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सोमवार, 12 जुलाई 2010

क्या सचमुच कहीं, कुछ बदला है ??


मेरी कहानी की  नई किस्त में  बाबूजी की  मृत्यु के बाद सजने संवारने का शौक रखनेवाली
अम्मा जी का जीवन बिलकुल. बदल जाता है.शादी -ब्याह में भाग लेना,चूड़ियाँ,बिंदी, रंगीन कपड़े पहनना ..सब बंद हो जाता है. उस किस्त पर एक मेरी बहुत ही प्यारी सहेली (जो मेरे लेखन की नियमित पाठिका है और तारीफ की ऐसी गंगा बहाती है कि  मुश्किल होता है उसकी तेज धार में बहने से खुद को रोकना :)) के कमेन्ट के एक अंश ने कुछ सोचने को मजबूर कर दिया.

उसने लिखा था ,"हाँ आज समय बदल गया है ...अपने आस पास इतने तलाक और पुनर्विवाह के किस्से देख रही हूँ ...मगर तुम्हारी कहानी जिस समय के लिहाज़ से है ...पति पत्नी के रिश्ते की यही तुलना ठीक लग रही है "
पर क्या सचमुच समय बदल गया है?? पति को खोने के बाद स्त्रियों की स्थितियों में कोई परिवर्तन आया है? मुझे तो नहीं लगता. जबकि मैं खुद महानगर में रहती हूँ. मेरे बहुत सारे रिश्तेदार बड़े शहरों में हैं. ढेर सारी सहेलियां हैं उनके  रिश्तेदार हैं. पर अगर कहीं भी किसी स्त्री ने अपना पति खोया है तो ये सारी पाबंदियां  उसके साथ लागू हो जाती हैं.

इस 31 मई 2010 की एक घटना का जिक्र करती हूँ. मेरी एक सहेली की बेटी की मेहंदी की रस्म थी. लेडीज़ संगीत भी था. खूब नाच-गाना चल रहा था. उसकी ससुराल में उसकी ननदों को बहुत शौक है इन सब का. 4,5  साल पहले उसकी एक छोटी ननद के पति गुजर गए.वो भी वहाँ थी. काले बौर्डर वाली ग्रे कलर की साड़ी में. गले में  पतली चेन, छोटे से टॉप्स कानो में, जैसे हम  बाज़ार जाते वक़्त तैयार होते हैं.बाकी सारे लोग चमचमाती लाल-नीली-गुलाबी साड़ियों में थे, गहनों से लदे. उसके आस-पास बैठी सभी औरतों को परिवारवाले  खींच कर डांस  करने के लिए ले जा रहें थे.पर उसे कोई नहीं बुला रहा था. जबकि सहेली ने बताया था,वह बहुत अच्छा नाचती थी. वहीँ कुर्सी पर बैठी वह बच्चों को दिखा रही थी..ऐसे डांस करो....क्या उसका मन नहीं हो रहा होगा?

जब हम सहेलियों को सब बुलाने लगे तो हम लोगों  ने उसे भी जबरदस्ती उठाया और अपने साथ ले गए.पर वह जरा सा हिल कर वापस चली गयी.वहाँ मौजूद उसकी भाभियों,बहनों, भतीजियों ,भाइयों ने कोई इसरार नहीं किया कि नहीं तुम भी हमारे साथ डांस करो. जब मायके में ये हाल है तो ससुराल की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते. और यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है.

पिछले साल मैं अपने एक रिश्तदार की बेटी की शादी में पटना गयी थी.वहाँ मटकोर की रस्म के लिए  सारी औरतें,बाहर जा रही थीं. एक जिठानी और ननद को एक तरफ बैठे देख ,मैने उन्हें भी चलने को कहा,पर उनलोगों  ने जब इशारे से मना कर दिया तब मुझे ख़याल  आया कि इनका तो किसी रस्म में भाग लेना वर्जित है.मैं भी यह कहती वहीँ बैठ गयी..."बहुत भीड़ है..मैं भी नहीं जाउंगी "...लेकिन कुछ  औरतों ने पलट कर मुझे  देखा और मुझे जबरदस्ती साथ में ले गयीं. जिठानी लन्दन में अपने बेटे के साथ रहती  हैं और वो ननद एक स्कूल की प्रिंसिपल हैं. पर जब किसी ब्याह शादी में शामिल होने की बात आती है तो पुरानी परिपाटी ही निभायी जाती है.

ये महिलायें भी खुद से शामिल नहीं होना चाहतीं,एक तो समाज का डर और फिर दूसरा अंधविश्वास. किसी विधवा माँ को देखती हूँ, कितनी दौड़ धूप करके, कितनी परेशानी से वो बेटी या बेटे की शादी ठीक करती  है,सारे इंतज़ाम करती है.पर रस्मे सारी कोई चाचा -चाची निभाते हैं. ये लोग भी हिम्मत नहीं करती किसी चीज़ को हाथ भी लगाने की, अगर शादी के बाद वर -वधु को जुकाम भी हुआ तो इसका दोष, उन बेचारी महिलाओं  के सर जायेगा.

जबकि पत्नी की मृत्यु हो जाए तब भी पुरुष के किसी भी रस्म में भाग लेने की कोई मनाही नहीं है. जिस रस्म में माता-पिता दोनों की जरूरत होती है, वहाँ पत्नी की जगह एक लोटा रख दिया जाता है और सारी विधि निभाई  जाती है. यानि की स्त्री का अस्तित्व  एक निर्जीव लोटे से ज्यादा कुछ नहीं??

पति के जाते ही, जैसे  उनकी ज़िन्दगी रुक सी जाती है. बनना-संवारना नहीं, चूड़ियाँ,बिंदी,लिपस्टिक, लाल-गुलाबी,पीले-नारंगी रंग..सब अलविदा हो जाते हैं उनकी ज़िन्दगी से. आज जमाना बदल गया है.स्त्रियाँ हर जगह पति के साथ ही नहीं जातीं. नौकरी करती हैं, घर के सौ काम निपटाती हैं. बच्चों के स्कूल ,बैंक सब जगह जाना पड़ता  है पर वही महिला, इन सारी जगहों पर इतने बन संवर कर जाती  थी अब हलके, धूसर रंग  के कपड़े,  हाथों में एक कड़ा,और एक छोटी सी काली बिंदी. इस से ज्यादा श्रृंगार मैने  किसी विधवा स्त्री का नहीं देखा.(यह शब्द भी मुझे लिखने का मन नहीं होता...पूरी कहानी में मैं लिखने से बचती  रही) उन्हें भी तो एक ही ज़िन्दगी मिलती है. पर उन्हें  अपनी सारी इच्छाओं का गला घोंटना पड़ता है. यह समाज क्या अब भी यही सोचता है कि स्त्री का श्रृंगार सिर्फ पुरुष को लुभाने के लिए होता है. अपनी संतुष्टि के लिए उसे सजने संवारने का कोई अधिकार नहीं?
पति को खोने का दुख तो उसे हर पल रहता है, और  रोम रोम से महसूस करती है. पर जैसे खाना-पीना नहीं छोड़ सकती तो ख़ुशी ख़ुशी जीना छोड़ने पर उसे क्यूँ  मजबूर किया जाता है??

उनके खाने पीने पर भी रोक लग जाती है. नौन-वेज़ की कितनी भी शौक़ीन हों पर अब नहीं खा सकतीं. बंगालियों में मछली के बिना उनके एक शाम का खाना नहीं होता पर विधवा स्त्री मछली नहीं खा सकती. एक बुजुर्ग महिला ने अपने अनुभव बांटे थे. संयुक्त परिवार था, बता रही थीं, जैसे ही  मटन-चिकन बनने  लगता, उसकी सुगंध से ,उनमे तीव्र इच्छा जगती, खाने की. फिर उन्होंने साईं बाबा की शरण ली. और रो रो कर बाबा से कहा, "इतना बड़ा आधार छीन  कर, इस तुच्छ इच्छा को क्यूँ नहीं छीन  रहें" और उनका कहना था ,साईं बाबा ने उबार लिया. उनकी आराधना में मन रम गया और अब उनकी इच्छा नहीं होती.  मैं चुपचाप उनकी बातें सुन रही थी.पर सोच रही थी,यह तो सहज स्वाभाविक है. कल तक जो महिला इतने शौक से बनाया करती थी, शौक से खाया करती थी. अचानक छोड़ देना कितना मुश्किल है.
 
पुनर्विवाह की अगर सोची भी जाती है तो बस उन महिलाओं के लिए ,जिनकी शादी को मुश्किल से एकाध साल हुए हों.और जिनकी कोई संतान ना हो.

यह सही है,इतना परिवर्तन तो आया है कि अब दुर्व्यवहार नहीं होते, उनके साथ .वैसे ऊपर से ऐसा दिखता है..अंदर की बातें तो भुक्त-भोगी महिला ही बता सकती है कि रोज कैसे कहाँ, वह अपमान झेलती है और कैसे रोज  मर मर कर  जीती है.
और अगर उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं भी होता...दुख नहीं दिए जाते फिर भी दुख की अनुपस्थिति ,सुख की गारंटी तो नहीं है??

कुछ बदलाव तभी आएगा ,जब हम अपने परिवार में ,पड़ोस में, रिश्तदारों में किसी भी ऐसी महिला को देखें तो पूरी कोशिश करें कि वे एक सामान्य जीवन बिताएं  और उनके होठों की हंसी कायम ही ना रहें बल्कि वो हंसी होठों से चलकर आँखों में झलके.

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