Wednesday, January 29, 2014

ये रस्में कैसी कैसी


पहले मुझे लगा यह विषय बहुत ही पुरातनपंथी सा है . वर्तमान युग में लोगों की ऐसी सोच नहीं हो सकती परन्तु पिछली पोस्ट पर आयी टिपण्णी देख लगा,अब भी कई लोग यही सोचते  है कि स्त्रियों का श्रृंगार सिर्फ पुरुषों को आकृष्ट करने के लिए या  उनके लिए ही होता है . उन टिप्पणीकर्ता का कहना था ,"आप भी सोचिये.... स्त्रियाँ क्यों सजती है, संवरती है , क्यों आकर्षक दिखने का प्रयत्न करती है .. एक ऐसे समाज की कल्पना कीजिये जहाँ सिर्फ स्त्रियाँ ही स्त्रियाँ हो , कोई पुरुष नहीं दूर दूर तक नहीं .. क्या स्त्रियाँ वैसे ही सजेगी , वैसे ही संवरेंगी " मैंने उन्हें विस्तार से जबाब दे दिया था और इस विषय को वहीँ छोड़ दिया था . पर अभी हाल में ही एक शादी में सम्मिलित होने का मौक़ा मिला . शादी की रस्मों में एक रस्म वर-वधू  द्वारा सात वचन लेने की रस्म भी होती है . वहाँ पंडित जी ,एक वचन का बड़े विस्तार से वर्णन कर रहे थे , " पति ही पत्नी का श्रृंगार है, अगर वह दूर देश जायेगा तो वचन लो कि तुम श्रृंगार नहीं करोगी क्यूंकि तुम्हारा श्रृंगार अब सिर्फ पति के लिए है " 

पास बैठी एक सहेली ने बताया कि उसके एक परिचित की मृत्यु हो गयी थी उनके श्राद्ध में भी पंडित जी उनकी  पत्नी को यही सब कह रहे थे , "तुम्हारा श्रृंगार चला गया , तुम्हे अब बिलकुल सादगी से रहना होगा, सादा जीवन बिताना होगा...तुमने पिछले जनम में न जाने कैसे पाप किये हैं कि यह दिन देखना पड़ा..आदि अदि " उसकी छोटी सी बच्ची माँ के पास बैठी सब सुन रही थी . 
घर के बहुत लोगों को ये सब सुन कर बहुत बुरा लगा होगा, पर माहौल कुछ ऐसा होगा कि पंडित को किसी को टोकते नहीं बना होगा. 

कई समारोह -पूजा में शामिल होने का मौक़ा मिला है और मैंने अक्सर देखा है कि सारे लोग पंडित जी की बात ध्यान से सुनते हैं और शायद खुद को केंद्र में पाकर अधिकाँश पंडित जी लोगों की वाक्यचातुरता भी  बढ़ जाती है .वे अपने तरीके से  रस्मों की  वृहद व्याख्या करने में लग जाते हैं .

पर लोगों की मानसिकता भी ऎसी ही है . हमारे शेरो-शायरी, कविता ,गीत में भी इस बात का बहुत ही प्रचार किया गया है, "सजना है मुझे सजना के लिए..." जैसे गाने सबकी जुबान पर होते हैं . वैसे इन सबमें  में आंशिक सत्यता भी है.  जब प्यार में हो तो एक दूजे के लिए सजना-संवारना अच्छा ही लगेगा . पर यह बात  दोनों पक्षों पर लागू होती है. कोई लड़का भी लड़की से मिलने जाएगा तो गन्दी सी शर्ट ,उलझे बाल और टूटे चप्पल में नहीं ही जाएगा .  जब ये ख्याल रहे कि कोई नोटिस करने वाला है...ध्यान देने वाला है तो अपने आप ही सजने संवरने का ध्यान आ ही जाता है.(प्रसंगवश एक बात याद आ गयी, एक सहेली अपने बेटे के विषय में बता रही थी कि उसने अपनी  पसंद की लड़की से शादी करने का प्लान किया है . फ्रेंड हँसते हुए बता रही थी कि "अब तू उसे देखना  बहुत स्मार्ट हो गया है, जबसे गर्लफ्रेंड आयी है, अपने कपड़ों का ध्यान रखने लगा है...पहले तो कुछ भी पहन लेता था :)}

पर ये कहना या सोचना कि लडकिया/स्त्रियाँ सिर्फ पुरुषों के लिए या पति के लिए ही सजती संवरती हैं ,बिलकुल गलत है . यूँ भी लड़कियों की प्रकृति ही होती है श्रृंगार की . वो जंगल में अकेले भी रहेगी तो एक फूल तोड़ कर बालों में लगा लेगी . प्रसिद्द लेखिका ,'शिवानी' का एक संस्मरण पढ़ा था जो उनके 'जेल के महिला सेल' के दौरे पर था .उन्होंने लिखा था जेल में महिलाओं के लिए कोई आईना नहीं था . लेकिन हर महिला के बाल संवरे हुए थे . जली हुई लकड़ी के कालिख से छोटी सी काली बिंदी लगी हुई थी माथे पर . एक बार शिवानी ने देखा, थाली में पानी भरा हुआ था और उसमें अपना प्रतिबिम्ब देख एक महिला कैदी अपनी बिंदी ठीक कर रही थी. अब जेल में कौन से पुरुष थे जिनके लिए ये महिलायें अपना रूप संवार रही थीं ??

और ऐसा सिर्फ आज के जमाने में नहीं है कि लडकियां ,घर से बाहर निकल रही हैं ,नौकरी कर रही हैं तो उन्हें खुद का ख्याल रखना पड़ता है ,सजना पड़ता है.,स्मार्ट दिखना पड़ता है. पहले जमाने में भी लड़कियों/औरतों का पुरुषों से मिलना-जुलना  नहीं बराबर था फिर भी वे खूब सजती-संवरती थीं . गाँव में झुण्ड में मंदिर जातीं, शादी-ब्याह में चटख रंगों के  कपडे पहने, जेवर से लदी, टिकुली, सिन्दूर, आलता लगाए औरतें क्या पुरुषों को दिखाने/रिझाने के लिए तैयार  होती थीं ?? पता नहीं ,इस बात का उद्भव कहाँ से हुआ कि स्त्रियाँ पुरुषों के लिए श्रृंगार करती हैं . स्त्रियाँ श्रृंगार जरूर करती हैं , उन्हें सजने संवरने ,ख़ूबसूरत दिखने का शौक भी  होता है, पर यह उनकी प्रकृति में ही है . 

शादी की रस्मों का जिक्र हुआ  है तो एक रस्म जो मुझे बहुत नागवार गुजरती है . वैसे बहुत सारे रस्मों के अर्थ अब समझ में नहीं आते और वे प्रासंगिक भी नहीं लगते . पर सदियों से ये रस्म वैसे ही चले आ रहे हैं . उनके अर्थ भी लोगों को नहीं मालूम पर पूरी निष्ठा से निभाये जाते हैं . एक रस्म जिसे मुझे लगता है कि अब दूल्हे बने लड़कों को इस रस्म से मना कर देना चाहिए ,वो है...द्वाराचार के समय वधू के पिता द्वारा एक बड़ी सी परात (पीतल की थाली ) में वर के पैर धोना. आपसे दुगुनी उम्र का व्यक्ति जिसे अब आप पिता कहने वाले हैं , उनके सामने आप पैर बढ़ा देते हैं और वह आपके पैरों को धोकर उनकी पूजा करता है .और आपको असहज नहीं लगता ?? हमारे यहाँ कहावत भी है .."पैर धोकर ऐसा दामाद उतारे हैं " पर मेरा  ख्याल है, ये रस्म अब नहीं करनी चाहिए ,ठीक है आप टीका लगाकर स्वागत करें, फूल-माला भी पहना दें पर पैर धोना ?? 

बड़े बूढ़े इस रस्म को निभाने पर जरूर जोर देंगे ,हो सकता है ,पिता-मामा-चाचा-फूफा से दुल्हे राम को डांट भी पड़ जाए पर किसी एक को तो आवाज़ उठानी पड़ेगी . किसी को तो इस रस्म से मना करना पड़ेगा. दुल्हे के तो यूँ भी सौ नखरे उठाये जाते हैं . उसका कहा तो मानना ही पड़ेगा . अब देखना है ,ऐसी किस यू.पी. बिहार की शादी में शामिल होने का मौक़ा मिलता है, जहाँ दूल्हे जी अपने  पितातुल्य बुजुर्ग से अपने पैर न धुलवाएँ . मेरे ब्लॉग के बैचलर ,युवा पाठक ..आपलोग पढ़ रहे हैं न ??

Sunday, January 12, 2014

आप बहुत ख़ूबसूरत हैं

टाइम्स ऑफ इण्डिया में एक खबर पढ़ी . सात महीने पहले चौबीस वर्षीया वकील 'अणिमा मुरयथ ' १२७ साल पुराने 'कालीकट बार असोसिएशन' की सदस्या बनीं . पर उन्हें वहाँ अपनी ही उम्र के पुरुष सहकर्मियों का व्यवहार बहुत पुरातनपंथी लगा . उन्होंने अपने फेसबुक वाल पर लिखा कि "मुझे पता नहीं दुनिया में और भी काम करने वाली जगह ऐसी हैं या नहीं. पर मेरे ऑफिस में और 'बार असोसियेशन' में आज भी  भी पुरुष सहकर्मी , महिलाओं को 'शुगर कैंडी ' कहकर बुलाते हैं और ये कहते कि 'आप कितनी सुन्दर हैं ' उनके आगे पीछे घूमते रहते हैं . जैसा पुरानी  मलयालम फिल्मों में प्रेम नजीर अपनी हीरोइनों से कहा करते थे . यहाँ लोगों का वही पुराना रवैया है ,या तो लोग महिलाओं को बहन बना लेते हैं या फिर उनकी तारीफ़ करके उन्हें प्रेमिका बना कर अधिकार जताना चाहते हैं , मेरी उनसे पूरी सहानुभूति है "

अणिमा की इस फेसबुक पोस्ट ने हंगामा मचा दिया . 'कालिकट बार असोसिएशन' की बैठक बुला कर इसपर गंभीर चर्चा की गयी और अणिमा से माफ़ी मांगने के लिए कहा गया . अणिमा के इनकार करने पर कुछ पुरुष वकील गालियाँ देते हुए उनकी तरफ  बढे . गुस्से में कुर्सी फेंक कर अणिमा को  चोट पहुंचाने की कोशिश की गयी . एक दूसरी वकील पी.के .निर्मला ने  अणिमा का पक्ष लिया तो उन्हें भी भला-बुरा कह कर उनपर हमला किया गया जिसमे उन्हें चोटें भी आयीं .

अणिमा को 'बार असोसिएशन' की सदस्यता से सस्पेंड कर दिया गया . वे अब
'बार असोसिएशन' के अहाते में और उनकी कैंटीन में नहीं जा सकतीं. अणिमा को इसकी चिंता नहीं  है पर उन्हें दुःख इस बात का है कि उनका पक्ष सुना भी नहीं गया और फैसला सुना  दिया गया .

इस तरह की मानसिकता समाज के हर क्षेत्र में विद्यमान है .
लोगों को, स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व मानने में  बहुत मुश्किल होती है . स्त्रियों की मानसिकता ,उनका रहन-सहन ,कार्य स्थल बहुत तेजी से बदल रहा है पर अधिकाँश पुरुष आज भी यही सोचते हैं कि स्त्रियों के रूप की तारीफ़ करने पर वे खुश हो जाती हैं . जबकि स्त्रियाँ सोचती हैं, उनके 'काम' को गंभीरता से लिया जाए. उनके 'काम' पर चर्चा की जाए पर पुरुषों की वही सदियों पुरानी मानसिकता...'आप बहुत ख़ूबसूरत हैं ,आपके हाथ-पाँव-बाल-आँखें   बहुत ख़ूबसूरत है आदि आदि '..कई फ्रेंड्स  ने अपने अनुभव बांटे हैं कि कुछ पुरुषों की प्रगतिशील सोच, उनके लेखन की गहराई देखकर लगा वे औरों से अलग हैं. उनसे मित्रता कर कई मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया जा सकता  है. पर सार्वजनिक रूप से वे कितने भी प्रगतिशील, आधुनिक  सोच वाले दिखें, आपसी बातचीत में वहीँ सुई अटक जाती हैं..'आप बहुत ख़ूबसूरत हैं ' और निराश होकर स्त्रियों को मित्रता से पीछे हट जाना पड़ता है. अगर बहुत खुश हुए तो कह दिया..." Beauty with Brain " यानी beauty तो होनी ही चाहिए उसके साथ brain भी हो गया तो सोने पे सुहागा . जबकि अहमियत brain को पहले मिलनी चाहिए ,उसके साथ beauty भी है तो ईश्वर की देन है वरना अकेला brain ही सफलता की गारंटी  है. कुछ स्त्रियाँ भी पुरुषों की  इस मानसिकता का फायदा उठाती  हैं ,उन्हें सफलता भी मिलती है पर वह  सफलता स्थायी नहीं होती .

अणिमा ने यह भी जिक्र किया था कि लोग या तो बहन बना लेते हैं या फिर प्रेमिका बनाने के फिराक में रहते हैं . इन दोनों के बीच एक दोस्त का रिश्ता भी हो सकता है .पर इस मामले में वही सदियों पुरानी बात दुहरा दी जाती है , "स्त्री-पुरुष कभी सच्चे दोस्त नहीं बन सकते " .(ख़ुशी है कि इस मिथ को झूठा होते देखने का व्यक्तिगत  अनुभव है ) .

बचपन में एक कहानी  पढ़ी थी , जिसमे एक लड़की और लड़का सच्चे दोस्त हैं .लड़के की शादी हो जाती है .उसकी पत्नी भी लड़की की अच्छी  दोस्त बन जाती है और जब उनकी बेटी होती है तो दोनों आपस में झगड़ते हैं कि बेटी इसे 'बुआ' कहेगी या 'मौसी' . फिर लड़की कहती है ,"ये मुझे आंटी कहेगी  मुझे कभी रिश्ते को नाम देने की जरूरत नहीं महसूस हुई. इस से दोस्ती एक दायरे में बंध जाती है " तब यह कहानी  बिलकुल समझ में नहीं आयी थी और मुझे भी लगा था ,वो लड़की अगर लड़के को भैया कहने लगती तो क्या फर्क पड़ जाता . क्यूंकि तब स्कूल की सारी सीनियर 'दीदी' हुआ करती थीं और महल्ले के सारे बड़े लड़के 'भैया ' और मुझे यह बहुत ही स्वाभाविक और सहज लगता . 

बहुत बाद में वह कहानी अच्छी तरह समझ में आयी कि 'रिश्ते का  दायरे में बंध जाने  का' मतलब क्या होता है. अगर मन के अंतरतम कोने से किसी के लिए भैया-दीदी का संबोधन निकले  तो सही है वरना सिर्फ दोस्ती में भी कोई बुराई नहीं.