मेरे पास जयपुर घूमने के लिए दो दिन थे . पहले तो जयपुर दर्शन यानि एक दिन का ट्रिप करने का प्लान किया . कई मिनी बसें चलती हैं जो ग्रुप में कुछ लोगों को एक दिन में जयपुर के मुख्य दर्शनीय स्थलों की सैर कराती हैं . मैंने भी एक ट्रेवल एजेंसी को फोन कर अपनी सीट बुक कर दी . जब लोकेशन पूछा कि आपका ऑफिस कहाँ है और कैसे पहुंचा जा सकता है तो एक बार फिर जयपुर के लोगों की सहज आत्मीयता का परिचय मिला .उन्होंने कहा, 'आपका होटल मेरे घर और ऑफिस के बीच में है, मैं आपको सुबह होटल से पिक कर लूंगा '
सुबह एक अजनबी के कार में बैठने पर संकोच तो हो रहा था पर जब सोलो ट्रिप करनी हो तो ये सब संकोच त्यागने पड़ते हैं . जल्द ही उनका ऑफिस आ गया . .धीरे धीरे लोग इकट्ठे हो रहे थे और जब सब आ गए तो हमारी यात्रा शुरू हो गई . एक गाइड महाशय भी साथ थे ,जिन्होंने सबसे पहले उद्घोषणा की ,'आपकी बाईं तरफ 'राजमंदिर सिनेमा हॉल' है, उसकी तारीफ़ में कुछ कशीदे भी काढ़े .कुछ लोग उतर कर उस सिनेमा हॉल की भी फोटो लेने लगे. सुबह का वक्त था...गेट बंद था ,सूना सा हॉल था .मैं तो खैर नहीं गई, ना ही फोटो खींचे .
बिड़ला मंदिर
अगला पड़ाव था ,'बिडला मंदिर ' . मोती डोंगरी पहाड़ी के नीचे स्थित सफेद संगमरमर से बना ये विशाल मंदिर बहुत ही भव्य और खुबसूरत है . इसे 1988 में बिड़ला ग्रुप ने बनवाया है .इसे लक्ष्मी नारायण मंदिर भी कहा जाता है. ग्रुप के ज्यादातर लोग ,फोटो खिंचवाने में व्यस्त हो गए थे .आजकल किसी भी दर्शनीय स्थल या किसी मनोहारी प्राकृतिक दृश्य को खुली आँखों से देख,उसकी खूबसूरती में डूब जाने का चलन कम ही देखा जाता है, ज्यादातर लोग उस दृश्य के साथ अपनी फोटो खिंचवाने में ही रूचि रखते हैं . अकेले घूमने का एक फायदा ये भी है कि काफी गौर से सबकुछ देखने का मौक़ा मिल जाता है. मन्दिर से निकलते वक्त काले लहंगे दुपट्टे में राजस्थानी महिलाओं का एक समूह आता दिखा. उनकी वेशभूषा मुझे बहुत रोचक लगी. मैंने फोटो खींचने की इच्छा जाहिर की तो वे ख़ुशी ख़ुशी तैयार हो गईं और आगे बढ़ गई महिलाओं को भी आवाज़ दे बुला लिया .पूछने परा बताया, 'हमारे देस में इसी रंग के कपड़े पहनते हैं ' मुझे उनकी फोटो लेते देख काफी लोग पास आकर उनसबकी फोटो लेने लगे. वे सब भी एकदम स्टार वाली फीलिंग के साथ पोज देने लगीं :)
म्यूजियम
इसके बाद हमारी बस म्यूजियम पहुंची . जयपुर का म्यूजियम 1887 में ही जनता के लिए खोल दिया गया था . इस विशाल संग्रहालय में करीब 19,000 ऐतिहासिक वस्तुएं हैं . राजा महाराजों के पुराने अस्त्र - शस्त्र , उनके परिधान , धातु, हाथी-दांत, मिटटी से बनी वस्तुएं ,आभूषण , कपडे, आदिवासी जनजाति के परिधान ,लम्बे सुराहीदार सिरेमिक पॉट , बहुत कुछ है देखने और गुनने लायक . दुनिया ने कहाँ से शुरुआत की और कैसे कैसे प्रगति करती गई, अच्छी झलक मिली वहां . उस वक्त की कारीगरी भी देखती ही बनती है. म्यूज़ियम में जाने के टिकट लगते हैं.

हमारी बस में एक छोटे बच्चे के साथ एक कपल ,तीन लड़के और एक दक्षिण भारतीय कपल थे,जिनसे कुछ बातें हुई थीं . उन तीन लड़कों में से एक टिकट लेने जा रहा था .उसने कहा, 'आपकी टिकट भी ले आता हूँ ' टिकट का इंतज़ार करते बातें होने लगीं और पता चला, वे लड़के रांची से जयपुर, रेलवे की कोई परीक्षा देने आये हैं .मैंने बड़े होने का रौब जमा दिया , ' परीक्षा देने आये हो और घूम रहे हो..पढ़ना चाहिए न ' वे झेंपे से कहने लगे, 'कितना पढेंगे ...बहुत सी परीक्षाएं दे रहे हैं और दो साल से सिर्फ पढ़ ही रहे हैं . बिहार झारखंड में आज भी ज्यादा लड़के साल दर साल ,प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियां ही करते हैं .उनके पास नौकरी के दूसरे विकल्प हैं ही नहीं.
जंतर -मंतर
म्यूजियम के बाद,हमारी बस ,जन्तर-मंतर और सिटी पैलेस पहुंची . जनत मंतर यानि वेधशाला .
जयपुर की वेधशाला सबसे विशाल एवं विश्व विख्यात हैं। . महाराजा सवाई जयसिंह ने सन 1718 में इस वैधशाला की आधार शिला रखी। .इस ज्योतिष यंत्रालय में समय की जानकारी, सूर्योदय, सूर्योस्त एवं नक्षत्रों की जानकारी प्राप्त करने के उपकरण हैं। .यहाँ स्थित सम्राट यंत्र विश्व की सबसे बडी सौर घड़ी मानी जाती ह .2010 में यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज की सूचि में शामिल किया है . .
सिटी पैलेस ,जन्तर मंतर के सामने ही है . सिटी पैलेस का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1729 से 1732 ई. के मध्य कराया था .कहा जाता है "शहर के बीच सिटी पैलेस नहीं, सिटी पैलेस के चारों ओर शहर है।" शहर के बहुत बड़े हिस्से में स्थित सिटी पैलेस के दायरे में बहुत-सी इमारतें आती थीं। इनमें चंद्रमहल, सूरजमहल, तालकटोरा, हवामहल, चांदनी चौक, जंतरमंतर, जलेब चौक और चौगान स्टेडियम शामिल हैं। वर्तमान में चंद्रमहल में शाही परिवार के लोग करते हैं। शेष हिस्से शहर में शुमार हो गए हैं और सिटी पैलेस के कुछ हिस्सों को संग्रहालय बना दिया गया है। संग्रहालय में जयपुर के राजाओं, रानियों, राजकुमारों और राजकुमारियों के वस्त्र संग्रहित किए गए हैं। इसी चौक के उत्तरी-पश्चिमी कोने में एक बरामदे में जयपुर की प्रसिद्ध कलात्मक कठपुतलियों का खेल दिखाने वाले कलाकार गायन के साथ अपनी कला का प्रदर्शन कर पर्यटकों का मनोरंजन करते हैं। चौक के उत्तरी ऊपरी बरामदे में सिलहखाना है। ऐसा स्थान, जहां अस्त्र शस्त्र रखे जाते हैं। यहां 15 वीं सदी के सैंकड़ों तरह के छोटे-बड़े, आधुनिक प्राचीन शस्त्रों को बहुत सलीके से संजोया गया है। सबसे आकर्षक है, इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया द्वारा महाराजा रामसिंह को भेंट की गई तलवार, जिस पर रूबी और एमरल्ड का बहुत सुंदर काम है .
इसके बाद आमेर किला जाना था , जहां थोड़ी दूर तो बस गई पर उस से आगे जीप या छोटी गाड़ी में जाना था . बस में छोटे छोटे ग्रुप बन गए थे .हम अपने ग्रुप के साथ एक जीप में सवार हो गए.
आमेर किला
आमेर किला पर्यटकों का ख़ास आकर्षण है .यह मुगलों और हिन्दुओं के वास्तुशिल्प का अद्भुत नमूना है। राजा मानसिंह जी ने 1592 में इसका निर्माण आरंभ किया था। महल को बनाने में लाल पत्थरों और सफ़ेद मार्बल का बहुत अच्छे से उपयोग किया गया है. इस किले में दीवान-ए-आम' ,दीवान-ए-ख़ास ,, भव्य शीश महल जय मंदिर तथा सुख निवास शामिल हैं, महल के पीछे से जयगढ दिखाई देता है। किले के झरोखे से जहां कभी रानियाँ झांकती होंगी . पर्यटक झाँक कर अपनी तस्वीरें खिंचवा रहे थे .पल भर को शाही अहसास महसूस करने का हक तो सबको है ..
राजस्थान शिल्प
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एक बड़े शो रूम के सामने सब्जियों से निर्मित रंग और ब्लॉक प्रिंटिंग का भी प्रदर्शन दिखाया गया .उसी दूकान में जयपुरी रजाई, राजस्थानी पारम्परिक वस्त्र और साज सज्जा के सामान भी मिल रहे थे .काफी लोगों ने खरीदारी की .
जलमहल
रास्ते में ही मानसागर झील में स्थित खूबसूरत 'जलमहल' है . 1596 ई. में गंभीर अकाल पडने पर तत्कालीन अजमेर के शासक ने पानी की कमी को दूर करने के लिए बांध का निर्माण करवाया था, ताकि पानी को जमा किया जा सके. बाँध को बाद में 17वीं सदी में एक पत्थर की चिनाई संरचना में परिवर्तित किया था. यूं तो जल महल का निर्माण 1799 में हुआ था. लेकिन इस महल का जीर्णोद्धार महाराजा जयसिंह ने करवाया था. जलमहल मध्यकालीन महलों की तरह मेहराबों, बुर्जो, छतरियों एवं सीढीदार जीनों से युक्त दुमंजिला और वर्गाकार रूप में निर्मित भवन है. पर्यटक दूर से ही इस खुबसूरत महल का अवलोकन कर सकते हैं .
गैटोर
इस भ्रमण का अंतिम पडाव. गैटोर था . गैटोर एक ऐतिहासिक स्थल है. यहाँ नाहरगढ़़ क़िले की तलहटी में दिवंगत राजाओं की छतरियाँ निर्मित हैं। 'गैटोर' यानि 'गए का ठौर ' .पुरातत्व महत्त्व की अनेक वस्तुएँ यहाँ पाई गई हैं. प्राचीन राजाओं की समाधि-छतरियाँ आदि यहाँ के उल्लेखनीय स्मारक हैं। ये राजस्थान की प्राचीन वास्तुकला के सुन्दर उदाहरण हैं .इन छतरियों में सीढ़ीदार चबूतरे के चारों ओर का भाग पत्थर की जालियों से बना हुआ है और केन्द्र में सुंदर खंभों पर छतरियों का निर्माण किया गया है। यहाँ एक अद्भुत शान्ति चारों तरफ फैली होती है .
अब तक शाम हो गई थी और मैं होटल वापस आ गई . होटल में रूफ टॉप रेस्टोरेंट था . और वहाँ शाम सात बजे से दस बजे तक राजस्थानी लोकगीत और लोकनृत्य के कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते थे .अकेले घूमने पर एक सबसे बड़ी मुसीबत खाने पीने की होती है .स्त्रियों की डायट वैसे ही थोड़ी कम होती है और कुछ भी ऑर्ड करने पर पूरा खत्म करना मुमकिन नहीं होता . मैंने सोचा सूप और सलाद ही मंगवाती हूँ . पर शायद स्वादिष्ट व्यंजनों के इस शहर में कोई सलाद ऑर्डर नहीं करता होगा . क्यूंकि सलाद के नाम पर मिले मोटे मोटे कटे प्याज, खीरा और टमाटर के कुछ टुकड़े .पर लोकनृत्य का आनन्द लेते हुए उस खुले आसमान के नीचे बैठ कर प्याज कुतरना भी अच्छा ही लगा .दूसरी मेजों पर ज्यादातर विदेशी कपल ही बैठे थे .और वे ग्लास से कोई कड़वा द्रव्य सिप कर रहे थे .महिलायें , बीच
बीच में नर्तकी के साथ ठुमके लगा आतीं .
जयपुर शहर में स्थित मुख्य दर्शनीय स्थल देख चुकी थी . जयगढ़ का किला और नाहरगढ़ का किला ,शहर से थोड़ी दूरी पर थे और वहाँ कोई कार हायर करके ही जाया जा सकता था .थोड़ी असमंजस की स्थिति थी पर फिर मन को समझाया , ऐसे तो बहुत कुछ देखने से रह जाएगा . होटल में बात की तो उन्होंने कहा, उनके अपने कार और ड्राइवर हैं, और पूरी तरह सुरक्षित है. किसी डर की कोई बात नहीं .
दूसरे दिन सुबह सुबह किचन से कॉल आया कि कल आपने नाश्ता नहीं किया . भूल ही गई थी कि पैकेज में सुबह का नाश्ता भी शामिल था . बुफे था , नाश्ते में कॉर्न फ्लेक्स, ब्रेड बटर ,इडली डोसा, पूरी भाजी ,जूस, कॉफ़ी सब कुछ था .अभी लोग किसी स्त्री को अकेले रेस्टोरेंट में नाश्ता करते देखने के आदी नहीं हुए हैं .आस-पास के टेबल वाले स्त्री-पुरुष सब एक नजर जरूर डाल लेते थे ,हाँ घूरते नहीं थे. इतना इत्मीनान काफी था .
जयगढ़ दुर्ग
नाश्ते के बाद मैं जयगढ़ दुर्ग के लिए निकल पड़ी . जयगढ़ दुर्ग अरावली पहाड़ियों में स्थित है . जंगल के बीच से जाती सर्पीली घुमावदार सडक बहुत ही खुबसूरत थी . हाल में ही कोई त्यौहार सम्पन्न हुआ था .क्यूंकि रास्ते भर रास्ते के किनारे पत्थरों के उपर छोटी छोटी मूर्तियाँ रखी दिखीं . मूर्तियों का विसर्जन ना करके उन्हें इस तरह जंगल में पत्थरों के ऊपर रख देना भी एक अच्छा प्रयास है . रास्ते की खूबसूरती और भी बढ़ जाती है. जगह जगह कई सुंदर पक्षी और मोर भी दिखे . जयगढ़ दुर्ग में अच्छी भीड़ थी. किसी स्कूल के बच्चे आये हुए थे और हर चीज को बड़े गौर से देख रहे थे .उनमें फोटो खींचने की होड़ नहीं थी .
जयगढ़ किला, जयपुर का सबसे ऊंचा किला है.यह नाहरगढ की सबसे ऊंची पहाड़ी चीलटिब्बा पर स्थित है. इस किले से जयपुर के चारों ओर नजर रखी जा सकती थी. यह किला आमेर शहर की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए 1726 में महाराजा जयसिंह द्वितीय ने बनवाया था . उन्हीं के नाम पर इस किले का नाम जयगढ़ पड़ा। मराठों पर विजय के कारण भी यह किला जय के प्रतीक के रूप में बनाया गया. यहां लक्ष्मीविलास, ललितमंदिर, विलास मंदिर और आराम मंदिर आदि सभी राजपरिवार के लोगों के लिए अवकाश का समय बिताने के बेहतरीन स्थल थे.यहां रखी दुनिया की सबसे विशाल तोप भी लगभग 50 किमी तक वार करने में सक्षम थी। जयगढ़ दुर्ग के उत्तर-पश्चिम में सागर झील व उत्तर पूर्व में आमेर महल और मावठा है। यह भी कहा आजाता है कि महाराजा सवाई जयसिंह जब मुगल सेना के सेनापति थे तब उन्हें लूट का बड़ा हिस्सा मिलता था .उस धन को वे जयगढ़ में छुपाया करते थे . इस दुर्ग में धन गड़ा होने की संभावना के चलते कई बार इसे खोदा भी गया .
जयगढ़ और आमेर महल के बीच एक लम्बी सुरंग है इस सुरंग का भी ऐतिहासिक महत्व है। यह सुरंग एक गोपनीय रास्ता था जिसका इस्तेमाल राजपरिवार के लोग एवं विश्वस्त कर्मचारी जयगढ़ तक पहुंचने में किया करते थे . जयगढ़ किले तक इस सुरंग की लम्बाई 600 मीटर है .जबकि बाहर से जाने पर यह दूरी 11 किलोमीटर है. विश्व की खूबसूरत इमारतों में जयगढ़ किले का नाम भी है.
जयगढ़ दुर्ग से नाहरगढ़ दुर्ग का रास्ता भी बहुत खू बसूरत है. नाहरगढ़ का किला, जयपुर को घेरे हुए अरावली पर्वतमाला के ऊपर बना हुआ है। नाहरगढ़ का निर्माण एक साथ न होकर कई चरणों में हुआ। महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने इसकी नींव रखी, प्राचीर व रास्ता बनवाया, इसके बाद सवाई रामसिंह ने यहां 1868 में कई निर्माण कार्य कराए। बाद में सवाई माधोसिंह ने 1883 से 1892 के बीच यहां लगभग साढ़े तीन लाख रूपय खर्च कर महत्वपूर्ण निर्माण कराए और नाहरगढ़ को वर्तमान रूप दिया. महाराजा माधोसिंह द्वारा कराए गए निर्माण में सबसे आलीशान इमारत है-माधवेन्द्र महल. वर्तमान में जो दो मंजिला इमारत जयपुर शहर के हर कोने से दिखाई देती है वह माधवेन्द्र महल ही है। यह महल महाराजा माधोसिंह ने अपनी नौ रानियों के लिए बनवाया था। इनमें दो महलों के सेट बिलकुल एक जैसे हैं . जो राजा की पटरानियों के थे .वे दोनों पटरानियाँ बहनें थीं . बाकी के सात महल (आधुनिक अपार्टमेन्ट जैसे ) बिलकुल एक जैसे हैं . इनमें राजा द्वारा जीत कर लाई गईं रानियाँ रहती थीं . हर महल की रसोई, दासी के रहने की व्यवस्था अलग थी . महल में एक मुख्य राजकक्ष है जो सभी नौ महलों से एक गलियारे के साथ जुड़ा है. नाहरगढ़ का दुर्ग लम्बे समय तक जयपुर के राजा-महाराजाओं की आरामगाह और शिकारगाह भी रही. यहाँ एक किंवदंती है कि कोई एक नाहर सिंह नामके राजपूत की प्रेतात्मा वहां भटका करती थी। किले के निर्माण में व्यावधान भी उपस्थित किया करती थी। अतः तांत्रिकों से सलाह ली गयी और उस किले को उस प्रेतात्मा के नाम पर नाहरगढ़ रखने से प्रेतबाधा दूर हो गयी थी. किले के पश्चिम भाग में “पड़ाव” नामका एक रेस्तरां भी है जहाँ खान पान की पूरी व्यवस्र्था है। यहाँ से सूर्यास्त बहुत ही सुन्दर दिखता है .
अब अकेले घूमते हुए मुझे थोड़ी हिम्मत आ गई थी . मैंने अब तक कुछ शॉपिंग नहीं की थी .अगले दिन तो शादी में शामिल होने रिसॉर्ट जाना था .फिर तो मौक़ा मिलता नहीं और मैंने ड्राइवर से कहा, हवामहल के नीचे जो दुकानों की कतार है, वहीँ मुझे छोड़ दे .मैं बाद में खुद ऑटो लेकर आ जाउंगी .फिर तो इत्मीनान से एक सिरे से दूसरे सिरे तक घूमते हुए ढेर सारी छोटी मोटी चीज़ें खरीदीं , शीशे जड़ा झोला,, बांधनी के दुपट्टे , चादरें ,वॉल पीस, लाख की चूड़ियां . सेल्समैन की वाक्पटुता भी देखते बन रही थी . विदेशी पर्यटकों से स्पेनिश, इटैलियन ,फ्रेंच में भी बातें कर रहे थे . एक 3XL साइज़ वाले सज्जन ने फरमाईश की ,उन्हें टी शर्ट पर 'गांडी ' की फोटो चाहिए थी .सेल्समैन ने कई टीशर्ट दिखाए पर उन्हें गांधी ही चाहिए थे .
वहाँ एक चीज़ अखर गई, कोई ऐसी जगह नहीं थी, जहां बैठकर एक कप चाय पी जा सके . लौटते समय ,मुझे साइकिल रिक्शा मिला . जयपुर की सडकों पर आहिस्ता आहिस्ता घूमते हुए जयपुर भ्रमण का समापन हुआ. .