Thursday, March 18, 2010

सपनो के शहर मुंबई में सच होता एक सपना



आज Mumbai Mirror (लोकल अखबार) में एक खबर पढ़ी तो सोचा आप सब से बाँट लूँ. आजकल अखबारों में हत्या,लूटपाट,धोखा धडी की ख़बरों से ऐसा पटा होता है कि ऐसी कोई खबर पढो तो लगता है हाँ ज़िन्दगी सांस ले रही है. उम्मीद मिटी नहीं है.ईमानदारी, मानवता सब इस दुनिया में शेष हैं.अगर सपने देखो तो सच भी हो सकते हैं.

महादेव बिरादर जिसे सब प्यार से देवा बुलाते हैं. कर्नाटक के छोटे से गाँव से अपने पिता के साथ मुंबई चादर खरीदने आया था. उसके पिता मुंबई से चादरें खरीद कर ले जाते और गाँव गाँव घूम कर बेचते. जब दादर स्टेशन के पास उसने लोगों का ऐसा रेला देखा तो उस लगा कोई तो बात है इस शहर में जो लोग ऐसे खींचे चले आते हैं. और उसने निश्चय कर लिया कि वह भी अपनी किस्मत आजमाने जरूर आयेगा.

कुछ ही दिन बाद सिर्फ प्राइमरी पास २५ वर्षीय देवा एक छोटा सा बैग और आँखों में हज़ारो सपने लिए इस मायावी शहर में दाखिल हुआ. जैसा कि इन बाहर से आए युवकों के साथ होता है. वह भी फूटपाथ पर सोता और नौकरी ढूंढता. एक रेस्टोरेंट में उसे वेटर की नौकरी मिल गयी. वह पूरे लगन से काम करता. होठों पर मुस्कान सहेजे सबसे विनम्रता से पेश आता.

सड़क के पार एक रियल स्टेट का ऑफिस था.उसके मालिक रोज उस रेस्टोरेंट में आते.
वे देवा के व्यवहार से काफी प्रभावित हुए.. उन्होंने देवा को अपने ऑफिस के देखभाल की जिम्मेवारी सौंपी .क्यूंकि वे दूसरी जगह शिफ्ट हो रहें थे. देवा ने बहुत ईमानदारी से अपना काम निभाया. ऑफिस में करोड़ के करीब कैश पड़े रहते . क्यूंकि ये रियल स्टेट वाले लोग काफी रकम कैश में ही लेते हैं. लेकिन देवा ने कभी एक सौ का नोट भी नहीं छुआ. करीब एक साल बाद उन साहब ने अपना ऑफिस बेचने का फैसला किया. अब फिर से देवा के सड़क पर आ जाने के दिन थे. पर वे उसके काम और ईमानदारी से इतने खुश थे की उन्होंने थोड़ी रकम देवा को दी और कहा कि वो भी रियल स्टेट का काम शुरू करे. और अपना काम पूरे लगन और ईमानदारी करे. अपने एक मित्र के ऑफिस में उसे काम सीखने का अवसर भी दिया. मुंबई में फ़्लैट ,दुकान का खरीदना बेचना.किराये पर लेना. सब इन ब्रोकर्स के जरिये ही होता है. और खरीदने वाले और बेचने वाले दोनों को कुछ निश्चित रकम ब्रोकर्स को देनी होती है. इस काम में किसी शैक्षणिक योग्यता की जरूरत नहीं होती. बस काम की लगन, मेहनत और वाक्पटुता चाहिए होता है. देवा के पास इनमे से किसी का अभाव नहीं था. और एक साल के अंदर ही उसने एक साढ़े सात लाख की डील को अंजाम दिया. धीरे धीरे बस दो साल में बांद्रा के हिल रोड जैसे पौश इलाके में उसने अपना ऑफिस बनाया है. और हाल में ही एक घड़ी के शोरूम की डील, इलाके के सब रियल स्टेट्स वालों को पीछे छोड़ उसने हासिल कर ली .

उसके पुराने रेस्टोरेंट के मैनेजर "मारियो मेनेन्जस' का कहना है कि देवा के चलने बैठने ,खड़े होने का का अंदाज़ ही कुछ ही कुछ ऐसा था कि देखते ही लगता था उसमे काम करने के प्रति लगन है.. वह सिर्फ पेट भरने के लिए काम नहीं करता था बल्कि अपने काम को एन्जॉय भी करता था. जिन सज्जन ने देवा को पैसे दिए, उन्होंने अपना नाम बताने से इनकार कर दिया पर इतना कहा कि इतने पैसे यूँ खुले पड़े देख किसी का भी मन डोल सकता था पर इतनी कम उम्र में भी देवा के मन में कभी लालच नहीं आया.

पर वह अपने पुराने दिन नहीं भूला. उसने अपने साथ काम करने वाले वेटर्स को अपने ऑफिस में नौकरी दी है. और आज भी जब ए.टी. एम. के पास, जहाँ वह फूटपाथ पर सोता था.,गुजरता है तो एक मिनट को रुक कर उस जगह को जरूर याद कर लेता है.

जिनमे जज्बा हो, लगन हो, ईमानदारी हो,और जो परिश्रमी हों.उन्हें थोड़ी सी अच्छी किस्मत का साथ मिले तो , सफलता उनसे दामन नहीं छुड़ा पाती.

37 comments:

  1. रश्मि जी कहाँ से ढूंढ ढूंढ कर लाती हैं ऐसे लोगों को .....क्या सच में देवा जैसे इमानदार लोग होते हैं .....और रियल स्टेट के मालिक से नेक दिल इंसान भी ....??

    उनकी तसवीरें भी लगा देती ....जब इतने करीब से गुजरी हैं तो .......!!

    आपका यह कार्य बहुत ही सराहनीय है ....मेरा उन महानुभावों को नमन है ......!!

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  2. रश्मि जी आपकी पारखी नजर को सलाम है। अब सतयुग आने ही वाला है। चाहे कितने ही नोटों की मालाएं नेताओं को पहनाई जाएं पर वे हार ही पहनेंगे और ईमानदार सदा ही जीतेंगे जीवन के प्रत्‍येक मोर्चे पर नेकता के साथ।

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  3. अच्छा प्रेरक प्रसंग है.... काफी हिंदी फिल्मों से कहानी मेल खाती है...और आशा भी जगती है कि अगर जज्बा हो, मेहनत हो ,तो सपने साकार जरुर होते हैं.वो कहते हैं न ..
    .खुद ही को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले
    खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है.

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  4. @ हरकीरत जी,
    ये तस्वीर देवा की ही है थम्स अप करते हुए और साथ में हैं उसके पुराने साथी वेटर.
    उन सज्जन ने तो अपना नाम भी नहीं बताया, तस्वीर लेने की इजाज़त कहाँ से देते.

    आप लोगों को ये पोस्ट पसंद आई...सच सुकून आ गया...बहुत हिचकते हुए यह पोस्ट किया है...दोस्तों से भी सलाह ली कि करनी चाहिए या नहीं. क्यूंकि इसमें सृजनात्मकता नहीं थी कुछ भी.

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  5. @अविनाश जी,इसी इमानदारी नेकनीयती पर ही तो दुनिया चल रही है जिसमे नेतागण भी सांस ले रहें हैं.

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  6. @शिखा ,फिल्मे भी तो जीवन के उद्धरणों से ली गयी कहानियों पर ही बनती हैं.:)

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  7. Hi..
    Pure lekh ka saar antim para ke ek shabd main Nihit hai aur wo hai "KISMAT".. Kismat nahi to kuchh bhi nahi.. Koi imandari ya mehnat kam nahi karti puri tarah..bina eske..

    DEEPAK..

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  8. Hi..
    Pure lekh ka saar antim para ke ek shabd main Nihit hai aur wo hai "KISMAT".. Kismat nahi to kuchh bhi nahi.. Koi imandari ya mehnat kam nahi karti puri tarah..bina eske..

    DEEPAK..

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  9. प्रेरक प्रसंग है।

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  10. यही इस मायानगरी कि सच्चाई है.. मुझे भी कभी कभी मन में आता है कि उस मायानगरी कि माया देखने वही शिफ्ट हो जाऊं.. :)

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  11. बहुत ही प्रेरक कहानी है देवा की. आज के युग में भी ऐसे ईमानदार लोग होते हैं. अगर न होते तो ये दुनिया कब की गर्त में चली गयी होती.

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  12. padh kar man khil khil gaya

    shukriya !

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  13. रश्मि जी आपके ऐसे लेख आगे ब्लोग लेखन की दिशा और दशा तय करेगे. देवा कोई मिथक नही है और ये तो जमाना गर्त मे जा रहा है वरना ईमानदारी कोई गुण नही है. मुजेह जो चीज प्रभावित करती है वो है उसका अपने काम को प्यार करना और पूरा मन लगाकर काम करना. एक और बात देवा की लुभाती है कि उसे अपने बदहाली के दिन खूब याद है और इसे लेकर उसे कोई समस्या नही है. अपने पुराने दोस्तो के साथ हस्ना खेलन नही भूला है ये देवा. दीपक शुक्ल जी ने किस्मत पर ज्यदा जोर दिया है टीप मे. ये सच है कि किस्मत का भी बडा हाथ होता है सफ़लता मे लेकिन केवल किस्मत से भी कुछ नही होता.

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  14. बहुत सुंदर ओर ऎसे कर्मयोगी ही मंजिल तक पहुचते है. देवा को सलाम जी

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  15. जिनमे जज्बा हो, लगन हो, ईमानदारी हो,और जो परिश्रमी हों.उन्हें थोड़ी सी अच्छी किस्मत का साथ मिले तो , सफलता उनसे दामन नहीं छुड़ा पाती

    -बिल्कुल सही कहा..यही मूलमंत्र है सफलता का. अच्छा लगा देवा के बारे में पढ़ना..प्रेरक.

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  16. ईमानदारी पूर्वक परिश्रम से ही भाग्‍य बनता है। जिसने भी ऐसा किया है वह उच्‍च शिखर तक अवश्‍य पहुंचा है। प्रेर‍क कथानक देने के लिए बधाई।

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  17. बहुत प्रेरक प्रसंग है। धन्यवाद ।

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  18. प्रेरक प्रसंग.

    खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान..अपन बचपन से कहते आये हैं..और अगर सचमुच ईमानदार प्रतिभा और लगन हो तो फिर भाग्य भी साथ देता है!! है न!!!!!!

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  19. बहुत प्रेरक प्रसंग है....आज भी ऐसे ईमानदार और परिश्रमी लोग हैं जिनकी वजह से ये धरती टिकी हुयी है...देवा के बारे मैं जानकारी अच्छी लगी...

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  20. "जिनमे जज्बा हो, लगन हो, ईमानदारी हो,और जो परिश्रमी हों.उन्हें थोड़ी सी अच्छी किस्मत का साथ मिले तो , सफलता उनसे दामन नहीं छुड़ा पाती."
    और उन्हें अपने सपनों को सच करने में देर नही लगती।

    इस प्रेरक प्रसंग के लिये आभार

    प्रणाम स्वीकार करें

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  21. देवा ओ देवा -जिन्हें लम्बी पारी खेलनी होती है वे ऐसे ही होते हैं -प्रेरक प्रसंग !

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  22. कितने देवा इसी तरह से बिखरे पड़े हैं? बस इन गुदड़ी के लालों को पहचानने वाली आँखें चाहिए होती हैं. और उनको चुन कर हम तक पहुँचाने के लिए तुम्हारी जैसे इंसान की भी . अभी मानवीय गुणों से ये धरती खाली नहीं है और शायद इसके साथ ही संतुलन बना है, नहीं तो बेईमानी, घूस और शोषण करने वालों की संख्या अधिक है.

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  23. जरा सी किस्मत मेहनत और लगन से मिल जाए तो देवा बन जाती है ...
    दुनिया बहुत दुरंगी है ...मगर देवा जैसे इंसान भी जरुर मिल ही जाते हैं ...इसलिए मैं बार बार कहती हु कि अच्छा ढूंढे तो अच्छा मिल जाता है ...जब हम खुद को अच्छा समझते हैं तो क्या ईश्वर ने हमारे अलावा किसी को अच्छा बनाया ही नहीं ....?? किसी को भी बुरा कह कर कोसते रहने से कुछ हासिल नहीं होता ...हम उसको अच्छा बनने में कितनी मदद करते हैं ...यह भी मायने रखता है ....ठीक है कि कई बार धोखे में मिलते हैं मगर उम्मीद की किरण भी वही कहीं छिपी होती है ...

    बहुत प्रेरक कथा ....!!

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  24. बहुत प्रेरक प्रसंग है। धन्यवाद ।

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  25. देवा जैसे और भी लोग है मुम्बई मे जिन्होने संघर्ष किया है और आज वे उस मकाम तक पहुंचे है जहाँ पहुंचना उनका सपना था ।
    लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी है जिनका सपना पूरा नही हुआ और वे वक्त की गर्दिश मे खो गये ।
    यही है ज़िन्दगी .. ।
    अच्छा लगा .. मुम्बई मे तो ऐसी ढेर सारी कहानियाँ बिखरी पड़ी है .. आपकी कलम की राह देखती हुई ।

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  26. आपसे किसने कहा कि इसमे स्रजनात्मकता नहीं है ?कहानी के पूरे तत्व हैं इसमें । बस शिल्प और बेहतर हो सकता था लेकिन उसके लिये.... खैर नो भाषण.. ( इस टिप्पणी को प्रकाशित कीजियेगा , नो हाजमोला सर ..)

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  27. तरक्की करना वो भी ईमानदारी के साथ...बहुत बड़ी बात है...

    मुझे इस कहानी में अमिताभ की दीवार जैसा ही सशक्त प्लॉट नज़र आ रहा है...स्क्रीनप्ले ट्राई करने में कोई हर्ज़ नहीं...

    जय हिंद...

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  28. aapaka yah blog bhi apani uuchaiyo tak pahuche, yahi shubh kamana hai vaisebhagya aur purushharth dono hi saath saath chalte hain leki n kabhi kabhi ishwar bhidono ki pareechha leata hai khaikismat dhokha deti hai to kabhi karm .aur kabhi dono hi har jeet me badalate rahate hai.
    poonam

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  29. हा हा शरद जी, आपको ऐसा क्यूँ लगा, मैं यह टिप्पणी प्रकाशित नहीं करुँगी??..आलोचना का खुले दिल से स्वागत है. यही हमारे लेखन को परिष्कृत कर निखार लाता है. आप मेरी कहानियाँ तो पढ़ते नहीं. सारी मेहनत मैं वहाँ लगा देती हूँ.वहाँ शायद मेरी लेखन शैली (अच्छी ,बुरी या साधारण ) नज़र आएगी.
    इस ब्लॉग की पोस्ट्स मैं बड़ी जल्दी में लिख डालती हूँ,कई बार दुबारा पढने का वक़्त भी नहीं रहता. और यह आपकी पैनी नज़र से छुप नहीं सका. शुक्रिया, आगे से जरूर ख्याल रखूंगी और थोड़ा वक़्त यहाँ के लेखों को भी दूंगी.विडंबना यह भी है कि इसी ब्लॉग को ही ज्यादा लोग पढ़ते हैं. :(

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  30. aaj bhi imaandari khatm nhi huyi hai tabhi to is prathvi ka astitva hai jab sansaar se imandari ,dharm ka abhav ho jayega na tab ye prithvi bhi nhi bachegi.........aur aaj inhi logon ki badolat kafi log unhein dekhkar sikhte hain aur aage badhte hain.........bahut hi sundar aur prernadayi lekh likha hai.

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  31. देर से आने के लिये कोई सज़ा.......अगर तय हो, तो दे ही दो, अब माफ़ी मांगने का मुंह भी नहीं रहा.
    रश्मि जी, बहुत ही प्रेरक संस्मरण. ऐसे जीवट और नैतिक मूल्यों को सम्हाले रखने वाले लोग ही अपना और दूसरों का भविष्य संवार पाते हैं.

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  32. Sach kaha di, mehnat aur Imaandari ke alawa safalta pane ka koi aur vikalp nahin. prenadayak lekh ke liye shukriya.. :)

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  33. rashmiji
    aise imandar logo se prichy krvane ka bahut bahut dhnywad .vaise mumbai ko logo ne yu hi bdnam
    kar rkha hai,par imandari aur mehnt jitna vahn ke logo me hai kahi nahi ?

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  34. रश्मि जी तस्वीर पहले दिखाई नहीं दी थी ......बड़ा भोला सा प्यारा सा लड़का है ......सच्चाई के साथ हमेशा भगवान होता है ......ऐसे लोगों को पाप धोने के लिए पूजा पाठ की जरुरत नहीं होती .....मन सच्चा तो कठौती में गंगा .....!!

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  35. abhi bhi is tarh ke log hai is duniya me
    tabhi to hu m ji paa rahe hai
    saadar
    praveen pthik
    9971969084

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  36. कुछ ऐसे पोस्ट ढूंड कर पढता हूँ मैं.

    सार्थक ब्लोगरी यही है... ब्लोगरी वह मंच हैं जहाँ मौलिक और सहज प्रस्तुति को सभी सम्मान देते हैं.
    लक्ष्य ऊँचा हो और लगन ईमानदारी हो तो कुछ बेहतर जरुर मिलता है.

    मुझे आश्चर्य होता है जब अधिकाँश लोग ऐसा बोलते हैं " आज भी ऐसे अच्छे लोग हैं दुनिया में.." असल में लोग डरे हुए हैं और हिम्मत नहीं दिखाते हैं....

    मैं आज से पांच-छ साल पहले अपने छोटे से शहर में किराये पर P.C.O लेकर पहली कमाई(मासिक हज़ार के आस पास) शुरू की. साथ ही कम्प्यूटर सिखा फिर पड़ोस के शहर में कम्प्यूटर टीचर बना. तकनिकी शिक्षा की अदम्य इच्छा ने दिल्ली भेज दिया. आज वेब डेवलपमेंट से जुड़ा हूँ. कंपनी खोलने के लिए संघर्ष जारी है. भविष्य में अपने शहर में इंजीनियरिंग कालिज खोलने का भी सपना है. विपरीत परिस्थिति में भी लेखन के शौक को कभी मरने नहीं दिया सो ब्लागिंग भी जारी है.

    बहरहाल मैं देख रहा हूँ, आप नियमित अच्छे तरीके से ब्लोगरी कर रही हैं. ऐसे ही जनजागरण करते रहिये. शुक्रिया !!

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  37. देवा की लगन को सलाम, शुक्रिया आपका की हमें उनके बारे में जानने को मिला.

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