Tuesday, March 26, 2013

स्वप्न मञ्जूषा 'अदा ' का सकुचाते हुए अपने पति से मिलना और सरस दरबारी जी का रंगों के ख्याल से ही डरना


("पिया के घर में पहला दिन या पहली होली " इस परिचर्चा के तहत अब तक लावण्या शाह जी, रचना आभा और रंजू भाटिया के रोचक संस्मरण,  हमारे चेहरे पर मुस्कान ला चुके हैं ..आज अदा और सरस दरबारी जी की यादों की बगिया से दो फूल...बस इनकी खुशबू  में खो जाइए )

अदा : चली गोरी पी के मिलन को चली 

रश्मि ने ऐसा काम पकड़ा दिया है, जिसे पूरा करने के लिए वर्षों पीछे जाना पड़ रहा है। हर आम लड़की की तरह मेरी भी आम सी शादी हुई थी, जो हर आम लड़की की तरह, मेरे लिए भी 'सारा' ख़ास है ('बहुत' नहीं लिखा क्योंकि 'बहुत' बहुत ही होता है, 'सारा' नहीं होता। 

शादी के तुरन्त बाद की तो, कोई घटना याद नहीं लेकिन, एक घटना याद है। 

मेरे 'वो' दिल्ली में नौकरी करते थे और हम राँची में रहते थे। उस साल, उनकी जिद्द हुई कि इस बार होली में तुम मेरे पास आ जाओ। उन दिनों हमारी इतनी औकात नहीं थी कि हम प्लेन में सफ़र करते, बस या ट्रेन का ही आसरा था। हम किसी तरह डरते-डरते ट्रेन में अकेली ही जाने को तैयार हो गए। 

ट्रेन का सफ़र और होली का मौसम, घर में भी सब हड़क गए थे। कहीं कोई हुडदंगबाज़ी हुई और हम किसी अनजान जगह में फँस गए तो का होगा ! लेकिन दामाद की बात काटने की जुर्रत भला कौन कर सकता था ! खैर जी रोते-गाते 'उन ज़नाब' को ख़बर कर दिया गया कि, हम होली के दो दिन पहले 'नीलाञ्चल', जिसको हमलोग 'नीलाचल' कहते हैं, से नई दिल्ली पहुँच रहे हैं। अपने पूरे टीम-टाम के साथ, हमलोग राँची रेलवे स्टेशन पहुँच गए थे, 'ऑपरेशन ट्रेन में बेटी को बिठाओ' करने। हर बिहारी की तरह, हमरे साथ भी, हमरा पूरा कुनबा आया था, हमको ट्रेन में बिठाने। सब अपनी-अपनी सलाह दिए जा रहे थे, और हम बस हाँ-हूँ किये जा रहे थे। ताक़ीद का लम्बा-लम्बा लिफ़ाफा हर कोई हमको पकडाता जा रहा था,  खिड़की मत खोलना नहीं तो कोई कोई रंग, गोबर, कुछ भी फेंक देगा, हाथ बाहर मत निकालना, ज्यास्ती बात मत करना, किसी से मत कहना की तुम अकेली जा रही हो, ट्रेन के नीचे तो गोदे नहीं धरना है तुमको, पानी-ऊनी कुछ भी दरकार हो किसी से मँगवा लेना, वैसे वाटर बोतल में काफी पानी है, कुछ भी खाने-पीने का मन करे तो अपना सीट पर बैठे-बैठे ही खरीदना, इधर-उधर जाना मत, रात में हर्हट्ठे सूत मत जाना, जाग-जाग के सोना और अपना चप्पल अपना मुड़ के नीचे रखना, बहुत चोरी होता है चप्पल, आदि आदि। ई सब सलाह का सार यही था कि अपना सीट पर एक बार जो कुण्डली मार कर बैठो तो बस बैठे ही रहो और जब बर्थ पर सुतो तो सुते ही रहो । साथे साथ, साथ की सीट पर बैठे हुए, मारवाड़ी बुजुर्ग जोड़े से हाथ जोड़ कर, कातर नज़र से, अनुनय, विनय, मनुहार, गोहार, जोहार  किया जा रहा था, हमरी बिटिया रानी पहली बार अकेली दिल्ली जा रही है। प्लीज प्लीज आप लोग ज़रा ख़याल रखियेगा इसका, सीधी भी है और बुडबक भी, बड़ी जल्दी किसी पर भी बिस्वास कर लेती है। और वो जोड़ा भी मुंडी हिला-हिला के सबको पूरा आश्वस्त करने में लगा हुआ था, 'चींते' की कोई बात नहीं है, हम लोग हूँ न !! 

माँ-बाबा की हालत वैसे ही पतली हो रही थी। बाबा तो बार-बार 'उनको', सबके सामने गरियाने में लगे हुए थे, का लड़का है ! एतना रिस्क लेने का कौन ज़रुरत था, भेज देते हमलोग होली के बाद। हमको ई सब एकदम पसंद नहीं आ रहा है। कुछ हो गया तो, हम तो 'उसी' से जवाब-तलब करेंगे। बल्कि हम तो कहते हैं, अभी भी घर वापस चलो। होली के बाद भेज देंगे हम, बल्कि हम साथे चलेंगे। अभी नहीं जा सक रहे हैं न, कुलदेवता का पूजा है, गाँव पहुंचना ज़रूरी है और तुम जानबे करती हो हम ही पूजा कर सकते हैं कोई दूसरा नहीं। बीच-बीच में बाबा, माँ पर भी बमक रहे थे, ई सब तुमरा किया-धीया है, बिना हमसे पूछे, तुम भेजने के लिए 'हाँ' कैसे कह दी। त्यौहार में कोई बाल-बच्चा को बाहर भेजता है। लोग तीज-त्यौहार में घर आता है, और तुम बाहर भेज रही हो, ऊ भी एकदम अनजान जगह पर। तुमरा खोपड़ीये उलटा है, अरे ऊ दिल्ली है दिल्ली ! लोहरदगा, गुमला नहीं है। अगर ऊ लेने के लिए टाईम से नहीं पहुँचा तो ! तो का होगा ? तुम समझ नहीं रही हो। लेकिन माँ को दामाद बाबू की ज्यास्ती चिंता थी। ऊ फुल फ़ोर्स में जुटी हुई थी, बाबा का गुस्सा पर ठंडा पानी डालने में। आप तो बस बिना मतलब का चिन्तियाये रहते हैं। आपका दामाद एतना बुडबक है का और एक ठो आपकी ही बेटी फूलकुमारी है का ? सब दुनिया आवाजाही करती है, होली के दिन में भी। होली के दिन, ट्रेन, बस, हवाई जहाज सब बंद हो जाता है का, नहीं चलता है पसिंजर लोग ??? यहीं देख लीजिये इसी बोगी में ही देखिये, केतना लड़की और केतना औरत लोग सफ़र कर रही है। बाबा भी आख़िर कब तक टिके रहते ऐसे तर्क के सामने, जब तर्क साक्ष्य के साथ प्रस्तुत किये जा रहे हों तो। हथियार डाल ही दिए, ऊ भी। 

खैर जी, बाबा के नहीं चाहने से का होना था, 'नीलाचल' को तो अपने नियत समय पर चलना ही था, सो वो चल ही पड़ी और सबलोग धडफड़ा कर ट्रेन से उतर गए। अब खिड़की के साथ-साथ दौड़ते-दौड़ते सब हमको समझाने में लग गए। डरना मत, पहुँचते खबर करना। हम भी रुआँसी होकर, जोर-जोर से हाथ हिला-हिला कर, और और भी जोर-जोर से बाय-बाय करने लगे। जितनी तेज़ी से ट्रेन के पहिये धड़धड़ा रहे थे, उतनी ही तेज़ी से हमरा दिल भी धड़धड़ा रहा था। ट्रेन के प्लेटफार्म से निकलते ही, और माँ-बाबा के ओझल होते ही, एकबारगी लगा, जैसे इस भवसागर में हम एकदम अकेले रह गए हैं। रोना आ गया हमको। हमरी रोनी सूरत देख कर, साथ में बैठे बुजुर्ग मारवाड़ी दंपत्ति, अब पूरी तरह हमरे माँ-बाबा के रोल में आ गए। स्नेह के इतने रंग और उनकी इतनी बारिश हुई, आज तक हम भीजे हुए हैं। देखते ही देखते खाने के कनस्तर पर कनस्तर खुलने लगे। उनके प्यार का रंग और उनके रंग-रंग के पकवान, जीवन भर में खेली गयी सारी होलियों पर अब तक भारी हैं। 

हमको लगता है, लगभग डेढ़ साल हो गए थे, न हम उनको देखे थे और न ऊ हमको देखे थे। शादी के तुरन्त बाद ही 'ऊ' दिल्ली चले गए थे। शक्ल भी याद करना मुहाल हो गया था। याद करते तो चेहरा पूरा गडमड हो जाता था। न न उनकी शक्ल ठीक ही है, बस याद में कभी भी ठीक शकल नहीं नज़र आती थी :) 

अब तो ई सोच-सोच कर हाथ-पाँव फूलने लगे कि कैसे बात करेंगे हम और का बात करेंगे ! सामने कैसे जायेंगे ! का कहेंगे हम !  ऐसे लग रहा था जैसे पहली बार मिलेंगे उनसे। आखों से नींद गायबे हो गयी थी, हम तो अब यही फ़िक्र में आधे हुए जा रहे थे, कि सामना कैसे करेंगे ! 

तो जी राम-राम करते हुए, नई दिल्ली स्टेशन आ ही गया। सामान उतारने में उन दंपत्ति ने पूरी मदद की। हमरी आँखें चोरी-छूपे उनको ढूँढने में जुट गयीं। साथ-साथ हम बुजुर्ग दंपत्ति से बतियाते भी जा रहे थे। आख़िर ऊ हमको दिख ही गए, सफ़ेद शर्ट में, दूर से आते हुए। हम जल्दी से मारवाड़ी दंपत्ति के पाँव, झुक कर छू लिए। हड़बड़ा कर वो छिटकने लगे, कहने लगे, बेटियाँ पाँव नहीं छूतीं तो हम कह दिए अंकल आप हमको बहु ही मान लीजिये, लेकिन पाँव छूने दीजिये। हम, बिलकुल सुरक्षित, एकदम ठीक-ठाक, सही जगह पहुँच गए हैं। आप लोग नहीं होते तो, कुछ होता या नहीं होता, लेकिन हम खुद को इतना सुरक्षित महसूस नहीं करते। आंटी कहने लगीं, अरे सपना, तुमने तो हमलोगों का मन ही मोह लिया, हम बोले, मोहा तो हम भी गए हैं आंटी आपलोगों से। प्यार से सिर पर फेर कर, ढेर सारा आशीर्वाद दे कर, वो लोग चले गए। 

अब मेरी बारी थी, दूसरी हल्दीघाटी में कूदने की, 'ज़नाब' चले आ रहे थे सामने से इठलाते हुए। चेहरे पर हज़ार वाट का बलब जला हुआ था शायद, ऐसा हमको लगा था, अब जब भी हम कहते हैं कि हमको देख कर आपका चेहरा लाईट मारने लगता है, तो मानते नहीं है, कहते हैं, का मतलब है तुम्हारा कि तुम जब होती हो तभी हम चमकते हैं, ऐसे नहीं चमकते हैं का !! 

खैर, सामने से ऊ चले आ रहे थे, सफ़ेद शर्ट में, जॉनी वाले राजकुमार की तरह, और इधर से हम धीरे-धीरे, उनकी तरफ डग भर रहे थे। हम उनकी तरफ देख ही नहीं पा रहे थे, आँखें नीची किये और अपना सामान उठाये, हम उनकी तरफ बढ़े जा रहे थे। मारे लाज के हमरे कदम एक-एक मन के हो गए थे। हम ऐसे सकुचाये जा रहे थे, जैसे हमरे बदन में ही कोई जगह-उगह होती तो वहीँ घुस जाते। हम बिना उनकी तरफ देखे हुए, उनकी बगल से निकलने का चुरकी रास्ता ढूँढने लगे। हमरी नियत शायद ऊ भाँप  गए थे, बस फिर का था, झट से मेरा हाथ पकड़ लिए, और हलके से अपनी तरफ खींच लिए। हमरे दोनों हाथों में सामान था। हम अटेंशन में खड़े हो गए थे, धीरे से उन्होंने मुझे अपने सीने से लगा लिया और एक बहुत लम्बी साँस ली थी उन्होंने। क्या था वो मुझे नहीं मालूम, शायद चैन की साँस इसे ही कहते हैं। कुछ पल के लिए, उस भीड़ भरे प्लेटफार्म से सब कुछ गायब हो गया था, न लोग थे वहाँ, न ही कोई शोर था। पूरे प्लेफोर्म में सिर्फ हम थे और वो थे, बिलकुल अकेले। हम हड़बड़ाये हुए उनसे अलग हुए तो, उनकी गर्दन, ठोढ़ी और उनकी सफ़ेद शर्ट पर लाल रंग लग चुका था, मेरी माँग के सिन्दूर ने भी पूरा साथ दिया था, 'हमारी' होली का !!


सरस दरबारी : खुद ही रंग लगाया और फिर खुद ही  छुड़ाया

होली आयी रे !

शादी के पहले बहुत होली खेलती थी मैं - लेकिन शादी के बाद जो पहली होली ससुराल में हुई ... उसमें ऐसी दुर्दशा हुई कि कसम खा ली- अब होली नहीं खेलूंगी .

चार साल बाद नन्द का विवाह हुआ . अब शादी के बाद पहली होली तो मायके में होनी थी , सो खूब जोर शोर से तैयारी की. ढेरों पकवान बनाये ...बस मन ही मन मनाती रही ..नंदोई होली न खेलें .

नंदोई भी नए नए थे , संकोच स्वाभाविक था . लेकिन फिर भी थोड़ी थोड़ी देर में कह देते , "भाभी तैयार हैं न ...कल होली खूब जमकर खेलेंगे".

मैं भी हाँ में हाँ मिलाती रही, लेकिन मन ही मन धुकपुकी लगी थी.

अगले दिन सुबह से ही सतर्क थी, ज़रा सी आहट से चौकन्नी हो जाती. और थोड़ी थोड़ी देर में नंदोई भी आवाज लगाते, " भाभी जल्दी काम ख़त्म करिए , तैयार हो जाइये ,,,मैं आ रहा हूँ ".

मैं भी हाँ में हाँ मिला देती , "आइये आइये हम भी तैयार हैं ."

इसी तरह पूरा दिन बीत गया. जब मैं आश्वस्त हो गयी, अब तो दिन ख़त्म , अब क्या खेल होगा तो नंदोई को चिढ़ाना शुरू कर दिया . "बस...मुँह ज़बानी..." नंदोई मुस्कुराकर रह गए .

अगले दिन सुबह मैं चौके में दूध छान रही थी, तभी पीछे से दबे पाँव आ, उन्होंने गालों पर ढेरों गुलाल मल दिया....कुछ गुलाल दूध में भी गिर गया...मैं अरे अरे कहती रह गयी , और वह आँगन में भाग गए.

अब तो इज्ज़त की बात थी ...हालाँकि दूसरी बिटिया होने को थी ...लेकिन मैंने आव देखा न ताव और मुट्ठियों में

रंग भर आँगन में पहुँच गयी. अब वह आगे आगे ...मैं पीछे पीछे ...लेकिन वह कहाँ हाथ आने वाले , अपने कॉलेज के एथलीट थे. जब देखा कोई ज़ोर नहीं चल रहा तो 'इनको ' आवाज़ दी.
"कैसे हैं आप ...हम अकेले परेशान हो रहे हैं..यह नहीं होता की ज़रा उनको पकड़ लें तो हम रंग लगा दे".

हमारे साहब भी तैश में आ गए ..कूद पड़े आँगन में और नंदोई जी को आखिर घेर कर पकड़ ही लिया .फिर क्या था खूब जी भरकर उनको रंग लगाया. अब तो गुलाल एक तरफ, गाढे रंग घुलने शुरू हो गए . और खूब बाल्टी भर भर भिगोया नंदोई जी हमें, कहाँ हम ५'१" और कहाँ वह ५' ११", चुपचाप भीगते रहे ...रंगवाते रहे.

खैर ! जब खेल ख़त्म हुआ तो नंदोई बोले," भाभी मैं नल के नीच बैठ रहा हूँ, आप ज़रा पानी डाल दीजिये ". बस इसी मौके का तो इंतज़ार था . नन्द ने गाढ़ा हरा रंग लाकर मुझे थमा दिया और उसे आधी बाल्टी पानी में घोल हमने प्यारसे, नंदोईजी के सर पर डाल दिया.

बड़ी तृप्ति हुई. अब तो बेचारे पानी डाले जायें और गाढ़ा हरा रंग बहता जाये .करीब आधे घंटे तक वह सर धोते रहे और रंग था की हल्का होने का नाम ही नहीं ले रहा था. फिर थोड़ी देर बाद उनपर तरस आ गया ..और हम सबने मिलकर उनका रंग छुड़वाया.

उसके बाद फिर कभी ऐसी होली नहीं हुई. लेकिन आज भी याद करते हैं तो एक मुस्कराहट खुद ब खुद चेहरे पर खिल आती है .

(अगली पोस्ट में कुछ और रोचक संस्मरण )

34 comments:

  1. अदा की तो अदा ही निराली है...
    सरस जी की बातों सा रस और कहाँ....

    रश्मि तुम्हारा शुक्रिया सबके करीब लाने का....
    अनु

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  2. हई देखिये... बुझाता है कि राईट टाइम आ गया हमरा गाड़ी भी लाटफारम् पर.. नहीं त अदा जी का संस्मरण का गाडिये छूट जाता.. १४ रील का सिनेमा में बस दुइए रील होली देखाई दिया.. बाकी सब हमलोग अपने से समझ गए.. मगर रेल का जर्नी में त एकदम सौंसे दिरिस नजर के सामने आ गया.. मियाज हरियर हो गया..
    एगो करेक्सन.. ऊ गाड़ी का नाम नीलाचल एक्सप्रेसे है "नीलांचल" नहीं!!
    अऊर सरस जी का संस्मरण भी सरस लगा!!

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    1. भूल सुधार के लिए आपको धनबाद कह रहे हैं।
      डाउट तो था हमको भी कि जे बा की न नीलाचले नाम था साइद, बाकी आज फुल कान्फर्मा गया है, अब तो कौनो डाउटे नहीं रहा :)

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  3. होली की हार्दिक शुभकामनायें!!!

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  4. दोनों ही संस्मरण प्यारे है.... पढ़ते हुए मुस्कराहट बनी रही ... शुभ होली

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  5. रंगोत्सव की आपको और आपके परिवार को बहुत-बहुत शुभकामनाएं...

    जय हिंद...

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  6. क्या बात, मजा आ गया।

    होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं।.

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  7. रश्मि...वाकई ...मज़ा आ गया ....थैंक्स अ लॉट

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  8. बहुत बहुत धन्यवाद मैडम जी, हमलोगों को ई मौका देने के लिए :)
    सरस जी की बातें बड़ी रसभरी लगीं हैं, उनका भी आभार। उन्हें होली की ढेर सारी शुभकामना
    और सपरिवार तुमको होली मुबारक !

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  9. बहरहाल स्वप्न मंजूषा शैल अदा जी वाले संस्मरण का मजा तब है जब उसे सारा का सारा उलट कर पढ़ा जाए :)

    मसलन पतिदेव अपने सहयात्री मारवाड़ी अंकल आंटी के पैर छूकर,किंचित लजाये सिमटे से प्लेटफार्म पर खड़े रहे,इधर अपने चेहरे पर हज़ार वाट के बल्ब जलाये स्वप्न शैल ने लपक कर ...

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    1. काहे नहीं, ज़रा सा हम साफ़ लिख दिए तो हमारा रोल ही बदल दिया ?
      माने हम हीरो 'वो' हिरोइन ?

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  10. बेहतरीन,होली की हार्दिक शुभकामनाएँ.

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  11. ऐसा लगा,धर्मयुग या साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान की किसी परिचर्चा में शामिल संस्‍मरण पढ़ रहे हैं...मजेदार एकदम..झकास...।

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    1. राजेश जी,
      आज तक पढने-लिखने या साहित्य में जो भी रूचि है , इसका पूरा पूरा श्री धर्मयुग को ही जाता .जो भी थोड़ा बहुत सीखा है, धर्मयुग पढ़कर ही सीखा है.
      मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है कि इस परिचर्चा में आपको धर्मयुग की झलक मिली.

      धर्मयुग के स्तर का शतांश भी मेरा ब्लॉग छू ले तो मेरे लिए ये एक उपलब्धि होगी .

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    2. ई लो !
      धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छप-छुप कर बैठी हो आउर बात कर रही हो।

      हमरा तो इन रिसालों से बस इतना ही नाता था
      किसी मैगजीन स्टैंड से ख़रीद कर, कोई घर ले आता था :)

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    3. अरे नहीं अदा !!
      उन दिनों तो छोटे थे ,युवा जगत में मेरे आलेख छप जाते थे .
      पर उसका स्तर वाकई बहुत ऊँचा था . धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान के बाद आज तक उनके स्तर की एक पत्रिका देखने को नहीं मिली.

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  12. होली की महिमा न्यारी
    सब पर की है रंगदारी
    खट्टे मीठे रिश्तों में
    मारी रंग भरी पिचकारी
    होली की शुभकामनायें

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  13. अच्छी प्रस्तुति...होली की हार्दिक शुभकामनाएं...

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  14. गनीमत है सही चेहरा पहचाना अदा जी ने !
    सरस जी की घबराई होली !
    दोनों संस्मरण रोचक लगे !
    बहुत शुभकामनायें !

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    1. हमरा कपार पर चश्मा देख के ई मत समझिये की हम बचपने से आन्हर हूँ ...
      अगर जे पहचानने का गनीमत नहीं हुआ होता तो फजीहत न हो जाता :)

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  15. अदा जी, आपकी लेखनी से कमाल के हास्य का सृजन होता है, अगर आप चाहें तो :) नमूना पेश कर दिया है आपने. बहुत बहुत बधाई.
    सरस जी, आपका संस्मरण भी खूब सरस है :) बधाई.

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    1. वंदना,
      @अदा जी, आपकी लेखनी से कमाल के हास्य का सृजन होता है, अगर आप चाहें तो :)

      तुम्हारी इस बात पर पता नहीं क्यूँ कुछ लिखने को दिल कर गया, देखते हैं शायद एक शेर निकल ही आये :)

      चाहते तो हम भी हैं, ज़ुबां हमारी फूल बरसाए
      पर क्या करूँ, मेरे शहर में अक्सर पत्थरों की बारिश होती है :)

      अरे वाह ई तो हो गयी शायारी..
      आदाब अर्ज़ है !

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  16. ई संस्मरण पढ़ के अजीब सी गुदगुदी हुई.. दिल धक-धुक करने लगा। :)

    ...आभार सभी का।

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    1. अरे राम !
      ई एकदम ठीक बात नहीं है।
      रश्मि को डिस्क्लेमर लगाना चाहिए था 'कमजोर दिल वाले इस पोस्ट को न पढ़ें' :)

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  17. क्या ये वही अदाजी है ?सुरीला गाने वाली ,या की रोचक शैली के साथ लिखने वाली या
    रेलवे स्टेशन वाली ।
    सरस जी की होली जी बड़ी सरस लगी ।

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    1. अब का कहूँ आउर कैसे कहूँ !
      आप जो जो लिख दीं हैं उसमें से 'रोचक' 'सुरीली' माइनस करके पिलाटफ़ार्म वाली हम ही हूँ। ई सब पढ़ के एक बार फिर, मुंडी झुका के, अपने पैर के अँगूठा से जमीन कोड़ने लगे हैं हम :)

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  18. वाह, असल कहानी इसे कहते हैं..

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    1. का मतलब है आपका ? :)
      ई असल भी है और कहानी भी है ?
      :)
      हम बता रहे हैं आपबीती और उसे अफ़साना बता रहे हैं ?
      बहुत बेइंसाफी है ई ..हाँ नहीं तो !

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  19. अदाजी की अदा के क्‍या कहने। फोटो तो ऐसी है जेसे साहिब, बीबी और गुलाम की मीना कुमारी। पढ़कर ऐसा लग रहा था कि पिक्‍चर का ट्रेलर हो। भाई पूरी पिक्‍चर कहां हैं? सरस जी का भी संस्‍मरण बहुत अच्‍छा है। होली की सभी को बधाइयां। हम भी दो दिन के लिए होली पर बाहर चले गए थे, इसलिए इतनी मजेदार होली पढ़ने में देर हुई।

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    1. अजित जी,
      हम को सिर्फ़ 'आईटम संस्मरण' के लिए साईन किया गया था, पूरी पिचर के लिए थोड़े न किया गया था :)

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  20. ada ji ne to apni lekhni se poora chitra hi prastut kar diya laga jaise poora wakya dekh liya...aur saras ji ka sansmaran bhi kafi rochak laga

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    1. नेहा,
      यही तो ऐम था, हम ही खाली-पीली काहे भुगतें , पढ़वैया भी भुगतें थोडा-बहुत :)
      तुम्हें पसंद आया, हमारा भी जी जोडाया :)

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  21. aapka lekhan kamaal ka hai..padhte samay to bas yahi laga ki jaise ham bhi us waqt aapke samne wali seat par baithe hon...delhi station par khidki se jhankne ke liye sharminda bhi hain...par kya karen aap thik se pahunch gayi ya nahi ye janana bhi tha...

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