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बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

धोबी घाट : फिल्म या कैमरे द्वारा लिखी कोई कविता

{ धोबी-घाट फिल्म के ऊपर कई पोस्ट लिखी जा चुकी है....पर जब से यह फिल्म देखी है...इस पर कुछ  लिखने से खुद को नहीं रोक पायी...अब जिन्होंने ये फिल्म अब तक नहीं देखी और देखने का इरादा रखते हों ...वे इस पेज के  के राइट टॉप कॉर्नर में बने क्रॉस पर क्लिक कर लें :)}


मुझे तो धोबी घाट फिल्म बिलकुल एक कविता सी लगी... जिसके  अलग-अलग किरदार जैसे अलग-अलग stanza हों..पर मूल भाव एक ही हो...मुंबई में  ज़िन्दगी की जटिलताओं में उलझे  अलग -अलग तबके के लोग. हर चरित्र एक दूसरे से जुड़ा हुआ है...और इन्हें जोड़ता है मुंबई शहर.किसी शहर का इतना यथार्थपरक और ख़ूबसूरत चित्रण...शायद ही कभी देखने को मिला हो.
अरुण (आमिर खान) एक पेंटर है. हर कलाकार की तरह परले दर्जे का  मूडी. अपनी दुनिया में डूबा हुआ.....ना किसी का अंदर आना पसंद ना खुद इस से  बाहर निकलना चाहता है. और ऐसा लगता नहीं कि वो  कुछ मिस कर रहा हो......अकेलेपन की  मजबूरी कई लोगो की होती है...पर सब उसे एन्जॉय नहीं करते. पर अरुण  अपने अकेलेपन..अपनी उदासी...को शिद्दत से जीता है.....बिना किसी शिकयत के. {अरुण  के पास तो इस उदासी की एक वजह है...उसका  डिवोर्स हो चुका है.परन्तु कई युवा  भी इस मनस्थिति को एन्जॉय  करते हैं. एक ख़याल आता है...कहीं यह उनका ओढा हुआ अवसाद तो नहीं...और वे उसे सच मान बैठते  हैं...पर यह सिर्फ ख़याल ही है :)}

अरुण , एक बार  अपनी ही पेंटिंग की प्रदर्शनी में जाता है  और वहाँ उसकी
  मुलाक़ात अमरीका से आई हुई शाय(मोनिका डोंगरा) से होती है. जो एक इन्वेस्टमेंट बैंक में काम करती है...पर भारत को करीब से देखने और असली भारत की तस्वीरें लेने के लिए आई हुई है. कुछ शराब का सुरूर...इतने दिनों से किसी वार्तालाप से महरूम किसी लड़की की नजदीकियां....अरुण  के मन की परतें खुलती जाती  हैं और  घर पर म्युज़िक...पेंटिंग्स..अलबम...ढे र सारी बातों के बीच.... कब सारे बंधन टूट जाते हैं... ...उन्हें पता भी नहीं चलता.

लेकिन, सुबह अरुण  अपनी दुनिया में लौट चुका  हैं...वैसे ही अपनेआप में गुम. जबकि शाय  पर रात का सुरूर तारी  है..मुस्कान उसके चेहरे से मिटती नहीं. लेकिन अरुण  आँखे मिलाने को भी तैयार नहीं...बड़े अजनबीपन  से उसे चाय के लिए पूछता है ...और जब शाय  को सॉरी बोलता है ...तो वह नाराज़ हो जाती है...कि अरुण  को अपने मन का यूँ खोल कर रखने का ....वे ख़ूबसूरत पल बिताने का ....इन सबका अफ़सोस है..और वह वहाँ  से चली जाती है.

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शाय की  मुलाकात एक धोबी, मुन्ना(प्रतीक बब्बर)  से होती है. मुन्ना  का चरित्र बिहार ,यू.पी से आए हज़ारो युवको का प्रतिनिधित्व करता है...मुन्ना, कवियों -लेखकों की तरह गाँव को याद कर उदास नहीं होता क्यूंकि उसे गाँव के साथ ही याद आता है कि वहाँ भूख बहुत लगती थी और खाना नहीं मिलता था...आठ साल की उम्र में मुंबई आया और यहाँ के एक होटल में पेटभर कर खाना और मार दोनों खाया. फिर धोबी का काम करने लगा. अमेरिका से आई शाय, भेदभाव नहीं जानती..मुन्ना को भी अपने साथ की कुर्सी  पर बिठा चाय का ऑफर कर देती है. पर उसकी बाई उसके लिए  तो महंगे कप में पर मुन्ना के लिए एक ग्लास में चाय लेकर आती है...शाय पहले तो चेहरे के भाव से नाराज़गी प्रकट करती है..फिर वो ग्लास अपने लिए उठा लेती है..यही सब दृश्य  हैं जो किरण राव के निर्देशन की  बारीकियों की  तारीफ़ करने को मजबूर कर देते हैं.  मुन्ना शाय का कैमरा देखकर अपना एक पोर्टफोलियो तैयार करने का आग्रह करता है...फिल्म  में इस बिंदु  को भी छुआ है कि कैसे छोटे शहर वालों  के मन  में खुद को एक बार परदे पर देखने का सपना पलता रहता है. शाय कहती है..इसके  बदले उसे ,धोबी घाट लेकर जाना पड़ेगा ..और वो वहाँ की  तस्वीरें लेगी.

मुन्ना अपने छोटे से कमरे में एक्सरसाइज़ कर अपनी बॉडी बनाता है और मॉडल  की तरह अलग-अलग पोज़ में तस्वीरें खिंचवाता है. शाय अपनी हंसी रोकते हुए उसकी तस्वीरें लेती हैं..पर असली खूबसूरती उन तस्वीरों में है जो वह उसके कपड़े..धोते...फैलाते..तह करते और ...और इस्त्री करते हुए लेती है. पानी की उड़ती बूंदें और सफ़ेद झक्क कमीज़ के बीच ली मुन्ना की वे  तस्वीरें mesmerizing हैं. शाय मुन्ना के साथ..सब्जी मंडी..मच्छी  बाज़ार...झुग्गी-झोपडी..हर जगह जाती है. और ये सारी शूटिंग रियल लोकेशन पर की गयी हैं...जहाँ  के सारे लोग कोई एक्टर नहीं असली लोग  हैं. शाय का यूँ खुलकर बातें करना, उसके साथ बेझिझक  घूमना,  मुन्ना को उसके प्रति आकृष्ट करता है.


पर शाय अरुण  को नहीं भूल पाती....क्यूंकि उसे विश्वास नहीं होता...एक रात मन और तन से इतना करीब आ गया व्यक्ति ..सुबह होते ही अजनबी कैसे बन जा सकता है.वह किसी ना किसी बहाने उसे दूर से देखती रहती है और एक बार अरुण अचानक से सामने आ कर उसे अपने घर पर चाय की दावत देता है.....और अपने उस दिन के व्यवहार के लिए सॉरी भी बोलता है..तभी...मुन्ना कपड़े देने आता है. शाय को आमिर के साथ यूँ घुलमिलकर बातें करते देख उसे जलन होती है...और वह भाग जाता है....शाय को अपने प्रति मुन्ना की  भावनाओं का अहसास है...वह उसके पीछे जाकर उसे मनाने  की कोशिश करती है.


इस फिल्म के सबसे ज्यादा डायलॉग 'यास्मीन' (कीर्ति मल्होत्रा)  के हिस्से
आए हैं. अरुण  जब इस घर में शिफ्ट होता है  तो उसे  एक छोटे से बक्से में कुछ तस्वीरें और वीडियो कैसेट मिलते हैं. जो इस घर में उससे  पहले रहनेवाली यास्मीन के हैं. यास्मीन मुंबई से जुड़े अपने सारे अनुभव इन कैसेट्स में अपने भाई को भेजने के लिए रिकॉर्ड करती रहती है. यास्मीन आँखों में हज़ारो सपने लिए यू.पी.के एक छोटे से कस्बे से मुंबई आती है. शुरू में उसकी आवाज़ बहुत चहक भरी होती है...मैरीन ड्राइव...गेट वे...लोकल ट्रेन सबके बारे में उत्साह से अपने भाई को बताती है.... धीरे -धीरे अपने जीवन की एकरसता से उसकी आवाज़ पर उदासी की परत चढ़ती जाती है...और वो सवाल करती है..."शादी को इतना जरूरी क्यूँ समझा जाता है"
यास्मीन पर अपने शौहर की बेरुखी का राज़ ज़ाहिर हो जाता है. कई बार बरसो से मुंबई में रहनेवाले यहाँ शादी भी कर लेते हैं और फिर माता-पिता के दबाव में अपनी जातिवाली  से उनकी पसंद की लड़की भी ब्याह लाते हैं.यास्मीन आखिरी रेकॉर्डिंग करती है...और अपने भाई से कहती है.."मैने बहुत कोशिश की,पर अब हार गयी हूँ....अम्मी-अब्बू को संभालना और कहना मुझे माफ़ कर दें."
स्क्रीन ब्लैंक हो जाता है और आमिर की नज़र...छत की कुण्डी से लटकते तार पर जाती है...

हिन्दू- मुस्लिम एकता......गैंगवार...ड्रग्स का धंधा, अधेड़ अमीर औरतों के शगल जिगोलो...रात में चूहे मारते rat killers....रेलवे ट्रैक के पास बसी बस्तियां...इन सबका, जो मुंबई के अहम् अंग हैं...फिल्म में ,हल्का सा रेफरेंस है. मुन्ना अपने जिगरी दोस्त सलीम के परिवार को ही अपना परिवार मानता है..सलीम काला
धंधा करता है..और उस विवाद में ही दूसरे गैंग के लोग उसकी हत्या कर देते हैं और पुलिस के भय से सलीम के परिवार को दूर किसी फ़्लैट में शिफ्ट कर देते हैं.

मुन्ना और आमिर दोनों ने घर बदल  लिया है...शाय  दोनों को ढूंढती रहती है और एक दिन उसे मुन्ना मिलता है जो सारी हकीकत बताता है. वो शाय से कहता है..कि :लगता है तुम्हे अरुण  से प्यार हो गया है.." शाय उस से संपर्क में रहने का वादा ले...विदा लेती है. और उसकी कार आँखों से ओझल होने के बाद, मुन्ना  को जैसे होश  आता है..वो ट्रैफिक में किसी तरह दौड़ते हुए उसकी कार के समीप पहुँच खिड़की नीचे करने को कहता है......दर्शक समझते हैं...शायद अब वो..अपने प्यार का इज़हार कर देगा..लेकिन नहीं...वो शाय को आमिर के नए घर का पता दे देता है. इसके बाद का शॉट बेहतरीन  है...मुन्ना के झुके कंधे आत्मविश्वास से चौड़े हो जाते हैं. और चेहरे पर एक आत्मसंतोष से भरी कॉन्फिडेंट स्माइल होती है और चाल में लापरवाही. कुछ सार्थक करने के अहसास से लबरेज़.


सभी कलाकारों  ने जैसे अभिनय ना करके उन पात्रों को जिया है .किरण राव के बेहतरीन निर्देशन को कॉम्प्लीमेंट किया है. सुन्दर फिल्मांकन ने. मुंबई की मूसलाधार बारिश को खूबसूरती से कैप्चर करते हुए..मुन्ना की टपकती छत और उसी बारिश में भीगते हुए उसके  छत पर प्लास्टिक  बिछाने के दृश्य किसी फिल्म के नहीं...सच्चे से लगते हैं.

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