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सोमवार, 16 जुलाई 2012

आखिर कुछ पुरुषों/लड़कों के अंदर ही एक जानवर क्यूँ निवास करता है...

गुवाहाटी में जो कुछ भी उस शाम एक बच्ची के साथ हुआ...ऐसी घटनाएं साल दो साल में हमारे महान देश के किसी शहर के किसी सड़क पर घटती ही रहती हैं. बड़े जोरो का उबाल आता है...अखबार..टी.वी...फेसबुक..ब्लॉग पर बड़े तीखे शब्दों में इसकी भर्त्सना की जाती है. ऐसे लड़कों को मृत्युदंड देना चाहिए...सरेआम कोड़े लगाने चाहिए...वगैरह वगैरह...फिर सबका ध्यान किसी नेता या अभिनेता से जुड़ी ख़बरों की तरफ मुड जाता है और फिर ये आक्रोश.. ये बहस.. अगली किसी घटना के घटने तक मुल्तवी हो जाती है. ऐसी घटनाओं की पुनरावृति ना हो...ये घटना आखिर क्यूँ घटी..इसकी  जड़ में क्या है..जिसका समूल नाश किया जाए...इन सबपर दिमाग खपाने का शायद समय भी नहीं है, सबके पास और ना ही इसकी जरूरत समझी जाती है.

पर कब तक चलेगा यह सब? आखिर ऐसा लड़कियों के साथ क्यूँ होता है??...ऐसी हरकतें कर के..लड़कों को कौन सा सुख मिल जाता है?
कुछ लोगो की सोच है कि लडकियाँ ही इसकी जिम्मेदार हैं...वे कम कपड़े पहनकर अगर निकलेंगी..तो पुरुषों के अंदर का जानवर तो जागेगा ही. सर्वप्रथम तो यह बिलकुल बेतुकी बात है..(.सलवार कुरते और साड़ी पहने होने के बावजूद रेप की कितनी घटनाएं हुई हैं...इस से कोई अनजान नहीं  ) और उस पर से उस लड़की ने स्कर्ट पहना था.. एक टीशर्ट और उसके ऊपर कार्डिगन भी था. तो क्या लडकियाँ सिर्फ सलवार कुरते या बुर्के में ही घूमें? और ऎसी  ही स्कर्ट पहनकर अगर किसी पुरुष के मित्र या रिश्तेदार की बेटी उसके सामने आती है तो उसके अंदर का जानवर क्यूँ नहीं जागता ? उस अंदर के जानवर को पता है...अगर यहाँ वो जाग गया तो उस जानवर के पालक  की खैर नहीं. यानि कि किसी भी पुरुष के अंदर का जानवर उसके इशारे पर सोता और जागता है. उन बीस लड़कों में से क्या किसी ने कभी किसी और लड़की को स्कर्ट पहने नहीं देखा था? और जब देखा था तो फिर उस वक़्त उसके अंदर का जानवर सोया क्यूँ रहा? 

गाँवों में स्त्री-पुरुष मिलकर खेतों में काम करते हैं. घुटनों तक साड़ियाँ  उठा कर लडकियाँ/औरतें धान की रोपनी करती हैं...घास छीलती हैं... आस-पास पुरुष भी होते हैं..उनके अंदर का जानवर तो नहीं जागता. ऐसे ही आदिवासी महिलाएँ तो एक ही साड़ी से अपना तन ढंकती हैं. जंगलों में घूमती हैं...उनके समुदाय के पुरुषों के अंदर का जानवर भी सोया ही रहता  है. महानगरों में भी... खासकर मुंबई में, सड़कों पर लडकियाँ..स्कर्ट और शौर्ट्स में सरेआम घूमती दिखती हैं...यहाँ के पुरुषों के अंदर का जानवर भी निद्रा में लिप्त रहता है तो क्या बात है कि सिर्फ कुछ पुरुषों के अंदर का जानवर ही मौका देखकर जाग जाता है या यूँ कहना सही होगा कि सिर्फ उनके  अंदर ही कोई जानवर सांस लेता है .

 इसका सिर्फ एक ही कारण नज़र आता है कि ये लोग लड़कियों को एक इंसान.. एक अलग अस्तित्व की तरह नहीं बल्कि एक शिकार की तरह देखते हैं. क्यूंकि लडकियाँ उनके लिए अजूबा बनी रहती हैं. बचपन से ही ना उन्हें लड़कियों के साथ  खेलने का मौका मिलता है...ना ही पढ़ने का...ना बातचीत करने का...ना ही मिलने-जुलने का. लड़कियों से इनका interaction...  मेलजोल एक रिश्ते में बंधा हुआ ही होता है. माँ..बहन..पत्नी..भाभी...दोस्त की पत्नी..और उनके प्रति उनका व्यवहार भी एक दायरे में  निश्चित होता है. ऐसे लोगों को जब एक अजनबी लड़की मिलती है तो इन्हें पता ही नहीं होता..उसके साथ कैसा व्यवहार करना है?? और यहीं से eve  teasing  यानि छेड़छाड़  की शुरुआत  हो जाती है. चलते समय धक्का मार देना...बस में चढ़ते-उतरते..टकरा जाना...मौका मिलते ही हाथों पर हाथ रख देना...फब्तियां कसना...इन्हें अजनबी लड़कियों के साथ बस ऐसा ही व्यवहार करना आता है.

अगर बचपन से ही ये सह शिक्षा वाले स्कूल में पढ़ें तो ऐसे व्यवहारों पर काफी हद तक रोक लग सकती है. वहाँ लड़के-लडकियाँ साथ में पढेंगे..खेलेंगे..कूदेंगे...स्कूल के वार्षिक प्रोग्राम में भाग  लेंगे. तो जाने-अनजाने कितनी ही बार इनके हाथ भी टकरायेंगे..एक-दूसरे से धक्का भी लगेगा...और ऐसे लड़कों को पता चल जाएगा..कि मात्र टकरा जाने से या धक्का मार देने से मन या शरीर के तार झनझना नहीं उठते. उनके बीच बातचीत होगी तो लड़के/लड़कियों दोनों को ही ये आभास होगा कि वे दोनों किसी अलग ग्रह के वासी नहीं हैं...बल्कि उनकी सोच.. चीज़ों को देखने का नजरिया ..एक जैसा  ही है. इस से एक दूसरे के प्रति आदर की भावना भी उत्पन्न होगी. और जब लड़कों के मन में ..लड़कियों के लिए आदर...अपनापन की भावना होगी तो फिर ये eve  teasing  और जिसकी परकाष्ठा लड़कियों के कपड़े फाड़ने जैसी घटाओं के साथ होती है..वे नगण्य हो जायेंगी.

आज  जब लडकियाँ ..उच्च  शिक्षा हासिल करने लगी हैं...ऑफिस में काम करने लगी हैं...अपने सहपाठियों के साथ मिलकर पार्टी करने लगी हैं तो बहुत जरूरी है कि पूरे समाज में ही ज्यादा से ज्यादा लड़के-लड़कियों को आपस में मिलने-जुलने का अवसर दिया जाए. और ये अवसर सह-शिक्षा को बढ़ावा देकर ही संभव है. कालांतर में भी इस से दोनों ही पक्षों को बहुत मदद मिलेगी  आपस में बिना किसी हिचकिचाहट के मिल कर काम कर सकेंगे..अपनी राय रख सकेंगे...एक दूसरे की समस्याएं समझ सकेंगे. 

सह-शिक्षा में थोड़ी बहुत अनचाही घटनाएं भी घट सकती हैं. किशोर होते लड़के/लड़कियों का एक दूसरे के प्रति सहज आकर्षण. पर यह तो बिना को-एड स्कूल में पढ़े भी संभव है. मोहल्ले में...कॉलोनी में भी इतने बंधन के बावजूद प्रेम-कथाएं परवान चढ़ती रहती हैं. वैसे ही  को-एड स्कूल में भी इक्का-दुक्का घटनाएं ही ऐसी होती हैं. ऐसा नहीं होता कि को-एड स्कूल के सारे लड़के-लड़की एक दूसरे के प्रेम में पड़ जाते हैं. बल्कि एक दूसरे के प्रति दोस्ताना भाव ज्यादा रहता है. 

अगर गुवाहाटी में घटी , इस तरह की घटनाओं से डरकर लड़कियों को घर में बंद किया जाने लगा...उनके बाहर जाने पर रोक लगाया जाने लगा  तो फिर इस तरह की घटनाएं होती ही रहेंगी. क्यूंकि जितना ही लोग..लड़कियों को आजादी से घूमते देखने के आदी होंगे..उतना ही उनके लिए स्वीकार करना आसान होगा. यहाँ मुंबई में ज्यादातर ऑटो रिक्शा वाले....सिक्योरिटी गार्ड बिहार..यू.पी...असाम..नेपाल  के ही हैं. पर उनके सामने से शौर्ट्स..मिनी स्कर्ट में लडकियाँ गुजरती रहती हैं...पर वे  वे आँख उठा कर भी नहीं देखते..क्यूंकि वे आदी हो चुके हैं...उन्हें कुछ अलग सा नहीं लगता. बाजारों में..सडकों पर भी  लड़कियों/औरतों को धक्के नही मारे जाते हैं...क्यूंकि वहाँ घूमती स्त्रियों/लड़कियों  का प्रतिशत पुरुषों/लड़कों के बराबर ही होता है. पर यही बात सभी शहरों के लिए नहीं कही जा सकती जो बहुत ही दुखद है. 

अगर गाँव में खेतों में काम करने वाली लडकियाँ...जंगलों में घूमती आदिवासी लडकियाँ....महानगरों में बस-ट्रेन-बाजार से गुजरती लडकियाँ इस  eve teasing  की शिकार नहीं होतीं...तो फिर बाकी जगहों की लड़कियों ने क्या गुनाह किए हैं कि उन्हें ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ता है.




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