Monday, March 22, 2010

एक खूबसूरत फिल्म जिसकी नायिका एक ब्लॉगर है



हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म "जूली एन जूलिया 'का रिव्यू पढ़ा तो तय कर लिया यह फिल्म तो हर हाल में देखनी ही है. पर वही बेटे के दसवीं के बोर्ड ने हर राह पर तालेबंदी कर रखी थी.उसकी परीक्षा ख़त्म हुई और मैंने अपने तमाम व्यस्तताओं को धता बताकर इसे देखने का समय निकाल ही लिया. आखिर आपलोगों के साथ बांटना भी तो  था :)

जूली एन जूलिया दो सच्ची कहानियों पर आधारित है.एक जूलिया चाइल्ड द्वारा लिखित "My life in France " और दूसरी जुडिथ पोवेल द्वारा लिखित Juli and Juliya ' ये दोनों ही किताबें उनके संस्मरणों पर आधारित हैं. Nora Ephron ने अपने  शानदार निर्देशन में बिलकुल सच्चाई  से उनकी  ज़िन्दगी को फ़िल्मी कैनवास पर उतारने की कोशिश  की है.,
Meryl Streep और  Amy Admas ने बहुत सधा हुआ अभिनय किया है

२००२ में २९ वर्षीय जूली ,एक पत्रिका में अपनी सब एडिटर की नौकरी छोड़, अपने पति के साथ उसके ऑफिस  के पास एक छोटे से फ़्लैट में शिफ्ट हो जाती है.वह एक कॉल सेंटर में काम करने लगती है, पर अनजान जगह,एक छोटा सा फ़्लैट और दिन भर लोगों  की समस्याओं से जूझना,ये सब मिलकर उसे बहुत परेशान कर देते हैं. उसे खाना बनाने का बहुत शौक है और वह रोज एक नयी रेसिपी ट्राई  करके अपनी थकान उसमे भुलाने की कोशिश  करती है.

एक बार वह अपनी पुरानी सहेलियों के साथ लंच पर जाती है.वे सब अपने अपने क्षेत्रों में काफी सफल हैं. वे सब एक अभिनेत्री के ब्लॉग की चर्चा करती हैं.जूली, घर आकर अपने पति को बताती है, कि वह उस अभिनेत्री से कहीं ज्यादा अच्छा लिख सकती है.
"हाँ, क्यूंकि तुम एक लेखिका हो " उसका पति कहता है.
"एक ऐसी लेखिका जिसका नॉवेल  नहीं छपा है. जबतक नॉवेल छपे नहीं उसे लेखिका नहीं कह सकते."
"तो फिर, तुम भी अपना एक ब्लॉग बना लो और उसमे लिखो"
"पर लिखूं क्या"
"हम्म इस जगह के बारे में कि तुम्हे ये कितना पसंद है"
"यह जगह मुझे नहीं पसंद"
"अपने जॉब के बारे में लिखो"
"और किसी  ऑफिस वाले ने पढ़ लिया तो मुझे नौकरी से निकाल देंगे.मैं कुछ ऐसा लिखना चाहती हूँ कि जिससे मुझे ख़ुशी मिले और मैं अपनी  दिन भर की परेशानी भूल जाऊं. जैसी ख़ुशी मुझे नए नए व्यंजन बनाने में मिलती है"
"तो अपने खाना बनाने के अनुभव के बारे में  लिखो"
और जूली तय करती है कि वह अपनी प्रिय लेखिका 'जूलिया चाईल्ड' की किताब से रोज कुछ  रेसिपी ट्राई करेगी और उसके अनुभव के बारे में अपने ब्लॉग में लिखेगी.वह एक डेड लाईन रखती है.३६५ दिन में ५२४ रेसिपी.
शुरुआत  में वह अपने पोस्ट के अंत में लिखा करती है. Are you listening? Whoever you are...या फिर  is there anybody ??somebody??anyone ??  वह अपने पति से कहती  है कि ऐसा लग रहा है मैं यह सब लिख कर शून्य में भेज रही हूँ.

जूली की माँ भी उसे फोन पर  डांटती  है कि वह क्यूँ अपना समय बर्बाद कर रही है. कोई उसे नहीं पढता"
"लोग पढेंगे  माँ "जूली कहती है.

दस दिन बाद उसे एक कमेन्ट मिलता है. वह खुश हो जाती है. पर वह उसकी माँ का कमेन्ट था और यही लिख था कि 'क्यूँ अपना समय बर्बाद कर रही है'.
एक महीने के बाद उसे १२ कमेन्ट मिलते हैं.वह अपने  पति को खुश होकर बताती है कि वह इनमे से किसी को जानती तक नहीं. दो महीने के बाद उसके ऑफिस में कदम रखते  ही उसकी सहेली बताती है. उसके लौब्स्टर वाली पोस्ट पर उसे ५३ कमेंट्स मिले हैं.वह ख़ुशी से  झूम उठती है.


फिल्म में जूलिया चाइल्ड की कहानी  भी साथ साथ चलती है कि कैसे १९४९ में जूलिया ४० साल की  उम्र में अपने पति के साथ फ्रांस आई और उसने समय काटने के लिए एडवांस्ड कुकिंग कोर्स  ज्वाइन किया.क्लास में सब पुरुष थे और किसी ना किसी होटल में शेफ थे.वे सब जूलिया को हिकारत से देखते थे क्यूंकि जूलिया उनकी तरह तेज़ी से प्याज नहीं काट पाती थी. जूलिया ने घर आकर करीब दस किलो प्याज काटकर अभ्यास किया. और अगले दिन क्लास में सबसे फुर्ती से प्याज काट कर रख दिए. इसी तरह वह हर कार्य में मेहनत करती और क्लास की सबसे तेज़ और मेहनती छात्रा बन गयी.
 

एक बार एक पार्टी में जूलिया को दो महिलायें  मिलती हैं.जो अंग्रेजी में फ्रेंच व्यंजनों की एक किताब लिख रही थीं.उनके निमंत्रण पर जूलिया भी उनके साथ हो गयी. पर प्रकाशक किताब छापने से मना  कर देते हैं कि यह बहुत बड़ी है.फिर  जूलिया अपने दम पर सारे व्यंजनों को नया रूप देकर, पका कर,चख कर ..उनकी रेसिपी लिख डालती है. इसमें उसे ८ वर्ष लग जाते हैं.एक दो जगह से रिजेक्ट होने के बाद यह किताब Masterin the Art of  French Cooking  के नाम से छपती है. आज तक इसके ४९ एडिशन छप चुके हैं.

इधर जूलिया का ब्लॉग पोपुलर होने लगा है. एक अखबार के रिपोर्टर ने उसके ब्लॉग के बारे में लिखना चाहा . जूलिया उसे खाने पर बुलाती है और यह सब अपने ब्लॉग में लिख देती है. वह एक बहुत ही कठिन रेसिपी बनाती है.जिसे पकाने में ढाई घंटे लगते हैं.वह  टाइमर लगा कर सो जाती है और वह व्यंजन जल जाता है. दूसरे दिन वह ऑफिस में फ़ोन कर देती है कि तबियत ख़राब है और फिर से वह व्यंजन बनाती है. लेकिन बारिश की वजह से वह रिपोर्टर नहीं आता. ये सारी बातें वह ब्लॉग में लिख देती है. दूसरे दिन उसके बॉस ने उसे बुलाकर जबाब तलब करते हैं  क्यूंकि उसके ब्लॉग में वे सारी असलियत पढ़ चुके थे. अब उसके ऑफिस के लोग थोड़ा उस से डरने लगे थे कि क्या पता वह उनकी बातें जाकर ब्लॉग में लिख देगी.

इस बीच कई दुखद क्षण भी आए. जब उसकी तबियत काफी खराब हुई...फिर भी पति के मना करने के बावजूद उसने पोस्ट लिखी,यह सोच कि उसके पाठक निराश हो जाएंगे.एक बार एक व्यंजन खराब हो जाने पर बहुत हिस्टिरिकल भी हो गयी. उसका पति उसे हर तरह से सहयोग  करता था. पर उस दिन नाराज़ हो गया कि उसका सारा ध्यान सिर्फ ब्लॉग में रहता है.और घर छोड़कर अपने ऑफिस में रहने चला गया.पर जाते जाते कह गया कि ये सब वह अपने ब्लॉग में मत लिख देना.

जूली सारी बातें तो नहीं लिखती,पर ये  लिखती है कि वह बहुत दुखी है .एक अच्छा इंसान नहीं बन पा रही. उसकी आदर्श जूलिया कभी कोई व्यंजन बिगड़ जाने पर इस तरह का व्यवहार नहीं करती. अपने पति का बहुत ध्यान रखती.उसका पति ये सब पढ़कर वापस आ जाता है.
उसका पति ऑफिस से फोन करता है कि जूलिया का ब्लॉग नेट पर पढ़े जाने वाला तीसरा सबसे लोकप्रिय ब्लॉग है. एक दिन न्यूयार्क टाइम्स का  एक रिपोर्टर उसका इंटरव्यू लेता है और वह पहले पेज पर प्रकाशित होता है.जूलिया ट्रेन में जा रही है और बगल में बैठे आदमी को अपने ऊपर लिख लेख पढ़ते देखती है. बाज़ार में प्लेटफ़ॉर्म पे कई जगह वह लोगों  को वो लेख  पढ़ते देखती है.
जब घर आती है तो उसके फ़ोन के आंसरिंग मशीन पर ६५ मैसेज पड़े होते हैं. पत्रिकाओं , अखबारों और ,पब्लिशिंग हाउस से उसे लिखने के ऑफर मिल रहें थे.इस बीच उसकी माँ का भी फोन था कि पडोसी, रिश्तेदार दोस्त सबलोग उसे फोन पर बधाई दे रहें हैं और वह बहुत खुश है.
४ दिन बाकी है ३६५ दिन पूरे होने में. और अपन कमिटमेंट पूरा कर जूली अपने दोस्तों को पार्टी देती है और सबके सामने कहती है कि "अपने पति एरिक के सहयोग के बिना वह यह सब नहीं कर पाती और ग्लास उठा कर टोस्ट करते हुए, वही शब्द दुहराती  है जो कभी जूलिया के पति ने जूलिया को कहे थे,"You are butter to my bread
                 You are life to my breath "
                                               
फिल्म में दोनों पुरुषों का किरदार बहुत ही पॉजिटिव  है. दोनों अपनी पत्नी को पूरा सहयोग देते हैं और वे जब भी निराश,हताश होती हैं तो उनका अपने में विश्वास जगाते हैं और उत्साह बढाते हुए कहते हैं कि वह अपने मकसद  में जरूर कामयाब होंगी.

आशा है  आपलोगों  को फिल्म अच्छी लगी होगी.:)

31 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

बहुत अच्‍छी लगी जूली और जूलिया फिल्‍म। आपने फिल्‍म की कहानी के साथ ही ब्‍लॉगिंग का भविष्‍य भी बांच दिया है। वो बात दीगर है कि वो फिल्‍म में बांचा गया है। जल्‍द ही ऐसी हकीकतें हमें समाज में देखने कों मिलेंगी। आखिर हम सब भी यही कर रहे हैं। हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग का हित संधान करती यह पोस्‍ट रश्मि रवीजा की कलम को भी बुलंदियों की ओर ले जाती है। किसी अहसास को महसूस करना और ज्‍यों का त्‍यों प्रस्‍तुत कर देना वास्‍तव में एक कला है। जिसका कि ब्‍लॉग के माध्‍यम से हो रहा भला है। जय ब्‍लॉगिंग।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अभी यह फिल्म यहां नहीं लगी…आपने हमें शब्दों और चित्रों से दिखा दी तो आभार…

अविनाश वाचस्पति said...

करें लॉ‍ग इन और बनायें आज ही एक हिन्‍दी ब्‍लॉग यदि आपका अभी तक कोई ब्‍लॉग नहीं है तो ...

shikha varshney said...

वाह अपनी सी लगी कहानी कुछ कुछ .काश जूली वाला दिन हमें भी देखने को मिलता..बहुत अच्छी फिल्म लग रही है ..देखनी पड़ेगी...आपका शुक्रिया जो बता दिया और इतनी अच्छी तरह समझा भी दिया ..दोनों पुरुषों का सहयोग थोडा अतिश्योक्ति है हाहा हाहा

HARI SHARMA said...

रश्मि जी, वेहद ताजगी लिये हुए आपकी ये पोस्ट ठन्डी हवा के झौके सी लगी. ठीक है कि ये एक फ़िल्म की कहाने है लेकिन मुझे ऐसा लगा कि हमारे बीच के कुछ ब्लोगर भे कल को ऐसे ही लोकप्रिय हो सकते है. उनमे से मुझे ऐसा लगता है कि एक आप हो सकती है. मुझे ऐसा लगता है कि ऐसा होगा तब मेरे यह कहने पर कि रश्मि जी भी मुझे जानती है लोग विश्वास नही करना चाहेगे. जैसे आज मे कहता हू कि आज के कवि सम्मेलनो के सबसे लोकप्रिय गेतकार डा कुमार विश्वास मुझे बडा भाई कहते है.
फ़िल्म यकीनन खूबसूरत है लेकिन ये पोस्ट उससे भी खूबसूरत है. मेरी तरफ़ से बधाई और वेहतर कल के लिये शुभकामनाये

आवेश said...

मैंने ये फिल्म नहीं देखी ,और यकीन मानिये फिर देखूंगा भी नहीं,फिल्मों की समीक्षा में सबसे कठिन काम पाठकों के मन में पूरी सेल्युलाइड को लाइव दिखाना होता है .ज्यादातर समीक्षक इसमें असफल होते हैं मगर रश्मि रविजा ने जबरदस्त ढंग से कहानी को अपने शब्द दिए हैं

rashmi ravija said...

शुक्रिया,अविनाश जी, अशोक जी, हरि जी एवं शिखा....अच्छा लगा जान आपलोगों को यह पोस्ट अच्छी लगी.
@आवेश,आप यह फिल्म क्यूँ नहीं देखना चाहेंगे? क्यूँ सारी कहानी जान ली ,इसलिए?
@अरशद ,महफूज़ की सारी बात मत सीख लेना...(jst joking)

Suman said...

nice

mukti said...

वाह !!! बहुत अच्छा रिव्यू लिखा है आपने. मैं ये फ़िल्म ज़रूर देखूँगी जब यहाँ आयेगी. वैसे भी मेरिल स्ट्रीप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं.
और मालूम है मेरा वर्डप्रेस वाला ब्लॉग भी हिन्दी वर्डप्रेस के डैशबोर्ड पर लगातार दो दिन से टॉप पर है और मेरी पिताजी के बचपन वाली पोस्ट 125 से ज्यादा लोग पढ़ रहे हैं. अच्छा लगता है न यह सब देखकर.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

अरे वाह! ये तो हम सब की कहानी है. इस फ़िल्म को तो अब देखना ही होगा. बहुत शानदार रिव्यू है तुम्हारा. :)

राज भाटिय़ा said...

आप ने इस फ़िल्म को शव्दो मे दिखा दिया, मै बहुत कम फ़िल्मे देखता हुं,धन्यवाद

सुशीला पुरी said...

कहानी जानकार फिल्म देखने की ललक और बढ़ गई है .....बहुत अच्छी तरह पोस्ट किया आपने .

PD said...

ise aaj hi download karta hun..

kuldeep said...

लो जी एक ओर सुक्रिया

शरद कोकास said...

1. उसके लौब्स्टर वाली पोस्ट पर उसे ५३ कमेंट्स मिले हैं.वह ख़ुशी से झूम उठती है......
यहाँ तक तो हिन्दी ब्लॉगिंग की कहानी लगती है । उसके बाद कहानी में नया मोड़ है .. ऑफिस के लोग डरने लगते है कि हमारे बारे में न लिख दे .. और किताब के कितने कितने एडीशन छपते हैं ..यह हमारे किसी ब्लॉगर के साथ हो यह दुआ ..वैसे आपने उत्सुकता पैदा कर दी है . अब इसे कहीं न कहीं से ढूँढकर देखना ही होगा ।

वाणी गीत said...

फिल्म निहायत ही सच्चाई भारी है ...हिंदी ब्लोगिंग की पूरी जासूसी की जा रही है फिल्म निर्माताओं द्वारा .... एक आशा की किरण जागी है ....इतना बुरा भविष्य नहीं है हमारे लेखन का ...:):)

और ऑफिस के लोग डरने लगे हैं कि कुछ हमारे बारे में नहीं लिख दे...हा हा हा ह....कुछ लोगों के सर्द जर्द चेहरे आँखों के सामने घूम रहे हैं ...मगर नहीं ...हम इतने बेदर्द भी नहीं हैं ...दूसरों की इज्जत बचने में विश्वास रखते हैं ...उछालने में नहीं ...!!

रेखा श्रीवास्तव said...

पूरा साउंड ट्रैक तो नहीं कहूँगी, पर पूरे राईट अप से फ़िल्म तुम्हारी जबानी देख डाली, वैसे तो टाइम नहीं मिलता लेकिन अब जब तुम मेरा शौक पूरा कर रही हो , तो फिर मैं जहमत क्यों उठाऊं . जो समान बाँधा है न उसमें ऐसी बंधी कि पूरा एक सांस में पढ़ गयी.
बहुत अच्छी प्रस्तुति, इसको कहते हैं बताऊ क्या? जो कुशल होते हैं न, वे घास कि सब्जी भी बना कर रख दें तो लोग अंगुलियाँ चाटते रह जाते हैं. वही है. जिस रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है , तारीफ करने के लिए शब्द ही नहीं बचे हैं.
बहुत बहुत बधाई.

यशवन्त मेहता "फ़कीरा" said...

बहुत अच्छा रिव्यू
फ़िल्म को तो देखना ही होगा

sangeeta swarup said...

बहुत अच्छी जानकारी..जान कर अच्छा लगा कि पत्नी को आगे बढने में पति की महत्तवपूर्ण भूमिका रही ...एक अच्छी जानकारी के साथ बेहतरीन पोस्ट

rashmi ravija said...

संगीता जी, पोस्ट लम्बी ना हो जाए इस डर से मैंने ज्यादा नहीं लिखा...वरना जूलिया के पति, फोटोग्राफर थे और जूलिया जो भी व्यंजन बनाती..उसकी तस्वीरें लेते और जूलिया की भी खाना बनाते हुए ,हमेशा तस्वीरें लिया करते. उसकी किताब में उनकी खींची तस्वीरें ही छपी हैं.जब उसकी किताब रिजेक्ट हो गयी...तो उसका उत्साह बढाते ही बोला..तुम्हारी किताब जरूर छपेगी..और देखना तुम टेलीविजन पर अपना कुकरी शो भी करोगी...जूलिया आश्चर्य से हंसने लगती है..पर आगे चल कर यह सब सच होता है.

जूली की कहानी तो २००२ की है..उसका पति भी ब्लॉग बनाने से लेकर खाना बननें तक में उसका सहयोग करता था. कुछ बिगड़ जाए,गिर जाए तो जूलिया अपसेट होकर किचेन से बाहर चली जाती और वो सारा किचेन साफ़ करता. हमेशा उसे ये विश्वास दिलाता कि वो एक बहुत अच्छी लेखिका है.

और ये दोनों कपोल कल्पना नहीं,सच्ची घटनाएं हैं. और ये दोनों अपने अपने ऑफिस में उच्च पद पर थे.

rashmi ravija said...

@mukti
अरे अरे मुक्ति मैं तुम्हे बधाई देना तो भूल ही गयी...हिंदी वर्डप्रेस पर तुम्हारा ब्लॉग दो दिन से टॉप पर है...और १२५ से ज्यादा लोग पढ़ रहें हैं. woww thats a great news..congrats again

अब तो पक्का तुम हिंदी ब्लॉग जगत की जूली हो (जूली एन जूलिया फिल्म वाली ) :)

शहरोज़ said...

भाषा प्रतिदिन उठान पर है.....विधा कोई भी हो..हाँ !!
लेकिन संस्मरण की शैली में आप का कथ्य अतिरिक्त निखर जाता है.

फिल्म की कहानी जिस तर्ज़ पर आपने हम सभी के आँखों से दिखला दी ...
बल्ले!!!!!!बल्ले!!!
जोर से बोलो रश्मि रविजा की जय!!!!

Vivek Rastogi said...

हमने तो आपके शब्द चित्रों के माध्यम से ही पूरी फ़िल्म देख ली। बहुत बढ़िया फ़िल्म लगी :)

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

एक बात तो है....अब सिर्फ़ फ़िल्म देखनी भर है.
समझने के लिये तो कुछ रह नहीं गया शायद.
इतने विस्तार से आपने व्याख्या जो की है.
रश्मि जी, फ़िल्म की कहानी जैसा भले ही न बन सका हो..लेकिन एक से बढ़कर एक प्रतिभाओं से रूबरू करा रहा है ये हिन्दी ब्लॉग का संसार.
इस समीक्षा के लिये बधाई.

रश्मि प्रभा... said...

are waah tumhare saath film dekhna rochak raha

शोभना चौरे said...

bhaut hi achhi smeeksha lgi aur achhi isliye bhi ki ham sab ak sfar ke sathi hai .ye bhi sach hai ki hmko janne vale thoda smjh kar bolne lge hai kya maloom agli post kahi unke kahe vaky ko lekar hi na ho ?
aur hme bhi sochkar post likhni hoti hai kyoki sare parichit blog pdhte hai
badhai

रवि धवन said...

आहा, लजीज।

वन्दना said...

बहुत ही खूबसूरती से बयान किया है हालात को और सच भी है।

Sanjeet Tripathi said...

interesting...jarur dekhna chahunga is movie ko

Kulwant Happy said...

ब्लॉगिंग को उत्साह देती हूँ एक फिल्म। मजा आ गया। पहली प्रतिक्रिया, उसके मजबूत इरादे का परिचय देता है।

V!Vs said...

aapne bahut achhe se likha h ye.......sach me bahut achha.