Saturday, January 5, 2013

संवेदनाएं जगाने के लिए किसी क़ानून की जरूरत नहीं

दामिनी / निर्भया के साहस और बलिदान ने हमारे देशवासियों को जैसे सोते से जगा दिया है। अब ये बात दीगर है कि कब तक ये आँखें खुली रह पाती  है। नए क़ानून का निर्माण , मौजूद कानूनों को सख्ती से लागू करना, दोषियों  को कड़ी सजा देना , महिला पुलिस की नियुक्ति जैसी बातें हो रही हैं .कितनी तत्परता से इन्हें  लागू किया जाएगा , ये कितनी सफल होगीं .यह तो आने वाला वक़्त ही बतायेगा। 

पर इस आन्दोलन ने इतना जरूर किया है कि जो विषय परिवार के बीच  वर्जित था। जिस पर बात  करने से लोग कतराते थे। चर्चा करते भी थे तो बड़े  ढंके छुपे शब्दों में ,अब खुलकर इस पर बात हो रही है। कम से कम समाज यह स्वीकार तो कर रहा है कि इस तरह की व्याधि समाज में व्याप्त है। रुग्ण  मानसिकता वाले लोग समाज में हैं। लडकियां यह सब झेल रही हैं। अगर किसी लड़की के साथ छेड़छाड़ होती है तो दोष उस लड़की का नहीं है, चुप उसे नहीं रहना है बल्कि उस अपराधी को चुप कराना  है . पर अब तक बिलकुल उल्टा होता आया है। लडकियां भी इसे शर्म का विषय मान कर चुप रहती आयी हैं और दुराचारियों की हिम्मत इस से बढ़ी ही है। 

अमेरिका में रहने वाली एक भारतीय लड़की ने बहुत ही व्यथित और आक्रोशित होकर  अपने अनुभव शेयर किये हैं। वह उन्नीस वर्ष की थी, एक शाम बस से घर लौट रही थी। पास खड़े एक आदमी ने उसे हाथ लगाया उसने जोर से चिल्ला कर विरोध प्रकट किया और उस आदमी को डांटा . उसके साथ पहले भी जब किसी ने ऐसी हरकत की थी ( पब्लिक ट्रांसपोर्ट में यह आम है ) उसके चिल्लाने पर कंडक्टर उस आदमी को बस से उतार देता था। वह खुश हो जाती  कि 'उसने विरोध किया, उस आदमी को सजा मिली और अब वह ऐसी हरकत नहीं करेगा।'

 इस बार भी वह लड़की कुछ ऐसी ही अपेक्षा कर रही थी पर इस कंडक्टर ने कहा, "दूसरी जगह जाकर खड़ी  हो जाओ"
उस लड़की ने कहा, "मैं क्यूँ दूसरी जगह जाऊं?? आप इसे बस से उतरने के लिए कहिये" और उसी वक़्त पास खड़े उस आदमी ने उस लड़की को चूम लिया " पूरी बस चुपचाप तमाशा देखती रही . ये लड़की गुस्से में चिल्लाती रही,वह आदमी  मुस्कुराता  रहा और बस के लोग चुपचाप देखते रहे (उसमें महिलायें भी होंगी ) पर यह उनकी बहन या बेटी नहीं थी ,इसलिए सब चुप थे। उसके लगातार गुस्सा करने  पर कंडक्टर ने उस लड़की को ही  बस से उतार दिया। 

इस लड़की ने बस का नंबर  नोट किया। घर आकर पिता को बताया .पिता उसे लेकर पुलिस स्टेशन जाना चाहते थे पर उसकी माँ ने कहा 'एक टीनेज लड़की को लेकर पुलिस स्टेशन जाना ठीक नहीं, और फिर लोग पता नहीं क्या बातें बनाएं' (माँ का सोचना भी गलत नहीं था, समाज ही ऐसा है ) पुलिस स्टेशन फोन किया गया कि उनके पास बस का नंबर है वे ड्राइवर और कंडक्टर के खिलाफ रिपोर्ट लिखाना चाहते हैं . पिता को बार बार अपने 'गजटेड अफसर' होने का जिक्र करना पड़ा तब उनकी बात सुनने  को कोई तैयार हुआ। दस मिनट बाद एक महिला पुलिस ऑफिसर ने फोन करके कहा, " अगर हम FIR फाइल करते हैं तो वो आदमी तो पकड़ा नहीं जाएगा, हमें ड्राइवर और कंडक्टर को सस्पेंड करना पड़ेगा . ड्राइवर और पुलिस ने अपने युनियन में शिकायत कर दी तो वे स्ट्राइक पर चले जायेंगे .फिर स्ट्राइक  की बात  अखबारों में आएगी, आपका नाम आएगा, बेकार बदनामी होगी ,मेरी सलाह है भूल जाइये इस घटना को "

जब उसने कॉलेज में इस घटना के बारे में बताया तो एक लड़के ने उसके पीठ पीछे कहा, "पागल है क्या ये लड़की, इस तरह की बातें कोई बाहर में करता है ??", यही सबसे बड़ी गलती है हमारे समाज की। जो ऐसी हरकते करे ,उसे कुछ न कहा जाए  बल्कि शायद वह अपने दोस्तों में शेखी भी बघारे 'आज तो उसने ऐसा किया' पर जिसके साथ ऐसी हरकत की जाए वह लड़की चुप रहे। उस लड़की ने ये भी लिखा है कि इसके पहले कि  ये पढ़ते हुए लोग सोचने लगें कि मैंने क्या पहना हुआ था जो उस आदमी ने ऐसी हरकत की तो ये बता दूँ कि  मैंने सलवार कुरता दुपट्टा पहना हुआ था " 
शायद ये सब पढ़ते हुए यह ख्याल भी आये लोगो के मन में कि वह लड़की , कंडक्टर की बात मान कर दूर क्यूँ नहीं खड़ी  हो गयी ? अब भुगते जैसा दामिनी के लिए भी लोगो ने कहा, उसे आत्मसमर्पण कर देना चाहिए था, उसने उस बस में लिफ्ट ही क्यूँ ली? लोग ये नहीं सोचते कि पूरी भरी बस में से लोगो ने उस आदमी को पीट क्यूँ नहीं दिया। कम से कम वह आगे ऐसी हरकत करने से तो डरता पर छोड़ देने से तो उसे और बढ़ावा ही मिल गया। 
 आखिर लडकियां कब तक ऐसी हरकतों को नज़रंदाज़ कर दूर जाकर खड़ी  होती रहें। अगले कितने साल, अगली कितनी सदी तक???

उस लड़की ने आगे लिखा है, "पिछले आठ साल से वह इस घटना को भूलने की कोशिश कर रही है। पर उस आदमी  की वह हरकत और उपहास भरी हंसी वह भूल नहीं पायी है। उस आदमी को सजा देना चाहती है,उसकी हंसी छीन लेना चाहती है ". वह इतनी दुखी है कि कहती है ,'अच्छा है अब मैं अमेरिका में हूँ और मैं नहीं चाहती कि  वापस लौटूं और अपनी बेटी को ऐसे माहौल में बड़ा करूँ ?"
क्या हम उसे ऐसा सोचने के लिए स्वार्थी कह सकते हैं ? नहीं कह सकते क्यूंकि हम सब यहाँ स्वार्थी हैं। जब तक खुद पर न गुजरे निरपेक्ष बने रहते हैं।

उस लड़की को यह सब झेले तो आठ साल ही हुए हैं, इसके मुकाबले एक छोटी सी घटना ही है ,पर उस  घटना को पच्चीस साल हो गए हैं फिर भी मुझे  अक्सर ख्याल आता है कि लोग ऐसे उदासीन कैसे हो सकते हैं ? 

मैं कॉलेज में थी और 'तिलैया सैनिक स्कूल' में पढनेवाले अपने भाई से मिलकर माँ  के साथ बस से 'तिलैया'  से 'रांची'  जा रही थी। बस में चढ़ी तो बस बिलकुल खाली सी थी। बहुत कम लोग थे पर जितने भी लोग थे, पूरी बस में पसरे हुए थे। सबने विंडो सीट ली हुई थी। हर सीट पर अकेला आदमी बैठा था पर खिड़की के पास।माँ ने,  सबसे आग्रह किया कि किसी दूसरे  के साथ बैठ जाएँ . विंडो  सीट मुझे दे दें, मैं खिड़की के पास बैठ जाती , माँ मेरे बगल में बैठ जातीं तो मैं सुरक्षित रहती .पर एक आदमी भी अपनी सीट से नहीं उठा, उदासीन सा सर उठा कर दूसरी सीट की तरफ इशारा करता, 'उनसे कहिये न, उठने को ' वो आदमी दूसरे से कहता पर कोई अपनी जगह से नहीं हिला  क्यूंकि उनके घर की कोई लड़की तो थी नहीं, वे क्यूँ परवाह करें। कंडक्टर ने माँ से कहा ,आप बीच में बैठ जाइये  लड़की  को किनारे बिठा दीजिये "  पर मुझे उन सबको देख कर इतना गुस्सा आया था कि मैं बस से उतर गयी और दूसरे  बस का इंतज़ार करने लगी कि उसमें तो कोई महिला यात्री होगी। दूसरी बस में महिला यात्री भी मिल गयीं और मुझे विंडो सीट भी।  मेरे दो घंटे जरूर बर्बाद हो गए।
पर यह घटना मुझे अक्सर याद आती है, आखिर उस बस में  सवार लोग एक संस्कारवान मध्यमवर्गीय परिवार से ही होंगें पर इतने उदासीन  कैसे हो सकते हैं ? 

सरकार से नए कानून  बनाने की , दोषियों को कड़ी सजा देने की ,महिलाओं के सुरक्षित माहौल की मांग तो हम जरूर कर रहे हैं पर इस से पहले हमें एक समाज के रूप में जागना होगा। अपने परिवार से आगे बढ़कर सोचना होगा। 
यह प्रण  लेना होगा, किसी भी पब्लिक प्लेस पर किसी लड़की को कोई तंग करे तो गर्दन घुमा कर दूसरी तरफ नहीं देखने लगेंगे बल्कि चारों तरफ एक बार नज़र घुमा कर पहले ही देख लेंगे कि कोई लड़की अपने पास किसी की उपस्थिति से असुविधाजनक तो महसूस नहीं कर रही . 

रास्ते के किनारे किसी घायल को पड़े देख नज़रें फेर आगे नहीं बढ़ेंगे, ये नहीं सोचेंगे कि अभी घर जाकर जल्दी सोना है क्यूंकि कल ऑफिस जाना है, बच्चों को सुबह स्कूल भेजना है। एक दिन बच्चे स्कूल नहीं गए, बॉस की डांट खा ली तो ज़िन्दगी नहीं रुक जायेगी पर समय पर किसी की मदद नहीं की तो उनकी ज़िन्दगी जरूर चली जायेगी। जितने लोग इस आन्दोलन में शामिल हुए , अपनी प्रतिक्रियाएं दीं , दुखी हुए अगर उतने लोग ही अपने आस-पास का माहौल बदलने की शुरुआत कर दें तो कुछ तो बदलेगा .

इन सबके लिए कोई कानून बनाने की जरूरत नहीं है। 

हम थोड़ी सी अपनी संवेदनाएं जगायेंगे , दूसरों की मदद के लिए आगे आयेंगे ,अपनी सोच बदलेंगे तो  आस-पास अपने आप बदलने लगेगा। और दुनिया रहने लायक बनने लगेगी तब इस देश की कोई बेटी दुखी होकर नहीं कहेगी कि 'मुझे अपने वतन नहीं लौटना.'

31 comments:

  1. संवेदनाओ का पत्थर होना बेहद आम हो गया है

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  2. आपने दुखती राग पर हाथ रख दिया है... पब्लिक ट्रांसपोर्ट में ऐसी बातें आम हैं.. चिल्लाने पर लोग लड़की को ही घूर कर देखते हैं... जैसे उसने कोई क्राइम कर दिया हो...

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  3. दामिनी हादसे के बाद तो कोई भी मतलब जो लोग यहाँ है लंदन में वो भी ऐसा ही सोचने लगे है कि हमारे भी बेटियाँ हैं अब हम भला ऐसे माहौल के होते हुए भारत वापस लौटने के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं। जो आपने लिखा वो सच है "एक सभ्य समाज का निर्माण और सख्त कानून व्यवस्था ही इस समस्या का समाधान बन सकता है" मगर उस समाज के निर्माण के लिए लोग योगदान ही नहीं देना चाहते।

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  4. बहुत सारगर्भित आलेख...आज हमारी संवेदनाएं मर गयी हैं..ज़रूरी है कि हम बच्चों को शुरू से ही नारी का सम्मान करना सिखाएं..

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  5. इस तरह की घटनायें विश्वास डिगा देती हैं फिर भी प्रतिकार आवश्यक है।

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  6. मिलकर प्रतिकार तो करना ही होगा ये घटनाएँ हमारी सामाजिक और मानवीय संवेदनाओं पर प्रश्नचिन्ह लगातीं हैं

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  7. संवेदनाएं तो आंतरिक संरचना है .... आंतरिक संरचना कितनी गहरी है,कितनी उथली नज़रिए पर निर्भर है ! परिवर्तन खुद में आ जाये तो बहुत कुछ बदलेगा - निःसंदेह कानून बदले या ना बदले . दुर्घटना से किसी की छवि हम क्या बनाते हैं - यह हमारी सोच है और आस-पास यह मायने रखती है
    उस लड़की की एक एक बात सही है ..... अपना अनुभव भी इंगित करता है लोगों की प्रवृति को -

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  8. महिलाओं को बहुत सशक्त होना पड़ेगा । पुरुषों के हौसले बहुत बढे हुए हैं क्योंकि कोई प्रबल विरोध नहीं करता । 20/22 वर्ष की उम्र में एक बार मैं बस से यात्रा कर रहा था । मेरी सीट के आगे वाली सीट पर (विंडो साइड) एक 17/18 वर्ष की लड़की बैठी थी और उसके बगल में एक व्यक्ति 50 वर्ष से भी अधिक अवस्था का बैठा हुआ था । वह रास्ते भर उस लड़की के साथ गलत हरकत कर रहा था , उसके पीछे गर्दन की और से हाथ डालकर । लड़की कसमसाती हुई खिड़की की और दबी चली जा रही थी । मैं अगर शोर करता ,तब मेरी स्थिति यह थी चूंकि लड़की देख नहीं रही थी कि कौन उसे तंग कर रहा है, वह वृद्ध व्यक्ति मुझ पर आरोप लगा देता और सभी लोग उसी बुजुर्ग की बात मानते और मैं तो बुरी तरह पिट जाता । मैंने मौक़ा देख कर बहाने से बस रुकवाई और नीचे उतर गया । कंडक्टर को नीचे बुलाकर मैंने सारी बात बताई , उस पर उसने मुझसे जो कहा उसे सुनकर मेरे होश उड़ गए । वह कंडक्टर बोल , तुम खुद उस लड़की पर हाथ साफ़ करना चाहते हो ,क्या । मेरी आँखें भर आई । फिर भी मैंने उस बुजुर्ग व्यक्ति को जबरदस्ती वहां से उठाकर अलग बिठाया और उस लड़की के बगल बैठ गया और उसे बहुत डाटा कि ऐसी हरकत पर तुरंत विरोध करना चाहिए और दो थप्पड़ लगाने चाहिए । इस पर वह लड़की बोली .यह तो रोज़ की बात है , लड़के कम छेड़ते हैं , बुजुर्गवार बहुत तंग करते हैं । ऐसी मानसिकता है हमारे पुरुष प्रधान समाज की । महिलाओं को ही मुखर होना पडेगा ,ऐसी मानसिकता को समाप्त करने के लिए ।

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  9. चारों ओर सम्वेदनहीनता पसरी पडी है और अनवरत प्रसार पा रही है। आखिर लोगों में कर्तव्यनिष्ठा जागृत भी कैसे हो? निराशाजनक है!!

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  10. अच्छी सोच विकसित हुई है। यह आंदोलन पूरे भारत में और जोरदार ढंग से फैलना चाहिए था। जन- जन को यह एहसास हो जाना चाहिए था कि गलत हो रहा है, अब नहीं होना चाहिए।

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  11. बहुत ही संवेदनशील विषय पर आपका एक सारगर्भित आलेख |आभार

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  12. यदि समाज पृथक-पृथक इकाईयों में विभक्‍त होता, सब का अपना तन्‍त्र होता तो वे अपने अनुसार ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाते। परन्‍तु भारत या किसी अन्‍य लोकतान्त्रिक देश में समाज स्‍वयं में कुछ नहीं है। सर्वप्रथम सत्‍ता, तन्‍त्र, नेतृत्‍व है। इनके रहते जब समाज अपराधोन्‍मुख हो सकता है, तो अपराधमुक्‍त भी हो सकता है। लेकिन ये लोग बिगाड़ के खेल का जब खुद ही झण्‍डा थामे हुए हैं, तब इनसे यह आशा करना कि इनके नेतृत्‍व में त्‍वरित समाज-सुधारक कार्य होंगे, निरर्थक है। अपराधियों से कठोरता से निपटने की बात आते ही ये समाज को अहिंसा का पाठ पढ़ाने लगते हैं। तब कैसे रुकें अपराध।

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  13. यह प्रण करने का नहीं..बल्कि करने का समय है। सच तो यह है कि हममें से हरेक ईमानदार व्‍यक्ति इस घटना से पहले भी इसका प्रतिकार कर ही रहा होगा। हां पक्‍के तौर पर इसे और ज्‍यादा और बड़े पैमाने पर करने की जरूरत है।

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  14. कितना भी हम लिख लें वर्तमान में हुए हादसे के बारे में

    मगर वाही ढाक के तीन पात ....यदि हम सभी (स्त्री-पुरुष दोनों)

    अपने आप में पहले झाँक कर देखें और सच्चे दिल से

    इससे उबर पाने के लिए दृढ प्रतिज्ञ हो जाएँ तो देखिये

    परिणाम .......मगर यहाँ तो दूरदर्शन में दिखाए जाने वाले

    विभिन्न चेनलों में दिखाए जाने वाले फूहड़ कार्यक्रम

    में लोग व्यस्त हैं चाहे वह द्विअर्थी संवाद लिए कोमेडी सर्कस

    हो या आईटम सांग ......आखिर कौन है इन सब चीजों के

    लिए जिम्मेदार ......

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  15. दूसरों पर ऊँगली उठाना आसान है लेकिन हम खुद कितने असंवेदनशील हो गए है यह हमें सोचना है. गलती हमारी भी उतनी है. इस घटना से सिर्फ एक सार्थक पहलू लिकल कर आया है कि अब हम इस विषय पर चर्चा तो करने लगे हैं. चर्चा करेंगे तो कुछ समाधान भी जरुर निकलेगा.

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  16. संवेदनाओं के साथ साथ लड़के और लड़कियों को शारीरिक बल पर भी ध्यान देना चाहिए। अक्सर लोग गुंडागर्दी से डर जाते हैं क्योंकि आत्म विश्वास नहीं होता। इसके लिए फिजिकल ट्रेनिंग लेकर आत्म विश्वास पैदा करना होगा। हमें तो लगता है कि मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग स्कूल और कॉलिजों में अनिवार्य कर देनी चाहिए ताकि दिल से डर निकल सके ।

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  17. लोग कहते हैं कानून बनाओ-कानून बनाओ , जो असंवेदनशील घटना बस में उस लड़की या आपके साथ घटी , सोचिये , उसके लिए क्या कानून बन सकता है भला ?
    सख्त कानून जरूरी हैं , बेशक | कानून का सख्ती से पालन जरूरी है , बेशक | सरकार का जागना भी जरूरी है लेकिन इस सब से पहले आवाम का जागना सबसे ज्यादा जरूरी है | इसकी एक वजह ये भी है कि कल इसी आवाम में से कोई सरकार में होगा |
    और मैं दराल सर की बात से पूरा इत्तेफाक रखता हूँ , फिजिकल ट्रेनिंग बहुत ही जरूरी है , इसे अनिवार्य करना ही चाहिए |

    सादर

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  18. पुरुषों में एकता का बाहुल्‍य है, ऐसी ही एकता महिलाओं को भी सीखनी होगी। कठिनाई यह है कि महिलाएं भी ऐसी घटना के समय भी महिला मौन हो जाती है।

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  19. क़ानून बनाना जो जरूरी है ही पर सच ही की मर्यादित होना वो भी लड़कों का बहुत जरूरी है ... मेरे विचार में हर माता पिता को सुबह या दिन में कभी भी बस ५ मिनट रोज लड़कों को ये बात समझाने की जरूरत है ... कुछ समय में वो अपने आप संस्कारित हो जाएंगे ... हां ... अपने ऊपर पहले लागू करना होगा ये सब ....

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    1. Below link depicts the best way how to shape children

      http://unmukt-hindi.blogspot.in/2009/06/children-learn-by-conduct-rather-than.html

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  20. Rashmi ji, मैने पहली बार आपकी रचना पढ़ी ... और बता नहीं सकती इस लेख का एक-एक शब्द मेरी आँखों के सामने नाचता चला गया....! अपने देश में लड़कियों की यही दशा है... बहुत बहुत दुख होता है, घृणा होती है, गुस्सा आता है ! मुश्किल तो यही है ना, कि जो भला मानुष मदद करने . आएगा, अपने यहाँ उसे ही धर लिया जाएगा ! यही वजह है जो लोग कर के निकल जाते हैं... मगर सबको अब एकजुट होकर इसके खिलाफ जंग छेड़नी ही चाहिए..
    इस अपराध की सज़ा बहुत कड़ी होनी चाहिए !
    ~सादर !!!

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  21. राह में चलने वाले लोगों की दुर्घटना के बाद सहायता ना करना कुछ तो पुलिस के चक्कर से बचने की जुगत है और कुछ पहले से मरी हुई संवेदनशीलता। मध्यम वर्ग तो इस कोताही में पूरी तरह शामिल है जिसमें मैं आप सब हैं। शायद इस घटना के बाद हमारे दृष्टिकोण में कुछ परिवर्तन आए।

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  22. आजकल हमारे समाज में संवेदना नाम की चीज ही नही रह गयी है।अपने सामने होते अत्याचार से भी लोग दरकिनार कर लेते हैं,बहुत ही अच्छी प्रस्तुती।


    भूली -बिसरी यादें

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  23. समाज की इकाई के रूप में जब हम नहीं बदलेंगे तो समाज भी नहीं बदलेगा.. प्रण करना नहीं, अमल करना ज़रूरी है!! हमारी संवेदनाएं मर गयी हैं!!

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  24. बहुत सही बात कही है आपने .सार्थक भावनात्मक अभिव्यक्ति @मोहन भागवत जी-अब और बंटवारा नहीं

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  25. ऐसे और इससे भी विभत्स अनुभवों से गुजरकर ही एक भारतीय लड़की स्त्री बनती है। शायद पूजा का अर्थ यही है।

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  26. अच्छा है अब मैं कनाडा में हूँ और मैं नहीं चाहती कि वापस लौटूं और अपनी बेटी को ऐसे माहौल में बड़ा करूँ .....
    क्योंकि मेरे बच्चे जैसे माहौल में पले हैं, उनको सारी उम्र , समझ में नहीं आएगा कि अगर ऐसा है तो क्यों है !!!
    हम जितनी मर्ज़ी चीख-पुकार कर लें , मुझे नहीं लगता है यहाँ कुछ भी बदलने वाला है ....ईश्वर की कृपा है और मुझे दिली ख़ुशी है कि मेरी बच्ची सुरक्षित है।

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  27. हाँ रश्मि ....बदलाव तो पहले स्वयं में लाना होगा ...अगर हर व्यक्ति अपने घर से शुरुआत करे ...तो कितनी जल्दी यह समस्या हल हो सकती है ...लेकिन अगर यही सोचेगा ...की मैं क्यों पहल करूँ तो यह समस्या सदा बनी रहेगी ......

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  28. कानून बनाने वाले और उसकी रखवाली करने वाले हमारे बारे में जानते हैं कि हम खुद एक दूसरे के लिए संवेदनशील नहीं हैं,दूसरों को मुसीबत में देख भी मुँह मोड़ने वाले हैं तो वो क्यों हमारी चिंता करने लगे।
    खैर जो भी हो इस पूरे प्रकरण के बाद भी महिलाओं ने जो आशावान और सकारात्मक नजरिया भविष्य के प्रति अपनाया है वह हमें भी सक्रिय हो कुछ करने की प्रेरणा देता है।

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  29. ऎसी "मर्दानगी" के प्रति समाज को कठोर कदम लेने होंगे ...
    स्पष्ट लेखों की आवश्यकता है...
    एक बढ़िया पोस्ट के लिए आभार !

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