रविवार, 12 जनवरी 2014

आप बहुत ख़ूबसूरत हैं

टाइम्स ऑफ इण्डिया में एक खबर पढ़ी . सात महीने पहले चौबीस वर्षीया वकील 'अणिमा मुरयथ ' १२७ साल पुराने 'कालीकट बार असोसिएशन' की सदस्या बनीं . पर उन्हें वहाँ अपनी ही उम्र के पुरुष सहकर्मियों का व्यवहार बहुत पुरातनपंथी लगा . उन्होंने अपने फेसबुक वाल पर लिखा कि "मुझे पता नहीं दुनिया में और भी काम करने वाली जगह ऐसी हैं या नहीं. पर मेरे ऑफिस में और 'बार असोसियेशन' में आज भी  भी पुरुष सहकर्मी , महिलाओं को 'शुगर कैंडी ' कहकर बुलाते हैं और ये कहते कि 'आप कितनी सुन्दर हैं ' उनके आगे पीछे घूमते रहते हैं . जैसा पुरानी  मलयालम फिल्मों में प्रेम नजीर अपनी हीरोइनों से कहा करते थे . यहाँ लोगों का वही पुराना रवैया है ,या तो लोग महिलाओं को बहन बना लेते हैं या फिर उनकी तारीफ़ करके उन्हें प्रेमिका बना कर अधिकार जताना चाहते हैं , मेरी उनसे पूरी सहानुभूति है "

अणिमा की इस फेसबुक पोस्ट ने हंगामा मचा दिया . 'कालिकट बार असोसिएशन' की बैठक बुला कर इसपर गंभीर चर्चा की गयी और अणिमा से माफ़ी मांगने के लिए कहा गया . अणिमा के इनकार करने पर कुछ पुरुष वकील गालियाँ देते हुए उनकी तरफ  बढे . गुस्से में कुर्सी फेंक कर अणिमा को  चोट पहुंचाने की कोशिश की गयी . एक दूसरी वकील पी.के .निर्मला ने  अणिमा का पक्ष लिया तो उन्हें भी भला-बुरा कह कर उनपर हमला किया गया जिसमे उन्हें चोटें भी आयीं .

अणिमा को 'बार असोसिएशन' की सदस्यता से सस्पेंड कर दिया गया . वे अब
'बार असोसिएशन' के अहाते में और उनकी कैंटीन में नहीं जा सकतीं. अणिमा को इसकी चिंता नहीं  है पर उन्हें दुःख इस बात का है कि उनका पक्ष सुना भी नहीं गया और फैसला सुना  दिया गया .

इस तरह की मानसिकता समाज के हर क्षेत्र में विद्यमान है .
लोगों को, स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व मानने में  बहुत मुश्किल होती है . स्त्रियों की मानसिकता ,उनका रहन-सहन ,कार्य स्थल बहुत तेजी से बदल रहा है पर अधिकाँश पुरुष आज भी यही सोचते हैं कि स्त्रियों के रूप की तारीफ़ करने पर वे खुश हो जाती हैं . जबकि स्त्रियाँ सोचती हैं, उनके 'काम' को गंभीरता से लिया जाए. उनके 'काम' पर चर्चा की जाए पर पुरुषों की वही सदियों पुरानी मानसिकता...'आप बहुत ख़ूबसूरत हैं ,आपके हाथ-पाँव-बाल-आँखें   बहुत ख़ूबसूरत है आदि आदि '..कई फ्रेंड्स  ने अपने अनुभव बांटे हैं कि कुछ पुरुषों की प्रगतिशील सोच, उनके लेखन की गहराई देखकर लगा वे औरों से अलग हैं. उनसे मित्रता कर कई मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया जा सकता  है. पर सार्वजनिक रूप से वे कितने भी प्रगतिशील, आधुनिक  सोच वाले दिखें, आपसी बातचीत में वहीँ सुई अटक जाती हैं..'आप बहुत ख़ूबसूरत हैं ' और निराश होकर स्त्रियों को मित्रता से पीछे हट जाना पड़ता है. अगर बहुत खुश हुए तो कह दिया..." Beauty with Brain " यानी beauty तो होनी ही चाहिए उसके साथ brain भी हो गया तो सोने पे सुहागा . जबकि अहमियत brain को पहले मिलनी चाहिए ,उसके साथ beauty भी है तो ईश्वर की देन है वरना अकेला brain ही सफलता की गारंटी  है. कुछ स्त्रियाँ भी पुरुषों की  इस मानसिकता का फायदा उठाती  हैं ,उन्हें सफलता भी मिलती है पर वह  सफलता स्थायी नहीं होती .

अणिमा ने यह भी जिक्र किया था कि लोग या तो बहन बना लेते हैं या फिर प्रेमिका बनाने के फिराक में रहते हैं . इन दोनों के बीच एक दोस्त का रिश्ता भी हो सकता है .पर इस मामले में वही सदियों पुरानी बात दुहरा दी जाती है , "स्त्री-पुरुष कभी सच्चे दोस्त नहीं बन सकते " .(ख़ुशी है कि इस मिथ को झूठा होते देखने का व्यक्तिगत  अनुभव है ) .

बचपन में एक कहानी  पढ़ी थी , जिसमे एक लड़की और लड़का सच्चे दोस्त हैं .लड़के की शादी हो जाती है .उसकी पत्नी भी लड़की की अच्छी  दोस्त बन जाती है और जब उनकी बेटी होती है तो दोनों आपस में झगड़ते हैं कि बेटी इसे 'बुआ' कहेगी या 'मौसी' . फिर लड़की कहती है ,"ये मुझे आंटी कहेगी  मुझे कभी रिश्ते को नाम देने की जरूरत नहीं महसूस हुई. इस से दोस्ती एक दायरे में बंध जाती है " तब यह कहानी  बिलकुल समझ में नहीं आयी थी और मुझे भी लगा था ,वो लड़की अगर लड़के को भैया कहने लगती तो क्या फर्क पड़ जाता . क्यूंकि तब स्कूल की सारी सीनियर 'दीदी' हुआ करती थीं और महल्ले के सारे बड़े लड़के 'भैया ' और मुझे यह बहुत ही स्वाभाविक और सहज लगता . 

बहुत बाद में वह कहानी अच्छी तरह समझ में आयी कि 'रिश्ते का  दायरे में बंध जाने  का' मतलब क्या होता है. अगर मन के अंतरतम कोने से किसी के लिए भैया-दीदी का संबोधन निकले  तो सही है वरना सिर्फ दोस्ती में भी कोई बुराई नहीं.

47 टिप्‍पणियां:

  1. अभी हम लोग 'मेंटली' बहुत पिछड़े हैं |

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    1. हमलोग यानि पुरुष ?? :)

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    2. शुक्रिया अली जी,
      पोस्ट पर न सही, टिपण्णी पर तो अपने अपनी प्रतिक्रिया दी... :)

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    3. दोनों नहीं , सिर्फ और सिर्फ पुरुष ,बहुत पीछे हैं मानसिक रूप से । बराबरी की बात सिर्फ दिखावे के लिए करते हैं ,अभी भी महिला को केवल एक उपभोग की वस्तु ही समझते हैं । क्या शिक्षित और क्या गैर शिक्षित !!

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन स्वामी विवेकानन्द जी की १५० वीं जयंती - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. बहुत अच्छी पोस्ट है रश्मि
    सच कहा है तुम ने ,,,बस ये एक बात कह दी जाती है कि पुरुष- स्त्री के बीच दोस्ती नहीं हो सकती लेकिन क्यों नहीं हो सकती का कोई ठोस कारण किसी के पास नहीं ,,,और पुरुषों को क्यों दोष दिया जाए स्त्रियाँ ही कहाँ स्वीकार कर पाती हैं ,तुरंत बातें बननी शुरू हो जाती हैं .

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    1. पता नहीं और कितना समय लगेगा इतनी संकुचित मानसिकता बदलने में

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  4. केरल वैसे भी बहुत पढ़ा-लिखा राज्य है... वहाँ के बहुत से लोग विदेशों में हैं... वहाँ का साहित्य भी बड़ा समृद्ध है... और कोषिकोड जैसी जगह पर इस तरह की घटना सचमुच दुखद है!!

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  5. घटना निंदनीय है। हम जिस माहौल में, जिस क्षेत्र में रहते हैं वहाँ के लिए तो यह घटना अचंभित करने वाली नहीं है लेकिन केरल जैसे राज्य में भी ऐसा ही है! यह बात दुःख पहुँचाने वाली है।

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  6. कई बार पढ़ी लिखी समझदार महिलाए भी इन चीजो को समझ नहीं पाती है , हमारी बनारस की मित्र है सुन्दर , हंसमुख मिलनसार और पीएच डी , नेट पास , विवाह के बाद दिल्ली में एक बड़े मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने लगी , मुझे अक्सर बताती की कैसे पुरुष साथी , बॉस उनकी तारीफ करते है वही ब्यूटी विथ ब्रेन वाला मुझे लगा वो चीजो को समझती होंगी , किन्तु एक दिन जब मैंने उनके फेसबुक वाल पर एक व्यक्ति कि कुछ ज्यादा ही तारीफ वाली टिप्पणी पढ़ी तो मुझे लगा कि वो चीजो को समझ नहीं रही है , मैंने उनसे कहा की कौन है वो व्यक्ति जो तुम्हारे साथ फ्लर्ट कर रहा है , तो पूछती है कि ये फ्लर्ट करना क्या होता है , पहले तो मुझे लगा मजाक कर रही है , फिर चिढ़ाया की बनारसन की बनारसन ही रह गई , उन्हें बाकायदा फ्लर्ट करने का मतलब बताया , वो बेचारी हैरान परेशान की ऐसा भी होता है , ( बाद में अपना अनुभव उन्होंने अपने ब्लॉग पर भी एक बार लिखा ) उसके बाद उन्होंने लोगो को भाव देना बंद किया और समझी की वो तारीफ तारीफ न थी और लोगो को पहचानना सिखा नतीजा केवल ६ महीने में आफ़िस से छुट्टी हो गई , जहा लोग उनकी तारीफ करते नहीं थकते थे । हालत कई बार ये होती है कि आप के थोड़ा सा हंस के बात तक कर लेने का लोग गलत अर्थ निकालने लगते है , चाहे वो हंसी तो फंसी वाला जुमला हो या जो आप ने लिखा महिला पुरुष मित्र नहीं होते , घूम कर ये जुमले महिलाओ पर ही पाबन्दी लगाते है और उनकी हर काबलियत को नजरअंदाज करने का प्रयास किया जाता है और हर बार कहा जाता है कि महिलाए सावधान रहे , कभी कभी लगता है कि सीमा पर खड़ा सैनिक भी २४*७ सावधान की मुद्रा में नहीं खड़ा होता होगा वो भी कुछ समय के लिए विश्राम की मुद्रा में भी जाता होगा , किन्तु महिलाओ को तो वो थोड़ा समय भी नहीं मिलता । बहुत बढ़िया विषय और अच्छी पोस्ट ।

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  7. अणिमा के साथ किया गया दुर्व्यवहार निंदनीय है। अपनी बात रखने का अधिकार हर स्त्री पुरुष को समान रूप से है। विचार से सहमत अथवा असहमत हुआ जा सकता है , उनके लिखे से असमत हो तो स्पष्ट शब्दों में अपने विचार प्रस्तुत करें मगर इस प्रकार का दुर्व्यवहार अनुचित है।

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  8. जरूरी नहीं है की रिश्तों में हमेशा नाम हो ... कई बार दोस्त कहना भी एक नाम हो सकता है ...
    ऐसी घटनाएं ठीक नहीं ... दिमाग का दायरा विस्तृत करने की जरूरत है ...

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  9. बड़ा अच्छा मुद्दा उठाया है, केरल हो या टिम्बकटू सोच वही है, या तो स्त्री प्रेमिका है या फिर दुश्मन । हम कहते हैं दोस्त भी क्यों कहलाना, 'सहकर्मी' का भी एक रिश्ता होता है.। क्या ऑफिस में सभी पुरुष एक दुसरे के भाई, दोस्त ही होते हैं उनके बीच भी तो 'सहकर्मी' वाला रिश्ता होता ही है, क्या सभी आपसी रिश्ते घनिष्ट होते हैं उनके ??? नहीं न ??

    अणिमा का कैरियर ऐसे पुरुषों के दम्भ पर चोट लगने का कोलैटरल डैमेज है । पुरुषों की सोच या तो 'माई वे' है वर्ना 'हाई वे' है ।

    यहाँ पारिवारिक परिवेश से इतर बात कर रही हूँ ।
    अक्सर सामाजिक परिवेश में भईया, दीदी, बहना ये सारे सम्बोधन अब भावनात्मक सम्बन्ध नहीं होते, इनका उपयोग सिर्फ एक 'रक्षा कवच' की तरह किया जाता है, फट से भैया बोल दो तो कोई ऊँगली नहीं उठाएगा या फिर एक सेफ्टी नेट बन जाएगा और अगला व्यक्ति अपनी सीमा जान जाएगा। याद है मुझे जब दिल्ली काण्ड हुआ था तो आसाराम ने कहा था 'अरे भईया बोल देती तो बच जाती' कितनी लचर बात कही थी उसने।
    पुरुषों का चरित्र शब्दों की टेक क्यों मांगता है ??? इन बातों की ज़रुरत क्यों पड़ती है ?? सही कहा है अंशुमाला ने इतनी मुस्तैदी तो शायाद हमारे सीमा प्रहरी भी नहीं दिखाते जितनी मुस्तैदी हम औरतें अपने जीवन में हर पुरुष का सामना करते हुए दिखातीं हैं.।

    बहुत बढ़िया आलेख, हमेशा की तरह !

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  10. मौका मिलते ही
    दिखाना चाहता है
    अपना पिछड़ापन इसी तरह
    पता नहीं क्यों इससे बाहर
    नहीं आना चाहता है
    हमेशा की तरह :(

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  11. सच कहूं तो मुझे कोई हैरानी नहीं हुई इस घटना को पढकर , और अब तो दुख और क्षोभ जताने का भी मन नहीं करता । जिस देश की सवा अरब जनसंख्या में से हमने महज़ पच्चीस न्यायाधीश जिन्हें न्यायमूर्ति का ओहदा देकर हमने ईश्वर के फ़ैसले से पहले के सारे फ़ैसले करने का हक देकर वहां बिठाया है वे भी ...............हां वे भी इस मानसिकता और संकीर्णता से बाहर नहीं निकल पाए तो दूसरों का कहना ही क्या ..मैं भी यही सोच रहा हूं कि आखिर कब ...कब बदलेगा ये सब

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  12. माफ़ी चाहता हूँ , जिसे आम तौर पर पिछड़ापन, या उद्धत पुरुष मानसिकता कहा जाता है , यह प्रकृति ही .. आज कल के नकली प्रगतिशीलता वादी लोग जो सामने कुछ और पीछे कुछ और करते है , इसमें दोनों स्त्री एवं पुरुष शामिल हैं ... प्रकृति को नहीं समझते , स्वाभाविक मानवीय स्वाभाव को नहीं समझते और उससे विपरीत बातें करते है , यहाँ ध्यान दीजिये कि बातें करते हैं .. परदे के पीछे आचरण वैसा नहीं करते .. अब उदाहरण देखिये ना .. अभी हाल में घटी घटना .. तरुण तेजपाल और शोमा चौधरी का , किसी ने सोचा था कि इतनी क्रांतिकारी प्रगतिशील बातें करने वाले तरुण का आचरण ऐसा होगा वैसे ही शोमा चौधरी .. रंजित सिन्हा के एक बयान When rape is inevitable .... वाली पर कितना हंगामा किया था , लेकिन तरुण को बचाने के लिए उन्होंने क्या क्या नहीं किया .. खैर मैं जो बात कहना चाह रहा हूँ .. आप स्त्री हैं , मैं बहुत आदर करता हूँ... मेरे मन में एक सवाल है .. आप भी सोचिये.... स्त्रियाँ क्यों सजती है संवरती है , क्यों आकर्षक दिखने का प्रयत्न करती है .. एक ऐसे समाज की कल्पना कीजिये जहाँ सिर्फ स्त्रियाँ ही स्त्रियाँ हो , कोई पुरुष नहीं दूर दूर तक नहीं .. क्या स्त्रियाँ वैसे ही सजेगी , वैसे ही संवरेंगी ... अब आगे देखिये किसी अन्य जीव में कभी किसी फिमेल पार्टनर को सजते संवरते देखा है इसके उलट पुरुष तरह तरह के उपायों से अपने मेल पार्टनर को रिझाने का प्रयत्न करते हैं , , डिस्कवरी या एनीमल प्लैनेट पर ऐसे कई शो आते हैं .. कहने का तात्पर्य स्पष्ट है कि प्रकृति ने स्त्रियों को ऐसा बनाया है .,. खास बनाया है , वह चाहती है , पुरुष उसके प्रति आकर्षित हो , हाँ यही सत्य है , कोई माने या नहीं सत्य , सत्य होता है , और नारी मन से बेहतर इसे कौन समझता है , दिक्कत कहाँ शुरू होती है जब गलत शिक्षा .. गलत प्रेरणा के कारण स्त्रियाँ वैसा आचरण करती है जो उसे नहीं करना चाहिए , मैं पूछता हूँ जब अणिमा कचहरी गयी उन्होंने कैसे वस्त्र पहने , उन्होंने कैसा श्रृंगार किया , उस बार में या उस पूरे शहर में अगर सिर्फ स्त्रियाँ होती तो क्या वे उसी रूप में जाती ... पुरूष की मानसिकता को गलत कहना या उसे दोष देना आजकल का फैशन है , धर्मनिरपेक्षता की तरह ... मैं यह नहीं कहता.... सभी पुरुष अच्छे होते हैं..पुरुषों में बलात्कारी होते हैं , अपहरण कर्ता होते हैं .. लेकिन अधिकांश पुरुष वैसे नहीं होते .. प्रकृति को समझना आवश्यक है , प्रकृति के विपरीत आचरण करके हम कभी सफल नहीं हो सकते .. विषय बहुत बड़ा है , कमेन्ट फॉर्म में कितना लिखा जाये ..... ... आपका आलेख प्रभाव कारी एवं प्रस्तुति सुन्दर है ...

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    1. नीरज ,
      आपके लिए विषय बहुत बड़ा है एवं आप और भी बहुत कुछ लिखना चाहते हैं. जबकि आपके कमेन्ट पढ़ कर मैं कुछ भी उत्तर नहीं देना चाहती...क्यूंकि दस पोस्ट भी लिख दी जाएँ ,आप समझने को तैयार ही नहीं.
      मुझे बस आपकी टिपण्णी पर घोर दुःख है , हम दूर क्यूँ जाएँ ,हमारे आस-पास ही आप जैसी मानसिकता वाले लोग हैं . कुछ नहीं हो सकता इस समाज का :(

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    2. क्षमा प्रार्थी हूँ , मैं उत्तर की अपेक्षा भी नहीं कर रहा , मुझे दुःख है मेरी टिप्पणी से आपको दुःख पंहुचा , शायद मैं अपनी बात सही ढंग से प्रस्तुत नहीं कर सका .. दुःख मुझे भी हुआ .. आपने मेरी मानसिकता बहुत शीघ्रता में तय कर दी .. कोई बात नहीं , आप जल्दी में होंगी .. मेरा आपके प्रति आदर है ... इस समाज का बहुत कुछ हो सकता है , हो रहा है , लेकिन कपोल कल्पित ख्यालों से नहीं हकीकत को पहचान कर प्रकृति को समझ कर , उसके अनुसार आचरण करके , हरेक की अपनी विशिष्टता है , उसे पहचान कर ..... खैर, आपके ब्लॉग पर पुनः लिखा .. इसलिए नहीं कि मैं आपको जवाब देकर आपको कष्ट पहुचाने की घृष्टता करूँ , बल्कि इसलिए कि मैं सफ़ेद को सफ़ेद कहता हूँ ..ब्लॉग आपका है .. मेरे कमेन्ट डिलीट कर दें , दुबारा कष्ट नहीं दूंगा .. हाँ इतना जरूर कहूँगा इतनी जल्दी जजमेंटल नहीं हुआ करें ... सादर ..

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    3. नीरज ,
      आप बुरा न मानें , मुझे सचमुच आपकी टिपण्णी ने निराश किया था ,इसलिए कि आप एक युवा हैं , रांची में रहते हैं जो कोई गाँव या छोटा कस्बा नहीं है. वहाँ की लकडियाँ भी काफी प्रगतिशील हैं . एक युवा की सोच ऐसी होगी तो बदलते समाज की कैसी तस्वीर हम पायेंगे ??
      खैर, आपके कमेन्ट की बात करें तो ये आपलोगों की ग़लतफ़हमी है कि स्त्री ,पुरुषों को रिझाने के लिए या उनसे प्रशंसा पाने के लिए बनाव-सिंगार करती है .आप बताएं , आपका मन नहीं होता इस्त्री की हुई सुन्दर सी अपने पसंद के रंग की शर्ट पहने, मैचिंग पैंट पहनें , बढ़िया कुरता-पायजामा पहनें, अच्छी टी शर्ट पहनें पौलिश किये हुए चमकते हुए जूते हों ,सुन्दर चप्पल हों (आप पहनते भी होंगे ) तो क्या ये सब आप किसी को दिखाने के लिए पहनते हैं ??किसी तारीफ़ के लिए ??या फिर आपको अच्छा लगता है...आप अच्छा महसूस करते हैं, इसलिए पहनते हैं ?? . ठीक ऐसा ही लड़कियों के साथ भी है. यह बात लोग क्यूँ नहीं समझते, ये बात मेरी समझ में नहीं आता .
      आपने लिखा है, "जब अणिमा कचहरी गयी उन्होंने कैसे वस्त्र पहने , उन्होंने कैसा श्रृंगार किया , उस बार में या उस पूरे शहर में अगर सिर्फ स्त्रियाँ होती तो क्या वे उसी रूप में जाती " मैंने उस खबर की लिंक दी है आप वहाँ 'अणिमा ' की तस्वीर देख सकते हैं .उसने कोई बनाव-श्रृंगार नहीं किया है. अगर शहर में सिर्फ स्त्रियाँ ही होतीं तो उसके रूप में क्या बदलाव आ जाता ?? आप ही सोच कर बतला दें . लड़कियों के कॉलेज में या लड़कियों के स्कूल में तो लड़कियों को उनके टीचर्स को अच्छे कपडे पहनने नहीं चाहिए ,कोई श्रृंगार नहीं करना चाहिए ?? गर्ल्ज़ होस्टल में लडकियां महीनों कॉलेज से बाहर नहीं जातीं ,कॉलेज में हॉस्टल में किसी भी पुरुष का प्रवेश वर्जित है तो फिर लडकियां किसके लिए अच्छे कपडे पहनती हैं ? मेकअप करती हैं...इयररिंग्स ,बैंगल्स पहनती हैं ?? किसे दिखाने के लिए ? उन्हें तो एक सफ़ेद सलवार समीज में होना चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं होता तो इस बात पर सोचिये कि स्त्री या पुरुष खुद अच्छा महसूस करने के लिए सजते संवरते हैं या किसी को दिखाने के लिए ??
      आपने लिखा है, " दिक्कत कहाँ शुरू होती है जब गलत शिक्षा .. गलत प्रेरणा के कारण स्त्रियाँ वैसा आचरण करती है जो उसे नहीं करना चाहिए " कैसी शिक्षा..कौन सा गलत आचरण ?? लड़के/लड़कियों को तो एक सी ही शिक्षा दी जाती है तो इसमें कौन सी शिक्षा लड़कियों के लिए गलत हो जाती है ??
      आप जैसे युवा लोगों से बहुत उम्मीदें हैं , जरा अपने विचार व्यापक और उदार रखिये . और जो बात सही लगे, उसे अपनाने की कोशिश कीजिये .
      इस तरह की बातें मैं इतनी बार लिख चुकी हूँ कि फिर से किसी को समझाने का मन नहीं होता, जिसे चीज़ों को जिस तरह देखना हो, वे उसी नज़र से देखते हैं ,इसीलिए आपकी टिपण्णी का जबाब देने की इच्छा नहीं हुई . मैं कोई कमेन्ट रोकती या डिलीट नहीं करती जबतक वे आपत्तिजनक न हों ,आपको अपने विचार रखने का पूरा हक़ है .

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    4. ये कमेन्ट पढ़कर अचरज में हूँ, क्या कहूँ... बहुत भारी गलतफहनी है आपको कि सिर्फ पुरुषों को रिझाने के लिए लड़कियां तैयार होकर निकलती हैं... सच में आपके लिए विषय बहुत बड़ा है... :-(

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  13. दुखद ......... पर समाज की यही वास्तविकता है !!

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  14. स्त्री पुरुष के बीच मित्रता के दावे मुझे बहुत आकर्षित करते हैं।
    मैं नहीं मानता कि विपरीत लिंगी मित्र हो सकते हैं।
    इस विषय पर आगे बढ़ने से पहले मैं " मित्रता" को परिभाषित करना चाहूंगा ।
    मेरी नज़र में मित्र वो व्यक्ति है जिसका आचार व्यवहार मुझे पसंद हो और जो प्रतिउत्तर में मेरे विचारों को पसंद करे। मेरी मित्र मंडली में कुछ ऐसे लोग हैं जिनके समक्ष मैं अपने हर तरह के विचार रख पाता हूँ. कई विचार तो ऐसे होते हैं जिनको मैं अपने माता पिता या भाई बहन यहाँ तक कि अपनी पत्नी के साथ नहीं बाट सकता पर अपने मित्रों के साथ बाट लेता हूँ। मैं अपने नज़दीकी मित्रों को आधी रात के वक्त भी बेहिचक बुला सकता हूँ, उनसे सहायता मांग सकता हूँ और ऐसे ही उनकी सहायता भी कर सकता हूँ। मेरे एक मित्र अक्सर अपनी छोटी छोटी परेशानियों को सुलझाने के लिए साधिकार मेरे घंटों बर्बाद करते हैं। मैं समझता हूँ कि मित्रों का हमपर और हमारा उन पर ऐसा अधिकार होता है। मेरी नज़र में मित्रता दूसरे रिश्तों के बहुत से बंधनों से मुक्त होती है। अब आप ये बताये कि मित्रता कि मेरी परिभाषा में कहाँ कमी है ? क्या मित्रता इससे भी आगे कि कोई चीज होती है। इस पर थोडा प्रकाश डालें।
    और अगर आपको लगता है कि मित्रता कुछ ऐसी ही होती है तो क्या ऐसा विपरीत लिंगी मित्र ऐसे मानसिक और शारीरिक बंधनों से मुक्त निर्बाध मित्रता निभा सकते है।

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    1. आप न मानें, शायद आपके रिजर्वेशंस होंगे, पर आपकी मित्रता की परिभाषा पर एक पुरुष-महिला के बीच की मित्रता भी बिलकुल खरी उतर सकती है/उतरती है . अगर आधी रात के वक़्त किसी महिला मित्र को न बुला पाने की मजबूरी है तो शायद महानगरों में और नयी पीढ़ी के बीच यह मजबूरी भी नहीं. कई लड़के और लड़की मित्र हैं और आधी रात के बाद नाटक, सिनेमा या ऑफिस से साथ लौटते हैं . जरूरत पड़ने पर आधी रात को उनके घर आ भी सकते हैं . मैंने पहले भी यह बात दुहराई है कि हर पुरुष ,जानवर नहीं होता कि सामने किसी लड़की को अकेला देखकर आक्रमण कर देता है. अगर वो मित्र है और लड़की उसे बहुत अच्छी तरह जानती है तो फिर जेंडर का अंतर कहाँ रह जाता है ??

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  15. रश्मि, स्त्री-पुरुष मित्रता की परिभाषा बदल पायेगी, मुझे तो लगता ही नहीं. तमाम क्षेत्रों में आगे बढ जाने के बाद भी औरत के प्रति हमारे समाज में सोच बदल पाया क्या? बस ऐसे ही ये रिश्ता भी हमेशा शक की निगाह से देखा जाता रहेगा....अफ़सोस...

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    1. वंदना,
      हम ये सोचते हैं कि विचार नहीं बदल रहे हैं, और ये सच भी है कि हमारी पीढ़ी और हमसे पहले की पीढ़ी के विचार वही थे, हैं और रहेंगे। लेकिन ख़ुशख़बरी ये है कि विचार अब बदल रहे हैं । हम बेशक़ स्त्री-पुरुष, दोस्त-प्रेमिका, उसका सम्बन्ध, इसका चक्कर में उलझ कर अपनी ज़िन्दगी बिता दें, लेकिन हमारे बच्चे हमसे कहीं ज्यादा सूझ-बूझ रखते हैं, वो इन मामलों में हमसे ज्यादा परिपक्व हैं । आने वाली पीढ़ियों के पास इन बिना सर-पैर की बातों के लिए न वक्त होगा न ही इच्छा । इसलिए अब ये चिंता का विषय ही नहीं रहा :)

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  16. on a lighter note :)
    http://www.youtube.com/watch?v=dFAeBb2QvYU

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  17. सामाजिक जीवन में सम्मान पाना की लालसा तो सबमें रहती है, देने के समय रूढ़िवादिता सामने आ जाती है। प्रकृति में सहजता से सब रह लेते हैं।

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  18. Bhut Theek.Aap ne sachai se ruh bruh kraayaa hai.
    bdhaai,
    Vinnie

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  19. अच्छा होता कि उन पुरुषों का नाम ही ले लिया होता।मुझे ये मामला गलतफहमी या सामान्यीकरण का लग रहा है।कोई सहकर्मी किसी महिला की सुंदरता की तारीफ तभी करता है जब वह उससे बहुत फ्रेंक हो वर्ना इतनी हिम्मत किसीकि नही होती।जब पहली बार किसीने तारीफ की तो क्या उन्होंने उसे टोका?जो महिला फेसबुक पर इतना कुछ लिख रही है उसे ऐसी किसी घटना का जिक्र भी करना चाहिए था क्योंकि मुझे नहीं लगता इस तरह के विचारो वाली महिला विरोध नही करेगी।या फिर ये हुआ है कि पुरुष तारीफ दूसरी महिलाओं की किया करते थे और बुरा इन्हें लग गया।और अगर इनके साथ ऐसा हुआ है तो क्या कार्यालय के सारे पुरुष इनकी तारीफ करते थे?ये बहुत सामान्य बात है कि हर स्कूल कॉलेज या कार्यालय में कुछ लड़के ऐसे होते हैं जिन पर साथ वाली कई लड़कियाँ लट्टू होती है।ऐसा एक लड़का एफबी पर यह पोस्ट करे कि आजकल की प्रगतिशील महिलाएँ कैसी हो गई हैं मेरे संस्थान की लड़कियाँ मुझे प्रेमी बनाना चाहती है मेरी उनसे हमदर्दी है।तो बाकि की लड़कियों की क्या प्रतिक्रिया होगी?वो तो यही चाहेंगी न कि इसका सिर फोड दिया जाए?

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    1. राजन,
      आपका कमेन्ट समझ में नहीं आया. यह कमेन्ट पोस्ट पर है या किसी कमेन्ट के जबाब में.??.स्पष्ट करें तो प्रतिक्रया दी जाए .

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    2. राजन,
      जैसा आपने मेल में बताया है कि आपका कमेन्ट पोस्ट पर ही है तो अब उसे उसी परिप्रेक्ष्य में देख रही हूँ . नाम लिया जाए या नहीं या कितनो का लिया जाए उस से फर्क नहीं पड़ता. यह एक मानसिकता होती है और अफ़सोस है कि न तो यह ग़लतफ़हमी की बात है और ना सामान्यीकरण की . सारे पुरुष नहीं पर अधिकाँश की मानसिकता यही है कि 'औरतों की तारीफ़ करने पर वे खुश हो जाती हैं या उनके रूप की तारीफ़ करके उनसे दोस्ती बढ़ाई जा सकती है '

      @कोई सहकर्मी किसी महिला की सुंदरता की तारीफ तभी करता है जब वह उससे बहुत फ्रेंक हो वर्ना इतनी हिम्मत किसीकि नही होती "

      आपका ये कहना सिर्फ अनभिज्ञता ही जता रहा है, कई बार बातों की शुरुआत ही इस से होती है, "आप बहुत ख़ूबसूरत हैं '

      @जब पहली बार किसीने तारीफ की तो क्या उन्होंने उसे टोका?

      अगर महिला को सिर्फ विचारों के आदान-प्रदान वाली दोस्ती ही मंजूर होती है तो वह अवश्य टोक देती है और अगर दूसरा पक्ष नहीं समझता तो दोस्ती ही ख़त्म कर लेती है .

      @जो महिला फेसबुक पर इतना कुछ लिख रही है उसे ऐसी किसी घटना का जिक्र भी करना चाहिए था क्योंकि मुझे नहीं लगता इस तरह के विचारो वाली महिला विरोध नही
      करेगी।

      महिलाओं के बीच यह बहुत ही आम वाकया है और चर्चा क्या करे कि अमुक पुरुष मित्र उसके रूप की तारीफ़ कर उस से दोस्ती बढ़ाना चाह रहे हैं.?? फिर भी कई बार महिलायें ऐसे स्टेटस लिखती हैं कि कृपया मेसेज बॉक्स में मेसेज न भेजें,बेकार दोस्ती बढाने की कोशिश न करें ..आदि आदि.

      @या फिर ये हुआ है कि पुरुष तारीफ दूसरी महिलाओं की किया करते थे और बुरा इन्हें लग गया।और अगर इनके साथ ऐसा हुआ है तो क्या कार्यालय के सारे पुरुष इनकी तारीफ करते थे?
      अणिमा ने पुरुष मानसिकता की बात की है . आपका ये कहना सही नहीं लग रहा कि

      "पुरुष,तारीफ दूसरी महिलाओं की किया करते थे और बुरा इन्हें लग गया।"...आपका ये कहना ऐसा लग रहा है जैसे अणिमा को जलन हो गयी और उसने इसलिए वह स्टेटस लिखा. . जबकि हम सब देखते हैं कुछ पुरुष बिना वजह किसी स्त्री की तारीफ़ में कसीदे पढ़े जा रहे हैं तो उनकी मंशा निरपेक्ष लोगों को बुरी नहीं लगती पर समझ में आ जाती है. कार्यालय के सारे पुरुष तारीफ़ करते थे या नहीं...बात वो नहीं है बल्कि किस मानसिकता के तहत ऐसा करते थे...मुद्दा वो है.

      @ एक लड़का एफबी पर यह पोस्ट करे कि आजकल की प्रगतिशील महिलाएँ कैसी हो गई हैं मेरे संस्थान की लड़कियाँ मुझे प्रेमी बनाना चाहती है मेरी उनसे हमदर्दी है।तो बाकि की लड़कियों की क्या प्रतिक्रिया होगी?वो तो यही चाहेंगी न कि इसका सिर फोड दिया जाए?

      बाक़ी लडकियां क्यूँ चाहेंगी कि उसका सर फोड़ दिया जाए ?? अगर उन्हें उस लड़के में रूचि नहीं होगी तो इग्नोर करेंगी या फिर सोचेंगी कि वो क्या खुद को कैसानोवा समझता है या फिर सोचेंगी लडकियां कितनी बेवकूफ हैं ,उसकी शक्ल या बातों पर मर मिटी हैं ...सर फोड़ने की बात तो कहीं से नहीं आती.

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    3. रश्मि जी मैंने जो कहा कि यह मामला मुझे गलतफहमी या सामान्यीकरण का लग रहा है।यदि जलन वाली बात होती तो बिल्कुल साफ साफ वही लिखता।पर ऐसा है नही।मेरा मतलब था कि यदि पुरुषों ने उनसे कुछ कहा होता तो उन्होंने विरोध किया होता और इस घटना का विवरण भी दिया होता।लेकिन वास्तव में ये वाकये दूसरी महिलाओं के साथ होते होंगे।और उनकी नजर में हो सकता है यह मजाक या फ्लर्ट ही हो और उसे सामान्य तौर पर ले रही हो।लेकिन अणिमा जी को इसमे पुरुषवादी मानसिकता नजर आ गई।क्यो?जबकि आजकल कॉलेजो औफिसो में यह आम है और पुरुष ही नही महिलाएँ भी करती है।अब अणिमा जी को इस बारे में नही पता तो गलती सिवाय उनके और किसीकी नही है।और आपकी इस बात से तो खुद अणिमा जी भी सहमत नही होंगी कि पुरुष बात की शुरुआत ही सुंदरता की तारीफ से करते है।ऐसा फिल्मो में ही होता है वास्तव में क्या पुरुषों को सैंडिलो से पिटना है?फेसबुक पर आप सामने नहीं होते कुंठित पुरुष कुछ भी कह सकते हैं अधिकांश प्रोफाइल भी नकली होती हैं।उनकी क्या बात करें।

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    4. ग़लतफ़हमी या सामान्यीकरण आपको, आपके नजरिये से लग रहा है और बिलकुल सही भी है आप तो अपनी नज़र से ही देखेंगे न .पर ऐसा न तो अणिमा को लगा...और न मुझे (तभी तो इस खबर को शेयर किया ) न यहाँ टिपण्णी करने वाली और न फेसबुक पर इस लिंक को शेयर करने वाली महिलाओं को लगा (और सब इसे नारीवादी चश्मे से नहीं देख रहीं )
      मैंने पहले भी लिखा है ,यहाँ अधिकाँश पुरुष मानसिकता की बात हो रही है . हर पुरुष की नहीं. मैं कहने वाली थी, संतोष की बात है कि नयी पीढ़ी ऐसी मानसिकता से मुक्त है पर यहाँ भी सारे नहीं...बहुत लोगों के दिमाग के जाले साफ़ होने बाकी हैं .

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    5. रश्मि जी,मैंने अणिमा जी की बात पर नहीं उनके तरीके पर प्रश्न उठाया है।महिलाओं के मुद्दों पर या किसी भी बात पर मेरी सोच सही ही होगी ऐसा तो मेरा भी दावा नहीं है।लेकिन अणिमा जी की सोच भी परफैक्ट ही हो यह जरूरी नही।झूठी विनम्रता नही दिखाउँगा ।यदि आपको ऐसा लगा कि मेरी मानसिकता भी उन्हीं महिला विरोधी पुरुषों की तरह है तो मुझे बुरा बिल्कुल नहीं लगा संतोष ही हुआ आपने बताया तो सही।क्योंकि आप पुरुष का विरोध केवल इसलिए नहीं करती कि पुरुष पुरुष है।लेकिन सभी के बारे में मैं ऐसा नहीं सोचता।अनिमा जी से सहमति रखने वालो से मुझे कोई शिकायत नही।आपने भी उनका पक्ष लिया लेकिन लेते हुए यह भी कहा कि कुछ महिलाए भी खराब हो सकती है और कुछ पुरुष अच्छे भी लेकिन अनिमा जी तो सभी को लपेटने की जल्दी मे है।रश्मि जी किसीसे ज्यादा उम्मीदे मत रखा कीजिए चाहे बात महिलाओ की हो या नई या पुरानी पीढ़ी की।वर्ना आपसे असहमति रखने पर आपको ऐसे ही बुरा लगेगा।दूसरे क्या कह रहे है केवल इससे मै अपने विचार नही बदलता।आप पहली ऐसा महिला जिसने मेरी सोच पर प्रश्न उठाया बाकियो ने कभी नही।तो क्या इसीलिए मै मान लूँ कि आपका सोचना गलत है?बहुमत हमेशा सही नही होता ।

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    6. @यदि आपको ऐसा लगा कि मेरी मानसिकता भी उन्हीं महिला विरोधी पुरुषों की तरह है तो मुझे बुरा बिल्कुल नहीं लगा
      @आप पहली ऐसा महिला जिसने मेरी सोच पर प्रश्न उठाया बाकियो ने कभी नही

      पता नहीं राजन...मेरे किस कथन से ऐसा लगा आपको...हाँ, अणिमा वाले मामले पर आपका और हमारा नजरिया जरूर अलग है...पर इस एक मुद्दे पर सहमत -असहमत होने से न मैं पुरुषविरोधी हो जाउंगी न आप नारीविरोधी ...अगर कुछ लोग मुझे समझते हों कि मैं पुरुष विरोधी हूँ..तो हो सकता है उनकी ऐसी सोच हो और सबको अपनी तरह से सोचने का अधिकार है.

      अणिमा ने अपने 'बार एसोसियेशन' में अधिकाँश पुरुष ऐसे देखे होंगे...तभी उन्होंने ऐसा लिखा है. एक पत्रकार ने जनसत्ता में इस आलेख को छापने की अनुमति ली (पहली बार किसी अखबार वाले ने छापने से पहले पूछा ) उन्हें भी यह बात सही लगी होंगी तभी उन्होंने ,इसे ज्यादा जनमानस तक पहुंचाने की सोची, .इसलिए ये अपना अपना नजरिया है...

      @ रश्मि जी किसीसे ज्यादा उम्मीदे मत रखा कीजिए चाहे बात महिलाओ की हो या नई या पुरानी पीढ़ी की।वर्ना आपसे असहमति रखने पर आपको ऐसे ही बुरा लगेगा।

      यह भी समझ में नहीं आया....किसी की टिपण्णी का जबाब देकर अपनी बात स्पष्ट करने में बुरा लगने जैसी क्या बात हो गयी ?? और किसी से उम्मीद क्या रखनी ,दुनिया मैं भी देख ही रही हूँ...यहाँ हर तरह के लोग हैं , मुंबई जैसे महानगर में पले -बढे लोगों की सोच कभी बहुत ही संकुचित दिखती है और सारी ज़िन्दगी एक छोटे से शहर में रहने वालों के विचार बहुत ही उदार दिखते हैं ...फिर भी आपकी सलाह का शुक्रिया :)

      @ नयी पीढ़ी ऐसी मानसिकता से मुक्त है पर यहाँ भी सारे नहीं...बहुत लोगों के दिमाग के जाले साफ़ होने बाकी हैं .

      अगर आपको लगा कि ये पंक्ति आपके लिए लिखी है ..तो इतना स्पष्ट कर दूँ, ये आपके लिए नहीं थी ...आपके विचारों से इतने दिन में वाकिफ हो ही गयी हूँ पर कई युवाओं के बहुत ही संकुचित विचार देखती हूँ ,इसलिए ये नहीं कह सकती कि 'सारी युवा पीढ़ी बहुत broad minded है.

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    7. रश्मि जी,आपने कहा 'आप तो अपने ही नजरिए से देखेंगे न'।इन पंक्तियों से मुझे लगा जैसे कि आप कह रही हैं कि पुरुष होने के कारण आप तो पुरुष के नजरिए से ही देखेंगे।पर चलिए जानकर खुशी हुई कि आप मेरे बारे में ऐसा नहीं सोचती।और आप सोचती भी तो यह मेरे लिए स्वमूल्यांकन का ही अवसर होता।निष्पक्ष लोगों की बातों को मैं बहुत गंभीरता से लेता हूँ।आपको पुरुष विरोधी मानता तो यहाँ कमेंट नहीं कर रहा होता।हाँ अनिमा जी की बात पर असहमति है और वो रहेगी ही।मैंने इस बारे में कल ही खबर पढ़ी।उनका विरोध करने वाले पुरुष भी ठीक यही बात कह रहे हैं कि उन्होंने कुछ लोगों की वजह से संस्थान का नाम लेकर हम सभी को बदनाम किया है।और मेरे ख्याल से वो बिल्कुल ठीक कह रहे ।उन्हें इसका पूरा अधिकार।कुर्सी फेंकने वाले का उन्होंने भी विरोध किया है।बाकि मेरे कहने से क्या होता है।खबर में ही पढ़ा कि अनिमा जी को पुरुषों का तो और भी अच्छा समर्थन मिल रहा है एफबी पर ।आपकी पोस्ट ही नहीं टिप्पणियाँ भी हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण ।अखबार में छपे न छपे कम से कम मेरे लिए इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता।

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    8. चलिए,अच्छा लगा जान , आपकी ग़लतफ़हमी दूर हुई.....:)

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  20. नईदुनिया कि "नायिका" में और फिर आपके ब्लॉग और उस लेख पर किये गए कमेंट्स और आपके जवाबात पढ़कर हाल 'गुलज़ारन कुछ ऐसा है कि;

    " ना बोलूं मैं तो कलेजा फूँके
    जो बोल दूँ तो ज़बान जले है
    सुलग ना जाए गर सुने वो
    जो बात मेरी जुबां तले है "

    जी हाँ, मैं डरा हुआ हूँ, बहुत डरा हुआ कि अगर नायिका के हुस्न कि या फिर ग़ालिबन उसके हुनर कि तारीफ़ कर दी तो बकौल मोहम्मद रफ़ी साहेब 'कहीं भूल से वो ना समझ बैठे कि मैं उससे मोहब्बत करता हूँ'

    इतना गरीब हूँ मैं कि खुद को गरीब भी नहीं कह सकता
    इतनी लुटाई उसने मोहब्बत के अब और उसे लूट भी नहीं सकता
    आप इसे दीन-ओ-ईमान समझ लीजिये या कह लीजिये इसे ईबादत का दस्तूर
    इतनी है तमीज़ के मोहब्बत कर सकता हूँ मैं सबसे पर 'उनसे' नहीं कर सकता

    हौसला अफजाई कि चाह किये बगैर इतना जरुर लिखना चाहूंगा कि मोहतरमा सिक्के के दूसरे पहलु कि तरफ भी कृपा करके आप उतनी ही नज़ाकत से पेश आयें जितना सुकून आप सिक्के के एक पहलु को दामन से लगाकर पा रही हैं। Generalized attitude या तथाकथित सामान्यित अवधारणा से हमारा समाज बचे तो ज्यादा बेहतर होगा। स्त्री-पुरुष के लिए भी और आने वाली पीढ़ियों के लिए भि…नहीं?

    प्रश्न ये कि चाह तो हमें है limitless, unconditional, immaterialistic LOVE (अनन्त, परस्थिति नगण्य, आत्मिक प्रेम) कि पर रोजमर्रा कि ज़िन्दगी में हमारे ही कृत्य हमारी ही तथाकथित पाक-साफ़ ईच्छाओं का दमन किये जा रहे हैं? क्या सम्बन्धों कि चादर ओढ़ सँकुचित, संकोचित और कुपित नहीं हो चुकी है हमारी राजनितिक व्यवहार कुशलता?
    क्या दोमुहाँ आचरण हमें पारस्परिक विद्रोह कि और नहीं ले जा रहा?

    Men & Women are not here to COMPETE with each-other but are indeed here to COMPLETE eac-other...aren't they?

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  21. रश्मि जी मैंने जो कहा कि यह मामला मुझे गलतफहमी या सामान्यीकरण का लग रहा है।यदि जलन वाली बात होती तो बिल्कुल साफ साफ वही लिखता।पर ऐसा है नही।मेरा मतलब था कि यदि पुरुषों ने उनसे कुछ कहा होता तो उन्होंने विरोध किया होता और इस घटना का विवरण भी दिया होता।लेकिन वास्तव में ये वाकये दूसरी महिलाओं के साथ होते होंगे।और उनकी नजर में हो सकता है यह मजाक या फ्लर्ट ही हो और उसे सामान्य तौर पर ले रही हो।लेकिन अणिमा जी को इसमे पुरुषवादी मानसिकता नजर आ गई।क्यो?जबकि आजकल कॉलेजो औफिसो में यह आम है और पुरुष ही नही महिलाएँ भी करती है।अब अणिमा जी को इस बारे में नही पता तो गलती सिवाय उनके और किसीकी नही है।और आपकी इस बात से तो खुद अणिमा जी भी सहमत नही होंगी कि पुरुष बात की शुरुआत ही सुंदरता की तारीफ से करते है।ऐसा फिल्मो में ही होता है वास्तव में क्या पुरुषों को सैंडिलो से पिटना है?फेसबुक पर आप सामने नहीं होते कुंठित पुरुष कुछ भी कह सकते हैं अधिकांश प्रोफाइल भी नकली होती हैं।उनकी क्या बात करें।

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  22. और सिर फोडने की इच्छा होगी न कि सचमुच में ही सिर फोड़ दिया जाएगा।यदि कोई लडका अपने संस्थान का नाम लेकर वहाँ की लड़कियों के बारे में ऐसा कहेगा तो क्या वहाँ बाकी लड़कियों को बुरा नहीं लगेगा जो ऐसी नहीं है?यह सीधे सीधे उनके चरित्र पर हमला ही तो है।हाँ ये अलग बात है कि वो विरोध किस तरह करेंगी।अभी पलाश सेन का कैसे विरोध किया गया आपको पता ही होगा।इसीलिए कहता हूँ कि किसी खास संस्थान का नाम लो तो ऐसा जनरल स्टेटमेंट नहीं देना चाहिए।मैंने दो कमेंट ड्राफ्ट में सेव किए थे।पर गलती से पोस्ट करते वक्त मैंने पहले वाले को ही दो बार कॉपी कर पेस्ट कर दिया था ।मोडरेशन की वजह से पता नहीं चला।आप जवाब दे चुकी थी इसलिए मैंने वो दूसरा कमेंट नहीं दिया।

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  23. "स्त्री-पुरुष कभी सच्चे दोस्त नहीं बन सकते " .(ख़ुशी है कि इस मिथ को झूठा होते देखने का व्यक्तिगत अनुभव है ) .

    Dittto didi !

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