मंगलवार, 14 जून 2016

काँच के शामियाने : सुचेता शर्मा जी के विचार

सुचेता शर्मा जी का बहुत शुक्रिया
आप नायिका के दर्द में भीग गईं और उसे दुख से लोहा ले, सुख के दिन वापस लाते देख खुश भी हुईं...यानि उपन्यास डूबकर पढ़ा .
                             काँच के शामियाने
 Fb पर रोज़ ,अक्सर किसी न किसी की timeline पर प्रिय Rashmi Ravija रचित " कांच के शामियाने "उपन्यास का ज़िक्र पढ़ने को मिल जाता है
यूँ बहुत ज़्यादा तो नहीं पढ़ती हूँ,पर fb पर ही अच्छी रचनाओं की चर्चा होती रहती है, उत्सुकतावश ऎसी बहुचर्चित पुस्तकों को पढ़ने की जिज्ञासा होती है,तो online order कर के अवश्य पढ़ती हूँ
हालांकि मैं दुःखद कहानियाँ,serials यहाँ तक movies तक देखने से बचती हूँ. कई दिन तक impact रह जाता है दिलो दिमाग पर शायद कुछ हद तक guilty conscious भी हावी हो जाती है क़ि अपने आस पास इतना कुछ बुरा घटित हो रहा है और हम चाह कर भी रोक नहीं पा रहे हैं


कुछ ऐसी ही त्रासदायक कथा है जया की,जो सालों "अपनों" द्वारा ही सताई जाती रही जिसे उसने अपनी नियति मान कर स्वीकार भी कर लिया.उसकी व्यथा,दर्द,मानसिक शारीरिक यंत्रणा को खूबी से चित्रित किया है रश्मि ने,या यूँ कहें कि दर्द की स्याही में डुबो करअपनी सधी हुई लेखनी से एक उपन्यास में,एक ज़िन्दगी की तमाम वेदना black and white में उंडेल कर रख दी है


जया मात्र कहानी की ही पात्र नहीं है,हमारे आस पास कई ऐसी दुखद जीवंत कहानियाँ बिखरी होती हैं,बेहतर है यदि हम इन innocent angels के लिए कुछ सार्थक,ठोस करें.


उपन्यास पढ़ने के बाद,बहुत मानसिक टेंशन रहा कुछ दिन,और संयोग ही कि एक book fair में अचानक ही रश्मि से मुलाक़ात हो गई और उनसे सीधे शिकायत कर दी कि इतनी pain क्यों दिखाई नायिका के जीवन में ,कैसे कोई इतना दर्द सह सकता है.......खैर, हक़ीक़त यही है कि कई मासूम "अपनों" द्वारा प्रताड़ित होते हैं जब तक वो खुद अपनी ज़िन्दगी की लगाम अपने हाथों में नहीं ले लेते......मुश्किल होता है पर असम्भव नहीं

शुक्रवार, 10 जून 2016

कविता वर्मा द्वारा 'काँच के शामियाने' की समीक्षा

 कविता वर्मा जी एक उत्कृष्ट लेखिका एवं समीक्षक हैं . इस वर्ष उनके कहानी  संग्रह को राजस्थान अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया है.
बहुत आभार उनका, इस उपन्यास की समीक्षा के लिए.
कविता जी ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही है ,"यह उपन्यास तीव्रता से इस बात को बल देता है कि भारतीय परिवारों में बच्चों खासकर लड़कों की परवरिश को गंभीरता से देखने सुधारने की जरूरत है तो लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ साथ आत्म सम्मान से जीना सिखाने की। "
अगर सबलोग इस तरफ ध्यान दें तो समाज में सुख चैन आ जाए .
आपने किताब पढ़ा और उसपर लिखा भी ...पुनः आभार

उपन्यास काँच के शामियाने (समीक्षा ) 
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रश्मि रविजा का उपन्यास काँच के शामियाने जब मिला थोड़ी व्यस्तता थी तो कुछ गर्मी के अलसाए दिन। कुछ उपन्यास की मोटाई देखकर शुरू करने की हिम्मत नहीं हुई। फेसबुक और व्हाट्स अप के दौर में इतना पढ़ने की आदत जो छूट गई।
दो एक दिन बाद पुस्तक को हाथ में रखे यूं ही उलटते पुलटते पढ़ना शुरू किया। सबसे ज्यादा आकृष्ट किया प्रथम अध्याय के शीर्षक ने 'झील में तब्दील होती वो चंचल पहाड़ी नदी ' वाह जीवन के परिवर्तन को वर्णित करने का इससे ज्यादा खूबसूरत तरीका क्या हो सकता था / फिर जो पढ़ना शुरू किया तो झील के गर्भ में बहती धार सी कहानी में उतरती चली गई। बस वह कहानी अब कहानी नहीं रह गई थी वह शब्द चित्रों में बदलती किसी रील सी चलती चली जा रही थी। जिसमे सब विलीन हो गया आलस पृष्ठ अध्याय अतन्मयता सब। रह गई तो सिर्फ जया उसकी पीड़ा उसका संघर्ष उसकी जिजीविषा।
एक समय ऐसा भी आया जब मन में आक्रोश पूरे उफान पर था राजीव के लिए नहीं जया के लिए उसकी माँ भाई भाभी बहनों के लिए। रिश्तों के सतहीपन , मजबूरी की आड़ में कायरता जिम्मेदारी से भागने की कोशिश यही तो वास्तविकता है अधिकांश रिश्तों की जिनके लिए जीते मरते उनका मान रखते जिंदगी गुजार दी जाती है। राजीव और उसके परिवार के लिए तो घृणा थी वितृष्णा थी और ढेरों बद्दुआएँ थीं। इनके साथ भारतीय परिवारों का कड़वा बदबूदार सच भी था। पुरुषों की विकृत मानसिकता के पालन पोषण का घृणित दायित्व परिवार वाले ही निभाते हैं फिर भले वह उनके लिए ही मुसीबत बन जाये। धन लोलुपता सोचने समझने की शक्ति छीन लेती है तो ईर्ष्या असुरक्षा सही गलत की पहचान।
स्त्री के लिए सभी रिश्ते काँच के शामियाने ही साबित होते हैं जो उसे जीवन की कड़ी धूप से कतई नहीं बचाते और इस धूप में तप निखर कर वह कुंदन बन जाती है लेकिन कितनी स्त्रियाँ यह बड़ा प्रश्न है।
अलबत्ता जीवन की कड़वी हकीकतों को बारीकी से बुना गया है। हर पात्र अपनी अच्छाई निकृष्टता मजबूरी कायरता कुटिलता के साथ पूरी शिद्दत से अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है और खुद के लिए प्यार घृणा दया आक्रोश उत्पन्न कराने में पूरी तरह सक्षम है। यह उपन्यास तीव्रता से इस बात को बल देता है कि भारतीय परिवारों में बच्चों खासकर लड़कों की परवरिश को गंभीरता से देखने सुधारने की जरूरत है तो लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ साथ आत्म सम्मान से जीना सिखाने की।
रश्मि जी ने इस उपन्यास में ढेर सारे प्रश्न खड़े किये है जिसके जवाब समाज को ढूंढना है और ये उपन्यास सोच को समाधान ढूंढने की दिशा में मोड़ने में सक्षम है।
रश्मि जी को इस उपन्यास के लिए बहुत बहुत बधाई आप यूँ ही लिखती रहें समाज को नई सोच के साँचे में ढालने के लिए। आपके यशस्वी लेखन के लिए मेरी शुभकामनाये।

बुधवार, 1 जून 2016

हमारी संवेदनायें बढ़ाती फिल्म ' वेटिंग '

हम सबको एक ही जिंदगी मिली होती है और हम दुनिया के सारे अनुभव नहीं ले सकते .किताबें और फ़िल्में, हमसे बिलकुल अलग परिस्थिति में जी रहे लोगों की ज़िन्दगी की झलक दिखाती हैं और दूसरों के प्रति हमारी संवेदनशीलता बढ़ाती हैं.

फिल्म 'वेटिंग' में अलग उम्र, अलग बैकग्राउंड के दो लोग एक सी अंतहीन प्रतीक्षा में शामिल हैं . दोनों के जीवनसाथी कोमा में हैं .दोनों अपने जीवनसाथी के होश में आने का इंतज़ार कर रहे है, पर उम्र के हिसाब से दोनों का नजरिया अलग है. शिव (नसीरुद्दीन शाह ) चालीस वर्ष साथ रही, अपनी पत्नी को हर हाल में होश में आते देखना चाहते हैं. पत्नी आठ महीने से कोमा में है, पर उन्होंने आस नहीं छोड़ी है. डॉक्टर ऑपरेशन के लिए तैयार नहीं होते, उनके ठीक होने की किसी सम्भावना से इनकार करते हैं पर शिव सैकड़ों मेडिकल जर्नल पढ़ डालते हैं और डॉक्टर से पत्नी के ऑपरेशन के लिए आग्रह करते है.कई उदाहरण देते हैं कि अमुक को इतने वर्षों बाद होश आ गया था .

.करीब पच्चीस वर्षीया तारा (कल्कि) की शादी के कुछ हफ्ते ही हुए थे और पति का एक्सीडेंट हो गया. टेनिस खेलने वाले ,मैराथन में दौड़ने वाले पति के लिए जब डॉक्टर बताते हैं कि ऑपरेशन के बाद हो सकता है वह कभी चल फिर बोल नहीं पाए तो तारा ऑपरेशन के लिए मना कर देती है. पर जब डॉक्टर ऑपरेशन करते हैं तो नास्तिक तारा, जो मंदिर में हाथ नहीं जोडती थी,प्रसाद नहीं लेती थी ,दौड़ते हुए,जाकर मंदिर के सामने खड़ी हो जाती है. खुद से सवाल भी करती है ,"क्या मैराथन में दौड़ते व्यक्ति को व्हीलचेयर पर बैठे देख, प्यार बदल जाना चाहिए .प्यार सच्चा है तो हर हाल में होना चाहिए'. प्यार की खातिर दोनों ने अपने अपने माता-पिता को नाराज़ कर शादी की थी.

फिल्म का कथानक बहुत गंभीर है पर फिल्म कहीं से भी बोझिल नहीं होती. . हॉस्पिटल में शिव और तारा मिलते हैं और बार बार जेनरेशन गैप सामने आ जाता है. आज की पीढ़ी की तारा ,हर वाक्य में F वर्ड बोलती है और शिव असहज हो जाते हैं . उनकी असहजता और तारा के साथ दोस्ती में F वर्ड बोलने की कोशिश दर्शकों को हंसा देती है. फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं ,जब पूरा हॉल हंस पड़ता है. तारा के पति के ऑफिस का एक कर्मचारी जो तारा की सहायता के लिए आता है ,उसके साथ कोई ना कोई रोचक स्थिति आ ही जाती है.
तारा आज की पीढी की तरह जल्दबाज़ है , उस से इंतज़ार नहीं होता वह शिव से पूछती है, ऐसी स्थिति में भी इतने zen (शांत ) कैसे हो ?' और शिव बताते हैं...इतना गहरा दुःख होने पर सबसे पहली स्थिति नकारने की होती है, फिर गुस्सा आता है ,फिर स्वीकार करना और उसके बाद डिप्रेशन .डिप्रेशन सबसे खतरनाक स्थिति होती है, उसमें बह गए तो जिंदगी बर्बाद और उबर गए तो फिर zen कि स्थिति में अ आजाते हैं .
फिल्म में सोशल मीडिया पर भी कटाक्ष है .तारा कहती है ,मेरे दो हज़ार फेसबुक फ्रेंड्स हैं, ट्विटर पर पांच हज़ार फौलोवर्स हैं ,कुछ भी उलटा सीधा लिखती हूँ ढाई सौ लाइक्स आ जाते हैं पर आज इस दुःख की घड़ी में मैं बिलकुल अकेली हूँ . शिव भावहीन चेहरे से पूछते हैं ,'ट्विटर क्या है ' तारा बताती है...'एक तरह का नोटिसबोर्ड है' :)
 
उसके अन्तरंग मित्र भी अपनी अपनी उलझनों में फंसे हुए हैं और नहीं आ पाते .एक सहेली कुछ दिनों बाद आती भी है तो उसका बेटा बीमार पड़ जाता है और उसे वापस जाना पड़ता है. फिल्म में एक इशारा भी है...'सुख के सब साथी हैं...दुःख का ना कोई .'
डॉक्टर्स की मजबूरी भी बयां हुई है कि कैसे अपने आस-पास मरीजों के रिश्तेदारों का दुःख देखते हुए कैसे उसमें शामिल ना हों और निर्लिप्त रहें. डॉक्टर रजत कपूर अपने जूनियर्स को एक तरह से ट्रेन करते हैं हैं कि मरीज के परिजनों को स्थिति कैसे बताई जाए ,उसमें कितना अभिनय हो, कितना सच .
हॉस्पिटल और इंश्योरेंस कम्पनी की सांठगांठ की तरफ भी हल्का सा इशारा है .पैसे वाले मरीज के ऑपरेशन के लिए वे तुरंत तैयार हो जाते हैं जबकि दूसरों को टालते रहते हैं .आम जन की मजबूरी भी बताई है..'अपना घर गिरवी रख दिया ...सारी जमा पूंजी खर्च कर दी...बढती उम्र की वजह से लोन नहीं मिल सकता और आगे महंगा इलाज जारी रखना मुश्किल हो जाता है.

शायद तारा के नई पीढी की होने की वजह से पूरी फिल्म अंग्रेजी में ही है और हिंदी बोलते जैसे बीच बीच में अंग्रेजी का एकाध वाक्य बोला जाता है .वैसे ही बीच में कहीं कहीं हिंदी में डायलॉग हैं . कोची में स्थित होने के कारण मलयालम के भी कुछ शब्द हैं . फिल्म में 'F' वर्ड की भरमार है . हमलोग आश्चर्य कर रहे थे फिल्म को A सर्टिफिकेट क्यूँ दिया गया है. इस से कहीं ज्यादा तो टी वी पर सबकुछ दिखाया जा रहा है. पर हाल के विवाद देखते हुये समझ में आया ... इस 'F ' की वजह से ही फिल्म अडल्ट घोषित की गई है.

एक घंटे चालीस मिनट की फिल्म में कई छोटे छोटे बिन्दुओं को छुआ गया है. अनु मेनन का निर्देशन काबिल ए तारीफ़ है . सिर्फ हॉस्पिटल में शूटिंग कर कुछ पात्रों के सहारे अपनी बातें दर्शकों तक पहुंचाने में सफल हुई हैं. नसीरुद्दीन शाह के अभिनय के तो सभी कायल हैं. कल्कि का अभिनय बहुत बढ़िया है. उनका अभिनय बहुत सहज और विश्वसनीय है. छोटे रोल में सहयोगी कलाकारों ने भी बढ़िया काम किया है.

सोमवार, 16 मई 2016

पूजा खरे के विचार 'कांच के शामियाने' पर

पूजा खरे एक छात्रा हैं...प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं ,पढने लिखने का खूब शौक रखती हैं .
कांच के शामियाने पर उन्होंने अपने विचार रखे

इंसान,पेड़--पौधे,जीव--जंतु ये सब जितने भी होते है । वो जिस वातावरण में जन्म लेते है उसी वातावरण में प्रफुल्लित रह पाते है। किसी अन्य वातावरण में जीवित भी नही रह पाते । अगर इन जीव-जन्तुओं को कहीँ और रखना होता है तो पहले वहां वैसा ही वातावरण बनाना पड़ता है। लेकिन प्रकृति की अनुपम कृति स्त्री वो जन्म कहीं और लेती है विकसित कहीं और होती है और फिर अचानक उन्हें उनकी ही जड़ से उखाड़ कर कहीँ और रोपते है और ये कहीं और होता है ससुराल। सबसे मजेदार बात है किसी को पता ही नही होता की स्त्री का अपना घर कौन सा है। मायके में माँ कहती है यहां लाड उठवा लो ससुराल में ये सब नही चलेगा। ससुराल में सब कहते है अपने घर क्या सीखी। समझ में ही नही आता कौन सा घर उनका अपना होता है।
इसी धारणा को हमारे सम्मुख रखता हुआ एक उपन्यास है"काँच के शामियाने"। रश्मि रविजा जी का ये उपन्यास नारी की मार्मिक दशा के साथ साथ उसकी असीम योग्यता,ताकत को भी बताता है। उपन्यास की मुख्य पात्र जया एक साधारण लड़की है। जिसके सपने बस इतने है की उसे अपनी विधवा माँ की सेवा करनी है। लेकिन पुरुष समाज के द्योतक राजीव जो कि एक pcs (शिक्षित समाज)अधिकारी है
उसका अहम हावी हो जाता है और वो अपने अहम के लिए जया से शादी कर लेता है। फिर यही से जया की पीड़ा शुरू होती है। राजीव जया को मात्र अपना गुलाम समझता है। वो जया की सहन शक्ति से परिचित नही रहता इसी कारण बस उसे पीड़ा देता है। अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरा करने में जया के तमाम सपने , इच्छाएं रौंदता है। और हमेशा से ऐसा होता रहा है की लड़कियां भी शादी होने के बाद खुद को पराया समझने लगती है पता नही क्यों पर ऐसी मानसिकता हो जाती है जिन बहनो से कपड़े बांटती है उनसे दुःख नही बाँट पाती। जो भाई हर राखी पर रक्षा करने का वायदा करता है वो भी शादी के बाद पराया कर देता है। माँ पापा चाहते है की दामाद मेरी बेटी को गुलाम बना कर रखे। बस थोडा खुश गुलाम बनाये और लड़कियां भी जीवन भर गुलामी ढोने को तैयार रहती है। जैसा की जया ने किया तमाम प्रताड़ना उलाहना के बाद भी वो राजीव के साथ रहती है। राजिव के तीन बच्चों की माँ बनती है और उन्ही बच्चों में अपनी नई दुनिया बसा लेती है। रूद्र,सौम्याऔर काव्या को जीवन का आधार बना कर उनमे खुशियाँ ढूंढती हैं लेकिन राजीव का अहम् ये भी बर्दाश्त नही कर पाता उसके प्रताड़ित करने के तरीके बदल जाते है । बच्चों को भी कष्ट देने लगता है। तब जाकर जया का धैर्य समाप्त हो जाता है वो मरना चाहती है क्योकि सबके सहने की सीमा होती है। जया की सीमा खत्म हो गयी थी। जया ने अपना कष्ट सह लिया था लेकिन बच्चों का नही सह पाती है। लेकिन उसकी बिटिया उसे जीवन में हर लड़ाई का अदम्य साहस देती है।
जिससे जया की संघर्ष यात्रा पर अपने बच्चों को निकल पड़ती है। अंत में विजय भी जया की ही होती है। जया के बच्चे ias,मैनेजर,और डॉ बनते है। जया का संघर्ष और विजय की अद्वितीय कहानी है| "कांच के शामियाने"। जब शुरू में नाम सुना था तो थोडा अजीब लगा की "कांच के शामियाने" के मायने क्या होते है। जब पढ़ा तो लगा की सच लड़कियों का कोई घर नही होता । उनके लिए हर घर चाहे ससुराल हो या मायका जहाँ वो अपने सपने बुनती है। कांच का ही तो बना होता है। जिसे जब चाहे कोई भी तोड़ दे और इस उपन्यास की सबसे सच्ची बात यही है की स्त्री जब माँ बनती है तो वो बस माँ बन जाती है। फिर उसे स्वयं के अंदर अद्भुत ऊर्जा महसूस होती है जिससे वो हर स्थिति से निपट लेती है जया ने भी ऐसा ही किया। माँ बनकर वो बस माँ बन गयी।

समाज की कमजोर स्त्री को प्रेरित करने की दृष्टि से बहुत ही खूबसूरत उपन्यास है। हर रिश्ते की सच्चाई को सही और सटीक ढंग से बताया है रश्मि दीदी ने। जो जया के साथ हुआ वही अगर जया की बड़ी बहन रीता के पति की बहन के साथ ऐसा कुछ होता तो क्या वो बस इतने से ही संतोष कर लेते। या भाइयों की बेटियों के साथ ऐसा होता तो ?? या रिश्ते खुशियों में ही साथ देते है?? या माँ भी अपनी बेटी की पीड़ा नही समझ पाती??ऐसे कई सवाल मन को झंकझोरते है।। नारी शक्ति के साथ साथ नारी शन शक्ति और मानव समाज का आईना है "रश्मि रविजा" जी का शानदार उपन्यास"कांच के शामियाने"।।

बुधवार, 11 मई 2016

पिता पुत्री के खूबसूरत रिश्ते दर्शाता फ़िल्म पीकू

'पिछले साल आज के दिन ही ये पोस्ट फेसबुक पर लिखी थी ।ब्लॉग पर भी डालना था पर आलस्यवश रह गया ।आज फेसबुक ने याद दिलाया तो दुबारा पढ़कर भी अच्छा लगा . बस  शेयर कर  लिया ।

' फिल्म की सबसे अच्छी बात ये लगी कि इस फिल्म के किरदार खूब बातें करते हैं और जोर जोर से. एक दुसरे पर अपना अधिकार जताते हुए .आम घरों से यह विलुप्त होता जा रहा है. आँखें, फोन ,लैपटॉप या टी वी से चिपकी होती हैं . आजकल के सम्भ्रान्त माता-पिता अपने बेटे-बहू या बेटी-दामाद से एक दूरी बना कर चलते हैं, उन्हें कहीं कोई बात बुरी न लग जाए. पर इसके पीछे यह भावना भी होती है कि कहीं वे पलट कर कुछ न कह दें .जबकि ये निश्चित है कि चार सुनायेंगे तो दो सुनने भी पड़ेंगे .पर यह सबको नागवार गुजरता है ,इसलिए संवाद खत्म होते जा रहे हैं.
इस फिल्म में पिता और बेटी ,जीजा और साली दोनों एक दूसरे को खूब बातें सुनाते हैं पर स्नेह का बंधन भी मजबूत रहता है.

वृद्ध होता इंसान , जितना किसी बिमारी से नहीं जूझता ,उतना बीमारियों की आशंका से परेशान रहता है. फिल्म में पिता की भूमिका में अमिताभ बच्चन इसी शंका से ग्रस्त हैं .उनकी बातचीत का केंद्र , अपने कब्ज़ की परेशानी बयाँ करना ही रहता है. फिल्म भी इसी विषय से शुरू और यहीं पर खत्म होती है. पर बीच में फिल्म ने कई बिन्दुओं को छुआ है. सत्तर वर्षीय पिकू के पिता से बड़ा कोई फेमिनिस्ट नहीं ,वे स्त्रियों के सबकुछ छोड़ अपनी जिंदगी सिर्फ पति और घर की देखभाल में लगा देने के सख्त खिलाफ हैं और स्त्रियों का ज़िन्दगी में एक उद्देश्य होना चाहिए ,इसके प्रबल हिमायती .हालांकि पिकू की शादी को नकारते, वे थोड़े सेल्फिश नजर आते हैं.  पर किस पिता को अपनी बेटी के लिए कोई लड़का 'लायक' लगता है . अमिताभ का ये डायलॉग पूरे समाज का हाल बयाँ करता है  ," पिकू तो कभी आपकी प्रायोरिटी नहीं थी, अचानक उसकी शादी की इतनी फ़िक्र क्यूँ होने लगी ?" लड़कियों की तरफ कभी किसी का ध्यान नहीं जाता ,पर जैसे ही युवावस्था की दहलीज़ पर कदम रखा कि पूरा खानदान ,उनकी शादी के पीछे पड़ जाता है.
छोटा भाई अपनी पत्नी को जब चुप रहने के लिए कहता है तो अमिताभ कहते हैं ,"नहीं नहीं बोलने दो..एडुकेटेड स्त्री का बोलना बहुत जरूरी है, चुप रहने से उसे फ्रस्ट्रेशन होगा और फिर निगेटिविटी आएगी " .कितने लोग समझते हैं, ये बात .

पिकू एक स्ट्रांग, आत्मनिर्भर लड़की है और वो अपने वृद्ध पिता की जिम्मेवारी एक बोझ समझकर नहीं, एक कर्तव्य समझ कर लेती है कि उसे उनकी देखभाल करनी ही है .यह कोई मुद्दा ही नहीं. अगर बहुत सारे लोग ,ऐसा समझ लें तो कितनी जिंदगियां आसान हो जाएँ. पर यही स्ट्रांग लड़की ,जब पिता के बारे में कुछ भी सुनने से इंकार करते हुए कहती है, मैं उनसे दस गुणा ज्यादा चिडचिडी और अजीब आदतों वाली हूँ'...तब कमजोर पड़ जाती है ,जब  इरफ़ान ,उसका पक्ष  लेते हुए कुछ कहते  है, उसकी आँखें नम हो जाती हैं . किसी के भी एक कठोर आवरण के पीछे कई  वजहें होती हैं और जरा सा आवरण के खिसकते ही अंदर की  मासूमियत झलक जाती है .

आँखों की नमी ,हाँ
तेरी मेहरबानी है
थोड़ी सी उम्मीदों के आगे
ऐसी कहानी है.

इरफ़ान की जगह शायद ही कोई दूसरा एक्टर ,इतने नामालूम से रोल को इतनी अच्छी तरह नहीं निभा पाता. उनकी ऑंखें ,बौडी लैंग्वेज़ ही बहुत कुछ कह जाती हैं . वे अमिताभ को दो टूक सुना भी देते हैं और रूड भी नहीं लगते .दीपिका और उनके बीच एक नाजुक सा रुई के फाहे सा  पनपता रिश्ता भला सा लगता है .

मौसमी चटर्जी ने पिकू की मौसी का रोल बहुत बढ़िया निभाया है. फिल्म में छोटे छोटे कई लमहे हैं, जो सुजीत सरकार के बेहतरीन निर्देशन का नमूना हैं. अमिताभ और इरफ़ान के अभिनय पर तो कोई टिपण्णी अब बेमानी है .पर फिल्म दर फिल्म दीपिका निखरती जा रही हैं . पिता की बीमारी का सुनते ही परेशान हो दौड़ के उनके कमरे में जाना ,पिता के अचानक घुमने चले जाने पर अपनी चिंता भरी झल्लाहट जाहिर करना ...इरफ़ान को पसंद भी करना  पर जाहिर न करना , सब बहुत सधा हुआ था .

फिल्म की एडिटिंग बहुत क्रिस्प है .एक भी दृश्य खिंचा हुआ  नहीं लगता .और फिल्म शुरू होने के अंदर दो मिनट में ही अगर होठों पर मुस्कान आ जाए और बीच बीच में हंसी में बदलती हुई..फिल्म के अंत तक कायम रहे तो ये फिल्म देखनी तो बनती है.

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

निदा फाजली की नज्मों, गजलों, यादों में डूबी एक शाम

मन के हर मौसम ने मुखरित होने के लिए जिनसे शब्द उधार मांगे ,उनकी याद में 'चौपाल' द्वारा आयोजित प्रोग्राम करीब पांच घंटे तक चला और साहित्य जगत के कई दिग्गज मंत्रमुग्ध हो उनसे जुड़े संस्मरण ,उनकी नज़्म ,गज़लें सुनते रहे. 'निदा फाजली 'के प्रति अगाध प्यार ही सबको खींच लाया था .

प्रोग्राम का आगाज़ 'विष्णु शर्मा जी ने अपनी दमदार आवाज़ में किया . उन्होंने निदा फाजली के कई मशहूर शेर जोशीले अंदाज़ में पढ़े . 'शकील आज़मी' ने निदा फाजली के आरम्भिक जीवन और उनसे अपनी दोस्ती पर प्रकाश डाला. निदा फ़ाज़ली के वालिद जो खुद भी शायर थे ने उनका नाम 'मुक़्तदा हसन 'रखा था .'निदा फ़ाज़ली' इनका लेखन का नाम है. निदा का अर्थ है स्वर/ आवाज़ . फ़ाज़िला क़श्मीर के एक इलाके का नाम है जहाँ से निदा जी के पुरखे आकर दिल्ली में बस गए थे, इसलिए उन्होंने अपने उपनाम में फ़ाज़ली जोड़ा .

निदा फाज़ली छोटी उम्र के थे तभी कौमी दंगों से तंग आकर उनका पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया .पर उन्होंने जाने से इनकार कर दिया और दूर जाकर छुप गए . पूरे परिवार के चले जाने के बाद वे अपने घर में गए और वे कहते थे , "घर के अंदर जाने और फिर बाहर आने के दरम्यान मुझमें बहुत कुछ बदल चुका था ". वे १९६४ में काम की तलाश में मुम्बई आये और धर्मयुग, ब्लिट्ज़ (Blitz) जैसी पत्रिकाओं, समाचार पत्रों के लिए लिखने लगे. उनकी सरल और प्रभावकारी लेखन शैली ने शीघ्र ही उन्हें सम्मान और लोकप्रियता दिलाई। पर पैसों की कमी बनी रही .

रोज शाम साहिर लुध्यानवी के घर उनकी बैठक भी होतीं. खाना और पीना भी होता और उन्हें साहिर की शायरी सुन कर दाद देनी पड़ती (पता नहीं ये बड़े शायरों/लेखकों का क्या शगल है .रविन्द्र कालिया जी ने भी अपनी आत्मकथा 'ग़ालिब छूटी शराब' में लिखा है .वे इलहाबाद में थोड़े दिनों के लिए 'उपेन्द्रनाथ अश्क ' के यहाँ रहते और खाना खाते थे .बदले में रोज शाम उन्हें उनकी रचनाएँ सुननी पड़तीं ) एक शाम नशे में 'निदा फाजली' ने साहिर की किसी शायरी में कई कमियाँ निकाल दीं .अब साहिर नाराज़ हो गए .(हम सब साहिर के प्रशंसक हैं, पर सच तो सच है ) निदा फाजली को बिना खाना खाए घर से निकल जाना पड़ा पर साहिर ने उनकी जेब में कुछ रुपये डाल दिए थे कि उन्हें भूखा ना रहना पड़े. लेकिन साहिर की नाराज़गी कम नहीं हुई थी .जब आर.डी. बर्मन ने निदा फाजली की एक गजल किसी फिल्म के लिए ली तो साहिर ने उनसे मना करवा दिया. आर.डी.बर्मन ने कुछ रुपये देकर माफी मांग ली . एक मुशायरे में भी जब दोनों को आमंत्रित किया गया था तो साहिर ने कह दिया,'निदा फाजली' को बुलाया जाएगा तो वे शिरकत नहीं करेंगे . ( जिन शायरों के प्रति दिल में इतना सम्मान होता है, उनकी ऐसी बातें कष्ट पहुंचाती हैं पर फिर ये भी यकीन होता है कि वे एक इंसान ही हैं, कोई भगवान नहीं ) 'शकील आज़मी' ने निदा फाजली के विषय में भी कहा कि उनकी पहली किताब की भूमिका निदा फाजली ने लिखी थी पर उसके विमोचन में वे वायदा कर के भी नहीं आये .शायद किसी और मुशायरे में ज्यादा पैसों का आमन्त्रण आ गया था . जबकि एक मुशायरे में सभी नए लोगों को श्रोता हूट कर दे रहे थे . 'शकील आज़मी' भी आमंत्रित थे .पर आयोजकों ने श्रोताओं का मूड देख, उन्हें मंच पर बुलाने का इरादा त्याग दिया .लेकिन निदा फाजली अड़ गए कि शकील आजमी को मौक़ा नहीं दिया जायेगा तो वे भी मंच पर नहीं आयेंगे .

निदा फाजली की  पत्नीश्री  'मालती जोशी', उनके दोहे गाती हुई.
'अब्दुल अहद साज़' जी ने निदा फाजली की रचनाओं पर विस्तार से चर्चा की . निदा फाजली की रचनाओं पर कबीर, सूर, मीरा का बहुत प्रभाव पडा है. उनका अध्ययन बहुत गहन था . उनकी रचनाओं में साम्प्रदायिक सद्भाव धड़कता रहता है. उनके मशहूर शेर
"घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो, यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये " पर मुल्लाओं ने उन्हें घेर लिया था कि 'क्या वे बच्चे को अल्लाह से बड़ा मानते हैं ?'.इस पर निदा फाजली का जबाब था ,'मस्जिद इन्सान ने बनाया है जबकि बच्चे को अल्लाह ने. '
रचनाओं का जिक्र सुन सुन कर यूँ लग रहा था ,निदा फाजली की हर रचना करीब करीब याद है .उनकी अपनी बेटी के जन्म पर लिखी प्यारी सी पंक्तियाँ सबके चहरे पर बरबस मुस्कान ले आईं .

निदा फाजली की पत्नीश्री 'मालती जोशी' का संस्मरण 'नेहा शरद' ने बहुत ही भाव भरे स्वर में आत्मीयता से पढ़ा .'मालती जोशी' फिल्मों में काम करने की इच्छुक थीं.उन्हें मानस मुखर्जी (गायक शान के पिता ) ने एक फिल्म के लिए साइन किया जिसकी पटकथा निदा फाजली लिख रहे थे . निदा फाजली और मालती जोशी एक ही बिल्डिंग में रहते थे . फिल्म निर्माण से सम्बंधित बातचीत मालती जोशी के फ़्लैट में ही होती थी. लेकिन वो फिल्म बंद हो गई . दोनों उस बिल्डिंग से शिफ्ट हो कहीं और रहने चले गए . मालती जोशी का एक एक्सीडेंट हो गया और उन्होंने फिल्मों में एक्टिंग का ख़याल छोड़, गायन अपना लिया . उन्हीं दिनों 'निदा फाजली' की लिखी और जगजीत सिंह -चित्रा सिंह की गाई ग़ज़ल ,
' दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है, खो जाये तो सोना है' बहुत मशहूर हुआ ."
मालती जोशी को ये ग़ज़ल बहुत पसंद आई थी और वे उस शायर से मिलना चाहती थीं . एक दिन एक बैंक में निदा फाजली से मुलाक़ात हुई तो पता चला वे पास में ही रहते हैं और ये उनकी ही गजल है . दोस्ती पुनः परवान चढ़ी .निदा फाजली अकेले रहते थे .मालती जोशी ,उनका ख्याल रखने लगीं. और एक दिन निदा फाजली ने ये नज़्म उन्हें सौंप कर प्रपोज़ कर दिया .
"मुमकिन है सफर हो आसान;
अब साथ भी चलकर देखें!"
इस गजल का अंतिम शेर है
,"अब वक्त बचा है कितना जो और लड़ें दुनिया से
दुनिया की नसीहत पर भी थोडा सा अमल कर देखें "
मालती जी को काम के सिलसिले में तीन महीने के लिए बहरीन जाना पड़ा...दूरियों ने नजदीकियां और बढ़ा दीं. उनके लौटने पर दोनों ने शादी कर ली .एक प्यारी सी बेटी 'तहरीर' का जन्म हुआ. मालती जी बताती हैं, वे ज्यादा से ज्यादा वक्त अपनी स्टडी में गुजारते थे .दुनियादारी से कोई मतलब ना था . चेक पर बिना पूछे साइन कर दिया करते . उनके जाने के बाद माँ-बेटी की दुनिया बिलकुल ही सूनी हो गई पर निदा जी के शेर ने ही उन्हें सहारा दिया ,
" अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये "

मशहूर पटकथा और संवाद लेखक जावेद सिद्दकी ने भी निदा फाज़ली से जुड़ी अपनी प्यारी यादें शेयर कीं . उनके संघर्ष के दिनों का भी बयां किया. उन दिनों निदा फाजली के एक शेर (जो एक आधुनिक कविता के दौर का था ) की काफी आलोचना की गई थी
सूरज को चोंच में लिए मुर्गा खड़ा रहा
खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई

निदा फाजली की बिटिया 'तहरीर '
जिसका अर्थ था कि प्रकृति ने तो सुबह का उजाला कर दिया, पक्षी भी जग गए पर इंसान ने पर्दा खींच कर रात कर लिया. इसे सही अर्थों में नहीं लिया गया .जावेद सिद्दकी ने भी अपने एक कॉलम में इसका काफी माखौल उड़ाया कि यह किस किस्म का शेर है . फिर एक दिन उन्होंने एक किताब की दुकान में दुकान के मालिक से एक हैरान परेशान नौजवान को शिकायत करते सुना कि अमुक से हमारे पैसे देने के लिए कह दीजियेगा '
जावेद सिद्दकी ने जब माजरा पूछा तो पता चला, ' एक करोडपति को मुशायरे में जाने का शौक था पर उन्हें शेर कहने नहीं आते थे. वो नौजवान निदा फाजली हैं जो उनके लिए शेर लिखते और बदले में पैसे मिलते थे '.जावेद सिद्दकी उन करोडपति साहब को जानते थे और उनके शेर बहुत पसंद भी करते थे .अब उन्हें पता चला कि असल में वो सब निदा फाजली का लिखा है, जिनकी शायरी का वे मजाक उड़ा चुके हैं. उन्होंने निदा फाजली का लिखा ढूंढ कर पढ़ना शुरू किया और फिर उनकी आपस में अच्छी दोस्ती भी हो गई .

चौपाल के दूसरे सत्र में निदा फाजली की रचनाओं का गायन था .कुलदीप जी और उनकी टीम ने उनकी रचनाओं को इतने तरन्नुम में इतना डूब कर गाया कि रोमांच हो आया .
'गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड धानी दे मौला "
"बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ "
भूपेन्द्र मिताली भी आये थे. भूपेन्द्र ने सदाबहार ग़ज़ल ,' कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता..." अपनी पुरसोज़ आवाज़ में गाई . भूपेन्द्र पर उम्र हावी होने लगी है .उन्हें डगमग क़दमों से चलते देख , एक कसक सी होती है पर आवाज़ वैसी ही दमदार है .

प्रोग्राम के बीच में ही सफेद कुरते में एक ऊँचे पूरे व्यक्तित्व के सज्जन आये और कोने में खड़े हो गए .एक बार लगा, 'तलत अज़ीज़' हैं. फिर लगा नहीं वे तो बहुत युवा हैं...इनकी दाढी और बालों में भी कहीं कहीं सफेदी झलक रही थी. पर मैं भूल गयी थी , 'तलत अज़ीज़' का एक प्रोग्राम बिलकुल सामने बैठ कर देखा था पर सोलह साल पहले . वे 'तलत अज़ीज़' ही थे और उन्होंने स्टेज से थोड़े स्टार वाले नखरे भी दिखाए . वे निदा फाजली की एक गजल गाना चाहते थे पर वह उनके आई पैड में नहीं था . एक लड़का मोबाइल में लेकर आया तो तलत अज़ीज़ ने फरमाया, 'उन्हें हिंदी पढने नहीं आती...वे सिर्फ उर्दू में लिखा पढ़ते हैं '.(दसवीं तक तो हिंदी पढी ही होगी ) .उन्होंने गुजारिश की कि कोई उर्दू में लिख कर उन्हें ये गजल दे . प्रोग्राम शुरू हुए चार घंटे हो चुके थे और इन सबमे कीमती समय नष्ट हो रहा था . निदा फाजली की कोई भी गज़ल सुना देते और इतनी तैयारी तो उन्हें पहले से कर के आनी चाहिए थी .आखिर शकील आजमी ने उन्हें वो गजल उर्दू में लिख कर दी तब उन्होंने गाया ," जिंदगी ने सब कुछ दिया पर दिया देर से..." इस से पहले उनसे जुड़े कुछ संस्मरण और कुछ ग़ज़लें भी गाईं .

घनश्याम वासवानी. जसविंदर ने उनकी मशहूर गज़लें गाईं .
मालती जोशी जी ने निदा फाज़ली के दोहे गाये. मालती जी ने बताया दुनिया को रुखसत कहने से कुछ ही दिनों पहले निदा जी ने एक बहुत ही सामयिक दोहा कहा था ,"
"गंगा जी के घाट पर करे जुलाहा बात,
वादा करके सो गए क्यूं अच्छे दिन रात "

इस कार्यक्रम में एक कमी खलती रही .यूँ तो वहाँ उपस्थित सभी लोग निदा साहब की तस्वीर से वाकिफ थे . ज्यादातर लोग मिल चुके थे और रूबरू सुन भी चुके थे . फिर भी स्टेज पर उनकी एक तस्वीर होनी चाहिए थी . युवावस्था से लेकर अंतिम दिनों तक की तस्वीरों का कोई कोलाज़ होता तो और बेहतर. जिनके विषय में सुन रहे होते हैं, जिनकी रचनाओं का पाठ हो रहा होता है.उनकी तस्वीर पर भी नजर पड़ती रहे तो उस महान हस्ती की उपस्थिति का अहसास होता रहता है. हो सकता है , ये सिर्फ मुझे ही खला हो वरना 'चौपाल' द्वारा आयोजित कार्यक्रम पूरी तरह मुकम्मल होते हैं और बेहतरीन अनुभवों से समृद्ध कर जाते हैं ।
भूपिंदर

तलत अज़ीज़



शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

'काँच के शामियाने ' पर गंगा शरण सिंह जी के विचार

गंगा शरण सिंह उन गिने चुने लोगों में से हैं जो विशुद्ध पाठक हैं. वे लगतार पढ़ते रहते हैं और करीब करीब
सारी प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ उन्होंने पढ़ रखी हैं. वे जिनके लेखन से प्रभावित होते हैं ,उन लेखकों से फोन पर या मिलकर लम्बी साहित्यिक चर्चा भी करते हैं. लोग दर्शनीय स्थलों की यात्रा पर जाते हैं, वे कभी कभी लेखकों से मिलने के लिए यात्रा पर निकलते हैं . उन्होंने 'काँच के शामियाने ' पढ़कर उसपर अपने विचार रखे, बहुत आभारी हूँ.

                               "कांच के शामियाने"
फेसबुक और अन्य तमाम स्त्रोतों से मिलती निरंतर प्रशंसा और पाठकीय प्रतिक्रिया देखकर उपरोक्त उपन्यास पढ़ने की जिज्ञासा बढ़ जाना स्वाभाविक था। एक सहज सा कौतूहल मन में जागता था कि आखिर क्या होगा इस रचना में कि जो भी पढ़ता है वो इसके रचनाकार से बात करने को तड़प उठता है।
कुछ समय बाद जब ये उपन्यास उपलब्ध हुआ उस वक़्त मैं किसी और किताब को पूरा करने में व्यस्त। कुछ दिन बीत गए। एक दिन रात को अचानक किताब उठा लिया और सोचा कि चलो दो चार पृष्ठ पढ़कर देखते हैं। पर एक बार आग़ाज़ हुआ तो फिर ये सफ़र अंजाम पर जाकर ही थमा। ये करिश्मा रश्मि रविजा की लेखनी का है जो चंद पृष्ठों में ही मन को बाँध लेती है। बेहद सरल किन्तु अद्भुत आत्मीय भाषा का संस्पर्श एक बहुत ही दुखद और दिल दहला देने वाले कथानक को जिस तरह की रवानी देता है, वो हिन्दी कथा साहित्य में आजकल विरल सा है क्योंकि इन दिनों शिल्प और कला के नाम पर ऐसे ऐसे लेखकों को प्रोमोट किया जाता है जिनको पढ़कर सर धुनने स्थिति बन जाती है।
ये उपन्यास पढ़ते समय बरबस मुझे कभी सूर्यबाला जी याद आती रहीं तो कभी मालती जोशी जी, क्योंकि ये ऐसी लेखिकाएँ हैं जिन्होंने अपनी सरल और सहज रचनाओं से एक पूरी पीढ़ी को समृद्ध किया। तथाकथित महान आलोचकों की कृपा दृष्टि भले ही इन्हें न मिली पर पाठकों का भरपूर प्यार व आदर इन्हें नसीब हुआ।
कथा में ऐसी तमाम सारी संभावनाएं थी जहाँ कथानक के बहाने भाषा अभद्र हो सकती थी पर रश्मि जी ने क्षण भर के लिए भी अपनी शब्द-निष्ठा को नहीं गँवाया। कथा के सारे चरित्र इस तरह से चित्रित किये गए हैं कि जीवन्त हो उठे हैं। बेहद घमण्डी और क्रूरता की पराकाष्ठा को छूते पति का घृणित किरदार हो या अवसरवादी सास ससुर, स्वार्थी बड़ा देवर या स्नेही छोटा देवर, नायिका की माँ, बहनें और कहानी में आये हुए अन्य सभी पात्रों का चित्रण तन्मयता से हुआ है।
उपन्यास के आखिरी पृष्ठों में नायिका और उसके बच्चों के वार्तालाप एवं उनके परस्पर रागात्मक सम्बंन्धों की ऊष्मा से आँखें बरबस भर आती हैं।
एक सार्थक, सुन्दर और मार्मिक उपन्यास के सृजन हेतु रश्मि जी को हार्दिक शुभकामनाएं। आप जैसे लिखनेवालों को देखकर भविष्य के प्रति मन आशान्वित होता है

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...