Friday, May 13, 2011

खाली नहीं रहा कभी, यादों का ये मकान

(सोचा था....इस ब्लॉग से एक ब्रेक लेकर...दूसरे ब्लॉग पर कहानी लिखना शुरू करुँगी...अब मेहमानों के आवागमन ने ब्रेक तो दिला दिया...पर नया कुछ लिखने का वक्त नहीं मिल रहा (ना ही पढ़ने का...साथी ब्लॉगर्स माफ़ करेंगे/करेंगी ,...काफी कुछ जमा हो गया है,पढ़ने को...वक्त मिलते ही देखती  हूँ) ....ये मेरी एक पसंदीदा पोस्ट है....'मन का पाखी पर ' 2009 में   पोस्ट की  थी.}

मेरे पिताजी, अगर अपने कार्यकाल के दौरान हुए अपने अनुभवों को लिखें तो शायद एक ग्रन्थ तैयार हो जाए. किस्से तो मैंने भी कई सुने कि कैसे दंगों के दौरान पापा ने एक अलग सम्प्रदाय के लोगों को दो दिन तक घर में पनाह दी थी. वे लोग दो दिन तक पलंग के नीचे छुपे रहें. पलंग पर जमीन छूती चादर बिछी रहती...घर में आने जाने वाले लोगों को पता भी नहीं चलता कि कोई छुपा हुआ है. पापा घर में ताला बंद कर ऑफिस जाते. उनमे से एक को सिगरेट पीने की  आदत थी,उन्होंने रिस्क लेकर एक सिगरेट सुलगाई और बंद खिड़की की दरार से निकलती धुँए की लकीर देख, दंगाइयों ने पूरा घर घेर लिया था. शक तो उन्हें पहले से था ही...संयोग से पुलिस ने वक़्त पर आकर स्थिति संभाल ली. ऐसे ही एक बार दंगे में पापा की पूरी शर्ट खून से रंग लाल हो गयी थी. भीड़ में से किसी ने घर पर खबर कर दी और घर पर रोना,धोना मच गया. बाद में पापा की खैरियत देख सबको तसल्ली हुई.

हॉस्टल में रहने के कारण ,मैंने किस्से ही ज्यादा सुने पर एकाध बार मुझे भी ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ा. इस बार पापा की पोस्टिंग एक नक्सल बहुल क्षेत्र में थी. मेरे कॉलेज की छुट्टियाँ कुछ जल्दी हो गयी थीं,लिहाज़ा दोनों छोटे भाइयों के घर आने से पहले ही मैं घर आ गयी थी. फिर भी मैं बहुत खुश थी क्यूंकि इस बार,छुट्टियाँ बिताने,मेरे मामा की लड़की 'बबली' भी आई हुई थी. वी.सी.आर.पर कौन कौन सी फिल्मे देखनी हैं,किचेन में क्या क्या एक्सपेरिमेंट करने हैं...हमने सब प्लान कर लिया था.उसपर से हमारा मनोरंजन करने को एक नया नौकर ,जोगिन्दर भी था.जो फिल्मो और रामायण सीरियल का बहुत शौकीन था.जब भी हम बोर होते,कहते,"जोगिन्दर एक डायलॉग सुना." और वह पूरे रामलीला वाले स्टाईल में कहता--"और तब हनुमान ने रावण से कहा..."या फिर शोले के डायलॉग सुनाता.हम हंसते हंसते लोट पोट हो जाते पर वह अपने डायलॉग पूरा करके ही दम लेता.


दिन आशानुकूल बीत रहे थे,बस कभी कभी शाम को घर में कुछ बहस हो जाती. पास के शहर  के एक अधिकारी का मर्डर हो गया था.और पापा को उनका कार्यभार भी संभालने का निर्देश दिया गया था. घर वाले और सारे शुभेच्छु पापा को मना कर रहे थे पर पापा का कहना था, "ऐसे डर कर कैसे काम चलेगा...मुझे यहाँ के काम से फुरसत नहीं मिल रही वरना वहां का चार्ज तो लेना ही है."


एक दिन शाम को हमलोग 'चांदनी' फिल्म देख कर उठे. बबली किचेन में जोगिन्दर को 'स्पेशल चाय' बनाना सिखाने चली गयी. मम्मी  भगवान को दीपक दिखा रही थीं.प्यून उस दिन की डाक दे गया था ,मैं वही देख रही थी (कभी हमारे भी ऐसे ठाठ थे :)). उन दिनों मेरी डाक ही ज्यादा आया करती थी. मैंने पत्र पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया था.'धर्मयुग','साप्ताहिक हिन्दुस्तान",'मनोरमा' 'रविवार' वगैरह में मेरी रचनाएं छपने लगी थी. लिहाजा ढेर सारे ख़त आते थे. मेरे ५ साल के लेखन काल में करीब ७५० ख़त मुझे मिले ,जबकि मैं नियमित नहीं लिखा करती थी...कभी कभी तो इन पत्रों से ही पता चलता कि मेरी कोई रचना छपी है. फिर पड़ोसियों के यहाँ ,पेपर वाले के यहाँ पत्रिका ढूंढनी शुरू होती. हालांकि ये इल्हाम मुझे था कि ये पत्र मेरे अच्छे लेखन की वजह से नहीं आ रहे. उन दिनों इंटरनेट की सुविधा तो थी नहीं. इसलिए लड़कियों से interact करने का सिर्फ एक तरीका था. किसी पत्रिका में तस्वीर और पता देख, ख़त लिख डालो. सारे पत्र शालीन हुआ करते थे,पर कुछ ख़त बड़े मजेदार होते थे. दो तीन ख़त तो सुदूर नाईजीरिया से भी आये थे. मैं किसी पत्र का जबाब नहीं देती थी पर हम सब मजे लेकर सारे पत्र  पढ़ते थे. पत्र आने से थोडा अपराधबोध भी रहता था क्यूंकि मम्मी- पापा को लगता था मेरी पढाई पर असर पड़ेगा इसलिए वे मेरे लेखन को ज्यादा बढावा नहीं देते थे.

उन पत्रों में से एक पत्र था तो पापा के नाम पर मुझे लिखावट मेरे दादाजी की लगी,लिहाज़ा मैंने पत्र खोल लिया. पढ़कर तो मेरी चीख निकल गयी.मम्मी , बबली,जोगिन्दर सब भागते हुए आ गए. उस पूरे पत्र में पापा को अलग अलग तरह से धमकी दी गयी थी कि अगर उन्होंने 'अमुक' जगह का चार्ज लिया तो सर कलम कर दिया जायेगा..एक मर्डर वहां पहले ही हो चुका था.हमारे तो प्राण कंठ में आ गए. पापा मीटिंग के लिए पटना गए हुए थे. जल्दी से जोगिन्दर को भेज 'प्यून' को बुलवाया गया. शायद वह कुछ बता सके. वो प्यून यूँ तो इतना तेज़ दिमाग था कि हमारे साथ यू.एस.ओपन देख देख कर 'लॉन टेनिस' के सारे नियम जान गया था. बिलकुल सही जगह पर 'ओह' और 'वाह' कहता. पर अभी उस मूढ़मति ने बिना स्थिति की गंभीरता समझे कह डाला,"साहब तो कह रहे थे कि मीटिंग जल्दी ख़तम हो गयी तो वहां का चार्ज ले कर ही लौटेंगे." हम सबकी तो जैसे सांस रुक गयी. पर पापा का इंतज़ार करने के सिवा कोई और चारा नहीं था.
 चिंता से भरे हम सब सड़क पर टकटकी लगाए,बरामदे में ही बैठ गए. तभी जैसे सीन को कम्प्लीट  करते हुए बारिश शुरू हो गयी.बारिश हमेशा से मुझे बहुत पसंद है पर आज तो लगा जैसे पट पट पड़ती बारिश की  बूँदें हमारी हालत देख ताली बजा रही हैं.बिजली की चमक भी मुहँ चिढाती हुई सी प्रतीत हुई. बारिश शुरू होते ही बिजली विभाग द्वारा बिजली काट दी जाती थी ताकि कहीं कोई तार टूटने से कोई दुर्घटना ना हो जाए. बिलकुल किसी हॉरर फिल्म से लिया गया दृश्य लग रहा था.....कमरे में हवा के थपेडों से लड़ता धीमा धीमा जलता लैंप, अँधेरे में बैठे डरे सहमे लोग और बाहर होती घनघोर बारिश. तभी दूर से एक तेज़ रौशनी दिखाई दी.पास आने पर देखा कोई ५ सेल की टॉर्च लिए सायकल पे सवार हमारे घर की तरफ ही आ रहा है. हमारी जान सूख गयी.पर जब वह हमारा गेट पारकर चला गया तो हमारी रुकी सांस लौटी.

दूर से पापा की जीप की हेडलाईट दिखी और हमारी जान में जान आई. मम्मी ने कहा,"तुंरत कुछ मत कहना, फ्रेश होकर  खाना खा लें,तब बताएँगे" पर पापा ने जीप से उतरते ही ड्राइवर को हिदायत दी,"कल सुबह जरा जल्दी आना.पहले मैं वहां का चार्ज लेकर आऊंगा तभी अपने ऑफिस का काम शुरू करूँगा."ममी जैसे चिल्ला ही पड़ीं,"नहीं, वहां बिलकुल नहीं जाना है" फिर पापा को पत्र दिया गया. सबसे पहले हम लड़कियों पर नज़र पड़ी. इन्हें यहाँ से हटाना होगा. पटना में मेरे छोटे मामा का घर खाली पड़ा था.मामा छः महीने के लिए बाहर गए हुए थे और मामी अपने मायके में थीं. हमें आदेश मिला,"अपना अपना सामान संभाल लो,सुबह ड्राइवर मामा के घर छोड़ आएगा"
 

खाना वाना खाते, बातचीत करते रात के बारह बज गए,तब जाकर मैंने और बबली ने अपनी चीज़ें इकट्ठी करनी शुरू कीं. बिस्तर पर दोनों अटैचियाँ खोले हम अपना अपना सामान जमा रहे  थे कि हमारी नज़र नेलपॉलिश  पर पड़ी और हमने नेलपॉलिश लगाने की सोच ली. रात के दो बज रहे  थे तब. ममी  हमारी खुसुर-पुसुर  सुन कमरे में हमें देखने आयीं.(ये ममी लोगों की एंट्री हमेशा गलत वक़्त पर ही क्यूँ होती है??) हमें नेलपॉलिश  लगाते देख जम कर डांट पड़ी. और हम बेचारे अपनी अपनी दसों उंगलियाँ फैलाए डांट सुनते रहें. क्यूंकि झट से किसी काम में उलझने का बहाना भी नहीं कर सकते थे.नेलपॉलिश  खराब हो जाती.

सुबह सुबह मैं और बबली,पटना के लिए रवाना हो गए.पता नहीं,स्थिति की गंभीरता हम पर तारी थी या अकेले सफ़र करने का हमारा ये पहला अनुभव था. ढाई घंटे के सफ़र में हम दोनों, ना तो एक शब्द बोले,ना ही हँसे. जबकि आज भी हम फ़ोन पर बात करते हैं तो दोनों के घरवालों को पूछने की जरूरत नहीं होती कि दूसरी तरफ कौन है? ना तो हमारी हंसी ख़तम होती है,ना बातें.

ड्राईवर हमें घर के बाहर छोड़ कर ही चला गया,दोपहर तक मम्मी  को भी आना था.पड़ोस से चाभी लेकर जब हमने घर खोला,तो हमारे आंसू आ गए. घर इतना गन्दा था कि हम अपनी अटैची भी कहाँ रखें,समझ नहीं पा रहे थे. मामी के मायके जाने के बाद कुछ दिनों तक मामा अकेले थे और लगता था अपनी चंद दिनों की आज़ादी को उन्होंने भरपूर जिया था. सारी चीज़ें बिखरी पड़ी थीं. बिस्तर पर आधी खुली मसहरी,टेबल पर पड़े सिगरेट के टुकड़े,किचेन प्लेटफार्म पर टूटे हुए अंडे,जाने कब से अपने उठाये जाने की बाट जोह रहें थे.'जीवाश्म' क्या होता है,पहली बार प्रैक्टिकली जाना. डब्बे में एक रोटी पड़ी थी.जैसे ही फेंकने को उठाया,पाया वह राख हो चुकी थी.

मैंने और बबली ने एक दूसरे को देखा और आँखों आँखों में ही समझ
गए,सारी सफाई हमें ही करनी पड़ेगी. कपड़े बदल हम सफाई में जुट गए.बस बीच बीच में एक 'लाफ्टर ब्रेक' ले लेते. कभी बबली मुझे धूल धूसरित,सर पर कपडा बांधे, लम्बा सा झाडू लिए जाले साफ़ करते देख,हंसी से लोट पोट हो जाती तो कभी मैं उसे पसीने से लथपथ,टोकरी में ढेर सारा बर्तन जमा कर , मांजते देख हंस पड़ती. कभी हम,डांट सुनते हुए लगाई गयी अपनी लैक्मे की नेलपॉलिश  की दुर्गति देख समझ नहीं पाते,हँसे या रोएँ.

दो तीन घंटे में हमने घर को शीशे सा चमका दिया और नहा धोकर मम्मी  की राह देखने लगे.अब हमें जबरदस्त भूख लग आई थी.किचेन में डब्बे टटोलने शुरू किये तो एक फ्रूट जूस का टिन मिला. टिनक़टर तो था नहीं,किसी तरह कील और हथौडी के सहारे उसे खोलने की कोशिश में लगे.मेरा हाथ भी कट गया पर डब्बा खोलने में कामयाबी मिल गयी. बबली ताजे धुले कांच के ग्लास ले आई. हमने इश्टाईल से चीयर्स कहा और एक एक घूँट लिया.फिर एक दूसरे की तरफ देखा और वॉश बेसिन की तरफ भागे. जूस खराब हो चुका था.वापस किचेन में एक एक डब्बे खोल कर देखने शुरू किये. एक डब्बे में मिल्क पाउडर मिला. डरते डरते एक चुटकी जुबान पर रखा,पर नहीं मिल्क पाउडर खराब नहीं हुआ था.फिर तो हम चम्मच भर भर कर मिल्क पाउडर खाते रहें,और बातों का खजाना तो हमारे पास था ही.सो वक़्त कटता रहा..

वहां का काम समेटते ममी को आने में शाम हो गयी.हमने उन्हें घर के अन्दर नहीं आने दिया.फरमाईश की,पहले हमारे लिए,समोसे,रसगुल्ले,कचौरियां लेकर आओ,फिर एंट्री मिलेगी.


(पापा ने उस जगह का चार्ज नहीं लिया...और अगले छः महीने के अंदर ही निहित स्वार्थ वालों  ने, वहाँ से उनका  ट्रांसफर करवा दिया. )

44 comments:

मनोज कुमार said...

आपकी यादों के गलियारे में सफ़र करते वक़्त सांस रोक कर पूरा आलेख पढ़्ता रहा। एक सशक्त व्यक्तित्व वाले पिता को समर्पित यह आलेख काफ़ी प्रेरक है।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

रश्मि जी, अकसर इंसान को हालात के मुताबिक ढल जाना होता है. बहुत कुछ कह रही है आपकी पोस्ट.

रवि धवन said...

ऐसा लग रहा था कि जैसे आंखों के सामने ही दृश्य चल रहे हों।
आपका लिखने का स्टाइल सबसे अलग है। गंभीरता के साथ कुछ हंसी का पुट डालकर लेख को जीवंत कर देती हैं।

मीनाक्षी said...

सहज प्रवाह में बस पढ़ते गए...कई यादों ने रोमाँचित कर दिया...

वन्दना अवस्थी दुबे said...

पहले भी पढ चुकी हूं, इस पोस्ट को, लेकिन जितना मज़ा तब आया था, उतना ही आज भी आया. ऐसे रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुभव बाद में ही मज़ा देते हैं, उस वक्त के क्या हालात रहे होंगे, महसूस कर रही हूं.
"मेरे ५ साल के लेखन काल में करीब ७५० ख़त मुझे मिले ,जबकि मैं नियमित नहीं लिखा करती थी..."
hmmmmm....अच्छे लेखक की यही पहचान होती है कि वो अपनी बात इशारों में समझा दे :)
अनियमित लेखन पर ७५० खत, तो नियमित लेखन होता तब??? :):)
बहुत दिलचस्प पोस्ट.

rashmi ravija said...

@वंदना
अनियमित लेखन पर ७५० खत, तो नियमित लेखन होता तब???

इसीलिए तो वजह भी बता दी...कि क्यूँ मिलते थे वे पत्र....:)..मुझे अपने बारे में कोई मुगालता नहीं है :):)

इस्मत ज़ैदी said...

रश्मि ,एक ही सांस में पढ़ गई पूरी पोस्ट और वाक़ई एक अजीब सी घबराहट का अनुभव हुआ ,,
ज़ाहिर है जिन लोगों पर गुज़री होगी उन की क्या हालत हुई होगी ,,
कुछ तो क़िस्से ऐसे और उस पर से तुम्हारा लेखन
दोनों ने पोस्ट को अत्यंत रोचक बना दिया
बढ़िया लेखन के लिये बधाई
और
देश के एक बहादुर सपूत की बेटी होने का जो सौभाग्य मिला है तुम्हें उस की भी बधाई

दीपक 'मशाल' said...

दोबारा पढ़ लिया.. अब तो याद भी हो गया.. :P

rashmi ravija said...

@ इस्मत
लगता है...पोस्ट का फर्स्ट पार्ट...दूसरे पार्ट पे हावी हो गया...अरे..कितने मजे किए हमने...वो लक्मे की नेलपॉलिश..वो घर साफ़ करना...वो जूस का टिन...मिल्क पाउडर का डब्बा...मुझे तो वो सब लिखने में ज्यादा मज़ा आया...In fact was laughing..swear..:)

Udan Tashtari said...

फिर से पढ़ा....

Rahul Singh said...

रोचक, प्रवाहमय.

नीरज जाट जी said...

याद करना, उन साढे सात सौ खतों में चार-पांच खत तो मेरे भी होंगे। मेरा भी वही मकसद होता था, जो आपने समझा। हा हा
खैर, मजाक कर रहा हूं। मेरी उस समय किसी को खत लिखने की औकात ही नहीं थी।
बहुत बढिया लेखन। एक बार पढना शुरू किया तो पढता ही गया।

रश्मि प्रभा... said...

हालात का असर किस तरह कितना कुछ दिखाता है , सिखाता है , बताता है

ajit gupta said...

एक एक लाइन पर लिखने को मन कर रहा है, लेकिन तब यह टिप्‍पणी नहीं रह जाएगी, पोस्‍ट ही बन जाएगी। मुझे भी चिन्‍ता हो रही थी, नेल-पालिश की। आखिर आपने लिख ही दिया। वैसे ऐसा क्‍यों होता हैं कि जब कोई अप्रिय समाचार आते हैं तब बारिश आ जाती है और लाइट चले जाती है? एक बात समझ आयी कि जिसे बातों का शौक है उसे कोई मुसीबत बड़ी नहीं लगती। बहुत मजा आया पढ़कर, एक ही साँस में पढ़ा गया। 750 पत्र की संख्‍या गिनी थी क्‍या? अब टिप्‍पणी का आंकड़ा क्‍या है?

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुधा देखा है कि धमकी देने वाले कुछ कर नहीं पाते हैं। अब तो कई स्थानों पर एक कान से सुनते हैं और दूसरे कान से निकाल देते हैं।

rashmi ravija said...

@नीरज जाट जी,
आप तो तब बहती नाक और सरकती पैंट के साथ नर्सरी में जाते होंगे....ए..बी.सी.डी.सीख रहे होंगे...पत्र कहाँ से लिखते { बुरा मत मानियेगा...आपकी उम्र वालों से इतनी छूट ले लेती हूँ }

rashmi ravija said...

@अजित जी,
लिख ही दिया होता....मजा आता पढ़ कर...:)

और बिलकुल गिने थे, सारे पत्र..बल्कि कई-कई बार 746 थी exact संख्या {ये मेरे छोटे-भाई बहनों का काम ज्यादा था..खासकर इस 'बबली' का..जिसका जिक्र किया है पोस्ट में :)}.....काफी दिनों तक वो चिट्ठियों का थैला साथ था.....फिर जब मुंबई आ रही थी...तो फेंक दिए सारे.....

टिप्पणियों का हिसाब तो नहीं रखती...कई जगह तो ये बस ले-दे का मामला है (आपलोगों के साथ नहीं...हमें एक-दूसरे को पढना अच्छा लगता है...) ...लोगो को ऐसे ही 70, 80 कमेन्ट थोड़े ही मिल जाते हैं....100 दो तो 80 मिलते हैं...:)...फिर देने का हिसाब भी रखना पड़ेगा :)

Gyandutt Pandey said...

धमकियाँ, कभी लगता था उनका तनाव जीवन का अंग है। अब लगता है धमकियां नहीं बचीं, यादें बच गयी हैं!
आप लिखती वास्तव में बहुत अच्छा हैं!

राजेश उत्‍साही said...

यादों की बारात निकली है यार दिल के द्वारे। मजेदार है।
*
पर ये लक्‍मे का विज्ञापन क्‍यों कर रही हैं आप। क्‍या लक्‍मे गर्ल भी रहीं हैं।

rashmi ravija said...

@राजेश जी,
हमारे जमाने में लैक्मे गर्ल जैसी कोई प्रतियोगिता होती नहीं थी....और जब होने लगी तो हम गर्ल से वूमैन बन चुके थे...so no chance :(
बस यूँ ही लगा दी वो तस्वीर....पोस्ट में जिक्र था इसलिए...

rashmi ravija said...

@ज्ञानदत्त जी,
क्या कहूँ.....You just made my day :)

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

नमस्कार जी
नेल पालिश का डर मम्मी से ज्यादा लगा वाह क्या कहने
आपने नीरज भाई की सही खिचाई की,

Arvind Mishra said...

इन संस्मरणों को पुस्तकाकार होने की जरुरत है ....

Avinash Chandra said...

बहुत ही रोचक लिखती हैं आप, वैसे मैं कोई नया राग नहीं छेड़ रहा। :)

और फिर. 100 दो तो 80 मिलते हैं......सही बात है।

सतीश पंचम said...

पहले भी पढ़ चुका हूँ, आज फिर पढ़ा। रोचक अंदाज में लिखी पोस्ट है।

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही रोमाँचित कर रही हे आप की यह यादें, अब पढने लिखने मे रोमंच लगता हे, जब यह सब बीत रही होगी तो कैसा लगा होगा.....

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

कर्मठ पिता को समर्पित सुन्दर प्रस्तुति।

जयकृष्ण राय तुषार said...

रश्मि जी बहुत रोचक संस्मरण लगा काश मैं भी आपको कोई खत लिख सकता |बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं |

डॉ टी एस दराल said...

बहुत रोचक संस्मरण है । बहुत खूबसूरती से आपने पेश किया है । कई बातों को मिला कर लिखने से रोचकता और भी बढ़ जाती है । बारिश वाला द्रश्य बड़ा सस्पेंस्फुल रहा ।
लेकिन आपके पापा किस महकमे में काम करते थे , यह पता नहीं चला ।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

एक पूरी सस्पेंस थ्रिलर की तरह पोस्ट है ये.. और बीच बीच में एनेक्डॉट्स... १०० और ८० के बारे में बस इतना ही कहना है कि फिलहाल तो हाथ १०० के काबिल ही नहीं है,इसलिए जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया!!

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सुंदर प्रवाहमयी लेखन ..... नमन ऐसे कर्मठ व्यक्तित्व को.... उनके घर जन्मी और बड़ी हुईं यह सौभाग्य है आपका....

Sadhana Vaid said...

इस पोस्ट को अरसों ही पढ़ लिया था ! कमेन्ट भी करना चाह रही थी लेकिन सर्वर डाउन था इसलिए नहीं कर पाई ! पोस्ट बहुत ही रोचक लगी ! स्मृति मंजूषा में हर याद बेशकीमती मोती की तरह होती है ! उन्हें जितना सहेजा सँवारा जायेगा वे उतनी ही अनमोल होती जायेंगी ! खूबसूरत झरोखे से अपनी अतीत की सुन्दर झलकियाँ दिखाने के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

मनोज कुमार said...

आप लोग खुशनसीब हैं... बबली जैसी दोस्त हैं और
१०० देने पर ८० मिल जाते हैं, यहां १००-१५० दो तो १०-१५ के लाले पड़ते हैं।
...

rashmi ravija said...

@मनोज जी,
इस मामले में तो सच्ची खुशनसीब हूँ....बहन से बढ़कर वो दोस्त है...

और ये मैं नहीं मानती...कि आप १००-१५० दें और आपको..१०-१५ मिलें ..असंभव :)
दो दिन पढना-लिखना छोड़....सिर्फ टिप्पणियाँ दीजिये...फिर देखिए...:)

Mired Mirage said...

चलिए आपने हमें व हमारों को मिली न जाने कितनी धमकियों की याद दिला दी.न जाने वे धमकी देने वाले अब कहाँ होंगे इस लोक में या परलोक में अपना धंधा चला रहे होंगे.
वे हाथ पैर शिथिल करने वाले पल आज होंठों पर मुस्कान ले आते हैं.

घुघूती बासूती

वन्दना said...

तुम्हारा अन्दाज़-ए-बयाँ ही हर बात को खास बना देता है…………तुम्हारी यादो का मकान कभी खाली नही हो सकता।

ZEAL said...

सभी की तरह , मैं भी एक ही सांस में पढ़ गयी। अच्छा हुआ आपने इसे दुबारा यहाँ लगाया , मैंने पहले नहीं पढ़ा था। पिताजी के प्रेरणादायी व्यक्तित्व को नमन।

सतीश सक्सेना said...

आपके पापा का व्यक्तित्व पसंद आया ...शुभकामनायें आपको !

वाणी गीत said...

ये कब लिख दिया ...पढ़ा ही नहीं मैंने ...

उन दिनों ऐसी सिहरा देने वाली यादें बिहार में कोई अजूबा नहीं थी ...अब तो पूरे देश के लिए ही नहीं है ...कुछ वर्षों पहले मध्यप्रदेश के बालाघाट जाना हुआ था ...परिचित वन अधिकारी ऐसे ही भय के माहौल में जी रहे थे ..
तुम्हारी यादों के साथ बहुत सी यादें मेरी भी जुड़ गयी ..पापा दौरे से देर रात लौटते तो गनमैन के साथ होने के बावजूद साँसे थमी रहती थी !
तुम इतना बड़ा लेख /संस्मरण कैसे लिख लेती हो ...और कही भी तारतम्यता टूटती नहीं !
उत्सुकता भी है कि तुमने बाद में इतने सालों लिखना क्यों छोड़ दिया !

रंजना said...

यह पहले भी पढी थी...पर फिर से पढना भी उतना ही ताज़ा, रोचक लगा...

ये यादों की पूंजी वाली पोटली समय के साथ समृद्धतर और सुखदाई होती जाती है....नहीं?.

रचना दीक्षित said...

एक साँस में ही पढ़ ली पूरी पोस्ट.बहुत रोचक संस्मरण हैं ऊपर ससे आपके लिखने के स्टाइल ने चार चंद लगा दिए. जीवनके खट्टे मीठे अनुभव पिताजी कि कर्मठता लाजवाब. प्रेरक पोस्ट
आभार

Rakesh Kumar said...

आपकी प्रवाहमयी प्रस्तुति रोचक ही नहीं अदभुत है.
वातावरण का अहसास कराती हुई चलती ही जाती है फिर फिर पढ़ने का मन करता है.
मेरे ब्लॉग पर आप आयीं इसके लिए आपका आभारी हूँ .
आप मेरी ५ मई को जारी पोस्ट पर नहीं आयीं हैं शायद.समय मिले तो जरूर आईयेगा.

अग्निमन said...

बहुत रोचक संस्मरण

अरुण चन्द्र रॉय said...

कई बार पढ़ गया इस संस्मरण को... बहुत प्रवाह के साथ लिखा है आपने... कई बार पढने का मन किया... चिट्ठी .. फिर पिताजी का स्थानातरण.. मामाजी के घर की सफाई.. और दो बहनों के बीच बातों का पिटारा.... जीवन इन्ही संस्मरणों का तो नाम है... बहुत सुन्दर !