Wednesday, September 29, 2010

प्लीज़ रिंग द बेल : एक अपील

आज , एक ऐसे संवेदनशील विषय पर लिखने जा रही हूँ, जिसके जिक्र से सब आँखें चुराते हैं और ऐसा प्रदर्शित करते हैं ,मानो ना कभी देखा ,ना सुना हो.

अभी कुछ दिन पहले सलिल जी के ब्लॉग पर एक पोस्ट पढ़ी, "पति पत्नी और वो" जिसमे जिक्र था कि कैसे एक पति अपनी पत्नी को सरेआम पीट रहा था और जब उनके बाबूजी ने उस आदमी को एक थप्पड़ मारा तो खुद उसकी पत्नी ने उनका हाथ पकड़ लिया कि "यह उसके घर का मामला है, "

सलिल जी के बाबूजी के प्रति अगाध श्रद्धा  से मन भर उठा क्यूंकि बिरले ही कोई पहल कर के 'यह बात' स्त्री के मुहँ से सुनता है . अधिकाँश लोग यह मान कर ही  चलते हैं कि यह उनके घर का मामला है. बरसो पहले बचपन में देखी एक घटना मानसपटल पर अंकित है . जब पूरे गाँव ने यह सोच कि यह उनके घर की  बात  है, कोई हस्तक्षेप नहीं किया था.

मैं काफी छोटी  थी,दादा जी के पास गाँव गयी हुई थी . यूँ ही गाँव में घूम रही थी कि देखा एक महाशय जी अपनी पत्नी पर अपना पुरुषार्थ दिखा रहें हैं और उसे मारते हुए घर की तरफ लिए जा रहें हैं. मैने पास खड़ी खेतों में काम करने वाली  काकी से पूछा, " कोई रोकता क्यूँ नहीं?" कहने लगी, "ये तो उसके घर की  बात है... ये तो कुछ नहीं, एक दिन बरसात में वह अपनी पत्नी को दौड़ा दौड़ा  कर मार रहा था और आस-पास के सब लोग अपनी खिडकियों से नज़ारा देखते हुए यह प्रार्थना  कर रहें थे कि "हे भगवान!.. उसकी लाज रखना ...उसके कपड़े ना फटें "

उस दिन जो आक्रोश उपजा था यह सुन...आज भी ज्यूँ का त्यूँ है. क्यूँ लोग समझ लेते हैं कि यह उनके घर का मामला है? कई लोगों ने उस पोस्ट पर टिप्पणी की है कि अगर घर का मामला है तो ,घर के अंदर ये मार-पीट करो. यानि कि घर के अंदर अगर पति हाथ उठाये और पत्नी बिना आवाज़ किए  सहती रहें तो सब कुछ ठीक  है? बाहर दुनिया वैसी ही सुन्दर है ?

खैर वह सब एक लम्बे विमर्श  का विषय है. क्यूँ पत्नियां ऐसा कहने पर मजबूर होती हैं.  अधिकाँश मामलो में वे पति के ऊपर आर्थिक रूप से निर्भर  होती हैं. पर यह आंशिक सत्य है. घरेलू हिंसा से शिक्षित, संपन्न, आत्म-निर्भर महिलायें  भी बरी नहीं हैं.उनका  आर्थिक रूप से निर्भर होना भी कोई मायने नहीं रखता. कई मध्यम वर्गीय और उच्च घरों में भी ऐसे दृश्य बदस्तूर चलते रहते हैं. नाम नहीं लिख रही पर काफी लोगों को पता होगा. एक मशहूर उद्योगपति की पत्नी, जो पांच करोड़ रुपये की घड़ी हाथों में पहनती हैं. घरेलू हिंसा की शिकार हैं. कितनी बार पत्रकारों ने उनके गले ,हाथ, चेहरे पर लाल-काले  निशान देखे हैं. मशहूर बोलीवुड हिरोइन का किस्सा भी सबको पता होगा. जिसके  बॉय फ्रेंड ने उसका हाथ जख्मी कर दिया था और चेहरे के निशान को बड़े से  ;डार्क ग्लासेज' से छुपाये और हाथों  में प्लास्टर लगाए वो फिल्म फेयर अवार्ड लेने पहुंची थीं. और उनकी तारीफ़  भी हुई थी क़ि उन्होंने इसे दुनिया के सामने सरेआम स्वीकारा. कल के बड़े स्टार जिनका बेटा भी अब सुपर स्टार के कगार पर है. और पत्नी भी फिल्म-स्टार थीं. पर उनके हाथ उठाने की आदत से तंग  आ एक दिन पत्नी ने पुलिस को बुला लिया. खैर मामला रफा-दफा हो गया और आज भी दोनों मुस्कुराते हुए, फ़िल्मी पार्टी, टी.वी. प्रोग्राम में नज़र आते हैं.

वर्तिका नंदा की ये कविता यहाँ बड़ी सटीक है.

नौकरानी और मालकिन
दोनों छिपाती हैं एक-दूसरे से
अपनी चोटों के निशान
और दोनों ही लेती हैं
एक-दूसरे की सुध भी

 

मर्द रिक्शा चलाता हो
या हो बड़ा अफसर
इंसानियत उसके बूते की बात नहीं।


और यह सब सिर्फ हमारे पिछड़े देश में ही नहीं चलता.विदेशों में भी वहाँ की शिक्षित, आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाए भी इसकी शिकार हैं.. एक बार एक बड़े टेनिस स्टार ने अपने इंटरव्यू में स्वीकारा क़ि मैच हारने के बाद ,वह अपना गुस्सा अपनी पत्नी पर निकालता है और उसने कहा था, she dsnt get hurt much as she has fast knees " क्या कहने!! बस ये है क़ि वे इसे शर्म का विषय नहीं समझतीं.पुलिस में शिकायत  भी कर देती हैं और पुलिस तुरंत हरकत में  भी आ जाती है.

हम यहाँ जजमेंटल नहीं हो सकते. ये सब सहने की सबकी अपनी मजबूरियाँ होती हैं, अपने तर्क हैं. जो पुरुष ऐसी अमानवीयता दिखाते हैं. उनकी upbringing   में प्रॉब्लम होती है. बचपन अच्छा नहीं गुजरा होता और उन्हें काउंसिलिंग  की सख्त जरूरत होती है. पर वे कभी मानेंगे ही नहीं क़ि उनके व्यक्तित्व में कोई असंतुलन है.

पर इस पोस्ट को लिखने का उद्देश्य कुछ और है. करीब दो साल  पहले मैने मुंबई में अखबारों में एक मूवमेंट के बारे में पढ़ा था ".प्लीज़ रिंग द बेल".उसमे यह अपील की गयी  थी  क़ि अगर किसी फ़्लैट के अंदर से ऐसी आवाजें आ रही हैं. तो कृपया आप चुपचाप तमाशा ना देखें. घंटी बजाएं. लेकिन आपको उनकी लड़ाई के बीच कोई हस्तक्षेप या किसी की  साइड नहीं लेनी है. इस से झगडा और बढ़ सकता है और फिर लोग वही सदियों पुराना जुमला दुहरा सकते हैं " ये हमारे घर का मामला है?" आपको उस टेंशन को  को बस  defuse  करना है. आप अखबार मांग  लें, या बर्फ मांग लें..या स्क्रू  ड्राइवर...किसी भी बहाने से उस सिचुएशन को टाल दें. अचानक किसी को सामने देख, उसके सामने वो हरकत तो नहीं कर  सकता.और एक बार जब आप थोड़ी देर को बातों में उलझा लेंगे तो उस चरम तनाव के क्षण में कुछ ढीलापन तो आएगा.  ऐसा ही, किसी भी स्थिति में किया जा सकता है. फ़्लैट ना हो....और यह सब नज़रों के सामने चल रहा हो.....तब भी पुरुष को कहीं दूर ले जाया जा सकता है, महिला को किस बहाने से वहाँ से हटाया जा सकता है.

उस वक़्त इसे सुलझाने की  कोशिश तो बेकार ही होगी क्यूंकि कई सारी बातें होती हैं...और जबतक पुरुष इसे खुद गलत नहीं समझता ,सुधार नहीं आ सकता. लेकिन आँखों के सामने या जानकारी में ऐसी घटना हो तो पहल करनी चाहिए. क़ि कम से कम एक महिला उस प्रताड़ना से तो बच सके .और ये सब सिर्फ कोरी बातें नहीं हैं. एक बार मेरी एक फ्रेंड ने किया भी था. इस मूवमेंट की बात पढ़कर  नहीं...अपने अंतर्मन की सुनकर. वो रात में मेहमान को छोड़ने गेट तक आई तो ग्राउंड फ्लोर से ऐसी ही आवाजें आ रही थी. पति-पत्नी ने घंटी बजा दी. थोड़ी देर शांत हो गया,सब कुछ. फिर घंटी बजायी तो पति ने दरवाज खोला. पति ने कुछ बातों में उलझा लिया, उस आदमी की  पत्नी बेडरूम में चली गयी. वह आदमी थोड़ा शर्मिंदा भी दिख रहा था. जब १५-२० मिनट बाद वो लौटे तो उस आदमी का गुस्सा काफी कम हो चुका था.

यह उपाय कितना कारगर है.....कोशिश कितनी कामयाब होगी नहीं कहा जा सकता पर जबतक अमल में नहीं लाया जायेगा , इसकी सफलता -विफलता  का पता कैसे चलेगा ? कम से कम  सोच में यह बदलाव तो आनी शुरू होगी कि यह सिर्फ घर का मामला नहीं.इंसानियत का मामला है. और हस्तक्षेप किया जा सकता है इसलिए हिचकिचाइए मत एंड  Please ring the Bell.

86 comments:

  1. आप की खबर यहाँ भी है .... मेरे नाम के साथ .
    आप की रचना चोरी हो गयी है .... यकीन न आये तो यहाँ देख ले ...
    http://chorikablog.blogspot.com/2010/09/blog-post_9327.html

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  2. are haa waki me chori ho gai hai..
    yahan par

    http://chorikablog.blogspot.com/

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  3. ring the bell, whistle blower कई इस तरह के प्रयास किए जा रहे हैं सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए । लेकिन इन सब के मूल में है सदियों की गुलामी और अपनी खीज मिटाने का एक ही सुरक्षित रास्ता ।
    वैचारिक मतभेद सामान्य बात है लेकिन उसका ऐसा अंत हमारी व्यवस्था की कहीं न कहीं कोई गंभीर चूक दर्शाता है ।
    स्त्री शोषण वो भी जन्म से पहले ही !! कहाँ खड़े हैं हम ?
    मुझे तो लगता है हमारी शिक्षा व्यवस्था में ही कोई गंभीर चूक है जो समय के साथ इन समस्याओं को कम करने के बजाय बढ़ा ही रही हैं ।

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  4. @ बंटी एवं संजय
    इतने गंभीर विषय पर इस तरह की टिप्पणियाँ मुझे अच्छी नहीं लग रहीं.

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  5. सबसे पहले तो आप यह बताइये कि क्या यह पोस्ट आपने उन लोगों के लिए लिखी है जो ऐसे पति पत्नी से इतर हैं ?
    मतलब यह कि पहला पत्थर वह मारे जिसने पाप न किया हो ....
    और इस तरह पत्थर मारकर एक नया पाप कर ले ..
    ?
    मतलब यह कि जो यह कहता है कि यह उनके घर का मामला है और चुप रह जाता है वह भी इस जुर्म में भागीदार है ...
    बापू कह गए हैं .. जुल्म सहना भी तो पाप है ..
    मैं इसमे इतना जोड़ना चाहता हूँ कि जुल्म सहते हुए देखना भी पाप है ।
    लेकिन जो लोग शारीरिक प्रताड़ना देने को पाप नहीं समझते क्या उनकी पाप की अलग परिभाषा है ?
    और उनकी जो इसे अपनी नियति समझते हैं ?
    मेरे प्रश्नचिन्हों और पूर्ण विरामों पर गौर किया जाए माई- बाप ।

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  6. 'उड़ान' फिल्म का वह लड़का याद आ रहा है जिसने ( अपने कथन में कहा ) शराबी पिता के कोप से माँ को बचाया और जब पीछे मुड़ा तो माँ ने ही बेटे को गलत ठहरा दिया ! इतनी गहरी हैं जड़ें ! निर्मूलन के लिए तो व्यापक जागृति चाहिए ! अच्छे विषय पर लिखा है आपने |

    'रिंग द बेल' वाली बात भी ठीक है , पर इसमें संस्कार तो बहुत धीरे धीरे बदलेंगे ! पीढियां निकलती रहेंगी | धनी हो या गरीब , यह समस्या तो वहाँ भी ! शायद महिलाओं को ही आगे आकर ज्ञानात्मक जागृति लाना होगा !

    और जो प्रविष्टि बहस की अपेक्षी उसका कॉपी-करण बहस की केन्द्रीयता में व्यवधान पैदा करता है ! आभार !

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  7. आपसे मैं पूर्णतया सहमत हूँ.
    लेकिन, उन पतियों को कौन बचाने आयेगा जो पत्नी-पीड़ित हैं.
    जिन लोगो को पत्नियां अपने पतियों को मारती-पीटती, लडती-झगडती, गाली-गलौच करती हो उन्हें कौन बचाएगा??
    मैं पति-पत्नी में किसी एक का पक्ष नहीं ले रहा हूँ और नाही किसी एक का साथ दे रहा हूँ.
    मैं तो सिर्फ ये कहना चाहता हूँ कि-पीड़ित मात्र पत्नी ही नहीं हैं, पति भी पीड़ित हैं.
    मेरी आपसे अपील हैं कि-"कृपया आप अपने इसी ब्लॉग-पोस्ट के लास्ट (अंत) में दरवाज़ा खटखटाने या डोर बेल बजाने की अपील पुरुषो के लिए भी करे. यानी पुरुष के हित के लिए भी यही प्रक्रिया भी अपनाने की अपील करे."
    बहुत अच्छा और गंभीर मुद्दे पर लिखा हैं आपने.
    धन्यवाद.
    WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

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  8. रश्मि जी,
    अपने ब्लॉग पर अपने निजी अनुभव बाँटते हुए मेरी कोशिश हमेशा यही रही है कि मैं उन सरोकार को उजागर करूम जो कहीं न कहीं व्यक्तिगत की परिभाषा से बाहर निकल समाज को प्रभावित करते हैं या कम से कम किसी को उसमें अपना सा कुछ खोजने के लिए विवश करते हैं. मैंने अपने स्वर्गीय पिताजी की जिस घटना का ज़िक्र किया, उसे जिस मोड़ पर मैंने छोड़ा था, उसका उद्देश्य यही था कि लोग इसपर चर्चा करें, न कि यह कहें कि मैंने बड़ी सम्वेदनशील पोस्ट लिखी है. क्योंकि मेरी सम्वेदनशीलता व्यर्थ है अगर मैं उस समस्या की तह तक न पहुँच सकूँ.
    आज मेरा लिखना सार्थक हुआ और मेरे पिताजी अगर कहीं किसी लोक में हैं तो आपको अवश्य आशीस दे रहे होंगे. आपने अच्छा समाधान सुझाया है, लेकिन इसका स्कोप सीमित है. असभ्य या अशिष्ट समाज में इन बातों का असर नहीं होता. सभ्य या शिष्ट समाज में इसका स्वरूप भी बदल जाता है. मैं एक बहुचर्चित महिला ब्लॉगर को जानता हूँ जो स्वयम् इससे भी कटु अनुभव से गुज़री हैं. ख़ैर आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने मेरी पोस्ट को आगे बढाया. जो चर्चा मेरी पोस्ट पर अधूरी रह गई थी शायद यहाँ आकार ले सके.

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  9. @चन्द्र जी जरा पत्नी पीड़ितों का प्रतिशत भी बता दें...कि कितने प्रतिशत पति घरेलू हिंसा के शिकार हैं...और रेशियो क्या है...प्लीज्ज्ज़

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  10. रश्मि जी आपने बहुत संतुलित तरीके से पूरी बात को रखा है।
    मैं आपसे सहमत हूं। पर इसके लिए बहुत हिम्‍मत चाहिए। पीडि़त की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं और आप पीडित करने वाले के निशाने पर आ जाते हैं। और पहली कसौटी तो यही है कि आप खुद ऐसा कुछ नहीं करने में विश्‍वास रखते हों।
    मैंने सलिल जी के ब्‍लाग पर भी लिखा था,मैंने दो तीन ऐसे मामलों को बहुत नजदीक से देखा है,उन्‍हें सुलझाने का प्रयत्‍न किया है।

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  11. बात में एरिका जोंग की पंक्तियों से शुरु करना चाहूँगा कि स्त्रियां इतिहास का एक मात्र ऐसा शोषित समुदाय है जो अशक्त रूप में आदर्श बना दी गई हैं। एक सर्वे के अनुसार प्रत्येक 7 मिनट में अपने पति अथवा उसके रिश्तेदारों द्वारा एक स्त्री को प्रताड़ित किया जाता है। प्रताड़ना तो प्रताड़ना सफाई में यह कहा जाता है कि पति, पिता, भाई है, हाथ उठा ही दिया तो क्या हुआ ? इस घरेलू हिंसा को कौन सभ्य समाज जायज ठहरा सकता है ?

    अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा सम्मान से जीने का हक तो हमें संविधान से मिले है। अगर इस पर अतिक्रमण हो तो इसका विरोध किया जाना चाहिए। घरेलू हिंसा की रोकथाम के लिए सन् 2005 में “द प्रेटेक्शन ऑफ वुमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस” अधिनियम पारित हुआ था। यह कानून लड़की, मां, बहन, पत्नी, बेटी बहू यहां तक कि लिव इन रिलेशन यानी बगैर शादी के साथ रह रही महिलाओं को भी शारीरिक व मानिसिक प्रताड़ना से सुरक्षा प्रदान करता है।
    इस अधिनियम के तहत हर जिले में दंडाधिकारी के समकक्ष प्रोटेक्शन ऑफिसर की व्यवस्था की गई है। इस कानून में सजा का भी प्रावधान है।
    सवाल है कि कितनी महिलाओं को इसके प्रावधानों की जानकारी है ? है,तो क्या वे प्रोटेक्शन ऑफिसर तक शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत जूटा पाती है ? अगर जुटा पाती होती तो हर सातवें मिनट में कोई न कोई महिला घरेलू हिंसा का शिकार नहीं होती। बात यहीं खत्म न करते हुए मैं रोजऐन बार की पंक्तियों से इस विषय को और आगे बढ़ाना चाहूँगा कि औरत को अभी तक यह सीखना बाकी है कि ताकत कोई देता नहीं है, वह आपकों ले लेनी होती है ।

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  12. रश्मि जी बंटी और संजय की बात से परेशान न हों। शायद अब तक आपने भी देख लिया होगा उनका ब्‍लाग। बंटी ने आपकी यही पोस्‍ट वहां लगाई है। यह तो अच्‍छा ही है जो पढ़ेंगे उन तक आपका संदेश पहुंच ही जाएगा। बस एक ही गड़बड़ है। आपका नाम वहां नहीं है।

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  13. ये डोमेस्टिक वोएलेंस किसी एक समाज की नहीं पूरी दुनिया की समस्या है.कोई तबका कोई देश इससे अछूता नहीं.और इसके लिए कर्ता ही नहीं भोगी और दर्शक भी पूरी तरह जिम्मेदार है.घंटी बजाने से शायद उस समय बात टल जाये. वैसे यहाँ तो घंटी बजाई उस समय तो अपना भी सर फूट सकता है.
    जागरूक करती सार्थक पोस्ट.

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  14. @राजेश उत्साही जी बीच में व्यवधान आ रहा है...बस और कुछ नहीं...और मुझे नाम से कोई मतलब नहीं ..सन्देश जहाँ तक पहुंचे,अच्छा है.

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  15. बहुत चिंतनीय पोस्ट है रश्मि जी ! लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियाँ भी पैदा हो जाती हैं कि सदाशयता के साथ निष्पक्ष रूप से और केवल सहायता करने की शुभेच्छा से हस्तक्षेप करने वालों को भी कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है और सारे फसाद की जड़ उन्हें ही घोषित कर दिया जाता है ! जब अपने आस पास ऐसी घटनाओं का आवर्तन प्रत्यावर्तन बार बार देखनेको मिलता है तो लोग दूर से ही हाथ जोड़ लेते हैं ! वैसे एक ज़िम्मेदार नागारिक होने के नाते इस इस की हिंसा की शिकार स्त्रियों को बचाना और उनकी सहायता करना हमारा प्रथम और सर्वोपरि कर्तव्य होना चाहिए और मैं व्यक्तिगत रूप से इस बात से पूर्णत: सहमत हूँ ! इतनी विचारणीय पोस्ट के लिये आपका आभार !

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  16. रश्मि जी , यदि पत्नी सुशिक्षित होकर स्वावलंबी हो , यानि अपने पैरों पर खड़े होने लायक हो तो किसी पति की हिम्मत नहीं कि वो ऐसा कर सके । पति अक्सर पत्नी की कमजोरी का फायदा उठते हैं । यदि पत्नियाँ डरना छोड़ दें , तो घंटी बजाने की नौबत ही न आए ।

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  17. बहुत गम्भीर मसला है ये रश्मि.
    पुराने ज़माने में जब महिलाएं पुरुषों पर आश्रित होती थीं, पत्नी के दर्ज़े से इतर, उन्होंने महिलाओं को भोग्या और आश्रिता ही माना, तभी तो पत्नी के साथ मार-पीट जैसा जघन्य कृत्य वे कर सके. मुझे लगता है कि आज भी अधिसंख्य वे महिलाएं, जो आर्थिक रूप से स्वतन्त्र नही हैं, ऐसी प्रताड़नाओं की ज़्यादा शिकार हैं. और जो आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर हैं, वे मानसिक और कई जगह शारीरिक प्रताड़ना भी बर्दाश्त कर रही हैं. मेरी एक परिचिता हैं, जो उच्च पदाधिकारी हैं, उनके पति भी लगभग उसी स्तर के अधिकारी हैं, लेकिन तब भी पत्नी को जलील करते रहते हैं. उसे
    अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते.
    अच्छी मुहिम है ring the bell, लेकिन शायद महानगरों में ज़्यादा सफ़ल हो, जहां फ़्लैट्स होते हैं, मल्टी में लोग रहते हैं.एक दूसरे के घरों की आवाज़ें सुन सकते हैं. छोटे शहरों में individual houses होते हैं, वहां झगड़ा हुआ, ये अगले दिन पता चलता है.
    सार्थक पोस्ट के लिये बधाई.

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  18. रश्मि जी शरद कोकास जी ने इशारों में ही बहुत कहा है। मैं उसमें यह भी जोड़ना चाहता हूं कि क्‍या केवल शारीरिक प्रताड़ना ही प्रताड़ना है। गालियां देना,अपशब्‍द बोलना या मानसिक रूप से प्रताडि़त करना भी तो एक तरीका है। उससे भी लड़ने की जरूरत है
    । वह कौन करेगा। सबसे पहले तो आप और हम को ही यह कौल उठाना होगा कि हमने न तो ऐसा कुछ किया है और न करेंगे। और जहां तक संभव होगा औरों को भी नहीं करने देंगे।
    जहां मैं समझता हूं कम से कम मैं तो इसे निभाने में अब तक सफल रहा हूं। शायद इसीलिए औरों के मामले में बोलने या दखल देने की हिम्‍मत जुटा पाता हूं।

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  19. @ दराल साहब
    मैं एक ऐसी महिला को जानता हूं, करीबी रिश्तेदार हैं, खुद डॉक्टर हैं, पति भी। घरेलु हिंसा से त्रस्त होकर २० नींद की गोलियां खा लीं।

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  20. रश्मिजी
    बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे पर बहुत ही संतुलित पोस्ट लिखी है |उपाय भी अच्छा है |
    अगर ऐसे ही लोग जागरूकता अपनाये और ऐसे समय किसी न किसी रूप में दोनों का ध्यान बटाने का प्रयत्न करे तो बहुत हद तक गुस्सा काबू किया जा सकता है पतिदेव का और इस घरेलू हिंसा से बच्या जा सकता है महिला को |

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  21. @ उत्साही जी
    कुछ और जोड़ना चाहूंगा
    घरेलू हिंसा क्या हिंसा नहीं है? क्या घरेलू हिंसा मारपीट या गाली गलौज भर है? शिक्षा के वंचित कर देना, इच्छा के विरूद्ध किसी के साथ विवाह कर देना, नौकरी से त्यागपत्र दिलवा देना, उसकी आय को हथिया लेना, मानसिक तौर पर प्रताड़ित करना – क्या घरेलू हिंसा नहीं है? किसी भी परिस्थिति में स्त्री के आत्मसम्मान तथा अभिव्यक्ति का गलाघोंटना तथा उसके व्यक्तित्व विकास में बाधा पहुंचाना भी घरेलू हिंसा की श्रेणी में आता है।

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  22. रश्मि जी,

    पोस्ट में मुद्दा बहुत सही ढंग से और अच्छे नज़रिए से उठाया गया है। रिंग द बेल वाली मुहिम के बारे में मैंने भी पढ़ा था। कई बार ऐड भी देखा है टीवी पर लेकिन यह रिंग द बेल मुहिम फ्लैट आदि में बेहतर काम करेगा ऐसा मुझे लगता है।

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  23. मनोज जी आपकी बात से सहमति है। लेकिन फिर वही होता है,जब आप विषय को इतना विस्‍तार दे देते हैं कि वह समस्‍या आपकी भर नहीं रह जाती,दुनिया की हो जाती है। हम उस पर गाल बजाकर या यूं कहूं कि यहां ब्‍लाग बजाकर फिर अपने काम में लग जाते हैं। किसी भी काम की शुरूआत अपने से हीं करें न। जिस तरफ आपने इशारा किया है सबको उसके संदर्भ में अपना आत्‍मावलोकन पहले करना चाहिए।

    और रश्मि जी ने पति पत्‍नी के बीच की हिंसा की बात की है। अगर पति पत्‍नी इस मामले पर एक समझदारी भरा रवैया अपनाएं तो उसका प्रभाव तो घर के बच्‍चों पर सकारात्‍मक रूप से ही पड़ेगा ही न।
    इसलिए मै यहां कहता हूं कि किसी और के घर की घंटी बजाने के पहले यह देख लें कि कहीं आपके घर में घंटी तो नहीं बज रही है। अगर हां तो सबसे पहले उस पर ध्‍यान दीजिए,तुरंत।

    September 29, 2010 11:07 AM

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  24. राजेश जी, पीड़ित तो पत्नी है न? फिर उसी से कैसी समझदारी की अपेक्षा कर रहे हैं आप? समझदारी तो पति को दिखानी है न? जो पिट रही है, गाली खा रही है, वही समझदारी दिखाये?? मौका है उसके पास?? ज़रा इस समझदारी पर कुछ और प्रकाश डालें.

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  25. रश्मि दी आज आपने सही में बहुत सही बात कही है..हाल का ही एक किस्सा है, नाम नहीं लूँगा लेकिन वहां मैंने देखा है की जब तीसरा आदमी कोई बीच में आ जाता है तो मामला सही मायने में थोड़ा ठंडा हो जाता है....वहां ये रिंग द बेल वाली बात बिलकुल फिट बैठ रही थी.

    बहुत ही बढ़िया रही ये पोस्ट..शायद लोगों को ये तरीका अपनाना ही परेगा, उसके बाद ही मालुम हो की ये कितनी सफल रहेगी.. लेकिन एक बात तो पक्की है की ये एक अच्छा प्रयास है.

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  26. वंदना जी माफ करें। ताली एक हाथ से नहीं बजती। आप भी किसी की पत्‍नी होंगी और मैं भी किसी का पति हूं। इन बातों को आप समझती हैं।

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  27. मैं यही जानना चाह रही हूं, कि यदि किसी महिला के साथ ऐसे हालात हों, जब उसका पति पिटाई कर रहा हो, तब उसे किस प्रकार की समझदारी दिखानी चाहिये?

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  28. यह सिर्फ घर का मामला नहीं.इंसानियत का मामला है. और हस्तक्षेप किया जा सकता है इसलिए हिचकिचाइए मत एंड Please ring the Bell.
    बहुत सही !!

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  29. रशिमा जी अगर आप के पडोस मै कोई ऎसा करे तो आप क्या करेगी? ओर अगर आप के बीच वचाब करने से बात तलाक तक पहुंच जाये तो..... इस ममाले मै कुछ मामलो को छोड कर( शराबी जुयारियो को) बाकी मामलो मै दोनो ही जिम्मेदार होते है, बाकी अगर मै आप को ऎसी बीबियो से मिलबाऊ जो पति को खुब पीटती है, उन्हे सरेआम बेइज्जत करती है तो उन के बारे क्या लिखेगी, वेसे यह किस्सा भारत का ही नही पुरी दुनिया का हे, ओर जब कोई बीच बचाव करने आता है तो सब से पहले पीटने वाली बीबी या पति ही शेर बन कर लडने आता हे कि हमारे घर के मामले मै तुम्हे क्या, तुम कोन होते हो बोलने वाले तो हम जेसे लोग जो बचाव करने जाते है बेशर्मो की तरह से लोट आते है, ओर दुसरे दिन यही पति पत्नी हाथो मै हाथ डाले घुमने जाते है,इस लिये हम मस्त रहते है

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  30. वंदना जी आपके सवाल का जवाब विद्वान लोग देंगे ही। पर मुझे लगता है आप खुद एक विचारवान महिला है। पुरुष की कमजोरियां आप समझती हैं। आप ही यह बेहतर सलाह दे सकती हैं कि ऐसी स्‍त्री क्‍या करे। मैं तो यह कह रहा हूं मार पिटाई की नौबत तक ही बात क्‍यों पहुंचे।

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  31. औरतों पर हाथ उठाने वालों पर मुझे बहुत तेज गुस्सा आता है -कुछेक बार तो मैंने ही उन पर हाथ चला दिया है ......और बहुत धमकाया और शर्मिंदा किया है ..उसके बाद लगता रहा कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था -मगर एक हिंस्र हो चुके व्यक्ति को आसानी से मना पाना कई बार संभव नहीं हो पाता

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  32. निश्चित ही त्वरित निदान एवं डिफ्यूजन के लिए ’रिंग द बैल’ का कॉन्सेप्ट कारगर है. मगर कितनी जगह और कब कब जागरुक लोग हो सकते हैं. यह विषय मानसिकता में बदलाव का है. महिलाओं को सम्मान और बराबरी का दर्जा देने का है जिसे बचपन से बच्चों की नींव में डालना होगा वरना अपने बाप को करता देख वो इसे अपना अधिकार मान बैठता है और सिलसिला है कि रुकता नहीं. बहुत अच्छा विमर्श लिया है.

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  33. हिंसा कैसी भी हो गलत है।आपसी समझदारी और सूझबूझ ही जीवन है।कई बार तीसरे की बात जल्दी समझ में आती है, प्रयास किया जाना जरूरी है। आत्मावलोकन किसी भी विषय की नींव डालने के पहले किया जाना चाहिए। विषय सिर्फ़ स्त्री,पुरूष या बच्चे तक ही सीमित नहीं है और भी जहाँ है इसके आगे.रही घर की बात तो जब रिश्तेदार,मित्र,पडोसी,समाज "अपनों"मे शामिल होगा तो अपने घर की बात होगी।कमेंट बड़ा हो रहा है पर एक बात याद आ रही है -पिताजी वकील थे तो बचपन से कई केस देखने मिलते थे।तलाक की नौबत तक पहूँचे मामलों में पिताजी हमेशा वकील पत्र भर कर ५-७ दिन किसी न किसी बहाने से दाखिल करने से पहले टाल देते थे,और खुद देखा है लोगों के बीच सुलह होते हुए,यहाँ तक की एक पक्ष (स्त्री-पुरूष)के रहने खाने का इंतजाम भी हमारे घर पर किया जाता और कुछ दिनों में वे अपने घर चले जाते।(मुझे भी शौक है बीच में पडने का)मामला सुलझना जरूरी है "रिंग द बेल"(व्यापक अर्थ में)..

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  34. घरेलू हिंसा को बिना पक्षकार बने रोक पाने / एंगर को डिफ्यूज करने का बेहद कारगर तरीका है ! जिन लोगों नें भी 'रिंग द बेल' मुहिम छेडी ! वे धन्यवाद के पात्र हैं और आप भी जो इसमें शामिल हो इसे आगे बढाने की कोशिश कर रही हैं !

    वर्तिका नंदा की कविता में न्यूनतम से अधिकतम आर्थिक उपलब्धियों की रेंज वाले सारे पुरुषों को गैर इंसान बता डाला गया है ! उनका मंतव्य सही है पर इसे पूर्ण सत्य की तरह से हजम कर पाना मुश्किल है ! उनकी कविता उन मर्दों को भी जानवर कह डालती है जो घरेलू हिंसा से कोसों दूर हैं ! लैंगिक भेदभाव सा करती कविता...गोया स्त्रियां ही स्त्रियों के दुःख हरती हों / सुध लेती हों ! चूंकि इस कविता को आपने कोट किया है इसलिए इसे मात्र इस आशय के साथ स्वीकार कर पा रहे हैं कि सभी आर्थिक वर्गों में से कुछ या बहुतेरे मर्द , स्त्रियों के साथ जो व्यवहार करते हैं उसे पशुवत माना जायेगा ! यकीनन ऐसे लोग पशु ही हैं ! कहने का उद्देश्य ये कि हिंसा का सरलीकृत आरोपण उचित नहीं है !

    अब बात पर मुद्दे की ! समस्या है तो सही और बेहद गंभीर भी...पर मुहिम इससे सामायिक रिलीफ ही दे पायेगी ! ये उपाय पेन किलर जैसा है जिसे स्थाई इलाज वाली दवाओं की ईजाद तक दिल से स्वीकार किया जाना चाहिए !

    समस्या के स्थायी निदान के लिए स्त्रियों का आर्थिक सबलीकरण ज़रुरी लगता है ! अन्यथा पुरुषों का दंभ 'आश्रितता' को 'सम्पति' की तरह से ट्रीट करता ही रहेगा ! पड़ोसियों का इन्वाल्वमेंट एक कारगर पहल है और यह मिथ टूटना ही चाहिए कि 'ये तो उसके घर की बात है' ! एक बात जो बेहद ज़रुरी है उसे केवल स्त्रियाँ ही कर सकती हैं ...उन्हें पति के परमेश्वरत्व से मुक्ति पानी होगी !
    जब कुदरत नें जोड़े बराबरी से बनाये हैं तो इनमें से कोई एक परमेश्वर क्यों हुआ ! एक दु:खद पक्ष ये है कि देवी लक्ष्मी शेषशायी भगवान के चरणों की ओर चित्रित होकर पति के परमेश्वरत्व को धर्मसम्मत स्थायीकरण प्रदान कर देती हैं और फिर मर्द अपनी मनमर्जी से इस परमेश्वरत्व की व्याख्या करने लग जाते हैं ! मुझे कहना ये है कि धर्म को जोड़ों की दरम्यानी 'खाई' को गहराने वाले प्रसंग विशेष में त्याग दिया जाना चाहिए ! पता नहीं कितने लोग सहमत होंगे इससे ?... पर मेरी व्यक्तिगत सम्मति ये है कि 'जोड़े' सहअस्तित्व और सहसम्मान की बुनियाद पर खड़े हों तो बेहतर हैं ! 'स्वामित्व' वाली बुनियाद समस्या को कभी सुलझनें नहीं देगी !

    यूं समझिये कि मैं धर्मप्रेरित मानसिक दासता की 'डोज' से असहमत हूं ! 'उसके घर वाली' बात जैसी सामजिक धारणा से असहमत हूं ! ...और स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता , इस समस्या के निदान का मार्ग प्रशस्त कर सकती है , ऐसा सोचता हूं !

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  35. बिलकुल रिंग बजानी चाहिए ...और मैं बजा भी देती हूँ यदि आसपास कुछ ऐसा दिखता है ...हिंसा व मारपीट
    की पक्ष्दर ना मैं कभी थी , ना रहूंगी ....हर समस्या का समाधान बातचीत से निकाला जाना चाहिए ..
    लेकिन ...
    कई बार रिंग बजाने के बाद स्थिति ऐसी होती है कि समझ नहीं आता कि किसको सही और किसको गलत माने ...अब यदि किसी बेटे के सामने उसकी मां को बुढिया , कमीनी, जैसी उपाधियाँ दी जाए और कई बार समझाने के बाद भी कोई ना समझे तो मैं उस बेटे से संयत व्यवहार की उम्मीद कैसे करूँ ...

    स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्र की पक्षधर भी हूँ मैं ...मगर यह स्वतन्त्रता महज अपने परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों से भागने के लिए ली जाये तो ऐसा नहीं होना चाहिए ...!

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  36. उस वक़्त अचानक कहीं जाना पड़ गया तो टिप्पणी को अधूरा ही प्रकाशित करना पड़ा जबकि इस विषय में एक बात यह भी कहना शेष थी कि धर्मसम्मत आचरण के विषय में मैंने जो मिसाल दे दी है उससे यह अर्थ ना निकाला जाये कि मैं धर्म विशेष के स्त्री पुरुषों के संबंधों पर बात कह रहा हूं ! मेरे हिसाब से सारे धर्मों की परम्पराओं का पालन कर जोड़े बनाने के बाद भी समस्या यथावत है ! सवाल ये है कि धर्म ना होते तो क्या जोड़े नहीं बनते ?

    बस...मेरे कहने का मकसद भी यही है कि कुदरत नें जोड़े बनने की अनिवार्यता दी ज़रूर है पर उसनें परमेश्वरत्व नहीं थोपा ! परमेश्वरत्व और स्वामित्व हम इंसानों की दिमागी उपज है / खलल है सो इसे हमें ही त्यागना होगा !

    बहरहाल आपनें एक अच्छी मुहिम में हाथ डाला ! एक विचारणीय मुद्दा सामनें रखा ! एक अच्छी पोस्ट लिखी ! अपनी बात साफ साफ कही ! इसके लिये आपका धन्यवाद !

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  37. बड़ा ही विचारपूर्ण और सामयिक विषय उठाया है, सच है, इन्सानियत सबके बस की बात नहीं है।

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  38. बहुत अच्छी प्रस्तुति। भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है!
    मध्यकालीन भारत धार्मिक सहनशीलता का काल, मनोज कुमार,द्वारा राजभाषा पर पधारें

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  39. अब तक तो काफी कुछ कहा जा चुका है ...सारे पक्ष भी रखे जा चुके हैं ...बहुत अच्छी बातें सामने आई हैं ...

    खैर मैं तुम्हारे लेख कि बात करूँ ....बहुत सटीक मुद्दा उठाया है ..जहाँ हम कुछ नहीं कर सकते तो इतना तो अवश्य कर सकते हैं कि घंटी बजा कर स्थिति को बदला जा सके ...क्यों कि उस माहौल में कोई समझने की स्थिति में नहीं होता ...
    वर्तिका नंदा की लिखी पंक्तियाँ नारी की दुर्दशा को बता रही हैं ..चाहे पढ़ी लिखी हो या अनपढ़ सब एक सी ही परिस्थिति से गुज़रती हैं ...
    यह भी सही है कि यह ज़रूरी नहीं कि शारीरिक प्रताडना ही मिले ..जहाँ मानसिक प्रताडना मिलती है वहाँ तो किसी को पता भी नहीं चलता ..फिर घंटी कैसे बजेगी ?

    विचारणीय लेख

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  40. बहुत गम्भीर मसला है। शरद कोकास जी ने सही कहा है।ापने उस मुहिम को आगे बढाया है इसके लिये आप बधाई की पात्र हैं। मैं तो बेल ही नही बजाती उस आदमी को फटकारती भी हूँ चाहे अंजाम कुछ हो। धन्यवाद।

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  41. जैसे-जैसे सत्ता की लडाई बढ़ रही है वैसे-वैसे हर ओर हिंसा बढ़ रही है्, फिर वह घरेलू हिंसा ही क्‍यों ना हो। सत्ता को केन्द्रित रखने की चाह और अपने आनन्‍द खोने का डर ही हिंसा को जन्‍म देता है। कमजोर व्‍यक्ति हिंसा का सहारा लेता है, उसे लगता है कहीं मेरा प्रतिदिन का आनन्‍द छिन ना जाए इसलिए मारपीट करके अपना पुरुषार्थ दिखाता है। यही कारण है कि आज शिक्षित और सभ्‍य समाज में भी हिंसा ने पैर पसारे हैं। इसके लिए पुरुष को संस्‍कारित करने की आवश्‍यकता है साथ ही उसके मन से यह भय निकालने की भी कि महिला उससे ज्‍यादा समझदार है। यही भय उसे हमेशा डराता रहता है, क्‍योंकि पुरुष का मुख्‍य कार्य भोग ही है। वह कैसे भी महिला को अपने चंगुल में रखना चाहता है। यदि इस दुनिया की प्रत्‍येक माँ यह सोच ले कि मुझे संस्‍कारी एवं आत्‍म सम्‍मानी संतान बनानी है तो इस समस्‍या पर कुछ हद तक रोक लग सकती है।

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  42. आज के वक्त मे औरत को खुद पहल करनी होगी तभी उसकी स्थिति मे सुधार आ सकता है बाकी समाज के हस्तक्षेप से भी कोई खास फ़र्क नही आने वाला जब तक औरत खुद इस बात को ना समझे और अपनी आने वाली पीढी मे भी संस्कार ना डाले …………………एक कदम अगर औरत आगे बढायेगी तो सारे जहाँ का साथ अपने आप मिलता चला जायेगा बस अपनी सोच को बदलना होगा।

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  43. रश्मि जी ,
    बहुत अच्छा और सार्थक लेख है ,"ring the bell " kaa concept बहुत सही भी है और कारगर भी मैं अधिक्तर बातों से सहमत हूं आप की ,
    मेरा मानना है कि घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं का प्रतिशत अवश्य बहुत ज़्यादा है लेकिन पुरुष भी अछूते नहीं ये हिंसा या प्रताड़ना केवल शारीरिक नहीं शरीर के घाव तो भर जाते हैं ,अधिक गहरे और कभी न भरने वाले घाव होते हैं मानसिक
    आज की नारी सब कुछ करके भी हिंसा की शिकार हो रही है ,और इस के लिये ज़िम्मेदार है अशिक्षा ,बराबरी के स्तर पर आ गई पत्नी के कारण हीन भावना और हम महिलाएं स्वयं ,इन से किसी हद तक निबटने के लिये आवश्यकता है जागृति की ,शिक्षा की ,हिम्मत की और एकता की

    परंतु दूसरी ओर एक वर्ग पुरुषों का भी ऐसा है जो अपने घर की शांति बनाए रखने के लिये मानसिक प्रताड़नाएं सहन कर रहा जिन की पत्नियां अपने पती के बॉस के सामने या उन के आधीन कार्य करने वालों के सामने उन से हिक़ारत से बात करती हैं मज़ाक़ बनाती हैं ,बार बार ये एह्सास दिलाती रहती हैं कि तुम से शादी कर के मेरे भाग्य फूट गए आदि आदि
    महिला-पुरुष समाज के वो आधार हैं जिन के बिना समाज बन ही नहीं सकता था ,दोनों यदि अहंकार छोड़कर एक दूसरे की अहमियत को ,विचारों को और भावनाओं को समझें तो ऐसी कोई नौबत ही न आए ,इस की ज़िम्मेदारी किसी एक की नहीं बल्कि साझा ज़िम्मेदारी है कि हम इन चीज़ों में सुधार लाने की कोशिश करते रहें ,एक दूसरे को समझें और जहां ग़लत हो रहा हो उसे समझाएं चाहे उस के लिये हमें भी सहना पड़े कुछ पाने के लिये कुछ तो खोना ही पड़ता है अगर इस से दो चार लोग भी बच सकें तो हम सफल होंगे.

    एक सार्थक लेख और महत्वपूर्ण टिप्पड़ियां पढ़वाने के लिये धन्यवाद रश्मि

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  44. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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  45. @शरद जी,
    पहला पत्थर (पहला प्रयास ' कॉल बेल बजाने का ) वही भी मारे जिसने ये पाप किया हो ...और फिर शपथ ले ले कि अब ये पाप कभी नहीं करेगा .

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  46. @अमरेन्द्र जी
    'उड़ान ' फिल्म में ही क्यूँ अक्सर माँ,अपने बेटे को पिता का अपमान करने से रोकती है और डाँटती भी है क्यूंकि वह पिता और बेटे का रिश्ता खराब नहीं करना चाहती. बेटे के मन में पिता के लिए सम्मान और पिता के मन में बेटे के लिए प्यार देखना चाहती है...चाहे बेटा उसका पक्ष ही क्यूँ ना ले रहा हो.

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  47. पूर्णतः सहमत. टेंशन को diffuse तो किया ही जाना चाहिए.

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  48. पूर्णतः सहमत. टेंशन को diffuse तो किया ही जाना चाहिए.

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  49. @मनोज जी,
    आपने कई सारी बातें बड़े विस्तार से कहीं..पर वही बात है...नियम-कानून कितने भी बना लिए जाएँ, और उनकी जानकारी भी हो पर स्त्री उसका सहारा कैसे ले सकती हैं?? क्यूंकि उसका अपना कोई घर नहीं होता और उसे बच्चों की भी फ़िक्र होती है.

    औरत को अपनी ताकत बखूबी पता होती है पर बच्चों का प्यार और जिम्मेवारियां उसके पैरं की बेड़ियाँ बन जाती और उसकी ताकत कमजोर कर देती हैं.

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  50. रश्मि,

    तुम्हारा लिखना बिल्कुल सही है, ये एक मानसिक स्थिति होती है और पुरुषों का अहंकार भी, इसको टाला जा सकता है लेकिन क्या कहीं का भी गुस्सा सहने के लिए पत्नी ही बनी है. सारे वाकये सही हैं. कई बार तो ऐसा भी होता है कि पति खुद मनोरोगी होता है और पत्नी को डॉक्टर या काउंसलर के पास लेकर पहुँच जाता है. ये घर की बात जब तक पत्नी घर में ही सहती रहेगी वो इसका शिकार रहेगी. वो किसी की जायदाद नहीं है. हाँ अगर वह पति से मिलने वाले पैसे और ऐशो आराम को ही सब कुछ समझती है तो ये उसकी नियति है. उस सुख और आराम की कीमत है. इसके आगे भी बहुत कुछ होता है , पति की जायदाद बन कर उसको पति के द्वारापरोसा भी जाता है और वह उसको भी सहन करती है.

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  51. @राजेश जी
    आपने कहा, ताली एक हाथ से नहीं बजती...यानि की स्त्री ऐसा कुछ करती है कि मजबूर होकर पति को हाथ उठना पड़ता है??
    यह तो सही नहीं लगता...आखिर उसे सजा देने का अधिकार किसने दिया? वाद-विवाद,असहमतियां...वैमनस्य हो सकता है. हो सकता है स्त्री की ही गलती हो..फिर भी कई तरीके हैं असहमति जताने के.

    आपने यह भी कहा है...मार-पिटाई तक नौबत ही क्यूँ पहुंचे?..यह सब क्षणिक आवेग में होता है..जिसपर पुरुषों को नियंत्रण रखना है...ऐसा नहीं होता कि बहस- मुसाहिबें चलते हैं और फिर उसकी परिणति....हिंसा में होती है.

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  52. रश्मि दी,
    आपने बहुत गंभीर समस्या के विषय में बहस छेड़ी है. सच तो यही है कि निम्नवर्ग की महिलाओं से कहीं अधिक पढ़ी-लिखी उच्चवर्गीय महिलायें घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं. क्योंकि एक तो वो पुरुष अहं को अधिक चोट पहुंचाती हैं दूसरे, उन्हें अपनी और अपने घर की इज्जत की सबसे अधिक चिंता होती है, इसलिए जब बात हद से ज्यादा बढ़ जाती है तभी शिकायत करती हैं नहीं तो उसे दबाने की कोशिश करती हैं.
    मेरे विचार से औरतों को खुद चाहिए कि वो पति के पहली बार हाथ उठाने पर ही उसका विरोध करें और उससे स्पष्ट कह दें कि ये सब उन्हें सहन नहीं होगा. मैं अपनी एक करीबी डॉक्टर मित्र की बात बताती हूँ कि उसने जब अपने पति को तलाक की धमकी दी, तब पति ने मारपीट कम कर दी.
    'रिंग द बेल' की बात बहुत से मामलों में मदद करती है, पर मानसिक प्रताड़ना आदि के मामलों में उतनी सहायक नहीं है.
    लेकिन फिर भी जहाँ तक संभव हो सभी को रिंग द बेल के तरीके को अपनानी चाहिए क्योंकि मारपीट और मानसिक प्रताड़ना किसी का भी व्यक्तिगत मामला नहीं हो सकता.

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  53. अली जी की ये बात भी सही है कि महिलाओं को पति के परमेशरत्व से मुक्ति पानी होगी और रिश्तों को बराबरी की दृष्टि से देखना चाहिए.

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  54. @राज भाटिया जी,
    यह पूछकर कि आप ऐसे में क्या करतीं?..आपने एक बड़ी भूली बिसरी बात याद दिला दी. सहेली वाली घटना हाल की थी इसलिए याद रही. अपना तो भूल ही गयी थी.

    करीब १५,१६, साल पहले की बात है.मैं दिल्ली में थी.उन दिनों वहाँ, सेफ्टी डोर तार की जाली के होते थे. और मैं और मेरे सामने वाली पड़ोसन लकड़ी का दरवाजा सिर्फ रात में सोते समय बंद करते. मैं अपने एक साल के बेटे को लेकर घर के बाहर कॉरिडोर में खड़ी उसे बहला रही थी.अचानक उस फ़्लैट से भागा-दौड़ी..की अजीब सी आवाजें आने लगीं. मैं तो इतनी घबरा गयी कि बेल बजाने की भी सुध नहीं रही..और मैने उनका वो डोर ही पीट डाला. वो भागती हुई आयीं और दरवाजा खोल दिया..कुछ बोला होगा..ध्यान नहीं. मैने तुरंत उन्हें बाहर लिया और उनके घर का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया. (अब सोचती हूँ ऐसा कैसे कर पायी...पर उस समय आप अपने instinct पर काम करते हैं.सोचते नहीं और अगर सोचने बैठेंगे तो फिर कभी नहीं कर पाएंगे ) लेकिन मैं वही खड़ी रही. पतिदेव दरवाजे के पास आए और मैं बोलती रही.."प्लीज़ शांत हो जाइए...".जब वे वापस जाकर अपने सोफे पर बैठ गए तब मैं अपने बेटे को उन पड़ोसन को थमा...अपने फ़्लैट में भेज, उनके पास गयी...उन्हें पानी दिया...वे पत्नी की शिकायतें करते रहें...और मैं बस इतना कहती रहीं.."हाँ समझती हूँ..पर आप शांत हो जाइये" शाम का वक़्त था कई फ़्लैट के दरवाजे खुले हुए थे. आवाजें सुन दूसरे पड़ोसी भी आ गए. फिर मैं अपने फ़्लैट में लौटी...वो देर तक मेरे पास बैठी रहीं. जब उनके बच्चे खेल कर लौटे तब वे अपने फ़्लैट में वापस गयीं.
    ऐसा नहीं कि बाद में सब कुछ सही हो गया होगा. लेकिन पति के मन में एक डर तो होगा कि लोग सुन लेंगे...और पत्नी को भी लगा होगा कि मेरा साथ देनेवाले हैं. दो साल मैं वहाँ रही.उस तरह की घटना फिर दुबारा नहीं देखी.

    और आपका कहना सही है, कुछ पत्नियां भी अत्याचार करती हैं. उसकी भी भर्त्सना करनी चाहिए.पर उनका प्रतिशत बहुत कम है,राज जी

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  55. @ अली जी,
    वर्तिका नंदा की कविता से ऐसा ध्वनित होता है कि समाज के सारे पुरुषों के लिए कहा जा रहा है...परन्तु अक्सर कविता,कहानियों , आलेखों में बहुमत की ही बात की जाती है. सारे पुरुष तो खैर हरगिज़ ऐसे नहीं हैं. पर नारी का दुख-दर्द समझने वाले संवेदनशील पुरुषों की संख्या बहुत ही कम है. कई मामलों में देखा है, पिता और भाई भी ऐसी समस्याओं को अनदेखी कर देते हैं. जबकि माँ,बहने भले ही कुछ ना कर पायें पर मानसिक सहारा तो देती हैं. महानगरों में तो खासकर, कामवाली बइयां इमोशनल एंकर बन जाती हैं और जैसा कि कविता में वर्णित है, दोनों ही एक दूसरे की सुध लेती हैं

    आपकी धर्मप्रेरित मानसिकता की बात सही है. बचपन से ही लड़के लडकियाँ, विष्णु भगवान के पैरों के पास बैठी लक्ष्मी की तस्वीर देखते बड़े होते हैं. दूसरे धर्मो में भी पुरुष को श्रेष्ट बताया गया है.महिलायें पति को परमेश्वर मानती हैं. परन्तु यूरोपियन देशों का क्या? घरेलू हिंसा वहाँ भी कम नहीं. वहाँ तो बचपन से ऐसी शिक्षा नहीं दी जाती.

    मुझे लगता है बस एंगर मैनेजमेंट ही इस समस्या का हल है. अगर अपने गुस्से पर नियंत्रण रखना सीख लें तो कितनी भी नाराजगी हो, ऐसी हरकत नहीं करेंगे. और औरतों की आर्थिक आत्मनिर्भरता तो निहायत जरूरी है ताकि बार बार अगर इसकी पुनरावृत्ति हो तो वे अलग हो सकें .

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  56. आपके विचार से सहमत हूँ ... ये घर का मामला नही है समाज भी इससे प्रभावित होता है और उस समाज में हम और हमारे बच्चे भी हैं जो प्रभावित हुवे बिना नही रह सकते .... आपका सुझाव भी अच्छा है ... इस प्रयास का ज़रूर फ़ायडा होगा मैसा ऐसा मानना है ...

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  57. वर्तिका नंदा जी की इन रचना ने बहुत उद्वेलित किया है मन को ..... समाज में नारी की स्थिति आज भी ऐसी है ... नारी के मन की संवेदनाओं को समझना नारी मन के लिए ज़्यादा आसान होता है ....

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  58. @ रश्मि जी
    आपसे सहमत नहीं हूं
    (१) "घर नहीं होता अपना"
    और वो क्या घर है जिसमें हिंसा (किसी भी रूप में) हो।
    (२) ताकतवर भी हैं और कमज़ोर भी
    इसी से तो उबरना है। फिर हम क्या बेल और किसके लिए बजाएंगे। वो सामने नहीं करेगा घर में करेगा। छुपके।
    फिर तो एक इंडिविजुअल के विवेक पर सारी बात टिक जाए।
    और एक इंडिविजुअल के तौर पर तो मेरी तरफ़ से "उन्हें" इतनी छूट है कि वो ऐसी परिस्थिति में मुझे ही घर से बाहर कर दें।
    अगर मैं एक सुनाऊं तो वो पूरा चालीसा सुनाकर ही दम लें। इतना बल मैंने उन्हें प्रदान किया है।

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  59. @मनोज जी,
    अपने कहा
    रश्मि जी,
    आपसे सहमत नहीं हूं
    (१) "घर नहीं होता अपना"
    और वो क्या घर है जिसमें हिंसा (किसी भी रूप में) हो।


    अब सच तो सच है, ना. व्यवहारिक रूप तो यही है.
    अगर पति द्वारा हाथ उठाने का विरोध कर वो घर छोड़कर निकल जाए, तो जाए कहाँ? क्यूंकि अधिकाँश मामलों में माता-पिता बेटी को चुपचाप सब कुछ सहने की शिक्षा देते हैं. और वो अकेली निकल भी जाए क्यूंकि दो रोटी और सर पे छत का इंतजाम ,मजदूर और शिक्षित, हर स्त्री कर सकती है .पर बच्चों को लेकर कहाँ जाए? और उन्हें पीछे, किसके भरोसे छोड़ जाए ?

    और बेल इसलिए बजाने की अपील है कि जहाँ तक हो सके शारीरिक प्रताड़ना रोकी जा सके. यह सिर्फ घर के अंदर की बात ना रहें. और पुरुष भी आखिर हैं तो मनुष्य और एक सामजिक प्राणी ही,ना . आस-पड़ोस, संगी- साथी ,सहकर्मियों में यह बात पता चल जाए और वे हस्तक्षेप करने में संकोच ना करें तो 'घरेलू हिंसा ' की यह आदत ख़त्म तो होनी चाहिए ( ऐसा मुझे लगता है )

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  60. इस पोस्ट में उठाए गए विषय को , रिंग द बेल ..मूवमेंट को ..आपके मत को और उस पर सभी पाठकों के मत को जाना .,....इतने सारे विचारों के आदान प्रदान से ये तो साबित हो ही गया कि ..पोस्ट सार्थक बन पडी है ।

    जहां तक मुद्दे की बात है ..तो आपने जो भी रास्ता सुझाया है ..उसका सीधा सीधा अर्थ मैं समझा वो ये कि , ....उस समय उठे तात्कालिक क्रोध से उठे विवाद या झगडे को ....टाल कर दूसरी किसी दिशा में मोड दिया जाए ..ताकि वो आवेग धीरे हो जाए और शायद कम होकर खत्म हो जाए , न भी खत्म हो तो उसका प्रभाव कम तो हो ही जाएगा . हालांकि समस्या की प्रतिशतता को देखते हुए ऐसा हल कितना कारगर होगा ..इसमें संशय जरूर है ..मगर ये सोच कर प्रयास नहीं किया जाना भी गलत होगा ।

    यहां एक बात से जरूर मैं असहमत हूं कि ..आपके रुझान के अनुसार ...शायद उन महिलाओं का प्रतिशत जो कुछ ....ही नकारात्मक भूमिका में होती हैं ....इतना नहीं है कि उसे एक मुद्दा माना जाए । यकीन जानिए ,अपने एक दशक से ज्यादा के अदालती अनुभव के अनुसार ....मुद्दा इतना भी गौण नहीं है ..गवाह हैं तलाक , दहेज प्रताडना और बलात्कार तक के सैकडों लंबित और फ़ैसले हो चुके मुकदमें ...। बहरहाल आपने तरीके से एक मुद्दे को न सिर्फ़ रखा बल्कि एक सार्थक बहस को भी जन्म दे दिया ..यही असली ब्लॉगिंग है ..। शुक्रिया

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  61. रश्मि...
    बहुत ही ज़रूरी मुद्दा उठाया है तुमने...
    ये भी सच है की इस बात को बहुत कम तवज्जो दी जाती है...लेकिन घरेलू हिंसा पूरे विश्व के लिए एक समस्या है...
    किसी देश की आरती, सामाजिक समस्याएं तो फिर भी बड़ी मीटिंग्स निपटा लेती हैं...लेकिन छोटे से घर की छोटी समस्याएं जब विकराल बन जाती हैं तो...समाज यही कहता है की ये उनका मामला है हम क्या कह सकते हैं...
    यहाँ ज़रा सा मामला अलग है...ऐसी दशा में यहाँ सरकार हस्तक्षेप करती है...और कोशिश करती है मामला सुलझे...लेकिन ऐसे हस्तक्षेप के अपने नुक्सान भी हैं...
    कोई भी सम्बन्ध थोड़ी adjustment तो मांगता ही है...लेकिन जब support मिलता है तो adjustment करने की कोशिश में कमी आ जाती है...परिणाम ...परिवार टूटता है...
    ऐसा ही कुछ हाल यहाँ है...
    बहुत ही अच्छी पोस्ट ...हमेशा की तरह...
    नाज़ है तुम पर..कसम से..!

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  62. रश्मि जी मैं इसे स्त्री व पुरुष कि लडाई ना मान कर एक व्यक्ति द्वारा किसी कमजोर पर अपनी खीज निकालने वाली घटना ज्यादा मानता हूँ. मैंने बहुत सी काम काजी महिलाओं को ऐसी ही खीज अपने बच्चों पर निकलते हुए देखा है. तो क्या आप ये कहेंगे कि महिलाएं अपने बच्चों से प्यार नहीं करती या वो अपने बच्चों का शोषण करती हैं.

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  63. itne gambhir mudde per ek bahut hi sarthak post aapne likhi Di,,,

    is baar der me aane se post ke saath saath sabki bahumulay tippniyan bhi padhi...kuch kahne ko bacha hi nahi...lekin gharelu hinsa rokane ka ye ek upay mujhe to ahccha laga
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    बच्चो के उत्साहवर्धन हेतु एक लघु प्रयास, कृपया आप अवश्य पधारे :
    मिलिए ब्लॉग सितारों से

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  64. देखिये मेरा यह मानना है कि ... जो कि काफी हद तक सही भी है.... वही पुरुष औरतों पर हाथ उठाते हैं.... या उनको दबाते हैं.... जो सेक्सुयली कमज़ोर होते हैं.... जो किसी भी औरत को (पत्नी) सैटिस्फाई करने का दम नहीं रखते हैं.... तो ऐसे लोग अपनी मर्दानगी उनको मार कर चिल्ला कर.... या फिर पीट कर.... दर्शाते हैं.... और यह बात एकदम सही है कि जो नामर्द होते हैं ........वही लोग औरतों पर हाथ उठाते हैं... यह फ्रस्ट्रेशन ही होता है जो औरतों पर अत्याचार के रूप में निकलता है....... ऐसे लोग मार पीट कर ही अपनी मर्दानगी दिखाते हैं....

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  65. बिल्कुल सही लिखा है, सार्थक और सामयिक आलेख, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम

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  66. क्या इस आलेख में सिर्फ़ हाथ उठाने को ही आपने घरेलु हिंसा की कैटेगरी में रखा है?
    मैंने अपना विचार तो कल ही दे दिया था।
    आलेख के लेखिका से निवेदन है कि इसे स्पष्ट करें। कुछ टिप्पणियां देखकर भ्रम सा होता है।

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  67. रश्मि जी ,
    सहमत हूँ ! पर जो वहाँ जो माँ की सोच है वही पिता की भी होनी चाहिए ! परिवार बना रहे / चलता रहे / मेंटीनेंस रहे , इसका सारा धक्का तो मातृपक्ष पर ही है और यह भी पितृपक्ष को छूट दे देता है , हिंसा की !

    मनोज जी ने सही मुद्दा उठाया है कि हिंसा वही नहीं जो भौतिक रूप में हो और जिसके लिए भौतिक कर्म ( घंटी बजाना ) के तौर पर हल हो ! ''आइडिया'' फॉर्म की हिंसा ज्यादा खतरनाक है ! भौतिक हिंसा उसका या उसी का मूर्तीकरण है !

    महफूज भाई ने भी एक मनोविश्लेषणात्मक 'एंगिल' देखा है , इसकी भी उपेक्षा नहीं की जा सकती !

    इस तरह एक नहीं बल्कि कई कारण दिखते हैं ! 'निदान की छटपटाहट' भी निदान की प्रक्रिया का हिस्सा बनेगी ! सुन्दर बहस ! आभार !

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  68. Great post and good discussion. Sorry for those who still can't see the reality. Women all over the world have been abused mentally, physically and sexually for centuries.

    I agree some men are also victims but it is a negligible number. In addition, men have many more options than women especially in developing countries like ours.

    Awareness and voice must be raised against domestic violence and thanks so much for bringing up this subject. I promise you, I will ring the bell.

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  69. मामला गंभीर है दी और पोस्ट भी... कोई शक नहीं कि ऐसे दुखद हादसे आयेदिन हमारे सामने होते हैं और हम बच निकलने में सफल होते हैं.. बच निकलने को ही अपनी नैतिक जिम्मेवारी समझते हैं.. बस थोड़ा सा गलत यही लग रहा है कि आवाज़ हर समय उठाने की जरूरत है.. तब भी जब पति अपनी पत्नी को पीट रहा हो और तब भी जब पत्नी अपने पति को पीट रही हो. फिर वही पुरानी बात कि मामला शोषक और शोषित का है ना कि पति पत्नी का.. इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि कई पत्नियां भी अपने पतियों की बुरी हालत करके रखती हैं.. खासकर जब उनके बच्चे माँ के वश में हो तब.. और ये सब अशिक्षित पति-पत्नियों के बीच ज्यादा होता है... कई उदाहरण देखे हैं मैंने भी.
    उद्योगपति और फिल्मस्टार वाले एक भी उदाहरन मेरी समझ में नहीं आये.. बेहतर होता उनके नाम आप लिखतीं दी.. ऐसे लोगों के नाम छुपने नहीं चाहिए... हाँ उस नालायक राहुल महाजन का वहशीपन जरूर पता है.. पर उसकी पहली बीवी भी खामोश रही और अब दूसरी भी ऐसी ही भीरु निकली..
    लड़ाई बचाने का तरीका बहुत ही पसंद आया.. :)

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  70. वैसे एक सच ये भी है कि ऐसे मुद्दों का हल निकालना बहुत ही मुश्किल है.. कारण कि हर झगड़े का कारण एक जैसा ही हो यह संभव नहीं.. कई बार पत्नी हद तक गलती करती है और कई बार पति.. ऐसे में कोई एक ना तो हमेशा सही होता है और ना कोई एक हमेशा ही गलत.. हाँ पर मार-पीट करके हल निकालने की कोशिश रत्ती भर भी सही नहीं है..
    इन झगड़ों के या इनके कारण के हम सिर्फ कुछ पहलू समझ या जान सकते हैं और अधिकाँश से बेखबर ही रहते हैं.. किसी हल तक पहुँचने से पहले गहन विवेचना की जरूरत होती है..
    मैं पता नहीं क्यों बोल रहा हूँ ये सब.. लगता है जल्द ही कोई बोल देगा कि 'बैचलर्स आर नॉट अलाउड इन दिस डिशकसन' :) लेकिन अनुभव अपने आस-पास से ही बटोरे जाते हैं.. अलबत्ता ये बिवाई अभी तक फटी नहीं मेरे पाँव.. और ना ही फटे तो बेहतर..

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  71. apeel sau pratishat sahi hai...per yah bell bajane se rokte hain apne , samaaj ko kya padi hai ....
    samaj hamare inhin apno se bana hai aur apne ! aatmhatya, hatyaa ke mukhya doshi wahi hote hain , ek bachche ke prashn per bhi yahi jawab dete hain ...
    palatker koi hamen n gaali de, hum per n haath utha de , hum per n koi musibat aa jaye ........ bell bajane kee bajaye rote hue apmaan ki zindagi jeete hue ishwar ka diya maan lete hain !
    purush ko baandhna stree ka kaam, stree ko to hansne ka adhikaar stree hi nahin deti

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  72. aapne bahut hi steek avam ek shat ptishat sahi baat likhi hai .main aapse puri tarah se sahmat hun.
    ek gambhir vishhay par prabhav shali prastuti.aabhaar--------
    poonam

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  73. @मनोज जी ,
    आपकी संवेदनशीलता, सराहनीय है ...आपने इस समस्या के हर पहलू पर रोशनी डाली है.

    यह सच है कि सिर्फ हाथ उठाना ही हिंसा के अंतर्गत नहीं आता, तंज कसना, भला-बुरा कहना, नीचा दिखाना, जलील करना, दहेज़ के लिए ताने कसना , माता-पिता को अपशब्द कहना...सब कुछ घरेलू हिंसा के तहत ही हैं...किन्तु ये सब बातें, बातचीत के द्वारा हल की जा सकती हैं. किन्तु जब बात हाथ उठाने की आती है तो स्त्री उसका प्रतिकार कैसे करे ? क्यूंकि यहाँ तो कुदरत ने पुरुष को बलशाली बनाया है. और यहीं पर बात एकतरफा हो जाती है और इसलिए स्त्रियों को सहायता की जरूरत है.

    इस पोस्ट के माध्यम से मेरा कहना ये था कि , लोग सिर्फ तमाशा ना देखें और इसे घर का मामला ना समझें बल्कि हस्तक्षेप करने में संकोच ना करें....अच्छा हुआ, अपनी टिप्पणियों में सबने इस इस समस्या पर भी खुल कर अपने विचार रखे.

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  74. @विचार शून्य जी,
    अब मैं इस पर क्या कहूँ....यानि कि आप इसे जायज ठहरा रहें हैं?.....अगर कोई महिला अपने बच्चे की पिटाई कर के अपनी खीझ निकालती है तो इसे कौन सही ठहराएगा??

    पर पुरुषों का हाथ उठना अक्षम्य है, पारंपरिक शादी में, सातो फेरे लेकर, सातो वचन में हामी भर कर....रजिस्टर्ड शादी में एक साथ हस्ताक्षर कर...ऐसे ही हर विधि की शादी में दोनों को समान माना गया है तो स्त्री को कमजोर क्यूँ माना जाए? बस इसलिए कि उसमे शारीरिक बल कम है? वही पुरुष , बॉस कितना भी डांटे, कहेगा येस सर...अगर बॉस कहे.."यू आर एन इडियट"...."येस सर...." उस समय उसे गुस्सा नहीं आता??...वह गुस्से पर कैसे काबू रखता है? और यहाँ पत्नी ईजी टार्गेट हो जाती है?....जरा सा गुस्सा आया और..हाथ चला दिया...इसे जस्टिफाई कैसे किया जा सकता है??

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  75. @दीपक,
    पति क्यूँ मार खाते हैं,पत्नियों से?.....वे तो ज्यादा बलशाली हैं,ना?...हाँ,मानसिक प्रताड़ना की बात से मैं असहमत नहीं हूँ.....कई बार पत्नियां भी मानसिक रूप से बहुत उत्पीडित करती हैं...पर एक पोस्ट में एक ही विषय पर केन्द्रित रहने की मंशा थी.

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  76. विचार-शून्य जी,
    शारीरिक प्रताड़ना, वो बच्चे को दी जा रही हो, बीवी को या अन्य किसी को भी, हिंसा की श्रेणी में ही आती है. पिटाई के मूल में कारण चाहे कुछ भी हो, पत्नी और बच्चे को ,शारीरिक-मानसिक दोनों कष्ट होते हं, जिसे देने का हक किसी तीसरे व्यक्ति को केवल इसलिये नहीं मिल जाता, क्योंकि वह घर का मुखिया है. बच्चे को यदि मां पीट भी देती है तो उसे वो तकलीफ़ नही होती, जो बराबरी के दर्ज़े पर खड़ी पत्नी को होती है. किसी घर में यदि ये स्थितियां नियमित बनती हों, तो वहां पत्नी के मन में पति के लिये प्यार की जगह खौफ़ होता होगा. कभी उस महिला की जगह पर खड़े हो के उसकी मानसिक स्थिति का अन्दाज़ा लगाइये, जिसका स्वाभिमान लगातार चूर-चूर किया जाता
    हो. ऑफ़िस की खीझ न तो बच्चे पर निकाली जानी चाहिए और न ही पत्नी पर.

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  77. आपका कांसेप्ट एकदम सही है। हमारे एक छोटे से कदम से कुछ तो लिहाज करेंगे ही। साथ ही मैं यह कहना चाहूंगा कि बेटियों को जितना शिक्षित करेंगे, वह उतना ही स्वाभिमानी और स्वावलंबी बनेंगी। यहां शिक्षा से अभिप्राय पढ़ाई लिखाई के साथ सामाजिक शिक्षा भी है। और आपने लिखा कि

    अगर पति द्वारा हाथ उठाने का विरोध कर वो घर छोड़कर निकल जाए, तो जाए कहाँ? क्यूंकि अधिकाँश मामलों में माता-पिता बेटी को चुपचाप सब कुछ सहने की शिक्षा देते हैं. और वो अकेली निकल भी जाए क्यूंकि दो रोटी और सर पे छत का इंतजाम, मजदूर और शिक्षित, हर स्त्री कर सकती है .पर बच्चों को लेकर कहाँ जाए? और उन्हें पीछे, किसके भरोसे छोड़ जाए?
    क्षमा कीजिएगा मैं इससे सहमत नहीं हूं। नारी को अपनी ताकत का अभी अंदाजा नहीं है। शायद इसी जागरुकता की बात मैं कर रहा हूं। यकीन मानिए, इससे घर टूटेंगे नहीं बल्कि और पक्के ही होंगे।

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  78. @ रवि जी
    सही कहा, प्रत्येक नारी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाए तो सालों -साल उसी घर मे यह शारीरिक मानसिक प्रताड़ना झेलने को मजबूर नहीं होगी.

    पर अभी तस्वीर पूरी तरह बदली नहीं है....स्त्रियाँ आत्मनिर्भर नहीं हैं....इसलिए उनका कोई अपना घर भी नहीं है और मजबूरन उन्हें सब कुछ झेलना पड़ता है.

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  79. \दरअसल वही पत्नियां पिटाई खाती हैं, जो अपने पतियों से प्यार नहीं करतीं .....
    एक बार एक पति गुस्से में अपनी पत्नी को पीटता है | गुस्सा शांत हो जाने के बाद वह उसे समझाता है '' मारता हूँ तो क्या प्यार भी तो करता हूँ, और मारता वही है जी बहुत प्यार करता है "[ सदाबहार डायलोग ] जवाब में पत्नी भी उसके गाल में थप्पड़ रसीद करते हुए कहती है .....
    '' आप क्या समझते हैं, क्या मैं आपसे प्यार नहीं करती ''?
    मजाक की बात है ....कमेन्ट डीलीट कर देना

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  80. @ रश्मि जी ,
    अक्सर सामजिक मुद्दों को सार्वभौमिक नज़रिये से देखना कठिन हो जाता है ! घरेलू हिंसा पूरी दुनिया का सच है किन्तु इसमें ज्यादातर कारक स्थानीयता के प्रभाव वाले हैं ! मिसाल के तौर पर भारतीय नारी के सामने पति परमेश्वर और सात जन्मों के बंधन वाली नैतिक मजबूरी है किन्तु पश्चिम में स्त्री कुछ ही मिनटों में हिंसक पुरुष को नमस्ते कर सकती है अतः वैवाहिक जीवन / स्त्री पुरुष के रिश्ते को ढोने की 'बाध्यता' और 'बर्दाश्त' का अंतर यह बतलाता है कि पश्चिम की नारी हिंसा के विरुद्ध प्रतिकार का जो 'सामर्थ्य' और 'मनोबल' अपने समाज से 'प्रशिक्षण' के दौरान पाती है उसका लेश मात्र भी भारतीय नारी के हिस्से में नहीं आता क्योंकि उसे 'समर्पण' और 'सब्र' के अलावा और कौन सी घुट्टी पिलाई जाती है ?
    तो मेरे हिसाब से प्रतिकार का स्पेस /सामर्थ्य दोनों समाजों की स्त्रियों के बीच का बड़ा अंतर है ! इसी तरह से पड़ोस और न्याय व्यवस्थागत सपोर्ट के अन्तर को भी देखिये ! वहां हिंसा और शोषण की शिकार स्त्री को 'न्याय' और 'मुआवजा' तथा वहां की स्त्री 'अस्मिता' की धारणा को सामजिक ढांचे का 'समर्थन' स्पष्ट है किन्तु क्या यही हालात भारतीय स्त्री के साथ भी हैं ?

    मैं ये नहीं कहता कि पश्चिम में पुरुष की हिंसा का शिकार स्त्रियाँ नहीं होतीं पर ये ज़रूर कहता हूं कि पूरी दुनिया के इस लैंगिक विभेद में पश्चिम की स्त्री को प्रतिकार का अपेक्षाकृत अधिक प्रशिक्षण प्राप्त है जबकि भारत में परमेश्वरीय घुट्टी प्रतिकार के प्रति स्त्री का मनोबल तोड़ने वाली है ! जैसा कि मैंने अपनी पहली टिप्पणी में स्त्री के आर्थिक स्वावलंबन का मुद्दा उठाया था जोकि हिंसा के विरुद्ध प्रतिकार में पश्चिम की स्त्री का दूसरा प्रबल हथियार है !

    मेरे कहने का आशय ये कि पश्चिम की स्त्री और भारत की स्त्री घरेलू हिंसा का शिकार तो हैं पर कारक एक जैसे नहीं हैं जैसे कि पश्चिम की स्त्री आर्थिक सामर्थ्य रखते हुए भी पीड़ित है जबकि हम भारतीय स्त्रियों के आर्थिक सबलीकरण से समस्या के निदान की कल्पना कर रहे हैं क्योंकि हम उसे पुरुष की आश्रितता से मुक्त देखना चाहते हैं ताकि वह भी पश्चिम की स्त्री की तरह बेधड़क अलग रास्ता अख्तियार करना चाहे तो कर सके !

    दोनों ही समाजों की स्त्रियों की पीड़ा की मात्रा का अंतर निश्चय ही प्रतिकार के सामर्थ्य से तय किया जाना चाहिये !

    अब मुद्दा आपके मूल प्रश्न का ...कि पश्चिम की स्त्री घरेलू हिंसा का शिकार क्यों है ? इस प्रश्न का पहला और सीधा उत्तर लैंगिक है तथा शताब्दियों से पुरुषों के देह श्रेष्ठी होने के निरर्थक चिन्तन और स्त्री पर संपत्तिनुमा वर्चस्व बनाये रखनें की इच्छा से जुड़ा हुआ है किन्तु झगडे के शेष कारक दोनों ही समाजों में भिन्न हैं !

    यूं समझिए कि पश्चिम की स्त्री का प्रतिकार अधिकार / सामर्थ्य उसे 'सबला' तथा इसी अधिकार / सामर्थ्य की न्यूनता भारतीय स्त्री को 'अबला' ठहरा देती है ! बस यही कारण मुख्य था कि मैंने उस दिन टिप्पणी करते हुए भारतीय स्त्री के सबलीकरण पर फोकस किया था !

    मेरा मंतव्य यह बिलकुल भी नहीं था कि पश्चिम में घरेलू हिंसा नहीं होती बल्कि मैं वहां की स्त्रियों के निज सामर्थ्य पर भरोसा करते हुए भारत की स्त्रियों के दीन मनोबल और अबलापन के कारणों की चर्चा कर रहा था !

    टिप्पणी शायद लंबी लगे पर मेरे मंतव्य के स्पष्ट हो जाने की उम्मीद कर रहा हूं !

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  81. @अली जी,
    आपकी टिप्पणी से यह कहीं भी ध्वनित नहीं होता था कि 'पश्चिम की स्त्रियाँ घरेलू हिंसा की शिकार नहीं हैं' ...बस मेरे मन में यह शंका उठी थी कि वहाँ तो बचपन से ही दोनों को समान दर्जा प्राप्त है, उनका धर्म भी किसी एक को श्रेष्ठ नहीं मानता,आर्थिक रूप से सबल हैं फिर भी क्यूँ हिंसा की शिकार हैं. आपका कहना सही है " ज्यादातर कारक स्थानीयता के प्रभाव वाले हैं ! शताब्दियों से पुरुषों के देह श्रेष्ठी होने के निरर्थक चिन्तन और स्त्री पर संपत्तिनुमा वर्चस्व बनाये रखनें की इच्छा से जुड़ा हुआ है किन्तु झगडे के शेष कारक दोनों ही समाजों में भिन्न हैं ! "

    बस आर्थिक स्वावलंबन ही भारतीय स्त्रियों को इस अमानवीय व्यवहार से मुक्ति दिला सकता है.

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  82. अब......प्रतिशत में तो मैं नहीं बता सकता ज्सिके लिए मैं माफ़ी चाहता हूँ. लेकिन मेरे कई रिश्तेदार / जानकार पत्नी पीड़ित जरूर हैं. जिन्हें मैं काफी करीब से जानता हूँ.
    उनका प्रतिशत बेशक कम या नाममात्र होगा लेकिन, इनके अस्तित्व को नहीं नकारा जा सकता.
    मेरी व्यक्तिगत सोच यही हैं की--सिर्फ औरत के पढ़ लिख लेने या खुद कमाने मात्र से ये समस्या हल नहीं होगी. इस समस्या का हल तो मिल बैठकर बात करने से निकलेगा. एक बार तनाव होने या पति के हाथो पिटने के तुरंत बाद विरोध करना उचित नहीं होगा. थोड़ी देर बाद, माहोल शांत होने के बाद, शान्ति से धैर्यपूर्वक बात की जाए तो पति अपने गलती मान सकता हैं.
    ऐसा मुझे लगता हैं, बाकी सबकी अपनी-अपनी सोच हैं.
    धन्यवाद.
    (अगर मेरी कोई बात बुरी लगी हो तो एडवांस में ही माफ़ी चाहता हूँ.)
    WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

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  83. रश्मि तुम्हारा लेख बहुत एफ्फ्क्टिव लगा...लेकिन मैं यह महसूस करती हूँ कि औरतें घरेलु हिंसा के मामलों में अक्सर लोगो का हस्तक्षेप सिर्फ इसलिए नहीं चाहती क्योंकि ..वह और अधिक हिंसा का शिकार नहीं होना चाहती ...वे जानती हैं उनका पति बहार वालों के सामने चाहे कुछ न कहे, लेकिन उनके जाते ही उसका क्रोध और विकराल रूप ले लेगा. इसी स्तिथि से बचने के लिए वे ऐसा करती हैं....और इसी डर के तहत अपने पति के मन में यह विश्वास बैठाना चाहती हैं की देखो...इस सबके बावजूद मैंने तुम्हारी बुराई नहीं होने दी.....शायद इसी बात से पतिदेव का मिजाज़ कुछ सही हो जाये..लेकिन जो भी वजह हो...बहुत ही निंदनीय कृत्य है .....यह सुझाव...घंटी बजाने वाला हमें भी बहुत अपील किया था जब पहली बात टीवी पर देखा था .....वैरी इम्प्रेस्सिव .......कोशिश करने में क्या हर्ज़ है अगर हिंसा को कुछ ही देर के लिए ही सही....रोका जा सके...!

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लाहुल स्पीती यात्रा वृत्तांत -- 6 (रोहतांग पास, मनाली )

मनाली का रास्ता भी खराब और मूड उस से ज्यादा खराब . पक्की सडक तो देखने को भी नहीं थी .बहुत दूर तक बस पत्थरों भरा कच्चा  रास्ता. दो जगह ...