
आजकल ब्लॉग जगत में दो 'हॉट' टॉपिक चल रहें हैं. एक 'नारी' और दूसरी 'टिप्पणी'.रोज ही एकाध पोस्ट इन दोनों विषयों पर देखने को मिल जाती है.मैंने सोचा,मैं भी बहती गंगा में हाथ धो डालूं.वैसे भी यह पोस्ट 'वाणी गीत' की पोस्ट का एक्सटेंशन भर है.कहीं पढ़ा,ये वाकया मुझे बाद में याद आया वरना वहीँ कमेंट्स में लिख देती.
एक बार प्रसिद्द ग़ज़ल गायक 'जगजीत सिंह; का प्रोग्राम दिल्ली में था.वे अपने साजिंदों के साथ मंच पर पहुंचे.हॉल खचाखच भरा हुआ था. श्रोताओं में टाई सूट में सजे, बड़े बड़े ब्यूरोक्रेट्स थे.माहौल बिलकुल अफसराना लग रहा था.जगजीत सिंह भी बड़े उत्साह में थे. सिर्फ बड़े बड़े अफसरानों के सामने ग़ज़ल पेश करने का उनका यह पहला मौका था. उन्हे लगा बहुत ही सुखद अनुभव होगा, यह तो.उन्होंने एक ग़ज़ल गाना शुरू किया.ग़ज़ल ख़त्म हो गयी.हॉल में वैसा ही ही सन्नाटा पसरा था,जैसा ग़ज़ल शुरू करने के पहले था.दूसरी ग़ज़ल शुरू की.ख़त्म हो गयी.वैसी ही शांति बरकरार.शायद टाई सूट में सजे लोगों को ताली बजाना नागवार गुजर रहा था.अब जगजीत सिंह से रहा नहीं गया.उन्होंने तीसरी ग़ज़ल शुरू करने से पहले कहा..."अगर आप लोगों को ग़ज़ल अच्छी लग रही है. तो वाह वाह तो कीजिये.यहाँ आप किसी मीटिंग में शामिल होने नहीं आए हैं.सूट पहन कर ताली बजाने में कोई बुराई नहीं है.अगर आप ताली बजाकर और वाह वाह कर मेरा और मेरे साजिंदों का उत्साह नहीं बढ़ाएंगे तो ऐसा लगेगा कि मैं खाली हॉल में रियाज़ कर रहा हूँ."
फिर तो अपने सारे संकोच ताक पे रख कर उन अफसरानों ने खुल कर सिर्फ वाह वाह ही नहीं की और सिर्फ ताली ही नहीं बजायी.जगजीत सिंह के साथ गजलों में सुर भी मिलाये.अपनी फरमाईशें भी रखी.वंस मोर के नारे भी लगाए.जगजीत सिंह की ली गयी चुटकियों पर खूब हँसे भी.जगजीत सिंह अपने प्रोग्राम में बीच बीच में गजलों को बड़े मनोरंजक ढंग से एक्सप्लेन भी करते हैं.उनके प्रोग्राम में जाने का मौका मिला है...देखा है मैंने कैसे श्रोता हंसी से दोहरे हो जाते हैं.इन श्रोताओं ने भी गजलों का पूरा रसास्वादन लिया और उस शाम को एक यादगार शाम बना दी.
यही बात टिप्पणियों के साथ भी है.अगर पढने वाले चुपचाप पढ़कर बिना अपनी प्रतिक्रिया दिए चले जाएँ तो ऐसा लगेगा जैसे यह ब्लॉग पर नहीं ,किसी डायरी में लिखा जा रहा है.टिप्पणियों पर इतनी बातें हो चुकी हैं कि कुछ भी और कहूँगी तो दुहराव सा लगेगा.
फिर भी इतना कहना चाहूंगी कि सबकी पसंद अलग अलग होती है.किसी को कवितायें अच्छी लगती है,किसी को समसामयिक विषय तो किसी को धर्मविषयक बातें.हर ब्लॉग का पाठक वर्ग अलग होता है.इसलिए टिप्पणियों की गिनतियों पर तो कभी नहीं जाना चाहिए.क्यूंकि फिर तो 'उम्दा लेख' ,'सार्थक लेख' ,भावपूर्ण रचना', 'अच्छी लगी रचना' या 'nice ' जैसे कमेंट्स ही मिलेंगे.'रश्मि प्रभा' जी ने भी ऐसे कमेंट्स पर एक बार एक पोस्ट लिखी थी,"कंजूसी
कैसी??" उन्होंने लिखा था ,'इस बधाई ने मुझे हताश कर दिया है, इस
नज़्म के लिए बधाई क्यूँ?..मेरी बेटी ने कहा,'दिमाग अभी चल रहा है,इसकी बधाई' "...पाठकगन (जो साथी ब्लौगर बन्धु ही हैं)...कहेंगे बहुत demanding है ये लिखने वाले?..अब थोडा तो होंगे,ना..स्वान्तः सुखाय ही सही पर लिखने में थोड़ी मेहनत तो लगती है.ज्ञानदत्त पाण्डेय जी का कहना है " ये पाठक नहीं उपभोक्ता हैं,कुछ ग्रहण करते हैं यहाँ से"...फिर तो कुछ देना भी चाहिए.ये टिप्पणियाँ पारिश्रमिक जैसी ही हैं.
पर जो लोग अपनी रूचि से पढ़ते हैं और उन्हें रचना अच्छी या बुरी जो भी लगे..बताना जरूर चाहिए. यह नहीं कि कभी बाद में चैट या मेल पर बताएं कि आपकी पोस्ट तो बड़ी अच्छी लगी.अरे दो मिनट वक़्त निकाल कर वहीँ बताओ ना.अब सोचिये अगर जगजीत सिंह जी का प्रोग्राम वे लोग चुपचाप सुन लेते और कभी एयरपोर्ट या कहीं और उनसे मुलाकात होती तो उनके कानो में कह जाते,आपकी ग़ज़ल बड़ी अच्छी लगी थी.
मैं इतने महान गायक की तुलना ब्लॉगर्स के साथ नहीं कर रही.पर यहाँ संवेदनाएं एक सी हैं.अगर इतने महान गायक को यह दर्द हुआ तो हम अकिंचन ब्लॉगर्स किस खेत की गाज़र मूली शलजम हैं?