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मंगलवार, 16 नवंबर 2010

आज प्रस्तुत हैं..रश्मि प्रभा, ललित शर्मा, ताऊ रामपुरिया, वाणी गीत, शरद कोकास , रेखा श्रीवास्तव , अविनाश वाचस्पति के बचपने भरे किस्से

रश्मि प्रभा जी के हाथों की बर्फी, अपने रिस्क पर खाएं

बच्चों जैसे काम के लिए अंतिम दिन ? कद से हूँ बड़ी , मन से छोटी तो काम वैसे ही
हर दिन .......
१४ नवम्बर ... जब कद से छोटी थी तो कुछ ख़ास लगता था , स्कूल में टॉफी का मिलना दावत 
जैसा ही लगता था - 'चाचा नेहरु' कहते एक अपनापन का बोध होता, एक परिवार सा ख्याल दिया जाता 
था घर में . 
मन तो आज भी बच्चा है , पर अब तो बच्चे बच्चों की तरह नहीं करते तो स्वाभाविक है कि हमारे बचपने 
को लोग अस्वाभाविक दृष्टि से देखते हैं ... फिर भी कुछ मस्ती चुराने में बहुत मज़ा आता है .
चलिए यादों की सांकलें खोलती हूँ ---
तब मैं दसवीं की छात्रा थी. अप्रैल फूल बनाने की धुन थी पहली अप्रैल को ... हमउम्र के साथ क्या मज़ा !बड़ों को 
बनाने की योजना थी तो मासूम सा चेहरा लेकर शिक्षकों के पास गई ' सर मेरा बर्थडे ऐसे दिन को है कि कोई मानता ही
नहीं ' कुछ शिक्षक मुस्कुराये , कुछ ने सर हिलाया ... एक शिक्षक ने कहा 'मैं आऊंगा' ... मैं मुस्कुराते हुए चल दी .
              
घर में हमने चावल के पानी का (माड़ का ) बर्फी बनाया ... उसे खूब गाढ़ा किया चिन्नी मिलाकर फिर  जमा दिया और बर्फी की शक्ल में काट लिया ... मास्टर साहब के आते बड़ी विनम्रता से उनके आगे उसे रखा और भाग गए , मास्टर साहब ने एक नहीं दो नहीं तीन तीन बर्फी बारी बारी खाए और हम सारे भाई बहन हँसते हँसते लोटपोट हो गए . हमारी बेबाक हँसी से .वे सतर्क हुए ,.......... हमारी माँ को बहुत बुरा लगा और उन्होंने उनको सही ढंग से नाश्ता दिया . 
उनके जाने के बाद हमें डांट भी पड़ी पापा से , पर दांते दांते वे भी हंसने लगे मेरी शैतानी मुस्कुराहट के आगे . 
वैसे आपको बता दूँ , कुछ बातों में मैं आज भी वैसी ही हूँ .... अपने बच्चों के साथ मैं पूरा बचपन जीती हूँ

ललित जी सुना रहें हैं...,आम-इमली और लाठी-डंडे के साथ की दास्तां

जैसे ही गर्मी के दिन आते हैं,आम और इमली के पेड़ों पर फ़ल लगते हैं। इमली की खटाई की मिठास ऐसी होती है,जिसका नाम सुन कर ही मुंह में पानी आ जाता है। यही हाल आम की कैरी के साथ भी है। उसकी भीनी खुश्बु मन को मोह लेती है। हमारे यहाँ पकी हुई इमली के बीज निकाल कर उसे कूटकर नमक मिर्च मिलाके "लाटा" बना के खाया जाता है। बच्चों को बहुत प्रिय होता है। वही कैरी खाने के लिए घर से ही नमक मिर्च पुड़िया में बांध कर जेब में रख लेते थे कि पता नहीं कब किसके आम के पेड़ पर अपना दांव लग जाए।


बचपन की बातें तो कुछ और ही होती है। वह भी गांव का बचपन जीवन भर याद रहता है। हमारे दिल्ली के रिश्तेदारों के बच्चों को यह पता ही नहीं की मुंगफ़ली में फ़ल कहां लगता है? उपर लगता है कि जड़ में लगता है। लेकिन गांव के बच्चों को दिल्ली-बांम्बे तक की जानकारी होती है। टीवी और फ़िल्मों में सब दिखा दिया जाता है। जिससे वे समझ जाते हैं कि शहर कैसा होता है। लेकिन फ़िल्मों में यह नहीं दिखाया जाता कि मुंगफ़ली का पौधा कैसा होता है। आम और इमली पेड़ पर कैसे लगते है।


एक बार की बात है जब हम 7वीं में पढते थे। मेरे दो स्थायी मित्र थे एक कपिल और एक शंकर।हम सारी खुराफ़ातें साथ मिल कर ही करते थे। क्लास में खिड़की के पास बैठते थे और उसके साथ ही अपनी सायकिल रखते थे। अगर किसी टीचर का पीरियड पसंद नही है तो टीचर के ब्लेक बोर्ड की तरफ़ मुंह करते ही सीधा खिड़की से कूद कर सायकिल उठाई और रफ़ूचक्कर हो लेते थे। 

हमारे स्कूल के पीछे आम के बड़े-बड़े कई पेड़ थे। एक दिन कपिल ने बताया कि इन आम के पेड़ों में बहुत सारे आम लगे हैं, कहां हम दो चार कैरियों के लिए चक्कर काटते हैं मरघट तक में, यहीं हाथ आजमाया जाए। मैने भी देखा एक पेड़ तो आम से लदा हुआ था जहां भी हाथ डालते आम ही आम। बस योजना को मुर्त रुप देने की ठान ली। दोपहर के बाद खिड़की से जम्प मारा और चल दिए आम के पेड़ तक। शंकर को सायकिल की चौकिदारी करने के लिए खड़ा किया। उसे चेताया कि अगर कोई चौकिदार या आम का मालिक आ गया तो सायकिल लेकर भाग जाना और चौरस्ते पर मिलना। वहां से हमारे आए बिना कहीं मत जाना तुझे तेरा हिस्सा बराबर मिल जाएगा।

उसे चेता कर हम दोनो चढ गए आम के पेड़ पे। आम भरपूर थे, पहले तो पेड़ के उपर बैठ कर खाए जी भर के, शंकर सायकिल की चौकिदारी करते रहा। एक दो आम उसके पास भी फ़ेंक दिए जिससे वह खाली मत बैठा रहे, आम खाने का आनंद लेता रहे। हमने अपनी जेबें भर ली, लालच और बढ़ा हम आम तोड़ते ही जा रहे थे। आम के पेड़ की लकड़ी बहुत कमजोर होती है अगर टूट जाए तो दुर्घटना होना लाजमी है। इसलिए संभल कर काम में लगे थे।


तभी अचानक जोर का शोर सुनाई दिया। उपर से देखा तो 10-15 लोग हाथों में लाठी लिए जोर जोर से गाली बकते हुए आ रहे थे-"पकड़ो पकड़ो साले मन आमा चोरावत हे,मारो-मारो झन भागे पाए (पकड़ो सालों को आम चोरी कर रहे हैं, मारो मारो भागने ना पाए) मैने शंकर की तरफ़ देखा तो वह सायकिल को वहीं छोड़ कर भागा जा रहा था 100 की रफ़तार में, जैसे किसी ने पैट्रोल लगा दिया हो। सायकिल वहीं खड़ी थी, अगर वो सायकिल ले गए तो चार-आठ आने के आम के चक्कर में घर में धुनाई पक्की थी। वे सब लाठियाँ लेकर पेड़ के तने को पीट रहे थे-"उतरो साले हो नीचे, आज तुम्हारा हाथ पैर तोड़े बिना नहीं छोड़ेगें"। अब क्या किया जाए ? पेड़ पर पत्तियों के बीच छिपे-छिपे सोचने लगे।


कपिल बोला-" देख मै पेड़ की एक डाल को हिलाता हुँ और तु आम तोड़ कर आधा खा के नीचे फ़ेंकना शुरु कर दे। फ़िर जैसे ही ये हमें आम तोड़ने से मना करेंगे तो पहले सायकिल पेड़ के नीचे मंगाएगें और इन्हे पेड़ से दूर हटने बोलेंगे। तु पहले उतर कर सायकिल ले कर भाग जाना, मेरी फ़िक्र मत करना मै तुम्हे चौरास्ते पर ही मिलुंगा।" मैने उसकी बात मान ली। 


कपिल ने पेड़ की डाली हिलाई, पड़-पड़ आम नीचे गिरने लगे। मै भी आधे आम तोड़ कर नीचे फ़ेंकने लगा। कपिल जोर से चिल्लाया-" तुम लोग पेड़ के पास से हट जाओ और सायकिल को पेड़ के नीचे रखो नहीं तो पेड़ के पूरे आम गिरा दुंगा।" उसका कहना था कि उन लोगों को सांप सुंघ गया। क्योंकि आम अभी छोटे ही थे अगर गिरा देता है तो मारने के बाद भी नुकसान पूरा नहीं होगा और वे हमें अभी तक नहीं देख पाए थे कि हम कौन हैं? उन्होने आपस में बात की और एक बोला-"देखो भैया हो आम मत तोड़ो नुकसान हो जाएगा, तुम लोग नी्चे उतर आओ हम लोग कुछ नहीं कहेंगे"। कपिल ने अपनी मांग फ़िर दोहराई। तो उन्होने सायकिल पेड़ के नीचे लाकर रखी। 

मै पेड़ से उतर कर सायकिल के पास कूदा और सायकिल को दौड़ा कर एक ही छलांग में घोड़े की पीठ पर बैठने वाले अंदाज में सीट पर बैठा तो आवाज सुनाई दी- "ये दे तो फ़लांना महाराज के लईका हवे गा"।(ये तो फ़लां महाराज का लड़का है) बस फ़िर तो मैने चौरास्ते पर पहुंचकर दम लिया। थोड़ी देर सड़क पर बैठा और कपिल का इंतजार करने लगा। शंकर को मन ही मन बहुत गालिंयां दे रहा था कि-"साला हमें फ़ंसा कर भाग लि्या।" आधे घंटे बाद शंकर और कपिल कैरियों की जेबें भरे हुए आ रहे थे। शंकर ने कहा कि-"इतने सारे लोगों को लाठी लेकर आते देखकर मै बहुत डर गया। सायकिल की तो मुझे याद ही नहीं आई-मै तो सीधा ही छुट लिया। मु्झे माफ़ करना।" इस तरह आम खाए हम लोगों ने, आज भी बहुत याद आती है बचपन की खुराफ़ातों की और बाल सखाओं की

जब रेखा जी टीचर ना होकर बस एक दोस्त थीं
 
अरे बचपने की बात कर रही हैं, बच्चों के साथ तो बचपन आ ही जाता है. मैंने तो टीचर होकर  भी बच्चों जैसी मस्ती की और वह भी डिग्री कॉलेज के बच्चों के साथ. वाकया १४ नवम्बर  का ही था. मैंने एस डी कॉलेज में राजनीतिशास्त्र  विभाग में प्रवक्ता के पद पर काम कर रही थी. मेरे पास रिसर्च का पेपर था और रिसर्च लेने वाले सभी छात्रों को क्लास के बाद भी मेरे साथ रहना पड़ता था. कुछ अधिक ही खुले हुए थे. सब लोगों ने आपस में विचार करके योजना बनाई कि मैडम बालदिवस पर हमको कहीं पिकनिक पर ले चलिए. ये कोई बच्चों का स्कूल तो था नहीं कि चल दिए. मैंने उनको समझाया कि ये संभव नहीं है. लेकिन बच्चे तो बच्चे उन लोगों ने प्रिंसिपल और हैड से अनुमति ले ली . लड़कियाँ इसलिए  जा सकती थी कि मैडम ले कर जा रही हैं. लेकिन साथ में और कोई टीचर स्टाफ जाने के लिए कोई भी तैयार नहीं था विभाग में मैं अकेली महिला थी . बच्चे भी चाह रहे थे कि मैडम के साथ अधिक मस्ती कर सकते हैं.
                       बाल दिवस आया. मेरा मूड अब भी बिल्कुल नहीं था. सभी ने मिलकर मिनी बस की और मेरे घर पहुँच गए. अब कोई चारा न था और मुझे भी जाना ही पड़ा . सबसे पहले उन लोगों ने कानपुर के पास ही एक जगह है भीतरगांव जहाँ पार गुप्त कालीन मंदिर है. उसको देखने के लिए चल दिए सोचा था कि प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर है वहाँ पर  अच्छा सा प्रांगण  होगा वहीं पर पिकनिक होगी और फिर लौट आयेंगे लेकिन वहाँ पहुंचे तो सिर्फ एक मंदिर था और उसके आसपास खुली जगह भी न थी कि बैठ कर खा पी सकते . मंदिर देख कर सोचा अब कहाँ चले? ये तो कुछ ही घंटे में काम ख़त्म होता नजर आता है. लड़कों ने नबावगंज पक्षी विहार चलने के लिए योजना बना ली. पक्षी विहार वाकई ऐसी जगह थी जहाँ की आराम से बच्चे अपने मकसद में कामयाब हो रहे थे.
                        वहाँ रेसोर्ट के तरह से जगह थी और उसके सामने बड़ा सा गार्डेन था और बड़ा सा घास का मैदान. सबने वही बैठ कर खाना खाया और फिर बच्चे तो आ गए  मौज मस्ती के मूड में. मैडम हम लोग खेलेंगे - मैंने कहा कि मैं तो बैठती हूँ तुम लोगों जो करना हो करो और फिर जब चलना हो तो चल देंगे . वास्तव मैं उस समय अपने बच्चों को मिस कर रही थी क्योंकि छुट्टी के दिन ही हम बच्चों के साथ रह पाते हैं , लेकिन बच्चे वहाँ मैडम कहाँ मान रहे थे उनको लग रहा था कि मैं उनकी हमउम्र हूँ और वे अपने गेम में घसीट ले गए. कबड्डी, बैडमिन्टन और अन्ताक्षरी सब कुछ खेल डाला. उतने समय के लिए लगा नहीं कि मैं टीचर हूँ और ये हमारे छात्र है. डांस से लेकर सब कुछ किया गया. वह दिन शायद इतनी मस्ती मैंने अपने स्कूल या कालेज टाइम में नहीं की थी. हमारे समय में एक अनुशासन था और छोटी जगह का माहौल कुछ अलग ही होता है. उस समय  मैं भूल ही गयी थी कि मैं दो बेटियों की माँ बच्चों के साथ बच्चा बन कर नाच भी रही थी और खेल भी रही थी. वह दिन कभी भूल नहीं पाऊँगी.

 
ताऊ रामपुरिया जी का बचपना भला क्यूँ जाए

यह बात पिछली होली यानि मार्च - 2010  की है. आप जानते ही हैं कि होली पर रंग से बचना बडा मुश्किल है. कितनी ही कोशीश करो कोई ना कोई पकड कर काले पीले लाल रंग डाल ही देता है और बस शुरू हो जाती है रंगो की छूआछूत वाला रोग. यानि अब हम भी टोली में शामिल. तो पिछली होली पर तय हुआ कि इस बार होली पर कहीं बाहर जाकर छुट्टियां बिताई जायें. बेटे ने उसके दोस्तों के साथ पहले ही औली (उत्तराखंड) जाने का प्रोग्राम बना रखा था.


हमारे एक पारिवारीक मित्र हैं दिल्ली में, वो भी इन रंगों से तंग आये हुये थे सो उनसे बात हुई, वो बोले आप दिल्ली आ जाईये फ़िर यहां से जिम कार्बेट पार्क चलते हैं. हालांकि समय बहुत कम था सो जैसे तैसे तैयार होकर निकल लिये. मित्र और उनकी पत्नि हमको एयरपोर्ट पर ही मिल गये जहां से सीधे हम जिम कार्बेट पार्क के लिये निकल गये.


शाम तक जिम कार्बेट पार्क पहुंचे, वहां पता चला कि अंदर बाहर कहीं भी कोई होटल उपलब्ध नही है. छुट्टियों की भीड बहुत ज्यादा हो गई थी. बडी निराशा हुई. मित्र भी बेचारे बडे शर्मिंदा हुये कि उन्होने पहले होटल बुकिंग क्यों नही करवाई?


इसी सब पर बात चल ही रही थी कि बेटे का फ़ोन आगया कि हम लोग कहां हैं? हमने सारी बात उसे बताई तो वो बोला कि आप लोग औली आजाईये, बहुत शानदार जगह है और होटल भी खाली है, सारे रास्ते बर्फ़ मिलेगी. हम लोगों ने भी हिम्मत करके रात को ही गाडी औली की तरफ़ बढा दी. सुबह होते होते औली पहुंच गये. नजारे वैसे ही थे जैसे बेटे ने बताये थे. एक दम स्वर्गिक आनंद आगया.


वापसी हमने होली वाले दिन सुबह ही की. बीच पहाडी रास्ते में एक छोटा सा गांव पडा, देखा सामने कुछ बच्चे खडे थे. गाडी रोक कर पूछा तो पता चला होली का चंदा मांग रहे थे. कुच बच्चों के हाथ में रंग और गुलाल भी था.


पता नही मुझे क्या सूझा कि मैं गाडी से उतर गया, बच्चों को कुछ रूपये दिये, उनसे रंग गुलाल लिया और उनको भी लगाया...उन्होनें भी हमको लगाया...यहां तक तो सब ठीक ठाक था. इसके बाद मुझे पता नही क्या हुआ कि मैने अपने मित्र को भी लगा दिया...उनकी पत्नि को भी लगा दिया और ताई (मेरी नही आपकी) को भी लगा दिया. वो नानुकुर करते रह गये और वहां उस पहाडी गांव की सडक पर हमने जम कर होली खेल ली. बाद में कुछ शर्म भी महसूस हुई कि जिस से बचने को घर छोडकर यहां इतनी दूर आये थे वही काम कर बैठे.:)


पत्नि कुनमुनाती सी बोली - इतनी दूर घर से आकर भी रंग नही छूटते तुमसे? जब देखो बचपना करते रहते हो? 

भगवान जानें कब जायेगा तुम्हारा बचपना?

अविनाश वाचस्पति : कबूतर से बिल्ली में 
 तब्दील होता ,बचपन
अब पिछले पत्र में मेरा बचपना ही तो झलक रहा है, बल्कि यूं कहिए कि झांक रहा है सिर उठा उठाकर। जब आप देखती हैं तो आंखें बंद कर लेता है और सोचता है कि मेरे बचपने को कोई नहीं देख रहा है। बचपना कबूतर है। जैसा सीधा कबूतर। कबूतर तो रहो पर मिट्टी का माधो मत बनो। मिट्टी का कबूतर बन सकते हो। वो भी सीधा ही होता है। पर उससे भी सीधा बचपना। कबूतर का बिल्‍ली होना, बचपन का पूरी तरह खोना है, वैसे जब बचपन पूरी तरह खो जाता है तब या तो सौदागर हो जाता है या हो जाता है भेडि़या। यही इंसान से जानवर बनने की प्रक्रिया है। 
जिनका बचपन कबूतर ही रहता है, न तो बिल्‍ली हो पाता है और न हो पाता है भेडि़या, वो शेर तो हो ही नहीं सकता। वो कबूतर मरने के लिए अभिशप्‍त है, उस कबूतर का अंत भी बिल्‍ली के झपट्टे से ही होना है। हर बिल्‍ली चौकस है, उसे मालूम है जो कबूतर है, वो बिल्‍ली नहीं हुआ है और जब तक वो बिल्‍ली हो, तब तक उसे कबूतर भी न रहने दो। इसी होने में बिल्‍ली का जायका है, उसका स्‍वाद है। उसकी वीरता है। इसी वीरता के चलते कबूतर सदा से हतप्रभ है और वो सदा ही हैरान होता रहेगा और उसकी आंखें होती रहेंगी बंद। 
कबूतर बिल्‍ली का किस्‍सा आम होते हुए भी इसलिए खास है क्‍योंकि कबूतर, इस किस्‍से के आम होते हुए भी न तो बिल्‍ली हो पाता है और न भेडि़या। 


बचपन के वे सारे किस्‍से हैं , जब हम अपने लिए जगह कब्‍जाने के लिए लग रहते थे।  बचपन में मां की गोदी कब्‍जाने की होड़ सबसे ज्‍यादा रहती है, येन-केन-प्रकारेण तब चाहे अकारण ही रोना-चिल्‍लाना पड़े ताकि गोदी में हम जा पहुंचे, वैसे गोदी स्‍वयं सदा बच्‍चे तक पहुंचती रही है। फिर थोड़ा बढ़े हुए तो खेलने के लिए जगह कब्‍जाने का सिलसिला चालू हो जाता था। अरे वही जगह, जहां पर गिल्‍ली डंडा खेलना होता था कि कहीं और वहां पर खेलने न आ जायें। फिर खो खो में जगह कब्‍जाने से ज्‍यादा, छोड़ने की बेताबी, कि कोई पीछे से छूकर खो खो कहे और हम दौड़ पड़ें। थोड़ा और बढ़े हुए तो पत्रिकाओं पर कब्‍जा नंदन, पराग, चंदामामा, लोटपोट इत्‍यादि और नवभारत टाइम्‍स की माया दीदी से परिचित हुए, तभी मेरी एक कविता माया दीदी ने नवभारत टाइम्‍स में चाय शीर्षक से प्रकाशित की थी।  कब्‍जा इसलिए करते थे ताकि एकबार में ही पूरा पढ़कर छोड़ें। तब ऐसा भी बहुत शिद्दत से महसूस होता था कि ये पत्रिकाएं रोज क्‍यों नहीं प्रकाशित होती हैं, एक पत्रिका को लगातार पढ़ने में मात्र दो से तीन घंटे ही लगते थे और इसी का नतीजा था कि स्‍कूली पढ़ाई में सदा हाशिए पर ही रहे। 


कविता में बारूद भरने को बिखरे  पटाखे 
 ढूँढते शरद जी



यही कोई आठ नौ साल की उम्र रही होगी । दीवाली का अगला दिन था । सुबह सुबह भी हवाओं में बारूद की गन्ध विद्यमान थी । घर के भीतर स्टॉक में पटाखे खत्म नहीं हुए थे लेकिन एक चाहत थी कि जो पटाखे रात फूट नहीं पाए थे उन्हे बीन लिया जाये , सो बीनते बीनते ढेर सारे पटाखे इकठ्ठा हो गए । गुझिया का आनन्द लेते हुए , उन्हे (पटाखों को ) तोड़कर उनके भीतर का बारूद निकाला गया और एक कागज़ में इकठ्ठा कर लिया गया ।अब बारूद को ' भक्क ' से जलते हुए देखने का आनन्द लेना था । मगर एक गलती हो गई , बारूद के ढेर को एक किनारे से आग लगाने की बजाय मैंने ऊपर से आग दिखाई । नतीज़ा ..दायें हाथ की हथेली पीली पड़ गई । कुछ ही सेकंड में जब तीव्र जलन प्रारम्भ हुई , समझ में आ गया कि हाथ जल गया है । बस रो रो कर आसमान सर पर उठा लिया । भला हो पड़ोस की आँटी का जिन्होने तुरंत अपने देसी नुस्खे के साथ कच्चे आलू पीसकर उनका लेप जली हुई हथेली पर लगाया और उसे पैक कर दिया । आश्चर्य जलन कुछ देर में गायब हो गई और अगले दिन शाम तक हाथ बिलकुल ठीक हो गया ।            

अभी दस दिनों पूर्व ही दिवाली सम्पन्न हुई है । अक्सर यह किस्सा दिवाली के समय मैं बच्चों को सुनाता हूँ । हुआ यह कि इस दिवाली के अगले दिन सुबह सुबह बाहर निकला तो देखा बहुत सारे बिना फूटे हुए पटाखे पड़े हैं । बस उन्हे बीनना शुरू किया ही था कि भीतर से श्रीमती जी बाहर आई और कहा ... " क्यों आपका बचपना गया नहीं अभी तक ? "  हाहाहाहा " मैंने हँसकर कहा " मनुष्य बचपन से कितनी भी दूर निकल आये , उसका बचपना जीवन भर उसके साथ साथ चलता है ।
  
वाणी गीत की सलोनी सूरत के पीछे छुपी चुलबुली  सी नन्ही बच्ची 

जबसे बचपन पर कुछ लिखने को कहा है लगातार सोच रही हूँ कि बचपन बीता  ही कब ...बड़े हुए भी कब थे या कभी -कभी उदास होकर ये भी सोचता है कि बचपन जिया कब था ...भाई बहनों के परिवार में दूसरे नंबर के बच्चे अपना बचपन कितना जी पाते हैं , जल्दी बड़े हो जाते हैं ...शायद बेसमय जुदा  हुए उस बचपन का ही असर है जो बड़े होते -होते वापस लौटने लगता है ...
 
बड़ा सा संयुक्त परिवार रहा है हमारा ...लगभग एक दर्जन भाई-बहनों की सबसे बड़ी दीदी मैं ...तो दादागिरी तो खूब चलती रही ...बात -बात पर प्रसाद चढाने वाली धर्मपरायण अम्मा(दादी ) के बांटे हुए प्रसाद को इन छोटे भाई -बहनों से छीन लेना , कंचे -क्रिकेट-कैरमबोर्ड पर अपना हक़ जताना  आदि जैसे बेईमानी भरे कार्य भी खूब किये ...
सीटी पर गाना गुनगुनाना , या कभी -कभी बाथरूम से गले फाड़ कर चिंघाड़ते हुए गाना , देर रात किसी को भी मिस काल देकर परेशान करना  (अपना फोन नंबर तो देना ), बरसात में अपने बच्चों के साथ उछलकदमी  करना ...अपने ही बच्चों की  आइसक्रीम और चॉकलेट पर नजर गडाना...चंदा मांगने, जनगणना करने  आये बड़ों और बच्चों को अपने सवालों से परेशान करना .... ऑनलाइन फ्रेंड्स को खुद ही हेलो और फिर बाय कहना ...ये सब तो अभी भी बदस्तूर जारी है  ...अब अलग से कौन सा संस्मरण लिखूं ...

याद  करती  हूँ  ...कुछ सालों पहले एक नए विद्यालय के पहले ही सेशन  में कुछ समय पढ़ाने का अवसर प्राप्त हुआ ... पूरा स्टाफ नया ...कुछ लड़कियां थी जो इससे पहले दूसरे विद्यालयों में पढ़ा चुकी थी ...नए सेशन में नर्सरी के बच्चों का हाल बुरा होता है , नए माहौल में एडजस्ट  होने में उन्हें समय लगता है और तब तक उनकी चीख -पुकार , रोना धोना , बैग और खाना बिखेर देना जैसे कार्यक्रम चलते रहते हैं ...ऐसे में उन्हें संभलना बहुत मुश्किल हो जाता है ...उन रोते-ढोते   बच्चों को संभालना, क्लास में बैठाये रखना  बहुत ही मुश्किल काम था ...कोई उस क्लास में जाने को तैयार नहीं ...आखिर जोखम लिया मैंने ...कोई कहीं भाग रहा , कोई रोरोकर आसमान सर पर उठा रहा , कोई क्लास में जाने को तैयार नहीं , किसी ने अपना बैग फैला रखा ...समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे संभालूं इन्हें ...फिर मैंने एक दो बच्चों से कहा ," आज पढेंगे लिखेंगे नहीं , सिर्फ खेलेंगे ...सुनते ही एक दो का तो बाजा  बंद हो गया ...दूसरों की सिसकियाँ धीमी ...माहौल को देखते हुए मैंने कहा जिसको मेरे साथ आईस पाईस खेलना हो क्लास में चलो ...बच्चे महाखुश...एक घंटे तक बच्चों के साथ आईस पईस , घोडा मार खाई जैसे गेम खेलते बच्चों के खिलखिलाते चेहरे को देख जैसे अपना बचपन फिर से लौट आया ...


(हमारे कुछ सुपर स्टार्स ब्लॉगर्स की नींद अब खुली :)...उनलोगों ने अब जाकर भेजे हैं संस्मरण तो कल कुछ और ब्लॉगर्स के बचपने  भरे किस्से )

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...