शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

कुमार प्रशांत श्रीवास्तव की 'काँच के शामियाने 'से रोचक मुलाक़ात


कहानी लिखने वालों के साथ, अक्सर कहानियाँ भी घटित होती हीहैं . एक ऐसा ही कुछ रोचक वाकया हुआ .

 एक सज्जन, जिन्हें किताबें पढने का शौक है ,और जो अक्सर ऑनलाइन किताबें मंगवाते रहते हैं. अमेजन से दो किताबें मंगवा रहे थे तो उनकी नजर 'कांच के शामियाने' पर पड़ी . उन्हें किताब के नाम ने आकर्षित किया और उन्होंने किताब ऑर्डर कर दी .(और मुझे कुछ लोगों से फीडबैक मिला था कि नाम बड़ा पुराना सा है, सत्तर के दशक का लगता है, कोई कूल नाम होना चाहिए .एक हफ्ते तक मैं कुछ सोच में थी पर फिर अपने सूत्र वाक्य, 'सुनो सबकी करो अपने मन की' पर अमल करते हुए यही नाम रहने दिया )बाद में भी कई लोगों ने लिखा कि सबसे पहले उन्हें उपन्यास के नाम ने ही आकृष्ट किया .

उन्हें किताब पसंद आई ,एक ही सिटिंग में पढ़ ली उन्होंने और फिर मुझे मैसेज करने को मुझे फेसबुक पर ढूँढा तो पता चला उनके और मेरे दो म्युचुअल फ्रेंड्स हैं. उनकी पत्नी की मामी मेरी भी फ्रेंडलिस्ट में हैं .उन्होंने तुरंत अलका को फोन लगा कर पूछा ,'आप रश्मि रविजा को कैसे जानती हैं' अलका इस पर क्या कहे क्यूंकि हमारी जब तक फोन पर बात नहीं होती, हमारा दिन शुरू नहीं होता. वो मेरी छोटी बहन है यानि कि Kumar Prashant Srivastava की पत्नी पूजा के मामा की शादी मेरे मामा की बेटी से हुई है. :)


प्रशांत जी ने किताब पर अपनी प्रतिक्रिया भेजी है .: "Aaap ka novel kaanch ke shamiyane padha.. maine ek bar shuru kiya to yakin maniye bina khatm kiye ruk nahi paya..just abhi finish kiya hai. Last page tak aate aate mai khud emotional ho gaya.... I must say grt work.. Waiting for ur next novel.
. As i am only a reader not a good writer, so can't express my feelings about this novel in so many words, but i want to say that its contents have so much emotions which can make its place in best seller group very soon. Now about the story ...

जो कि शुरुआत में ये दिखाती है कि एक लड़की की शादी आज भी घर के सिचुएशन और एक रुढीवादी सोच ( लड़का अच्छा खाता -कमाता है, और क्या चाहिए ) पर निर्भर है. और कहानी में एक पुरुष का अहम् उसकी जिद ,एक परिवार की स्वार्थपरक इच्छाएं , दोहरा मापदंड ,फिर एक स्त्री (महिला) के दुःख दर्द और संघर्ष और अंत में अपनी पहचान बनाने के संघर्ष और प्रयास, सब कुछ है, इसमें .एक पाठक के अंदर के बहुत से इमोशन, इसको पढ़ते हुए जाग जाते हैं. शुरू में दुःख, क्रोध, फिर दर्द,दया और अंत में ख़ुशी के आंसू > मुझे इसमें जो बहुत अच्छा लगा, उसमे सेपहला तो ये है कि जो एक माँ का अपने बच्चे को जन्म देने का जुनून और ज़ज्बा और दूसराइसका समापन .

जिस तरह से माँ और बच्चे के लाड़ -दुलार किया गया है, वो मन को हर्षित कर देता है. "

यह प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुत मायने रखती है क्यूंकि यह एक ऐसे पाठक कीप्रतिक्रिया है , जो फेसबुक, ब्लॉग किसी भी माध्यम से मुझसे कनेक्टेड नहीं थे .और उहोने किताब का नाम पहले पढ़ा, लेखिका का बाद में .
बहुत शुक्रिया प्रशांत जी ,आपने और कुछेक मित्रों ने मेरे मन से ये वहम भी दूर कर दिया कि पुरुषों को ये किताब शायद पसंद ना आये.

3 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " भारत और महाभारत - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    जवाब देंहटाएं
  2. रोचक ... पढने वाले मोती खोज ही लेते हैं ... पर आपको ऐसा वहम क्यों आया की पुरुषों को पसंद नहीं आएगी ये पुस्तक ..

    जवाब देंहटाएं
  3. हम भी पढ़कर आपके भ्रम को दूर करने का प्रयत्न करेंगे।

    जवाब देंहटाएं

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...