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| सारंग परसकर और सुनील परसकर |
पहले अखबार की खबर. कुछ दिनों पहले, मुंबई मिरर में एक बहुत ही प्रेरक वाकया पढ़ने को मिला. जहाँ उन्नीस साल का एक लड़का, पार्टी-गर्लफ्रेंड-रॉक बैंड- डिस्क की दुनिया से दूर समाजसेवा में लगा हुआ है. DCP सुनील परसकर, ने 1999 से 2001 तक एनकाउन्टर स्पेशलिस्ट की एक टीम का नेतृत्व किया था और कई गैन्गस्टर को अपनी गोली का निशाना बनाया था.
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| बार डांसर की बेटी अपनी टेलरिंग शॉप में |
अब सारंग इस NGO का संचालन अमेरिका से ही करते हैं. इसमें 25 वालंटियर्स हैं. जो उन परिवारों से संपर्क करते हैं, जिनके पिता या परिवार का मुखिया, अपराधी थे और मारे गए. चैरिटेबल और्गनाइजेशन से मिले लोन और डोनेशन पर 'रास्ता' अपने लक्ष्य को अंजाम देती है. किसी को आर्थिक मदद, किसी को कैमरा या सिलाई मशीन दी जाती है. बार डांसर्स को मेहन्दी लगाने या ब्यूटी पार्लर की ट्रेनिंग दी जाती है, जिस से वे कोई सम्मानजनक पेशा अपना सकें. एक 'बार डांसर' की उन्नीस वर्षीया बेटी बताती है कि उसके पास भी अपनी माँ का पेशा अपनाने के सिवा कोई चारा नहीं था. पर उसके पहले ही रास्ता ने उसे सहारा दिया और उसे सिलाई की ट्रेनिंग दी और एक सिलाई मशीन उपलब्ध करवाई. आज उसकी टेलरिंग शॉप में बार डांसर का पेशा छोड़, तीन और लडकियाँ काम कर रही हैं.
गेटवे ऑफ इण्डिया पर टूरिस्ट का फोटो खींचता एक स्मार्ट सा लड़का, एक अपराधी का बेटा है और खुद भी चेन स्नैचर बन गया था. अब फोटोग्राफर का काम करता है और गर्व से कहता है, " सारंग सर ने मुझे ये कैमरा देकर एक इज्ज़त की ज़िन्दगी बख्शी है " वह 500 से 1000 रुपये रोज कमाता है. जो 'चेन खींचने' वाले दिनों की तुलना में काफी कम है. पर कहता है.." पैसे कम हैं, पर दिन रात पुलिस का डर तो नहीं है"
सुनील परसकर जो अब Anti-Narcotics cell, के हेड हैं, 'रास्ता' के प्रयासों की सराहना करते हुए कहते हैं, "अक्सर इन अपराधियों के बच्चे को समाज स्वीकार नहीं करता और वे भी उसी अपराध की दुनिया में धकेल दिए जाते हैं, जिसमे उसके माता-पिता जीते थे और मारे गए." अक्सर ये बच्चे बड़े अपराधकर्मियों द्वारा ट्रेंड किए जाते हैं और अंडरवर्ल्ड के लिए काम करने को तैयार किए जाते हैं. बहुत जरूरी है कि इन्हें सही समय पर उस दुनिया में जाने से रोक लिया जाए."
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| गेटवे ऑफ इण्डिया पर फोटोग्राफर जो कभी चेन स्नैचर था |
सारंग कहते हैं ," किसी भी व्यक्ति को एक अपराधी करार देना बहुत आसान है पर उसके लिए इस छवि से छुटकारा पाकर सामान्य जीवन जीना बहुत ही मुश्किल है."
(लिखते वक्त लगा, टी.वी. वाले प्रकरण का जिक्र दूसरी पोस्ट में होना चाहिए, )


