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गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

टी.वी. सीरियल देखना....महिलाओं का शौक या मजबूरी.

पिछली पोस्ट में मैने आपत्ति जताई  थी..,टी.वी. सीरियल्स में दिखाए जा रहे उन दृश्यों पर  जो कभी हमारी संस्कृति का अंग थे ही नहीं.

टिप्पणियों में एक बात पर अधिकाँश लोगो ने जोर दिया कि महिलाएँ ये  सब  देखना पसंद करती  हैं...वे बड़े चटखारे लेकर बिना पलक झपकाए देखती हैं...और इसीलिए सीरियल निर्माता ये सब दिखाते हैं.
मैने टिप्पणियों के उत्तर में भी इस प्रश्न पर विचार करने की कोशिश की कि  आखिर महिलाएँ टी.वी. सीरियल्स देखना...इतना पसंद क्यूँ करती हैं?? फिर लगा विस्तार से इस विषय पर  पोस्ट ही लिखनी चाहिए
 

जैसा मेरा खयाल  है कि महिलाएँ टी.वी. सीरियल्स मजबूरी में देखती हैं. उनके पास मनोरंजन  के दूसरे साधन नहीं हैं. समय काटने का भी कोई बेहतर उपाय नहीं है.

आजकल सबलोग अपने-अपने घरो में सिमटते जा रहे हैं. बस किसी अवसर पर ही लोगो का मिलना-जुलना होता है. पहले की तरह महिलाएँ मिलकर अचार-बड़ियाँ-पापड़ नहीं बनातीं. पहले गाँव-मोहल्ले में किसी लड़की की शादी तय  हुई और पूरा महल्ला या गाँव ही लग जाता  था, शादी की तैयारियों में. कहीं महिलाएँ घर के कामो से बचे समय में पेटीकोट, ब्लाउज की सिलाई में जुटी हैं...तो कहीं कशीदाकारी में तो कहीं  लड़की को दिए जाने वाले तरह-तरह के हस्तकला से निर्मित वस्तुएं बनाने में.  इन सबके साथ, मंगल-गीत...हंसी मजाक भी चलता रहता था. शादी...जन्मोत्सव....तीज-त्योहा
र जैसे अवसर अक्सर आते ही रहते थे.
 
शादी-ब्याह ना हो तब भी महिलाओं को घर के काम में ही काफी वक्त लग जाता था. तब ये गैस के चूल्हे...मिक्सी..अवन नहीं हुआ करते थे. ब्रेड, मैगी  या बाज़ार का रेडीमेड नाश्ता उपलब्ध नहीं था . जो भी नाश्ता बनाना हो वे अपने हाथों से ही बनाया करती थीं. इन सबके बाद भी बचे हुए समय पर वे सिलाई मशीन पर काफी काम किया करती थीं...पेटीकोट-ब्लाउज...लड़कियों की फ्रॉक,  सलवार-कमीज़....पजामे सबकी सिलाई घर पर ही की जाती थी. पचास के दशक  में शायद हर घर में फूल कढ़े रूमाल और तकिये के गिलाफ जरूर नज़र आते थे. क्रोशिये का भी काफी काम किया जाता था. और यह सब सिर्फ शौक के तहत नहीं...हर महिला इन कामो में रूचि लेती थी या फिर उन्हें लेनी पड़ती थी.( कहीं पढ़ा था कि कढाई-बुनाई मेंटल थेरेपी का भी काम करती है. ). लिहाज़ा इन सब कामो में उलझी महिलाओं को खुद के लिए भी वक्त मयस्सर नहीं था.

पर आज परिदृश्य बदल गए हैं. गाँव में भी अब गैस के चूल्हे पहुँच गए हैं. मिक्सी..अवन..टोस्टर अब घंटो का काम मिनटों  में निपटाने लगे हैं. बच्चों के  लिए माँ, तरह-तरह के व्यंजन बनाने को तैयार है पर बच्चों को मैगी चाहिए. अब शायद माँ, तकिये के गिलाफ पर फूल काढ दे तो बच्चे सर रखने को तैयार ना हों. घर पर सिले कपड़े पहनने का चलन करीब-करीब बंद ही  हो गया है.वजह ये भी है कि बाज़ार में ,उस से कम पैसों में बिना मेहनत के रेडीमेड कपड़े उपलब्ध हैं.


शादी-ब्याह में भी अब सब कुछ कॉन्ट्रेक्ट पर होने लगा है...करीब पंद्रह साल  पहले मैंने गाँव में एक शादी अटेंड की थी और वहाँ, खाने का कॉन्ट्रेक्ट किसी एक को...मंडप सजाने का दूसरे को...और स्टेज सजाने का किसी तीसरे को दिया गया था. मिलजुल कर काम करनेवाली प्रथा ही विलुप्त  सी हो गयी है.


जिन महिलाओं के बच्चे छोटे हैं, उनके लालन-पालन में उनका काफी समय निकल जाता है.परन्तु जब बच्चे हाइ-स्कूल में पहुँच जाते हैं तो महिलाओं के पास ढेर सारा खाली  वक्त बच जाता है. अब बच्चे अपना सारा काम खुद करने लगते हैं. स्कूल छोड़ने -लाने की  जिम्मेवारी से भी  निजात मिल जाती है. पढ़ाई के लिए ज्यादातर ट्यूशन जाते हैं.

 

खासकर उन महिलाओं के पास ज्यादा वक्त होता है,जिनके बच्चे शहर से बाहर पढ़ने चले जाते हैं. ऐसी महिलाओं   में अक्सर, empty nest syndrome देखे जाते हैं.(जैसे पक्षियों के बच्चे घोंसला  छोड़ उड़ जाते हैं ) उनके पास अब बहुत सारा वक्त होता है...और साथ में अकेलेपन का अहसास भी. अक्सर वे अवसादग्रस्त भी हो जाती है. और टी.वी. सीरियल्स के पात्रों से इस  कदर जुड़ जाती हैं कि उनके दुख-दर्द..हंसी-ख़ुशी उन्हें अपनी सी लगने लगती है.

महिलाओं के पास अब वक्त तो बच जाता है. परन्तु इस वक्त के साथ क्या किया जाए..इसकी प्लानिंग किसी के पास नहीं है. लिहाजा वे टी.वी. देखकर ही समय काटती हैं. कई महिलाएँ कहती हैं...'हमें टी.वी. देखना नहीं पसदं...इतने समय में हम कुछ पढ़-लिख लेते हैं " पर सबको पढ़ने-लिखने का  शौक नहीं होता. सबका IQ लेवल अलग है. अगर वे टी.वी. देखकर ही समय काटना पसंद करती हैं तो हमसे कोई  कमतर नहीं हैं.

 

कई  पुरुष, कह बैठते हैं..." जरूरी काम पड़े रह जाते हैं...और वे टी.वी. देखती रहती हैं." काम तो वे हर हाल में निबटाती ही होंगी......शायद समय की उतनी पाबन्द नहीं हों. पर अगर दूसरा पक्ष देखा जाए तो उनका घरेलू काम कितना बोरिंग है...और वे इसे वर्षों से करती आ रही हैं. अब तक..मनों धूल साफ़ कर चुकी होंगी...लाखों रोटियाँ बना चुकी होंगी...कितने ही क्विंटल दाल-चावल-सब्जी बना चुकी होंगी. इनके बीच अगर कुछ इंटरेस्टिंग बदलाव मिले तो वे निश्चय  ही आकर्षित हो जायेंगीं.

घुघूती जी ने पिछली पोस्ट की टिप्पणी में कहा था कि 
"सीरियल तो अफ़ीम हैं.देखो और संसार की चिंताओं से मुक्त हो यहाँ के पात्रों के दुखों को जियो." परन्तु अफीम की एडिक्शन की तरह ही टी.वी. का एडिक्शन भी नहीं होना चाहिए. ईश्वर हर किसी को कोई ना कोई गुण प्रदत्त करता ही है. महिलाएँ अपने जीवन के  Best  Year घर-परिवार संभालने में लगा देती हैं. तो अब उनके पति-बच्चों की बारी है कि वे उन्हें कोई शौक अपनाने या किसी तरह का कार्य करने को प्रेरित करें.

म्युज़िक..बागबानी...सिलाई...कढाई...पेंटिंग...योगा...कई सारे शौक होते हैं...जो प्रोत्साहन के अभाव में असमय  ही कुम्हला गए होते हैं. अब, जब उनके पास समय है...फिर से उनके शौक को पल्लवित-पुष्पित किया जा सकता है. कुछ नया सीखा भी जा सकता है..सीखने की कोई उम्र नहीं होती...(हम सबने भी आखिर इस उम्र में कंप्यूटर चलाना सीखा,ना ) परन्तु हमेशा सबके लिए सोचती महिला..शायद ही अपने लिए कभी, खुद सोचे...और संकोच भी घेरे रहता है,उन्हें...इसलिए प्रोत्साहन की बहुत जरूरत है.


हमने पश्चिमी जीवन-शैली  तो अपना ली है...पर ये नहीं अपनाया...कि वहाँ किसी भी काम को छोटा नहीं समझा जाता.

 

मुंबई में ही देखती हूँ....महिलाएँ तरह-तरह के काम करती हैं..चाहे वो आर्थिक कारणों से करती हों...या समय के सदुपयोग के लिए ही. घर से इडली-चटनी...नीम-आंवले-करेले का जूस ...या घर की बनी रोटी-सब्जी की सप्लाई. बहुत सारे लोग देर से ऑफिस से आते हैं...या फिर अकेले रहते हैं...वे हमेशा होटल से ज्यादा घर के बने खाने को तरजीह देते हैं. बच्चों की बर्थडे पार्टी का ऑर्डर....टिफिन सर्विस तो एक बढ़िया बिजनेस है ही. फूलों के पौधों की नर्सरी खोलना...या योगा सीखकर...दूसरों को सिखाना...सिलाई-कढाई  सिखाना....ट्यूशन, ड्राइंग क्लासेस..प्ले स्कूल...डे-केयर......कितनी ही सारी चीज़ें हैं..जिनमे खुद को व्यस्त रखा जा सकता है. और पुरुषों को भी इसमें हेठी नहीं समझनी चाहिए कि वे क्या इतना नहीं कमाते कि पत्नी को काम करना पड़े. कई काम शौक के लिए भी होते हैं.

हर शहर -कस्बे में समाज-सेवी संगठनो का भी गठन होना चाहिए...जहाँ महिलाएँ जाकर अपना कुछ योगदान कर सकें...

हमारे राष्ट्र के उत्थान के लिए भी जरूरी है कि स्त्रियों  का भी इसमें योगदान हो. उन्होंने अपने बच्चों का सही ढंग से लालन-पालन  कर देश को अच्छे नागरिक तो दिए...लेकिन अब उनकी दूसरी पारी शुरू होती है...और उसमे यूँ निष्क्रिय बैठ सिर्फ..टी.वी. देखना सही नहीं है...स्कोर बोर्ड पर कुछ दिखना चाहिए.

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