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रविवार, 24 अप्रैल 2011

साथी ब्लॉगर्स के साथ गुजरे कुछ खुशनुमा पल


शरद कोकास  जी की कविता पर लिखी पुस्तक के विमोचन समारोह के बाद ही ये पोस्ट लिखनी थी...परन्तु वही...बैक लॉग निबटाते अब जाकर इसकी बारी आई.....मैने तो इरादा छोड़ ही दिया था लिखने का....क्यूंकि तस्वीरे फेसबुक पर डाल दी थीं और ज्यादातर लोगो ने देख लिए थे .....परन्तु कई मित्र जो फेसबुक पर नहीं है...उनकी फरमाईश थी कि हमलोग फोटो कैसे देखेंगे ...सो उनका आग्रह सर माथे..

पिछले महीने अपने ब्लोगर मित्रों से काफी जल्दी-जल्दी मिलना हो गया. पहले अभिषेक ओझा...अमेरिका से मुंबई तशरीफ़ लाए...
आभा मिश्रा जी के यहाँ , अभिषेक ओझा ...युनुस खान, ममता सिंह...प्रमोद सिंह...अनिल रघुराज...इकट्ठे हुए थे. अभिषेक, बिलकुल अच्छे बच्चे बन कर अपने घर जा रहे थे....बालों की स्टाइल बिलकुल शरीफ लडको वाली थी. मैने तस्वीरों में उनके बालों के पीछे की टेल देख चुकी थी...और पूछ ही बैठी,"चोटी गायब??" उन्होंने हंस कर सर हिला दिया. सबलोग उनसे पूछ रहे थे.."अमेरिका से वापस आने का इरादा है या नहीं?" उन्होंने ईमानदारी से बता दिया, " इरादा तो है..पर पक्का कुछ नहीं कह सकता....क्यूंकि कई मित्रों को देखता हूँ...वे तय कर लेते हैं...छः महीने बाद वापस लौट आऊंगा..पर वे छः महीने  दो साल में बदल जाते हैं "
 

अभिषेक ने ये भी जिक्र किया...कि 'मुंबई में उन्होंने करीब आठ महीने बाद एक फ्रेंड के टिफिन में घर की बनी चपाती खाई'

वहाँ बोधिसत्व जी और प्रमोद जी में समाज में कवि की भूमिका को लेकर सार्थक बहस छिड़ गयी. अनिल रघुराज जी और आभा बोधिसत्व जी ने भी इस विषय पर खुलकर अपने विचार रखे.
बोधिसत्व जी  ने  निराला...पन्त..महादेवी से सम्बंधित  कई बातों की चर्चा की..कि कैसे निराला जब बीमार हुए तो उनके इलाज के लिए नेहरु जी महादेवी वर्मा के माध्यम से पैसे भिजवाते थे क्यूंकि निराला जैसे स्वाभिमानी कवि को को किसी तरह की मदद लेना गवारा नहीं था.

ऐसी बहस का तो कोई अंत नहीं होता किन्तु अभिषेक को जल्दी निकलना  था क्यूंकि उन्हें कहीं लेक्चर देने जाना था. मैने कह ही दिया ,"आप तो इतने छीटे दिखते हैं...लोग,आपकी बात सुनते भी  है?" अब सुनते ही होंगे ना...वरना इनवाईट क्यूँ करते :)

युनुस जी...ममता जी ने विविध भारती के अपने अनुभव से और बोधिसत्व जी ने फिल्मो से जुड़ी कई  रोचक बातें बताईं ...अफ़सोस भी किया कि अब सागर सरहदी और साहिर लुधियानवी जैसे लोग नहीं हैं जो स्क्रिप्ट का या गाने का एक शब्द भी बदलने को तैयार नहीं होते थे बल्कि कहते थे....आप लेखक/गीतकार बदल लीजिये.
बातों के साथ चाय का दौर चलता रहा....बोधिसत्व जी की बनाई स्पेशल चाय.:)

फोटो आभा जी के ब्लॉग के सौजन्य से मैं उस दिन कैमरा ले जाना ही भूल गयी 

बोधिसत्व जी एवं अभिषेक ओझा 


मैं, आभा जी एवं ममता सिंह जी
आभा जी,मैं,अभिषेक एवं ममता जी

इसके कुछ ही दिनों बाद....विमोचन समारोह था जिसका जिक्र मैं यहाँ कर चुकी हूँ.

उस दिन विमोचन समारोह में सबसे मुलकात तो हुई..पर इत्मीनान से बैठकर बात नहीं हो पायी थी. और दूसरे दिन ही शरद जी को वापस लौट जाना था. बहुत ही जल्दबाजी में कुछ लोगो को ही सूचना दे पायी उसमे भी ममता सिंह जी और अनीता कुमार जी नहीं आ पायीं. घुघूती बासुती जी...शरद जी..युनुस जी...आभा जी...बोधिसत्व  जी और सतीश पंचम जी ही आ पाए.

संयोग से शरद जी के भाई का घर और घुघूती जी का घर एक ही इलाके में है....इसलिए वो लोग साथ ही आ गए. और इस बात की तो प्रशंसा करनी पड़ेगी कि मुंबई में इतनी दूरी होने पर भी...उनलोगों ने इतने अच्छे से कैलकुलेट किया था कि बिलकुल समय पर आ गए. थोड़ी ही देर में आभा जी बोधिसत्व जी और युनुस जी भी आ गए. सतीश जी...पोस्ट तो बड़ी जल्दी जल्दी लिखते हैं...पर यहाँ काफी देर से  पहुंचे.

पता नहीं किस बात पर भगवान राम का जिक्र आया और पुरातन काल में स्त्रियों की स्थिति पर गहरा विमर्श शुरू हो गया. सब लोग अपने अपने विचार रख रहे थे.पर घुघूती जी और बोधिसत्व जी ज्यादा मुखर थे. अब घुघूती जी की तस्वीर तो नहीं दिखा सकती {उन्हें कैमरे को सजा देने की आदत है ..उसे डांट कर दूर भगा देती हैं :)} लेकिन बोधिसत्व जी की तस्वीर से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कितने जोश में थे, दोनों वक्ता :)...फेसबुक पर इस सन्दर्भ में हुए कुछ संवाद का आपलोग भी लुत्फ़ उठाएँ   
Rashmi Ravija अनुमान लगाइए बोधिसत्व जी, किसे कुछ समझाने की कोशिश कर रहे हैं??

Bodhi Sattva उधर कौन है जो नहीं समझ रहा...

Praveen Trivedi ‎.........तो इतना गुस्साने की क्या जरुरत है ?    .
 

 Yunus Khan कउन कहता है कि बोधि गुस्‍सा रहे हैं। कोई मत कहिए कि वो खीझ रहे हैं। अरे भई वो तो बतियाए रए हैं।

Praveen Trivedi ओह! युनुस भाई .....माफी देव हमका ........हम समझे कि .................?
गुस्सा रहें हैं |

Praveen Trivedi वैसे इत्त्ने तथाकथित स्नेह से वह किससे बतिया रहे हैं ........अब ज़रा यहु तो बता दीजिए ना ?

Yunus Khan उनसे जिनका नाम एक चिडिया का नाम भी है।

Anil Pusadkar ghughuti basuti jee,   

Bodhi Sattva लोग भावनाओं को नहीं समझते....तो क्या करें....

Ghughuti Basuti भावनाओं को तो समझना सरल है तर्क नहीं. वहीं तो मतभेद हो रहा है, मनभेद नहीं. वैसे कल जब हम बतिया / तर्किया रहे थे 'राम जी' हिचकियों से बहुत परेशान हो रहे थे.

Rashmi Ravija हा हा सही कहा,घुघूती जी..बेचारे राम , द्रौपदी, कृष्ण, अर्जुन,अहिल्या,गौतम , इंद्र को बड़ी हिचकियाँ आ रही होंगी....युनुस जी का सुझाव बढ़िया था...अगली बहस ठीक उसी बिंदु से शुरू होगी...:)..... वैसे मजा आ गया...सबको कॉलेज स्टुडेंट्स जैसे हँसते-बतियाते-बहसियाते देख.

Abha Bodhisatva अभी तो घुघूती जी के साथ हूँ......:)

Ghughuti Basuti प्रवीण, स्नेह तो स्नेह ही था तथाकथित नहीं, हाँ, विषय ही कुछ ऐसा था कि जोश आ ही रहा था, मजा भी.

 Praveen Trivedi हम तो केवल बूझ पाने की कोशिश ही कर पा रहे हैं| .......फिर भी बड़ा मजा आ रहा है|  वैसे चित्र चर्चा से कुछ आगे बढ़कर यह 'हिचकी' प्रकरण आगे बढ़ाया जाए .....तो कैसा ? .........बस क्यूंकि समझने में तनिक नहीं बहुत कठिनाई समझ आ रही है | इस (बोध) कथा को भी अगर समझाया जा सके ....तो बहुत ...........साधुवाद आप सबका |  

Yunus Khan कुछ नहीं जी। बस ज़रा चर्चा श्रीराम के बहाने पौराणिक संदर्भ में स्‍त्री की स्‍वतंत्रता जैसे मुद्दों से शुरू हो गयी थी। और फिर क्‍या था।

Praveen Trivedi ‎...........क्या था .....युनुस भाई ?

Yunus Khan अरे मास्‍साब!!
Bodhi Sattva बता दो भाई..

शरद जी से घुघूती जी ने यूँ ही पूछ लिया कि कितनी महिलाएँ  उनकी कविता से प्रभावित हुई हैं और शरद जी ने तुरंत बता दिया कि उनकी पत्नी भी पहले उनकी कविताओं से ही प्रभावित हुई थीं. एक रोचक घटना भी उन्होंने शेयर की . शादी से पहले उन्होंने, लता जी से पूछा, "आप मार्क्स से परिचित हैं?" { अब कवि हुए तो क्या हुआ...लड़कियों से बात करने में सारे लड़के dumb ही होते हैं...(सॉरी शरद जी :))अब पहली मुलाकात में कोई लड़की से कार्ल मार्क्स के बारे में पूछता है?:)} और लता जी ने कहा..."हाँ बिलकुल परिचित हूँ..वो मार्क्स के पर्सेंटेज ना ?" (वे टीचर हैं...तो नंबर(मार्क्स) से ही उनका वास्ता पड़ता है ).

इस बात पर शरद जी की बहुत खिंचाई  हुई पर सतीश जी और आभा जी की वेशभूषा पर हुई खिंचाई से कम.

संयोग कुछ ऐसा था कि
दोनों लोगो ने बिलकुल मिलते जुलते रंग  के ड्रेस पहने थे. फेसबुक पर इसपर बड़े रोचक संवाद हुए जो फोटो के नीचे कॉपी पेस्ट कर दे रही हूँ...



 Rashmi Ravija किस स्कूल से क्लास बंक कर के आ रहे हैं दोनों...ड्रेस तो एक ही स्कूल की लग रही है...एकदम मैचिंग :)

Abha Bodhisatva कल तो छुट्टी थी..... :)

Rashmi Ravija कोचिंग क्लास का बहाना बनाया होगा...हा हा

Abha Bodhisatva कोचिंग में स्कूल ड्रेस हा हा हा.... :)

Rashmi Ravija यूनिफॉर्म वाला नया कोचिंग क्लास खुलनेवाला है..:)

Ghughuti Basuti जहाँ पढ़ने जाएंगे ब्लॉगर! 

Satish Pancham मेरी टीचर ने तो आज मेरे कान पकड़ कर पिटाई भी कर दी.....ये कहते कि क्लास में तबीयत खराब का बहाना बहाना बनाकर छुट्टी ली और वहां ब्लॉगर बैठकी में जा पहुंचा ......वो क्या है कि मेरी टीचर भी फेसबुक पर ही है, उसे भी यहीं से पता चला :)
Ghughuti Basuti जो टीचर फेसबुक पर हो उससे पढ़ने नहीं जाना चाहिए.

वैसे रोचक बात यह भी थी कि घुघूती जी, बोधिसत्व जी एवं शरद जी ने शायद वसंत के आगमन की ख़ुशी में  पीले रंग के कपड़े पहन रखे थे..(घुघूती जी तो पीली साड़ी और लाल बिंदी में बहुत ही ख़ूबसूरत लग रही थीं.) उनके परिधानों पर वसंत के असर के   जिक्र पर बोधि जी ने कहा .."भायं भायं  करता आया वसंत..." सतीश जी ने इसपर 'इसी पंक्ति से एक कविता रच डालने  का अनुरोध भी कर डाला. देख लीजिये बानगी 
 
atish Pancham वैसे युनुस जी ने या शायद आप ही ने कहा था - 'भांय भांय बसंत'......रोचक शब्द रचना है :)
Bodhi Sattva यह मैंने कहा था भाई..खुद के लिए....

Satish Pancham बोधि जी.....इतने से नहीं चलेगा....पूरा किजिए :) 'भांय भाय करता बसंत' अब रच ही डालिए :)

Yunus Khan भांय भांय करते ब्‍लॉगर/भांय भांय करता बसंत। इस तस्‍वीर में खिले दांतों को देखकर कहा जा सकता है कि ब्‍लॉगरी करके भी खुश रहा जा सकता है।
Bodhi Sattva अरे सतीश जी...मैं अपनी वावाज को कितना प्यार करता हूँ.....निरपेक्ष हो कर नहीं लिख पाऊँगा... :)

Rashmi Ravija वावाज ???

Bodhi Sattva वावाज...के मायने हैं.....ऐसी आवाज जो तारीफ के काबिल हो..... 

शरद जी की उसी शाम की ट्रेन थी और बोधि जी की भी एक मीटिंग थी..इसलिए बातचीत अधूरी छोड़ कर ही सबको उठ जाना पड़ा. युनुस जी ने हँसते हुए  सुझाव रखा कि "अब ये बहस अगली मीटिंग में ठीक उसी बिंदु से शुरू होगी."
 मैने कहा..."हाँ! मैने विषय नोट कर लिया है..".अब तो यहाँ लिख भी दिया  :) 

वैसे एक "कोडक मोमेंट" छूट गया....बोधी जी ने "माफ़ करना माते " कहते झुक कर विधिवत घुघूती जी के पैर छू लिए और घुघूती जी ने भी भरपूर आशीर्वाद दिया. सबके चेहरे पर मुस्कान खिल आयी...बहुत ही हंसी-ख़ुशी के माहौल में वो पल गुजरे... कुछ ऐसे ही  और पलों का इंतज़ार है,अब.
कुछ और चित्र 
शरद जी, युनुस जी एवं बोधिसत्व जी 
सतीश पंचम जी, बोधिसत्व जी,आभा जी,शरद जी एवं युनुस जी 




दो महिलाओं के बीच बैठकर फोटो खिंचवाने के लिए मुस्कराहट की कॉन्फिडेंस जरूरी है.



सोमवार, 28 मार्च 2011

शरद कोकास की कविता पर समीक्षात्मक पुस्तक के विमोचन समारोह की झलकियाँ

मुंबई में होली हम उत्तर-भारतीयों का महत्वपूर्ण त्योहार है. और इस बार की होली तो कुछ ख़ास ही रही क्यूंकि ठीक होली के एक दिन पहले और एक दिन बाद ब्लॉगर बंधुओं से भी मिलने का सुयोग जुटा. १९ मार्च २०११  को मुंबई विश्वविद्यालय परिसर में शरद कोकास  जी की दीर्घ कविता 'पुरातत्ववेत्ता'  पर लिखी डा. विजया की समीक्षात्मक पुस्तक का विमोचन समारोह था. आभार शरद जी, आभा मिश्रा  जी और बोधिसत्व जी का...जिनके सौजन्य से मुझे भी इस समारोह में शामिल हो, इतने सारे दिग्गज  कवियों ,लेखकों,पत्रकारों  से रु-ब-रु होने का सुअवसर मिला.
बोधिसत्व जी एवं शरद जी

शरद जी और बोधिसत्व जी के प्रिय मित्र कवि नरेश चंद्रकर जी (इनकी एक बेहतरीन कविता शरद जी ने यहाँ पोस्ट की है ) बड़ौदा से सुबह ही बोधिसत्व जी के घर पधार चुके थे . मैं, आभा जी, नरेश जी,बोधिसत्व जी जब समारोह स्थल नेहरु ग्रंथालय पहुंचे तो शरद जी नीचे ही इंतज़ार में खड़े थे. उनकी मंशा थी कि उनके  मित्रों के बिना कार्यक्रम शुरू ना हो...और जब कवि ही मंच पर  उपस्थित ना हो तो कार्यक्रम कैसे शुरू हो सकता है :)
  
सरस्वती वंदना और दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ.मुंबई विश्विद्यालय के प्राध्यापक डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे. प्रोफ़ेसर  मनोहर जी ने कार्यक्रम का उदबोधन  किया. श्री ज्ञानरंजन जी किन्ही कारणवश तशरीफ़ नहीं ला सके थे...उनका आशीर्वाद स्वरुप  पत्र पढ़ कर सुनाया गया. सबसे पहले डा. विजया ने अपने विचार रखे. उन्होंने बताया कि जब उन्होंने शरद कोकास की कविता 'पुरातत्ववेत्ता ' पढ़ी तो उनका मन बहुत उद्वेलित हो गया. करीब चार-पांच महीने तक उनके दिमाग में यह कविता चलती रही. वे किचन में हों....या कहीं भी हों ...कविता की पंक्तियाँ लगातार उनके मन में प्रतिध्वनित होती रहतीं. उन्हें लगा जब उन्हें ये कविता इतना उद्वेलित कर रही है तो इसे  लिखते वक्त कवि किस यंत्रणा से गुजरा होगा. और उन्होंने इस कविता की विस्तृत समीक्षा लिखने का निश्चय किया. उन्होंने शरद जी से संपर्क किया . शरद जी ने सहर्ष स्वीकृति दे दी .
 

इसके बाद शरद जी ने कविता की रचना प्रक्रिया पर बातें की. उन्होंने  बताया  कि ५३ पेज की इस लम्बी कविता की शुरुआत मात्र तीन पंक्तियों से हुई थी .जब वे कविता लिखने बैठे तो उन्हें लगा कि उनकी कविता का यह केंद्रीय पात्र केवल पुरातत्ववेत्ता नहीं है बल्कि वह एक लेखक , कवि , इतिहासकार तथा चिन्तक भी हो सकता है .आम लोगो में इतिहासबोध उत्पन्न करना तथा चीजों को वैज्ञानिका द्रष्टिकोण से देखने की क्षमता  उत्पन्न करना ही उनका उद्देश्य है

शरद जी को इस बात का भी मलाल था कि आम आदमी 'पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा किए जा रहे महत्वपूर्ण कार्य की सार्थकता नहीं समझता. उन्होंने अपने अनुभव बताए कि कैसे पुरातत्ववेत्ता कहीं खुदाई करने जाते हैं तो लोग-बाग़ समझते हैं..."वे सोना ढूँढने आए हैं " और जब वे कोई टूटा बर्तन या टूटी ईंट मिलने पर खुश होते  हैं तो लोग कहते हैं.."अच्छा! ठीकरो मिल्यो है " शिक्षित लोगों को  भी इनके कार्य की महत्ता का अंदाजा नहीं है.

शरद  जी ने यह कविता सबसे पहले...अपने अग्रज कविवर बन्धु "लीलाधर मंडलोई ' को पढ़ने के लिए भेजी. और सबसे पहले यह कविता अपने मित्र नरेश चंद्रकर को सुनाई, रात में उन्होंने यह कविता सुनानी शुरू की और कब सुबह के पांच बज गए  दोनों मित्रों  को पता ही नहीं चला. इस तरह इस कविता के प्रथम पाठक 'लीलाधर मंडलोई ' जी  और प्रथम श्रोता नरेश चंद्रकर जी बने . श्री ज्ञानरंजन जी ने इसे 'पहल' पत्रिका में प्रकाशित किया. अशोक बाजपेयी जी...लाल बहादुर वर्मा ..कवि वसंत त्रिपाठी ने इस पर समीक्षा लिखी थी. लाल बहादुर वर्मा जी ने इसे साहित्य  के साथ-साथ इतिहास  की पाठ्य-पुस्तक बनाने की जरूरत पर भी बल दिया. जब विजया जी ने इस पर समीक्षा लिखने की बात कही तो शरद जी को लगा...आठ-दस पेज की समीक्षा होगी.पर जब डा. विजया ने २०० पृष्ठ की समीक्षा लिखकर  भेजी तो कवि भी आश्चर्यचकित रह गए. उनलोगों ने सिर्फ  पांच बार पत्रव्यवहार किए और शरद कोकास  , डा. विजया से विमोचन के एक दिन पहले ही पहली बार मिले.

शरद जी ने बड़े जोशीले स्वर में कविता के शुरू के दो तीन पन्नो का पाठ किया...लोगों ने तो बार-बार ' बहुत खूब' कह कर प्रशंसा की ही. साथी कवि बोधिसत्व जी एवं नरेश जी ने भी कहा कि अपनी कविता का बहुत ही सुन्दर पाठ किया उन्होंने...ये पंक्तियाँ खासकर बहुत पसंद आयीं सबको.



इतिहास तो दरअसल माँ के पहले दूध की तरह है

जिसकी सही खुराक पैदा करती है ,हमारे भीतर
मुसीबतों से लड़ने की  ताकत
दुख सहन करने  की क्षमता देती जो
जीवन की समझ बनाती है वह
हमारे होने का अर्थ बताती है,हमें
हमारी पहचान कराती जो हमीं से

कवि नरेश जी
ने कविता पर विचार रखते हुए कहा कि वे कविता में इतना खो गए थे कि सुनते-सुनते पूरी रात बीत गयी और उन्हें पता ही नहीं चला.


कवि विजय कुमार ने इसे एक कालजयी कविता बताते हुए कहा कि इस कविता का महत्व आनेवाले कई बरसों तक रहेगा समीक्षा के विषय में उन्होंने कहा कि पोएटिक लोजिक ,सातत्य वा साधारणीकरण इस समीक्षा की विशेषता है .

कवि बोधिसत्व जी ने कविता की प्रशंसा की और कहा कि "वे भी इस कविता पर कुछ लिखने को इच्छुक हैं"...उन्होंने यह वायदा भी कर डाला कि "अगर २०११ में वे इस कविता पर कुछ नहीं लिखते तो फिर उन्हें किसी आयोजन में ना बुलाया जाए. "

कार्यक्रम के अध्यक्ष लीलाधर मंडलोई जी (जो दूरदर्शन के महानिर्देशक भी हैं ) ने डा.विजया की भूरी-भूरी प्रशंसा की कि अहिन्दीभाषी होकर भी हिंदी की एक कविता पर इतनी विस्तृत समीक्षा लिखी.और पुस्तक में विषय के अनुरूप दुर्लभ चित्र भी प्रकाशित किए हैं. कविता की भूमिका लीलाधर जी ने ही लिखी है..और वहाँ वे कविता पर अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं. यहाँ भी वे काफी-कुछ कहना चाहते थे.पर उनकी फ्लाईट का समय हो चला था ..इस वजह से उन्हें जाना पड़ा.

आभा मिश्रा जी मैं, शरद जी

इसके अलावा सर्वश्री रामजी तिवारी , वेद राही , राम प्रकाश द्विवेदी , त्रिभुवन राय सभी वक्ताओं ने एक स्वर से कहा कि यह कविता हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है और लिखने वालों को प्रेरणा  भी देती है कि कविता की लम्बाई की चिंता किए बिना अपनी इच्छानुसार वे अपने भावों को शब्द दे सकते हैं..एक ना एक दिन उसका मूल्य साहित्य जगत जरूर समझता है. और हिंदी साहित्य  भी समृद्ध होता है. ज्ञानरंजन जी की प्रशंसा भी की गयी कि उन्होंने इतनी लम्बी कविता को प्रकाशित किया. हिंदी से इतर भाषा वाले भी हिंदी-साहित्य की ओर उन्मुख हो रहे हैं...यह हिंदी के लिए शुभ-संकेत है. और सबसे अच्छी बात ये है कि यहाँ समीक्षक का कवि से कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं था..सिर्फ कविता की उत्कृष्टता ही उन्हें समीक्षा लिखने को प्रेरित कर गयी. ऐसी ही परम्परा होनी चाहिए. कार्यक्रम में हिन्दी के प्रसिद्ध कवि विनोद दास , अनूप सेठी , ओम शर्मा , तथा मराठी के साहित्यकार ,प्रकाश भाताम्ब्रेकर,सुश्री सुमनिका सेठी ,डॉ.वसुंधरा तारकर , मुक्ता नायडू नीरा नाहटा और अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे .

मैं ,नरेश जी, शरद जी, आभा जी
कार्यक्रम की समाप्ति पर चाय-नाश्ते के साथ फोटो-सेशन का दौर चला. शरद जी और बोधिसत्व जी के प्रशंसक/प्रशंसिकाएं  उनके साथ तस्वीर खिंचवाने को आतुर थे. शरद जी को बार-बार अपनी प्लेट नीचे रख देनी पड़ रही थी...पता नहीं वे अपनी प्लेट की सामग्री ख़त्म भी कर पाए या नहीं :)

पर पूरे कार्यक्रम के दौरान सबसे नयनाभिराम दृश्य रहा ...समकालीन कवियों का आपसी स्नेह. स्कूली बच्चों सा एक-दूजे के कंधे से उनकी बाहें हट ही नहीं रही थीं. तस्वीरों में आप बानगी देख सकते हैं:)

शरद जी  और लेखिका डा. विजया 



शरद जी , बोधिसत्व जी एवं नरेश चंद्रकर जी













फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...