी लड़की से मिलने जाएगा तो गन्दी सी शर्ट ,उलझे बाल और टूटे चप्पल में नहीं ही जाएगा .  जब ये ख्याल रहे कि कोई नोटिस करने वाला है...ध्यान देने वाला है तो अपने आप ही सजने संवरने का ध्यान आ ही जाता है.(प्रसंगवश एक बात याद आ गयी, एक सहेली अपने बेटे के विषय में बता रही थी कि उसने अपनी  पसंद की लड़की से शादी करने का प्लान किया है . फ्रेंड हँसते हुए बता रही थी कि "अब तू उसे देखना  बहुत स्मार्ट हो गया है, जबसे गर्लफ्रेंड आयी है, अपने कपड़ों का ध्यान रखने लगा है...पहले तो कुछ भी पहन लेता था :)}

पर ये कहना या सोचना कि लडकिया/स्त्रियाँ सिर्फ पुरुषों के लिए या पति के लिए ही सजती संवरती हैं ,बिलकुल गलत है . यूँ भी लड़कियों की प्रकृति ही होती है श्रृंगार की . वो जंगल में अकेले भी रहेगी तो एक फूल तोड़ कर बालों में लगा लेगी . प्रसिद्द लेखिका ,'शिवानी' का एक संस्मरण पढ़ा था जो उनके 'जेल के महिला सेल' के दौरे पर था .उन्होंने लिखा था जेल में महिलाओं के लिए कोई आईना नहीं था . लेकिन हर महिला के बाल संवरे हुए थे . जली हुई लकड़ी के कालिख से छोटी सी काली बिंदी लगी हुई थी माथे पर . एक बार शिवानी ने देखा, थाली में पानी भरा हुआ था और उसमें अपना प्रतिबिम्ब देख एक महिला कैदी अपनी बिंदी ठीक कर रही थी. अब जेल में कौन से पुरुष थे जिनके लिए ये महिलायें अपना रूप संवार रही थीं ??

और ऐसा सिर्फ आज के जमाने में नहीं है कि लडकियां ,घर से बाहर निकल रही हैं ,नौकरी कर रही हैं तो उन्हें खुद का ख्याल रखना पड़ता है ,सजना पड़ता है.,स्मार्ट दिखना पड़ता है. पहले जमाने में भी लड़कियों/औरतों का पुरुषों से मिलना-जुलना  नहीं बराबर था फिर भी वे खूब सजती-संवरती थीं . गाँव में झुण्ड में मंदिर जातीं, शादी-ब्याह में चटख रंगों के  कपडे पहने, जेवर से लदी, टिकुली, सिन्दूर, आलता लगाए औरतें क्या पुरुषों को दिखाने/रिझाने के लिए तैयार  होती थीं ?? पता नहीं ,इस बात का उद्भव कहाँ से हुआ कि स्त्रियाँ पुरुषों के लिए श्रृंगार करती हैं . स्त्रियाँ श्रृंगार जरूर करती हैं , उन्हें सजने संवरने ,ख़ूबसूरत दिखने का शौक भी  होता है, पर यह उनकी प्रकृति में ही है . 

शादी की रस्मों का जिक्र हुआ  है तो एक रस्म जो मुझे बहुत नागवार गुजरती है . वैसे बहुत सारे रस्मों के अर्थ अब समझ में नहीं आते और वे प्रासंगिक भी नहीं लगते . पर सदियों से ये रस्म वैसे ही चले आ रहे हैं . उनके अर्थ भी लोगों को नहीं मालूम पर पूरी निष्ठा से निभाये जाते हैं . एक रस्म जिसे मुझे लगता है कि अब दूल्हे बने लड़कों को इस रस्म से मना कर देना चाहिए ,वो है...द्वाराचार के समय वधू के पिता द्वारा एक बड़ी सी परात (पीतल की थाली ) में वर के पैर धोना. आपसे दुगुनी उम्र का व्यक्ति जिसे अब आप पिता कहने वाले हैं , उनके सामने आप पैर बढ़ा देते हैं और वह आपके पैरों को धोकर उनकी पूजा करता है .और आपको असहज नहीं लगता ?? हमारे यहाँ कहावत भी है .."पैर धोकर ऐसा दामाद उतारे हैं " पर मेरा  ख्याल है, ये रस्म अब नहीं करनी चाहिए ,ठीक है आप टीका लगाकर स्वागत करें, फूल-माला भी पहना दें पर पैर धोना ?? 

बड़े बूढ़े इस रस्म को निभाने पर जरूर जोर देंगे ,हो सकता है ,पिता-मामा-चाचा-फूफा से दुल्हे राम को डांट भी पड़ जाए पर किसी एक को तो आवाज़ उठानी पड़ेगी . किसी को तो इस रस्म से मना करना पड़ेगा. दुल्हे के तो यूँ भी सौ नखरे उठाये जाते हैं . उसका कहा तो मानना ही पड़ेगा . अब देखना है ,ऐसी किस यू.पी. बिहार की शादी में शामिल होने का मौक़ा मिलता है, जहाँ दूल्हे जी अपने  पितातुल्य बुजुर्ग से अपने पैर न धुलवाएँ . मेरे ब्लॉग के बैचलर ,युवा पाठक ..आपलोग पढ़ रहे हैं न ??

रविवार, 12 जनवरी 2014

आप बहुत ख़ूबसूरत हैं

टाइम्स ऑफ इण्डिया में एक खबर पढ़ी . सात महीने पहले चौबीस वर्षीया वकील 'अणिमा मुरयथ ' १२७ साल पुराने 'कालीकट बार असोसिएशन' की सदस्या बनीं . पर उन्हें वहाँ अपनी ही उम्र के पुरुष सहकर्मियों का व्यवहार बहुत पुरातनपंथी लगा . उन्होंने अपने फेसबुक वाल पर लिखा कि "मुझे पता नहीं दुनिया में और भी काम करने वाली जगह ऐसी हैं या नहीं. पर मेरे ऑफिस में और 'बार असोसियेशन' में आज भी  भी पुरुष सहकर्मी , महिलाओं को 'शुगर कैंडी ' कहकर बुलाते हैं और ये कहते कि 'आप कितनी सुन्दर हैं ' उनके आगे पीछे घूमते रहते हैं . जैसा पुरानी  मलयालम फिल्मों में प्रेम नजीर अपनी हीरोइनों से कहा करते थे . यहाँ लोगों का वही पुराना रवैया है ,या तो लोग महिलाओं को बहन बना लेते हैं या फिर उनकी तारीफ़ करके उन्हें प्रेमिका बना कर अधिकार जताना चाहते हैं , मेरी उनसे पूरी सहानुभूति है "

अणिमा की इस फेसबुक पोस्ट ने हंगामा मचा दिया . 'कालिकट बार असोसिएशन' की बैठक बुला कर इसपर गंभीर चर्चा की गयी और अणिमा से माफ़ी मांगने के लिए कहा गया . अणिमा के इनकार करने पर कुछ पुरुष वकील गालियाँ देते हुए उनकी तरफ  बढे . गुस्से में कुर्सी फेंक कर अणिमा को  चोट पहुंचाने की कोशिश की गयी . एक दूसरी वकील पी.के .निर्मला ने  अणिमा का पक्ष लिया तो उन्हें भी भला-बुरा कह कर उनपर हमला किया गया जिसमे उन्हें चोटें भी आयीं .

अणिमा को 'बार असोसिएशन' की सदस्यता से सस्पेंड कर दिया गया . वे अब
'बार असोसिएशन' के अहाते में और उनकी कैंटीन में नहीं जा सकतीं. अणिमा को इसकी चिंता नहीं  है पर उन्हें दुःख इस बात का है कि उनका पक्ष सुना भी नहीं गया और फैसला सुना  दिया गया .

इस तरह की मानसिकता समाज के हर क्षेत्र में विद्यमान है .
लोगों को, स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व मानने में  बहुत मुश्किल होती है . स्त्रियों की मानसिकता ,उनका रहन-सहन ,कार्य स्थल बहुत तेजी से बदल रहा है पर अधिकाँश पुरुष आज भी यही सोचते हैं कि स्त्रियों के रूप की तारीफ़ करने पर वे खुश हो जाती हैं . जबकि स्त्रियाँ सोचती हैं, उनके 'काम' को गंभीरता से लिया जाए. उनके 'काम' पर चर्चा की जाए पर पुरुषों की वही सदियों पुरानी मानसिकता...'आप बहुत ख़ूबसूरत हैं ,आपके हाथ-पाँव-बाल-आँखें   बहुत ख़ूबसूरत है आदि आदि '..कई फ्रेंड्स  ने अपने अनुभव बांटे हैं कि कुछ पुरुषों की प्रगतिशील सोच, उनके लेखन की गहराई देखकर लगा वे औरों से अलग हैं. उनसे मित्रता कर कई मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया जा सकता  है. पर सार्वजनिक रूप से वे कितने भी प्रगतिशील, आधुनिक  सोच वाले दिखें, आपसी बातचीत में वहीँ सुई अटक जाती हैं..'आप बहुत ख़ूबसूरत हैं ' और निराश होकर स्त्रियों को मित्रता से पीछे हट जाना पड़ता है. अगर बहुत खुश हुए तो कह दिया..." Beauty with Brain " यानी beauty तो होनी ही चाहिए उसके साथ brain भी हो गया तो सोने पे सुहागा . जबकि अहमियत brain को पहले मिलनी चाहिए ,उसके साथ beauty भी है तो ईश्वर की देन है वरना अकेला brain ही सफलता की गारंटी  है. कुछ स्त्रियाँ भी पुरुषों की  इस मानसिकता का फायदा उठाती  हैं ,उन्हें सफलता भी मिलती है पर वह  सफलता स्थायी नहीं होती .

अणिमा ने यह भी जिक्र किया था कि लोग या तो बहन बना लेते हैं या फिर प्रेमिका बनाने के फिराक में रहते हैं . इन दोनों के बीच एक दोस्त का रिश्ता भी हो सकता है .पर इस मामले में वही सदियों पुरानी बात दुहरा दी जाती है , "स्त्री-पुरुष कभी सच्चे दोस्त नहीं बन सकते " .(ख़ुशी है कि इस मिथ को झूठा होते देखने का व्यक्तिगत  अनुभव है ) .

बचपन में एक कहानी  पढ़ी थी , जिसमे एक लड़की और लड़का सच्चे दोस्त हैं .लड़के की शादी हो जाती है .उसकी पत्नी भी लड़की की अच्छी  दोस्त बन जाती है और जब उनकी बेटी होती है तो दोनों आपस में झगड़ते हैं कि बेटी इसे 'बुआ' कहेगी या 'मौसी' . फिर लड़की कहती है ,"ये मुझे आंटी कहेगी  मुझे कभी रिश्ते को नाम देने की जरूरत नहीं महसूस हुई. इस से दोस्ती एक दायरे में बंध जाती है " तब यह कहानी  बिलकुल समझ में नहीं आयी थी और मुझे भी लगा था ,वो लड़की अगर लड़के को भैया कहने लगती तो क्या फर्क पड़ जाता . क्यूंकि तब स्कूल की सारी सीनियर 'दीदी' हुआ करती थीं और महल्ले के सारे बड़े लड़के 'भैया ' और मुझे यह बहुत ही स्वाभाविक और सहज लगता . 

बहुत बाद में वह कहानी अच्छी तरह समझ में आयी कि 'रिश्ते का  दायरे में बंध जाने  का' मतलब क्या होता है. अगर मन के अंतरतम कोने से किसी के लिए भैया-दीदी का संबोधन निकले  तो सही है वरना सिर्फ दोस्ती में भी कोई बुराई नहीं.

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...