Sunday, August 28, 2011

खाया-पिया ..अघाया मध्य वर्ग

इस जन आन्दोलन में कुछ जुमले बहुत उछले कि ये आन्दोलन,खाए-पिए-अघाए लोगो का है....मध्य वर्गीय लोगो का है.


सर्वप्रथम अगर ये वर्ग अघाया हुआ है तो इसे  किसी आन्दोलन को समर्थन देने की क्या जरूरत है? धूप-बारिश में सड़कें नापने की क्या जरूरत ? सिर्फ टेलिविज़न में चेहरा दिखाने की चाह तो उन्हें सडकों तक नहीं खींच लाई थी....क्यूंकि भले ही चौबीसों घंटे टी.वी. कैमरे चालू थे लेकिन जिस तरह हज़ारों लोग किसी रैली का हिस्सा बनते थे ,उन्हें मालूम था कि उनका चेहरा टी.वी. में नहीं दिखने वाला.कई इलाकों में तो टी.वी. कैमरे थे भी नहीं फिर भी लोगो ने रैलियाँ निकालीं....सभाओं में शामिल हुए. और इस वर्ग को अगर टी.वी. में आने का इतना ही शौक होता तो उसे वो माध्यम पता है जिसकी वजह से वे टी.वी. में आ सके. ऐसा भी नहीं है कि उनकी जिंदगी इतनी बोरिंग थी कि बस मन-बहलाव के लिए वे इस आन्दोलन में शामिल थे. यह पढ़ा-लिखा वर्ग....हर स्तर पर भ्रष्टाचार से इतना तंग आ गया है कि उसे आवाज़ उठाने की जरूरत महसूस हुई और अन्ना का आन्दोलन एक जरिया बना,अपनी बात कहने का. रोज़ अखबार में करोड़ों के घोटाले की खबर ...वर्त्तमान  संसद  में 76 सांसदों का यानि कि 14% सांसदों का हत्या,  अपहरण, बलात्कार में लिप्त होना....भारत का निरंतर सर्वाधिक भ्रष्ट देश की रैंकिंग में नीचे की तरह उन्मुख होना...इन्हें उद्वेलित कर गया. (Transparency International's corruption index के अनुसार 2010 में भारत का स्थान  87 था ...2009 में 84 था और दस साल पहले 69 था.)

हाँ , इस वर्ग पर किराए की ही सही पर सर पर छत है और ये वर्ग भूखा भी नहीं है. लेकिन क्या इतना काफी है? वो भूखा नहीं है...इसलिए उसे आवाज़ उठाने का हक़ नही है? उसकी और जरूरतें नहीं हैं??  कई लोगो की प्रतिक्रियाएँ देखीं कि इस आन्दोलन से किसान-मजदूर नहीं जुड़े हैं...इसलिए ये आन्दोलन व्यर्थ है. अगर इस आन्दोलन से थोड़ा भी फर्क पड़ेगा...लोगो के भ्रष्ट आचरण पर थोड़ा भी अंकुश लगेगा तो इसका लाभ, सबको एक सामान मिलेगा. जो लोग ये शिकायत कर रहे हैं कि  पिछड़ा वर्ग इसमें शामिल नहीं है...तो उन्हें खुद आगे आना चाहिए था...उन्हें भी इसमें सम्मिलित करने की कोशिश करनी चाहिए थी.

वे अगर सचमुच उनकी स्थिति से इतने ही व्यथित हैं तो उन्हें अन्ना की तरह किसी गाँव में जाकर एक गाँव के लोगों को आत्म-निर्भर ..खुशहाल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए. जितने लोग इस आन्दोलन का मज़ाक उड़ा रहे हैं या इस पर उंगलियाँ  उठा रहे हैं...वे लोग एक-एक गाँव ही क्यूँ नहीं अपना लेते?....आखिर 'अन्ना हजारे' के पास भी संकल्प-शक्ति के सिवा और कुछ भी नहीं था. वे लोग कहेंगे , हमारा काम तो अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण करना है...फिर दूसरे लोग किसी तरह का प्रयत्न कर रहे हैं तो उसपर ऊँगली क्यूँ उठाना??...उन्हें निर्देश क्यूँ देना...कि इस मुद्दे के लिए नहीं फलां मुद्दे के लिए आन्दोलन करो. अगर वे कुछ गलत कर रहे हैं तो उन्हें टोकने का पूरा हक़ है  अन्यथा क्या मध्य वर्ग को उनकी चिंता नहीं है? पर यहाँ भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठायी जा रही है ..जिसपर अंकुश से सबों को  राहत मिलेगी. यह एक दिन में नहीं होगा पर कहीं से शुरुआत तो करनी  ही पड़ेगी.

 हालांकि आरोप लगाने वालों ने जरूर कमरे में बंद होकर ही आन्दोलन देखा है.....वर्ना मैने अपनी आँखों से ऑटोवालों ...सब्जी-मच्छी बेचने वाले/वालियों को स्वेच्छा से इस आन्दोलन का हिस्सा बनते देखा है. ऑटो वाले किसी को सभा में छोड़ने आते और फिर वापस नहीं जाते...सड़क के किनारे ऑटो खड़ा करके  सभा में शामिल होते. इसी तरह , वे लोग रैलियों में भी शामिल हुए . जो समय नहीं दे पाते वे लगातार अपने पैसेंजर से इस विषय पर चर्चा करते देखे जाते. यह आन्दोलन स्वतः स्फूर्त था/है...इसमें सब अपने विवेक से शामिल हुए . इतना जरूर है कि मध्यम वर्ग की स्थिति रोज़ कुआं -खोदने और पानी पीने वाली नहीं है...और इसीलिए वे ज्यादा समय इस आन्दोलन को दे सके...तो इसके लिए उन्हें शर्मिंदा होना चाहिए??.....अफ़सोस प्रकट करना चाहिए??

किसी भी आन्दोलन के प्रति उदासीन रहनेवाले इस वर्ग ने इस आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया...इसकी एक ख़ास वजह ये भी है कि इसका नेतृत्व और आह्वान  साफ़-सुथरी छवि वाले लोग कर रहे हैं. सबको ये भरोसा है कि वे अपने किसी व्यक्तिगत लाभ या...प्रसिद्धि पाने के लिए ये आन्दोलन नहीं कर रहे. वे सचमुच समाज में एक बदलाव लाना चाहते हैं और जनता का भला चाहते है.

अन्ना हजारे जी का अनशन उनकी गांधीवादी छवि....और बार-बार शांतिपूर्ण आन्दोलन की अपील  , इस आन्दोलन के शांतिपूर्ण होने का कारण रही ही. पर इसका श्रेय इसमें भाग लेने  वाले लोगो को भी जाता है कि....बस शान्ति से वे सडकों पर आए और सभा की..कहीं कोई आगजनी..पत्थर-बाजी...किसी तरह का संपत्ति नुकसान या  बाज़ार  बंद नहीं हुआ. इतना अनुशासन-बद्ध होना,स्व-विवेक से ही संभव है.....किसी छड़ी के जोर पर नहीं किया जा सकता 

नेता सिर्फ निम्न वर्ग और उच्च  वर्ग की ही फ़िक्र करते हैं  क्यूंकि उच्च वर्ग से उन्हें पैसे मिलते हैं  और निम्न वर्ग से वोट. मध्य वर्ग की उन्हें कभी फ़िक्र नहीं रही. और इसीलिए मध्य वर्ग भी हमेशा उदासीन रहा. एक वजह ये भी थी...अब तक अधिकांशतः मध्य वर्गीय लोग, वे थे जो सरकार नौकरियों में थे. और अपनी जीविका के साधन और पेंशन के लिए सरकार पर निर्भर थे . इसलिए सरकार के विरुद्ध जाने की हिम्मत भी उन्हें कम ही होती थी. अब जो नया मध्यम वर्ग उभरा है उसका एक बड़ा वर्ग  सिर्फ सरकार पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर नहीं है और जो निर्भर हैं वे भी सरकार से अपनी गाढ़ी कमाई से भरे गए टैक्स का लेखा-जोखा पूछने की हिम्मत रखते हैं. 

हर प्रायोजित आन्दोलन किसी ना किसी वर्ग से सम्बंधित रहा है....लेकिन यहाँ सोशल नेटवर्किंग साइट...एस.एम.एस. के जरिये बिना किसी जाति-वर्ग भेद के लोग स्वेच्छा से एकजुट  हुए. अन्ना हजारे जी ने मंच से 'देश की युवा शक्ति' का शुक्रिया कहा..परन्तु सीनियर सिटिज़न ने भी इस आन्दोलन में बहुत ही अहम् भूमिका निभाई है. हमारे इलाके में ज्यादातर उम्रदराज़ लोग ही सम्मिलित थे. कॉलेज जाते बच्चों...कोचिंग क्लास से निकलते बच्चों से वे बस दो शब्द कहते थे.."बेटा...हमलोगों ने तो बहुत भुगत लिया...अब कोशिश है कि तुमलोगों को इतनी करप्शन ना देखनी पड़े...इसके लिए कुछ करना चाहिए"  और वे बच्चे मैकडोनाल्ड का बर्गर और CCD की कॉफी का मोह छोड़ कर उनकी बात ध्यान से सुनते और  शामिल हो जाते. टी.वी. ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई....स्टेज पर यूँ अन्ना हजारे को दूसरों के लिए भूखा-प्यासा देख कितने ही लोगो के गले से निवाला उतरना मुश्किल हो जाता और वे भी आन्दोलन में शामिल होने को निकल पड़ते.

टी.वी. पहले भी कुछ ऐतिहासिक घटनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका है. कहा जाता है..मशहूर 'बर्लिन की दीवार' गिरवाने में टेलिविज़न का भी हाथ था. पूर्व जर्मनी के लोग बार-बार टी.वी. पर पश्चिम जर्मनी के लोगों का रहन-सहन देख कर ही अपने ही देश के दो टुकड़े करती उस दीवार को गिराने पर आमादा हो गए.


अन्ना हजारे के आन्दोलन ने  एक उत्प्रेरक का कार्य जरूर किया है..अब मध्य वर्ग जाग गया है....और अपनी शक्ति भी पहचान गया है. वो अपने देश को जीने के लिए एक बेहतर स्थान बनाने के लिए कटिबद्ध है. मध्य वर्ग की संख्या 1996 के 26  मिलियन  से बढ़कर,अब 160  मिलियन  और 2015 में  267 मिलियन हो जाने का अनुमान है. यानि जनसँख्या का 40% तो सरकार और नेताओं के लिए बेहतर होगा कि वे मध्य वर्ग की अस्मिता को पहचान लें क्यूंकि ये वर्ग  ,उन्हें सत्ता सौंपेगा...पावर  देगा तो पलट कर सवाल भी करेगा. 

32 comments:

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

खरी खरी........दो पाटों के बीच पिस मध्यम वर्ग ही रहा है.

Rahul Singh said...

अन्‍ना हजारे ने कहा कि देश में जनतंत्र की हत्‍या की जा रही है और भ्रष्‍ट सरकार की बलि ली जाएगी। यह गांधीवादी अहिंसक सत्‍याग्रह था या खून के बदले खून?

Arvind Mishra said...

बहुत सुन्दर और तार्किक विवेचन है और आपने सभी उठते /उठाये गए सवालों का उपयुक्त जवाब भी दे दिया है !

प्रवीण पाण्डेय said...

जब संसाधनों की कमी न हो तो मध्यम वर्ग कुछ सार्थक कर गुजरता है। संघर्ष और आक्रोश, दोनो ही उसकी वाणी बनते हैं।

ali said...

बेहद सुनियोजित आन्दोलन रहा यह !

इस्मत ज़ैदी said...

bahut badhiya vivechna !

aisa anushasit aur ahinsak aandolan BHARAT jaisi democracy men hi ho sakta hai

mujhe garv hai ki main HINDUSTANI hoon

Kajal Kumar said...

जहां भी सामाजिक-राजनैतिक बदलाव होते हैं वहां की कमान मध्यमवर्ग के ही हाथ में रहती आई है, यही पूरे विश्व का सत्य है. अच्छी बात है कि आज मध्यमवर्ग व शिक्षितों की संख्या भारत में कहीं तेज़ी से बढ़ रही है. आने वाले समय में और भी बदलाव देखने को मिलेंगे इस देश को...

abhi said...

बहुत ही सही लिखा है दीदी आपने..
मैं तो खुद बैंगलोर में दो तीन जगह जा चूका हूँ जहाँ ये प्रदर्शन वैगरह चल रहे थे और लोग सभी एकजुट थे...
मैंने तो पहली बार माध्यम वार्गियों को एक साथ ऐसे आते देखा..

वाणी गीत said...

पता नहीं किसे यह ग़लतफ़हमी है कि मध्यम वर्ग खाया पिया अघाया है बल्कि सबसे अधिक दबाव में यही वर्ग है . एक तरफ जहाँ उसे संस्कृति और मूल्यों की चिंता है , वहीं दूसरी ओर आधुनिक होती पीढ़ी के साथ तालमेल भी बैठना है ! वह निम्न वर्ग या उच्च वर्ग की तरह आस -पास के परिवेश से लापरवाह नहीं रह सकता है और इसका मानसिक और आर्थिक दबाव सबसे ज्यादा यही वर्ग झेलता है !

सुज्ञ said...

सही बात है। भ्रष्टाचार से त्रस्त यही मध्यम वर्ग है। नीचले वर्ग के पास देने को कुछ नहीं और उपरी वर्ग को देने से फर्क नहीं पडता।

किन्तु छोटे छोटे भ्रष्टाचार में रत भी यही वर्ग दिखाई देगा। आश्चर्य होता है, देश की नस नस में व्याप्त इस भ्रष्टाचार के विरोध में इतना विशाल समूह देखकर लगता है, भ्रष्टाचारी स्वयं अत्यधिक आक्रोशित नजर आते है। क्या गले तक आ पहुंचा है? या फिर छोटी मछली,बडी मछली का अब पेट भरने में असमर्थ है।

सतीश पंचम said...

शुरूवात में तो नहीं लेकिन जब अन्ना हजारे के अनशन का पांचवा छठवा दिन शुरू हो गया तो सचमुच लोगों ने निवाला लेते समय एकाध बार सोचना शुरू कर दिया था, खुद मैंने भी यह बात महसूस किया था कि यहां मैं भोजन कर रहा हूं और वहां अन्ना भूखे हैं। कहीं न कहीं यह बात सभी लोगों को अंदर ही अंदर हिट कर रही थी। भले ही बाद में लोग पार्टी शार्टी करते रहे हों,डट कर खा पी रहे हों लेकिन असर तो था, डायरेक्ट नहीं तो सबकॉन्शियस असर जरूर डाला है इस आंदोलन ने।

अरुण चन्द्र रॉय said...

सुनियोजित गांधीवादी आन्दोलन

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज 29 - 08 - 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर

रश्मि प्रभा... said...

kuch bolna ho madhyam varg hai n ...

Dr (Miss) Sharad Singh said...

उम्दा लेख...एकदम सारगर्भित...

rashmi ravija said...

@ सुज्ञ जी,

किन्तु छोटे छोटे भ्रष्टाचार में रत भी यही वर्ग दिखाई देगा। आश्चर्य होता है, देश की नस नस में व्याप्त इस भ्रष्टाचार के विरोध में इतना विशाल समूह देखकर लगता है, भ्रष्टाचारी स्वयं अत्यधिक आक्रोशित नजर आते है।

सही कहा जिस तरह इस आन्दोलन में शामिल होने वाले लोग...छोटे छोटे भ्रष्टाचार में रत दिखाई देते हैं.....वैसे ही इन पर अंगुलियाँ उठाने वाले लोग भी...तो फिर यथा स्थिति बनी रहनी चाहिए?

राम की सेना जो रावण से लड़ने निकली थी उसमे शामिल हर-एक का चरित्र राम जैसा धवल नहीं था...पर राम के नेतृत्व में एक बड़े राक्षस का खात्मा करने के लिए उनलोगों ने राम का साथ दिया ना....ये स्पष्ट कर दूँ...यहाँ मै अन्ना या अन्ना-टीम की तुलना 'राम' से नहीं कर रही...बस एक उदाहरण दिया है.

महफूज़ अली said...

टाइटल देख कर लगा .......कि ब्लौगर्ज़ के लिए कुछ लिखा है खुंदक में. ...... वैसे यह है कि करप्शन हटाने के लिए हमें स्कूल्ज़ में मॉरल साइंस को ऐज़ अ सब्जेक्ट कम्पलसरी करना होगा... आन्दोलन से थोडा बहुत उखड़ेगा... लेकिन बेसिस में मॉरल डाल दिए गए तो यह जड़ से ख़त्म हो जायेगा. कुल मिला कर अन्ना ने ज़मीर को जगाया है... हैट्स ऑफ़ टू अन्ना... हाईली कमेंडीएबल आर्टिकल...

anshumala said...

रश्मि जी
अभी अभी अपनी पोस्ट दी है पढ़ा कर लगेगा की जैसे आप की पोस्ट पढ़ने के बाद मैंने उसे लिखा है बहुत कुछ यही मुद्दे मैंने भी उठाये है आप से बिल्कुल सहमत हूं | क्या मध्यम वर्ग की कोई परेशानी नहीं है क्या वो अपनी बात नहीं उठा सकता है क्या आन्दोलन करने का हक़ सिर्फ दलित मजदूर किसान वर्ग को ही है | सुनियोजित है या नियोजित है या मैनेजमेंट है जो भी है हमारी समस्याओ के लिए किया गाय आन्दोलन है और हम इसके साथ है |

neelima sukhija arora said...

बहुत सही बात है रश्मिजी, मध्यवर्ग चाहता तो सीसीडी के एसी में बैठा रह सकता था लेकिन उन्होंने तय किया है कि वो भी अन्ना के साथ हैं , दिनभर वहां धूप में तपना आसान नहीं है, ये केवल फैशन नहीं हो सकता

वन्दना said...

तार्किक और सटीक आकलन किया है।

दीपक 'मशाल' said...

article se poori tarah sahmat..
Sheeba Aslam Fehmi ne kaha ki unki facebook post par
‎Mahfooz Ali says: Darasal baat sirf do hai.... Anna muhim mein ya to anpadh, ganwaar aur bhedchaal mein shaamil hone wale zyada hain YA phir aise padhe likhe hain jo zarurat se zyada padhe likhe hain aur apni zindagi mein asafal hain.

sach kya hai Mahfooz bhaai bataya jaaye??? jo yahan kaha wah ya jo FB par kaha wah??? :P

ajit gupta said...

बहुत अच्‍छा विश्‍लेषण। इस आंदोलन से लोगों की मानसिकता भी मालूम हुई कि वे भ्रष्‍टाचार की बाते तो करते हैं लेकिन जब कोई इसके विरोध में आवाज उठाते हैं तो वे राजनीति के दलों में उलझ जाते हैं और अपनी प्रतिबद्धता दिखाने में कसर नहीं छोड़ते। इस आंदोलन से यह भी स्‍पष्‍ट हुआ कि कुछ वर्ग विशेष के अधिकांश लोग राष्‍ट्रीय महत्‍व के विषय पर मौन रहते हैं वे केंवल अपने वर्ग तक ही सीमित रहते हैं। बस अकेला मध्‍यम वर्ग ही ऐसा है जो राष्‍ट्र की चिन्‍ता करता हुआ आज सड़कों पर उतरा। यह भी सच है कि इस आंदोलन में युवाओं के साथ बुजुर्गों ने भी बहुत बड़ी भागीदारी निभाई। लेकिन अन्‍नाजी ने युवाओं को ही धन्‍यवाद इसलिए दिया कि वे अधिकतर समाज निर्माण के कार्य का आनन्‍द जान नहीं पाते हैं।

डॉ टी एस दराल said...

इस बार मध्यम वर्ग ने ही जन आन्दोलन की ताकत दिखाई है । अन्ना ने सबको जगा दिया है । अब तो इन्कलाब आकर ही रहेगा ।

मनोज कुमार said...

कुछ बुद्धिजीवी को अभी तक समझ में नहीं आ रहा है कि यह कैसा आन्दोलन था। उन्हें यह भी नही दिख रहा कि यह किन लोगों का आन्दोलन था। उनकी आंद्ख पर तो खाने-पीने से चर्बी चढ़ गई है तो उन्हें दिखेगा क्या?

अब तो आलम ये है कि खाने को लाले पड़ रहे हैं और लोगों को लोग खाये पिए और अघाए दिख रहे हैं।

मनोज कुमार said...

कुछ बुद्धिजीवी को अभी तक समझ में नहीं आ रहा है कि यह कैसा आन्दोलन था। उन्हें यह भी नही दिख रहा कि यह किन लोगों का आन्दोलन था। उनकी आंद्ख पर तो खाने-पीने से चर्बी चढ़ गई है तो उन्हें दिखेगा क्या?

अब तो आलम ये है कि खाने को लाले पड़ रहे हैं और लोगों को लोग खाये पिए और अघाए दिख रहे हैं।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

असल में सही और ग़लत के बीच का फ़र्क़ सबसे ज़्यादा मध्यम वर्ग ही जानता है. और भ्रष्टाचार का शिकार भी यही वर्ग सबसे ज़्यादा है जो हर स्तर पर भ्रष्टाचार झेल रहा है. कसमसाता है बोलने को, विरोध करने को, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाता. उसे पीछे-पीछे चलने की आदत है. अपनी भड़ास को बखूबी निकाला है जनता ने, अन्ना जी और आंदोलन के ज़रिये. इस आंदोलन ने जता दिया, खुलेआम कर दिया कि जनता कितनी त्रस्त है.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

बिलकुल सही तस्वीर पेश की है आपने रश्मि जी!! लेकिन जैसे भीड़ में शामिल होना भेडचाल कहा जाता रहा है, वैसे ही इस तरह के आन्दोलनों के साथ भीड़ से अलग दिखने के लिए जनांदोलन की भावना के विपरीत कटाक्ष करना भी एक नया फैशन बना है.. मैं ऑफिस से लौटते समय शाम को रैली में हिस्सा लेने को रुकता.. बाज़ार के बीच, जिसका नेतृत्वा कर रहे होते थे बच्चे /युवा.. और वे आमंत्रित करते होते थे उन गृहणियों को जो वहाँ शोपिंग के उद्देश्य से आयी होती थीं.. उनका मार्च में हिस्सा लेना प्री-प्लांड नहीं था..
रामलीला मैदान में भी जाता रहा.. प्रतिदिन ५० से ६० हज़ार जन समूह दिखा.. किसी अप्रिय घटना का समाचार, किसी खून खराबे की खबर सुनी क्या..
यकीन मानिए पहली बार रैफ को बिना हथियार खड़े पाया.. फिर भी कोई यह मानने को तैयार नहीं कि यह आंदोलन अहिंसक था.. तो क्या कहा जाए.. अब अपनी भाषा में कहूँ तो गंगा में हेलाकर भी कहने से उनको बिस्वास नहीं होने वाला!!

मीनाक्षी said...

सटीक विवेचन...इसमें कोई शक नहीं कि देश और विदेश में रहने वाले हज़ारों लाखों भारतवासी इस आन्दोलन से जुड़े...लेकिन खास तौर से अन्ना और उनके साथ चलने वाले सभी लोगों को सलाम..हलचल हुई है तो उसका असर भी होगा देर सवेर...

Abhishek Ojha said...

"राम की सेना जो रावण से लड़ने निकली थी उसमे शामिल हर-एक का चरित्र राम जैसा धवल नहीं था" - ये सही कहा आपने. इन्फैक्ट अभी ५०-१०० साल पहले के ही जो अपने आदर्श नेता हैं. उनके बारे में हम जो कुछ भी पढते-पढ़ाते, सुनते-सुनाते हैं वो भी शायद सब कुछ सच नहीं होता ! अगर सच होता भी है तो वो उनके जीवन का सिर्फ एक पहलु होता है. इसके अलावा भी बहुत सी बातें होती हैं जो हम नहीं जानते. फिर उनकी भीड़ में सभी दूध के धुले हों ऐसा कैसे हो सकता है? !

Khushdeep Sehgal said...

वो सुबह कभी तो आएगी...

जय हिंद...

ZEAL said...

सत्ता सौंपने वालों को प्रश्न करने का पूरा-पूरा अख्तियार है।

Udan Tashtari said...

अब मध्य वर्ग जाग गया है....और अपनी शक्ति भी पहचान गया है...


अच्छा विश्लेषण किया...