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बुधवार, 4 मई 2011

फिल्म I am : मेघा और रुबीना का साझा दर्द

"कश्मीर' शब्द का जिक्र सुनते ही मस्तिष्क की नसें, सजग हो जाती हैं और टेंस भी. तुरंत ही एक बने बनाए विचार प्रकोष्ठ में हमारी सोच कैद हो जाती है...या तो पक्ष में या विपक्ष में. खुल कर इस समस्या पर सोचने की कोई कोशिश ही नहीं करता...या तो हमारी हमदर्दी विस्थापित कश्मीरी पंडितों के साथ होती है या फिर कश्मीर में रहनेवाले सामान्य जीवन  गुजारने से वंचित लोगो के साथ.  

पर फिल्म " I am " में बिना किसी का पक्ष लिए दोनों पक्षों की पीड़ा को तटस्थ रूप में देखने की कोशिश की गयी है.

मेघा (जूही चावला ) के माता-पिता का कश्मीर में घर है..पर वे इस आस में कि कभी अपनी जमीं पर लौटेंगे...उसे बेचना नहीं चाहते. पिता की मृत्यु के बाद किसी तरह...मेघा, माँ को घर बेचने के लिए तैयार करती है...और पेपर पर साइन करने...कश्मीर जाती है.

श्रीनगर में प्लेन उतरने को है...मेघा बीस साल बाद लौट रही है....पर उसके हाथ आगे बंधे हुए हैं...और सख्ती से होंठ भिंचा हुआ है...उसे कोई ख़ुशी नहीं हो रही...बल्कि एक गुस्सा सा उबल रहा है...कि उसका अपना शहर है..पर वो वहाँ नहीं रह सकती. उसकी बचपन की सहेली, रुबीना (मनीषा कोइराला ) उसे लेने आती है...बहुत खुश होती है...कार में, उस से कश्मीरी में उन स्थलों का जिक्र करती है...जहाँ दोनों साथ जाया करते थे. पर मेघा रुक्षता से कह देती है.."उसे कुछ भी नहीं याद....और अब उस से कश्मीरी में बात ना किया करे...हिंदी या अंग्रेजी ही बोले" और कुछ रोष से नज़रें कार से बाहर टिका देती है. रुबीना के माता-पिता, मेघा से  बहुत ही प्यार से मिलते हैं... हाल-चाल पूछते हैं...यहाँ भी मेघा...अपनापन से जबाब नहीं देती.


हाल के दिनों में मेरे कुछ फ्रेंड्स कश्मीर से होकर आए हैं...एक एडवेंचरस फ्रेंड ने तो अपनी पत्नी, दोस्त और उसकी पत्नी के साथ मुंबई से कश्मीर तक की यात्रा कार से की थी. सबने एक जुबान से वहाँ की मेहमानवाजी  की बहुत तारीफ़ की. एक घुमक्कड़ दंपत्ति, ट्रेन में मिले  थे  और भारत का चप्पा-चप्पा देखने की योजना थी,उनकी..उनलोगों ने भी कहा कि,"इतनी जगह घुमे पर कश्मीर वाले जैसे दिल निकाल कर रख देते हैं' .इसके पीछे कहीं कोई ग्लानि तो नहीं....या वे खुद को कुछ अलग -थलग महसूस करते हैं....और इस तरह ज्यादा खिदमत कर अपना प्यार जताना चाहते हैं??

मेघा, छत पर अपने घर के ढेर सारे सामान  जो ट्रंक में बंद थे...के बीच उदास सी खड़ी रहती है...जब वो अपने चाचा के घर के खंडहर बनी दीवारों को देखती हैं...जिसपर एक पुरानी तस्वीर, एक फटे पोस्टर का कोना,वैसे ही चिपके होते हैं..तब अपने को रोक नहीं पाती...और उसे वो सारे मंज़र याद आने  लगते  हैं...जिन हालातों में उसे आधी रात को अपना घर छोड़ भागना पड़ा था.


मेघा का ये दर्द मैने किसी की आँखों में रु ब रु देखा है. दिल्ली में एक मेरी कश्मीरी सहेली थी...उसने पूरा ब्यौरा बताया था कि पूरी रात लाउड स्पीकर से मुल्लाओं  के भाषण और पकिस्तान जिंदाबाद के नारे लग रहे थे. सारे कश्मीरी पंडित अपने-अपने घरो में काँप रहे थे. पौ फटते ही...उसे उसके  भतीजे के साथ जम्मू भेज दिया गया..तब उसकी शादी नहीं हुई थी. उसके भाई -भाभी बैंक में कार्यरत थे...उनका भी ट्रांसफर हो गया...और पूरा परिवार श्रीनगर छोड़...दिल्ली में बस गया...जब उसकी शादी तय हुई..तो उसकी माँ और भाभी, एक पड़ोसी की सहायता से ... अपने ही घर में चोरो की तरह बस कुछ घंटों के लिए गयीं...उन्हें शादी में देने को कुछ सामान और केसर लेना था . उसके घर में कुछ बेगाने लोगो ने कब्ज़ा कर लिया था.....अकसर वो अपने घर की...बागों...की बात किया करती थी. मुझे फिल्म में मेघा का और अपनी सहेली का दर्द..एकाकार होता दिख रहा था...शायद उसकी भी ऐसी ही प्रतिक्रिया होती.


रुबीना...देर तक मेघा की तरफ देखती है..और दोनों सहेलियों को वे बातचीत याद आ जाती हैं...जब रुबीना जिद करती थी कि 'मेरे भाई से शादी कर के मेरे घर में रहने आ जा'. आंसुओं में सारे गिले -शिकवे बह जाते हैं....बातचीत शुरू हो जाती है...मेघा, रुबीना से उसके प्रेमी अज़ान  के बारे में पूछती है..कि दोनों ने शादी क्यूँ नही की??


रुबीना बताती है कि वो अमेरिका चला गया....मेघा के ये कहने पर कि "तुम क्यूँ नहीं साथ चली गयी?...रुबीना कहती है .."सब तुम्हारी तरह लकी नहीं हैं."


और मेघा गुस्से में बोल उठती है, "मैं लकी हूँ??....आधी रात को अपने ही घर से चोरों  की तरह भाग निकलना ....रिफ्यूजी कैम्प में दिन बिताना...दिन रात-अपने माता-पिता को अपने घर की याद में घुलते देखना...ये सब क्या खुशकिस्मती है??"


रुबीना पलट कर कहती है,"अगर तेरी  जगह मैं यहाँ से निकल जाती...और तुझे यहाँ रहना पड़ता तो तुम्हे कैसा लगता??...सड़कें सुनसान हैं...जगह - जगह कंटीले तार..और बन्दूक लिए  सुरक्षाकर्मी खड़े हैं...जहाँ जाओ...हर तरफ से दो निगाहें...नज़र रखती हैं... पूछताछ की जाती है...सारे सनेमा हॉल बंद हो चुके हैं...शाम होते ही लोग अपने घरो में दुबक, बस टी.वी. देखते हैं.....जब-तब गोलियों की आवाजें आती रहती हैं...मेरे भाई ने छः साल  पहले...सरेंडर कर दिया, बीमार है...ठीक से चल नहीं पाता...फिर भी रोज पुलिस किसी ना किसी का फोटो लिए शिनाख्त करवाने आ जाती है...इस सरेंडर करने से तो अच्छा होता वो शहीद हो जाता...और लोग कहते हैं..'कश्मीर' जन्नत है..नहीं चाहिए मुझे ये जन्नत."


अब, मेघा उसका दर्द  समझती है...


वहाँ  रहनेवालों की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है...उनलोगों ने गलतियाँ की..लेकिन आखिर कब तक उसकी सजा भुगतेंगे और हर एक कश्मीरी तो आतंकवाद में शामिल नहीं था/ है . फिर कुछ सिरफिरों के करतूत की सज़ा पूरे कश्मीर को क्यूँ मिल रही है??...जब वे लोग टी.वी. पर दूसरे शहरों में लोगो को आज़ादी से घूमते...देर रात तक एन्जॉय करते देखते होंगे...तो क्या बीतती  होगी,उन पर...


जूही चावला ने बहुत  ही कम संवादों का सहारा ले..सिर्फ चेहरे के भाव से सब कुछ जीवंत कर दिया है..मनीषा कोइराला भी छोटे से रोल में बहुत ही भली लगीं.

 

( अगली पोस्ट में कश्मीर पर एक वृत्तचित्र  बनाने के दौरान मेघा  के विचार जानने की कोशिश करने वाले....अभिमन्यु (संजय सूरी) की कहानी जो बचपन में यौन शोषण का शिकार होता रहा था.)

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