मुझे कायर कह लें, डरपोक कह लें, असंवेदनशील कह ले,या फिर सेल्फ सेंटर्ड सब स्वीकारने को तैयार हूँ क्यूंकि दो दिनों से मेरी हिम्मत नहीं हो रही कोई भी न्यूज़ चैनल देखने की. टी.वी. ऑन ही नहीं किया कि कहीं चैनल सर्फ़ करते ही नज़र न पड़ जाए. अखबार की हेडलाइन पर नज़र पड़ी और पलट कर रख दिया. अब ज़रा भी हिम्मत नहीं बची ऐसी ख़बरें पढने की.
और अगर हमें इतना आगे नहीं बढ़ना है तो फिर पीछे लौट चलें. बाल-विवाह को ही प्रश्रय दें. आखिर पचास साठ साल पहले इतना वहशीपन तो नहीं था लोगों में . आधुनिक बनने की कैसी कीमतें चुका रहे हैं हम ??
फेसबुक पर मित्रों के अपडेट्स से ही सूचना मिल रही है . वहाँ भी कमेन्ट करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही. जैसे सारे अहसास ही कुंद हो गए हैं. शिराओं में बहता खून जम गया है. कोई उबाल नहीं आ रहा उसमे .मस्तिष्क निस्पंद हो गया, समझने-बूझने की ताकत नहीं बची है उसमे.
पांच साल की बच्ची और ऐसे मर्मान्तक कष्ट से गुजर रही है. राजस्थान में भी ग्यारह साल की बच्ची ऐसी ही दरिंदगी की शिकार हुई है और शायद दो साल से उसका इलाज चल ही रहा है. कई सर्जरी हो चुके हैं और कितने अभी बाकी हैं . फिर भी वह पूरी तरह नॉर्मल जिंदगी जी पाएगी, इसमें संदेह ही है डॉक्टर्स को. ऐसी ही जाने कितनी ख़बरें दिमाग में घूम गयीं. कहीं ऐसा वहशीपन झेलने वाली बच्ची दो साल की थी, कहीं पांच साल ,कहीं सात तो कहीं दस .
यह सवाल भी सर उठाता है मन में , पहली बार कब हुआ था किसी बच्ची के साथ ऐसा सलूक ?? जब लोगों को पता चला तो क्या प्रतिक्रिया हुई लोगों की ?? क्या सजा दी गयी उस दरिन्दे को ?? क्यूँ नहीं कोई ऐसी सजा दी गयी कि अगले का ऐसा कुकर्म करने की सोच ही रूह काँप जाए
ये भी ख्याल आ रहा है ,क्या विदेशों में भी ऐसी ख़बरें आम हैं ? वहाँ भी बच्चियां ऐसा वहशीपन भुगत रही हैं?? शायद नहीं .वहाँ अगर इस तरह की घटनाएं हुईं भी हैं तो एकाध. हमारे देश की तरह बाढ़ नहीं आती ऐसे हादसों की .
तो क्या छोटी छोटी बच्चियों के साथ ऐसे दुष्कर्म इसलिए हो रहे हैं क्यूंकि हमारे समाज में तमाम वर्जनाएं हैं ? यौन कुंठित पुरुषों की तादाद इतनी बढती जा रही है कि आये दिन छोटी छोटी मासूम बच्चियां उनकी कुंठाओं का शिकार हो रही हैं.
नहीं चाहिए ये बंदिशें ,नहीं चाहिए ये बंधन. सबको आज़ाद कर दो , किसी पर कोई रोक-टोक न हो. वे अपनी काम-पिपासा ,अपने हमउम्र वालों के साथ ही शांत करें. इन मासूम बच्चियों को बख्श दें . मेरी बातें बहुत ही अव्यावहारिक लग रही होंगीं. पसंद भी नहीं आ रही होंगीं ,पर इस मनःस्थिति में मुझे इसके सिवा कुछ नहीं सूझ रहा . अगर ऐसे खुले समाज में हमारी बच्चियां सुरक्षित हो जाती हैं तो यही सही.
और अगर हमें इतना आगे नहीं बढ़ना है तो फिर पीछे लौट चलें. बाल-विवाह को ही प्रश्रय दें. आखिर पचास साठ साल पहले इतना वहशीपन तो नहीं था लोगों में . आधुनिक बनने की कैसी कीमतें चुका रहे हैं हम ??
मासूम बच्चों की सुरक्षा में बुरी तरह नाकाम रही है ये व्यवस्था .
बिलकुल ही नकारा है, आज की व्यवथा और आज का समाज . अब या तो बहुत आगे ही बढ़ जाएँ या थोडा पीछे ही लौट चलें या फिर पाषाण युग में ही लौट जाएँ पर किसी भी कीमत पर हमारे बच्चों के साथ ये सब नहीं होना चाहिए .
उनकी सुरक्षा ही सर्वोपरी है. उसके बाद ही प्रगति, विकास ,नियम, संस्कृति, संस्कार आते हैं.
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