Wednesday, November 23, 2011

जिंदगी के ये मसले कभी आसान तो होंगे...

पिछली पोस्ट "हमारी कॉलोनी के काका'   पर आई टिप्पणियों ने कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया.
मेरे ये लिखने पर कि सत्तासी वर्षीय काका अपनी हमउम्र पत्नी के साथ अकेले रहते हैं. कई लोगो ने चिंता जताई....और  अपनी टिप्पणी में कहा...'काका ने बच्चों के बिना जीना सीख लिया'..या फिर 'कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता कि उनके  बच्चों को उनका ध्यान रखने पर मजबूर किया जा सके"

ये सब पढ़कर एक ख्याल आया....कि अगर कल्पना की  जाए कि काका अपने बेटे के साथ किसी फ़्लैट में रहते हैं. मध्यम वर्गीय काका के बेटों का भी मुंबई में दो बेडरूम का फ़्लैट होगा. काका-काकी को ड्राइंग रूम में ही जगह मिलेगी. निश्चय ही रसोई पर अधिकार बहुरानी का होगा. शायद वो सुबह-सुबह काका को चाय बना कर देने में आना-कानी करे. काका को अपनी इस तरह की दिनचर्या पर भी शायद दो बातें सुननी पड़ें. या अगर हम सकारात्मक सोच रखें.. कि बेटे-बहू..काका के जीवन में दखल अंदाजी ना करें. लेकिन तब भी...अभी जैसी दिनचर्या काका जी रहे हैं...उस से अलग क्या होता.

काकी का भी अपनी  बहू रानी के साथ गप-शप में मन लगेगा या फिर  खिट- पिट  होगी या काकी चुप रहकर कर अपना समय गुजारेंगी. सास-बहू में सहेलिपना  बहुत कम ही देखा जाता है. और अगर काकी को चुपचाप ही अपने दिन गुजारने पड़ें तो फिर अपने घर में रहना क्या बुरा है. 

आजकल के बच्चों को उनके स्कूल... होमवर्क..ड्राइंग-डांस-गेम क्लासेस इतनी मोहलत नहीं देते कि वे अपने माता-पिता के साथ समय बिता सकें. दादा-दादी के साथ समय गुजारने का मौका कहाँ मिलेगा. 

एक सवाल यह भी है..अगर माता-पिता...बेटे-बहू के बीच सबकुछ स्नेह..प्यार..सम्मान से भरा  होता तो अलग रहने की नौबत ही क्यूँ आती? शुरुआत में कुछ तो ऐसा घटा होगा...कि दोनों ने एक-दूसरे की जिंदगी में दखल दिए बिना...अलग रहना तय किया होगा. और हर बार बच्चों को ही दोषी ठहराना ठीक नहीं. कई बार कोई वैमनस्य नहीं होता पर दोनों ही अपना स्पेस चाहते हैं. इसलिए अलग रहना ही श्रेयस्कर समझते हैं. 

आजकल हर शहर की ये आम स्थिति है. क्यूंकि अब समीकरण बदल चुके हैं. पहले गाँवों में कृषि ही जीवन-यापन का साधन था. जमीन..खेत-खलिहान..घर के बड़े-बुजुर्ग के नाम पर होती थी....वे स्वतः ही घर के मालिक बन जाते थे...और सभी परिवारजन उनका आदर करते थे...उनकी आज्ञा मानने को बाध्य होते थे. पर अब सब कुछ बदल गया है. आजकल जब ,बड़े-बुजुर्ग अपने बच्चों के पास रहते हैं...तो वे घर के मालिक नहीं होते...बल्कि अक्सर बच्चों पर निर्भर होते हैं. बहुत कम प्रतिशत ही ऐसे लोगो का है जो बहुत ही मान-सम्मान के साथ अपने बुजुर्गों को रखते हैं. अक्सर उन्हें उपेक्षा..और कलह ही झेलनी पड़ती है. 

जिन घरों में बुजुर्गों का अपना कमरा होता है....बहुत ही आदर और मान-सम्मान मिलता है....वहाँ  भी उनकी अपनी जीवन चर्या क्या होती है?? अखबार पढ़ते हैं..टी.वी. देखते हैं...थोड़ा सा पार्क में टहल आते हैं. घर के सदस्य अक्सर व्यस्त ही रहते हैं...घर में आने-जाने वाले मेहमान भी ज्यादातर बेटे-बहुओं के दोस्त और सहेलियाँ ही होते हैं. घर की जिम्मेवारियों से भी वे मुक्त रहते हैं. उनकी जरूरत की सारी चीज़ें उनके  बेटे-बहू उन्हें उपलब्ध करवा देते  हैं. कहने-सुनने में यह कटु लगता है..पर उनका जीवन कुछ नीरस सा हो जाता है.

जो बुजुर्ग अपने घर में अकेले रहते हैं...वहाँ  पति-पत्नी के ऊपर घर चलाने की जिम्मेवारियां होती हैं. वे उनमे ही उलझे होते हैं. अपने घर में वे अपनी मर्जी से जीते हैं. पास-पड़ोस से भी उनके अपने बनाए हुए रिश्ते होते हैं. अक्सर आस-पास रहने वाले युवा दंपत्ति उन्हें माता-पिता स्वरुप सम्मान देते हैं और बुजुर्ग भी उन्हें...अपने बेटे-बेटियों जैसा प्यार देते हैं. उनके बीच स्नेह का ये बिरवा इसलिए पनपता है..क्यूंकि एक-दूसरे के जीवन में कोई दखलंदाजी नहीं होती. कोई अपेक्षाएं या शिकायतें नहीं होतीं. बुजुर्गों की अपनी इच्छानुसार...समयानुकूल जितनी सेवा कर दी...उतने में ही बुजुर्ग दंपत्ति खुश हो जाते हैं..क्यूंकि पीछे कोई इतिहास नहीं होता...कि अपने बेटे के लिए इतना किया..बदले में उसने बस इतना सा किया. पड़ोसी युवा दंपत्ति भी सुकून से रहते हैं...क्यूंकि ये बुजुर्ग किसी तरह की  टोका-टाकी नहीं करते...ना ही किसी तरह की जबाबदेही होती है..उनके प्रति.

जो बुजुर्ग अकेले अपने बच्चों से अलग जीवन बिताते हैं...अब शायद वे सहानुभूति  के पात्र नहीं हैं. अगर उन्होंने अपना भविष्य सुरक्षित रखा हो...और कुछ शौक अपना रखे हों तो उनकी वृद्धावस्था भी सुकून से कटती है. हाँ, बीमार पड़ने पर किसी तरह की असुविधा होने पर उनके बच्चों को उनका ख्याल जरूर रखना चाहिए. अपना यह कर्तव्य कभी नहीं भूलना चाहिए.

आजकल महानगरों में एक चलन देख रही हूँ....अक्सर लोग..अपने माता-पिता का पुराना मकान बेच कर उनके लिए अपने फ़्लैट के पास ही कोई फ़्लैट खरीद देते हैं. दोनों की अपनी प्राइवेसी भी बनी रहती है...और बुजुर्गों की देख-भाल भी हो जाती है...अपने बच्चों को अपने आस-पास पाकर उनका मन भी लगा रहता है. 

35 comments:

  1. गंभीर मसले पर विचारणीय आलेख्।

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  2. सच में समय तेजी से बदल रहा है .. युवा पीढ़ी को स्वतंत्रता चाहिए और बुजुर्गों को सम्मान एक दुसरे के जीवन में दखल ना दी जाए तो रिश्ते मधुर बने रहते है पर कौन सी बात "दखल " है कौन सी शुभकामना कैसे पता चलेगा ...

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  3. बुजुर्गों के प्रति असंवेदनशीलता निरंतर बढ़ रही है... आने वाले वर्षों में यह और भी गंभीर होने वाली है... बढ़िया आलेख...

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  4. आपका आलेख बहुत सामयिक एवं प्रासंगिक है ! इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि दो पीढ़ियों के एक साथ रहने पर कई तरह की समस्याएं जन्म लेती हैं जिनके निदान के लिये धैर्य और समझ बूझ की ज़रूरत होती है जिसका आज की पीढ़ी में कुछ-कुछ अभाव होता जा रहा है ! महानगरों में घर छोटे होने के कारण भी अलग रहना समझ में आता है ! आपत्ति केवल तब होती है जब बच्चे अपने बुजुर्गों का सम्मान नहीं करते, उनको प्यार नहीं देते और उनकी ज़रूरत के समय उनकी देखभाल नहीं करते ! वरना अपनी-अपनी स्पेस के साथ अपने-अपने घरों में सब खुश रहें तो इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है ! बेहतरीन आलेख के लिये बधाई !

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  5. बदलती दुनिया बदलते लोग ..बनावटी दुनिया बनावटी लोग ...खोखली दुनिया खोखले लोग ...भागती दुनिया भागते लोग ....बेशर्म दुनिया बेशर्म लोग कैसी दुनिया कैसे लोग ......अच्छी पोस्ट !

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  6. मिलकर रहना हो तो किसी के सुझाव की ज़रूरत ही क्या ... मन खुश तो सब अच्छा रहता है . साथ कर देने से संबंध तो अच्छे नहीं हो जाते , बल्कि स्थिति अधिक भयानक हो जाती है ...

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  7. Good post! One of my sr. colleagues who has retired from service met me today. He told me that he has sold his house in Lucknow and is shifting to New Delhi as he has only two daughters who are married settled in New Delhi. They need him to look after their homes and he needs them to look after him. It is a kind of compromise where both sides think that they are in a win-win situation. But practically, this is not the reality in every case.

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  8. रश्मि जी , आजकल न सिर्फ बच्चे , बल्कि मात पिता भी अलग ही रहना पसंद करते हैं , विशेषकर शहरों के धनाढ्य परिवारों में । इससे सभी को अपने अनुसार जिंदगी जीने का अवसर मिल जाता है ।
    लेकिन पास रहें या दूर , आपस में प्यार तो रहना ही चाहिए ।

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  9. बहुत बुरी स्थिति है हमारे बड़ों की ....
    जितना सोंच पाते हैं उससे कहीं बहुत अधिक ....कोई नहीं सोंचता इनके बारे में ! यह हम सबकी सामाजिक जिम्मेवारी है मगर समाज की परवाह किसे है !
    एक बेहतरीन लेख ....
    आभार आपका !

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  10. अकेले रहना , साथ रहना इत्यादि सब परिवार से परिवार के लिये अलग होता हैं . सबकी परिस्थितियाँ अलग हैं और रहेगी . जो आज जवान हैं , युवा हैं वो सब कल वृद्ध भी होगे इस लिये इसे पीढ़ी से नहीं जोड़ना चाहिये की नयी पीढ़ी ऐसी हैं या वैसी हैं .
    बहुत से लोग विदेशो में बसे हैं उनके माँ पिता को वीसा नहीं मिल सकता नहीं जा सकते
    बहुत से लोग दूसरे शहर में बसे हैं नौकरी की वजह से नहीं साथ रह सकते
    जरुरी ये हैं की आज के परिवेश में बात केवल और केवल सुरक्षा और कर्तव्यो की हो , भावना से ऊपर अगर कर्तव्य को रखा जाये तो बदलाव के साथ साथ एक अनुशाषित समाज में वृद्ध सुरक्षित होगे केवल अपने को उनकी जगह रख कर देखने की जरुरत हैं और कुछ सख्त कानून की जरुरत हैं जहां जो वृद्ध आर्थिक रूप से सुरक्षित नहीं हैं उनकी सुरक्षा का जिम्मा "स्टेट " का हो

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  11. घर में बुजुर्गों का अपना अलग स्थान हो, यह उनके प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति है।

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  12. औरों की तो नहीं जानता लेकिन हम जैसे हैं कि तरसते हैं अपने अम्मा बाबू के साथ रहने के लिये, उनके साथ समय बिताने के लिये। मौका मिलते ही गाँव की ओर लपक लेते हैं उनके सानिध्य हेतु।

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  13. हमारे बड़ों के प्रति मन संवेदनशीलता की सोच और सम्मान दोनों ज़रूरी है ......यही बात हमें अपने बच्चों को भी सिखानी होगी...... अच्छा वैचारिक आलेख

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  14. उम्र के हर पड़ाव में बच्चे, बडे, बूढ़े स्त्री-पुरुष का अपना एक कमरा होना चाहिए...
    कमरे के साथ साथ उन्हें एक स्पेस भी मिले, जहां शांति भी बनी रहे...
    पर देश में हर कोई यह अफोर्ड नहीं कर पाए.
    रश्मि जी की सारी-की-सारी हिदयातें क़ाबिले-तारीफ़ है. वे आंखे खुली रखकर जीती है,
    उनकी आसपास की सामाजिक सामयिक जानकारी संवेदनशील व सुखद है.

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  15. दी, सहमत हूँ आपकी बात से. मेरे पिताजी ने तो अम्मा के ना होने पर भी अपने बेटे-बहू के साथ रहने के बजाय अकेले रहने का निर्णय लिया था क्योंकि वो बहुत इंडिपेंडेंट थे और उन्हें अपनी प्राइवेसी में किसी की दखलंदाजी पसंद नहीं थी.

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  16. अनंत सिलसिला है रश्मि जी, अब ज़्यादा बढ़ गया है...
    इतना ज़रूर है कि साथ रहें या अलग, प्यार, सम्मान और आपसी तालमेल कायम रखा जाना चाहिए.

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  17. पूर्व में घर का मुखिया भी पिता ही होता था और दुकान या खेती में बॉस भी पिता ही होता था। इसलिए उसका सम्‍मान जीवनभर रहता था। लेकिन आज बॉस बदल गया है इसलिए पिता उपेक्षित हो गए हैं। हजारों के पेकेज के बदले भी लाखों के पेकेज हो गए हैं इसलिए माता-पिता आउट आफ सोसाइयी भी हो गए हैं। बात साथ रहने की या अलग रहने की नहीं है, सम्‍मान की है। यदि आप अपनी विवाह की वर्षगांठ मना रहे हैं और तब भी आप अपने माता-पिता को आमंत्रित नहीं करते तो ऐसे में समाज को अवश्‍य सोचना चाहिए। मेहमानों को भी प्रश्‍न करना चाहिए कि तुम्‍हारे माता-पिता कहां हैं?

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  18. वैसे तो मेरा मानना है कि माता-पिता ही सही होते हैं पर ठीक है, फाँस जैसे समबन्धों से दूर की मिठास बेहतर तो है ही।

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  19. कुछ बुजुर्ग मजबूरी में अलग रहते हैं और कुछ नए युग से सामजस्य न बिठा पाने की वजह से अपनी मर्ज़ी से ही अलग रहते हैं..

    ये आज कि विडंबना है.

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  20. @अजित जी,

    आपने बिलकुल सही कहा. साथ रहना ना रहना अलग बात है...परन्तु अपनी खुशियों में भी माता-पिता को शामिल ना करें...यह तो बहुत ही गलत है.

    यहाँ मैने काका के बहाने सामान्य स्थितियों की बात की है...जिस से आजकल के युवा और बुजुर्ग दो चार हो रहे हैं...

    काका के पुत्र जैसे अपवाद तो हैं ही..पर दुख ये है कि इस तरह की घटनाएं अब अपवाद नहीं रहगयी हैं...बल्कि सामान्य होती जा रही हैं.

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  21. महानगरों में इस प्रकार संतानों की उपेक्षा झेलते या संतानों की मजबूरी से विवश बुजुर्ग माता-पिता कष्ट का जीवन तो व्यतीत कर ही रहे हैं... साथ ही उनके साथ अहिंसा की वारदातें भी महानगर का एक हिस्सा है.. अकेलाप मजबूरी हो या प्रताडना, भुगतना तो बुजुर्गों को ही पड़ता है.. वे दुआ देते हैं कि उनके बच्चे पढ़-लिखाकर बड़ा आदमी बनें... बच्चा बड़ा हो गया तो शहर भी बड़ा हो गया.. अब बुज़ुर्ग अपनी ज़मीन छोडकर जाना भी तो नहीं चाहते.. इसलिए इस समस्या को हम महसूस तो कर सकते हैं.. लेकिन इसका कोई भी समाधान अंतिम और फाइनल नहीं हो सकता!!

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  22. चिंतनपरक आलेख !

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  23. दोनों को जमे वही श्रेयस्‍कर.

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  24. अच्छा चिन्तन किया है आपने रश्मि जी. :)

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  25. साथ रहकर बोझ बन जाना या नीरसता के वातावरण में रहने से कही बेहतर है ये अकेलापन .
    इस पोस्ट के सन्देश से शत प्रतिशत सहमत हूँ !

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  26. समय बदल रहा है ... समाज बदल रहा है ... तो इस परिस्थिति में भी परिवारों की स्थिति में विदेशों की तरह बदलाव आना निश्चित है ... अपने देश में ये समस्या अभी नई नई हैं और किस करवट समाज में बुजुर्गों की भूमिका रहनी है ये निश्चित नहीं हुई है ... अब स पहले अधिकतर बुजुर्ग घरों में ही पुत्र या पुत्री के साथ ही रहते आए हैं ... देखिये आने वाला समय किस और जाता है ...

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  27. वक़्त के अनुसार बदलना तो बेहतर है लेकिन इतना भी नहीं की हम खुद को ही भूल जाएँ ..!

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  28. बहुत गम्भीर मुद्दा है ये.
    ये सच है कि बुज़ुर्ग, जो हमेशा अपनी तरह से जीते आयें हों, अपनी जीवन-संध्या में बच्चों के अनुसार न जी पायें. बच्चों को भी उनकी सलाह दखलन्दाज़ी लगे. बेहतर विकल्प अपने ही पास एक अन्य फ्लैट में उन्हें रखना है, ऐसे में जगह की कमी या दखलन्दाज़ी का भय नहीं रहेगा, और उनकी देखभाल भी हो सकेगी.

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  29. सच्‍चाई यह है कि आज सब अकेले हैं,भले ही साथ में रह रहे हों।

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  30. ek bahut hi relevant issue uthaya hai di is post ke maadhyam se...ye sach hai ki dono hi taraf ke logon ko ek dusre ko samajhne ka prayas karna hoga...sirf ye ummeed ki koi humein samajhe niraasha hi deti hai..dono ko..
    ek khaas baat jo sochne ki hai woh ye hai ki..jahan pehle ki society mein buzurg log jyadatar physically or economically apne bachchon par dependent hote the, wahi aaj ke buzurg mostly pension aur doosre retirement plans ke saath economically independent hain aur yoga, exercise aur balanced life apna kar health ke prati bhi pehle se kahin adhik jagrook hain...aise me woh apne bachchon se sirf sneh aur samman ki hi apeksha rakhte hain, jo unnhe milni hi chahiye...

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  31. दिनो दिन गंभीर होती जा रही समस्या को बेहतर ढंग से उठाया है आपने। अच्छी लगी यह पोस्ट।

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  32. स्वतंत्रता का कोई विकल्प नहीं है। जहाँ तक सम्भव हो सहयोग हो पर निर्भरता नहीं।

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  33. बदलती दुनिया बदलते लोग समय बदल रहा है ... समाज बदल रहा है ..

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