Sunday, August 25, 2019

फिल्म सुपर थर्टी : अदम्य जीवट,साहस,लगन की कहानी

बच्चों की गर्मी छुट्टियों में पटना जाती थी, उन्हीं दिनों IIT का रिजल्ट आता था. फ्रंट पेज पर सुपर थर्टी के बच्चों का रिजल्ट होता और सब की जुबान पर इसी की चर्चा होती थी. मुझे भी डिटेल जानने की इच्छा हुई. कुछ डॉक्यूमेंट्रीज़ देखे .एक दृश्य, हमेशा के लिए आँखों के समक्ष ठहर गया, साधारण से कपड़ों में दो बच्चे एक मोटी सी किताब खोले, उसमें से गणित के सवाल बना रहे हैं. उनके बीच एक कटोरी में भुने चने रखे हैं, बीच बीच में दो-चार दाने मुंह में डाल लेते हैं. अपने बच्चों के पीछे उनकी पसंद की चीज़ें लेकर मनुहार करती, घूमती माँ के लिए ये देखना बहुत कष्टकर था. मैंने ब्लॉग पर भी विस्तार से एक पोस्ट लिखी थी. कुछ लोगों ने मुझे कुछ लिंक मेल किये कि “ये खबरें पढ़िए , सुपर थर्टी के बारे में सबकुछ सच नहीं है. उसके संचालक आनन्द कुमार एक और कोचिंग इंस्टिट्यूट चलाते हैं और उसके पैसे से सुपर थर्टी के बच्चों को पढाते हैं.अपनी दूसरी कोचिंग क्लास के उत्तीर्ण बच्चों को भी सुपर थर्टी के क्लास से उत्तीर्ण बता देते हैं.” ऐसा अगर वे करते भी हो तब भी इतने सारे गरीब बच्चों को मुफ्त भोजन-आवास के साथ शिक्षा भी मुहैया कराना कम बड़ी बात नहीं. अगर सुपर थर्टी के किसी बच्चे ने IIT की परीक्षा नहीं भी उत्तीर्ण की, कोई दूसरा कम्पीटीशन पास किया होगा. उसमें पढने के प्रति रूचि तो जगाई क्यूंकि गरीबों के पास शिक्षा छोड़कर ,अपनी किस्मत संवारने का कोई दूसरा साधन नहीं है.

फिल्म की घोषणा होते ही उसके रिलीज़ होने की प्रतीक्षा शुरू हो गई. बहुत पहले देख भी ली थी पर अनेकानेक कारणों से जल्दी कुछ लिख नहीं पाई. ऋतिक रौशन को आनन्द कुमार के रोल में देखने के प्रति मैं भी आशंकित थी. पर फिल्म देखते हुए उनकी कदकाठी, रूपरंग सब घुल मिल जाते हैं. बिहारी एक्सेंट भी नहीं है लेकिन फर्स्ट हाफ में कहानी इतनी बाँध कर रखने वाली है कि अलग से ध्यान नहीं जाता . कैम्ब्रिज में एडमिशन मिल जाने के बाद भी,पैसे की कमी की वजह से आनन्द कुमार इंग्लैण्ड नहीं जा पाते .पैसों के इंतजाम के लिए पिता के साथ दर दर भटकना, दर्शकों की आँखें नम कर जाता है. आनन्द कुमार के किसी इंटरव्यू में भी एक नेता की कही बात सुनी थी. इसे फिल्म में हू ब हू लिया गया है. गोल्ड मेडलिस्ट आनन्द कुमार जब नेता जी से कहते हैं, “आपने गोल्ड मेडल देते हुए कहा था , जब कभी जरूरत हो तो मेरे पास मदद के लिए आ जाना “. पंकज त्रिपाठी बिलकुल नेताओं वाले अंदाज में कहते हैं, “हाँ हाँ मैंने आपको जरूर बुलाया होगा. मैं सब युवा लोगों को बुलाता हूँ. “ फिर जब आनन्द कुमार हिम्मत कर कहते हैं, “मुझे इंग्लैण्ड जाना है ,पैसे की जरूरत है “ नेता जी बोलते हैं...” जाओ...जरूर जाओ...इंग्लैण्ड ,अमेरिका, जर्मनी, चीन कहीं भी जाओ...पर पैसे के फेर में मत पड़ो...पैसा बहुत बुरी चीज है. और विदेश जाकर अपने देश की मिटटी को मत भूलना. ये मिटटी तुम्हारी माँ है...आदि आदि “ नेताओं के वही रते रटाये जुमले हैं. प्रसंग कोई भी हो, समस्या कोई भी हो उन्हें वही जुमले बोलने हैं.

आनन्द कुमार विदेश नहीं जा पाते. उनके पिता की मृत्यु हो जाती है. माँ पापड़ बेलने लगती है और आनन्द कुमार साइकिल पर पापड़ बेच कर घर का खर्च चलाते हैं. उन्हें एक कोचिंग क्लास में पढ़ाने का ऑफर मिलता है .वे पढाने लगते हैं, घर के हालात सुधरने लगते हैं. पर जब एक बच्चे को पैसे की कमी की वजह से उस कोचिंग क्लास में एडमिशन नहीं मिलता तो आनन्द कुमार को अपना समय याद आने लगता है.

वे गरीब बच्चों को मुफ्त में कोचिंग देने का फैसला लेते हैं. उन गरीब बच्चों को जिनके पास पढने का कोई साधन नहीं है, पर गणित में रूचि है ,अपने पास रख कर दोनों समय का खाना खिला कर IIT की तैयारी करवाते हैं. रोजमर्रा के जीवन के उदाहरण देकर मैथ्स -फिजिक्स-केमिस्ट्री इस तरह समझाते हैं कि इन विषयों में बच्चों की रूचि जागती है, खौफ नहीं होता. यह कहकर उनमें विश्वास भरते हैं कि "अब राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा, जो हकदार है वही राजा बनेगा ।"
इस मुहिम में तमाम अडचनें आती हैं....पैसे की कमी, बच्चों की जरूरतें, दूसरी कोचिंग क्लास चलाने वालों के लगातार हमले. पर आनन्द कुमार की माँ, भाई, बच्चे और कुछ सच्चे दोस्त हमेशा उनके साथ खड़े रहते हैं. माँ अपनी देखरेख में बच्चों के लिए खाना बनवाती हैं.

फिल्म में माँ और पिता के बीच की छोटी-मोटी नोंक झोंक बहुत प्यारी लगती है. अमूमन इस उम्र में और उस वर्ग में पति-पत्नी में आपसी संवाद ही बहुत कम होते हैं. पर गरीबी से आक्रांत परिवार में इन दृश्यों को डालकर निर्देशक ने फिल्म की बोझिलता कम करने की कोशिश की है. 

फिल्म के प्रति दर्शकों को आकृष्ट करने के लिए फिल्म में बहुत सारा बॉलीवुड मसाला भी डाला गया है. एक छोटा सा प्रेम प्रसंग भी है. जो नकली नहीं लगता पर नब्बे के दशक में नायिका आजकल के चलन वाले अनारकली सूट और बड़े बड़े इयररिंग्स में थोड़ी अलग थलग दिखती है. ( नेता जी भी जनता दरबार में घर से एलोवेरा जूस मंगवा कर पीते हैं, जिसका १९९२ में प्रचलन नहीं था पर शायद इसे क्रिएटिव लिबर्टी कहते हैं जो जरूरी हो जाता है पर हमें तो खटक जाता है  )

सेकेण्ड हाफ में फिल्म थोड़ी बनावटी लगने लगती है. अंग्रेजी स्कूल में पढने वाले छात्रों के साथ सुपर थर्टी के बच्चों के घुलने मिलने के लिए जो सिचुएशन तैयार की गई है, वो गले नहीं उतरती. वैसे ही आनंद कुमार को गोली लगने पर जब दूसरे कोचिंग क्लास वाले उन्हें जान से मारने के लिए अस्पताल पर हमला करते हैं और बच्चे विज्ञान के प्रयोगों से जिस तरह उनका सामना कर उन्हें हराते हैं, वो भी एक बच्चों के फिल्म के लिए तो बहुत प्रेरणादायी है पर एक गम्भीर फिल्म में नहीं जमा. ये चीज़ें और भी कई तरह से दिखाई जा सकती थीं....पर इस अत्यधिक ड्रामे ने फिल्म को कमजोर कर दिया .

अक्सर बायोपिक में अंत में जिनपर फिल्म बनाई गई है ,उन्हें भी परदे पर अलग से दिखाते हैं. फिल्म के अंत में इंतज़ार ही कर रही थी पर आधे स्क्रीन पर ऋतिक रौशन और आधे पे आनन्द कुमार की झलक भर दिखाई देती है.वो भी कुछ सेकेंड्स के लिए . मुझे लगा था, सुपर थर्टी से पास हुए कुछ बच्चों के भी चेहरे और उनके दो शब्द सुनने को मिलेंगे ,पर अनावश्यक ड्रामे में ही फिल्म की लम्बाई इतनी बढ़ गई कि इन सबकी गुंजाइश ही नहीं रही .( पर भला हो यू ट्यूब का, वहाँ सब मौजूद है 😊 )

फिर भी एक साधारण से व्यक्ति ने जिस जीवट, साहस और लगन से सैकड़ों गरीबों की किस्मत बदल दी और कितनों की प्रेरणा बने. उनकी कहानी देखने योग्य है. कई राज्यों में इसे करमुक्त करके सरकार ने सराहनीय कार्य किया है. स्कूल के बच्चों को भी जरूर दिखाई जानी चाहिए.

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