Wednesday, February 13, 2013

हमारी पीढ़ी की कशमकश

हमारी पीढ़ी बड़े कशमकश से गुजर रही है। वह नयी पीढ़ी के साथ कदम मिला कर चल रही है, लेकिन पुरानी पीढ़ी के रिवाजों रवायतों का दामन भी नहीं छोड़ना चाहती। पुरानी परम्पराओं को भी बड़े शौक से निभाती है या यूँ कहें  पुरानी पीढ़ी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहती। हाल में ही बहुत करीब से यह सब अनुभव हुआ जब अपनी फ्रेंड के बेटे के हल्दी की रस्म में शामिल हुई।

वही बचपन की सहेली 'सीमा', जो बारह साल बाद मुझे इंटरनेट के थ्रू मिली और उसके मिलने की पूरी दास्तान  मैंने यहाँ लिख दी थी। आप सबने जरूर पढ़ी होगी, और शायद याद भी हो फिर भी मुझे अपनी इस सहेली का परिचय देने में बहुत गर्व महसूस होता है।  बहुत लोगो के लिए वह उदाहरण स्वरुप है। बारहवीं के बाद ही उसकी शादी हो गयी। शादी के बाद उसने बी. ए. , एम. ए. , बी. एड. , एम. एड.  और पी एच डी भी किया। सेन्ट्रल स्कूल में टीचर बनी और अब कटिहार केन्द्रीय विद्यालय की प्रिंसिपल है . 

बेटे की बारात  तो भुवनेश्वर जानी थी, पर सीमा के भाई, माता -पिता मुंबई में ही हैं, बेटे की जॉब भी मुंबई में है, इसलिए शादी से पहले की रस्में यहाँ  करनी थी और मुझे उसमे शामिल होना ही था। (सीमा की ज़िद  तो भुवनेश्वर साथ चलने की भी थी ,पर कई कारणों से वह संभव नहीं हो पाया ) इसलिए समय से मैं, इन रस्मों में शामिल होने के लिए पहुँच गयी।
 सीमा के माता -पिता ,उसके छोटे भाई-बहनों से मिलने के लिए अति उत्साहित थी क्यूंकि सीमा से तो मुलाकात होती रही थी,पर उन सबसे मैं  करीब पच्चीस साल के बाद मिलने वाली थी। माँ ने देखते ही पहचान लिया और मुझे सुकून हुआ,चलो इतना भी नहीं बदली हूँ .

सीमा पूजा की तैयारियों में लगी थी । जैसे ही सीमा और उसके पति पूजा के आसन पर बैठने को हुए। उसकी माँ ने टोक दिया "अरे, दोनों के पैरों में आलता तो लगा ही नहीं है " दोनों ने कहा, 'अब जाने भी दो न " इस बार उसके पिता बोले, "ऐसे कैसे, बेटा का बियाह एक ही बार होता है  न, पैर तो रंगना ही पड़ेगा "
अब मुश्किल थी आलता लगाए कौन? शादी-ब्याह के घरों में ये काम 'नाउन' करती हैं (अब मैं कोई सेलिब्रिटी तो हूँ नहीं कि ऐसा लिखने पर कोई केस कर देगा, वरना जाति सूचक शब्दों का प्रयोग वर्जित है। शाहरुख खान को 'बिल्लू बार्बर' फिल्म में से ऐसे शब्द हटाने पड़े थे ) पर यहाँ तो खुद सीमा दो दिन पहले आयी थी। अकेले बैचलर लड़के के घर में तो कोई काम वाली बाई भी नहीं थी। सीमा की छोटी बहनें ,उसके भाई के फ़्लैट पर से अब तक आयी नहीं थीं। बड़ी बहन आलता लगाने बढ़ी तो माँ ने मना  कर दिया,'वो बड़ी होकर उनके पैर को कैसे हाथ लगाएगी ' .सीमा की बेटी श्रुति ने  रंग की शीशी हाथों में ली तो माँ ने फिर से कहा, "बेटी कहीं पैर रंगती है, थोडा रुक जाओ छोटी बहनें आती ही होंगी।" पर कई सारे रस्म करने थे,देर हो रही थी और सीमा की नज़र मुझ पर पड़ी, "अरे, रश्मि है न ,ये लगा देगी " मैंने भी ख़ुशी ख़ुशी सहेली के पैरों में आलता लगा दिया। पर उसके पति को बहुत झिझक हो रही थी । वे वहां से चले गए .जब बार बार उनकी पुकार होने लगी तो श्रुति ने राज़ खोला, 'वे रश्मि आंटी से आलता नहीं लगवाएंगे ' सीमा ने रौब जमाया 'क्यूँ नेग देने से डर रहे हैं क्या ?' मैं भी अड़ गयी, "ये मौका तो नहीं छोडूंगी ,मनपसंद नेग लूंगी " (शादी-ब्याह में ऐसे हलके-फुल्के मजाक बहुत चलते हैं, माहौल खुशनुमा बना रहता है ) बेचारे किसी तरह झेंपते हुए आकर सावधान की मुद्रा में खड़े हो दूसरी तरफ देखने लगे। वे बहुत ही असहज महसूस कर रहे थे और मैं उनकी असहजता को लम्बा खींचने के लिए और देर कर रही थी .:)

पूजा शुरू हुई तो पंडित जी ने बड़ी बहन से कहा,अगली रस्म के लिए चीज़ें इकठ्ठा कर लीजिये। थोडा 'गाय का गोबर' मंगवा लीजिये। अब तो सब सकते में आ गए .रात  के आठ बजे मुंबई में गोबर कहाँ से  मिलेगा ?
 सीमा ने कहा 'आपने पूजा की सामग्री में तो लिखवाया ही नहीं।, पंडित जी नाराजगी से बोले, 'कहीं गोबर भी लिखवाया जाता है वो तो बगल से कोई भी ले आता है।' अब पंडित जी गाँव से आये थे, उन्हें कोई क्या एक्सप्लेन करे। सीमा ने कहा, ' पूजा के सामान की दुकान पर उपले दिखे ,वो तो मैं अपने मन से ले  आयी,' मेरे  पतिदेव ने उपाय सुझाया," उसमे पानी डाल कर गीला कर दीजिये,वो गोबर बन जायेगा " पंडित जी ने कहा," नहीं, उसे दीवार पर पांच जगह चिपकाना होता है, वो नहीं चिपकेगा " ( मेरे मन में आया, कहूँ, उसके पांच टुकड़े कर फेविकोल से चिपका दिया जा सकता है,पर पता था यह आइडिया खारिज हो जाएगा, इसलिए चुप रही ) पंडित जी ने ऐलान कर दिया 'बिना गाय  के गोबर के 'घिउढारी ' की रस्म नहीं होगी '. इस रस्म में दीवार पर गोबर चिपका कर दूब ,अक्षत, रोली से उसकी पूजा की जाती है और फिर उसपर घी डाला  जाता है इसलिए कहते हैं 'घिउढारी' (घिउ =घी , ढारी =ढालना ) .इसके पीछे कोई कहानी  तो होगी पर मुझे नहीं पता (औरों को भी कितना पता है, ये भी नहीं पता )

खैर फिर विमर्श हुआ कि वाचमैन से पूछा जाए, 'आस पास कहीं तबेला हो तो  ,वहां गोबर मिल जायेगा '. वाचमैन ने बताया, "पास ही एक गाँव है, वहां एक तबेला है ." चन्दा  दी और मैं गाडी ड्राइवर लेकर गोबर  की खोज में निकले। लोगों से रास्ता पूछते , अँधेरे में कच्ची सड़क पर काफी आगे निकल जाने पर एक मंदिर दिखा। हमारे चेहरे खिल गए ,वहां एक गाय बैठी थी। पर गाय को गन्दगी पसंद नहीं थी। वो बिलकुल साफ़-सुथरी जगह पर बैठी थी। गोबर वह तबेले में कर के आयी थी। अब जब हम तबेले तक पहुँच गए तब मुझे ख्याल आया, 'गोबर लेकर कैसे जायेंगे ? हमने तो कुछ लाया ही नहीं था ' ये मुंबई का ड्राइवर उस पर से फैशनेबल युवा (लम्बे बाल थे उसके, हाइलाइट किये हुए ) कहीं गाडी लगा कर कह दे 'आ गया तबेला ,जाइए  गोबर ले आइये ' कल्पना से ही मन सिहर गया। चन्दा दी बड़ी थीं उन्हें कैसे कहूँ, और मैं कोई फिल्म या रियलिटी शो तो नहीं कर रही थी जहाँ हिरोइन्स को ये सब करना पड़ता है (ओंकारा फिल्म में 'कोंकणा सेन' को गोबर से उपले पाथने थे और रिटेक पर रिटेक हुए जा रहे थे। रोते हुए अपनी माँ  'अपर्णा सेन' को फोन किया तो उन्होंने नसीहत दी ,' अभिनय का शौक अपनाया है तो ये सब झेलना ही पड़ेगा '.

मैंने ड्राइवर को मस्का लगाया और DDLJ फिल्म का डायलॉग मारा , "जरा आप  ही लेकर आओ न , कहते हैं शादी के घर में काम करने से सुन्दर लड़की मिलती है " ड्राइवर ने कहा, "मेरी शादी ऑलरेडी हो चुकी है " पर वो चला गया लेने और एक पौलिथिन भर के गोबर ले आया . अब घर पहुंचे तो मैंने कहा, 'दीवार पर पेपर चिपका देते हैं,उसके ऊपर गोबर लगा कर पूजा कर दी जायेगी '.(लड़के ने नया फ़्लैट लिया था , बल्कि पैरेंट्स ने खरीदवा दिया था कि  इधर-उधर पैसे न वेस्ट करे ) पंडित जी तैयार भी हो गए (और जगह भी लोगो ने ऐसा करवाया  होगा ) 
पर सीमा के पिताजी ने कहा, "नहीं, पूजा तो विधिवत दीवार पर ही होगी, क्या हुआ जो दीवार खराब हो जायेगी, फिर से पेंट करवा लेगा, शादी तो एक ही बार होती है ,ये सब शुभ है ' माता--पिता के बीच बैठा 'रिशु ' सर झुकाए बेबसी से सर हिला  रहा था। 

तब तक सीमा की छोटी बहने भी आ गयीं, उनलोगों ने भी मुझे पहचाना लिया था पर हैरान हो गयी थीं, मुझे वहाँ देख। जबकि मैंने तो किसी को नहीं पहचाना . सबको फ्रॉक में देखा था। 'सुषमा' जो तब नवीं कक्षा में थी ,आज उसका बेटा नवीं  में है। डिम्पल पांचवी में थी,और आज एक बेटे को गोद में लिए दुसरे की ऊँगली थामे खड़ी  थी। सब पुराने दिन याद  कर रहे थे। डिम्पल बता रही थी," हमेशा सीमा दी एक चिट्ठी लेकर आपके यहाँ दौड़ा देती .(तब फोन तो थे नहीं,छोटे भाई बहन ही सन्देश पहुंचाने  का काम किया करते थे )  एक बार बारिश हो रही थी,सीमा दी बीमार थी  और मैं छाता लेकर सीमा दी की चिट्ठी आपको देने  आयी थी। मैंने आपसे कहा था, 'सीमा दी अपनी किताबों पर सुन्दर सुन्दर हीरो हिरोइन, फूलो के कवर लगाती है, मुझे नहीं देती 'और आपने धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान से कई पेज निकाल कर मुझे दिए थे "(तब हमलोग ब्राउन पेपर खरीद कर किताब कॉपियों पर कवर नहीं लगाते थे) 
सुषमा ने अटकते हुए कहा, "आप रश्मि रवि...रविजा नाम से मैगजीन में लिखती थीं न, अब भी लिखती हैं ?" अच्छा हुआ तीन साल पहले वो नहीं मिली वरना मुझे होंठ बिसूर कर जबाब देना पड़ता ," वो सब तो कब का छूट गया " 

हमलोग बातों में ही थे कि सीमा की भाभी आयी, "चलिए सबलोग 'मटकोर' की रस्म करनी है " इस रस्म में वर, वर की माँ और बाकी महिलायें ,तालाब या नदी के किनारे पूजा करने जाती  हैं। उनमे से दो औरतें सर पर घड़ा लेकर जाती हैं और नदी/तालाब से पानी भरकर सर पर रखकर लाती हैं। सबने मुझे आगे कर दिया। आप सीमा दी की सहेली  हैं,आपको तो सर पर घड़ा लेकर जाना ही होगा। सीमा की भाभी हाथों में सिंदूरदान लेकर आयी और नाक से लेकर सर तक सिंदूर लगा दिया। मैं प्लीज़ प्लीज़ कहती रह गयी पर सबका कहना था, फ्रेंड का बेटा यानि आपका बेटा , ये सब तो करना ही पड़ेगा। 
अब यहाँ नदी तालाब कहाँ, स्विमिंग पूल के किनारे पूजा करना तय हुआ। स्विमिंग पूल भी गैरेज के ऊपर बना हुआ है ,जहाँ कई सीढियां चढ़ कर जाना पड़ता है। स्विमिंग पूल के किनारे पूजा संपन्न हुई। वहीँ पास लगी फूलों की क्यारियों से थोड़ी मिटटी निकाल कर 'मटकोर' की रस्म पूरी की गयी। और स्विमिंग पूल से घड़े में पानी भरकर सर पर लिए हम लिफ्ट से बारहवीं मंजिल पर पहुंचे। 
यह अनुभव भी क्यूँ बाकी रहे, नदी-कुआँ-तालाब से घड़ा भर कर पानी लाना किस्से कहानियों फिल्मो में होता है . हकीकत में तो स्विमिंग पूल से भरा जाता है। :)

एक धान कूटने की रस्म भी होती है। जिसमे वर के साथ पांच औरतें आँगन में ओखली में मूसल  से धान कूटती हैं। यहाँ, बालकनी में स्टील की छोटी सी ओखली मूसल  रखी गयी  जो हर किचन में होती है, उसे छह लोग पकड़ें कैसे? एक ने दो ऊँगली से पकड़ा और बाकी लोगों ने उसके ऊपर अपनी अपनी ऊँगली रख दी। छह लोगों का छोटी सी बालकनी में खड़ा होना ही मुश्किल हो रहा था। चाहे जिस रूप में हो पर रस्में  सारी करनी थीं। बस मंगल गीतों की कमी खल रही थी। किसी को गीत आते ही नहीं। रिशु भी अच्छा बच्चा बने औरतों से घिरा सर झुकाए सारे रस्म चुपचाप किये जा रहा था . हमें तो बहुत मजा आ रहा था . पर ये सब शायद हमारी पीढ़ी तक ही सीमित रह जाए . न तो हमें इतने डिटेल में रस्में याद रहने वाली हैं कि अगली पीढ़ी को बताएं और न ही वो सब ये सारी  बातें मानने वाले हैं। 

वैसे भी यह शादी बहुत अलग सी है। शादी की रस्मों की शुरुआत सीमा ने अपने ससुराल 'दरभंगा' से की। वहां कुल देवता की पूजा की। मुंबई में 'हल्दी - मटकोर' की रस्म की .प्लेन से बारात भुवनेश्वर गयी, जहाँ शादी की रस्में होंगी । और शादी के बाद की रस्मे और रिसेप्शन 'कटिहार' में 

आज 14 फ़रवरी को प्रेम दिवस के दिन दोनों बच्चे विवाह सूत्र में बंधने जा रहे हैं। उन्हें ढेरों आशीर्वाद और असीम शुभकामनाएं .

70 comments:

  1. क्या बात..
    बहुत सुंदर
    शुभकामनाएं

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया महेन्द्र जी

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  2. अरे दीदी, आप तो पेंटर हैं. खूब रच-रच के आलता लगाया होगा.
    और गोबर का तो मज़ेदार किस्सा मेरे पास भी एक है. हमलोग जब बाऊ के रिटायरमेंट के बाद गाँव शिफ्ट हुए तो पता चला कि दीवाली में वहाँ गोबर के लक्ष्मी-गणेश बनाकर उनकी पूजा होती है. पहले साल तो हमने दीवाली चाचा जी के यहाँ मनाई, जब अपने घर में शिफ्ट हो गए तब तो खुद ही मनाना था. दीदी तो पूजा-वूजा करती नहीं. तो मुझे ही गोबर के लक्ष्मी-गणेश बनाकर पूजा करनी पड़ी. अब हैं तो हमारे यहाँ सभी नास्तिक. लेकिन इसे लोक-संस्कृति का हिस्सा मानकर पूजा कर ली :)
    शादी में भी हमारे यहाँ बड़ी रस्में होती हैं और ब्याह कराने वाले पंडित लोग ऐसे ही परेशान करते हैं छोटी-छोटी पूजा सामग्री को लेकर :)

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    1. न मुक्ति , अपनी कला नहीं दिखा पायी न तो वहां कोई ब्रश था न कोई लकड़ी का टुकडा ही, रुमाल का कोन मोड़ कर कैसे आलता लगाया ,मुझे ही पता है।
      और मुझे पता नहीं था कि इतनी रस्में होने वाली हैं, इसलिए सफ़ेद और हरे रंग का सलवार कुरता पहन कर चली गयी थी ( मन में यह ख्याल भी था, सास बनाने जा रही हूँ,जरा सोबर कपडे पहनने चाहिए।)
      पूरे समय डर बना रहा अगर रंग का एक छींटा भी पड़ा तो मेरी ड्रेस बर्बाद हो जायेगी :)

      पंडितों के तो यही दिन होते हैं,अपनी उँगलियों पर पूरे घर वालों को नचाते हैं :)

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    2. रश्मि जी

      शायद ये आप का पहला मौका था आलता लगाने का इसलिए आप को पता नहीं की शहरों में इयर बड या रुई को किसी चीज में लगा कर लगाते है , यहाँ मुंबई में नाउन' क्या प्रनाउन भी नहीं मिलती है :) एक बार पूजा में में मुझे भी अपनी रिश्ते की सास को लगाना था तो हाथ कौन गंदे करे इयर बड से लगाया बहुत पतला लगा तो दो ले लिए :))

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    3. ना अंशुमाला,
      आलता तो साल में एक बार लगाती ही हूँ, तीज में . पर मैं ब्रश से लगाती हूँ क्यूंकि पेंटिंग की वजह से पास में कई सारे ब्रश हैं, और फिर लम्बी ब्रश होने की वजह से हाथ तो बिलकुल गंदे नहीं होते।

      वहां 'इयर बड्स ' का भी किस्सा हुआ . जब किस चीज़ से आलता लगाई जाए ये उलझन हो रही थी तो सीमा बड़े शान से एक पैक डब्बा लेकर आयी और कहा, लो ये 'इयर बड्स ' का डब्बा है इस से लगा लो . अब मैं उसे खोलने की कोशिश करूँ तो वो खुले ही न। बालकनी में थोडा अँधेरा सा भी था। उसकी बेटी ने भी खोलने की कोशिश की ,उस से भी नहीं हुआ तो वर महोदय को कहा गया। उसने एक दो बार घुमा कर खोलने की कोशिश की और फिर कमरे में उजाले में जाकर देखा तो वह बिलकुल एक पैक डब्बे सा दिखता कैंडल था :)

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  3. dono ko dher saari shubhkamnaayein aur aapki sindoor wali pic sach mein bahut cute hai

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    1. ही ही सोनल तुम भी न, पर हाँ, वो फोटो अलग सी तो है ही :)

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  4. सममुच मध्‍यवय पीढ़ी पर पुरातन संस्‍कृति और आधुनिकता के साथ संतुलित स्‍थापित करने का बहुत बड़ा दबाव है। अपने अस्तित्‍व आधार अर्थात् अपनी संस्‍कृतियों को याद रखने और निरन्‍तर आगे बढ़ाने के क्रम में हमें इस दबाव को अपना दायित्‍व मानना होगा। बहुत बढ़िया रश्मि जी। क्‍या साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान में आपने श्री बल्‍लभ डोभाल की कहानियां भी पढ़ी हैं?

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    1. श्री बल्‍लभ डोभाल की कहानियांपढ़ी तो जरूर होगी, विकेश जी, पर याद नहीं आ रहा :(

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  5. बड़ा मज़ा आता है तुम्हारी पोस्ट पढने में....
    कहानियाँ कहने का हुनर है तुम्हारे पास....रस्मों रिवाज़ से वाकिफ हुए सो अलग...
    बच्चों को हमारा भी आशीष पहुंचे.

    सस्नेह
    अनु

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  6. बच्चो के विवाह के लए शुभकामनाये.. ऐसे रस्म जिसका अर्थ या उद्येश्य के बारे में न आपको पता है ना कराने वालों को, भूल जाना ही श्रेयष्कर है.
    Latest post हे माँ वीणा वादिनी शारदे !

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    1. धीरे धीरे अपने आप ही ख़त्म होती जा रही हैं, ये रस्में।

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  7. धीरे धीरे अब पंडितों ने भी कम से कम शहरों एमिन सुधार कर लिया है ... पर हां अगर शादी रस्मों रिवाजों से हो तो उसका अपना ही मज़ा रहता है ...
    बहुत अच्छी लगी आपकी पोस्ट ...

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    1. हाँ,रस्में समझ में आये न आये पर एन्जॉय सब करते हैं :)

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  8. a well documented post i may say holds the attention all thru

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  9. >>पर ये सब शायद हमारी पीढ़ी तक ही सीमित रह जाए . न तो हमें इतने डिटेल में रस्में याद रहने वाली हैं कि अगली पीढ़ी को बताएं

    अरे ! याद रखने में क्या दिक्कत है ... अगली पीढ़ी को बस 1 लिंक फॉरवर्ड कर दिया जायेगा .....2 रस्मे ..धान कूटना और मटकोर तो आपकी पोस्ट से ही रेफेर हो जाएँगी .. बाकी सारी जो भी याद आती जाएँ आप उन पर भी पोस्ट लिख डालिए जल्दी से .....

    >> और न ही वो सब ये सारी बातें मानने वाले हैं
    हाँ मानना या न मानना उन पर ही है ..... रोचक पोस्ट ..!

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    1. हा...हा सही कहा अब एकाध ब्लॉग शादी , मुंडन, आदि के रस्मों को समर्पित होनी चाहिए। जिसके घर में ये समारोह हो झट से प्रिंट आउट लेकर उसके अनुसार रस्में कर ले :)

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  10. रोचक विवरण से भरी पोस्ट, जो चीजें मानकर बैठे होते हैं, वही नहीं मिल पाती है।

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    1. हाँ,ऐसा ही होता है

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  11. so beautifully written with pictures . read all . thanks for sharing .

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  12. पोस्ट पढ़ कर लगा की जैसे हम भी शादी में मौजूद है :) वाकई ऐसे शहरों में किसी भी पारंपरिक कार्यक्रमों में बड़ी परेशानी होती है , खल , बट्टा चकरी , मुसर, ढोलक , सूप न जाने कितनी ही चीजे यहाँ नहीं मिलती है , मेरी बिटिया तो बारात और कुए जैसे शब्दों से भी अनजान थी ।

    हमारे यहाँ भाई दूज पर आंगन में काफी सारी आकृतिया गोबर से बना कर पूजा की जाती थी बुआ के बाद उसे बनाने का हमारा नंबर आया शुरू में गोबर छूने में मन ख़राब हो जाता था किन्तु एक बार जब बनाना शुरू करने के बाद सब ठीक हो जाता था, मेरे विवाह के बाद जब एक बार अपने घर गई तो देखा छोटी चचेरी बहने पैलोथिन से बने दस्ताने आते है उन्हें पहन कर बना रही थी ।

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    1. लोग तो कहते हैं कि मुंबई में सबकुछ मिलता है बस पता होना चाहिए ,कहाँ मिलता है।
      मैं भी शायद आपकी बहन की तरह दस्ताने पहन कर ही बनाती :(

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  13. शुभकामनायें वर वधु को...

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    1. शुक्रिया सतीश जी

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  14. वाह !
    पढ़कर मज़ा आगया। याद आ गया हमको भी 'मट कोड़ '..अरे हम भी गए थे अपने भाई की शादी में सिर पर घड़ा रख कर कुआँ पर, फिर बाएँ हाथ से केहुनी में रस्सी लपेट लपेट कर पानी भरना पड़ा था ...बायें हाथ से ही मिटटी भी कोडनी पड़ी थी, कितना अद्भुत अनुभव था। हम तो सब कर लेते हैं, गोबर पाथना से लेकर गोइंठा जोरना तक। सबसे निमं लग रहा है तुम्हरा सेंदूर ..नाक से लेकर मांग तक :)
    स्विमिंग पूल में मट कोड़ !! कमाल हो गया। याद आया हमको जब हम मारीशस में थे वहाँ गंगा नहीं है लेकिन लोगों ने गंगा तालाब ही बना लिया है। जहाँ चाह वहाँ राह मिल ही जाती है। बात बस श्रद्धा की है।

    बहुत ही खूबसूरत पोस्ट है, हम कोई नयी बात नहीं कह रहे हैं, लेकिन कहने को दिल किया तो हम कह दिए, ई म हमरा का कसूर है जी ! :)
    हाँ नहीं तो !

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    1. @ बाएँ हाथ से केहुनी में रस्सी लपेट लपेट कर पानी भरना
      बाप रे !!अच्छा था, वहां कुआँ नहीं था ,स्विमिंग पूल ही भला . हमने तो मजे से घड़ा डुबोया और पानी भर लिया :)

      @हम तो सब कर लेते हैं, गोबर पाथना से लेकर गोइंठा जोरना तक।
      हाँ हाँ क्यूँ नहीं कनाडा में गोइठा जोर के ही तो भात पकाती हो :)

      कभी तुम्हारी भी सेंदुर वाली ऐसी ही तस्वीर देखने की तमन्ना है। मेरे बेटे की शादी में आना :) तुम हमसे कहीं जियादा नीमन लगोगी :)
      हाँ नहीं तो !!

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    2. अरे कनाडा में गोइंठा नहीं जोरते हैं, बाकी जोरना पड़े तो टेकनीक जानते हैं, गोइंठा पाथने में भी एस्पार्ट हैं हम ..ई न बता रहे थे बुद्धू :)
      आउर हम हमरा बेटा लोग का सादी में नहीं आबेंगे तो डांस-उन्स कैसे होबेगा :):)

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  15. अरे ! एक बात हम भूलिए गए, पोस्टवे ऐसा लिखती हो तुम की सब भुलवा देती हो :)
    हैपी वेलेंटाइनस डे ! :)

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    1. तुमको भी बहुत हेपी हेपी वेलेंटाइनस डे !!
      हमरे हियाँ त अब ख़तम होने को आया ,तुमरे हियाँ तो अभी सुरुये हुआ है न , खूब मनाओ पर स्काइप पे {तुमरे वेलेंटाइन त साउथ अफ्रीका में बइठे हैं,न :)}

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    2. आज कल हमलोगों का रुस्सा-रुस्सी चल रहा है :):)
      येही खातिर वेलेंटाइन डे कैंसिल है :):)

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  16. इश्क़ की दास्ताँ है प्यारे ... अपनी अपनी जुबां है प्यारे - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया

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  17. दोनों को बहुत बहुत शुभकामनायें, यही तो मज़े है दोस्तों के घरों में होने वाली शादियों के... :)

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    1. सच पल्लवी जी, बिलकुल वी आई पी थे हम,मजा तो आना ही था
      सहेली से ज्यादा तो उसके माता -पिता खुश थे .

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  18. बहुत प्यारा संस्मरण है रश्मि जी ! इसका एक वीडियो बनवा कर पोस्ट कर देतीं तो और मज़ा आ जाता ! वसंत पंचमी की आपको हार्दिक शुभकामनाएं !

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया ,साधना जी ,
      वीडियो तो उनलोगों ने बनाया ही होगा।
      मैंने तो सोचा नहीं था, ऐसी कोई पोस्ट लिखूंगी वरना कुछ और रोचक तस्वीरें लेती .

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  19. थोड़ी जद्दोजहद तो है ही ...रहेगी भी, नवयुगल को हार्दिक शुभकामनायें

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  20. हमें तो शादी में गये हुए ही अरसे हो गये, कोई बुलाता भी है तो समय की मारामारी होती है, आपकी लेखनी ने तो हमें भी शादी मॆं शामिल करवा दिया, बहुत कुछ पुराने वाकये याद आ गये :)

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    1. शादी -ब्याह में शामिल होने के लिए समय जरूर निकालना चाहिए। काफी लोगों से एक जगह ही मुलाक़ात हो जाती है और माहौल ऐसा होता है कि आप बिलकुल रिफ्रेश हो जाते हैं।

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  21. आनन्‍द आया। बिहार के रीतिरिवाज जानकर और भी अच्‍छा लगा।

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  22. स्मों का सरलीकरण कर भी इन्हें निभाया तो जाता है . हमारी पीढ़ी तो फिर भी थोडा बहुत जानती है , आगे क्या होगा .
    रस्मों से सम्बंधित चीजे शहरों में भी मिल जाती है , बस दाम देने पड़ते हैं , गांवों में यह सब स्नेहवश मुफ्त उपलब्ध कर दिया जाता है .
    रोचक तस्वीरें :)

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    1. हाँ, पहले तो गाँव के किसी लड़की की शादी मानो पूरे गाँव की लड़की की शादी, सब लोग अपनी सामर्थ्यानुसार मदद करते थे।पर अब तो वहाँ भी सब कुछ बदल रहा है

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  23. वाह...मज़ा आया पढ़ कर ... शहर और गाँव की संस्कृति एकदम गड्ड मड्ड हो रही है ...संक्रमण काल है ... गाँव मे सूट बूट टाई लगा कर दुल्हा पटे पर बैठा हुआ अजीब लगता है। धोती कुर्ते वालों को खड़े हो कर खाना पड़ रहा है। कई जगह पूरी बारात मे टाई बाँधने वाला नहीं मिलता। वास्तव मे विवाह के समय जीविका के लिए आवश्यक सभी चीज़ें रस्मों के रूप मे निभाई जाती हैं... यज्ञोपवीत से लेकर खेती बाड़ी, कुआँ पोखर, गाय बछरू, घर द्वार ... सब कुछ कहीं न कहीं रस्मों मे सांकेतिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही हैं। धीरे धीरे बहुत कुछ लुप्त भी हो रहा है ... जहाँ पहले तीन दिन बारात रुकती थी...महफिलें सजती थीं, शास्त्रार्थ होते थे, मान मनुहार के दौर चलते थे... बहुत कुछ बदल रहा है ... कुछ विशेष लोगों के अलावा शादी अब खाना खाने और लिफाफा थमाने तक सिमट गयी लगती है।

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    1. @ वास्तव मे विवाह के समय जीविका के लिए आवश्यक सभी चीज़ें रस्मों के रूप मे निभाई जाती हैं.

      हाँ, ये बात सही कही आपने, यही वजह होगी, हर चीज की किसी न किसी रूप में पूजा की जाती है।

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  24. दीदी...आपके फेसबुक पर जब तस्वीरें देखी थी मैंने तब ये मालुम नहीं था की ये आपकी वही दोस्त हैं जो आपसे इतने सालों बाद मिलीं...हाँ मैंने भी पढ़ी थी वो पोस्ट और वो पोस्ट भी मुझे बहुत पसंद आई थी....
    आपने तो एकदम शादी के माहौल में मुझे पहुंचा दिया....बहुत बहुत पसंद आया ये पोस्ट मुझे!!!

    मेरी तरफ से भी उन्हें ढेरों शुभकामनाएं!! :)

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    1. शुक्रिया अभिषेक :)

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  25. सही ऐडवेंचर रहा। पित्स्बर्ग की एक शादी याद आई जिसमे फेरे कराने के लिए अग्निकुंड मेँ कई बड़ी-बड़ी मोमबत्तियाँ जलनी पड़ी थीं। बेचारे पंडित जी को ये भी पता नहीं कि भारत के बड़े नगरों मेँ लोग गाय का बताकर भैंस का गोबर बेच देते हैं ...

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    1. अब ये तो तबेले वाले का ईमान जाने. वैसे बेचते नहीं हैं, गोबर यूँ ही दे देते हैं .
      हवन कुण्ड में मोमबत्तियां , यह भी खूब रही :)

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  26. रश्मि जी,ये तो बहुत सजीव सा वर्णन किया आपने।बहुत सी चीजें धीरे धीरे ही समझ आती है।मुझे कुछ समय पहले तक लगता था "पीले चावल भेजना" मतलब कोई मुहावरा होता है निमंत्रण देने के लिए लेकिन बाद में पता चला कि विवाह आदि पर बुलावा भेजने के लिए कभी सचमुच पीले चावल भेजे जाते थे।खैर हम तो आपको उन्ही रस्मों के बारे में बताऊँगा जिनमें मैं खुद कई बार शामिल हो चुका हूँ।एक रस्म में तो जब दूल्हा तोरण मारने के बाद जैसे ही घोडी से उतरता है तो लड़की और लड़के पक्ष के लड़कों में तुरंत घोडी पर चढने के लिए जोर आजमाईश शुरू हो जाती है।जिस पक्ष का लडका घोडी पर बैठने में सफल हो जाता है वही विजेता होता है और कुछ नेग लेकर ही उतरता है।छोटा था तब मैं भी कई बार बैठने में सफल रहा हूँ।एक बार मामा के लड़के की शादी में तो इस रस्म के दौरान घोडी ही बिदककर भाग गई थी।

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    1. बहुत ही मजेदार रस्म है यह तो :)

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  27. और दूसरी रस्म बडी मजेदार है।यह तब निभाई जाती है जब वधू अपने ससुराल पहली बार आती है उसे अपने कुलदेवता के दर्शन के लिए ले जाया जाता है इसके बाद वहाँ दुल्हन और उसके जितने भी देवर है उनके बीच एक खेल खेला जाता है जिसमें दुल्हन और देवर के हाथ में एक एक पतली गीली सी संटी (छडी) दे दी जाती है।इसके बाद दोनों एक गोले में घूमते रहते हैं और एक दूसरे की टाँगों पर छडी से मारते रहते है इस दौरान महिलाएँ गीत गाती रहती हैं और देवर भाभी को बीच बीच में जोर जोर से छडी मारने के लिए उकसाती रहती हैं।फिर एक एक कर सारे देवरों की बारी आती है।केवल नई दुल्हन ही नहीं पुरानी भाभियों के साथ भी इस समय ये खेल खेला जाता है।महिलाएँ जिस तरह के लहँगे वगैरह पहनती है उन पर तो छडी का असर नहीं होता पर जींस में हमारी हालत खराब हो जाती है :)
    इसमें तो मैं अभी तीन दिन पहले भी शामिल होकर आया हूँ और अभी भी टाँगों में थोडा थोडा दर्द हो रहा है।एलीट शहरी लोगों को शायद इनके बारे में पता न हो और वो सही भी न मानते हों लेकिन हम राजस्थानियों को तो असली आनंद ऐसी रस्मों में ही है।

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    1. इन सारी रस्मों के पीछे कोई न कोई वजह जरूर होती है.
      शायद नयी दुल्हन का संकोच दूर भगाने और घर वालों से जल्दी हिल-मिल जाने के लिए ,यह रस्म निभाई जाती है.

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  28. jo rashme ham apne shaadi ya apne gaaon me dekhte aaye, usko mumbai me kaise nibhaya gaya, padh kar achchha laga... :)
    shubhkamnayen.....

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  29. रश्मि तुम्हारी पोस्ट छूटती नहीं ....जीवंत कर देती हो सारा माहौल ....बहुत सुन्दर ..बस एक शिकायत है ...बतातीं नहीं .....

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  30. होफ्फ ! एक मजेदार संस्मरण पूरा पढ़ने के चक्कर मेँ मेरे कई जरूरी काम छूट गये .
    बाकी पूरे पोस्ट मेँ सिर्फ एक बात सबसे सबसे सबसे जादा मजेदार रही :-) 8-)

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  31. गोबर वाला प्रसंग रोचक रहा और हाँ पोस्ट पढ़कर याद आया कि मैंने भी जिद करके अपनी शादी में किसी को पैरों में रंग लगाने नहीं दिया था।

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    1. मनीष जी,
      @किसी को पैरों में रंग लगाने नहीं दिया था।

      किसी ख़ास को ??:)
      पर क्यूँ भला, परमा फिल्म याद आ गयी, पैरों में आलता लगाने वाले दृश्य कितनी खूबसूरती से फिल्माए गए हैं
      अच्छे ही लगते हैं, कभी कभी आलता लगे पैर .

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  32. इतना कुछ होता है क्या ! :)

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    1. हा...हा.. क्यूँ नहीं ये तो सिर्फ एक दिन की रस्म का किस्सा है, शादी के दो दिन पहले से दो दिन बाद तक ढेर सारी रस्में होती हैं .

      हमें तो तस्वीर साफ़ नज़र आ रही है,
      बहुत सारी महिलाओं से घिरे, घड़े पर सुपारी लगा चाक़ू रखे, पानी की धार को को काटते हुए अभिषेक साफ़ दिख रहे हैं :)

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