आज , एक ऐसे संवेदनशील विषय पर लिखने जा रही हूँ, जिसके जिक्र से सब आँखें चुराते हैं और ऐसा प्रदर्शित करते हैं ,मानो ना कभी देखा ,ना सुना हो.
अभी कुछ दिन पहले सलिल जी के ब्लॉग पर एक पोस्ट पढ़ी, "पति पत्नी और वो" जिसमे जिक्र था कि कैसे एक पति अपनी पत्नी को सरेआम पीट रहा था और जब उनके बाबूजी ने उस आदमी को एक थप्पड़ मारा तो खुद उसकी पत्नी ने उनका हाथ पकड़ लिया कि "यह उसके घर का मामला है, "
सलिल जी के बाबूजी के प्रति अगाध श्रद्धा से मन भर उठा क्यूंकि बिरले ही कोई पहल कर के 'यह बात' स्त्री के मुहँ से सुनता है . अधिकाँश लोग यह मान कर ही चलते हैं कि यह उनके घर का मामला है. बरसो पहले बचपन में देखी एक घटना मानसपटल पर अंकित है . जब पूरे गाँव ने यह सोच कि यह उनके घर की बात है, कोई हस्तक्षेप नहीं किया था.
मैं काफी छोटी थी,दादा जी के पास गाँव गयी हुई थी . यूँ ही गाँव में घूम रही थी कि देखा एक महाशय जी अपनी पत्नी पर अपना पुरुषार्थ दिखा रहें हैं और उसे मारते हुए घर की तरफ लिए जा रहें हैं. मैने पास खड़ी खेतों में काम करने वाली काकी से पूछा, " कोई रोकता क्यूँ नहीं?" कहने लगी, "ये तो उसके घर की बात है... ये तो कुछ नहीं, एक दिन बरसात में वह अपनी पत्नी को दौड़ा दौड़ा कर मार रहा था और आस-पास के सब लोग अपनी खिडकियों से नज़ारा देखते हुए यह प्रार्थना कर रहें थे कि "हे भगवान!.. उसकी लाज रखना ...उसके कपड़े ना फटें "
उस दिन जो आक्रोश उपजा था यह सुन...आज भी ज्यूँ का त्यूँ है. क्यूँ लोग समझ लेते हैं कि यह उनके घर का मामला है? कई लोगों ने उस पोस्ट पर टिप्पणी की है कि अगर घर का मामला है तो ,घर के अंदर ये मार-पीट करो. यानि कि घर के अंदर अगर पति हाथ उठाये और पत्नी बिना आवाज़ किए सहती रहें तो सब कुछ ठीक है? बाहर दुनिया वैसी ही सुन्दर है ?
खैर वह सब एक लम्बे विमर्श का विषय है. क्यूँ पत्नियां ऐसा कहने पर मजबूर होती हैं. अधिकाँश मामलो में वे पति के ऊपर आर्थिक रूप से निर्भर होती हैं. पर यह आंशिक सत्य है. घरेलू हिंसा से शिक्षित, संपन्न, आत्म-निर्भर महिलायें भी बरी नहीं हैं.उनका आर्थिक रूप से निर्भर होना भी कोई मायने नहीं रखता. कई मध्यम वर्गीय और उच्च घरों में भी ऐसे दृश्य बदस्तूर चलते रहते हैं. नाम नहीं लिख रही पर काफी लोगों को पता होगा. एक मशहूर उद्योगपति की पत्नी, जो पांच करोड़ रुपये की घड़ी हाथों में पहनती हैं. घरेलू हिंसा की शिकार हैं. कितनी बार पत्रकारों ने उनके गले ,हाथ, चेहरे पर लाल-काले निशान देखे हैं. मशहूर बोलीवुड हिरोइन का किस्सा भी सबको पता होगा. जिसके बॉय फ्रेंड ने उसका हाथ जख्मी कर दिया था और चेहरे के निशान को बड़े से ;डार्क ग्लासेज' से छुपाये और हाथों में प्लास्टर लगाए वो फिल्म फेयर अवार्ड लेने पहुंची थीं. और उनकी तारीफ़ भी हुई थी क़ि उन्होंने इसे दुनिया के सामने सरेआम स्वीकारा. कल के बड़े स्टार जिनका बेटा भी अब सुपर स्टार के कगार पर है. और पत्नी भी फिल्म-स्टार थीं. पर उनके हाथ उठाने की आदत से तंग आ एक दिन पत्नी ने पुलिस को बुला लिया. खैर मामला रफा-दफा हो गया और आज भी दोनों मुस्कुराते हुए, फ़िल्मी पार्टी, टी.वी. प्रोग्राम में नज़र आते हैं.
वर्तिका नंदा की ये कविता यहाँ बड़ी सटीक है.
नौकरानी और मालकिन
दोनों छिपाती हैं एक-दूसरे से
अपनी चोटों के निशान
और दोनों ही लेती हैं
एक-दूसरे की सुध भी
मर्द रिक्शा चलाता हो
या हो बड़ा अफसर
इंसानियत उसके बूते की बात नहीं।
और यह सब सिर्फ हमारे पिछड़े देश में ही नहीं चलता.विदेशों में भी वहाँ की शिक्षित, आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाए भी इसकी शिकार हैं.. एक बार एक बड़े टेनिस स्टार ने अपने इंटरव्यू में स्वीकारा क़ि मैच हारने के बाद ,वह अपना गुस्सा अपनी पत्नी पर निकालता है और उसने कहा था, she dsnt get hurt much as she has fast knees " क्या कहने!! बस ये है क़ि वे इसे शर्म का विषय नहीं समझतीं.पुलिस में शिकायत भी कर देती हैं और पुलिस तुरंत हरकत में भी आ जाती है.
हम यहाँ जजमेंटल नहीं हो सकते. ये सब सहने की सबकी अपनी मजबूरियाँ होती हैं, अपने तर्क हैं. जो पुरुष ऐसी अमानवीयता दिखाते हैं. उनकी upbringing में प्रॉब्लम होती है. बचपन अच्छा नहीं गुजरा होता और उन्हें काउंसिलिंग की सख्त जरूरत होती है. पर वे कभी मानेंगे ही नहीं क़ि उनके व्यक्तित्व में कोई असंतुलन है.
पर इस पोस्ट को लिखने का उद्देश्य कुछ और है. करीब दो साल पहले मैने मुंबई में अखबारों में एक मूवमेंट के बारे में पढ़ा था ".प्लीज़ रिंग द बेल".उसमे यह अपील की गयी थी क़ि अगर किसी फ़्लैट के अंदर से ऐसी आवाजें आ रही हैं. तो कृपया आप चुपचाप तमाशा ना देखें. घंटी बजाएं. लेकिन आपको उनकी लड़ाई के बीच कोई हस्तक्षेप या किसी की साइड नहीं लेनी है. इस से झगडा और बढ़ सकता है और फिर लोग वही सदियों पुराना जुमला दुहरा सकते हैं " ये हमारे घर का मामला है?" आपको उस टेंशन को को बस defuse करना है. आप अखबार मांग लें, या बर्फ मांग लें..या स्क्रू ड्राइवर...किसी भी बहाने से उस सिचुएशन को टाल दें. अचानक किसी को सामने देख, उसके सामने वो हरकत तो नहीं कर सकता.और एक बार जब आप थोड़ी देर को बातों में उलझा लेंगे तो उस चरम तनाव के क्षण में कुछ ढीलापन तो आएगा. ऐसा ही, किसी भी स्थिति में किया जा सकता है. फ़्लैट ना हो....और यह सब नज़रों के सामने चल रहा हो.....तब भी पुरुष को कहीं दूर ले जाया जा सकता है, महिला को किस बहाने से वहाँ से हटाया जा सकता है.
उस वक़्त इसे सुलझाने की कोशिश तो बेकार ही होगी क्यूंकि कई सारी बातें होती हैं...और जबतक पुरुष इसे खुद गलत नहीं समझता ,सुधार नहीं आ सकता. लेकिन आँखों के सामने या जानकारी में ऐसी घटना हो तो पहल करनी चाहिए. क़ि कम से कम एक महिला उस प्रताड़ना से तो बच सके .और ये सब सिर्फ कोरी बातें नहीं हैं. एक बार मेरी एक फ्रेंड ने किया भी था. इस मूवमेंट की बात पढ़कर नहीं...अपने अंतर्मन की सुनकर. वो रात में मेहमान को छोड़ने गेट तक आई तो ग्राउंड फ्लोर से ऐसी ही आवाजें आ रही थी. पति-पत्नी ने घंटी बजा दी. थोड़ी देर शांत हो गया,सब कुछ. फिर घंटी बजायी तो पति ने दरवाज खोला. पति ने कुछ बातों में उलझा लिया, उस आदमी की पत्नी बेडरूम में चली गयी. वह आदमी थोड़ा शर्मिंदा भी दिख रहा था. जब १५-२० मिनट बाद वो लौटे तो उस आदमी का गुस्सा काफी कम हो चुका था.
यह उपाय कितना कारगर है.....कोशिश कितनी कामयाब होगी नहीं कहा जा सकता पर जबतक अमल में नहीं लाया जायेगा , इसकी सफलता -विफलता का पता कैसे चलेगा ? कम से कम सोच में यह बदलाव तो आनी शुरू होगी कि यह सिर्फ घर का मामला नहीं.इंसानियत का मामला है. और हस्तक्षेप किया जा सकता है इसलिए हिचकिचाइए मत एंड Please ring the Bell.
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