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सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

हिंदी लेखन में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग...कितना उचित??





सबसे पहले मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि मैंने विषय के रूप में हिंदी बस इंटर तक ही पढ़ी है और मेरा सारा हिंदी ज्ञान ,पत्र पत्रिकाओं या हिंदी साहित्यिक पुस्तकों से ही अर्जित किया हुआ है,इसलिए अगर हिंदी में 'एम.ए.' या 'पी.एच.डी.' वालों को मेरी बात अच्छी ना लगे तो ,क्षमा याचना.

अक्सर मेरे लेखन में अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग पर र्लोग आपत्ति जताते हैं.एक बार किसी ने कमेन्ट में भी लिखा कि "कृपया अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग ना करें...यह आँखों में चुभता है." पर मेरा मानना है कि हिंदी को समृद्ध करने के लिए दूसरी भाषाओं के शब्द भी समाहित करने चाहिए.सिर्फ अंग्रेजी ही नहीं अगर संभव हो तो स्पेनिश,फ्रेंच,इटैलियन शब्द भी शामिल करने चाहिए लेकिन हमारा साबका ज्यादातर अंग्रेजी भाषा से ही पड़ता है इसलिए जाने अनजाने हम इनका प्रयोग कर डालते हैं.

एक समस्या सम्प्रेषण की भी है, लिखते वक़्त अनायास ही कोई अंग्रेजी शब्द लिख जाते हैं,पर अगर हम यह बंदिश रखें कि नहीं सिर्फ हिंदी शब्द ही इस्तेमाल करने हैं.तो रुक कर हिंदी शब्द सोचने पड़ते हैं और फिर इस से लेखन प्रवाह में रुकावट आती है.और पाठकों को भी इसका अहसास होता है और फिर वह लेख पाठकों को बांधे रखने में अक्षम हो जाता है.जानबूझकर अगर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया गया हो या विशिष्टता दिखाने के लिए किया गया हो तो लेख पढने से इसका भी अहसास हो जाता है.पर अगर सहज रूप में कुछ शब्द रचना का हिस्सा बन जाते हैं तो मेरे ख्याल से इसकी आलोचना नहीं करनी चाहिए.अंग्रेजी भाषा का नहीं अंग्रेजियत का विरोध करना चाहिए.

कहते हैं,'साहित्य समाज का दर्पण होता है'.जिस तरह की भाषा आसपास बोली जाती है,वह लेखन में भी झलक जाती है.किसी गाँव कस्बों में रहने वालों का लेखन या महानगरों में रहने वालों का लेखन,कोई किसी से कमतर नहीं है.वहाँ रहने वालों के लेखन में एक आंचलिक खुशबू होती है और कई सारे आंचलिक शब्दों से पहचान हो जाती है वैसे ही महानगरों में रहने वालों के लेखन में कई भाषाओँ के शब्दों का सम्मिश्रण अपेक्षित है.अगर हम यह दबाव डालें कि सिर्फ हिंदी या संस्कृत शब्दों का ही प्रयोग कर सकते हैं.फिर लेखन में विविधता दृष्टिगत नहीं होगी.अलग अलग शैली का लेखन किसी भी भाषा को समृद्ध ही करता है.मैं कभी अल्मोड़ा,हल्द्वानी नहीं गयी ऐसे ही कभी 'गल्फ कंट्रीज' में भी नहीं गयी.पर मेरे कुछ फ्रेंड्स अक्सर धोखा खा जाते हैं क्यूंकि 'शिवानी' के उपन्यास पढ़ पढ़ कर कितने ही पहाड़ी शब्दों से परिचय हो गया.और मुस्लिम महिलाओं के ऊपर लिखी कई किताबों से 'खाड़ी देशों' के रहन सहन का भी पता चला.मेरी समझ से हिंदी से इतर शब्दों का उपयोग हमारे ज्ञान में वृद्धि ही करता है.

अंग्रेजी एक समृद्ध भाषा है और सबको पता है,उसमे अनेकानेक भाषाओँ का सम्मिश्रण है.हर वर्ष 'ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी' के नए संस्करण निकलते हैं और अखबारों में खबर छपती है,फलां,फलां हिंदी शब्द को शामिल किया गया है.और अंग्रेजी लेखक उन शब्दों का उपयोग करने में जरा भी देरी नहीं करते.एक अंग्रेजी उपन्यास में मैंने जगह जगह 'जोधपुरी' का उल्लेख पाया.जबकि लेखक Artisitic indian shoes लिख सकता था लेकिन उसने 'जोधपुरी' लिखना श्रेयस्कर समझा.ऐसे ना जाने कितने हिंदी शब्द ,अंग्रेजी लेखन में मिल जाते हैं.और पढ़कर बुरा नहीं लगता,ख़ुशी ही महसूस होती है.

ये कह सकते हैं हिंदी खुद ही इतनी समृद्ध है और नए शब्द चाहें तो संस्कृत से लिए जा सकते हैं लेकिन आम पाठक,उर्दू अंग्रेजी मिश्रित हिंदी का इतना आदी हो चुका है कि संस्कृतनिष्ठ भाषा ही उसे अजनबी सी लगती है और उसके हिन्दी के प्रति ज्यादा रूचि जागने की जगह विमुख होने का खतरा ही ज्यादा बढ़ जाता है.

जो लोग बहुत सुगमता से क्लिष्ट हिंदी शब्दों का प्रयोग कर लेते हैं वे हिंदी के सच्चे साधक हैं पर जो लोग सिर्फ बोलचाल की भाषा में ही लिखते हैं,वे भी हिंदी को हानि नहीं पहुंचा रहें.

कई बार लेखन में कुछ नयापन लाने के लिए भी अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया जाता है.'शरद कोकस' जी मुंबई पर लिखी कविताओं की एक श्रृंखला लिख रहें हैं."सिटी पोएम्स'..अब "शहर कविता" लिखने में वह बात नहीं होती इसीलिए उन्होंने यह शीर्षक चुना.अंग्रेजी उपन्यासों में अक्सर पढने को मिलता है " He was still in his payjama " लेखक आसानी से लिख सकता है " He was still in his night suit " पर पायजामा लिखने में एक नवीनता झलकती है.और हर लेखक अपनी रचना को एक नयापन देना चाहता है.इसलिए इतर भाषा के शब्दों के प्रयोग से नहीं हिचकता.

कुछ अंग्रेजी शब्द हामारी भाषा में इतने रच बस गए हैं कि प्रतीत ही नहीं होता ये हिंदी भाषा के अभिन्न अंग नहीं हैं.'खुशदीप सहगल जी' ने मेरी 'कामवालियों' पर लिखी पोस्ट पढ़ कर कहा उन्हें, इनके लिए 'मददगार' शब्द उचित लगता है.हमें भी बाई,कामवाली ,महरिन, बुलाना अच्छा नहीं लगता.पर मददगार शब्द उतनी सुगमता से हमारी जुबान पर नहीं चढ़ पायेगा जितना 'हेल्पर' शब्द....गाँव का बच्चा बच्चा भी 'हेल्प' शब्द का अर्थ जानता है और सेना में तो ऑफिसर को जो व्यक्तिगत अर्दली दिए जाते हैं .उन्हें हेल्पर ही कहा जाता है.पर चूँकि 'हेल्पर'शब्द अंग्रेजी का है इसलिए कई लोगों को ग्राह्य नहीं होगा.अब 'ब्लॉग 'शब्द का उदाहरण ही ले लेँ.'चिटठा' या 'चिट्ठाकार' शब्द से सभी परिचित हैं पर उपयोग तो 'ब्लॉग' या 'ब्लॉगर' शब्द का ही करते हैं.

मेरे अहिन्दीभाषी फ्रेंड्स हमेशा पूछते हैं.बोलने वाली हिंदी और पढने वाली हिंदी में इतना फर्क क्यूँ है? जितना ही हम नए शब्दों को प्रश्रय देंगे. यह खाई मिटती जायेगी और हिंदी नए नए लोगों को और भी आकर्षित करेगी.

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