पिछली पोस्ट "हमारी कॉलोनी के काका' पर आई टिप्पणियों ने कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया.
मेरे ये लिखने पर कि सत्तासी वर्षीय काका अपनी हमउम्र पत्नी के साथ अकेले रहते हैं. कई लोगो ने चिंता जताई....और अपनी टिप्पणी में कहा...'काका ने बच्चों के बिना जीना सीख लिया'..या फिर 'कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता कि उनके बच्चों को उनका ध्यान रखने पर मजबूर किया जा सके"
ये सब पढ़कर एक ख्याल आया....कि अगर कल्पना की जाए कि काका अपने बेटे के साथ किसी फ़्लैट में रहते हैं. मध्यम वर्गीय काका के बेटों का भी मुंबई में दो बेडरूम का फ़्लैट होगा. काका-काकी को ड्राइंग रूम में ही जगह मिलेगी. निश्चय ही रसोई पर अधिकार बहुरानी का होगा. शायद वो सुबह-सुबह काका को चाय बना कर देने में आना-कानी करे. काका को अपनी इस तरह की दिनचर्या पर भी शायद दो बातें सुननी पड़ें. या अगर हम सकारात्मक सोच रखें.. कि बेटे-बहू..काका के जीवन में दखल अंदाजी ना करें. लेकिन तब भी...अभी जैसी दिनचर्या काका जी रहे हैं...उस से अलग क्या होता.
काकी का भी अपनी बहू रानी के साथ गप-शप में मन लगेगा या फिर खिट- पिट होगी या काकी चुप रहकर कर अपना समय गुजारेंगी. सास-बहू में सहेलिपना बहुत कम ही देखा जाता है. और अगर काकी को चुपचाप ही अपने दिन गुजारने पड़ें तो फिर अपने घर में रहना क्या बुरा है.
आजकल के बच्चों को उनके स्कूल... होमवर्क..ड्राइंग-डांस-गेम क्लासेस इतनी मोहलत नहीं देते कि वे अपने माता-पिता के साथ समय बिता सकें. दादा-दादी के साथ समय गुजारने का मौका कहाँ मिलेगा.
एक सवाल यह भी है..अगर माता-पिता...बेटे-बहू के बीच सबकुछ स्नेह..प्यार..सम्मान से भरा होता तो अलग रहने की नौबत ही क्यूँ आती? शुरुआत में कुछ तो ऐसा घटा होगा...कि दोनों ने एक-दूसरे की जिंदगी में दखल दिए बिना...अलग रहना तय किया होगा. और हर बार बच्चों को ही दोषी ठहराना ठीक नहीं. कई बार कोई वैमनस्य नहीं होता पर दोनों ही अपना स्पेस चाहते हैं. इसलिए अलग रहना ही श्रेयस्कर समझते हैं.
आजकल हर शहर की ये आम स्थिति है. क्यूंकि अब समीकरण बदल चुके हैं. पहले गाँवों में कृषि ही जीवन-यापन का साधन था. जमीन..खेत-खलिहान..घर के बड़े-बुजुर्ग के नाम पर होती थी....वे स्वतः ही घर के मालिक बन जाते थे...और सभी परिवारजन उनका आदर करते थे...उनकी आज्ञा मानने को बाध्य होते थे. पर अब सब कुछ बदल गया है. आजकल जब ,बड़े-बुजुर्ग अपने बच्चों के पास रहते हैं...तो वे घर के मालिक नहीं होते...बल्कि अक्सर बच्चों पर निर्भर होते हैं. बहुत कम प्रतिशत ही ऐसे लोगो का है जो बहुत ही मान-सम्मान के साथ अपने बुजुर्गों को रखते हैं. अक्सर उन्हें उपेक्षा..और कलह ही झेलनी पड़ती है.
जिन घरों में बुजुर्गों का अपना कमरा होता है....बहुत ही आदर और मान-सम्मान मिलता है....वहाँ भी उनकी अपनी जीवन चर्या क्या होती है?? अखबार पढ़ते हैं..टी.वी. देखते हैं...थोड़ा सा पार्क में टहल आते हैं. घर के सदस्य अक्सर व्यस्त ही रहते हैं...घर में आने-जाने वाले मेहमान भी ज्यादातर बेटे-बहुओं के दोस्त और सहेलियाँ ही होते हैं. घर की जिम्मेवारियों से भी वे मुक्त रहते हैं. उनकी जरूरत की सारी चीज़ें उनके बेटे-बहू उन्हें उपलब्ध करवा देते हैं. कहने-सुनने में यह कटु लगता है..पर उनका जीवन कुछ नीरस सा हो जाता है.
जो बुजुर्ग अपने घर में अकेले रहते हैं...वहाँ पति-पत्नी के ऊपर घर चलाने की जिम्मेवारियां होती हैं. वे उनमे ही उलझे होते हैं. अपने घर में वे अपनी मर्जी से जीते हैं. पास-पड़ोस से भी उनके अपने बनाए हुए रिश्ते होते हैं. अक्सर आस-पास रहने वाले युवा दंपत्ति उन्हें माता-पिता स्वरुप सम्मान देते हैं और बुजुर्ग भी उन्हें...अपने बेटे-बेटियों जैसा प्यार देते हैं. उनके बीच स्नेह का ये बिरवा इसलिए पनपता है..क्यूंकि एक-दूसरे के जीवन में कोई दखलंदाजी नहीं होती. कोई अपेक्षाएं या शिकायतें नहीं होतीं. बुजुर्गों की अपनी इच्छानुसार...समयानुकूल जितनी सेवा कर दी...उतने में ही बुजुर्ग दंपत्ति खुश हो जाते हैं..क्यूंकि पीछे कोई इतिहास नहीं होता...कि अपने बेटे के लिए इतना किया..बदले में उसने बस इतना सा किया. पड़ोसी युवा दंपत्ति भी सुकून से रहते हैं...क्यूंकि ये बुजुर्ग किसी तरह की टोका-टाकी नहीं करते...ना ही किसी तरह की जबाबदेही होती है..उनके प्रति.
जो बुजुर्ग अकेले अपने बच्चों से अलग जीवन बिताते हैं...अब शायद वे सहानुभूति के पात्र नहीं हैं. अगर उन्होंने अपना भविष्य सुरक्षित रखा हो...और कुछ शौक अपना रखे हों तो उनकी वृद्धावस्था भी सुकून से कटती है. हाँ, बीमार पड़ने पर किसी तरह की असुविधा होने पर उनके बच्चों को उनका ख्याल जरूर रखना चाहिए. अपना यह कर्तव्य कभी नहीं भूलना चाहिए.
आजकल महानगरों में एक चलन देख रही हूँ....अक्सर लोग..अपने माता-पिता का पुराना मकान बेच कर उनके लिए अपने फ़्लैट के पास ही कोई फ़्लैट खरीद देते हैं. दोनों की अपनी प्राइवेसी भी बनी रहती है...और बुजुर्गों की देख-भाल भी हो जाती है...अपने बच्चों को अपने आस-पास पाकर उनका मन भी लगा रहता है.
