Tuesday, November 27, 2012

ये कैसा चक्रव्यूह

पिछले कुछ महीनो में कई फ़िल्में आयीं और उन्होंने  काफी दर्शकों को थियेटर की तरफ आकर्षित किया। बर्फी, इंग्लिश-विन्ग्लिश, OMG , जब तक है जान आदि। पर इन सबके बीच ही एक बहुत ही सार्थक, चिंतनशील, हमारे समाज की एक बहुत ही गंभीर समस्या से रूबरू करवाती एक  फिल्म आयी 'चक्रव्यूह' और गुमनामी के अंधेरों में खो गयी। मुझे इस फिल्म का बहुत पहले से ही इंतज़ार था वैसे भी  प्रकाश झा की कोई फिल्म मुझसे नहीं छूटती। इन फिल्मों की भीड़ में इसे भी देखा और तब से ही लिखना चाह रही थी, पर कुछ  prior commitment  ने व्यस्त रखा। 


नक्सल समस्या पर बनी इस फिल्म ने सोचने पर मजबूर कर दिया। हम जो बाहर रहकर देखते हैं क्या सम्पूर्ण सच वही है? बिना उस समस्या को पास से देखे, उस से जूझते लोगो को जाने हम इस समस्या की गंभीरता को नहीं समझ सकते । हालांकि नक्सलियों का रास्ता गलत ही है, हिंसा किसी समस्या का हल नहीं है। और निर्दोष लोगो की ह्त्या, चाहे किसी  पैसे वाले की हो या बेचारे पुलिस वाले की ,कहीं से भी सही नहीं है। पर उनकी तंगहाली, उन पर किये जा रहे जुल्म, अपनी ही जमीन से  बेदखल करना, उनकी जमीन पर फैक्ट्री का निर्माण कर पैसे कमाना, ये सारी स्थितियां उन्हें गहरे आक्रोश से भर देती हैं।

पुलिसकर्मी भी अपने परिवार से दूर, सारी सुख सुविधाओं से दूर , इन बीहड़ जंगलों में रह कर इन नक्सलियों से लड़ते हैं। बड़ी मेहनत से  जाल बिछा, दिनों रणनीति रचकर अपने कई साथियों की शहादत के बाद किसी बड़े नक्सलवादी नेता को  पकड़ते हैं और नक्सलियों द्वारा किसी बिजनेसमैन के अकर्मण्य बेटे को छुडाने के लिए उन्हें उस नक्सली नेता को आज़ाद कर देना पड़ता है। और फिर वे खुद को वहीँ खडा पाते हैं, जहाँ से चले थे . सारी  लड़ाई फिर नए सिरे से लड़ने की तैयारी करनी पड़ती है।
टुकड़ों -टुकड़ों में इन सारी बातों से हम सभी अवगत हैं। पर जब परदे पर सिलसिलेवार इन्हें  घटते हुए देखते हैं ,तब हम पर सच्चाई तारी होती है। 

आदिल (अर्जुन रामपाल ) को नक्सली इलाके में पोस्टिंग मिलती है।वहां अब तक पुलिस को कोई कामयाबी नहीं मिली है .आदिल का एक पुराना मित्र है कबीर (अभय देओल ). आदिल  ने विद्यार्थी जीवन में उसके कॉलेज की फीस भरी है, अच्छे दोस्त हैं दोनों . कबीर,आदिल की मदद के लिए नक्सलियों के दल  में एक नक्सली बनकर शामिल हो जाता है। शुरुआत में तो वो आदिल को सूचनाएं देता है , जिसकी वजह से पुलिस को कई कामयाबी मिलती है और नक्सली नेता राजन (मनोज बाजपेयी ) पकड़ा जाता है । पर फिर धीरे-धीरे उन नक्सलियों के साथ  रहते  हुए कबीर  महसूस करता है कि सचमुच आदिवासियों पर बहुत जुल्म और अत्याचार हो रहे हैं।  नेताओं के अपने घिनौने  स्वार्थ हैं, जिसे पूरा करने  के लिए वे उनकी जमीन हड़पते  हैं और विरोध करने वालों की  निर्ममता से ह्त्या कर दी जाती है। आदिवासियों की जमीन पर कबीर बेदी, एक बड़ी फैक्ट्री लगाना चाहते हैं . नेतागण गाँव वालों  से कहते हैं कि उनके विकास के लिए यह सब किया जा रहा है। पर असलियत में वह गाँव की जमीन पर अपनी फैक्टरी खड़ी कर बड़ा मुनाफा कमाना चाहते हैं और इसके लिए नेताओं को भी अच्छे पैसे दिए गए हैं . इसीलिए  वे उनके सुर में सुर मिलाते नज़र आते हैं।  फैक्ट्री लगाने के लिए उन्हें गाँव की जमीन चाहिए। राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर सारे नेता , उनकी मदद को तैयार हैं। जमीन खाली करने के आदेश का नक्सल विरोध करते हैं। तो पुलिस उनका दमन करती है . विरोधस्वरूप नक्सल कबीर बेदी के  बेटे का अपहरण कर  लेते हैं और फिर आदिल को बिजनेसमैन के बेटे को आज़ाद कराने के लिए नक्सल नेता राजन को छोड़ना पड़ता है। इस लड़ाई में दोनों दोस्त आमने-सामने होते हैं. कबीर ,अपने मित्र को आगाह कर देते हैं कि औरतों और बच्चों पर जुल्म ढाना बंद करे पुलिस वरना अगली मुठभेड़ में दोनों दोस्त में से एक ही जिंदा वापस लौटेगा। और एक मुठभेड़ में आदिल को, कबीर  पर गोली चलानी पड़ती है।

फिल्म में वही सबकुछ है जो रोज घटित हो रहा है। मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी को छुडाने के लिए खूंख्वार आतंकवादी को छोड़ना पड़ा था . पता नहीं कितनी रातों की नींद त्याग कर कितनी  तैयारियों कितने पुलिसकर्मियों की शहादत के बाद ,उस आतंकवादी को पकड़ा गया होगा।

एक फिल्म में पूरी नक्सल समस्या ,पुलिस की लाचारी, नेताओं की बेईमानी , कुछ भ्रष्ट पुलिसकर्मियों के अनाचार ,बड़े उद्योगपतियों द्वारा जनता को गुमराह करना, इन सबको समेटना मुश्किल था। इसीलिए फिल्म कुछ अधूरी सी  लगती  है।पर नक्सल  समस्या को देखने की एक अलग दृष्टि जरूर प्रदान करती है। जब नक्सली महिला नेता जूही (अंजलि गुप्ता ) के पिता के क़र्ज़ न चुका पाने की सजा के रूप में सूदखोर उसकी दोनों बहनों को उठा ले जाते हैं। जूही के पुलिस में रिपोर्ट करने जाने पर पुलिसकर्मी उसके साथ ही अनाचार करना चाहते हैं तो वह जंगल में जाकर बन्दूक उठा लेती है। उसके मन में अमीरों के प्रति, पुलिस के प्रति नफरत होगी ही। उसकी दोनों बड़ी बहने चुपचाप जुल्म सह गयीं पर जूही समझौता नहीं कर पायी हालांकि बच्चों और स्त्रियों की रक्षा के लिए जब वह आत्मसमर्पण कर देती है तो पुलिसकर्मी उसक साथ बलात्कार करते हैं और उसके साथ वही सब होता है जिस से बचने के लिए वो जंगल में आकर नक्सली बन गयी थी। यानी कि गरीब का कोई निस्तार नहीं।

धीरे धीरे  यह नक्सलवाद पूरे देश के 200 जिलों में फ़ैल गया है ,और भविष्य में इसके और भी बढ़ने की  ही संभावनाएं हैं क्यूंकि इनकी समस्या को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। अगर आदिवासियों का शोषण बंद हो,उन्हें भी ज़िन्दगी की बुनियादी जरूरतें मुहैया हों।दो जून की रोटी,कपडे, शिक्षा का अधिकार हो तो फिर उन्हें ये नक्सली नेता नहीं बहका पायेंगे . पर उनके लिए जारी किये गए फंड तो नेताओं की जेब में जाते होंगे और उनकी जमीन हड़पने की भी चालें चली जाती हैं तो फिर उनकी तरक्की कैसे हो? फिल्म में आदिवासियों में शिक्षा के अभाव को बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्वक रेखांकित  किया गया है। जब नक्सली व्यायाम करते हुए बीस तक की गिनती गिनते हैं और उसके बाद पुनः एक से शुरू करते हैं क्यूंकि उन्हें बीस से ऊपर की गिनती नहीं आती। 

नक्सली नेता राजन के रूप में मनोज बाजपेयी और उनके शिक्षक-चिन्तक के रूप में ओम पुरी, छोटी भूमिकाओं में हैं पर बेहतरीन अभिनय किया है। अभय देओल का रोल एक author backed  रोल था और उन्होंने पूरा न्याय किया है उसके साथ। अर्जुन रामपाल  के फैन (मैं भी ) निराश होंगे। एक्टिंग तो उनके वश की है नहीं पर लुक में भी वे इम्प्रेस नहीं कर पाते । पता नहीं प्रकाश झा ने  इतने फिट पुलिसकर्मी कहाँ देख लिए। इस रोल के लिए अर्जुन को बहुत मेहनत करनी पड़ी,अपना वजन काफी घटाना  पड़ा। उनकी पत्नी के रोल में ईशा गुप्ता भी अति स्लिम हैं पर ख़ास प्रभावित नहीं करतीं। उनका रोल भी छोटा सा है ,और अर्जुन रामपाल  के साथ एक लम्बा प्रेम प्रसंग का सीन एडिटिंग की भेंट चढ़ गया।  पर इस फिल्म की देन  हैं ,अंजलि गुप्ता। अपने नक्सली किरदार को बखूबी निभाया है उन्होंने, उनकी बौडी लैंग्वेज, बोलने का अंदाज़ , भाषा,आक्रोश सब बहुत ही गहराई से अभिव्यक्त हुआ है। 

संगीत पक्ष कमजोर सा ही है। एक आइटम सॉंग डाला गया है, पर उसका  फिल्मांकन ,नृत्य-
गीत-संगीत सब बहुत ही निचले स्तर का है।

हमेशा की तरह ,प्रकाश झा का निर्देशन लाज़बाब है। पुलिस और नक्सलों की मुठभेड़ के दृश्य, धूल धूसरित इलाकों में नक्सलों के कार्यकलाप के दृश्य बहुत ही जीवंत बन पड़े  हैं। 

Friday, November 23, 2012

कल देखा, मैंने एक माँ को

किंजल्क के साथ 
ब्लॉग जगत ने बहुत कुछ दिया, इतने वर्षों बाद हिंदी लिखने-पढने का मौका दिया, ढेर सारे मित्र दिए ,इतने सारे छोटे भाई-बहन दिए ...आज 'थैंक्स गिविंग डे '  तो नहीं है पर मैं थैंक्स कहने के मूड में हूँ :)। वैसे एकाध unpleasant exp भी रहे पर वो शायद इसलिए कि कुछ कड़वा न चखो तो मीठे का स्वाद कैसे पता चले कि वो कितना मीठा है :) ये तो सुखद अनुभवों के सागर में  कंकड़ जैसे थे जो ज़रा सी हलचल मचा कर अतल  गहराइयों में डूब गए। 

पर आज भी अच्छे मित्रों की लिस्ट में नए नाम जुड़ते ही जा रहे हैं। ऐसे ही एक दिन 'अतुल पांडे' नाम के पाठक का एक मेल आया कि  मैंने आपका ब्लॉग पढना शुरू किया है, अच्छा लग रहा है......इत्यादि ,साथ ही आग्रह था कि  फेसबुक पर रिक्वेस्ट भेजी है add कर लीजिये . मैंने शुक्रिया  कहकर जबाब दे दिया और फ़ेसबुक  पर भी उन्हें दोस्त बना लिया।

कनिष्क के साथ 
फेसबुक पर अक्सर मैं अपने बच्चों की बातें ,उनकी शरारतें, उनकी बेवकूफियों के विषय में लिखती रहती हूँ पर ये नहीं पता था, इन्हें पढ़कर किसी के मन में गहरे अहसास जाग सकते हैं। अभी दो दिन पहले अतुल का एक मेल आया, एक प्यारी सी कविता और इस सन्देश के साथ 

"आपका अपने पुत्रो के प्रति प्रेम देखकर  (फेसबुक पर कुछ फोटोज और उनके नीचे लिखे कुछ शब्द पढ़ कर पता चला ) माँ की याद आ गयी , मै जल्दी जल्दी घर गया ,वहाँ  जाकर आप के बारे में सोच रहा था तो मन में कुछ शब्द आये और अपने आप पंक्तियों में सज गए आज करीब 8 दिन बाद लौटा हूँ सो आपको भेज रहा हूँ  " साथ में  कविता थी और ये आग्रह भी कि उसे सुधार दीजिये। 

अब मैंने अतुल की  प्रोफाइल  चेक की  तो पता चला अभी ,उसने कुल उन्नीस बसंत  देखे हैं ,वो तो मेरे बड़े बेटे से भी छोटा है :)
अब मुझे कहाँ कविता की इतनी  समझ कि उसकी कविता सुधार सकूँ .   उसी वक़्त एक प्रखर युवा कवि ऑनलाइन दिख गए। उनसे कहा ,तो उन्होंने हाथ जोड़ दिए कि ये मेरे वश का नहीं {हो सकता है, न भी हो। पर मैंने इसे ,उनके नखरे का नाम दे  दिया :)} क्यूंकि अनुभव ही कुछ ऐसे हैं .एक मित्र हैं , किसी कहानी पर उनके विचार मांगो  तो वे उसका मसनद बना कर सो जाते हैं। मित्र होने के नाते तकाज़ा करो, उलाहना दो ,नाराज़गी दिखाओ, उन पर  कोई असर नहीं होता .वे भी शायद इसे मित्रता का आवशयक अंग समझ नज़रंदाज़ कर देते हैं :( 

फिर मुझे सलिल वर्मा जी का ध्यान आया, उन्हें कविता की अच्छी समझ है और सलिल जी का शुक्रिया अदा करने को तो शब्द भी कम पड़ें {आप दोनों महानुभाव सुन रहे हैं ,I mean  पढ़ रहे हैं न  :) } . 
सलिल जी ने  लौटती डाक से यानि  कि  तुरंत ही कविता को संवार कर, निखार कर भेज दिया। तहे दिल  से  शुक्रिया  सलिल जी .
और अतुल तुम्हारा भी, भाव तो तुम्हारे ही हैं, और  मैं कोशिश करुँगी जैसे भाव तुमने कविता में पिरोये हैं, मैं वो सब खुद में उतार सकूँ {मुश्किल है, पर कोशिश पर दुनिया कायम है :) }

तो आप भी पढ़िए वो कविता 




अतुल
कल देखा, मैंने एक माँ को 

अपने बच्चों को प्यार करे, उन का ही मनुहार करे ,
खुद ही उनसे वह रुष्ट रहे, खुद ही उनका श्रृंगार करे , 
अपने बच्चों पर पूरी दुनिया, वह न्योछावर करती है 
ना जाने क्यूँ वह मुझको भी, मेरी माँ सी लगती है । 

हर वक़्त उन्हीं का ध्यान रहे ,खुद का कुछ भी न भान  रहे ,
बच्चों को कष्ट न हो कोई ,अपने दुःख से अनजान रहे, 
इनका बढ़ता ही मान  रहे ,ईश्वर से सदा ये कहती है ,
ना जाने क्यूँ वह मुझको भी, मेरी माँ सी लगती है ।

उनकी खातिर दुःख भी झेले ,पर किसी से कुछ ना बोले 
जब कभी देर हो आने में, करे प्रतीक्षा वो दर खोले 
खुद ही खुद में मालूम नहीं, वो क्या गुनती-सुनती रहती है 
ना  जाने क्यूँ वह मुझको भी, मेरी माँ सी लगती है ।

चाहे जितना ही कष्ट सहे, चाहे जितनी वो  त्रस्त  रहे , 
अपने सब कष्ट भुलाकर, अपने बच्चों में व्यस्त रहे ,
अपने बच्चों की आँखों से वह दुनिया देखा करती है ,
ना जाने क्यूँ वह मुझको भी, मेरी माँ सी लगती है ।

जब भी मैं कोई प्रश्न करूँ, पूरा उत्तर बतलाती है ,
दुनियादारी के पहलू  के सारे मतलब समझाती है ,
मैं भूल करूँ चाहे कोई, वह क्रोध नहीं दर्शाती है ,
ना जाने क्यूँ वह मुझको भी मेरी माँ सी लगती है ।

तुम वीर बहादुर, मृदुल बनो, दुनिया में तुम 'अतुल' बनो ,
तुम मुकुल मेरी इस बगिया के ,कर्तव्यनिष्ठ तुम प्रतुल बनो ,
जीवन में आगे बढ़ने का वह मार्ग सदा दिखलाती है 
न जाने क्यूँ वह मुझको भी मेरी माँ सी लगती है ।

---अतुल पांडे 

Tuesday, November 20, 2012

कुछ अनुत्तरित प्रश्न

कल कुछ छठ पूजा के दृश्य देखने के लिए न्यूज़ चैनल ऑन किया और खबर ये मिली कि पटना में छठ घाट पर एक अस्थाई बांस का पुल टूट जाने से मची भगदड़ में कई लोगों की मृत्यु हो गयी। जिसमे ज्यादातर बच्चे और महिलायें  शामिल हैं . ईश्वर उन सबकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें .


ऐसा समय ही आता है जब ईश्वर पर से विश्वास हिलने लगता है। ईश्वर को लेकर बहस से मैं हमेशा दूर रहती हूँ। न तो मैं घोर आस्तिक हूँ न ही नास्तिक। 
बचपन से बड़ों ने जहाँ कहा, सर झुका दिया। तीज त्यौहार पसंद हैं , और मैं अपने मन से भी ये सवाल नहीं करती कि ईश्वर में आस्था की वजह से पसंद हैं या फिर उनसे जुडी दूसरी  बातों के लिए। हालांकि जब मेरे भाई की शादी हुई थी और पहली तीज के लिए भाई-भाभी में बहस चल रही थी, भाभी तीज का पूरे दिन का व्रत रखना चाहती थी और भाई यह कहकर मना कर रहा था कि 'उसे ऐसे कर्मकांडों में विश्वास नहीं ' तब मैंने उसे यही समझाया था अगर भाभी व्रत रखना  चाहती है तो रखने  दो , रोज की दैनंदिन एकरसता से कुछ अलग होता है। घर का माहौल बदल जाता है। शौपिंग करना ..पूजा की तैयारी करना , घर की साफ़ सफाई, सजावट करना ,प्रसाद बनाना , लोगों  का आना जाना, किसी भी त्यौहार से जुडी कई सारी बातें होती हैं, जो घर का माहौल बिलकुल अलग सा खुशनुमा बना देती  है। 
और वैसे भी व्रत रखे या नहीं ये भाभी (या किसी भी स्त्री का )  का निर्णय होना चाहिए। कई लोग प्यार में कहते हैं ,मैंने तो अपनी पत्नी को करवा चौथ या तीज का व्रत नहीं रखने दिया अपने हाथों  से उसे खाना खिला दिया। उन पतियों के प्यार के आगे नतमस्तक पर ये निर्णय आप अपनी पत्नी पर ही छोड़ दें, तो बेहतर। उन्हें अपना निर्णय लेने की आजादी होनी चाहिए और व्रत रखना कोई ख़ुदकुशी नहीं हैं कि  जबरन रोका जाए। अगर जबरन रोका जाए तो फिर ये भी आपकी पुरुष मानसिकता की तानाशाही ही कहलाएगी। खैर भाभी तो व्रत रखती  ही है 

उन्हें यह सब कहने के बाद, मैंने अपने मन को टटोला आखिर मैं क्यूँ दीवाली, तीज ,गणपति, सब इतने शौक से मनाती हूँ। शायद उनसे जुडी तमाम इन्हीं बातों के लिए। और मैं भगवान के आगे भी उसी श्रद्धा से हाथ जोडती हूँ जैसे अपने किसी बड़े बुजुर्ग के सामने . उनका आशीर्वाद लेने के लिए। एक बार मैंने अपनी  पोस्ट में  मजाक में लिखा था 'मेरी इस बात से लोग कहीं मुझे नास्तिक न समझ लें' इस पर शरद कोकास जी  ने अपने कमेन्ट में लिखा था "आपको नास्तिक बनने  के लिए बहुत मेहनत  करनी पड़ेगी, ऐसे ही कोई नास्तिक नहीं बन जाता " तो मैं ऐसी   मेहनत  से इनकार करती हूँ। न तो मुझे ये सिद्ध करना है कि  ईश्वर  है न ही ये सिद्ध  करना है कि  ईश्वर नहीं है। दुनिया में बहुतेरे ऐसे दूसरे  काम पड़े हैं , जिन्हें करने के लिए ज़िन्दगी कम पड़  जाए।


पर जब धार्मिक स्थलों पर ऐसी घटनाएं होती हैं .अमरनाथ यात्रा पर जाते हुए लोगों के साथ हादसा, किसी मंदिर में दर्शन के लिए गए लोगो की भगदड़ में मौत।  कल ही छठ  पूजा के दौरान इतनी महिलाओं और बच्चों की मौत तो ईश्वर से सवाल करने को जी चाहता है, ये लोग तो पूरी श्रद्धा से आपकी पूजा के लिए गए थे फिर क्यूँ कितनी ही माँओं का आँचल  सूना किया??कितने ही बच्चों के सर पर से साया छीना ?? 
जबाब में  मन को सांत्वना देने के लिए लोग कह सकते हैं, 'इतने ही दिन का जीवन था'.....'वे पूर्वजन्म का कोई कर्म भुगतने आये होंगे '.  पर उनके जो आत्मीय जन पीछे रह गए, उनके दुःख का क्या? छठ पर्व ज्यादातर बच्चों के लिए किया जाता है। जिनके बच्चों को  भगवान  ने छीन लिया, उनकी माँ  ने उनकी लम्बी उम्र के लिए व्रत रखा था, वे अब बाकी का  जीवन कैसे गुजारेंगी ??  या वो बच्चे जिन्हें जीवन भर ये दुःख सालता रहेगा कि  'माँ ने उनकी मंगल-कामना के लिए व्रत  रखा और ईश्वर  ने उन्हें अपने पास ही बुला लिया।'

ये कुछ ऐसे सवाल है जो शायद सबका दिल-दिमाग मथते होंगे पर ये समझ नहीं आता, लोग कैसे अपने मन को समझाते हैं ?? .
एक सलाह मिल सकती है 'गीता पढ़ा करो "
पर अभी मन इतना क्षुब्ध और कुपित है कि कुछ भी सही  नहीं लग रहा .

हादसों पर वैसे तो  किसी का वश नहीं पर जब ये हादसे मानव निर्मित होते हैं तो क्षोभ दुगुना हो जाता है। 
छठ  पूजा , बिहार का महापर्व है। सभी बिहारियों के मन में इस व्रत को लेकर असीम श्रद्धा होती है और शायद ही कोई घर ऐसा हो जिनके खानदान का  कोई न कोई सदस्य  छठ  पूजा न करता हो।
हर वर्ष पटना में हज़ारों लोग गंगा किनारे  छठ पूजा के लिए एकत्रित  होते हैं। प्रशासन इतना लेखा-जोखा नहीं लगा सकता ? अनुमानतः कितने लोग आयेंगे, कितने लोगों के पूजा की व्यवस्था होनी चाहिए? 
कितने घाट  बनाने चाहिए ? साल  में एक बार जनता के सामने प्रशासन को अपनी  कार्यकुशलता दिखलाने  की जरूरत पड़ती है पर उसमे भी वे बुरी तरह नाकाम रहते हैं। 
पर कब तक चलती रहेगी इस तरह की ऐसी अव्यवस्था ? इतना कमजोर पुल क्यूँ बनाया गया?  अगर इतने लोगो का भार पुल नहीं संभाल सकता था तो पुलिस वाले वहां तैनात क्यूँ नहीं थे? क्यूँ लोगों को नहीं रोका गया? पूजा के दौरान बिजली कैसे चली गयी? ये कुछ अनुत्तरित प्रश्न हैं, जिनके जबाब कभी नहीं मिलेंगे 
आम जनता की सुविधा-असुविधा यहाँ तक कि उनकी ज़िन्दगी तक की परवाह नहीं इन्हें। 

पटना के अट्ठाईस घाट  असुरक्षित घोषित कर दिए गए थे। समय रहते, वे अच्छे सुरक्षित घाट का निर्माण नहीं कर सके। कम से कम जनता की  सुरक्षा के लिए तो कोई बंदोबस्त करते कि अनावश्यक  भीड़ न इकट्ठी हो। पर इन सबकी तैयारी बहुत पहले शुरू कर देनी चाहिए जिसकी आदत नहीं हमारे प्रशासन को .वे आनन् फानन में काम करना जानते हैं। इस महापर्व के दो दिन पहले उनकी नींद खुलती है  ताकि बड़े अधिकारियों, मंत्रियों  की आँखों में धूल  झोंका जा सके और वे लोग भी सारी असलियत समझते हुए भी आँखें मूंदे रहते हैं।
क्या इतना दुष्कर कार्य है , इस महापर्व के लिए अच्छी व्यवस्था करना ? जनसँख्या ज्यादा है , यह कहकर लोग किनारा कर लेते हैं। पर यह तो पहले से पता है, तो उसके अनुरूप ही व्यवस्था होनी चाहिए।
क्या मुंबई की जनसँख्या कम है? अभी अभी बाल ठाकरे की अंतिम यात्रा  में लाखों लोग शामिल हुए। कोई अनहोनी नहीं घटी , अखबारों में पढ़ा, चार साल पहले जब बाल ठाकरे बीमार पड़े थे ,उसी वक़्त पुलिस विभाग ने उनकी अंतिम यात्रा में भीड़ का अनुमान लगाकर पूरी रूप रेखा तैयार कर ली थी। अनुमानतः कितने लोग शामिल होंगे, किन रास्तों से किस वक़्त ट्रैफिक गुजरेगा आदि .और उसके ब्लू प्रिंट पूरे विभाग को भेज दिए गए। पिछले चार वर्षों में मुंबई की जनसंख्या बढ़ी ही होगी। फिर भी इसे संभालने में उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं हुई। 

अगर दूसरी जगह की सुव्यवस्था की बात  की जाए तो तुरंत अपने प्रदेश वाले नाराज़ हो जाते हैं कि  बाहर  रहकर हमें सीख देने का क्या अधिकार है,किसी को। (मुझपर तो एक बार अपने ही एक बिहारी भाई  ने लाठी लेकर दौड़ने वाली बात  भी कह डाली थी, क्यूंकि वे मुझे मुम्बईकर  समझ बैठे थे, कई लोगों को ऐसी ग़लतफ़हमी होते देख,मन हुआ ब्लॉग पर ही लिख कर टांक दूँ,'मैं भी बिहार की ही हूँ ' )
पर हम कोई सीख नहीं देना  चाहते , हम प्रदेश से दूर रहनेवालों का दिल दुखता है, जब हम देखते हैं कि यहाँ सडकों पर इतनी भीड़ को आसानी से नियंत्रित कर लिया जाता है। गणपति विसर्जन में एक मंदिर के छोटे से तालाब के आस-पास हज़ारों की भीड़ एकत्रित होती है पर सारा काम सुचारू रूप से संपन्न हो जाता है। किसी को कोई तकलीफ नहीं होती। तब मन में ये सवाल उठता है, हमारे यहाँ भी इतने सुचारू रूप से हर  कार्य क्यूँ नहीं संपन्न होता? हमारे देश की ही पुलिस है, समान ट्रेनिंग प्राप्त फिर एक जगह वो इतनी अक्षम क्यूँ हो जाती है?  

इसके लिए थोड़ी सी अपेक्षा अपने भाई-बहनों से भी  है, वे भी जरा खुद में सहनशीलता लायें। अपने कर्तव्यों का पालन करें .आज भी वहां यही माना जाता है, जिसके गले में आवाज़ है, जिसकी बाजू में ताकत है वह सबसे आगे खड़ा होगा। क्यू में पीछे खड़े रहना बुजदिली की निशानी है। प्रशासन और जनता दोनों को ही अपने अपने कर्तव्य समझने होंगे, मिल कर काम करना होगा, तभी ऐसे हादसे टाल  जा सकते हैं।

सभी दिवंगत आत्माओं को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि 

Saturday, November 3, 2012

कशमकश


ओह!! कितना मिस किया अपने ब्लॉग को , शायद ही  कभी दो पोस्ट के बीच इतना लम्बा अंतराल आया हो . कई विषय मन में उमड़ते घुमड़ते रहे पर सख्ती से उन्हें रोक दिया, कुछ ज्यादा ही सख्ती करनी पड़ी क्यूंकि आदत जो पड़ गयी है, जो मन में आया, ब्लॉग पर उंडेल  देने की ,loud thinking  में जैसे बोल बोल कर के सोचते हैं,वैसे ही हम लिख लिख कर सोचते हैं :)


पर कुछ ऐसे काम में व्यस्त थी ....और इतने सारे डेड लाइंस थे .{अभी भी बाकी हैं :(}...कि ब्लॉग का ही समय चुराना पड़ा, सिर्फ अपने ब्लॉग का ही नहीं पूरे ब्लॉगजगत का। किसी की पोस्ट पढना मुमकिन नहीं हुआ। अभी भी बस कुछ समय का ब्रेक ही लिया है . 7 तारीख के बाद पूरी तरह फ्री तो हो जाउंगी पर तब दीवाली सर पर होगी। और मैं हूँ कि  जितने विषय दिमाग में आ रहे हैं,उन्हें नोट कर के भी नहीं रख रही कि  बाद में उन पर लिख पाऊं. अपनी स्मृति पर कुछ  ज्यादा ही भरोसा हो चला है। कुछ भूल गयी तो :(

खैर फिलहाल भी पोस्ट लिखने का वक़्त तो नहीं मिला पर ख्याल आया अपनी पहली पोस्ट का जो एक  कहानी थी ...जिसे तीन साल पहले पोस्ट की थी और काफी कम लोगों ने पढ़ी थी 

तो मुलाहिजा फरमाएं :)


                                       कशमकश  (कहानी )


आँखें खुलीं तो पाया आँगन में चटकीली धूप  फैली है। हड़बड़ा कर खाट से तकरीबन कूद ही पड़ा लेकिन दुसरे ही क्षण लस्त हो फिर बैठ गया. कहाँ जाना है उसे? किस चीज़ की जल्दबाजी है भला? आठ के बदले ग्यारह बजे भी बिस्तर छोडे तो क्या फर्क पड़ जायेगा? बेशुमार वक़्त है उसके पास पूरे तीन वर्षों से बेकार बैठा आदमी. अपने प्रति मन वितृष्णा से भर उठा. डर कर माँ की ओर देखा,शायद कुछ कहें, लेकिन माँ पूरे मनोयोग से सब्जी काटने में लगी थीं। . यही पहले वाली माँ होती तो उसकी देर तक सोये रहने की आदत को न जाने कितनी बार कोसते हुए उसे उठाने की हरचंद कोशिश कर गयीं होतीं और वह अनसुना कर करवटें बदलता रहता. लेकिन अब माँ भी जानती है कौन सी पढाई करनी है उसे और पढ़कर ही कौन सा तीर मार लिया उसने? शायद इसीलिए छोटे भाइयों को डांटती तो जरूर हैं पर वैसी बेचैनी नहीं रहती उनके शब्दों में.

थोडी देर तक घर का जायजा लेता रहा.आँगन में नीलू जूठे बर्तन धो रही थी. जब जब नीलू को यों घर के कामो में उलझे देखता है एक अपराधबोध से भर उठता है. आज जो नीलू की उंगलियाँ स्याही के बदले राख से सनी थीं और हाथों में कलम की जगह जूठे बर्तन थमे  थे उसकी वजह वह ही था.. एक ही समय उसे भी फीस के लिए पैसे चाहिए थे और नीलू को भी.(वरना उसका नाम कट जाता) उसी महीने लोकमर्यादा निभाते दो दो शादियाँ भी निपटानी पड़ी थीं. एक ही साथ इतने सारे खर्चों का बोझ ,पिता के दुर्बल कंधे सँभालने में असमर्थ थे और नीलू का स्कूल छुडा दिया गया।. तय हुआ वह प्रायवेट परीक्षाएं दिया करेगी।  बुरा तो उसे बहुत लगा था पर सबके साथ साथ उसके मन में भी आशा की एक किरण थी कि उसका तो यह अंतिम वर्ष है. अगले वर्ष वह खुद अपने पैरों पे खडा हो सकेगा और नीलू की छूटी पढाई दुबारा जारी करवा सकेगा.किन्तु उस दिन को आज तीन साल बीत गए और ना तो वह ऑफिस जा सका ना नीलू स्कूल.

जबकि पिता बदस्तूर राय क्लिनिक से सदर हॉस्पिटल और वहां से आशा नर्सिंग होम का चक्कर लगाते रहे . सोचा था नौकरी लगने के बाद पहला काम अपने पिता की ओवरटाइम ड्यूटी छुड़वाने की करेगा.पर ऐसे ही जाने कितने सारे मंसूबे  अकाल मृत्यु को प्राप्त होते चले गए और वह निरुपाए खडा देखते रहने के सिवा कुछ नहीं कर सका. क्या क्रूर मजाक है? स्वस्थ युवा बेटा तो दिन भर खाट तोड़ता रहे और गठिया से पीड़ित पिता अपने दुखते जोडों सहित सड़कें नापते रहें. जब जब रात के दस बजे पिता के थके क़दमों की आहट सुनता है, मन अपार ग्लानि से भर उठता है। 

उसे जागते हुए देखकर पिता पूछते हैं, "अरे! सोया नहीं अभी तक"  और वह कट कर रह जाता है। जी करता है, 'काश आज बस सोये तो सोया ही रह जाए.' पर यहाँ तो मांगे मौत भी नहीं मिलती. कई बार आत्महत्या के विचार ने भी सर उठाया लेकिन फिर रुक जाता है. जी कर तो कोई सुख दे नहीं पा रहा. मर कर ही कौन सा अहसान कर जाएगा? बल्कि उल्टे समाज के सिपहसलारों के व्यंग्यबाणों  से बींधते रहने को अकेला छोड़ जायेगा अपने निरीह माता पिता को .

सारी मुसीबत इनकी निरीहता को लेकर ही है. क्यूँ नहीं ये लोग भी उपेक्षा भरा व्यवहार अपनाते? क्यूँ इनकी निगाहें इतनी सहानुभूति भरी हैं? क्यूँ नहीं ये लोग भी औरों की तरह उसके यूँ निठल्ले बैठे रहने पर चीखते चिल्लाते..क्यूँ नहीं पिता कहते कि वह अब इस लायक हो गया है कि  अपना पेट खुद पाल सके,कब तक उसका खर्च उठाते रहेंगे?..क्यूँ नहीं माँ तल्खी से कहती कि 'रमेश,विपुल,अभय सब अपनी अपनी नौकरी पर गए,वह कब तक बैठा रोटियां तोड़ता रहेगा?'...क्यूँ नहीं कोई काम बताने पर नीलू पलट कर कहती 'क्या इसलिए पढाई छुडा घर बैठा दिया था कि जब चाहो चाय बनवा  सको.'..पर ये लोग ऐसा कुछ नहीं कहते . हर बात संभाल -संभाल कर पूछी जाती है, ताकि उसे अपनी बेचारगी का बोध न हो। पर उन्हें इसका ज़रा भी इल्हाम नहीं कि  उसमें किस कदर आत्महीनता भर गयी है। बात बात में हीन भावना से ग्रस्त  हो उठता है। कहाँ चला गया उसका वह पुख्ता आत्मविश्वास? वह बेलौस व्यवहार ? हर किसी से आँखें चुराता फिरता है, आखिर क्यूँ ? सारे दोष खुद में ही नज़र आते हैं । लगता है कोई गहरी कमी है, उसके व्यक्तिव में। पर अगर ऐसा होता तो स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक सबकी जुबान पर उसका नाम कैसे होता । आज  भी पुराने प्रोफेसर्स मिलते हैं तो कितने प्यार से बातें  करते हैं। लेकिन वह है कि  ठीक से जबाब तक नहीं दे पाता , उनसे बातें करते हुए सोचता है , कब टलें  ये लोग?

 वरना रितेश से कतरायेगा ,ऐसा सपने में भी सोच सकता था ,भला। वही पिद्दी सा रितेश जो कॉलेज में उसके चमचे के नाम से जाना जाता था। उसके आगे-पीछे घुमा करता और हर वक़्त उसके मजाक का निशाना बना रहता था। 
सामने से रितेश आ रहा है और उसकी निगाहें बेचैनी से किसी शरणस्थल की  खोज में भटकने लगीं। लेकिन सामने तो सीधी सपाट सूनी सड़क फैली थी। गली तो दूर कोई दरख़्त भी नहीं ,जिसके पीछे छुप पीछा छुड़ा सके। इसी ऊहापोह में था कि  रितेश सामने आ गया।

"हल्लो अनिमेष...कैसे हो ??"... कहते गर्मजोशी से हाथ मिलाया। बदले में वह बस दांत निपोर कर रह गया। 
"इधर दिखते नहीं  यार... कहीं बाहर थे क्या?
"नहीं यहीं तो था " अटकते  हुए किसी तरह कहा उसने।
और अगला सवाल वही हुआ, जिस से बचने के लिए पैंतरे बदल रहा था। 
"क्या कर रहे हो आजकल ?"  रितेश ने पूछा। क्या बताये, बेरोजगार शब्द एक गाली सा लगता है, उसे। 
जब वह चुप रहा तो रितेश ने कहा, "चलो तुम्हे कॉफ़ी पिलाते हैं, फिर ऑफिस भी जाना है।"
'हाँ इसी जुमले के लिए तो कॉफ़ी की आदत दावत दी गयी थी। अब सुनाता रहेगा अपने ऑफिस, कलीग , बॉस ,  उनकी सेक्रेटरी के घिसे पिटे किस्से।
उसे चुप देख, रितेश ने फिर जोर डाला.." चलो न कॉफ़ी पीते हुए अपनी कोई नज़्म सुनाना , कॉलेज में तो बड़ी  मशहूर थीं तुम्हारी कवितायें... सुन कर जाने कितनी लडकियां आहें भरतीं  थीं।कोई ताजी हमें भी सुना दो । "
मन हुआ बुरी तरह झिड़क दे। पिता बड़े ओहदे पर हैं, जम्हाइयाँ लेने को एक कुर्सी मिल गयी है तभी ये कवितायें सूझ रही हैं। मेरी तरह चप्पलें चटकानी पड़ें तो पता चले ये  पूछने का अर्थ क्या है। पर उलट में बस इतना कहा , " एक दोस्त को सी ऑफ करने जा रहा था। उसके ट्रेन का टाइम  हो चला है। मिलते हैं फिर कभी "
" ओके दोस्त, टेक केयर"..  कहता हाथ हिलाता रितेश चला गया।

लेकिन रितेश के जाने के बाद जी भर कर गालियाँ दीं  खुद को। आजकल एक यही काम तो जोर शोर से हो रहा है। आखिर इस तरह हीन  भावना से ग्रस्त होने की क्या जरूरत थी। क्या वह देखने में भी अच्छा नहीं रहा। नहीं नहीं शारीरिक सौष्ठव में तो वह अब भी कम नहीं पर चेहरे का क्या करेगा जिस  पर हर वक़्त मनहूसियत की छाप लगी रहती है। 

और लोग हैं कि  सहानुभूति दिखाने से बाज़ नहीं आते ... नुक्कड़ के बनवारी चाचा हों या कलावती मौसी, नज़र पड़ते ही बड़ी चिंता से पूछेंगे ."कहीं कुछ काम बना? " पता नहीं उसे इन शब्दों में दया की भावना नज़र आ जाती है और वह बिना जबाब दिए आगे बढ़ जाता है। घर से निकलने का मन ही नहीं होता...और आजकल तो निकलना और भी दूभर क्यूंकि रूपा मायके आयी हुई थी वही रूपा जिसके साथ जीने मरने की कसमे खाई थीं. रूपा में तो बहुत हिम्मत थी....इंतज़ार करने... साथ भाग तक चलने को तैयार थी. पर वही पीछे हट गया ,कोई फिल्म के हीरो हेरोईन तो नहीं थे दोनों कि जंगल में वह लकडियाँ काट कर लाता और सजी धजी रूपा उसके लिए खाना बनाती. रूपा की शादी हो गयी ,एक नन्हा मुन्ना भी गोद में आ गया, कई मौसम बदल गए पर नहीं बदला रूपा की आँखों का खूनी रंग...आज भी कभी उसपर नज़र पड़ जाए तो रूपा की आँखे अंगारे उगलने लगती हैं.

शुक्र है, उसे हर तरफ से नकारा पाकर भी माँ पिता की आँखे प्यार से उतनी ही लबरेज रहती हैं. हर बार कोई नया फार्म या परीक्षा देने के लिए राह खर्च मांगते समय कट कर रह जाता है पर पिता उतने ही प्यार से पूछते हैं. "कितने चाहिए." और दस पांच ऊपर से पकडा देते हैं "रख लो जरूरत वक़्त काम आएंगे "..वह तो तंग आ चुका है इंटरव्यू देते देते. लेकिन इंटरव्यू का नाम सुनते ही परिवार में उछाह उमंग की एक लहर सी दौड़ जाती है. नीलू दरवाजे के पास पानी भरी बाल्टी रख देती है. नमन भागकर हलवाई के यहाँ से दही ले आता है. माँ टीका करती हैं. वार के अनुसार 'धनिया, गुड, राई देती हैं। अगर वह पहले वाला अनिमेष होता तो इन सारे कर्म कांडों की साफ़ साफ़ खिल्ली उड़ा चलता बनता। अब सर झुकाए सब सह लेता है। शायद यही सब मिलकर उसके रूठे भाग्य को मना सकें। लेकिन हठी बालक सा उसका भाग्य अपनी जगह पर अड़ा  रहता है। वह इन सारे हथियारों से लैस  होकर जाता है और हथियार डालकर चला आता है। . पता चलता है ,चुनाव तो पहले ही कर लिया गया था.इंटरव्यू तो मात्र एक दिखावा था.लेकिन अब आजीज  आ गया है वह। जब भी कोई नया इंटरव्यू कॉल आता है, सबके चेहरे पर आशा की चमक आ जाती है। बुझा मन लिए लौटता है तो पूछता तो कोई नहीं। सब उसके चेहरे से भांपने की कोशिश करते हैं। नीलू , नमन , माँ , सब आस-पास मंडराते रहते हैं। आखिर वह सच्चाई बताता है और सबकी  आँखों में जल रही आशा ,अपेक्षा की लौ दप्प से बुझ जाती है. माँ  एक गहरा निश्वास लेती है। पिता अपने दोनों हाथ उठा कर कहते हैं, "होइहे वही जो राम रची राखा। " पर अब उसने सोच लिया उसे इन सारी स्थितियों का अंत करना ही होगा. किसी को कुछ नहीं बताएगा . बार-बार अपराधबोध से ग्रस्त होने की मजबूरी से खुद  को उबारना ही होगा। अब घर में तभी बताएगा जब पहला वेतन लाकर माँ के हाथों पर  रख देगा.


ट्यूशन लेकर लौटा तो नीलू की जगह माँ ने खाना परोसा और देर तक वहीँ बैठीं रहीं तो लगा कुछ कहना चाहती हैं. खुद ही पूछ लिया --"क्या बात है,माँ?"
"नहीं ...बात क्या होगी "...माँ कुछ अटकती हुई सी बोल रही थीं..."अगले हफ्ते से नीलू के दसवीं के इम्तहान हैं." नीलू प्रायवेट से दसवीं कर रही थी, बहुत मेहनत  करती थी लड़की। वो भी उसे पढ़ा देता था उसे पूरा विश्वास था नीलू फर्स्ट डिविज़न से पास होगी।  माँ ने आगे बोला, "सेंटर दूसरे शहर पड़ा है. रहने की तो कोई समस्या नहीं,चाचाजी वहां हैं ही पर लेकर कौन जाए?.पिताजी को छुट्टी मिलेगी नहीं...और  मिल भी जाए तो पैसे कटेंगे , वो भारी पड़ेगा। मैं साथ चली भी जाऊं पर वहां नीलू को एक्जाम सेंटर रोज लेकर कौन जायेगा...मेरे लिए वो शहर नया है...वैसे भी अकेले आने-जाने की आदत नहीं " फिर माँ  ने बड़े संकोच से पूछा "तेरा कोई इम्तिहान तो नहीं ...तू जा सकता है?"

वह तो माँ के पूछने के पहले ही खुद को प्रस्तुत कर देना चाहता था ,पर एक समस्या थी...एक परीक्षा वह घर में बिना बताये दे आया था। लिखित परीक्षा उत्तीर्ण कर गया था और इंटरव्यू भी दे आया था। इंटरव्यू काफी अच्छा  हुआ था . लेकिन यह बात कहे कैसे? .कह देगा तो वही आशाएं ,अपेक्षाएं सर उठाने लगेंगी। जिनसे भागना चाह रहा था ...और फिर नौकरी नहीं मिली तो सबकी आशाएं बुझ जायेंगीं। नहीं अब और उम्मीदें नहीं दिलानी उन्हें। फिर से निराशा की खाई में गिरते उन्हें नहीं देख पायेगा .अब तक तो नौकरी मिली नहीं इस बार ही मिल जायेगी इसकी क्या गारंटी है। अब इस स्थिति से उबारना ही होगा खुद को। और नीलू के भी बोर्ड के इम्तहान हैं .पहले ही उसकी वजह से वह तीन साल से स्कूल छोड़ घर बैठी हुई थी. 

तय कर लिया कुछ नहीं बतायेगा, माँ की आँखे उसपर टिकी थीं.
बोला--"चिंता मत करो माँ, मैं लेकर जाऊंगा "

सामान संभालते हुए भी कई बार जी में आया ,जाकर कह दे। दरवाजे तक गया भी फिर जी कडा कर लौट आया। नहीं अब और बेवकूफ नहीं बनाना उसे। बहुत हो गया तमाशा। कितनी बार तो दे चूका  है इंटरव्यू। कब आया अप्वाइंटमेंट लेटर ? और वह नीलू को लेकर इम्तहान दिलवाने चला गया। 

पूरे पंद्रह दिन बाद लौटा , चाचा चाची और उनके बच्चों के साथ अच्छा समय बिताया, नया शहर बहुत रास आया उसे। जिधर चाहे निकल जाओ। न पहचाने चेहरे न पहचाने सवालों से टकराने का  डर .
घर पर आकर सामान रखते ही माँ  एक लिफाफा  लेकर आयीं ।

"देख तो नौकरी का कागज़ है क्या? " 

उसने कांपते हाथों  से लिफाफा खोला । और पंक्तियों पर नज़र पड़ते ही स्तंभित रह गया। चेहरा सफ़ेद पड़  गया। कंधे झूल आये। कागज़ हाथों से गिर पड़ा।

कैसे कहे  , " ज्वाइनिंग डेट बीत गया इसका "

लाहुल स्पीती यात्रा वृत्तांत -- 6 (रोहतांग पास, मनाली )

मनाली का रास्ता भी खराब और मूड उस से ज्यादा खराब . पक्की सडक तो देखने को भी नहीं थी .बहुत दूर तक बस पत्थरों भरा कच्चा  रास्ता. दो जगह ...