हमारे देश के करीब करीब सभी प्रान्तों में रंगोली बनायी जाती है. बस इसे बनाने के तरीके और नाम अलग होते हैं..बंगाल में चावल को पीसकर उसके घोल से सुन्दर आकृतियाँ बनाए जाती हैं,जिनमे शंख, मछली, कलश आदि प्रमुख होते हैं और इसे अल्पना कहा जाता है .केरल में फूलों से रंगोली बनायी जाती है और इसे पूकल्लम कहते हैं. जिन प्रदेशों में रंगोली की प्रथा नहीं थी , वहाँ भी अब टी.वी. वगैरह में देख, लोगों ने बनाने शुरू कर दिए हैं. महाराष्ट्र में भी रंगोली का बहुत चलन है और यहाँ पांच दिनों तक धनतेरस से लेकर भाई-दूज तक रोज अलग-अलग रंगोली बनायी जाती है. भाई-दूज के दिन ही गुजराती लोगों का नव-वर्ष भी होता है . ( मुझे कई लोंग गुजराती समझते हैं ,और 'हैप्पी न्यू इयर' बोल जाते हैं :)) लिहाजा उस दिन गुजरात के लोंग भी घरो के बाहर सुन्दर रंगोली बनाते हैं.
मुंबई आने से पहले मैने रंगोली की तस्वीरें देखी थीं और मुझे लगता था, पेंट से या गीले रंगों से रंगोली बनायी जाती है. पर जब मैं मुंबई आई तो देखा, यहाँ रंगोली रंगों के पाउडर से बनायी जाती है. शायद इसीलिए, रोज इतनी मेहनत से बनायी ख़ूबसूरत सी रंगोली मिनटों में बुहार कर हटा दी जाती है और फिर नई रंगोली बनायी
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| अंगूठे और तर्जनी की सहायता से रंगोली पाउडर डालने का तरीका |
जाती है. मेरे पड़ोस में एक महाराष्ट्रियन महिला रहती थीं. वह नौकरी करती थीं. पर ऑफिस से आते ही जल्दी से कपड़े बदल,रंगोली बनाना शुरू कर देतीं. उन्हें देख कर ही मैने भी रंगोली बनाना सीखा. पहले जमीन पर गेरू का लेप लगाया जाता है. फिर उस पर एक बड़े से शीट में किए छिद्रों की मदद से सफ़ेद रंग के डॉट्स डाले जाते हैं. फिर इन डॉट्स को छोटी छोटी रेखाओं से मिलाकर बहुत ही जटिल डिजाईन बनाए जाते हैं. अब सफ़ेद रंग के पाउडर में अलग-अलग रंग के पाउडर को मिश्रित करके इन खानों को भरा जाता है. और इन पाउडर को भी तर्जनी और अंगूठे के मध्य मसलते हुए एक विशेष तरीके से डाला जाता है. जो सिर्फ प्रैक्टिस से ही आ सकती है. कई लोंग धागे की सहायता से बनाते हैं. चुटकी में रंग ले ,उसे धागे में लगा...त्वरित गति से धागे की सहायता से गोल आकृतियाँ बनाते जाते हैं. कुछ रंग भरने का काम,चाय की छलनी में एक सिक्का डालकर करते हैं. और हाथ ऐसा सधा हुआ कि मजाल है जरा सा,पाउडर रेखा के बाहर चला जाए.
मैने भी यह सब सीखा और दिवाली में रंगोली बनाना शुरू कर दिया.बच्चे भी साथ में लगे होते. बारह साल की उम्र में बेटे ने फरमाईश की 'अब वो रंगोली बनाएगा.' पर मुझे उसपर भरोसा नहीं था कि पता नहीं कैसा बनाएगा, तो उसने कहा मैं अपने कमरे में बनाऊंगा. छोटा बेटा क्यूँ पीछे रहता, उसने भी जिद की, उसे मैने सीढियों के नीचे 'रंगोली' बनाने का निर्देश दे दिया.उस वर्ष , हमारे यहाँ तीन रंगोली बनी, पर लक्ष्मी जी की कोई विशेष कृपा नहीं हुई :( . और मेरी रंगोली भी उपेक्षित सी रही..सब आने-जाने वाले ,बेटे की रंगोली की ही सराहना करते रहें.
अगले साल से मैने उसे घर के बाहर रंगोली बनाने की इजाज़त दे दी और मेरे अच्छे -खासे समय की बचत होने लगी. करीब २,३ घंटे लग जाते हैं, एक रंगोली पूरी करने में. लेकिन हर साल मुझे आशंका तो रहती है, 'पता नहीं , इस साल रंगोली बनाएगा या नहीं' .पर अभी तक तो बना रहा है ..हाँ, अब दो साल से देखती हूँ वो पारंपरिक तरीके से नहीं. फ्री हैण्ड बनाता है. बाकी तरीके तो वही रहते हैं. पर इसमें समय काफी कम लगता है. सब कहते हैं ,"तुम्हे लड़की की कमी महसूस नहीं होती होगी...और बहुएं बड़ी खुश रहेंगी "... 'लड़की की कमी महसूस नहीं होती' ये तो सही है क्यूंकि आजकल लड़कियों की जीवनचर्या भी लड़कों जैसी ही है...वे भी घर के कामो में कम ही हाथ बटा पाती हैं. ( वैसे वे सौभाग्यशाली हैं,जिनके घर में बेटियाँ हैं ) पर 'बहुएं कितनी खुश होंगी' , ये नहीं पता क्यूंकि ये लोंग सिर्फ इंटरेस्टिंग काम ही करते हैं.वरना एक अखबार भी नीचे पड़ा हो तो उसे दिन में दस बार जम्प करके पार कर जाएंगे,उठाएंगे नहीं. और मेरे vocal chord की अच्छी खासी एक्सरसाईज चलती रहती है.:)
सोचा ये रंगोली बनाने का बिलकुल अलग सा तरीका, आपलोगों से भी साझा कर लूँ. मैने अपनी सहेली वैशाली से आग्रह किया क़ि वो स्टेप बाइ स्टेप रंगोली बनाने के साथ-साथ उसकी तस्वीरें भी लेती जाए. मेरी ऐसी उलटी-सीधी फरमाईश वो हमेशा पूरी करती है .थैंक्स वैशाली :)
ये वही
वैशाली है जिसने एक ही दिन में दो बार जोधा अकबर के शो देखे थे :) और मैने एक पोस्ट लिख डाली थी
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| गेरू के लेप से रंगोली के लिए तैयार जमीन | | | | | |
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| रंगोली बनाने के लिए डाले गए डॉट्स |
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| डॉट्स को मिलाकर रंगोली का खाका तैयार |
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| रंगों से सजकर रंगोली,तैयार |
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| रंगोली पर दिए रखती, गृहलक्ष्मी वैशाली शेट्टी |
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| अंकुर की बनायी रंगोली |
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| ऐश्वर्या (सहेली की बेटी ) की बनायी रंगोली |
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| अंकुर की पिछले साल की बनायी रंगोली |
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| पड़ोसी की बनायी रंगोली |