शनिवार, 3 नवंबर 2012

कशमकश


ओह!! कितना मिस किया अपने ब्लॉग को , शायद ही  कभी दो पोस्ट के बीच इतना लम्बा अंतराल आया हो . कई विषय मन में उमड़ते घुमड़ते रहे पर सख्ती से उन्हें रोक दिया, कुछ ज्यादा ही सख्ती करनी पड़ी क्यूंकि आदत जो पड़ गयी है, जो मन में आया, ब्लॉग पर उंडेल  देने की ,loud thinking  में जैसे बोल बोल कर के सोचते हैं,वैसे ही हम लिख लिख कर सोचते हैं :)


पर कुछ ऐसे काम में व्यस्त थी ....और इतने सारे डेड लाइंस थे .{अभी भी बाकी हैं :(}...कि ब्लॉग का ही समय चुराना पड़ा, सिर्फ अपने ब्लॉग का ही नहीं पूरे ब्लॉगजगत का। किसी की पोस्ट पढना मुमकिन नहीं हुआ। अभी भी बस कुछ समय का ब्रेक ही लिया है . 7 तारीख के बाद पूरी तरह फ्री तो हो जाउंगी पर तब दीवाली सर पर होगी। और मैं हूँ कि  जितने विषय दिमाग में आ रहे हैं,उन्हें नोट कर के भी नहीं रख रही कि  बाद में उन पर लिख पाऊं. अपनी स्मृति पर कुछ  ज्यादा ही भरोसा हो चला है। कुछ भूल गयी तो :(

खैर फिलहाल भी पोस्ट लिखने का वक़्त तो नहीं मिला पर ख्याल आया अपनी पहली पोस्ट का जो एक  कहानी थी ...जिसे तीन साल पहले पोस्ट की थी और काफी कम लोगों ने पढ़ी थी 

तो मुलाहिजा फरमाएं :)


                                       कशमकश  (कहानी )


आँखें खुलीं तो पाया आँगन में चटकीली धूप  फैली है। हड़बड़ा कर खाट से तकरीबन कूद ही पड़ा लेकिन दुसरे ही क्षण लस्त हो फिर बैठ गया. कहाँ जाना है उसे? किस चीज़ की जल्दबाजी है भला? आठ के बदले ग्यारह बजे भी बिस्तर छोडे तो क्या फर्क पड़ जायेगा? बेशुमार वक़्त है उसके पास पूरे तीन वर्षों से बेकार बैठा आदमी. अपने प्रति मन वितृष्णा से भर उठा. डर कर माँ की ओर देखा,शायद कुछ कहें, लेकिन माँ पूरे मनोयोग से सब्जी काटने में लगी थीं। . यही पहले वाली माँ होती तो उसकी देर तक सोये रहने की आदत को न जाने कितनी बार कोसते हुए उसे उठाने की हरचंद कोशिश कर गयीं होतीं और वह अनसुना कर करवटें बदलता रहता. लेकिन अब माँ भी जानती है कौन सी पढाई करनी है उसे और पढ़कर ही कौन सा तीर मार लिया उसने? शायद इसीलिए छोटे भाइयों को डांटती तो जरूर हैं पर वैसी बेचैनी नहीं रहती उनके शब्दों में.

थोडी देर तक घर का जायजा लेता रहा.आँगन में नीलू जूठे बर्तन धो रही थी. जब जब नीलू को यों घर के कामो में उलझे देखता है एक अपराधबोध से भर उठता है. आज जो नीलू की उंगलियाँ स्याही के बदले राख से सनी थीं और हाथों में कलम की जगह जूठे बर्तन थमे  थे उसकी वजह वह ही था.. एक ही समय उसे भी फीस के लिए पैसे चाहिए थे और नीलू को भी.(वरना उसका नाम कट जाता) उसी महीने लोकमर्यादा निभाते दो दो शादियाँ भी निपटानी पड़ी थीं. एक ही साथ इतने सारे खर्चों का बोझ ,पिता के दुर्बल कंधे सँभालने में असमर्थ थे और नीलू का स्कूल छुडा दिया गया।. तय हुआ वह प्रायवेट परीक्षाएं दिया करेगी।  बुरा तो उसे बहुत लगा था पर सबके साथ साथ उसके मन में भी आशा की एक किरण थी कि उसका तो यह अंतिम वर्ष है. अगले वर्ष वह खुद अपने पैरों पे खडा हो सकेगा और नीलू की छूटी पढाई दुबारा जारी करवा सकेगा.किन्तु उस दिन को आज तीन साल बीत गए और ना तो वह ऑफिस जा सका ना नीलू स्कूल.

जबकि पिता बदस्तूर राय क्लिनिक से सदर हॉस्पिटल और वहां से आशा नर्सिंग होम का चक्कर लगाते रहे . सोचा था नौकरी लगने के बाद पहला काम अपने पिता की ओवरटाइम ड्यूटी छुड़वाने की करेगा.पर ऐसे ही जाने कितने सारे मंसूबे  अकाल मृत्यु को प्राप्त होते चले गए और वह निरुपाए खडा देखते रहने के सिवा कुछ नहीं कर सका. क्या क्रूर मजाक है? स्वस्थ युवा बेटा तो दिन भर खाट तोड़ता रहे और गठिया से पीड़ित पिता अपने दुखते जोडों सहित सड़कें नापते रहें. जब जब रात के दस बजे पिता के थके क़दमों की आहट सुनता है, मन अपार ग्लानि से भर उठता है। 

उसे जागते हुए देखकर पिता पूछते हैं, "अरे! सोया नहीं अभी तक"  और वह कट कर रह जाता है। जी करता है, 'काश आज बस सोये तो सोया ही रह जाए.' पर यहाँ तो मांगे मौत भी नहीं मिलती. कई बार आत्महत्या के विचार ने भी सर उठाया लेकिन फिर रुक जाता है. जी कर तो कोई सुख दे नहीं पा रहा. मर कर ही कौन सा अहसान कर जाएगा? बल्कि उल्टे समाज के सिपहसलारों के व्यंग्यबाणों  से बींधते रहने को अकेला छोड़ जायेगा अपने निरीह माता पिता को .

सारी मुसीबत इनकी निरीहता को लेकर ही है. क्यूँ नहीं ये लोग भी उपेक्षा भरा व्यवहार अपनाते? क्यूँ इनकी निगाहें इतनी सहानुभूति भरी हैं? क्यूँ नहीं ये लोग भी औरों की तरह उसके यूँ निठल्ले बैठे रहने पर चीखते चिल्लाते..क्यूँ नहीं पिता कहते कि वह अब इस लायक हो गया है कि  अपना पेट खुद पाल सके,कब तक उसका खर्च उठाते रहेंगे?..क्यूँ नहीं माँ तल्खी से कहती कि 'रमेश,विपुल,अभय सब अपनी अपनी नौकरी पर गए,वह कब तक बैठा रोटियां तोड़ता रहेगा?'...क्यूँ नहीं कोई काम बताने पर नीलू पलट कर कहती 'क्या इसलिए पढाई छुडा घर बैठा दिया था कि जब चाहो चाय बनवा  सको.'..पर ये लोग ऐसा कुछ नहीं कहते . हर बात संभाल -संभाल कर पूछी जाती है, ताकि उसे अपनी बेचारगी का बोध न हो। पर उन्हें इसका ज़रा भी इल्हाम नहीं कि  उसमें किस कदर आत्महीनता भर गयी है। बात बात में हीन भावना से ग्रस्त  हो उठता है। कहाँ चला गया उसका वह पुख्ता आत्मविश्वास? वह बेलौस व्यवहार ? हर किसी से आँखें चुराता फिरता है, आखिर क्यूँ ? सारे दोष खुद में ही नज़र आते हैं । लगता है कोई गहरी कमी है, उसके व्यक्तिव में। पर अगर ऐसा होता तो स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक सबकी जुबान पर उसका नाम कैसे होता । आज  भी पुराने प्रोफेसर्स मिलते हैं तो कितने प्यार से बातें  करते हैं। लेकिन वह है कि  ठीक से जबाब तक नहीं दे पाता , उनसे बातें करते हुए सोचता है , कब टलें  ये लोग?

 वरना रितेश से कतरायेगा ,ऐसा सपने में भी सोच सकता था ,भला। वही पिद्दी सा रितेश जो कॉलेज में उसके चमचे के नाम से जाना जाता था। उसके आगे-पीछे घुमा करता और हर वक़्त उसके मजाक का निशाना बना रहता था। 
सामने से रितेश आ रहा है और उसकी निगाहें बेचैनी से किसी शरणस्थल की  खोज में भटकने लगीं। लेकिन सामने तो सीधी सपाट सूनी सड़क फैली थी। गली तो दूर कोई दरख़्त भी नहीं ,जिसके पीछे छुप पीछा छुड़ा सके। इसी ऊहापोह में था कि  रितेश सामने आ गया।

"हल्लो अनिमेष...कैसे हो ??"... कहते गर्मजोशी से हाथ मिलाया। बदले में वह बस दांत निपोर कर रह गया। 
"इधर दिखते नहीं  यार... कहीं बाहर थे क्या?
"नहीं यहीं तो था " अटकते  हुए किसी तरह कहा उसने।
और अगला सवाल वही हुआ, जिस से बचने के लिए पैंतरे बदल रहा था। 
"क्या कर रहे हो आजकल ?"  रितेश ने पूछा। क्या बताये, बेरोजगार शब्द एक गाली सा लगता है, उसे। 
जब वह चुप रहा तो रितेश ने कहा, "चलो तुम्हे कॉफ़ी पिलाते हैं, फिर ऑफिस भी जाना है।"
'हाँ इसी जुमले के लिए तो कॉफ़ी की आदत दावत दी गयी थी। अब सुनाता रहेगा अपने ऑफिस, कलीग , बॉस ,  उनकी सेक्रेटरी के घिसे पिटे किस्से।
उसे चुप देख, रितेश ने फिर जोर डाला.." चलो न कॉफ़ी पीते हुए अपनी कोई नज़्म सुनाना , कॉलेज में तो बड़ी  मशहूर थीं तुम्हारी कवितायें... सुन कर जाने कितनी लडकियां आहें भरतीं  थीं।कोई ताजी हमें भी सुना दो । "
मन हुआ बुरी तरह झिड़क दे। पिता बड़े ओहदे पर हैं, जम्हाइयाँ लेने को एक कुर्सी मिल गयी है तभी ये कवितायें सूझ रही हैं। मेरी तरह चप्पलें चटकानी पड़ें तो पता चले ये  पूछने का अर्थ क्या है। पर उलट में बस इतना कहा , " एक दोस्त को सी ऑफ करने जा रहा था। उसके ट्रेन का टाइम  हो चला है। मिलते हैं फिर कभी "
" ओके दोस्त, टेक केयर"..  कहता हाथ हिलाता रितेश चला गया।

लेकिन रितेश के जाने के बाद जी भर कर गालियाँ दीं  खुद को। आजकल एक यही काम तो जोर शोर से हो रहा है। आखिर इस तरह हीन  भावना से ग्रस्त होने की क्या जरूरत थी। क्या वह देखने में भी अच्छा नहीं रहा। नहीं नहीं शारीरिक सौष्ठव में तो वह अब भी कम नहीं पर चेहरे का क्या करेगा जिस  पर हर वक़्त मनहूसियत की छाप लगी रहती है। 

और लोग हैं कि  सहानुभूति दिखाने से बाज़ नहीं आते ... नुक्कड़ के बनवारी चाचा हों या कलावती मौसी, नज़र पड़ते ही बड़ी चिंता से पूछेंगे ."कहीं कुछ काम बना? " पता नहीं उसे इन शब्दों में दया की भावना नज़र आ जाती है और वह बिना जबाब दिए आगे बढ़ जाता है। घर से निकलने का मन ही नहीं होता...और आजकल तो निकलना और भी दूभर क्यूंकि रूपा मायके आयी हुई थी वही रूपा जिसके साथ जीने मरने की कसमे खाई थीं. रूपा में तो बहुत हिम्मत थी....इंतज़ार करने... साथ भाग तक चलने को तैयार थी. पर वही पीछे हट गया ,कोई फिल्म के हीरो हेरोईन तो नहीं थे दोनों कि जंगल में वह लकडियाँ काट कर लाता और सजी धजी रूपा उसके लिए खाना बनाती. रूपा की शादी हो गयी ,एक नन्हा मुन्ना भी गोद में आ गया, कई मौसम बदल गए पर नहीं बदला रूपा की आँखों का खूनी रंग...आज भी कभी उसपर नज़र पड़ जाए तो रूपा की आँखे अंगारे उगलने लगती हैं.

शुक्र है, उसे हर तरफ से नकारा पाकर भी माँ पिता की आँखे प्यार से उतनी ही लबरेज रहती हैं. हर बार कोई नया फार्म या परीक्षा देने के लिए राह खर्च मांगते समय कट कर रह जाता है पर पिता उतने ही प्यार से पूछते हैं. "कितने चाहिए." और दस पांच ऊपर से पकडा देते हैं "रख लो जरूरत वक़्त काम आएंगे "..वह तो तंग आ चुका है इंटरव्यू देते देते. लेकिन इंटरव्यू का नाम सुनते ही परिवार में उछाह उमंग की एक लहर सी दौड़ जाती है. नीलू दरवाजे के पास पानी भरी बाल्टी रख देती है. नमन भागकर हलवाई के यहाँ से दही ले आता है. माँ टीका करती हैं. वार के अनुसार 'धनिया, गुड, राई देती हैं। अगर वह पहले वाला अनिमेष होता तो इन सारे कर्म कांडों की साफ़ साफ़ खिल्ली उड़ा चलता बनता। अब सर झुकाए सब सह लेता है। शायद यही सब मिलकर उसके रूठे भाग्य को मना सकें। लेकिन हठी बालक सा उसका भाग्य अपनी जगह पर अड़ा  रहता है। वह इन सारे हथियारों से लैस  होकर जाता है और हथियार डालकर चला आता है। . पता चलता है ,चुनाव तो पहले ही कर लिया गया था.इंटरव्यू तो मात्र एक दिखावा था.लेकिन अब आजीज  आ गया है वह। जब भी कोई नया इंटरव्यू कॉल आता है, सबके चेहरे पर आशा की चमक आ जाती है। बुझा मन लिए लौटता है तो पूछता तो कोई नहीं। सब उसके चेहरे से भांपने की कोशिश करते हैं। नीलू , नमन , माँ , सब आस-पास मंडराते रहते हैं। आखिर वह सच्चाई बताता है और सबकी  आँखों में जल रही आशा ,अपेक्षा की लौ दप्प से बुझ जाती है. माँ  एक गहरा निश्वास लेती है। पिता अपने दोनों हाथ उठा कर कहते हैं, "होइहे वही जो राम रची राखा। " पर अब उसने सोच लिया उसे इन सारी स्थितियों का अंत करना ही होगा. किसी को कुछ नहीं बताएगा . बार-बार अपराधबोध से ग्रस्त होने की मजबूरी से खुद  को उबारना ही होगा। अब घर में तभी बताएगा जब पहला वेतन लाकर माँ के हाथों पर  रख देगा.


ट्यूशन लेकर लौटा तो नीलू की जगह माँ ने खाना परोसा और देर तक वहीँ बैठीं रहीं तो लगा कुछ कहना चाहती हैं. खुद ही पूछ लिया --"क्या बात है,माँ?"
"नहीं ...बात क्या होगी "...माँ कुछ अटकती हुई सी बोल रही थीं..."अगले हफ्ते से नीलू के दसवीं के इम्तहान हैं." नीलू प्रायवेट से दसवीं कर रही थी, बहुत मेहनत  करती थी लड़की। वो भी उसे पढ़ा देता था उसे पूरा विश्वास था नीलू फर्स्ट डिविज़न से पास होगी।  माँ ने आगे बोला, "सेंटर दूसरे शहर पड़ा है. रहने की तो कोई समस्या नहीं,चाचाजी वहां हैं ही पर लेकर कौन जाए?.पिताजी को छुट्टी मिलेगी नहीं...और  मिल भी जाए तो पैसे कटेंगे , वो भारी पड़ेगा। मैं साथ चली भी जाऊं पर वहां नीलू को एक्जाम सेंटर रोज लेकर कौन जायेगा...मेरे लिए वो शहर नया है...वैसे भी अकेले आने-जाने की आदत नहीं " फिर माँ  ने बड़े संकोच से पूछा "तेरा कोई इम्तिहान तो नहीं ...तू जा सकता है?"

वह तो माँ के पूछने के पहले ही खुद को प्रस्तुत कर देना चाहता था ,पर एक समस्या थी...एक परीक्षा वह घर में बिना बताये दे आया था। लिखित परीक्षा उत्तीर्ण कर गया था और इंटरव्यू भी दे आया था। इंटरव्यू काफी अच्छा  हुआ था . लेकिन यह बात कहे कैसे? .कह देगा तो वही आशाएं ,अपेक्षाएं सर उठाने लगेंगी। जिनसे भागना चाह रहा था ...और फिर नौकरी नहीं मिली तो सबकी आशाएं बुझ जायेंगीं। नहीं अब और उम्मीदें नहीं दिलानी उन्हें। फिर से निराशा की खाई में गिरते उन्हें नहीं देख पायेगा .अब तक तो नौकरी मिली नहीं इस बार ही मिल जायेगी इसकी क्या गारंटी है। अब इस स्थिति से उबारना ही होगा खुद को। और नीलू के भी बोर्ड के इम्तहान हैं .पहले ही उसकी वजह से वह तीन साल से स्कूल छोड़ घर बैठी हुई थी. 

तय कर लिया कुछ नहीं बतायेगा, माँ की आँखे उसपर टिकी थीं.
बोला--"चिंता मत करो माँ, मैं लेकर जाऊंगा "

सामान संभालते हुए भी कई बार जी में आया ,जाकर कह दे। दरवाजे तक गया भी फिर जी कडा कर लौट आया। नहीं अब और बेवकूफ नहीं बनाना उसे। बहुत हो गया तमाशा। कितनी बार तो दे चूका  है इंटरव्यू। कब आया अप्वाइंटमेंट लेटर ? और वह नीलू को लेकर इम्तहान दिलवाने चला गया। 

पूरे पंद्रह दिन बाद लौटा , चाचा चाची और उनके बच्चों के साथ अच्छा समय बिताया, नया शहर बहुत रास आया उसे। जिधर चाहे निकल जाओ। न पहचाने चेहरे न पहचाने सवालों से टकराने का  डर .
घर पर आकर सामान रखते ही माँ  एक लिफाफा  लेकर आयीं ।

"देख तो नौकरी का कागज़ है क्या? " 

उसने कांपते हाथों  से लिफाफा खोला । और पंक्तियों पर नज़र पड़ते ही स्तंभित रह गया। चेहरा सफ़ेद पड़  गया। कंधे झूल आये। कागज़ हाथों से गिर पड़ा।

कैसे कहे  , " ज्वाइनिंग डेट बीत गया इसका "

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

गलतियाँ करने की इजाज़त भी उतनी ही जरूरी


कुछ दिनों से अखबारों में पढ़ी कुछ ख़बरों ने मस्तिष्क में उथल-पुथल मचा रखी है ...न तो उस विषय पर लिखना मुमकिन हो पा रहा है और न ही वो विषय किसी और विषय पर लिखने की इजाज़त दे रहा है।  हाल में ही कुछ  ख़बरें ऐसी आयीं जहाँ 21,22 वर्ष के बच्चों ने कच्ची उम्र में बेवकूफी भरा कदम उठा कर इस दुनिया को अलविदा कह दिया 

यह विषय इतना परेशान करता है कि  अब तक इसपर कई  पोस्ट लिख चुकी हूँ। फिर भी  समझ नहीं आ रहा आखिर ऐसा क्या हो कि  सबकुछ ठीक हो जाए। कोई भी ज़िन्दगी से हार कर ऐसा कदम उठाने को उद्धत न हो। 
दरअसल , मरना तो कोई भी नहीं चाहता पर जिनसे दर्द नाकाबिले बर्दाश्त हो जाता है, उन्हें कोई और राह नहीं सूझती। उन्हें इस दर्द से बचने का एक ही हल नज़र आता है, आत्महत्या .सबकी सहनशक्ति अलग अलग होती है।

पर जो लोग काफी दिनों से डिप्रेशन में हों ,निराश हों उनकी  सहायता के लिए मनोवैज्ञानिकों ने कई उपाय सुझाए  हैं। 

अगर कोई आत्महत्या की धमकी दे या आत्महत्या  की चर्चा करे तो कभी ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि गरजने वाले बादल बरसते नहीं हैं। कितने भी मजाक में यह बात कही गयी हो पर उसके अन्दर का आंशिक सच ये होता है कि  उस व्यक्ति के दिमाग में यह चल रहा है .

यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि  जिसने मरने की ठान ही ली थी,उसे रोका नहीं जा सकता था । कोई भी व्यक्ति मरना नहीं चाहता बस ये चाहता है कि वो उस कष्ट और उस दर्द से छुटकारा पा जाए और मरने के सिवा उसे इस दर्द से छुटकारे का कोई रास्ता नज़र नहीं आता। पर अगर उसे हलकी सी भी रौशनी दिखे तो वो ऐसे कदम उठाने से  बच सकता है। 

कई बार कोई दोस्त/रिश्तेदार/पडोसी चुप्पी ओढ़ ले, बात न करना चाहे तो उसकी मर्जी जान कर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है कि  उसकी मनस्थिति जब अच्छी  होगी तो वो खुद बात करेगा। पर ये गलत है, उसके करीबी लोगों को अपने अहम् की परवाह किये बिना चाहे वो जितनी बार भी हाथ झटके, मदद के हाथ बढाने से बाज नहीं आना चाहिए। 
(फिल्म परदेस का ये डायलॉग मुझे हमेशा पसंद आता है "अगर कोई दोस्त दरवाजा बंद कर अन्दर बैठ जाए तो हम  भारतीय उसे उसके हाल पर अकेला नहीं छोड़ते ,दरवाजा तोड़ कर अन्दर घुस जाते हैं " पर भारत के सन्दर्भ में भी अब यह सच नहीं रहा। लोग अपने आप में सिमटते जा रहे हैं )

अगर कोई बहुत निराश हो और बार बार कहे कि जीने की इच्छा नहीं रही तो उसे से सीधा पूछ लेना चाहिए 'तुम आत्महत्या की तो नहीं सोच रहे न ??" ऐसा पूछना, उसे आत्महत्या के आइडियाज़ देने जैसा नहीं है बल्कि  उसे खुलकर उस विषय के दोनों पहलुओं पर बात करने का मौका देने जैसा है।

आत्महत्या के लिए प्रेरित व्यक्ति कोई न कोई इशारा जरूर देता है। जरूरत है ,उसके आस-पास वालों को इस इशारे को समझने की। 

आत्महत्या के विषय में बात करना,ये कहना कि  ज़िन्दगी से तंग आ गया हूँ, कोई रास्ता नहीं सूझता। काश ! पैदा ही नहीं हुआ होता ..
मरने के तरीके की चर्चा करना।
मृत्यु  से समबन्धित कहानी और कवितायें लिखना। 
ये सोच लेना  कि अब कुछ नहीं हो सकता, भविष्य अंधकारमय है 
खुद में हीन भावना भर जाना ,अपने को किसी काम के लायक न समझना, खुद से ही घृणा करना 
अपनी प्रिय चीज़ें लोगों में  बांटने  की बात करना।।
अपनी वसीयत  तैयार करना। 
अगर काफी दिनों के निराशा  और अवसाद के बाद अचनाक से कोई बहुत खुश दिखने लगे तब भी समझना चाहिए कि  उसके मन में कुछ चल रहा है।

ये सब  सिर्फ इशारे नहीं हैं बल्कि इसे मदद की पुकार समझा जाना चाहिए 

डिप्रेशन के शिकार व्यक्ति से ये सब कहकर बात की शुरुआत  की जा सकती है कि 
'तुम्हारी चिंता हो रही है।
तुममे कुछ परिवर्तन दिख रहा है।
अब तुम पहले जैसे नहीं हो 
मैं तुम्हारे साथ हूँ अपनी चिंता मुझसे बाँट सकते हो।
मैं  तुम्हारा दर्द बाँट नहीं सकता पर समझ सकता हूँ कि  तुम किस दौर से गुजर रहे हो।
बहुत तरह से मदद की जा सकती हैं।जरूरी नहीं कि  सही शब्द ही कहे जाएँ पर आवाज़ में  चिंता और व्यवहार बता देता है कि  अमुक चिंतित है ,उसके लिए। 

गहरे अवसाद में जो हो उसे कभी भी लेक्चर नहीं देना चाहिए कि 
 ज़िन्दगी कितनी अमूल्य है। वो गलत कर रहा है .
उसके ऐसे कदम के परिणाम क्या होंगे . 
उस व्यक्ति को बहुत ही प्यार से समझाने की कोशिश करनी चाहिए  कि उसके बिना किन लोगों को फर्क पड़ेगा। वो ज़िन्दगी में कितना कुछ कर सकता है।
कोशिश करनी चाहिए कि  वो किसी साइकियाट्रिस्ट से मिले। हमेशा उसके संपर्क में रहना चाहिए। वो न मिलना चाहे फिर भी उस तक पहुँचाने की हर कोशिश करनी चाहिए। 

कुछ दिनों से ही विषय पर लिखने की की सोच रही थी और आज ही  Mumbai Mirror अखबार  में एक हेल्पलाइन के विषय में विस्तार से जानकारी दी गयी है। जहाँ 24 घंटे चार युवा clinical psychologist सहायता के लिए तत्पर रहते हैं। उनका कहना है कि लोग कॉल इसीलिए करते हैं क्यूंकि वो जीना चाहते हैं और कहीं से भी एक आश्वासन चाहते हैं कि 'दुनिया जीने लायक है ,उनके पास भी जीने का कोई कारण है।'
एक महिला का उदाहरण बताया गया है . उसने फोन किया कि ' " उसने फांसी का फंदा तैयार कर लिया है बस अपने पति के ऑफिस जाने की प्रतीक्षा कर रही है।" 
इतना कहकर उसने फोन काट दिया। इनलोगों ने उसे कॉल बैक किया तो फोन स्विच ऑफ मिला। आधे घंटे तक की लगातार कोशिश के बाद उस महिला ने फोन उठाया। उसे शिकायत थी कि  पति घर से बाहर  नहीं जाने देते। नौकरी नहीं करने देते आदि .उसकी एक छोटी बेटी भी थी। इनलोगों ने उसकी बेटी के विषय में पूछा।बेटी को क्या पसंद है।वो कैसी  शरारतें करती है। उसे वो कैसे संभालती हैं।
उस से ये नहीं कहा कि उनके जाने के बाद बेटी का क्या होगा बल्कि यह सब पूछकर उनलोगों ने उसके सामने बेटी की तस्वीर ला दी। और वो खुद समझ गयी कि बेटी उसकी जिम्मेवारी है। फिर उसे अपनी ज़िन्दगी बेहतर बनाने के कई सुझाव दिए। उसने भी स्वीकार किया कि वो मरना नहीं चाहती थी पर ज़िन्दगी से निराश हो गयी थी .ये लोग बाद में भी कॉल करके उसका हाल लेते रहे .

ये कुछ हेल्पलाइन के फोन नंबर हैं -- Vanderwala Foundation --1860 266 2345 And  022 25706000 . Aasra helpline --91-22-27546669..I Call  Helpline --91-22-25563291


पर ये सारे उपाय उनलोगों के लिए हैं जो काफी दिनों से डिप्रेशन में हों। पर कई केस ऐसे भी होते हैं जहाँ क्षणांश में ऐसे घातक निर्णय ले लिए जाते हैं। 
हाल में ही अखबार  में एक खबर थी थर्ड इयर इंजीनियरिंग का एक स्टूडेंट कॉलेज की तरफ से टूर पर गया  था .वहाँ एक शिक्षक ने लड़कों के बैग की तलाशी ली . इस छात्र के बैग में एक सिगरेट मिली। शिक्षक ने पूछा, "क्या तुम्हारे पिता जानते हैं तुम सिगरेट पीते हो?"

उस छात्र के ना कहने पर उक्त शिक्षक ने उसके पिताजी को फोन कर दिया . और उसी रात उस लड़के ने छत से कूद कर आत्महत्या कर ली। 
अपनी एक पुरानी पोस्ट में जिक्र किया था, ' एक ग्यारह साल की लड़की ने अपनी नोटबुक में अपने क्लास के एक लड़के के लिए अपनी फीलिंग्स के बारे में लिखा था . माँ ने वो नोटबुक पढ़ ली। उन्होंने प्रिंसिपल से उसकी शिकायत कर दी . लड़की ने घर आकर ख़ुदकुशी कर ली।

यहाँ माँ और उक्त शिक्षक दोनों से इस मामले में थोड़ी संवेदनशीलता की दरकार थी। न इंजीनियरिंग के स्टूडेंट्स के पास से सिगरेट मिलने की बात अनहोनी थी न ग्यारह साल की लड़की के मन में ऐसे ख्याल आने की . पर उन दोनों वयस्कों की लापरवाही से दो मासूम जिंदगियां मिटटी में मिल गयीं।

कई बार ऐसा भी होता है कुसूर किसी का नहीं होता . एक परिचित का लड़का बहुत ही होनहार था .पूरे खानदान में उसकी प्रतिभा ,उसकी स्मार्टनेस के किस्से मशहूर थे। होटल मैनेजमेंट कर रहा था . उसके किसी साथी ने फोन  पर खबर दी कि  वो फेल हो गया है और इस लड़के ने तुरंत ही नौकर को किसी काम के बहाने बाहर भेज दिया, माँ  को पडोसी के यहाँ से कोई अखबार लाने के लिए कहा और खुद की इहलीला समाप्त कर ली।

यहाँ  सिर्फ अपने इमेज की बात होती है ,उस इंजीयरिंग के छात्र की इमेज घर में बहुत ही सुशील सज्जन लड़के की होगी, वो बर्दाश्त नहीं कर पाया कि उसके पैरेंट्स उसके विषय में ऐसा सोचें और पैरेंट्स की नज़रों में गिरने से ज्यादा बेहतर उसने मौत को गले लगाना समझा। यही बात उन परिचित के बेटे के साथ भी थी। आज भी उनका पूरा खानदान उस लड़के के विषय में बड़े गर्व से बात  करता है कि उस जैसा टैलेंटेड, स्मार्ट लड़का एक ही था, ख़ानदान  में पर अनजाने में ही उस लड़के के कन्धों पर अपेक्षाओं की कितनी बड़ी गठरी लाद  दी थी,इनलोगों ने, ये नहीं समझ पाते। उस गठरी का बोझ संभाले रखने की बजाय दुनिया छोड़ना उसे ज्यादा आसान लगा। 

ऐसी इमेज बनती कैसे है? बच्चे तो जिम्मेवार हैं ही। पर उनकी उम्र कच्ची  है। ज्यादा समझदारी पैरेंट्स को दिखानी है। इतनी ज्यादा उम्मीद अपने बच्चों से न लगाएं .उनके ऊपर ऐसे इमेज न थोपें। मैंने बहुत लोगो से कहते सुना है, "इतना तो विश्वास है मुझे अपने बेटे पर, ऐसा तो वो कर ही नहीं सकता।" विश्वास रखना बड़ी अच्छी  बात है। पर उसे थोडा सा सामान्य बने रहने की छूट भी दे दें। बच्चों के कम नंबर आने पर मैंने बच्चों से कई गुना उदास और निराश उनके माता-पिता को देखा है। 
एक मेरी  परिचिता बड़े गर्व से कहती  हैं, "मेरा  बेटा लड़ाई कर ले, किसी का सर फोड़ दे, मैं मान लूँ पर अगर  कोई कहे कि  किसी लड़की के साथ उसे देखा है, ये मैं नहीं मान सकती  वो तो लड़कियों से दूर भागता है। बात तक नहीं  करता ."
बड़ी अच्छी बात है .पर अगर कहीं उसे किसी से प्यार हो गया और माँ  ने देख लिया फिर तो उसके लिए डूब मरने की बात  ही हो जायेगी,न । 

बच्चे का प्रतिभावान होना, सज्जन होना, सुशील होना .चरित्रवान होना, आज्ञाकारी होना  हर पैरेंट्स के लिए गर्व की बात है पर उन्हें कभी -कभी गलतियां करने की इजाज़त भी दें . उन्हें सामान्य बने रहने भी दें .

ज़िन्दगी से बढ़कर कुछ भी नहीं। ज़िन्दगी रहेगी तभी गलतियां करके सुधरने का अवसर भी देगी।

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रविवार, 7 अक्टूबर 2012

कहीं देखा है,आपको...



ऐसा सबके साथ  ही होता है...कोई अनजान चहरा देखते ही लगता है....ये चेहरा  कहीं देखा है..जाना-पहचाना सा है. या फिर किसी को देखकर लोग कहें..'आपको कहीं देखा है' . अब ऐसे वाकये एकाध बार हों  तो वो सामान्य सी बात है...पर अगर बार-बार हो तो  फिर थोड़ा असहज लगता  है या  फिर आदत पड़ जाती है. 
 अभी हाल में ही गणपति पूजा के लिए एक नए पंडित जी घर आए. उन्होंने पूजा की तैयारियाँ करते हुए पूछा, "आप उस साईं मंदिर में हमेशा आती हैं ना? "
"कौन सा मंदिर ?"
"वही ब्रिज के पास जो  है..."
मैं समझ गयी उनकी ग़लतफ़हमी, पर हामी भरी.." हाँ..जाती हूँ."
वे खुश होकर बोले.."हां, मैने कई बार देखा है,आपको  "
जबकि सच ये है कि मुझे पता भी नहीं  वो मंदिर किधर है.
ये हामी भरनी अब सीखी है ,मैने...वरना पहले सीधा 'ना' कह देती थी. और अपना अंदाजा यूँ गलत होते देख लोगों की भृकुटी पर बल पड़ जाते थे.

कभी लोगो के इस मुगालते से मुझे फायदा भी होता था तो कभी लोगों की नाराज़गी भी झेलनी पड़ती थी. 

मुझे थोड़ा सा आश्चर्य होता था, जब मेरे बेटे के स्कूल के प्रिंसिपल मुझसे बड़ी आत्मीयता से बात करते. वरना प्रिंसिपल लोग कहाँ...स्टुडेंट्स के पैरेंट्स को इतनी तवज्जो देते हैं. पर मुझे हमेशा अच्छा ख़ासा समय देते और बात करते. बच्चों के बारे में भी बड़े विस्तार से पूछते . आखिर एक बार उन्होंने पूछ ही लिया.."आप नागपुर की रहने वाली हैं ना?"
"ना.."
"आप वहाँ.... रहती थीं ना..??" (किसी कॉलोनी का नाम लिया...जो मैं दूसरे पल ही भूल गयी..अब तक कहाँ याद रहेगा )
मेरे ये कहने पर कि 'मैं तो नागपुर कभी गयी भी  नहीं'.... बड़े आश्चर्य से भर कर उन्होंने सर हिलाया. कुछ सोचते रहे पर सज्जन व्यक्ति हैं..बाद में भी वही आत्मीयता बनाए रखी.  

पर मेरे दूसरे  अनुभव इतने अच्छे  नहीं रहे. ट्रेन में एक मोहतरमा मिलीं.परिचय का आदान-प्रदान हुआ...कुछ देर  बातचीत करने  के बाद.उन्होंने पूछा.."आप गोरखपुर की हैं..?"
मैने समझ गयी..थोड़ा हंस कर ही कहा.."नहीं."
"फिर आपके रिश्तेदार होंगे वहाँ...आप उनसे मिलने आयीं होंगी क्यूंकि आपको मैने वहाँ देखा है." 
मैने फिर जोर देकर कहा.."मैं कभी गोरखपुर नहीं गयी "
इस पर उस महिला ने मुहँ फुला लिया...और खिड़की से बाहर देखने लगीं...शेष यात्रा चुप्पी में कटी. उन्हें लगा, मैं झूठ बोल रही हूँ. 
ये तो फिर भी ठीक था..वे अजनबी थीं. कुछ देर का ही साथ था. एक बार तो एक 'ब्रैंड न्यू ' रिश्तेदार ही नाराज़ हो गए.
मेरी कजिन की शादी थी. दूल्हा-दुल्हन मंडप में बैठे रस्मे कर रहे थे. मैं बहनों में सबसे बड़ी हूँ..तो थोड़ा सब पर रौब जमा रही थी. फोटो वोटो  खींच रही थी. दुल्हे महाशय अक्सर मेरी तरफ देख लेते. मुझे यही लगता..'मैं शायद इतनी बातें कर रही हूँ..इसलिए वे कयास लगा रहे होंगे कि  मैं रिश्ते में कौन हूँ ?"

शादी के दूसरे दिन...जब इत्मीनान से सबलोग बैठे..परिचय का दौर शुरू हुआ..तो उन्होंने झट से पूछा.."आप दिल्ली में रहती हैं ना..?"
"ना मुंबई में...पर पहले दिल्ली में रहती थी.."
"हाँ, वही तो..मैने आपको दिल्ली में देखा है.."
फिर थोड़ी बातचीत के बाद चला...वे दिल्ली तब आए थे, जब मैने दिल्ली छोड़ दी थी.
वे फिर उलझन में पड़े,पूछा.."..आपके ममी -पापा कहाँ रहते हैं ?? " ये बताने पर कि  'पटना में,रहते हैं'....उनका चेहरा खिल गया.." अच्छाss...फिर  मैने आपको पटना में देखा होगा"
कुछ और बातें करने पर पता चला..रिटायरमेंट के बाद पापा  ने जब पटना में घर लिया तब तक वे जनाब पटना छोड़ 
दिल्ली जा चुके थे.
 पर अपने सारे कयास  गलत होते देख वे बुरी तरह झुंझला गए. रात भर जागने की थकान भी थी. और मेरे साथ इस तरह के वाकये कई बार  होने से मुझे हंसी भी आ गयी. जिसने उनके मूड को खुशनुमा बनाने में कोई योगदान नहीं दिया. वे भी मुहँ फिरा कर दूसरों से बातें करने में व्यस्त हो गए. 

पर इन दो वाकयों से मैंने सीख  लिया...कोई ऐसा कहे..तो हंस कर हामी भर दो.'.अपना क्या जाने वाला है'.:)

पटना साल में एक बार ही जाती हूँ..एक दिन सब्जी लेने गयी...सब्जी वाले को कहा.."अच्छी सब्जी देना."
 कहने लगा.."रोज ही तो मुझसे लेकर जाती हैं...मैने कभी खराब सब्जी दी है,आपको.?." मैं बस मुस्कुरा कर चुप हो गयी...कुछ नहीं कहा.

एक बार मुंबई में भी..मेरी सहेली...समुद्री मछली खरीद रही थी. उसे देने के बाद मछली वाले ने  मुझसे कहा .."आप नहीं लेंगी..आप भी लीजिये.."
सहेली के कहने पर कि ये तो मछली खाती ही नहीं...वो बोला.."क्या भाभी...हमेशा तो ये मुझसे मच्छी लेकर जाती हैं...हैं ना भाभी ? ."
मैने हामी भरी और कहा..'आज नहीं लेना है '
सहेली आश्चर्य से मुझे देख रही थी..मैने उसे चलने का इशारा किया...और फिर सबकुछ एक्सप्लेन किया.

पर ये सब देख कर मेरा मन बहुत रुआंसा हो जाता था, "मेरी इतनी साधारण शक्ल सूरत है...सबको लगता है..कहीं देखा हुआ है." फिर मन को समझाती रंग-रूप तो भगवान की देन  है,उसका क्या गिला करना....जो मिली है उस पर ही  संतोष करके अपने कर्म अच्छे रखो.

पर एक बार एक कहानी में कुछ पंक्तियाँ  पढ़ीं...और दिल सुकून से भर गया.उसमे कहानी के किसी एक पात्र का वर्णन करते हए लिखा था, .."कभी कभी भीड़  में भी कोई चेहरा अपना सा लगता है...देखते ही लगता है...इसे कहीं देखा है ..जाना पहचान चेहरा है. उस चेहरे से अपनापन झलकता है , कुछ ऐसा ही चेहरा था उसका. " (पता नहीं था..कभी ब्लॉग पर ये सब लिखूंगी..वरना..कहानी  और कहानी-लेखक का नाम जरूर याद रखती ) 

और जैसे मेरे खिन्न मन पर शीतल फुहारें पड़ गयीं. इस कथन में कितनी सच्चाई है, नहीं पता..पर मैने अपने दिल को बहलाने के लिए इसे बिलकुल सच मान लिया..:):)

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

यादों की रौशनी की उजास



मौजूदगी से गहरा , मौजूदगी का अहसास है
दूर जाकर, पता चले,  कोई कितने पास है .

सामने  जो  लफ्ज़  रह  जाते  थे, अनसुने
अब अनकही बातों को भी सुनने की प्यास है. 

बेख्याली में फिसल, उड़ गए, गुब्बारों से वो लम्हे
फिर  से  पास  सिमट  आएँ , ये कैसी  आस  है.

मिली होती मुहलत , करने को सतर, जिंदगी की सलवटें 
ना कर पाने की कसक, ज्यूँ दिल में गडी कोई फांस है.

तिमिर की कोशिश तो पुरजोर है,घर कर लेने की
पर दिल में, तेरी यादों की  रौशनी की उजास है. 


ये पंक्तियाँ लिखते वक्त 'वाणी गीत' याद आई...वो अक्सर मेरी कहानियों को पढ़कर कोई कविता रच देती है. 
कुछ ऐसा ही हुआ.सलिल जी की कहानी पढ़ने के पश्चात . जो भाव उपजे वो यूँ  शब्दों में ढल गए. 

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

उम्रदराज़ लोगों में लिव-इन रिलेशनशिप

जीवन के सांझ का अकेलापन, सबसे अधिक दुखदायी है. इसलिए भी कि जिंदगी की सुबह और दोपहर तो जीने की जद्दोजहद में ही बीत जाती है. सांझ ही ऐसा पडाव है,जहाँ पहुँचने तक अधिकांश जिम्मेदारियाँ पूरी हो गयी होती हैं. जीवन के भाग-दौड़ से भी निजात मिल जाती है और वो समय आता है,जब जिंदगी का लुत्फ़ ले सकें. सिर्फ अपने लिए जी सकें. अपने छूटे हुए शौक पूरे कर सकें. अब तक पति-पत्नी पैसे कमाने ,बच्चों को संभालने....सर पर छत का जुगाड़ और चूल्हे की गर्मी बचाए रखने की आपाधापी  में एक दूसरे का ख्याल नहीं रख पाते थे .एक साथ समय नहीं बिता पाते थे.और आजकल  उन्नत  चिकित्सा सुविधाएं ,अपने खान -पान..स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता ने लोगों की औसत आयु में काफी बढ़ोत्तरी कर दी है. स्त्री-पुरुष अपने जीवन की जिम्मेदारियाँ तो पूरी कर लेते हैं, पर मन और तन से सक्षम  रहते हुए भी,अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं. बच्चे अक्सर दूसरे शहरों में या विदेश में बस जाते हैं या फिर उनकी जिंदगी की दोपहर की कड़ी धूप इतना  हलकान किए रहती है कि माता-पिता के साए की ठंढी छाँव में , दो पल सुस्ताने की मोहलत  भी नहीं देती. 
खासकर महानगरों में यह समस्या ज्यादा है .अक्सर फ़्लैट में रहने की वजह से माता-पिता के साथ बच्चे  कम ही रहते हैं. 

 पर ऐसे में अगर एक साथी का साथ  छूट जाए तो दूसरे के जीवन में किस कदर अकेलापन घर कर लेगा,यह कल्पनातीत है . मुंबई जैसे महानगर में तो असहनीय ही है. सरकार की तरफ से कई कदम उठाये जा रहे हैं. वरिष्ठ  नागरिकों  के लिए एक हेल्पलाइन है. जहाँ दो पुलिसकर्मी चौबीसों घंटे लगातार फोन पर उपलब्ध रहते हैं. वरिष्ठ नागरिक उन्हें अपनी समस्याएं बताते हैं. ज्यादातर वे लोग सिर्फ कुछ देर तक  बात करना चाहते हैं. कभी कभी यह कॉल दो दो घंटे तक की हो जाती है. अपने युवावस्था के सुनहरे दिन, छोटी-मोटी तकलीफें, रोजमर्रा की मुश्किलें ,इन्ही सबके विषय में बात करते हैं,वे.

इन सबके बावजूद आए दिन , लूट-पाट के लिए वरिष्ठ नागरिकों  की ह्त्या की घटनाएं बढती जा रही हैं. अभी हाल में ही मुंबई पुलिस विभाग की तरफ से यह घोषणा की गयी है कि हर एक पुलिसकर्मी एक वृद्ध को adopt  कर लेगा. उनकी सुरक्षा...उनके आराम उनकी सुविधा का ख्याल रखेगा. हमेशा उनसे मिलकर उनका हाल-चाल लेता रहेगा. फिर भी ये कहा जा रहा है कि यह कदम शत प्रतिशत कारगर सिद्ध नहीं होगा क्यूंकि  वरिष्ठ नागरिकों की संख्या बहुत ज्यादा है, जबकि पुलिसकर्मियों की कम. फिर भी कुछ फर्क तो पड़ेगा.

कुछ वरिष्ठ नागरिक   जिनके बच्चे ज्यादातर विदेशों में हैं और अपने पैरेंट्स की देखभाल के लिए अच्छी रकम खर्च करने को तैयार रहते हैं. उनके लिए भी कुछ सुविधाएं हैं. सारी सुख सुविधा से परिपूर्ण 'ओल्ड एज होम्स ' हैं. जहाँ उनका अपना कमरा होता है.एक पर्सनल सर्वेंट होते/होती है. बढ़िया खान-पान की व्यवस्था ,स्वास्थ्य सुविधाएं, मनोरंजन के साधन और बातें करने को संगी-साथी भी होते हैं. करीब तीन लाख डिपोजिट और हर महीने सोलह हज़ार की रकम देनी पड़ती है. आम लोगों की तो इतना खर्च करने की हैसियत नहीं होती. पर हाँ,जिनके पास पैसे हैं, वे इन सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं. पर फिर भी एक ख्याल आता है..वहाँ बंधी बंधाई रूटीन होती है. एकरस दिनचर्या होती है. ज्यादातर लोग पूजा-पाठ में ही समय व्यतीत करते हैं. 
हमारे धर्म में भी चौथा आश्रम 'वानप्रस्थ' का कहा गया  है. पर कुछ ऐसा नहीं लगता जैसे बस अपने दिन गिन रहे हों ??..जाने का इंतज़ार कर रहे हों? पर  फिर यह भी है..देखभाल..सुखसुविधा...मनोरंजन..संगी-साथी भी मिल जाते हैं. 

पिछले  कुछ वर्षों से जीवन की इस शाम की गहराती कालिमा को कुछ कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं. २००१ में नातुभाई पटेल ने एक संस्था की स्थापना की जिसके द्वारा  अकेले पड़ गए वरिष्ठ नागरिकों के  शादी के प्रयास किए गए. कई जोड़ों ने ब्याह किए पर नातुभाई पटेल को यह देख बहुत दुख हुआ कि कई शादियाँ टूट गयीं, कहीं पुत्रवधू ने नई सास को नहीं स्वीकार किया ,कहीं संपत्ति का विवाद छिड़ गया. जब २०१० में सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता दे दी तो २०११ में 'श्री लक्ष्मीदास ठक्कर'  ने नागपुर में  'ज्येष्ठांचे लिव-इन रिलेशनशिप मंडल ' की संस्था द्वारा पुनः प्रयास किए कि वरिष्ठ नागरिक बिना विवाह किए एक दूसरे के साथ, रहकर बाकी का जीवन एक दूसरे के साथ बिताएं. उनके इस प्रयास को काफी सफलता मिली. 

हालांकि यह सब  आसान नहीं रहा. सम्मलेन के संस्थापक बताते हैं, वरिष्ठ नागरिकों और उनके परिवारजनों की काउंसलिंग करनी पड़ती है .क्यूंकि अभी समाज इसे सहजता से नहीं स्वीकार पाता. मुंबई के कमला दास ने दो साल पहले अपनी पत्नी को खो दिया है और वे इस तरह के सम्बन्ध में  बंधना चाहते हैं. लोगों के विरोध पर वे कहते हैं, "युवजन क्या जाने कि अकेलापन क्या होता है..वे तो सारा समय मोबाइल के द्वारा या लैपटॉप के द्वारा किसी ना किसी से कनेक्टेड रहते हैं. मुश्किल हम जैसे लोगों के लिए है, जिनके लिए पहाड़  से दिन काटने मुश्किल हो जाते हैं "
विट्ठलभाई ने तीस साल की शादी के  बाद अपनी पत्नी को खो दिया पिछले चार साल से वे अकेले हैं. उनके पुत्र-पुत्रवधू उनसे अलग फ़्लैट में रहते हैं. वे काफी अकेलापन महसूस करते थे. अब वीनाबेन के साथ वे लिव-इन रिलेशनशिप में हैं और काफी खुश हैं. उन्हें एक दूसरे से कोइ अपेक्षाएं नहीं हैं. दोनों एक दूसरे की आदत नहीं बदलना चाहते. बस साथ रहते हैं. वीनाबेन का भी कहना है..'अपने पति की मृत्यु के बाद पहली बार वे सुरक्षित महसूस कर रही हैं.  पहले वे खाना खाना..अपनी दवाई लेना भूल जाती थीं. अब वे अपना और विट्ठलभाई   का भी ध्यान रखती हैं कि अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखें. दोनों एक दूसरे का ख्याल रखते हैं." वे कहती हैं.."मैने समाज के सामने कुछ साबित करने के लिए यह कदम नहीं उठाया है. बल्कि अपनी जिंदगी को आरामदायक बनाने के लिए ऐसा निर्णय लिया. जब मैं शादी शुदा थी और जब पति को खो दिया तब भी समाज तो कुछ ना कुछ कहता था...इसलिए समाज की क्या परवाह करें " 

विट्ठलभाई का कहना  है , "दुबारा शादी करने से ज्यादा सुविधाजनक है , लिव-इन रिलेशनशिप में रहना ..मुझे अपने बेटों को समझाने में छः महीने लग गए. उन्हें चिंता थी कि मेरी मृत्यु के बाद मेरी संपत्ति कहीं वीनाबेन को ना मिल जाए. जबकि वे जानते थे मैं कितना अकेला हूँ, फिर भी उन्हें सिर्फ संपत्ति की ही चिंता थी." वीनाबेन की दोनों बेटियों ने माँ के इस निर्णय का समर्थन किया. नातुभाई पटेल ने २०११ में अहमदाबाद में ऐसे सम्मलेन आयोजित किए और कई वरिष्ठ नागरिकों ने  लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का निर्णय किया. २०१२ में श्री पटेल ने रायपुर, इंदौर, भोपाल में ऐसे कई सम्मलेन किए गए  और हर शहर में इस सम्मलेन में करीब ३०० वरिष्ठ नागरिक शामिल हुए. उन्होंने कहा, 'इस व्यवस्था में दोनों पक्षों का एक दूसरे की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता. सारे नियम और शर्तें एक कागज़ पर लिखे जाते हैं और उस पर दोनों पक्षों द्वारा हस्ताक्षर किया जाता है. पर कई पुरुष स्वेच्छा से अपनी मृत्यु के बाद लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली संगिनी के लिए कुछ रकम छोड़ जाने का प्रावधान करते हैं. पर इसकी बाध्यता नहीं है.'

तिरसठ वर्षीय 'सरयू केतकर' , जो पुणे ज्येष्ठ लिव-इन रिलेशनशिप मंडल की महिला शाखा की अध्यक्षा हैं, वे कहती हैं.."हमें महिलाओं की भावनात्मक काउंसलिंग करनी पड़ती है...क्यूंकि अक्सर पति की मृत्यु के बाद उन्हें ज्याद उपेक्षाएं झेलनी पड़ती हैं. और उनके लिए ऐसे कदम उठाना बहुत ही मुश्किल होता है. हमलोग ग्रुप्स को पिकनिक पर ले जाते हैं ताकि वे एक दूसरे से बातें कर सकें...एक दूसरे को समझ सकें. अक्सर महिलाएँ अपने पति को छोड़कर किसी परपुरुष के संपर्क में आती ही नहीं. उनके कोई पुरुष दोस्त नहीं होते...इसलिए उन्हें परपुरुष से बात करने में झिझक सी होती है. "

अभी तक मुझे भी व्यक्तिगत रूप से ,ऐसा ही लगता  था..अगर जीवन की सारी जिम्मेवारियाँ पूरी हो गयी हैं. बच्चे अपने पैरेंट्स का ख्याल रखते हैं तो फिर उन्हें दुबारा किसी जीवनसंगी की क्या जरूरत है? पर  MID Day अखबार में छपे एक आलेख और इंटरनेट पर बिखरी हुई सम्बंधित  सामग्री ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया. अब अगर कोई वरिष्ठ नागरिक ऐसा  निर्णय लेते हैं तो उनके इस निर्णय के प्रति आदर ही रहेगा,मन में. 

शनिवार, 15 सितंबर 2012

पूरी हुई तीसरी पारी...पर बल्लेबाजी अब तक है जारी :)


तीसरी पारी पूरी हुई यानि कि तीन साल हो गए ब्लॉगजगत में कदम रखे. बल्लेबाजी चल ही रही है...चौकों-छक्कों का नहीं पता...पर रन तो बनते ही रहे, यानि लिखना चलता रहा.
इच्छा हुई, जरा ब्लॉग बही को उलट- पुलट कर देखा जाए.

ब्लॉग शुरू करने से पहले की कशमकश भी याद आ रही है. जब अजय (ब्रह्मात्मज ) भैया ने कहा था कम से कम अब तक जो लिखा है...वो तो एक जगह एकत्रित हो जाएगा. यही सोच कर ब्लॉग बना लो. पर मैने  जो कुछ लिखा था वो अट्ठारह साल पहले..अपने कॉलेज के दिनों में. घर गृहस्थी की उलझन और मुंबई प्रवास ने तो हिंदी पढ़ने से भी वंचित कर रखा था तो लिखने का मौका कहाँ से आता. सोच रही थी...जितना लिखा है,वो टाइप करके डाल दूंगी..
पर उसके बाद?...उस से आगे? 
लेकिन 
लेकिन 
बस, एक पहले से लिखी पुरानी कहानी और एक कविता पोस्ट कर दी...पर इन दोनों पोस्ट ने ही मानो बाँध की मेड से मिटटी हटा दी..और हहराता हुआ लेखन प्रवाह इस गति से बह निकला..कि इन तीन सालों में दोनों ब्लॉग में कुल 321 पोस्ट लिख डालीं. अब क्या लिखा ..कैसा लिखा ..इसका आकलन तो गुणीजन करेंगे पर हम तो इतना जानते हैं कि खूब सारा लिखा. :)
समसामयिक विषय....कुछ सामाजिक मुद्दे...संस्मरण..खेल...फ़िल्में..कहानियाँ  और  कुच्छेक   कविताएँ {वो भी पता नहीं,कैसे लिख डालीं :)} .ब्लॉग्गिंग की वजह से कई सारे मौके भी मिले. 

दिल में ये कशमकश भी हमेशा जारी रहती है...कहानी या सामाजिक आलेख??  दिमाग कहे..."कहानी लिखो.." और दिल किसी ना किसी सामाजिक या समससामयिक विषय पर आ जाए . पर कभी -कभी दिमाग की जोरदार डांट सुन, दिल को कहानी में मन लगाना ही पड़ता है और फिर इस तरह कहानी में दिल रमता  कि १८ किस्त हो जाते हैं और पता ही नहीं चलता. इस साल फ़रवरी में एक लम्बी कहानी शुरू करने से पहले एक अख़बार के आग्रह पर उनके लिए एक आलेख लिखा था...उन्हें बहुत पसंद आया और उन्होंने नियमित एक कॉलम लिखने का प्रस्ताव ही रख दिया .पर तब तक मैं कहानी लिखना शुरू कर चुकी थी.  दिमाग ने फुसलाया .."कहानी के बीच बीच में समय निकाल कोशिश कर लो" पर दिल ने साफ़ कह दिया.."खुद ही तो कहा ,कहानी लिखो..अब मन लगाकर कहानी लिखने दो.." वो कहानी भी कुछ ऐसी थी कि  डूब कर, महसूस करके  लिखना जरूरी था.

अवसरें गंवाने का ये मौका नया नहीं है...:( .क्या ये सिलसिला चलता रहेगा...हमेशा कोई ऑफर  ऐसे अवसर पर ही क्यूँ आता है जब सामने दोराहे होते हैं और निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है....रेडियो  स्टेशन में काम  (जुड़ी तो अब भी हूँ आकाशवाणी से पर नियमित जॉब नहीं स्वीकार कर सकी.) और कॉलेज में पेंटिंग  सिखाने का ऑफर  तब आया था जब मेरे बेटे दसवीं में थे.

पर एकाध मौके ऐसे भी आए जब सारा जहां  ( अब मेरे जानने वाले ही मेरे जहां   हैं ) एक तरफ और मेरी  मकर राशि (capricorn )  का मिजाज़ एक तरफ. (कहते हैं  capricornian..     surefooted होते हैं ,सोच -समझकर निर्णय लेते हैं,पर फिर अपने निर्णय से जल्दी नहीं हटते. मन की ही करते हैं. ) वैसे भी मेरे मित्र तो कहते हैं तुम्हारी फितरत है.." सुनो सबकी..करो अपने मन की " कुछ तो ये भी कहते हैं..जिनके नाम के अंत में 'मि' या 'मी'   हो वे अपनी मर्जी के मालिक होते हैं ( अजीबोगरीब फंडे हैं ) 

हुआ यूँ कि  इस ब्लॉग लेखन की बदौलत टी.वी.से एक ऑफर आया. एक प्रसिद्द प्रोडक्शन कंपनी (बाला जी टेलीफिल्म्स नहीं ) वाले एक नेशनल चैनल के लिए एक नया प्रोग्राम बना रहे हैं...उनलोगों ने निलेश मिश्र ('याद शहर' फेम वाले और 'जादू है... नशा है'..जैसे गीत के रचयिता ) से चर्चा की...निलेश जी ने अनु सिंह चौधरी से जिक्र किया कि मुंबई की एक महिला से संपर्क करना चाहते हैं...और अनु ने हमारा नाम सुझा दिया . उस प्रोग्राम की डायरेक्टर नेशनल अवार्ड विनर  फिल्म की कहानी लिख चुकी हैं. उन्होंने मेरा ब्लॉग देखा...कई पोस्ट पढ़ीं...उन्हें  पसंद आया और मेरे पास एक मेल आया कि इस प्रोग्राम  के सिलसिले में मिलना चाहती हैं. मुझे भला क्या एतराज होता. और उनकी असिस्टेंट ने इतनी स्वीटली  बात की थी..."आप को डिस्टर्ब तो नहीं कर रही...कब कॉल करूँ..कब का अपोयेंटमेंट  देंगी आप ? {जैसे पता नहीं, कितनी बड़ी लेखिका हूँ :)}

नियत समय पर हम उनके ऑफिस पहुँच गए. बड़ा सा कॉन्फ्रेंस रूम और छः लोग ..चार लड़के और दो लडकियाँ, मुझे प्रोग्राम की रूपरेखा समझाने के लिए बैठे थे. गोल मेज की एक तरफ मैं बैठ गयी.  मुझे लगा था लिखने का काम होगा, परदे के पीछे रहकर पर यहाँ परदे के सामने आना था. वे मुंबई की पांच अलग-अलग उम्र और अलग अलग वर्ग की महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी...उनकी सोच...उनके सपने...पर आधारित कार्यक्रम बनाना चाहती थीं. इसमें कैमरा महिला के सुपुर्द ही कर देना था कि वो जो चाहे शूट करे...अपनी नज़र से दुनिया को कैमरे में कैद करे. अपनी रोजमर्रा की जिंदगी भी. वे यह दिखाना चाहती थीं  कि महिला किसी भी वर्ग की हो...उम्र की हो..उनकी सोच आपस में मिलती-जुलती होती है.

पर यह सुनकर मेरा मन हामी भरने को तैयार नहीं हुआ. मुझे कैमरे के सामने नहीं...पीछे की दुनिया पसंद थी. मैने तो पहले ही 'ना' कह दिया. पर वे 'ना' सुनने को तैयार नहीं...करीब 3 घंटे तक वे सब मुझे कन्विंस करने की कोशिश करते रहे. हमें तो पता ही नहीं...पर उन्हें मेरी लाइफ बड़ी इंटरेस्टिंग लग रही थी. एक छोटे शहर से आई हूँ...मुंबई में रम गयी...यहाँ के जीवन को आत्मसात कर लिया...ब्लॉग है...कहानियाँ लिखती हूँ...वगैरह..वगैरह . अपने  प्रोग्राम के लिए मेरा चयन उन्हें बिलकुल परफेक्ट लग रहा था. 

उनलोगों का बार-बार कहना था 'आप क्यूँ हिचकिचा रही हैं'...हमारी तरफ से कोई निर्देश नहीं होगा. कोई इंटरफेयारेंस  नहीं होगा. आप कैमरे पर जो दिखाना चाहती हैं...बस वही शूट कीजिए. हमारी टीम का कोई मेंबर आपके घर भी नहीं जाएगा,यह सब कॉन्ट्रेक्ट में लिखा होगा. मैं बीच -बीच में कह भी देती ,'आपलोग बेकार  टाइम वेस्ट कर रहे हैं...मैं 'हाँ' नहीं कहने वाली'.पर उनका कहना था, "आपके माध्यम से बहुत कुछ पता चल रहा है..एक महिला के सपने..उसकी सोच..उसकी रोजमर्रा की जिंदगी..." वे लोग अपनी नोट बुक में कुछ नोट भी करते जा रहे थे. उन्होंने कैमरा ऑन करने के लिए भी कहा...कि ये इंटरव्यू रेकॉर्ड करना चाहते हैं. पर जब मैने मना कर दिया तो तुरंत मान  गए कि 'ठीक है...जब आप कम्फर्टेबल नहीं हैं तो  रेकॉर्ड नहीं करेंगे.' 
मेरी पूरी जिंदगी के पन्ने दर  पन्ने पलटे  जा रहे थे. कहाँ से स्कूलिंग की??..कहाँ कॉलेज में पढ़ी?...जीवन  में क्या करना चाहती थी??...क्या सपने थे??.." मुझे भी वो सब कहते हुए लग रहा था कि कब से यूँ पलट कर अपनी जिंदगी को देखा ही नहीं. 

आखिर विदा लेते समय भी उन्होंने यही कहा..." घर जाकर, अच्छी तरह इस ऑफर पर विचार कीजिए...परिवार जन...सबसे सलाह ले लीजिये...फिर फैसला करिए "
परिवार वाले पहले तो थोड़ा सा हिचकिचाए पर किसी ने भी 'ना ' नहीं कहा. 
पतिदेव  ने तो बड़ा डिप्लोमैटिकली  कहा..".देख लो..करना तो तुम्हे है..." 
बड़े बेटे किंजल्क  ने कहा ,"मैं तो ज्यादातर बाहर ही रहता हूँ....बस कैमरे को हाय  और बाय ही बोलूँगा..." 
छोटे बेटे कनिष्क की छुट्टियाँ चल रही थीं...वो थोड़ा असहज था पर उसने कहा.."मैं तो सारा समय अखबार पढता रहूँगा. कैमरा जब भी सामने आएगा...पेपर सामने कर लूँगा " 

पर मना किसी ने नहीं किया. ये नहीं कहा कि 'इंकार कर दो.' सहेलियों से  चर्चा की तो  वे तो ख़ुशी से उछल गयीं..."तुम्हे जरूर करना चाहिए..ऐसे मौके बार बार नहीं आते..मौका हाथ से जाने मत दो..आगे भी तुम्हे सहायता  मिलेगी..जान-पहचान बढ़ेगी...आदि आदि ." 

माता-पिता..भाई-भाभी तो इसी बात से खुश हो गए कि हमें टी.वी. पर देखते रहेंगे. मेरी कजिन अलका  ने तो डांट ही दिया.."पागल हो तुम...ऐसा मौका  कोई छोड़ता है?..चुपचाप 'हाँ ' कह दो.."

विभा (रानी )भाभी ने कहा.."कुछ नया करने का मौका मिलेगा...इसे एक चैलेन्ज की तरह लो."

कुछ ब्लॉगर मित्रों से चर्चा  करने पर सुनने को मिला ," दुनिया को बचा क्या है..आपके बारे में जानने के लिए...अपने परिवार...दोस्तों के फोटो ब्लॉग-फेसबुक पर लगाती ही हैं...ब्लॉग में अपने जीवन से सम्बंधित घटनाएँ लिखती ही हैं...ये ऑफर स्वीकार कर लेनी चाहिए."

मतलब ये कि हर दरवाजा खटखटा लिया  कि कोई तो मेरे निर्णय को सही बताए और मुझे संतोष .मिले...पर नहीं..जैसे अपना सलीब सबको खुद ही ढोना पड़ता है...वैसे ही अपने निर्णय का सलीब भी मुझे ही ढोना  था .
और उस पर से पैसे भी बड़े अच्छे मिल रहे थे. इतने पैसे तो मैं खुद कमाने की कभी सोच भी  नहीं सकती थी .
पर मुझे खुद को यूँ टी.वी. स्क्रीन पर देखना मंजूर ही नहीं हो रहा था. अभी ख्याल आ रहा है...अपना ब्लॉगजगत भी फेमस हो जाता. मेरी रोजमर्रा की जिंदगी में तो ये भी शामिल है..यहाँ की अच्छाइयां....राजनीति....गुटबंदियां ...सब दर्शकों के सामने आ जातीं..:)

एक बार निलेश मिश्र की 'मंडे मंडली' में स्टोरी सेशन के लिए गयी थी. वहाँ भी इस कार्यक्रम की बड़ी चर्चा सुनी. वहाँ भी सबका कहना था..आपको स्वीकार कर लेना चाहिए था. प्रोडक्शन कंपनी से  मेल और उनके कॉल्स भी आते रहे .सबके यूँ कहने पर हर  बार पुनर्विचार करने को विवश होती  पर फिर वही अपनी तो एक बार ना..हज़ार बार ना :)
पर ब्लॉग्गिंग को एक थैंक्यू तो बनता है..ऐसे अवसर उपलब्ध करवाने के लिए :)

तीन साल हो गए ब्लॉग्गिंग करते हुए .मन ये सवाल भी करता है...क्या सारी जिंदगी यही करते रहना है या कुछ और आजमाना चाहिए? ऎसी  ही कुछ असमंजस  की स्थिति एम.ए के इम्तिहान के बाद आई थी  जब इम्तिहान के बाद मैं दुविधा में थी कि अब आगे क्या करना चाहिए. कम्पीटीशन की तैयारी...या एम.फिल. या कुछ और ? उन्ही दिनों  'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में एक विषय पर आलेख आमंत्रित थे ,"डिग्री तो हासिल कर ली..अब क्या करें.." और मैने अपने मन का सारा कशमकश उंडेल दिया था उस आलेख में जो छपा भी था.

पर उसके बाद जल्द ही शादी हो गयी...पतिदेव की अतिव्यस्तता ने बच्चों की सारी जिम्मेवारी मेरे कन्धों पर ही डाल दी . और मैं पूरी तरह उन्हें बड़ा करने में रम गयी. छोटा बेटा जब दसवीं में आया तब ब्लॉग्गिंग  में कदम रखा...और पूरी तरह ब्लॉग्गिंग में खो गयी. 

पर ब्लॉग्गिंग  ने मेरी पेंटिंग लगभग बंद ही करवा दी है..पढना भी पहले से कम हो गया है. पहले तो हफ्ते में दो किताबें ख़त्म कर देती थी. मन को समझा तो लेती हूँ...इतने दिनों सिर्फ पढ़ा,अब लिख रही हो..पर सतत अच्छी किताबें पढना भी बहुत जरूरी है. 

 अब तक जिंदगी जैसे एक तनी हुई रस्सी पर चलने जैसा था. सारे समय ये चिंता ,अपनी पढ़ाई में अच्छा करना है.....बाद में बच्चे अपनी पढ़ाई..खेलकूद..दूसरी गतिविधियों में अच्छा करें..इसकी चिंता. कभी ये भी सोचती हूँ..रिलैक्स होकर बहने दूँ जिंदगी को,अपनी रफ़्तार से. जब जो अच्छा लगे ..जैसा जी में आए,बस  वैसा ही करूँ... पर ऐसे जीने की आदत ही नहीं पड़ी ना. :) कुछ कुछ ना कुछ चैलेंज तो जीवन में चाहिए. 

हाँ, लिखना तो शायद ना छूटे कभी...क्यूंकि इतना तो जान लिया है कि यही है जो de stress करता है .चाहे तन और मन कितना भी थका हुआ हो...थोड़ा सा लिख कर ही रिफ्रेश हो जाती हूँ. 

तो हम लिखते रहेंगे...आपलोग  पढ़ते रहिए :)

ब्लॉग की पहली और दूसरी सालगिरह पर भी पोस्ट यहाँ और यहाँ  लिखी थी. 

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