Wednesday, November 30, 2011

कौन तय करेगा...क्या लिखना सार्थक है..और क्या निरर्थक..



ये पोस्ट एक साल पहले ही लिखने की सोची थी...जब बाल श्रम की त्रासदियों पर लिखने पर मुझसे कुछ सवाल किए गए थे.पर फिर बाद में इरादा छोड़ दिया...हाल में ही जब इसी विषय से सम्बंधित एक पोस्ट लिखी तो मुझे आभास था कि फिर से इस पर आपत्ति दर्ज करते हुए कुछ सवाल उठाये जायेंगे. इसलिए इस बार पहले से ही तय कर लिया था कि अगली पोस्ट यही होगी...मेरे अंदेशे को सही ठहराते हुये, फिर से सवाल किए गए और मैने जबाब में लिख भी दिया...कि अगली पोस्ट में विस्तार से इस सम्बन्ध में लिखूंगी...लेकिन फिर से विचार त्याग दिया कि क्यूँ 'किसी एक के कथन  को इतनी तवज्जो दी जाए??'...लेकिन अब देख रही हूँ कि एक चर्चा सी ही निकल पड़ी है और कई सुर एक साथ मिलकर इसे महज 'आरामकुर्सी चिंतन' का नाम दे रहे हैं.

सर्वप्रथम  तो ये सोचा जाए कि 'हम लिखते क्यूँ हैं?' हो सकता है, कुछ लोग समाज में एक जागरण..क्रांति लाने के लिए लिखते हों....लोगो को ज्ञान बांटने के लिए लिखते हों. खुद को कवि-कहानीकार-पत्रकार के रूप में स्थापित करने को लिखते हों. सबके अपने कारण होंगे...पर मैं अपने बारे में कह सकती हूँ , मैं कोई क्रान्ति लाने...या ज्ञान बांटने का दावा नहीं करती या कोई तमगा लगाने की इच्छा नहीं रखती... मुझे लोगों से संवाद स्थापित करना..उनके साथ अपने  विचार बांटना अच्छा लगता है. कोई किताब पढ़ती हूँ..फिल्म देखती हूँ...कोई खबर..या कोई सामाजिक समस्या उद्वेलित करती है...तो उस पर अपनी कहने और लोगो की सुनने की इच्छा होती है. जैसा हम अपने दोस्तों के बीच करते हैं....अपने सुखद-दुखद ..मजेदार संस्मरण भी सुनते सुनाते हैं.  (मेरे जैसे ,निश्चय ही कुछ और लोग भी होंगे ) मन में सैकड़ों तरह के विचार आते हैं....जिन पर चर्चा करने का मन होता है. अब इन विचारों पर पाबंदी लगा देना कि नहीं सिर्फ फलां-फलां विषय पर ही बात की जा सकती है...अमुक विषय पर नहीं क्यूंकि आप उस विषय पर कुछ कर नहीं सकते...उस समस्या का समाधान नहीं कर सकते तो आराम से कुर्सी पर बैठ कर उस विषय पर चिंतन  करना हास्यास्पद है.
 और रोचक बात यह है कि इस तरह की बातें  करने वालों की पोस्ट्स पर एक नज़र डाली तो पाया...उनलोगों ने भी तमाम तरह की समस्याओं पर मनन किया है...{जाहिर है कुर्सी पर बैठ कर ही किया होगा..ए.सी. ऑन किया था या नहीं..ये नहीं कहा जा सकता  :)} अब कोई उनसे पूछे...आपने तो अन्ना के साथ दस दिन का अनशन नहीं रखा...आप तो नहीं गए लाल चौक पर झंडा फहराने...फिर उन विषयों पर चर्चा कैसे कर सकते हैं?...आपको तो बस आह-कराह भरे प्रेम गीत लिखने चाहिए. :)

यहाँ बहुसंख्यक ब्लोगर ऐसे हैं जिनका प्रोफेशन लेखन नहीं है....अपनी नौकरी.....घर की जिम्मेदारियों...सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए , थोड़ा सा समय निकाल कर अपने पसंदीदा विषयों पर वे लिखते हैं. कितने ही संस्मरण..कविताएँ...कहानियाँ पढ़कर लगता है...बिलकुल ऐसा ही तो हमने भी महसूस किया था. कई विषयों पर विस्तार से जानकारी मिलती है. जिन्हें पढ़कर पाठकों का भला अगर ना हो..तो कोई नुकसान तो नहीं ही होता. कितनी ही पोस्ट्स  के पीछे उस पर की गयी मेहनत नज़र आती है. लेखक कई सारे आर्टिकल्स पढ़कर उसका निचोड़ अपनी पोस्ट में प्रस्तुत कर देता है. अब लेखक ने भले ही वातानुकूलित कमरे में एक आरामकुर्सी पर बैठ कर यह सब किया हो...पर वह दस आर्टिकल  पढ़ने की हमारी मेहनत तो बचा लेता है....शायद  हम उतनी मेहनत करें भी ना...पर निश्चित रूप से लाभान्वित तो होते ही हैं. पढनेवाला भी शायद ए.सी. लगाकर , आराम से कुर्सी पर बैठ कर ही पढ़े...पर उसे यह अधिकार तो नहीं मिल जाता कि वो लिखने वाले पर सवाल खड़े करे कि उसने  तपती धूप में धूल भरी सड़कों की ख़ाक तो नहीं छानी...उनलोगों की मुश्किलें तो कम नहीं कर पाया...फिर उनकी मुश्किलों पर लिखने का क्या हक़ है?? 

टी.वी. चैनल्स पर सामाजिक विषयों पर लम्बे डिबेट्स..अखबारों में आलेख...सब कुर्सी पर और  वातानुकूलित कमरे में बैठकर ही किए/लिखे जाते हैं. जिसे बड़ी रूचि से बाकी सब अपने -अपने घर में  कुर्सियों पर बैठ कर { शायद ए.सी. भी लगाकर:)} देखते हैं...वहाँ तो सवाल नहीं उठाये जाते  कि क्या फायदा..इन सबसे??...समस्या का समाधान तो ये कर नहीं रहे??...फिर सिर्फ ब्लॉग पर लिखने वालों पर ही ये आपत्ति या छींटाकशी क्यूँ??

कितने ही लोगो की पोस्ट पढ़कर लोगो को नई जानकारी मिली होगी. मुझे अपनी पोस्ट्स याद हैं...जब २००९ में मैने सिवकासी के बाल -मजदूरों पर लिखा...कितने ही लोगो ने टिप्पणियों में कहा...कि उन्हें इसके विषय में नहीं मालूम था...दुबारा जब २०१० में उसे रिपोस्ट किया...तब भी ऐसी ही प्रतिक्रियाएँ  मिलीं...मेल में भी अक्सर लोग इसका जिक्र करते रहे...पूरे एक साल बाद अभी ४ नवम्बर को  हाल में ही फेसबुक पर एक लड़की की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई....इस मेसेज के साथ
  • Hello mam, Aapka blog dekha hai kai bar, lekin us par deepawali ka ek sansmaran jo ki shivkashi ke durdant sach ko bayan karta hai, use padh kar aankh me aasu aa gaye. Fir wo din aur aaj ka din hai ki maine patakhon ke bare me socha bhi nahi, isne kitno ko prabhavit kiya nahi janti par meri aur mere 12 saal ke bhai ki to zindagi hi badal di, halanki ham aur kuch to nahi kar sake par apne hisse ki imandari ham nibha rahe hai aur ishwar ki kripa se kabhi koi parivartan kar sakun to bahut khushi hogi.

    aapne soye hue logon ko ek bar jhakjhorne ka jo kam kiya hai wo apne aap me sarahniy hai. 

अगर किसी एक को भी मेरा लिखना सार्थक लगता है और वह उसे एक साल के बाद भी याद रखता है तो चाहे हज़ारो लोग मुझसे सवाल करते रहें, कि "आपने लिखने के सिवा क्या किया??" मुझे फर्क नहीं पड़ता. पटाखा उद्योग हो जरी उद्योग या कोई अन्य उद्योग..उसमे शामिल बच्चों की दुर्दशा  के सम्बन्ध में किसी ने तो पहली बार लिखा होगा...अगर वो भी यही सोच कर रुक जाता कि मैं इन बच्चों को इस उद्योग से छुड़ा नहीं पा रहा....उनके पुनर्वास के लिए कुछ नहीं कर पा रहा फिर मुझे लिखने का क्या हक़ है?? तो दुनिया के सामने इन मासूमों की सच्चाई कभी आ पाती??
शर्मिला इरोम वाली पोस्ट जब लिखी थी...तब भी टिप्पणियों में कई लोगो ने स्वीकार किया कि उन्हें इसके बारे में नहीं पता था ...लेकिन मुझे तो चार दीवारों के अंदर महफूज़ होकर लिखना ही नहीं चाहिए था क्यूंकि मैं शर्मिला  के साथ अनशन पर तो नहीं बैठी ...ऐसे ही महिलाओं के ऊपर घरेलू हिंसा...वृद्ध जनों के प्रति लोगो की उपेक्षा.....पति को खोने के बाद स्त्रियों कि स्थिति...immigrant workers....समाज में उपस्थित तमाम विसंगतियों के प्रति लिखना ही नहीं चाहिए....क्यूंकि हम इसे दूर तो नहीं कर पा रहे....पर जैसा कि शिल्पा मेहता ने एक पोस्ट पर अपनी टिप्पणी में लिखा था...the first step to improvement in these situations is spreading awareness "... तो पोस्ट पर सवाल खड़े करने के बजाय या फिर 'आर्म चेयर आर्टिकल' कहकर माखौल  उड़ाने के बजाय शिल्पा की बात पर भी ध्यान दिया जा सकता है..हालांकि ये स्पष्ट कर दूँ...मैं सोए समाज को जगाने के उद्देश्य से किसी योजना  के तहत कुछ नहीं लिखती.....इसलिए लिखती हूँ क्यूंकि ये बातें मुझे व्यथित करती हैं.

और ये पूछना  भी फ़िज़ूल है कि ,"आगे आयें और बतायें कि आपने अपने बच्चों के अलावा और किसी बच्चे /बच्चों के लिए क्या किया है ?  संवेदना व्यक्त कर देने से ही एक इंसान के दायित्वों की पूर्ति नहीं हो जाती ....इस दिशा में -वचने का दरिद्रता वाले लोग बहुत हैं भारत में " चलो, मेरे पास इस सवाल का जबाब था...मैने दे दिया....पर जो लोग भी गहरी संवेदनाएं रखते है, वे जरूर कुछ ना कुछ करना चाहते हैं. लेकिन उन्हें मौका और माहौल नहीं मिलता. हर शहर में सेवा संस्थाएं नहीं हैं...या हैं भी तो उनकी जानकारी नहीं होती.  कई बार महिलाएँ  घर के कामों से समय नहीं निकाल पातीं....या फिर घर वाले पसंद नहीं करते...कई पुरुष भी नौकरी की व्यस्तता से समय नहीं निकाल पाते. पर उन्हें लिखने का शौक है...और वे अपने व्यस्ततम दिनचर्या से थोड़ा समय निकाल कर अपनी जानकारी, लोगो के साथ बाँटते हैं,तो इसमें बुरा क्या है??  जरी उद्योग में ज्यादातर बच्चे ,मधुबनी-सीतामढ़ी--दरभंगा जैसे शहरों से लाए जाते हैं...अगर नेट पर इसके विषय में पढ़कर...उसी  शहर  के किसी व्यक्ति ने अपने सामने किसी एजेंट को उन बच्चों के माता-पिता को लुभाते देखा तो उन्हें सच्चाई से अवगत तो करा  सकता है.इसलिए यह कहना....कि कुछ ठोस नहीं कर पाते..तो इनपर बात भी नहीं करनी चाहिए..लिखना भी नहीं चाहिए....सही नहीं लगता.

 और क्या पता..अपने- अपने  स्तर पर सबलोग कुछ ना कुछ करते भी हों...क्यूंकि जो लोग सचमुच कुछ सेवाकार्य करते हैं..वे ढिंढोरा पीटना नहीं चाहते. मेरी एक सहेली है...हम रोज दिन में दो बार मिलते .हैं .साथ शॉपिंग जाते हैं...फिल्म जाते हैं पर उसने कभी नहीं बताया कि वो अपनी कामवाली के बेटे की दसवीं के किताबों और कोचिंग क्लास का पूरा खर्चा उठा रही है. हाल में ही उसकी बाई मेरे घर आई थी तो उसने बताया. ऐसे ही एक दूसरी सहेली ने नहीं कभी नहीं बताया कि एक सब्जीवाली के बेटे के ट्यूमर के टेस्ट-ऑपरेशन -हॉस्पिटल का सारा खर्च उसने दिया है. सब्ज़ीवाली ने बताया. ऐसे कई लोगो को जानती हूँ...जो अपने जन्मदिन पर उपहार नहीं लेते/लेतीं बल्कि...आग्रह करते हैं कि सड़क पर पल रहे बच्चों के लिए...चप्पलें...कपड़े...जरूरत के दूसरे सामान खरीद दिए जाएँ. बच्चों का जन्मदिन घर में नहीं मनाते  बल्कि अनाथालय के बच्चों के साथ मनाते हैं..(प्रसंगवश एक बात का उल्लेख कर रही हूँ . कई लोग  श्राद्ध के मौके पर या और मौकों पर गरीबों को हलवा -पूरी-खीर खिलाते हैं. लेकिन एक बार एक अनाथालय के संचालक ने आग्रह किया कि हलवा-पूरी की जगह सब्जियां डली सादी खिचड़ी खिलाना श्रेयस्कर होगा. क्यूंकि उन गरीबों को या अनाथालय में पल रहे बच्चों को घी-तेल-मसालों से युक्त गरिष्ठ भोजन की आदत नहीं होती. वे रुखी- सूखी खाते हैं इसलिए ऐसा खाना खाने के बाद...उनकी तबियत खराब हो जाती है. दस्त-उलटी-पेटदर्द की शिकायत होने लगती है. हमलोग रोज दाल-चावल -रोटी-सब्जी खाते हैं..इसलिए  हलवा-पूरी हमें विशेष लगता है..पर उन गरीबों के लिए हमारा सादा खाना ही स्वादिष्ट व्यंज्यन से कम नहीं...गरीबों को हलवा -पूरी खिला..लोग समझते हैं..बहुत पुण्य कमा लिया  पर बदले में वे उनका अहित ही कर जाते हैं...हाँ, कम घी -तेल वाली मिठाई  उन्हें दी जा सकती है ) 

जब इंसान के भीतर संवेदनाएं होंगी तो वह उन समस्याओं की चर्चा भी करेगा..उनपर लिखेगा भी....और अपने स्तर पर उसे दूर करने की भी कोशिश करेगा...इसलिए ये कहना कि 'बाल श्रम की चर्चा ही व्यर्थ है...इन सब विषयों पर लिखना ही निरर्थक  है'...कुछ अजीब सा लगता है...तो फिर सार्थक लेखन क्या है??...सिर्फ ,प्रेम और विरह के गीत....संस्मरण...प्रवचन.....फूल-तारे-चाँद-खुशबू की बातें??

59 comments:

  1. आपकी इस पोस्‍ट को पढ़कर पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी जी के निबन्‍ध 'क्‍या लिखूँ' की याद आ गई। भूमिका बांधते बांधते आपने मन्‍तव्‍य को व्‍याख्‍यायित कर दिया है। बढि़या पोस्‍ट।

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  2. आपने जो भी लिखा आप उसे इस लिए लिख पाई क्योंकि आपके दिल ने उसे महसूस किया ,आपकी संवेदनाओं को झकझोरा ...लोगो की समस्या ये है की वो उन्ही बाटों को देखते हुए भी महसूस नहीं कर पाते है ,और किसी और को लिखता देख कर छिद्रान्वेषण में लग जाते है ...आप जागरूकता ला रही है लिखती रहिये :-)

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  3. रश्मि जी,
    वो एक गीत है न...
    ’कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना’
    लिहाज़ा...आप अपना लेखन अपने विचारों के साथ ज़ारी रखिए...
    शुभकामनाओं सहित.

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  4. रश्मि - मुझे लगता है - की बजाये असल मुद्दे के हमारी ब्लॉग दुनिया में महत्व इस चीज़ का ज्यादा हो गया है की बात कही किसने है |

    अब इतने सारे मुद्दे हैं - बाल श्रम है, गरीबी है, भ्रष्टाचार है, दहेज़ है, महिला उत्पीडन है, भूख, महंगाई, न्यूक्लियर warfare , चाँद पर जाने की कोशिशें, सामाजिक कुप्रथाएं, illiteracy , पर्यावरण, save the tiger , drugs , बालिका भ्रूण की हत्या .................................. the list is unending in fact |

    जिसका ह्रदय जिस विषय से अधिक द्रवित हो - वह उस पर लिखे, बजाये की जिस विषय पर उसका मन नहीं agree करता उस पर फलाने ने यह क्यों लिखा, वह क्यों लिखा, उस लिखने वाले ने स्वयं क्या किया इस विषय में इस पर समय और ऊर्जा नष्ट करने के , तो बहुत बेहतर होगा | तुम जानती ही हो की मैं ब्लॉग दुनिया में बहुत ही नयी हूँ - परन्तु यहाँ जो माहौल है - कि मैं जो सोचूं वही सब सोचें, यह ठीक वैसा ही है - जो असल दुनिया में | हम भले ही "आभासी दुनिया " के वासी हो गए हैं आज, किन्तु हैं तो असल ही न ? तो वही real world politics हम यहाँ भी कर रहे हैं |

    तुम बाल श्रम पर जो लिख रही हो - उसका एक सच्चा असर बताऊँ ? यह उत्तर है - उन सभी को - जो कहते हैं की इस से कुछ भला नहीं होगा |

    पहले मैं सरकारी स्कूल में मुफ्त में फिजिक्स पढ़ाती थी , क्योंकि शहर छोटा है - बच्चे गरीब परिवारों के | छोटे शहर में पोस्टिंग हुए senior क्लासेज़ के शिक्षक जल्द ही कुछ जुगत लगा कर बड़े शहर में अपना transfer करा लेते हैं | बच्चों के parents अक्सर mines में मजदूर हैं - tution कहाँ से दिलाएंगे ? तो बच्चे अक्सर fail होते हैं फिजिक्स / गणित में - क्योंकि कोई सुविधाएं नहीं हैं | तो पहले मैं पढ़ाती थी | फिर कुछ आलस के और कुछ व्यस्तता के चलते छोड़ दिया था |

    फिर तुम्हारी "जरी बोर्डर ..." वाली पोस्ट पढ़ी - और बहुत ग्लानी हुई - की थोड़े से आलस के कारण कितने बच्चों का भविष्य खराब हो रहा है और इश्वर की दी काबिलियत हो कर भी मैं कुछ कर नहीं रही | तो अभी दो हफ्ते से फिर से सरकारी स्कूल में कक्षाएं लेने लगी हूँ कोलेज से समय निकल कर | कोलेज में november december हम लोग सिर्फ मार्क्स एंट्री और एग्जाम सम्बंधित काम करते हैं - classes नहीं होतीं - तो समय होता है | HOD से permission ले ली है और स्कूल जाती हूँ |

    तो ऐसा नहीं की इन लेखों का कोई असर नहीं होता हो - होता है | जो तुम्हे important लगता है - लिखती रहो |
    "कर्मंयेवाधिकारास्ते - मा फलेषु कदाचनः , मा कर्म फल हेतु: भू , मा ते संगो अस्तु अकर्मणि "
    तुम अपना कर्म "लेखन" करो - फल कान्हा जी पर छोड़ दो | :)

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  5. Namaskar...

    Aagar koi kahta hai ki samajik chetna laane ke liye prayas karna nyaayochit nahi hai to yah na sahi hai aur na tarksangat. Har sanvedansheel vyakti ese dayneey kissee sun dravit ho uthega...hum apne saath ghati har ghatna ka jikr apne mitron, apne parivaar se kyon karte hain? Kya sahanubhuti paane ke liye? Shayad nahi eska ek udyeshy ye bhi hota hai ki jaise aap kop anubhav hua hai doosre ko na ho... Patrkarita ya blogging bhi samaj main chetna failane ka hi kary kar rahe hain.. Kahi koi kureeti dikhe, apraadh ho, ya kisi prakar ki bhi raajnaitik, samajik ya samsamayik ghatnakram par goshtian, samachar batane ka bhi yahi udyeshy hai ki log jagrook hon.. Aap bhi blogging ke jariye yah kar rahi hain..es par chhintakashi karna tarksangat nahi lagta... Yah theek hai ki abhivyakti ki swtantrta hai to fir koi yah kaise bhul jaata hai yahi swatantyryta blog lekhak ki bhi to hai... Kya bhikhari par likhne ke liye bhikhari hona jaroori hai??

    Aap wo likhen jo aapko achha lage..jo aapki sanvedna ko chhue, udwelit athwa prabhavit kare.. Vishay ka chunav aapka hai..kathy aapka aur shilp aapka..chahe kavita likhen, gazal likhen, nazm likhen , aalekh likhen ya fir kuchh na likhen..yah purntaya aap par nirbhar hai... Koi ittefak rakhe to theek varna uski marzi...

    Aapki agli post ki pratiksha rahegi..

    Shubhkamnaon sahit...

    Deepak Shukla..

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  6. संवेदनशील मन की अकुलाहट ही लिखने का एकमात्र कारण है मेरे लिये।

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  7. लिखता है व्यक्ति खुद के लिए ... जो किसी को खुद से जोड़ जाए ! लिखना भी जागरण है .... समाचार पत्र क्यूँ पढ़ते हैं लोग ? बिना पढ़े , सुने समाज की देश की स्थिति कैसे जानेंगे ? .... कुछ लोग विरोध में बोलने के ख्याल से ही पढ़ते हैं ....

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  8. आपने जो दिल से जो महसूस किया वह लिखा..जब तक कोई रचनाकार किसी बात को स्वयं गहराई से महसूस नहीं करता, वह उस विषय पर सार्थक लेखन नहीं कर सकता..जब उसे कोई बात अन्दर तक छू जाती है और उस विषय पर लिखता है तो उसकी सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह लगाने का अधिकार किसी को नहीं है.
    बहुत सारगर्भित विचारणीय आलेख...

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  9. नकारात्मक बातों पर ध्यान नहीं देनी चाहिए...हम जो कर रहे हैं और हमारी आत्मा,हमारा विवेक यदि उसे सही मानता है, तो फिर किसीके उसे रुचने न रुचने से क्या फर्क पड़ता है ...

    दूसरी बात है.. साधनहीन ही संवेदनशील होगा,समाज के हित सार्थक कुछ सोचने करने को उत्सुक तथा तत्पर होगा, ऐसा होता है क्या????

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  10. संवाद स्थापित करना वाजिब कारण हो सकता है। तभी शायद ब्लॉग की अपेक्षा फेसबुक बेहतर साबित हो रहा है - इन्स्टेण्ट संवाद की सुविधा है वहां!

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  11. @ज्ञानदत्त जी,
    यहाँ संवाद स्थापित करने से अर्थ है....अमुक विषय पर लोगो के विचार जानना और विमर्श को आगे बढ़ाना .
    फेसबुक पर भी सक्रिय हूँ..पर creative urge के सम्बन्ध में उसकी सीमाएं मुझे सीमित लगती हैं.

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  12. @शिल्पा,
    तुमने तो इमोशनल कर दिया..

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  13. बहुत सही कहा है आपने ... बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  14. आपके लेखों से किसी की अवमानना होती हो, मुझे तो आज तक ऐसा नहीं लगा, शायद किसी को भी नहीं लगा होगा। ’आरामकुर्सी चिंतन’ जैसे सर्टिफ़िकेट देने वाले किस हैसियत से तय कर सकते हैं कि क्या लिखना सार्थक है और क्या निरर्थक?
    लेकिन आखिरी लाईन में आप भी उसी टोन में लिख गईं, ये माजरा अपने भी समझ नहीं आया। इस मापदंड से तो हम जैसे बहुत सों का दिवाला पिट जायेगा:) वैसे इसी सवाल को एक बार मैंने भी गिराया था, लिंक देने से नियम भंग तो नहीं होगा न? http://mosamkaun.blogspot.com/2010/08/blog-post.html
    मेरे हिसाब से तो जिसे जो अच्छा लगता है, उसे लिखना चाहिये - भाषा की मर्यादा का हर हाल में ख्याल रखा जाये, वही बहुत है। सार्थक और\या रोचक नहीं होगा तो कौन अपनी आँखें फ़ोड़ेगा, वक्त और दिमाग खराब करेगा?
    हमें तो यकीन है कि ऐसे सवाल आप को और ज्यादा लेख लिखने के लिये प्रेरित करेंगे।

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  15. स्वयं ही तय करना होता है कि क्या लिखा जाए ।
    अच्छा लिखा तो प्रशंसा मिलती ही है ।
    वाद विवाद में सहमति असहमति होना स्वाभाविक है ।
    असहमति से विचलित नहीं होना चाहिए । यही परिपक्वता की निशानी है ।

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  16. रश्मि
    जहां तक मुझे लगता हैं मनोज जी की पोस्ट महज एक आत्म चिंतन से ज्यादा कुछ नहीं हैं . उस पोस्ट पर मेरे कमेन्ट के बाद उन्होने मुझे मेल दे कर कहा की वो मुझ से एक आक्रामक कमेन्ट की अपेक्षा कर रहे थे लेकिन मै तुम्हे पूरी ईमानदारी से कह रही हूँ उनकी पोस्ट मुझे महज एक आत्म चिंतन लगा .
    वो जो सोच पाए मेरी पोस्ट उसके बाद तुम्हारी पोस्ट पढ़ और बहुत सी और पोस्ट पढ़ कर उसने शायद उनके मन में कई सवाल खड़े कर दिये . जिसको उन्होंने पोस्ट के रूप में लिख दिया .
    हर चीज़ का , हर सोच का एक भावनात्मक पक्ष होता हैं और एक प्रक्टिकल . जो लोग किसी मुद्दे से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं उन्हे उस पक्ष का प्रक्टिकल रूप नहीं भाता हैं .
    मै नारी मुद्दों से जुड़ी हूँ , क़ोई भी महिला जो विवाहित हैं अगर मुझ से कहती हैं की उसके पति का विवाह के बाद किसी अन्य से सम्बन्ध हैं तो मै उसको तलाक लेने की सलाह देती हूँ , वही कुछ विवाहित महिला ब्लॉगर इसको गलत मानते हुए उसको किसी भी कीमत पर परिवार से जुड़े रहने की सलाह देती हैं
    तुम एक बार इस नज़रिये से मनोज जी की पोस्ट को पढो शायद उसमे दिये हुए प्रक्टिकल सवाल तुमको इतने गलत ना लगे क्युकी वो किसी व्यक्ति विशेष से जुड़े मुझे लगे ही नहीं , मुझे वो केवल बहुमत की सोच से जुड़े लगे .

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  17. सभी मनुष्‍य की प्रकृति एक सी नहीं होती .. इसलिए सबके सोंचने का अलग अलग ढंग होता है .. समाज के खास खास पक्ष को देखने का सबका अलग अलग नजरिया होता है .. किसी से कोई दिक्‍कत नहीं .. बस चिंतन , प्रयास और कार्य सकारात्‍मक होना चाहिए .. जिसके पास जो ताकत है उसका उपयोग समाज की समस्‍या को दूर करने के लिए कर सकता है .. जिनके पास पैसा है वे पैसे से सकारात्‍मक काम कर सकते हैं .. जिनके पास शक्ति है उसका सहारा लेंगे .. जिनको लिखने की शक्ति मिली है .. वो लेखनि से ही किसी प्रकार की आवाज उठाएंगे .. समस्‍याओं को दूर करने में सबको एक दूसरे से संबंध बनाकर चलने की आवश्‍यकता पडती है !!

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  18. रश्मिजी आपका आक्रामक तेवर देखकर डर ही गया... बाल श्रम मुझे भी उद्वेलित करता है... मेरी कई कवितायेँ इन पर हैं.... आपके बाल श्रम से जुड़े सभी आलेख पढ़े हैं.. मनोज की का चिंतन भी पढ़ा है.... मुझे दोनों में कोई विवाद तो नज़र नहीं आया.... बाकी शायद मुझे "बिटविन दी लाइन" समझ नहीं आती है....

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  19. आपने अपने पक्ष को अच्छी तरह रख दिया है -लेखक समस्याओं को उठाकर अपने सामजिक सरोकारों का निर्वाह करता है -और यह सचमुच उससे अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि वही उन इंगित समस्याओं का निराकरण भी कर डाले ...वह कई बार ह्विसिल ब्लोवर होता है ....मगर उसकी एक बड़ी जिम्मेदारी भी है -उसे व्यक्तिनिष्ठता के बजाय वस्तुनिष्ठता का आग्रही होना चाहिए और समस्याओं के प्रस्तुतीकरण और विवेचन में का यथा संभव सभी पहलुओं का समावेश कर उसे संतुलित रूप देना चाहिए ..बालश्रम की आपकी संवेदना के औचित्य पर सवाल नहीं है मगर आपको उनकी गरीबी बेरोजगारी के परिप्रेक्ष्य में उठाये संशयों को भी सकारात्मक दृष्टि से लेना चाहिए ...न कि उनके प्रति प्रतिक्रियात्मक हो उनका प्रतिकार करना चाहिए .मुंडे मुंडे जायते तत्वबोधः...आलोचनाओं से व्यग्र होने की जरुरत नहीं है ...आपका मन और प्रयास अगर ईमानदार है तो आगे बढ़ती रहिये... मगर हाँ रचनात्मक विरोधों को दमन करने के नजरिये से न देखिये...
    ओह काफी उपदेश हो गया मगर यह तो बनता ही था ......

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  20. लिखना न लिखना मर्जी और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। हर एक का अपना विवेक होता है, शैली होती है, रूचि होती है, उद्देश्य होता है। उस पर सवाल तब उठाना चाहिये जब किसी का मंतव्य कुछ गलत भावना से प्रेरित लगे वरना तो यह प्लेटफार्म ही ऐसा है कि जिसे जितना चाहे खुलकर लिखने बोलने का अवसर प्रदान करता है। वरना तो पहले साहित्यिक या वैचारिक आदान प्रदान हेतु डाक पर लोग निर्भर रहते थे, बाद में ब्लॉग से दुतरफा संवाद का अवसर मिला और जब उससे भी ज्यादा अधैर्य हुआ तो फेसबुक आदि पर रम लिये। यदि इन सब माध्यमों में लिखने के लिये पहले रिसर्च और फील्ड वर्क करने की बाध्यता है तो इस पर क्या कहा जाय।

    हां कभी कभी कुछ ज्यादा ही फेकने लगते हैं लोग तो जरा ताकीद करनी पड़ती है कि जमीन समझकर कहिये :)

    शिल्पा जी की टिप्पणी पढ़ना अच्छा लगा।

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  21. कौन क्या कहता है क्या सोचता है उसके चलते कोई अपने दिल से जुड़ी बात कहना बंद नहीं कर देगा ना। मेरी समझ से हम सबसे अच्छा तभी लिख पाते हैं जो विषय मन को उद्वेलित करता है और जिसके बारे में कुछ कहने को हमारे पास कुछ नया होता है।

    "अगर किसी एक को भी मेरा लिखना सार्थक लगता है और वह उसे एक साल के बाद भी याद रखता है तो चाहे हज़ारो लोग मुझसे सवाल करते रहें, कि "आपने लिखने के सिवा क्या किया??" मुझे फर्क नहीं पड़ता "

    बस यही जज़्बा बनाए रखें...

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  22. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  23. @रचना जी,
    यह पोस्ट किसी एक पोस्ट के प्रतिक्रिया स्वरुप नहीं लिखी गयी है....पिछले एक साल से कई पोस्ट और मेरे पोस्ट पर की गयी टिप्पणियों से सम्बन्ध है इसका...
    अगर आपको भी ध्यान हो तो सारी पोस्ट और टिप्पणियाँ याद आ जायेंगी
    आप किसी एक पोस्ट से इसे ना जोड़ें प्लीज़...

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  24. @अरविन्द जी,

    मगर हाँ रचनात्मक विरोधों को दमन करने के नजरिये से न देखिये..

    किसी से ये सवाल करना..रचनात्मक विरोध कहलायेगा.....मेरी अल्पबुद्धि को इसमें रचनात्मकता नज़र नहीं आई...

    "आगे आयें और बतायें कि आपने अपने बच्चों के अलावा और किसी बच्चे /बच्चों के लिए क्या किया है ? संवेदना व्यक्त कर देने से ही एक इंसान के दायित्वों की पूर्ति नहीं हो जाती ....इस दिशा में -वचने का दरिद्रता वाले लोग बहुत हैं भारत में "

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  25. रश्मि, हतप्रभ हूं, कि बाल-श्रम जैसे नाज़ुक, सम्वेदनशील मसले का मखौल भी उड़ाया जा सकता है? मुझे नहीं मालूम कि ये मखौल किसने उड़ाया, बस, इतना महसूस हो रहा है कि तुमने बहुत तक़लीफ़ के साथ ये पोस्ट लिखी है.
    रश्मि, लिखने वाले की ज़िम्मेदारी असल में करने वाले से ज़्यादा बड़ी होती है. किसी भी मामले की जानकारी हमें किसी के आलेख/ रिपोर्ट या समाचार के द्वारा ही होती है, उस पर कोई कार्यवाही/कार्रवाई तो बाद में होती है. कई बार तो किसी विषय-विशेष पर बार-बार लिखने भर से ही सम्बन्धित विभाग के कान पर जूं रेंगती है, और कुछ सार्थक पहल हो पाती है. सारी बातें करने के बाद ही लिखी जाती हैं, ऐसा तो है ही नहीं.
    अब सवाल "आराम-कुर्सी चिन्तन/लेखन" का है तो ध्यान मत दो, ऐसी बातों पर. तुम जिस शिद्दत के साथ लिखती हो, वो पढने वाले को महसूस होती है. फिर ये क्या कम है, कि तुम्हारे लिखने के बाद उसी विषय को आगे बढाया जा रहा है?
    बाल-श्रम हमारे देश की बहुत बड़ी समस्या है, इस पर लगातार लिखे जाने की ज़रूरत है शायद कोई सार्थक पहल हो ही जाये. तुमने ये सार्थक शुरुआत की है, इसे जारी रखो. अगर मैं किसी तरह की मदद कर सकूं, तो मुझे खुशी होगी :)
    तुम्हारा जुझारूपन काबिलेतारीफ़ है.
    गम्भीर विषयों का मखौल उड़ाने वाले खुद हंसी के पात्र बन जाते हैं. चिन्ता नको.

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  26. विचारों को साझा करने का जरिया है लेखन ..... यह चलता रहे

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  27. @ व्यर्थ हो गये दार्शनिक ,

    आह...बेचारे अरस्तू और सुकरात का अब क्या होगा :)

    वेदव्यास ने भी युद्ध नहीं लड़ा फिर बाबा तुलसी और महर्षि बाल्मीकि भी प्रेक्टिकल्स के मामले में ज़ीरो थे :)

    कार्ल मार्क्स को लेनिन और माओ के लिए सब कुछ छोड़ देना चाहिए था व्यर्थ ही लिखा उसने इतिहास दर्शन :)

    गुलज़ार को हर प्रणय गीत लिखने से पहले एक नग प्रेम करने और हर विरह गीत के पीछे एक नग तलाक ले लेने की व्यावहारिकता निभानी चाहिए थी :)

    प्रेम और विवाह पर लिखने से पहले हर बंदे को घोड़ी चढ चुकना चाहिए :)

    आगे से हर रिसर्चर पहले हायपोथीसिस टेस्ट करेगा उसके बाद हायपोथीसिस बनाया करेगा :)

    हर इंसान कुछ भी 'कर गुजरने' के बाद ही उस पर 'सोचा करेगा' :)

    पति पहले बच्चा पैदा करेगा फिर प्रेम के विषय में सोचेगा :)


    @ रश्मि जी ,

    हमने तो सुना है कि 'आर्म चेयर मेथड दार्शनिकों की रीत' है ! अब वे कौन हैं ,जो दार्शनिकों के इस हक़ के विरुद्ध हैं ? मुझे नहीं मालूम ये ख्याल किस महान विद्वान के हैं , पर वे चाहे जो भी हों , उन्होंने दुनिया के तमाम दार्शनिकों / चिंतकों की वाट लगा दी है :)

    धन्य हैं वे जो प्रेक्टिकल्स के बाद थियोरी की सोचेंगे :)

    'अमल' के बाद 'ख्याल' और 'हमल' के बाद 'ज़ज्बाती उबाल' की इस टेक्नीक के प्रणेता का नाम,आपने लिखा नहीं है और अब बताइयेगा भी मत ! किसी अपने का नाम सुनकर दुखी होने की
    रत्ती भर भी ख्वाहिश नहीं है :)

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  28. रश्मि जी!
    बड़ी ही सार्थक पोस्ट लिखी है आपने. लेकिन पोस्ट की सार्थकता के साथ टिप्पणी का कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए.. लिखने वाले का एक दृष्टिकोण होता है और पढ़ने और समझने वाले का एक दृष्टिकोण... यदि दोनों के विचार एक हों तो अच्छी बात है और यदि न हों, तो भी दोनों में से कोई भी गलत नहीं होता.. क्योंकि दोनों के अपने-अपने विचार होते हैं.. हमें उनका भी सम्मान करना चाहिए.. ज़रूरी नहीं कि जहाँ खड़े होकर हम किसी मुद्दे को देख रहे हैं, दूसरे को भी उसका वही पहलू दिखाई दे... और दूसरे को जो दिखाई दे रहा है वह गलत ही हो...
    रही बात रेडियो पर होने वाली परिचर्चाओं या टीवी पर होने वाले डिस्कशन की, तो उनकी सार्थकता तो हम सब देख चुके हैं और जानते हैं... देश के संवेदनशील से संवेदनशील मुद्दों पर जिस प्रकार वे बहस करते हैं उन्हें देखकर एक वरिष्ठ पत्रकार ने उसे “मुर्गा लड़ाई” का नाम दिया था.. और टीवी के डिस्कशन कितने सार्थक और कितने प्रायोजित होते हैं यह आज के ज़माने में किसी से छिपा नहीं है..
    संवेदनशीलता की बात पर मेरे एक दोस्त कहा करते थे कि यार तुम तो मुझसे भी ज़्यादा संवेदनशील हो.. अब उनसे कौन पूछने जाए कि आप संवेदनशीलता की इकाई कब से हो गए. कविता, संस्मरण, रिपोर्ताज, इतिहास, तथ्य और जानकारियाँ सबों में सभी की अभिव्यक्ति समाई है, अब ज़रूरी नहीं कि सब की बात सभी को पसंद आये... वो एक कहावत है ना कि आप सबको सारे समय खुश नहीं रख सकते... हम मानें या न मानें, दरअसल टिप्पणियों के माध्यम से हम लोगों से अपनी बात की स्वीकारोक्ति चाहते हैं, बस वहीं से सब संवेदनशीलता, सहनशीलता के अभाव में टूटकर बिखरने लगती है!!

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  29. मेरे हिसाब से यह बहस व्‍यर्थ है। वैसे यहां पर बहुत चर्चा इस पर हो भी गई है। कहने को केवल इतना बचा है कि जरूरी नहीं है कि लेखक समस्‍याओं को सामने लाने के साथ साथ हल करने भी जाएगा या जाएगी। हां यह जरूर है कि उसमें हिम्‍मत होनी चाहिए कि वह समय आने पर इसके लिए आगे आ सके।

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  30. rashmi ,,aap apna kaam karti rahiye kyunki agar likha hi nahin jaega to logon tak pahunchega kaise ,,ab ye mahatvpoorn nahin hai ki kahan baith kar likha gaya hai ,,mahatvpoorn ye hai ki kya likha gaya hai
    agar aisa hai to akhbaron ke offices band ho jane chahiye :)

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  31. @सलिल जी,
    आप मेरे ब्लॉग के नियमित पाठक हैं..मेरी पोस्ट पर किए गए लम्बे विमर्श आपको ध्यान होंगे......कई बार लोगो ने अपना-अपना पक्ष रखा है...और उसमे अपने विचार की स्वीकारोक्ति का कोई आग्रह नहीं था..

    खैर...दृष्टिकोण की बात अपनी जगह है...पर जब सीधे सवाल किए जाएँ....कि 'आप कुछ ठोस करें...तभी लिखें'...और जब किसी एक के कथन में कई स्वर शामिल हो जाते हैं...तो अपना विचार रखना भी जरूरी हो जाता है....और ऐसा मैं सोचती हूँ...इस से असहमत होने का पूरा अधिकार है आपको..:)

    टी.वी.. अखबार का उदाहरण मैने बार-बार 'वातानुकूलित कमरे में चिंतन' के जिक्र पर दिया था....सभी चीज़ों की वास्तविकता से सभी कोई वाकिफ है.

    "वो एक कहावत है ना कि आप सबको सारे समय खुश नहीं रख सकते."

    यहाँ कौन किसको खुश करने के लिए लिखता है....सब अपनी संतुष्टि के लिए अपनी पसंद की चीज़ें लिखते हैं .

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  32. मन में जो आये, उसे लिखते रहें.... व्यक्त करते रहें...
    सार्थक है !
    शुभकामनायें आपको !

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  33. किसी के दर्द को महसूस कर उसके बारे में लिखना और प्रकाशित करना,ताकि लोग उसकी मदद के लिए आगे आएं , यह भी एक प्रकार की समाज सेवा ही तो है.लेखन के साथ-साथ अगर कोई प्रत्यक्ष समाज -सेवा में भी लगा हो, तो यह सोने में सुहागा वाली बात है ,लेकिन अगर कोई सामाजिक -समस्याओं पर सिर्फ लिख और छप रहा है तो यह भी समाज-सेवा का ही एक अंग है.आपके लेखन से अगर किसी समस्या की तरफ सरकार और समाज का ध्यान जाए और उसके निराकरण के लिए कोई पहल होने लगे या उस समस्या के प्रति लोगों में जागृति आए क्या यह लेखन के माध्यम से की गए समाज-सेवा नहीं है ?आपका यह आलेख निश्चित रूप से विचारणीय है.

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  34. क्या दी ? आप भी ना. छोड़ो कौन क्या कहता है? पहली बात तो 'बात करने' और 'समस्या उठाने' से फर्क पड़ता है. कभी-कभी कुछ लोग जो किसी घटना को एक निश्चित नज़रिए से देखते हैं, कुछ ऐसी बातें पढ़कर दूसरे नज़रिए से देखने लग जाते हैं, जैसा शिल्पा जी ने कहा.
    दूसरी अली जी की टिप्पणी अपने आप में बहुत कुछ कह रही है. इसके अनुसार तो मुझे अपना ब्लॉग "नारीवादी बहस" अब बंद कर देना चाहिए क्योंकि कम से कम इस समय तो मैं भी औरतों के लिए कुछ नहीं कर रही हूँ :)

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  35. @रश्मि जी,
    कोई कुछ भी कहे...उन्हें तो सिर्फ कहना भर है. अगर महत्वपूर्ण सकारात्मक वे कुछ करते भी है तो, उन्हें भी ज़रूर 'सलाम'.
    पर जिसमें ज़रा-सी भी मानवीय संवेदना है हमारे असहाय और अनवरत कमर तोड़ पीड़ाओं में जीना को बाध्य लोगों की, जिनको न्याय मिलने की संभावनाएं दूर-दूर तक न हो... उनका, उनके पक्ष में बोला एक शब्द भी महत्व रखता है...और रश्मि जी आजकल तो तुम्हारी वैसी सोच के मद्देनज़र एक सम्मान हम अपने भीतर तुम्हारे लिए पाएँ...आराम-कुर्सी, ए.सी. तो साधन मात्र है, जो प्राप्त होते हैं, प्राप्त किए जा सकते हैं और जिनका होना 'मानवीय संवेदना या सरोकार' के होने की शर्त नहीं...

    इतने 'clarifications' क्यूँ देना पडे आपको ? कलम घिसाई की ज़रुरत न थी...

    शायद नजीर ने ही कहा है:
    "लड़ने को अखाड़े है तैयार
    मजमून तराशा क्यूँ न करूँ..." (भूल सुधार स्वीकार्य)

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  36. कई मुद्दे हैं जो बहुत कॉम्प्लेक्स है. जिनका कोई आसान हल नहीं है. ये सच्ची बात है. इन समस्याओं को देख मन द्रवित होता है. कुछ कहने लिखने का मन होता है. ऐसी समस्याएं हैं जिनके हल जो हम सोचते हैं वो कई बार नयी और भी विकट समाया को जन्म दे सकते/जाते हैं. इन पर जितना गहरा सोचें मन उतना ही व्यथित होता है.

    और जब इन पर बात हो तो 'हम सबको' (चलिए सबको नहीं भी तो... 'लगभग' सबको) लगता है कि हमारी समझ बाकियों से बेहतर है और बाकी तो बकवास कर रहे हैं. जमीनी वास्तविकता हमें पता है. इन्होने देखा ही क्या है ! मजे की बात ये है कि हम सब ऐसा ही सोचते हैं :)

    ये वैसे ही है जैसे सबको लगता है कि दुसरे की जिंदगी हमसे बेहतर है... तो ऐसी सोच में कोई अगर कुछ कह जाए तो इसका बुरा नहीं मानना चाहिए. मैं तो यही कहूँगा :)

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  37. आलेख ने सोचने को बाध्य किया। आरामकुर्सी चिंतन' होता ज़रूर है परंतु आप उससे आगे हैं, इतना यक़ीन है। इस विषय पर कई सारी बातें मन में आ रही हैं। एक तो यह कि बाल श्रम जैसी समस्या से मानव मन उद्वेलित होना स्वाभाविक है, हम समस्या का हल ढूंढ पाते हैं या नहीं, यह अलग बात है। दूसरा यह कि विचार कर्म का बीज है। जो लोग आज सेवाकार्य में लगे हैं उन्होने भी कभी पहला कदम उठाया था और अधिकांश ने उससे पहले इस बारे में विचार भी किया था। आपकी अधिकांश बातों से सहमत होते हुए भी यह कहूंगा कि सामाजिक समस्याओं के बारे में सबके विचार एक से होना आवश्यक नहीं है, आशा है आप क्षमा करेंगी।

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  38. @एक पुनर्चिन्तन ..अली सा और मुक्ति आदि विमुक्त चिन्तक कथनी और करनी के भेद के बहुश्रुत और बहु उद्धृत वक्तव्य के मर्म को भी समझाएगें जरा? -यह तभी उद्धृत होता है जब लोगों का किसी विषय को लेकर व्यामोह प्रबल दिखने लगता है -तब संत लोग इसी वाक्य से उनका आकलन करते हैं .....इसी को धुर अंग्रेज लोग आर्म चेयर क्रिटीसिज्म कहते भये हैं -और मैं इस जुमले को अक्सर लोगों की ओर उछालता रहता हूँ ,किसी सुचिंतित भाव से नहीं बल्कि सहज बोध से -अली जी दुखी तो आपको होना ही है -यह मानव का विशेषाधिकार जो है! अरे यह तो वाद विवाद सरीखा हो गया :) ...सच कहाँ गया कोई बतायेगा क्या ?

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  39. रश्मि जी…

    हर लेखन मेरी नज़र में स्वान्त:सुखाय ही होता है। और अपनी अभिव्यक्ति की सार्थकता और निरर्थकता भी अपने ही विवेक, सम्वेदनशीलता और नज़रिये पर निर्भर करती है।
    और किसी मुद्दे पर असहमति क सवाल अगर है तो फिर किसी स्वयंसिद्ध कथन से भी असहमत होने का अधिकार है सबको। अत: इस तरह के छिद्रान्वेषन से विचलित ना हुआ जाये तो बेहतर है। वैसे प्रसंगवश मेरे गुरुजी का एक कथन याद आया… वो अक्सर कहते थे कि "When everyone is thinking in the same manner then actually no one is thinking!" सो मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्न !

    नमन !

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  40. हम अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए लिखते हैं ... कुछ कर पायें तो और भी बेहतर !
    बालश्रम पर काम करने वाले एन जी हो के सदस्य के लिए इस विषय पर लिखना और भी वाजिब है .

    अली जी की टिप्पणी सटीक है!

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  41. अपनी सोच, अपनी पसंद.

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  42. @ अरविन्द जी ,
    :)

    अच्छा किया जो आपने इसे 'पुनर्चिन्तन' का नाम दिया जबकि वे लोग (चाहे जो भी हों) कहते हैं कि पहले 'हाथापाई'हो :)

    कथनी और करनी का भेद करने से पहले सिर्फ यह तय किया जाये कि पहले किसे होना चाहिए :)

    'करनी पहले वालों' की बुद्धिमत्ता :) कब तक आप अपने कांधे ढोइयेगा ? जबकि आप और मैं तो उसी स्कूल (चिंतन परम्परा/विज्ञान दृष्टि) के विद्यार्थी हैं जहां पहले परिकल्पनायें और फिर बाद में उनका परीक्षण किया जाना है :)

    आर्म चेयर मेथड तो एक प्रतीकात्मक संबोधन है जो कालान्तर में दिया गया / टैग किया गया , वर्ना चिंतन की यह परम्परा सारे दार्शनिक / सारे ज्ञानियों की सत्य खोज यात्रा का आद्य बिंदु / विधा / चिंतन दृष्टि रही है !

    अनजाने में ही सही "बौद्धिकता के अतिरेक :) से पीड़ित बन्दों" का पालन पोषण कीजियेगा तो सत्य निश्चय ही कहां गया पता नहीं चलेगा :)

    दुःख और सुख अपने होते हैं और अपनों से ही होते हैं :)

    विषय के प्रति तो हम हमेशा निरपेक्ष है पर आप से व्यामोह है फिर चाहे जो हाल हो :)

    अब ये बताइये कि आप हैं कहां जो कोई बंदा आपके जुमले लूट कर ले गया और आपको पता तक ना चला :)

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  43. मैं हमेशा मजे के लिए लिखता हूँ और अगर कोई पढ़ता भी हो उसके थोड़े मनोरंजन के लिए, शिवाकाशी वाला आपका मेसेज पढ़कर लगा कि हमारा लेखन कितना अर्थपूर्ण हो सकता है अगर हम किसी ऐसे मुद्दे पर लिखें जिससे किसी की दुनिया बदलती हो, बहुत अच्छी पोस्ट

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  44. मामला बहुत ज्‍यादा कुछ समझ नहीं आया लेकिन बालश्रम ऐसा विषय है जिसपर जितना लिखा जाए कम है। सभी विषयों पर अनेक राय हो सकती है, अपना-अपना नजरिया है। यह नजरिया ही नये नजरिए लाता है। कोई भी विचार बुरा या अच्‍छा नहीं होता, सभी आवश्‍यक होते हैं। किसी अन्‍य ने क्‍या लिख दिया इसकी चिन्‍ता मत कीजिए, लेखन में तो यह सब होता ही है। लेखक प्रत्‍येक संवेदनशील मुद्दे पर अपनी कलम चलाता ही है और सदियों से चला रहा है। बहुत सारे मुद्दे तो ऐसे हैं कि अभी तक नहीं सुलझे हैं, इसका अर्थ यह नहीं है कि उन मुद्दों की चर्चा ही बन्‍द कर देनी चाहिए। आपके सारे ही आलेख पढ़ने को बाध्‍य करते हैं और एक प्‍यास जगाते हैं।

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  45. सबसे आला अली साहब आप :)
    रश्मि जी निश्चय ही बहुत महत्वपूर्ण कम कर रही हैं मगर वे लोगों के अनुमोदन की फिर मुन्तज़िर क्यों हों ? आत्म तुष्टि भी कोई चीज है भला:) मुझे लगता है विषय अब खुद अपनी तारकिक परिणति पर आ गया है या रश्मि जी रस्मी -उपसंहार करेगीं ...पोस्ट तो हिट हो गयी ..मैडम जी मिठाई बनती है!:)

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  46. @अरविन्द जी,
    हमें अगर अनुमोदन चाहिए होता तो एक साल पहले ही ये पोस्ट लिख चुकी होती...किन्तु काफी दिनों से गौर कर रही थी...कई लोग बेखटके कुछ भी कह कर निकल जाते हैं....कहने से पहले सोचते नहीं....इसीलिए ये पोस्ट लिखनी जरूरी हो गयी कि लोग कुछ कहने से पहले एकबारगी सोच लें.....ये नहीं कि बाद में कहें..'मेरा यह मतलब नहीं था...आदि आदि..' {और अगर ऐसा कहते हैं..तो वो भी सबके सामने आ जाए :)}

    कौन सी पोस्ट हिट हो गयी और कौन सी फ्लॉप ..इसे कैसे तय किया जाता है??
    उस पोस्ट पर आई टिप्पणियों से ??
    ज्यादा टिप्पणियाँ पाने का फॉर्मूला तो जगजाहिर है...आप दो सौ दें...आपको सौ मिलेंगे....इस फॉर्मूला को अपना कर तो हर पोस्ट ही हिट करवा लूँ.

    और अगर आपका मंतव्य इस पोस्ट पर हुए विमर्श से है ...तो इस से ज्यादा विमर्श मेरी कई पोस्ट्स पर हो चुके हैं...फिर तो मिठाई की टोकरी ही भेजनी पड़ेगी...पर मुंबई में मिठाई बहुत महँगी है...और सेहत के लिए भी इतनी मिठाई अच्छी नहीं.:) jokes apart मैं पोस्ट हिट या फ्लॉप करने के लिए नहीं लिखती...क्यूँ लिखती हूँ....इसका उल्लेख पोस्ट में कर ही चुकी हूँ.

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  47. कुछ तो लोग कहेंगे
    लोगों का काम है कहना !

    आप जो लिख रही हैं वह सार्थक है या निरर्थक इसका फैसला करने का हक किसीको नहीं है ! ना ही किसीकी अपेक्षा के अनुरूप कोई पोस्ट लिखी जाती है ! रचनाकार अपने मन की बात, अपने विचार और अपने दृष्टिकोण को अपने तरीके से रखता है और उसे रखना भी चाहिये ! पाठक उससे सहमत होते हैं या नहीं यह उनका विचार और नज़रिया है ! दोनों के अधिकार क्षेत्र और सीमाएं निर्धारित हैं और मेरे विचार से किसीको अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करना चाहिये ! सामाजिक समस्याओं के प्रति संवेदनशील होना, उनके निदान के लिये चिंतित होना ही एक सार्थक और महत्वपूर्ण पहल है ! हर इंसान की अपनी सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक व अन्य कई प्रकार की विवशताएं होती हैं जिनके चलते वह स्वयं कुछ चाह कर भी नहीं कर पाता लेकिन यदि उसके लेख पढ़ कर चंद सक्षम मगर सोये हुए लोग जाग जायें तो अच्छा ही है ना !

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  48. कुछ तो लोग कहेंगे,
    लोगों का काम है कहना,
    छोड़ों बेकार की बातों को,
    अपना काम जारी रखो बहना...

    जय हिंद...

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  49. हा हा खुशदीप भाई...क्या तुक मिलाई है...:)

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  50. कुछ लोग बस बोल बच्चन होते है , कुछ लोगो को बस भाषणबाजी करने आता है , कुछ अपने ब्लॉग पर बस प्रवचन देते है करते कुछ नहीं है , इस तरह की कितने ही बाते कई बार अपने और आप की तरह कई ब्लोगरो के बारे में पढ़ चुकी हूँ | लोग इस गलत फहमी में क्यों जीते है की हम उनके लिए और उन्हें खुश करने के लिए लिख रहे है और हमें किस विषय पर लिखना चाहिए क्या वो हमें बताएँगे | सामाजिक विषयों कर कुर्सी चिंतन करने वाले ब्लोगर कम से कम इन विषयों पर चिंतन तो कर रहे है न समाज की समस्याए उन्हें प्रभावित कर रही है उन्हें कुछ सोचने पर मजबूर कर रही है किन्तु ऐसे बहुत से लोग है जो आज भी जलते रोम को देख कर भी चैन की बासुरी ही बजा रहे है उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है की आस पास समाज में हो क्या रहा है क्योकि उन्हें फुरसत ही नहीं है अपने आगे किसी बात को सोचने की | आप चिंतन की सोच की आलोचना कर सकते है पर आप ये कैसे कह सकते है की चुकी आप इस विषय में कुछ काम नहीं कर रही है तो आप इस पर लिख भी नहीं सकती है | जैसा आप ने कहा रश्मी जी की समाज में काफी लोग है जो अपने स्तर और मौके के अनुसार कुछ न कुछ कर रहे है किन्तु जरुरी नहीं है की वो यहाँ आ कर बताये की वो क्या कर रहे है | एक अच्छी सोच ही आगे जा कर कुछ करने के लिए सभी को प्रेरित करती है बस मौका परिस्थितिया मिलनी चाहिए |

    मुझे नहीं पता की रश्मि जी आप को किसने कहा और क्या कहा एक विषय पर टिपण्णी की है जो कई बार मई भी पढ़ चुकी हूँ और आप ने बिलकुल मेरे दिल की बात लिख दी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं ऐसे कहने वाले सभी पर टिपण्णी है |

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  51. अंतिम पंक्ति (लाल वाली) मेरे लिए दुकान बंद करो की नोटिस है पर ठीक है। :)
    अभिषेक ओझा जी की बात ही दोहराऊंगा मैं भी इस विषय पर।
    और @चाहे हज़ारो लोग मुझसे सवाल करते रहें, कि "आपने लिखने के सिवा क्या किया??" मुझे फर्क नहीं पड़ता।
    ये आपने आप में ही बहुत है।

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  52. @संजय जी (मो सम कौन ) एवं अविनाश जी चन्द्र जी,

    लगता है आपलोगों ने सिर्फ अंतिम पंक्ति ही देखीं....इन पंक्तियों पर ध्यान नहीं दिया.." अपनी नौकरी.....घर की जिम्मेदारियों...सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए , थोड़ा सा समय निकाल कर अपने पसंदीदा विषयों पर वे लिखते हैं. कितने ही संस्मरण..कविताएँ...कहानियाँ पढ़कर लगता है...बिलकुल ऐसा ही तो हमने भी महसूस किया था. "...:)

    लेखन में हर विधा का उतना ही महत्व है...

    अंतिम पंक्ति...उनलोगों के लिए एक सवाल था..जो सामाजिक विषयों पर लिखे आलेख को महज 'आरामकुर्सी चिंतन ' मानते हैं.

    और यह पोस्ट...ना मैने किसी आलोचना से घबरा कर....व्यग्र होकर...या किसी की बात का बुरा मानकर ही लिखी है....पर कभी तो अपने मन की बातें भी साझा करनी ही थीं,ना :)

    सबकी अपनी सोच होती है....मैं शायद बहुत ही मूढमति हूँ...कि ये बात मेरी समझ में ही नहीं आती कि एक बच्चे का महीनो कमरे में बंद होकर सोलह घंटे तक नारकीय यातनाएं झेलते हुए काम करने को कैसे सही ठहराया जा सकता है??...सिर्फ इसलिए कि उन्हें दो वक्त की रोटी मिलती है.....या उनके पुनर्वास की कोई ठोस योजना हमारे पास नहीं है या योजना है भी तो उसका सही रूप में कार्यान्वयन नहीं होता . इसलिए उन्हें यह श्रम करते रहना चाहिए??

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  53. नहीं, नहीं! पढ़ा तो सब था मैंने। वो तो बस कह दिया, मौके पर। :)
    खैर, एक अनुरोध है, बस अविनाश ही रहने दें मुझे।
    जी, वो भी दो-दो बार!

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  54. ओके अविनाश...:)
    वो तो अब देखा..दो बार 'जी' लिख गयी...:)

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  55. इस लेख और सन्दर्भों को जितना मैं समझ पाया हूँ उस हिसाब से कह रहा हूँ

    मैंने भी अपने जीवन में बाल-श्रम के कईं केस लगभग हर उम्र के हर फेज में देखे , होश संभालने पर सुधार के लिए मैंने क्या किया इसकी सफाई मैं ब्लॉग जगत को देना आवश्यक नहीं समझता क्योंकि फाल्ट निकालना यहाँ बड़ी आम बात है , शायद इसी तरह से यहाँ अपने आप को बुद्धिजीवी साबित किया जाता है .. ये तरीका आसान भी है " अपने आप को बुद्धीजीवी साबित करने का आराम कुर्सी तरीका "

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  56. शिल्पा जी का कमेन्ट अच्छा लगा

    .....सोच रहा हूँ उनके कमेन्ट पर कुछ ना कुछ भिन्न बोल कर खुद को बुद्धीजीवी साबित कर दूँ , .... आसान काम है ना ?:)

    -----

    रश्मि दीदी,
    आपके लेखों को अक्सर मैं लोगों को उत्तर देने के लिए करता हूँ और मैंने लोगों को निरुत्तर होते या बदलते देखा है

    और हाँ .....
    कईं बार आपने मेरी जानकारी बढ़ाई है
    कईं बार पुनर्चिन्तन के लिए बाध्य किया है
    कईं बार सोच को पुनर्जीवित किया है

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  57. सही कहा आपने .... बहुत बहुत बधाई
    नव वर्ष मंगलमय हो आपको.

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  58. Di, itne logon ki baaten sun kar likhne ki sarthakta siddh ho jati hai, mera massage share karne ke liye thanx di :)

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