मुंबई आने से पहले ही, यहाँ के सबसे बड़े त्योहार गणेशोत्सव के बारे में काफी कुछ सुन रखा था. जब मुंबई आए तो हमने सोचा,जैसे उत्तर भारत में दीपावली के समय लक्ष्मी गणेश की मूर्ति लाते हैं और उसकी पूजा करते हैं ,वैसे ही यहाँ भी सबलोग, गणेश जी की मूर्ति लाकर पूजा करते होंगे. और हमने भी उनकी मूर्ति लाकर पूजा करने की सोची. जैसे जैसे गणेशोत्सव का दिन नज़दीक आने लगा, हमें पता चला,हर घर में उनकी मूर्ति नहीं लाते. बल्कि मराठी लोगों के यहाँ तो खानदान में जो सबसे बड़ा हो, उनके यहाँ ही सबलोग जमा होते हैं और मूर्ति बिठाई जाती है. कई घरों में तो एक साल एक भाई के यहाँ पूजा की जाती है तो दूसरे साल दूसरे भाई के यहाँ.
बिलकुल शादी जैसा महौल होता है. सारे रिश्तेदार इकट्ठे होते हैं. आस-पास के खाली फ़्लैट में उन्हें ठहराया जाता है कुक रखे जाते हैं.काफी धूम रहती है. कई लोग गाँव भी चले जाते हैं.पर हमने सोच लिया था तो मूर्ति लेकर आए और पंडित को बुलाकर पूजा भी करवाई. जबकि मराठी लोग खुद ही पूजा कर लेते हैं. जब लोग दर्शन के लिए आने लगे तो पूछना शुरू किया,"आपने कितने साल तक पूजा करने की मन्नत की है?" लोग दो,पांच या सात साल की मन्नत करके ही पूजा करते हैं. और पतिदेव ने कह दिया, "जबतक मुंबई में रहेंगे,पूजा करेंगे". उस समय तक कुछ भी तय नहीं था कि स्थायी रूप से कहाँ रहेंगे. पतिदेव का दिल्ली... विदेश...मुंबई...भ्रमण जारी था.पर दो साल बाद ही गणपति बप्पा ने अपनी छत भी दे दी और हम यहीं बस गए. यहाँ लोगों के पूछने का तरीका भी अनोखा है. कोई ये नहीं पूछता,"आप गणपति की पूजा करते हो...या मूर्ति लाते हो?"लोग पूछते हैं.."आपके यहाँ गणपति आते हैं?" और लोग दर्शन के लिए निमत्रण का इंतजार नहीं करते. अगर उन्हें पता चल जाता है कि इस घर में पूजा होती है तो खुद ही चले जाते हैं.
एक महीना पहले ही जिसके यहाँ से आप मूर्ति लेते हैं उनकी चिट्ठी आ जाती है कि आप आकर मूर्ति बुक कर दें. फिर गणेशोत्सव के एक दिन पहले अक्सर रात में ही लोग मूर्ति अपने घर पर लेकर आते हैं. करीब करीब हर घर में ढेरो रिश्तेदार जमा होते हैं,इसलिए एक मूर्ति के लिए करीब करीब दस-बारह लोग जरूर जाते हैं. अक्षत,कुंकुम,नारियल से गणपति की पूजा कर, ढोल,मंजीरे के साथ उनकी जयजयकार करते हुए मूर्ति लेकर घर आते हैं यह सिलसिला पूरी रात चलता है.घर के दरवाजे पर भी, कुंकुम लगा , आरती की जाती है और गरम पानी दूध से मूर्ति लाने वाले का पद-प्रक्षालन किया जाता है. शायद यह भावना हो कि गणपति को लाने वाले के पैर दूध से धोए जाएँ.
दूसरे दिन सजे हुए मंडप में गणपति की स्थापना की जाती है .और दो दिन तक करीब करीब सारे जान पहचान वाले गणपति दर्शन को जरूर आते हैं. अपनी बिल्डिंग वाले लोग तो रात के बारह बजे भी आते हैं.क्यूंकि दिन में अक्सर उन्हें दूर दोस्तों या रिश्तेदारों के यहाँ जाना होता है. सार्वजनिक पंडाल में तो ग्यारह दिन तक के लिए मूर्ति रखी जाती है और फिर ग्यारहवें दिन,अनंत चतुर्दशी के दिन मूर्ति विसर्जित की जाती है.पर घरं में अक्सर लोग डेढ़ दिन के लिए ही रखते हैं. कुछ लोग ,पांच दिन या सात दिन के लिए भी रखते हैं.
मूर्तियाँ अक्सर तालाब या समुद्र में विसर्जित की जाती हैं. किन्तु पर्यावरण का ख़याल कर आजकल कई जगह कृत्रिम तालाब का निर्माण किया जाने लगा है. वैसे हमलोग शुरू से ही एक मंदिर के प्रांगण में बने कृत्रिम तालाब में ही मूर्ति विसर्जन के लिए जाते हैं. मंदिर से काफी पहले ही गाड़ी पार्क कर पैदल ,नंगे पाँव मूर्ति लेकर जाना होता है. पूरे रास्ते पर ढोल-ताशों के साथ लड़के-लडकियाँ,औरतें-पुरुष सब नाचते गाते,जयजयकार करते हुए चलते हैं. बहुत ही रोमांचित कर देने वाला नज़ारा होता है.
मंदिर में भीड़ तो बहुत होती है पर व्यवस्था इतनी अच्छी कि पंद्रह मिनट से ज्यादा नहीं लगते. लम्बी लम्बी मेजें बिछी होती हैं. सबलोग अपने घर से लाये गणपति को वहाँ रखते हैं और एक बार फिर आरती की जाती है और नारियल फोड़ कर उसका पानी गणपति के ऊपर डाला जाता है.शायद प्रतीकात्मक विसर्जन हो यह.
परिवार का एक सदस्य मूर्ति लेकर एक अलग रास्ते से तालाब की तरफ जाता है. बाकी लोग दूसरी तरफ से विसर्जन देखते हैं.पानी में कई स्वयंसेवक पहले से ही खड़े होते है वे दूर लेजाकर मूर्ति का विसर्जन कर देते हैं. उस दिन सबसे ज्यादा यह नारा गूंजता है " गणपति बप्पा मोरया..... पुढच्या वर्षी लाउकर आ "(मेरे गणपति बाबा,अगले वर्ष जल्दी आना )
एक दिन पहले ईद और दूसरे दिन इतवार ने इस गणपति को कुछ खास बना दिया. पूरा मुंबई ही त्योहार के खुशनुमा माहौल में डूबा था. मेरे घर पर भी सबकी छुट्टियां होने से मेरा काम काफी आसान हो गया. इस बार तो बच्चों ने ऐलान कर दिया, 'हमलोग ही सारा काम करेंगे' और सच में गणपति बप्पा को घर लाने से लेकर मंडप की सजावट, पूजा, विसर्जन...सबकुछ बच्चों ने ही किया. बस ये आस्था हमेशा बनी रहें.