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| ये अब्बास या अली नहीं..गिरिजेश जी के सुपुत्र हैं 'अरिन्दम' |
दुल्हन परदे की ओट से हमारी बर्थ की तरफ झांकती रही क्यूंकि यहाँ तो दो वर्षीय 'अली' और पांच वर्षीय 'अब्बास' ने उधम मचा रखा था . 'अली' की चॉकलेट की फरमाईश अब रूदन का रूप ले रही थी और अम्मी 'अजरा' अपने सलवार-कुरते-दुपट्टे के ऊपर बुरका ओढ़े हैरान-परेशान सी चॉकलेट वाला बैग तलाश रही थी. मैने अपने बैग से निकाल एक 5-स्टार ऑफर किया और 'अली' ने एक प्यारी सी मुस्कान दे चॉकलेट ले ली. अब मुझे भी ये चॉकलेट किसी ने बच्ची समझ कर दिया था और 'गिरिजेश राव जी' ने मुझे बड़े एहतियात से कैडबरी का वो सेलिब्रेशन पैकेट खोलते देख कह दिया था, "लगता है आप चॉकलेट नहीं खातीं " (जो सच था..मेरे भाई कहते हैं...'इसीलिए मीठा भी नहीं बोलती' :) )
गिरिजेश जी से हाल में ही परिचय हुआ था जबकि उनकी लेखनी से परिचय तो ब्लॉग जगत में शामिल होते ही हो गया था. चैट पर थोड़ी बहुत बात-चीत होने लगी थी. वैसे वे अति-व्यस्त व्यक्ति हैं..एक ग्रन्थ (प्रेम-ग्रन्थ:)) लिखने में जुटे हुए हैं. एक बार बहुत ही रोचक बात कही उन्होंने, "हम दोनों एक दूसरे का लिखा नहीं पढ़ते हैं पर लिखते शानदार हैं :)
सोचा, अक्सर 'हलो ' तो हो ही जाती है..बता दूँ उनके शहर आ रही हूँ. सुनकर बोले, 'समय मिले तो मिलते हैं " {कर्ट्सी में इतना तो उन्हें कहना ही था :)} मैने भी हाँ कह दिया,पर साथ में बता दिया 'पता नहीं शादी की गहमागहमी में मौका मिलेगा या नहीं' . मौसी की बेटी की शादी में शामिल होने लखनऊ पहुंची थी.कई रिश्तेदारों से पांच साल के बाद मिल रही थी. लखनऊ जाते ही उन्हें कॉल कर के अपने लखनऊ पहुँचने की खबर तो दे दी परन्तु मिलने का समय निकालना मुश्किल ही लग रहा था. भाभी जी ने घर बुलाने की भी बात की. पर गिरिजेश राव जी ने मित्र धर्म निभाते मेरी मजबूरी उन्हें बता दी ...शुक्रिया गिरिजेश जी..पर अगली बार भाभी जी से मिलना पक्का रहा.
आखिरकार लौटनेवाले दिन उन्होंने कहा ,"मैं स्टेशन आता हूँ" और वे समय से स्टेशन पहुँच गए थे . पर मुझे ही सबसे विदा लेते काफी देर हो गयी. अच्छा हुआ ट्रेन १०-१५ मिनट लेट थी और हमें दो बातें करने का मौका मिल गया..वरना सिर्फ 'हाय' और 'बाय' ही होती. ग्यारहवीं में पढने वाला मेरा कजिन 'कान्हा' जो स्टेशन भी आया था. बहुत उत्सुक था, "तुमलोग एक दूसरे को जानते नहीं...कभी मिले नहीं...कैसे पहचानोगे?..क्या बातें करोगे ?...शर्ट का कलर पूछा है, क्या दी?"... हा हा
गिरिजेश जी ने ही उसकी उत्सुकता शांत की, कि 'फोटोग्राफ्स देखे हैं'. हमने आसानी से एक-दूसरे को पहचान लिया. उस दिन लखनऊ स्टेशन पर एक ही समय अलग अलग प्लेट्फौर्म पर मेरे रिश्तेदार ,दिल्ली,बनारस,रांची,पटना जाने वाली ट्रेन के इंतज़ार में खड़े थे . मम्मी-पापा की पटना जाने वाली ट्रेन थोड़ी लेट हो गयी और पापा हमारे वाले प्लेट्फौर्म पर आ गए. गिरिजेश जी से परिचय करवाते हुए मन में सोया बरसो पुराना डर जाग उठा. जब हम तीनो भाई-बहन अपने दोस्तों से परिचय करवाते डर जाते थे कि पापा सवालों की बौछार ना कर दें..."पिछले एग्जाम में कितने परसेंट मिले थे??...अगले में कितने मिलने की आशा है,??....कैसी तैयारी है??....आदि आदि." उसपर से यह सब बताते उए किसी ने कुछ गलत बोल दिया..तो और मुसीबत. एक बार मेरे भाई के एक फ्रेंड ने कहा, "मुझे अपने grand father से मिलने गाँव जाना है ' पापा ने तुरंत पूछा...."maternal या paternal....सिर्फ grand father बोलने से कैसे चलेगा ?"
एकाध सवाल तो गिरिजेश जी को भी झेलने ही पड़े. पर मैने तुरंत यह कह कर उनका इम्प्रेशन जमा दिया कि "ये सबकी वर्तनी की 'अशुद्धियाँ' सही करते रहते हैं " मुझे पता था, पापा शुद्ध बोलने और शुद्ध लिखने पर बहुत जोर देते हैं. फिर अखबारों में लिखी जाने वाली भाषा के गिरते स्तर पर चर्चा होने लगी. तभी मेरी ट्रेन व्हिसिल देकर सरकने लगी और ज़िन्दगी में पहली बार मैं चलती हुई ट्रेन में चढ़ी (ये अनुभव भी क्यूँ बाकी रहे? )
मुंबई लौटने पर मैने गिरिजेश जी से पूछा, "पापा ने आपकी क्लास तो नहीं ली ?" कहने लगे.."नहीं नहीं..बहुत भले आदमी हैं " (सबके पापा भले आदमी ही होते हैं ) पर आगे जो उन्होंने कहा वो तो आठवां आश्चर्य था. कहा,"आपकी तारीफ़ कर रहें थे ". मेरी तारीफ़??....कोई और तारीफ़ करे तो वो भी कभी ना बताएं. कभी मेरी स्कूल की प्रिंसिपल ने मेरी तारीफ़ की थी और वो बात मुझे पता चली,जब मैं एम.ए. कर रही थी. वह भी किसी से पापा कह रहें थे और मैं बाहर से आती हुई अपना नाम सुन,बरामदे में ही रुक गयी थी. अच्छा हुआ सुन लिया वरना सारी ज़िन्दगी उन्हें 'शुष्क हृदय वाली कठोर अनुशासन प्रिय प्रिंसिपल' ही समझती रहती. सौ तो नाम रखे थे, हमने उनके .कभी -कहीं चुपके से बातें सुन लेना भी फायदेमंद होता है.:)
मैने थोड़ा और लालच दिखाया और गिरिजेश जी से कहा ,"आप भी मेरी थोड़ी तारीफ़ कर देते....पापा जरा खुश हो जाते "
वे बोले, "किया ना..कहा कि आपको काफी लोंग पढ़ते हैं ...और आपसे डरते भी हैं "
ख़ुशी के मारे मेरे पैर जमीन से उठने ही वाले थे कि उन्होंने वापस धरातल पर ला दिया ,यह कह कर कि "डरते हैं.. यह नहीं कहा" :(
कह ही दिया होता जरा इम्प्रेशन जम जाता. ...पर मैं सोच रही थी, जरूर मेरे सब-कॉन्शस माइंड ने यह पूछा होगा..'कितनी भी उम्र हो जाए...माता-पिता की नज़रों में अपनी पहचान की लालसा बनी ही रहती है '
(सबके मन में उठते सवाल का जबाब अगली पोस्ट में..महफूज़ से मुलाकात हुई या नहीं :))
