Sunday, December 18, 2011

नन्हा तोता - एक अतिथि...

GG Shaikh ब्लॉग जगत के लिए अनजाना नाम नहीं है. उनकी सारगर्भित टिप्पणियाँ हमेशा ही पोस्ट को विस्तार और एक नया आयाम देती हैं. वे सिर्फ खानापूर्ति के लिए टिप्पणी नहीं करते...पोस्ट को बहुत ही गंभीरता से पढ़ते हैं और फिर उस पर समीक्षात्मक  टिप्पणी करते हैं. कुछ दिनों पहले उन्होंने, मुझे  एक प्यारा सा आलेख मेल किया, इस संदेश के साथ कि 'चाहूँ तो अपने ब्लॉग पर अतिथि पोस्ट के रूप में पोस्ट  कर सकती हूँ.' मैने उल्टा उनसे फरमाइश कर डाली..'आप इतना अच्छा लिखते हैं...अपना एक ब्लॉग क्यूँ नहीं बना लेते ? और फिर उस ब्लॉग पर ये आलेख पोस्ट कर दीजिये' ..उन्होंने 'सोचूंगा...' कह कर बात टाल दी. पर शायद समय की कमी की वजह से उन्होंने अब तक अपना ब्लॉग नहीं बनाया है...जब मैने 'जया चेची की अतिथि' पोस्ट डाली तो मुझे  GG Shaikh  की पोस्ट भी याद आ गयी. इतने प्यारे से मासूम से तोते की कहानी से अपने पाठकों को इतने दिनों तक महरूम रखना ठीक नहीं. 

मैने आप सबसे परिचय करवाने को  GG Shaikh  से आग्रह किया कि कुछ पंक्तियों में वे अपना परिचय लिख कर भेज दें...क्यूंकि मैं तो उनका पूरा नाम भी नहीं जानती. प्रतिउत्तर में उनका मेल आया ,लिख दीजिये...


"Buzz/Blog के एक टिप्पणी कार ने  यह आलेख मुझे पढ़ने को  भेजा था. 
पसंद आया सो यहाँ अतिथि पोस्ट से भेज रही हूँ...बस, और क्या!"

हाँ..एक लेखक का असली परिचय तो उसका लेखन ही है...बस, और क्या !! 

तो लीजिये प्रस्तुत है एक प्यार से नन्हे अतिथि 'तोते' की कहानी GG Shaikh  की जुबानी 

जैसे  शाम अंधेरा होते ही पंछी अपने-अपने घोंसलों में, पेड़ो की शाखों  पर लौट  आते  है, इसके बिल्कुल उलट, इस तपते समर में,
शाम , सूरज के ढलने पर सोसाइटी  के बच्चे अपने-अपने घरों से निकल बाहर खेलने को  चले  आते हैं...
दिन का यही थोड़ा सा  शाम का वक़्त  बच्चों के साथ कभी-कभी बिताना मुझे अच्छा लगता है. बच्चे भी, मुझे लगे,
जैसे मेरी बाट  न जोहते  हो...! तभी तो मुझे  घर से बाहर निकलता  देख  शुरू हो जाते हैं, कुछ न कुछ बताने को. तब मैं सिर्फ उनकी प्राथमिकता  बन  जाता हूँ.  जेनब(छोटी सी लड़की) और अन्य बच्चे इतने ज़हीन है कि उन्हें मेरी बातों में कुछ न कुछ नयापन  सा ज़रुर  दिखता है  तभी तो  उन्हें मेरी बातें पसंद आती है. वैसे भी  रुढीगत ढर्रे मैं बंध ना शुरु से ही मुझे अरुचिकर लगा है. फिर इन बच्चों का मुझसे एक और आकर्षण भी है...दो-पांच रूपियोंवाला डेरी मिल्क चोकलेट्स...! जो में उन्हें कभी-कभी देता रहता  हूँ. फ़िर बच्चे तो  मासूम होते ही हैं क्योंकि वे  भूत-भविष्य की  सही-गलत  ख़याली  चिंताओं  से अछूते होते हैं और वर्तमान में ही जोश ख़रोश  से जीते हैं, खेलते हैं और  मिलते हैं...
  
अभी चार-पांच दिन की ही बात है. ऐसी ही एक  शाम  जब मैं घर से बाहर  निकला तो नन्हीं जेनब ने फौरन आकार  मुझे  बताया:
"अंकल ! अंकल ! सामने वाले  बंद घर के कम्पाउन्ड की लॉन  में एक नन्हा सा तोता  है"... "अच्छा...!"  कहकर जब मैं तोते को   देखने पहुंचा  तो देखा कि तोते  का एक छोटा सा  अधमरा बच्चा  बेतहाशा  उग आई जंगली घास में बिना हिले-डुले बेचारगी में उदास-सा बैठा है...जो उड़ 
नहीं पा रहा है. 


समझते मुझे  देर न लगी...हमारे घर के सामने वाला  वह   बड़ा सा मकान NRI का है, जो लंदन निवासी (अप्रवासी भारतीय) हैं और साल में एक बार, जब  विदेशों में ठंड असह्य हो जाती है तब  यहाँ भारत में,  अपने वतन में आ कर  एक-दो महीनों के लिए रुकते  हैं. फ़िर वहां मौसम सही होते ही वापस विदेश चले जाते हैं और उनके जाने के बाद  यह घर फ़िर से दस महीनों तक  सूना-सूना सा बंद  पड़ा  रहता है. 
इसी महल-नुमा NRI के   घर की  टेरेस पर पंद्रह-पच्चीस तोते-तोतियों के झुंड ने  एक अर्से से अपना बसेरा  बनाया हुआ है. जिनकी वजह से   हमारी भी रोज की  सुबह-शाम तोते-तोतियों की  हरी-हरी  प्रेज़ंस से, उनके चहचहाने से आबाद रहती है. इसी  दोमंजिला मकान की   टेरेस पर जहाँ बारिश के पानी के निकाल  के लिए एक पाईप का टुकड़ा  लगाया गया है, उस दो-ढाई फुट के  पाईप-टुकड़े के भीतर  इन तोतों  ने अपने  नवजात बच्चों को रखने को  घोंसला  बनाया है. तोतियाँ घोंसले में अंडे रख उन्हें सींचती  है, और सुबह-शाम उस घोंसले की देखरेख में तोते  लगे रहते हैं...उस छोटे से  पाईप से फिसल कर ही  शायद यह बच्चा नीचे गिर आया  होगा... 


गिर आए  बच्चे के इर्दगिर्द हैरान-परेशान  से कई  तोते  'टर्र-टर्र' की रट लगाए  इधर-उधर उड़ रहे थे...पर लग रहा था कि बेचारों को  इस बात का इल्म न था  कि कैसे बच्चे को उठाए  और घोंसले में वापस रख दें...     
अब  इस  सोच से  मेरी चिंता बढी जा  रही थी कि हमारी सोसाइटी  में काफी बिल्लियाँ इधर-उधर घूमती रहती है और अगर कहीं इस बच्चे की  भनक भी उन्हें लग  गई  तो नन्हे तोते का  ज़िंदा   रहना मुश्किल हो जाएगा...पर इतने लिजलिजे, पंख- झडे कमज़ोर बच्चे को उठा कर सुरक्षित  जगह पर रखना कुछ मुश्किल  सा  लग रहा  था. बहरहाल, सोसाइटी   के  वाचमैन को बच्चे ही बुला कर  ले आए, जो अभी  तक
देख-सोच  रहे थे कि आखिर  अंकल अब  क्या करनेवाले  हैं...! 


वाचमैन आया. मिसेज़  ने उसे एक कॉटन  के  कपड़े  का टुकड़ा  दिया. फ़िर घर में रखे जूने-पुराने  सामान से बहुत पहले ख़रीदा हुआ  एक जूना-पुराना धातु के तारों से बना  पंखी-पिंजरा निकाला गया जो लाल-सफ़ेद रंगों से रंगा हुआ था ...वाचमैन ने नन्हे तोते  को कपड़े में लपेट कर सिफत से  पकड़ा और धीरे से लाकर  पिंजरे में छोड़  दिया...और हमने पिंजरे का मुख्य  द्वार बाहर से बंद  कर दिया.


वह पूरी शाम आसपडोस के नन्हे बच्चों के लिए एक अनूठे उत्सव की सी शाम थी...फिर इस बारे में, सोसाइटी में जो भी बच्चा सुनता वह चला आता मेरे घर के कम्पाउंड में...जहाँ दीवार में लगी मोटी सी खूंटी में पिंजरा लटक रहा था...जिस में नन्हा तोता  उदास बैठा था... 


शाम ढली, बच्चे भी अपने-अपने घरों को हो लिए...मिसेज़  ने हरी मिर्च और एपल के कुछ  टुकड़े पिंजरे में डाले और  पिंजरे के अंदर लगी  हुई   दो  कटोरियों में पानी भरा...पर हमने देखा, हमारी इस मेहमाननवाज़ी  का  उस  नन्हे तोते पर  कोई  असर न हुआ...वह अनमने  भाव से  खामोश बैठा रहा...रात सोने से पहले हमने उसे हिफाज़त वाली जगह पर रख दिया. घर के पीछे वाले बंद दरवाज़े के  स्टोर-रूम में, जहाँ हवा के  आवन-जावन के लिए  वेंटीलेसन भी था...


सुबह नींद में ही कई तोतों के चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुनी...घर के पीछे जाकर देखा तो सात-आठ  तोते  स्टोर-रूम के बंद द्वार  पर अपनी टांगों  व  चोंचों के बल  लटक रहे हैं, और अंदर बैठा  नन्हा तोता भी  बार-बार निरंतर  अपनी टिपीकल बच्चों वाली आवाज़ में अपने गार्डीअंस को  पुकारे जा  रहा है... बाहर उड़ रहे तोते उसे खाना चुगाने को और  मुक्त कराने  को बेताब हो  इधर-उधर उड़े जा रहे  थे...


फ़िर  हमने पिंजरे को उसी बाहर  वाली  खूंटी  में लाकर टाँग दिया जहाँ बाद में उसके परिजनों ने नन्हे तोते को  भर पेट सुबह का नाश्ता करवाया.
पत्नी  रोज  सुबह तोते-बच्चे को पिंजरे में  ही नहलाती, नन्हे तोते को  नहाना बड़ा अच्छा लगता...इस नित्यक्रम के बाद पिंजरे को फ़िर बाहर खूंटी   पर  टाँग दिया जाता. सुबह  हमें  यह  देख  अफ़सोस होता  कि सारी रात  नन्हे तोते ने  हमारा पिंजरे में रखा  न कुछ  खाया है  और न  ही पानी पिया है, सबकुछ वैसा का वैसा ही पिंजरे में धरा पड़ा  है. पर घर के भीतर से  हम देखते  कि कुछ तोते-तोतियां,  आस-पास की जगह से चौकन्ने हो, इधर-उधर के  खतरे को भांपकर  बच्चे  को, शायद अपने मुंह में ही तैयार किया हुआ  कुछ सफेद दानों  सा खाना, पिंजरे के  तारों में अपनी चोंचें डाल खिला जाया करते थे  और वह नन्हा  भी बड़ी आश्वस्तता के साथ लाड-दुलार से दानें खाता रहता .


एक  दिन सुबह मैंने पाया  कि पिंजरे के कम अंतर  वाले तारों की वजह से तोतों को खिलानें  में और नन्हे  को खाने में दिक़्क़त हो रही है...मिसेज़  के मना करने पर भी मैंने पिंजरे का  मुख्य  द्वार ज़रा-सा  खोल दिया...ताकि तोते अपना पूरा मुंह पिंजरे में डाल बच्चे को सहूलियत के साथ खिला सके. मुझे विश्वास था कि बच्चा उस थोड़े से खुले द्वार से नहीं निकल पाएगा...फ़िर में शेविंग करने को  घर में लौट  आया...थोड़ी देर बाद आकर  देखा तो अपनी आँखों पर विश्वास ही न हुआ...पिंजरा ख़ाली था !  बाद में देखा तो बच्चा सामने वाले घर की गेट पर बैठा हुआ दिखा. उसके नातीन  उसे भगा ले जाने की पैरवी में चिल्लाते हुए  इधर-उधर उड़े जा रहे थे...मिसेज़ उसे पकड़ने दौड़ी तो वह नन्हा   दबंग  नीचे-नीचे उड़ता हुआ सोसाइटी के चौथे मकान के बागीचे में जा बैठा..


वहां काम कर रहे एक माली की मदद से मिसेज़  ने उसे फिर से पकड़वाया और ला कर वापस  पिंजरे में बंध  किया. नन्हा  तोता निराश और पस्त हुआ और बाहर उसके परिजनों  का आक्रंद भी बहुत देर तक न थमा...


इस दौरान  आसपडोस और सोसाइटी के बच्चे भी शाम को नियत समय पर नन्हे तोते की  मुलाक़ात लेते और हमारा भी ध्यान दिन भर नन्हे  तोते की ओर लगा रहता... 


नन्हा तोता  रोज़   सुबह नहाता. पर  खाता कुछ न था.  बाहर खूंटी पर टंगे पिंजरे पर तोते-तोतियां नियमानुसार आते और  उसे खिला जाते...हमने देखा, नन्हा तोता  मनुष्य  बच्चों  जैसा डेलिकेट न था...वह इन तीन दिनों में खासा निखर उठा था. शरीर की ख़ाली जगहों पर नए-नए  हरे  पर  उग  आए  थे...वह स्वस्थ  तरोताज़ा और सुंदर लगने लगा था. उसके  जन्मगत जीवन घटक  काफी साबुत  थे. मेरे लिए इस नौनिहाल का इस तरह दो-तीन दिनों में तरोताज़ा हो जाना  अचरज से कम न था. अभी तीन दिन पर तो वह पर-झडा मरियल सा पस्त हाल था...अब के उसका गोलमटोल चेहरा, चमकीली आंखे और हरा-भरा रेशम सा मुलायम  तन देखते ही बनता...बाद में मैंने फील किया  कि  उसके परिजन जो  सुबह-शाम उसे खिला जाते थे वे सफ़ेद  दाने नन्हे तोते के लिए काफी सत्वशील रहे  होंगे...
   
उसकी वैसी सुंदरता देख हम भी उसकी मोह-माया में धीरे-धीरे बंध ने लगे थे. उसे अपने पास रख लेने को ललचा रहे थे. मैं सोच  रहा था, कहीं हमारा यह मोह उसकी रिहाई में बाधा न बन जाए. हमारा हेतु तो उसे बिल्लियों से  बचाना था न कि उसे आजीवन का कारावास देना...  वह उड़ना सीख जाए,  शक्तिशाली  हो जाए तो उसे उड़ा देना था...


बहरहाल अगर हम उसे सदा अपने पास रखना चाहते भी,  उसे पिंजरे में बंद  रखना चाहते तब भी हम वैसा न कर पाते.  वैसा सोचना  भी  हमारी भूल ही होती, क्योंकि उसके परिजन हमें वैसा कतई करने न देते...उनकी जान इस बच्चे में बसी थी और जिसकी  मुक्ति उनका एक मात्र हेतु था...वे सुबह-शाम आ  धमकते और इतना शोरगुल मचाते कि आसपडोस वालों को भी  अब के दिक्कत  होने लगी थी, और वे भी हमें  सलाह देने लगे थे कि तोते-बच्चे को ऊंची जगह पर जाकर छोड़ दी जिए, उसके परिजन आकर उसे उड़ा ले जाएंगे...


फ़िर हम  यह  भी देख रहे थे  कि जितनी मोह-माया हमें उस बच्चे से थी उतनी उस बच्चे को हमसे  न थी. वह तो पहले दिन से ही  हमसे निःसंग चला आ रहा था...चिडचिडा  और डरा-डरा सा...उसकी मंशा तो  मुक्ति के अलावा और कुछ भी न थी. वह तो बस चाहता था मुक्त आकाश में उड़न छू होना, अपने साथियों के संग...पर उस तोते-बच्चे ने  अपना  यह गोपनीय भाव  हम पर कभी व्यक्त होने नहीं  दिया...
   
आख़िरकार वह मुक्ति-दिन भी आ ही गया... 
एक दिन सुबह, जब उसके परिजन तोते-तोतियां  पिंजरे  के आसपास हस्बेमामूल  मंडरा रहे थे, तब मैं, मिसेज़  और कुछ बच्चे हमारे  घर के  सेकंड फ्लोर  की लोबी में पिंजरा ले आए. जहाँ ऊपर स्वच्छ  खुला आसमां था.  नन्हे  तोते  को तो  इस बात का गुमां ही न था कि क्या होने जा रहा है...हमारी  लौबी के सामने इलेक्ट्रिक-तारों पर कितने ही तोते आ धमके  थे जिनकी पैनी नज़र सिर्फ और सिर्फ अपने वंशज  पर लगी हुई थी...वहां लोबी में, जो सभी मेरे साथ मौजूद  थे, उन सभी की मौजूदगी में मैंने पिंजरे का  मेन  डोर खोल दिया...नन्हा तोता पहले तो कुछ पल सकते में रहा...पर फिर खुला दरवाज़ा देख उसे यह समझने में ज़रा सी भी देर न लगी कि...कि... भागो...!


 वह इतनी  तेज़ी से पिंजरे से उड़ा कि जैसे खींची हुई गुलेल  से पत्थर छूटे...तीन तोते जो बिल्कुल सामने  इलेक्ट्रिक-तार पर  बैठे हुए थे वे भी उतनी ही तेज़ी  से  उसके  साथ हो लिए... और पायलोटिंग करते हुए नन्हे  तोते को अपने साथ आकाश में  उडा ले गए.  हमें अनुमान  ही न था  कि वे तीन तोते  इस तरह से तैयार बैठे होंगे,  नन्हे तोते को उड़ा ले जाने को...! यह सब  पलक झपकते ही हुआ. वे चारों आकाश  में, यकीन न आए  वैसी   अदभुत   गति से  कुछ ही सेकंडों में उतनी  ऊंचाई तक जा पहुँचे कि आकाश में  दूर होते-होते छोटे से   दिखने लगा...और वह नन्हा तोता हम सभी की नज़रों से  ऐसे ओझल हुआ कि आज के इस दिन के  बाद शायद  ही हम  कभी उसे  पहचान  पाएँ, उस जैसे एक  सरीखे अनेकों  हरे-हरे छोटे-बड़े  तोतों में...  


हम कुछ समय वहां सकते में रहे और  हतप्रभ भी लेकिन  फ़िर भी आश्वस्त तो  थे ही  कि चलो नन्हे तोते ने उड़ना तो सीख लिया...
इस पूरे एपिसोड के आरंभ से लेकर  अंत तक हमने देखा कि उस नन्हे तोते के परिजनों ने उसका जो  साथ बखूबी निभाया जिससे एक अहम   वास्तव हम पर  उजागर  हुआ कि उन  तोते परिवारों के सामाजिक सरोकार आज भी ख़ासे  जीवंत व सक्रिय है..

27 comments:

  1. तोते की उड़ान काफी रोचक है। लेखक का अवलोकन बहुत सूक्ष्‍म है। बधाई।
    *
    रश्मि जी लगता है आपने इसे जल्‍दबाजी में पोस्‍ट कर दिया। थोड़ा-सा संपादन जरूरी था। मैटर भी अगर जस्‍टीफाई करके लगातीं तो बेहतर होता। पैरा के बीच भी अंतर रखने से पढ़ने में आसानी होती। खैर यह तो अब भी किया जा सकता है।

    ReplyDelete
  2. तोतों का अपना सामाजिक तन्त्र है, उसमें मनुष्य का दखल स्वीकार कर लिया गया है।

    ReplyDelete
  3. नन्हे तोते का मिलना , उसे आसरा देना , उसकी उदासी... उसके परिवार की चिंता , देखरेख और उसकी उड़ान ...... बहुत अच्छी लगी कहानी . तोते के परिवार ने तो तोते का ख्याल रखा ही , लेखक ना भी हर वक़्त उस पर अपना ध्यान रखा , उसकी उदासी को समझा ...... ऐसा न होता तो इतनी अच्छी कई सन्देश देती यह कहानी हमारे बीच न होती . आपदोनों को बधाई

    ReplyDelete
  4. शुक्रिया राजेश जी,

    पैरा के बीच अंतर कर दिया है.आशा है अब सबों को पढ़ने में आसानी होगी.

    ReplyDelete
  5. बहुत प्यारी कहानी ...आखिर तक बांधे रहने में कामयाब !
    आजादी सबको इतनी ही प्यारी होती है ..उस दिन उनके घर जश्न मनाया होगा !

    ReplyDelete
  6. रश्मि जी!अतिथि लेखकों की रचनाएं प्रकाशित करने का यह महति कार्य जो आपने प्रारम्भ किया है वह निश्चित रूप से सराहनीय है.. ऐसे ही कभी (एनी ब्लोगर्स के साथ) आपने मेरी रचना भी प्रकाशित की थी..
    एक मूक पक्षी के परिवार और पारिवारिक संवेदनाओं के साथ हमारा तादात्म्य स्थापित करती यह रचना बड़ी कोमल है... जी. जी. शेख साहब को बधाई!!

    ReplyDelete
  7. तोता पुराण ने काफी बाँध के रखा. सम्बन्धों के प्रति संवेदनशीलता को शेख साहब ने बड़ी शिद्दत से निभाया है.

    ReplyDelete
  8. बड़ी प्यारी पोस्ट है .... पक्षियों का साथ भी बहुत कुछ बताता सिखाता है.....

    ReplyDelete
  9. तोते बहुत समझदार होते है। मेरे घर भी दो तोते रोजाना आते है, हम उन्हे फल के टूकड़े दे देते है। खा पीकर उड़ जाते ह। जब हम कभी उन लोगो पर ध्यान नही दे पाते है तब वे खिड़की पर आकर शोर मचाते है। जैसे कह रहे है "हम आ गये है, खाना दो!" खिड़की के बाजू मे ही फलो की प्लेट रखी होती है, आजकल उसके खाली हो जाने पर हमसे ज्यादा चिंता तोतो को होती है!

    ReplyDelete
  10. अगर वे परिंदे को आज़ाद ना छोड़ते तो मुझे दुःख होता !

    ReplyDelete
  11. स्वतंत्रता सभी प्राणियों को प्यारी है । यह इन्सान ही है जो दूसरों को ग़ुलाम बनाकर खुश होता है ।
    कहानी में सच्चाई झलक रही है ।

    ReplyDelete
  12. तोतों के ऐसे सामाजिक सरोकारों का पता नहीं था। बहुत ही जानकारी परक पोस्‍ट।

    ReplyDelete
  13. पोस्ट पढ़कर पिछले साल लिखी अपनी कहानी याद आ गई...

    पिंजरा...

    मल्लिका और बादशाह बाग़-ए-बहारा में टहल रहे थे...मौसम भी बड़ा दिलकश था...टहलते-टहलते मल्लिका की नज़र एक पेड़ की शाख पर बैठे बेहद खूबसूरत तोते पर पड़ी...इंद्रधनुषी रंगों से सज़ा ये तोता बड़ी मीठी बोली बोल रहा था...तोते पर मल्लिका का दिल आ गया...यहां तक कि मल्लिका बादशाह से बात करना भी भूल गई...तोते को एक टक देख रही मल्लिका के दिल की बात बादशाह समझ गए...बादशाह ने फौरन सिपहसालारों को हुक्म दिया- शाम तक ये तोता बेगम की आरामगाह के बाहर लगे झूले के पास होना चाहिए...और इस तोते के लिए बड़ा सा सोने का पिंजरा बनवाने का फौरन इंतज़ाम किया जाए...
    एक बहेलिये की मदद से सिपहसालारों ने थोड़ी देर में ही तोते पर कब्ज़ा पा लिया...तोते को महल ला कर बेगम की आरामगाह में पहुंचा दिया गया...शाम तक सोने का पिंजरा भी लग गया...तीन-चार कारिंदों को ये देखने का हुक्म दिया गया, तोते को खाने में जो जो चीज़ें पसंद होती है, थोड़ी थोड़ी देर बाद उसके पिंजरे में पहुंचाई जाती रहें...तोते को पास देखकर मल्लिका की खुशी का तो ठिकाना नहीं रह गया...लेकिन तोते के दिल पर क्या गुज़र रही थी, इसकी सुध लेने की भला किसे फुरसत...कहां खुले आसमान में परवाज़, एक शाख से दूसरी शाख पर फुदकना...मीठी तान छेड़ना...और अब हर वक्त की कैद...आखिर इस मल्लिका और बादशाह का क्या बिगाड़ा था, जो ये आज़ादी के दुश्मन बन बैठे...मानता हूं, खाने के लिए सब कुछ है...लेकिन ऐसे खाने का क्या फायदा...मनचाही ज़िंदगी जीने की आज़ादी ही नहीं रही तो क्या मरना और क्या जीना...तोते का गुस्सा बढ़ जाता तो पिंजरे की सलाखों से टक्करें मारना शुरू कर देता...शायद कोई सलाख टूट जाए और उसे वही आज़ादी मिल जाए. जिसके आगे दुनिया की कोई भी नेमत उसके लिए अच्छी नहीं...सलाखें तो क्या ही टूटने थीं, तोते के पर ज़रूर टूटने लगे थे...दिन बीतते गए तोता उदास-दर-उदास होता चला गया...तोते पर किसी को तरस नहीं आया...दिन-महीने-साल बीत गए...लेकिन तोते का पिंजरे से बाहर निकालने के लिए टक्करें मारना बंद नहीं हुआ...एक बार मल्लिका बीमार पड़ गई...बादशाह आरामगाह में ही मल्लिका को देखने आए...मल्लिका को निहारते-निहारते ही बादशाह की नज़र अचानक तोते पर पड़ी...तोते को गुमसुम उदास देख बादशाह को अच्छा नहीं लगा...लेकिन उसने मल्लिका से कुछ कहा नहीं...मल्लिका को एक सयाने को दिखाया गया तो उसने बादशाह को सलाह दी कि किसी बेज़ुबान परिंदे को सताने की सज़ा मल्लिका को मिल रही है...इसलिए बादशाह हुज़ूर अच्छा यही है कि पिंजरे में कैद इस तोते को आज़ाद कर दिया जाए...मल्लिका से जान से भी ज़्यादा मुहब्बत करने वाले बादशाह ने हुक्म दिया कि तोते को फौरन आज़ाद कर दिया जाए...हुक्म पर तामील हुई...तोते के पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया गया...ये देख तोते को आंखों पर भरोसा ही नहीं हुआ...भरोसा हुआ तो तोते ने पूरी ताकत लगाकर पिंजरे से बाहर उड़ान भरी...लेकिन ये क्या तोता फड़फड़ा कर थोड़ी दूर पर ही गिर गया...या तो वो उड़ना ही भूल गया था या फिर टूट टूट कर उसके परों में इतनी ताकत ही नहीं रही थी कि लंबी उड़ान भर सकें...तोते की ये हालत देख उसे फिर पिंजरे में पहुंचा दिया गया...अब तोता शान्त था...फिर किसी ने उसे पिंज़रे से बाहर आने के लिए ज़ोर लगाते नहीं देखा...शायद इसी ज़िंदगी को तोते ने भी अपना मुस्तकबिल (नियति) मान लिया...

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  14. बचपन में हमारे घर भी बहुत प्यारा सा तोता था जो पापा के छींकने की नक़ल करता था , डायनिंग टेबल के सामने लटकते अपने पिंजरे से यदि पापा खाना खाते नजर आते तो बहुत शोर मचाता था जबतक कुछ उसे भी नहीं खिलाया जाए ...एक दिन पिंजरे की चौड़ी पट्टी से सिर निकलकर चीख रहा था तो बिल्ली निगल गयी...तब से पक्षियों को पालतू बनाने का दिल नहीं करता ...रोज आते हैं , दाना चुग कर उड़ जाते हैं !

    तोतों में भी सामाजिकता बची हुई है जैसे इंसानों में कुछ प्रतिशत ही सही !

    तुम्हारी (अतिथि की )कहानी ने कैसे सबको प्रभावित किया कि सब अपने संस्मरण और कहानी याद करने लगे ...

    ReplyDelete
  15. बड़ी प्यारी रचना है मोनिका जिआ उर रश्मि जी की बातों से सहमत हूँ समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://aapki-pasand.blogspot.com/2011/12/blog-post_19.html

    ReplyDelete
  16. मुझे तो लगता था तोते बस रट्टू होते हैं :)

    ReplyDelete
  17. तब तो यह हाथ से तोते उड़ गए जैसा अनुभव नहीं हुआ क्या ?

    ReplyDelete
  18. बढिया है. शेख साहब को निश्चित रूप से अपना ब्लॉग बनाना चाहिये. आभार, आप दोनों का :)

    ReplyDelete
  19. :)
    आपके ब्लॉग पर अतिथि पोस्ट हमेशा बहुत अछे अछे वाले होते हैं...उन सभी लोगों को ब्लॉग बनाने के लिए भी आप कहिये अब :)

    ReplyDelete
  20. बहुत रोचक कहानी रही इस नन्हें तोते की ! पढ़ कर आनंद आया ! कभी सुविधा हुई तो मैं भी अपना एक संस्मरण अपने तोते से सम्बंधित आप सबके साथ ज़रूर बाँटूँगी जब मेरा तोता मेरी अनुपस्थिति में उड़ गया था और मेरे पतिदेव ने अकथनीय प्रयास कर उसे बड़े कौशल से दोबारा पकड़ा था कि मैं कहीं नाराज़ ना हो जाऊँ और साथ ही उन्हें यह चिंता भी थी कि उड़ने में पूर्ण रूप से सक्षम ना होने की वजह से वह कहीं किसी खतरनाक बिल्ली का ग्रास ना बन जाये ! इतने प्यारे संस्मरण को हम सबके साथ बाँटने के लिये आपका व आपके मित्र बंधु का हार्दिक आभार !

    ReplyDelete
  21. तोता एक माध्यम है विचारों का ताना बाना बुनने के लिए ... और कुछ न कुछ सन्देश देने के लिए ... बहुत रोचक और दिलचस्प रही ये कहानी ... बधाई इस प्रस्तुति पे ...

    ReplyDelete
  22. नन्हें तोते की रोचक गाथा...अच्छा लगा कि उसका परिवार उसे साथ ले उड़ा...वही उसका उन्मुक्त जीवन है.....सुन्दर प्रस्तुतिकरण.

    ReplyDelete
  23. आजादी सब को प्यारी होती है..बहुत प्यारी कहानी ....

    ReplyDelete
  24. शेख जी ने मुझे ई मेल के माध्यम से ये कहानी भेजी थी. मझे बहुत ही प्यारी लगी. शेख जी बज़ के माध्यम से ही मेरे भी दोस्त बने और अब बहुत अच्छे मित्र हैं. उनकी टिप्पणियाँ सच में अत्यधिक सारगर्भित होती हैं. वे कुछ ही लोगों को पढ़ते हैं, लेकिन पूरी गंभीरता से. हिन्दी भाषी ना होने के कारण कुछ व्याकरणिक त्रुटियाँ हो सकती हैं, लेकिन उनकी भाषा उच्चकोटि की है.

    ReplyDelete