किसी भी बच्चे के लिए उसके टिफिन का डब्बा कितना महत्वपूर्ण होता है..शायद हम नहीं महसूस कर सकते. अक्सर माताएं बच्चों को टिफिन में क्या देना है..इसका ख़ास ख्याल रखती हैं. माँ जिस प्यार से बच्चे के लिए टिफिन रखती है...बच्चा भी व्यक्त करे या ना...पर इसे महसूस जरूर करता है....{प्रसंगवश,याद आ गया ...आज ही अखबारों में "ज्योतिर्मय डे' (J Dey ) से जुड़े आलेख पढ़ रही थी . मुंबई से निकलनेवाले एक अखबार 'Mid Day' के क्राइम रिपोर्टर J Dey की कल शनिवार की दोपहर...बीच सड़क पर गोली मारकर हत्या कर दी गयी. उनके एक सहयोगी ने उन्हें याद करते हुए कहा है...कि दो दिन पहले ही ,वे लोग साथ में लंच कर रहे थे...और J Dey ने अपना टिफिन खोलते हुए कहा था..""My mother packed it for me...It is a declaration of a mother's love....all her love goes into making it for you and that's why it tastes so good." J Dey को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि )
फिल्म 'स्टेनली का डब्बा ' में इसी टिफिन के डब्बे के मध्यम से एक बहुत ही संवेदनशील विषय को उठाने की कोशिश की गयी है. स्टेनली एक हंसमुख चुलबुला सा बच्चा है. और एक संभावित कहानीकार भी. टीचर ने अगर पूछ लिया..चेहरा गन्दा क्यूँ है...तो पूरे एक्शन के साथ घटना बयाँ करता है कि माँ ने उसे कुछ लाने को भेजा..वहाँ उसने देखा एक छोटे लड़के को एक बड़ा लड़का पीट रहा था...फिर वो उस से भिड़ गया...और यूँ हाथ घुमाया...यूँ घूंसे जमाये...यूँ उठा कर पटका..." पूरा क्लास मंत्रमुग्ध हो उसकी बातें सुनता रहता है. टीचर के क्लास से बाहर जाते ही..बच्चे उसके पीछे पड़ जाते हैं..."स्टेनली फाइटिंग की स्टोरी सुना,ना " और वो शुरू हो जाता है. रोज एक नई कहानी...जिसमे माँ ने उसे कहीं भेजा होता है.वो माँ पर एक रोचक निबंध भी लिखता है...कि 'उसकी माँ..बस से जम्प करती है...और ट्रेन में उछल कर चढ़ जाती है..उसकी माँ एक सुपरवुमैन है '.
पर जब लंच-टाइम होता है तो स्टेनली चुपचाप बाहर जाने लगता है. और किसी बच्चे के पूछने पर कहता है... मैं कैंटीन से बड़ा पाव लेने जा रहा हूँ. उसके पास टिफिन नहीं होता. वो बाहर के नल से भर-पेट पानी पीकर आ जाता है. एक हिंदी के शिक्षक हैं. 'वर्मा सर' उनकी आदत है..लंच-टाइम में बच्चों की क्लास में ही घूमते रहते हैं..और सबकी टिफिन से कुछ ना कुछ लेकर खाते रहते हैं. लेकिन स्टेनली को देखते ही हिकारत से कहते हैं..'डब्बा तो कभी लाता नहीं.." (मुंबई में लंच-बॉक्स को डब्बा ही कहा जाता है...) अब स्टेनली कहने लगता है...'वो घर जा रहा है...माँ ने गरमागरम खाना बनाया है उसके लिए "
कुछ दिन बाद ही उसके दोस्त ये राज़ जान लेते हैं कि वो घर नहीं जाता, बल्कि सड़कों पर घूम कर वापस आ जाता है. स्टेनली कहता है..उसके मम्मी-पापा प्लेन से शहर के बाहर गए हैं..इसलिए वो डब्बा नहीं ला रहा. एक बड़ा सा चार डब्बे का टिफिन लानेवाला लड़का ऑफर करता है कि जबतक तुम्हारी मम्मी नहीं आ जाती...हम तुम्हारे साथ टिफिन शेयर करेंगे. "लेकिन वो खड़ूस "स्टेनली आशंका जताता है ( टीचर्स के नाम रखने का सदियों से चलता आ रहा, सिलसिला आज भी वैसे ही जारी है ) " और बच्चे रास्ता निकाल लेते हैं कि वो क्लास में रहेंगे ही नहीं. अब शुरू होती है...उन वर्मा सर और बच्चों के बीच आँख मिचौली. रोज ही बच्चे अपने टिफिन खाने का स्थान बदल देते हैं...और वर्मा सर की पकड़ में नहीं आते. एक दिन वर्मा सर उन्हें टेरेस पे पकड़ लेते हैं...पर सारा गुस्सा स्टेनली पर निकलते हैं...कि "उसने डब्बा नहीं लाया...अब नो डब्बा नो स्कूल...अगर डब्बा नहीं लाया तो स्कूल भी नहीं आ सकता"
स्टेनली का स्कूल आना बंद हो जाता है...सारे दोस्त उदास हैं...अब जाकर दर्शकों को पता चलता है कि स्टेनली डब्बा क्यूँ नहीं लाता है. क्यूंकि स्टेनली एक बाल-मजदूर है और शाम से देर रात तक , अपने चाचा के होटल में काम करता है. टेबल साफ़ करता है...लोगो को सर्व करता है...बड़ी-बड़ी कढाई-देगची साफ़ करता है , प्लेटें पोंछ कर रखता है...और सोने से पहले अपने माता-पिता की तस्वीर के आगे मोमबत्ती जला कर उनसे दो बातें करता है,...जो एक एक्सीडेंट में मारे गए थे. इसीलिए स्टेनली की हर कहानी के केंद्र में 'माँ' होती है. पता नहीं कितने दर्शक नोटिस करते हैं....पर फिल्म के पहले ही दृश्य में स्टेनली के चेहरे पर चोट के निशान होते हैं.
होटल में खाना बनाने वाला,अकरम उसका दोस्त है...और वो एक टूटे फूटे टिफिन का जुगाड़ करता है और उसमे होटल का बचा खाना भर कर फ्रिज में रख देता है. अब स्टेनली गर्व से वो टिफिन लेकर स्कूल जाता है..अपने दोस्तों को ...अपने टीचर्स को अपनी टिफिन के स्वादिष्ट व्यंजन खिलाता है..और साथ में रोज एक कहानी भी कि कैसे उसकी माँ, ने सुबह चार बजे उठ कर आलूदम बनाए...पनीर, लाने वो इतनी दूर गयी...आलू लाने दादर गयी क्यूंकि वहाँ आलू सस्ते मिलते हैं...आदि..आदि ..
दर्शकों के मन में सवाल उठ सकते हैं कि स्टेनली एक बाल-मजदूर होते हुए भी इतने अच्छे स्कूल में कैसे पढता है...अच्छी अंग्रेजी कैसे बोल लेता है. यहाँ मुंबई में कई कैथोलिक स्कूल हैं..जिनकी फीस आज भी ५,६ रुपये है....गरीब बच्चों को कॉपी किताब से लेकर स्कूल-ड्रेस...जूते तक स्कूल से मिला करते हैं. और इनकी पढ़ाई का स्तर इतना अच्छा है कि बड़े घर के बच्चे भी इसमें पढ़ते हैं.मेरी कॉलोनी में ही एक स्कूल है जिसमे कामवालियों के बच्चे, ऑटो चलाने वालों के बच्चों के साथ मल्टीनेशनल कम्पनीज के GM...CEO ' के बच्चे भी एक साथ पढ़ते हैं.(इसका जिक्र मैने इस पोस्ट में भी किया था )
इस फिल्म के लेखक -निर्देशक अमोल गुप्ते ने 'तारे जमीन पर' फिल्म की कहानी भी लिखी थी और उसके क्रिएटिव डायरेक्टर भी थे. 'वर्मा सर' के रूप में अमोल गुप्ते ने अच्छा अभिनय किया है..दिव्या दत्ता...राज़ जुत्शी...राहुल सिंह ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है...पर बाल कलाकार स्टेनली की भूमिका में पार्थो ने बहुत ही सहज अभिनय किया है.
पता नहीं..ऐसे कितने स्टेनली हमारे आस-पास हैं और वो फिल्म वाले स्टेनली जैसे भाग्यशाली भी नहीं कि स्कूल जा सकें. ऐसे ही एक स्टेनली का किस्सा डॉ. अमर कुमार जी ने अपने ब्लॉग कुछ तो है...जो कि पर लिखा है. जिसे पढ़कर मुझे इस फिल्म की याद आई...और कुछ लिखने का मन हुआ. हालांकि मन बहुत ही दुखी है...विक्षुब्ध है....हम देश की प्रगति पर गर्व करते हैं...बड़े बड़े मुद्दों पर बहस करते हैं...पर जब अपने देश के इन मासूम-नाजुक बिरवों की ही साज-संभाल नहीं कर सकते फिर क्या फायदा इन सब बातों का.
आज १२ जून है, बाल श्रम निषेध दिवस....पर क्या बदल जायेगा...आज या..आज के बाद
पर जब लंच-टाइम होता है तो स्टेनली चुपचाप बाहर जाने लगता है. और किसी बच्चे के पूछने पर कहता है... मैं कैंटीन से बड़ा पाव लेने जा रहा हूँ. उसके पास टिफिन नहीं होता. वो बाहर के नल से भर-पेट पानी पीकर आ जाता है. एक हिंदी के शिक्षक हैं. 'वर्मा सर' उनकी आदत है..लंच-टाइम में बच्चों की क्लास में ही घूमते रहते हैं..और सबकी टिफिन से कुछ ना कुछ लेकर खाते रहते हैं. लेकिन स्टेनली को देखते ही हिकारत से कहते हैं..'डब्बा तो कभी लाता नहीं.." (मुंबई में लंच-बॉक्स को डब्बा ही कहा जाता है...) अब स्टेनली कहने लगता है...'वो घर जा रहा है...माँ ने गरमागरम खाना बनाया है उसके लिए "
कुछ दिन बाद ही उसके दोस्त ये राज़ जान लेते हैं कि वो घर नहीं जाता, बल्कि सड़कों पर घूम कर वापस आ जाता है. स्टेनली कहता है..उसके मम्मी-पापा प्लेन से शहर के बाहर गए हैं..इसलिए वो डब्बा नहीं ला रहा. एक बड़ा सा चार डब्बे का टिफिन लानेवाला लड़का ऑफर करता है कि जबतक तुम्हारी मम्मी नहीं आ जाती...हम तुम्हारे साथ टिफिन शेयर करेंगे. "लेकिन वो खड़ूस "स्टेनली आशंका जताता है ( टीचर्स के नाम रखने का सदियों से चलता आ रहा, सिलसिला आज भी वैसे ही जारी है ) " और बच्चे रास्ता निकाल लेते हैं कि वो क्लास में रहेंगे ही नहीं. अब शुरू होती है...उन वर्मा सर और बच्चों के बीच आँख मिचौली. रोज ही बच्चे अपने टिफिन खाने का स्थान बदल देते हैं...और वर्मा सर की पकड़ में नहीं आते. एक दिन वर्मा सर उन्हें टेरेस पे पकड़ लेते हैं...पर सारा गुस्सा स्टेनली पर निकलते हैं...कि "उसने डब्बा नहीं लाया...अब नो डब्बा नो स्कूल...अगर डब्बा नहीं लाया तो स्कूल भी नहीं आ सकता"

स्टेनली का स्कूल आना बंद हो जाता है...सारे दोस्त उदास हैं...अब जाकर दर्शकों को पता चलता है कि स्टेनली डब्बा क्यूँ नहीं लाता है. क्यूंकि स्टेनली एक बाल-मजदूर है और शाम से देर रात तक , अपने चाचा के होटल में काम करता है. टेबल साफ़ करता है...लोगो को सर्व करता है...बड़ी-बड़ी कढाई-देगची साफ़ करता है , प्लेटें पोंछ कर रखता है...और सोने से पहले अपने माता-पिता की तस्वीर के आगे मोमबत्ती जला कर उनसे दो बातें करता है,...जो एक एक्सीडेंट में मारे गए थे. इसीलिए स्टेनली की हर कहानी के केंद्र में 'माँ' होती है. पता नहीं कितने दर्शक नोटिस करते हैं....पर फिल्म के पहले ही दृश्य में स्टेनली के चेहरे पर चोट के निशान होते हैं.
होटल में खाना बनाने वाला,अकरम उसका दोस्त है...और वो एक टूटे फूटे टिफिन का जुगाड़ करता है और उसमे होटल का बचा खाना भर कर फ्रिज में रख देता है. अब स्टेनली गर्व से वो टिफिन लेकर स्कूल जाता है..अपने दोस्तों को ...अपने टीचर्स को अपनी टिफिन के स्वादिष्ट व्यंजन खिलाता है..और साथ में रोज एक कहानी भी कि कैसे उसकी माँ, ने सुबह चार बजे उठ कर आलूदम बनाए...पनीर, लाने वो इतनी दूर गयी...आलू लाने दादर गयी क्यूंकि वहाँ आलू सस्ते मिलते हैं...आदि..आदि ..
दर्शकों के मन में सवाल उठ सकते हैं कि स्टेनली एक बाल-मजदूर होते हुए भी इतने अच्छे स्कूल में कैसे पढता है...अच्छी अंग्रेजी कैसे बोल लेता है. यहाँ मुंबई में कई कैथोलिक स्कूल हैं..जिनकी फीस आज भी ५,६ रुपये है....गरीब बच्चों को कॉपी किताब से लेकर स्कूल-ड्रेस...जूते तक स्कूल से मिला करते हैं. और इनकी पढ़ाई का स्तर इतना अच्छा है कि बड़े घर के बच्चे भी इसमें पढ़ते हैं.मेरी कॉलोनी में ही एक स्कूल है जिसमे कामवालियों के बच्चे, ऑटो चलाने वालों के बच्चों के साथ मल्टीनेशनल कम्पनीज के GM...CEO ' के बच्चे भी एक साथ पढ़ते हैं.(इसका जिक्र मैने इस पोस्ट में भी किया था )
इस फिल्म के लेखक -निर्देशक अमोल गुप्ते ने 'तारे जमीन पर' फिल्म की कहानी भी लिखी थी और उसके क्रिएटिव डायरेक्टर भी थे. 'वर्मा सर' के रूप में अमोल गुप्ते ने अच्छा अभिनय किया है..दिव्या दत्ता...राज़ जुत्शी...राहुल सिंह ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है...पर बाल कलाकार स्टेनली की भूमिका में पार्थो ने बहुत ही सहज अभिनय किया है.
पता नहीं..ऐसे कितने स्टेनली हमारे आस-पास हैं और वो फिल्म वाले स्टेनली जैसे भाग्यशाली भी नहीं कि स्कूल जा सकें. ऐसे ही एक स्टेनली का किस्सा डॉ. अमर कुमार जी ने अपने ब्लॉग कुछ तो है...जो कि पर लिखा है. जिसे पढ़कर मुझे इस फिल्म की याद आई...और कुछ लिखने का मन हुआ. हालांकि मन बहुत ही दुखी है...विक्षुब्ध है....हम देश की प्रगति पर गर्व करते हैं...बड़े बड़े मुद्दों पर बहस करते हैं...पर जब अपने देश के इन मासूम-नाजुक बिरवों की ही साज-संभाल नहीं कर सकते फिर क्या फायदा इन सब बातों का.
आज १२ जून है, बाल श्रम निषेध दिवस....पर क्या बदल जायेगा...आज या..आज के बाद
