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रविवार, 24 मार्च 2013

रचना आभा को आंसू न आने की टेंशन और नयी भाषा से जूझती रंजू भाटिया

( पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा  लावण्या  शाह जी द्वारा भेजा गया उनके माता-पिता का प्यारा सा संस्मरण ...इस पोस्ट में दो कवियत्रियों की रोचक यादें  )


रचना आभा : कभी तो बेबात चले आते हैं आंसू और कभी उनके न आने की चिंता 

तो पेश-ए -ख़िदमत है मेरी शादी के बाद की रोचक घटना , जिसे मैं और मेरे ससुराल वाले आज भी हंस -हंसकर याद करते हैं ! इस से पहले मैं यह बताना चाहूंगी कि मेरा जन्म और परवरिश पूर्णतः दिल्ली की है , अतः मैं इस घटना में पूर्ण रूपेण  निर्दोष हूँ  :)
         हुआ यूँ, कि शादी के कुछ ही महीने बाद मेरी दादी सास, जोकि पूरे परिवार की धुरी और आँखों का तारा  थीं, चल बसीं ! तो हमें गाँव ( उ o प्र o ) जाना हुआ !  रास्ते  भर मैं यही सोचती गयी कि मैं तो अभी तक उनसे ठीक से जुडी भी नही थी भावनात्मक तौर पर, क्योंकि मैं शादी के बाद कुछ दिन गाँव में बिताकर ही दिल्ली आ गयी थी, पति के साथ ! अत: मेरी टेंशन यह थी कि  मैं दुखी कैसे दिखा पाऊँगी सबको , हालाँकि थोडा बहुत दुःख तो  पति के दुःख से था ही , पर उतना नही था, जितना मैं चाहती थी ! 
खैर, यही सोचते-सोचते गाँव पहुंचे , तो मातम का माहौल था ! स्त्रियाँ अलग कमरे में थीं, सो में भी उनके पास जाकर बैठ गयी ! सभी परिवारवालों की आँखों में आंसू थे, सिवाय मेरे ( उस दिन मुझे पहली बार घूँघट प्रथा अच्छी लगी)  मेरी ननद ने मुझे इशारे से कहा -'मिलो' ! अब मुझे समझ न आये  कि  सबको तो नमस्ते करली , फिर कैसे मिलूँ ! शायद पैर छूने  को कह रही हो , जो कि  मैं हमेशा छूती  थी, पर उस दिन बैठे होने के कारण नजर ही नही आ रहे थे, इसलिए नही छुए थे ! मैंने उस से इशारे में पैर छूने का पूछा  , तो वो फिर आँख दिखाकर धीरे से बोली -"मिलो" !  मैं हैरान परेशान  ! एक तो पहले से ही थी, उस पर ये पहेली ! खैर, अपनी समझ से मैं बुआ जी के पास चली गयी , के शायद वो कुछ एक्शन लें मुझे देखकर, और मुझे "मिलने' का मतलब समझ में आये , और उसी तरह मैं बाकियों से 'मिल लूँ ' !

मैं जैसे ही उनके पास पहुंची, वे मुझे कसकर  गले से लगाकर रोने लगीं (पहले से भी जोर से ) और एक आलाप सा करने लगीं …… 'अरी  बीबी .....हमारी नीतू की तो शादी करा जाती ........'
  मैंने ध्यान दिया कि  जो भी कोई नई महिला उस कमरे में आती थी, वो कुछ ऐसा ही आलाप करती थी , और धुन सबकी same थी, शब्द चाहे अलग हों (जोकि अस्पष्ट थे, पर इतना समझ आ रहा था, की भगवान  से शिकायत की जा रही है, कि दादी के जाने से हमारा फलां काम रुक गया )

    अब मुझे थोडा थोडा समझ आने लगा के शायद गले मिलकर कुछ इस तरह का आलाप करने  को 'मिलना' कहते हैं , और अब यह  चिंता मुझे खाने लगी, कि  मेरी बारी आने पर मैं क्या आलाप करूँगी , क्योंकि मुझे तो सच में समझ नहीं आ रहा था कि मुझे उनसे कौन सा काम करवाना था ! फिर भी कन्फर्म करना जरूरी था  ! आखिर नई नई  बहू बनी थी, कुछ गलती नहीं करना चाहती थी ! तभी मेरी जेठानी  उठकर वहाँ से गयीं और मानो  मेरी जान में जान आई कि कोई तो मिला, जिस से पूछ सकूं अकेले में ! मैं उनके पीछे-पीछे दूसरे  कमरे में गयी , और उन्हें अकेला पाते ही पूछ बैठी ' भाभी , एक बात बताओ ! ये गाना क्या सबको गाना जरूरी होता है ? " 
    " कौन सा गाना ?" उन्होंने उदास स्वर में  पूछा  ! 
   "यही, जो सब गा  रहीं हैं, कि  "बीबी …ये करा जाती, हमारा वो करा जाती ....."
    
अचानक वो इतनी बुरी तरह ठहाका मारकर हंसीं , कि मैं घबरा गयी, अब कोई पूछने न आ जाये कि क्या हुआ , और मेरी समझदारी का राज़ खुल जाये ! मैं उनका ताक़  ही रही थी, कि वही  हुआ, जिसका डर था !! 
    घर की कुछ औरतें , जो शायद रोने से थक चुकीं थीं, या शायद हैरान होकर वहाँ आ गयीं, ऐसे गमगीन माहौल में ठहाके की आवाज़ सुनकर ! 
   और बस जी ! फिर तो आप सोच ही सकते हैं, कि क्या हुआ होगा !! 
  बस , इतनी मेहरबानी जरुर हुई कि उम्मीद के मुताबिक मुझे डांट नही पड़ी, पर जिसके कानो में भी यह बात पहुंची , वह हंसे बिना रह न सका ! 
    आज भी मुझे चिढ़ाने के लिए उस घटना को सहेज कर रखा हुआ है ससुराल वालों ने :))
        

रंजू भाटिया :  'जा धा घिन'...कोई डांस स्टेप ??

सिल्वर ग्लास में पानी ....पढ़ के ही हंसी आ गयी ...लड़की के जीवन का सबसे अहम् पहलु होता है शादी के बाद दूसरे घर जाना ...सब कुछ बदला हुआ ....रहन सहन ..खान पान ..बोलना ..सुबह शाम की बदली हुई सूरते ,दिल दिमाग के पेच ढीले कर देती है .....कैसे सबको जाने ,कोई क्या कह कह रहा है सब कुछ समझना आसान बात नहीं ...आज रश्मि ने जब यह सब लिखने को कहा  तो बरबस ही कई वाक्यात याद  गए ...होली का मौका है ,चलिए हंस लेते हैं इसी बहाने ...

अस्सी के दशक में कालेज होते होते ही शादी की बात शुरू हो जाती थी ...लड़की को भी पता होता था कि  अब शादी ही होगी ...आगे पढ़ाई के लिए कुछ कहने का मतलब एक लम्बा सा लेक्चर सुनना होता था अमूनन और घर में आप सबसे बड़े हो तो बेटा कोई चांस नहीं आपका कि  आप शादी से बच जाओ .:).हो सकता है सबके साथ ऐसा न हो पर  मेरे साथ यही हुआ ....और कोई मजेदार घटना शादी के बाद हो घटे यह कोई जरुरी नहीं  ..देखने ,दिखाने के दौरान भी किस्से याद रह रह जाते हैं ...:)
महज उन्नीस साल की उम्र ..और बिंदास एक काली पेंट और चेक शर्ट में हमेशा रहने की आदत थी ...जो घर उस वक़्त जम्मू में था वहां सामने आंगन में बहुत से पेड़ लगे थे ...अमरुद ,नीम्बू आदि के ..और अमरुद के पेड़ पर चढ़ कर अमरुद तोड़ना मेरा प्रिय शगल ...ससुराल वाले एक दो बार पहले देख गए थे ...और भी एक दो लोग अभी  देखेंगे ऐसा कह कर अभी जवाब का अभी इंतजार था  जब देखने आयेंगे तो बता कर ही आयेंगे ..यह सोच कर सब आराम से थे घर में ..सो  मैं भी बेफिक्री से घुटने तक पेंट चढ़ा कर और शर्ट के बाजू तान कर ऐसी ही एक शाम को मजे से पेड़ से अमरुद तोडती गेट पर अपनी पड़ोस की सहेली के साथ झूल रही थी ..कि  एक बुजुर्ग सी थोड़ी मोटी सी   महिला ऑटो से उतरीं ... और गेट पर पूछा कि भाटिया साहब का घर यही है ..हां हाँ यही है ..अन्दर चले जाओ वहीँ मिल जायेंगे ....आपको और उनके अन्दर जाते ही ...मेरे मुहं से निकला कि कितनी मोटी है न यह ....तभी अन्दर से छोटी बहन भाग कर आई कि मम्मी गुस्सा हो रही है .कैसे बाहर  घूम रही है ..अन्दर तेरी होने वाली नानी सास आई है ..मरे अब तो ...जल्दी से सूट चुन्नी ओढ़ कर ...कमरे में गयी .पर उस वक़्त नानी सास का घूरना  भूल नहीं पायी ...उन्होंने वह मोटी शब्द सुना ..या नहीं यह तो ससुराल जा कर ही पता चला :) 

और फिर शादी के बाद यहाँ आते ही जो बदलाव आया वह था भाषा का ..माहोल का ....वहां मेस पार्टी और आर्मी माहोल यहाँ उस से एक दम अलग ....और वहां बोलते थे हम ज्यादातर हिन्दी  ..यहाँ मुल्तानी ,पंजाबी के सिवा कुछ बोला नहीं जाता था | हाँ ससुराल में दो ननदे और मम्मी पापा थे | पर माहौल बिल्कुल ही अलग था | मायके में जो दिल में आता था वही किया ..खाना बनाना आता था ,पर उतना ही जितना जरुरी था ..बहुत आजादी वहां भी नही थी .पर यह समझ में आ गया था कि अब यहाँ कोई शैतानी नही की जा सकती है ...क्यूंकि यहाँ का माहौल बहुत डरा हुआ सा और सहमा हुआ सा लगा ...शायद यही फर्क होता है ससुराल और मायके का :) 
नवम्बर में शादी हुई  थी .हुक्म हुआ सुबह जल्दी उठ जाना .रस्मे है कोई .और  अगले दिन सासू माँ बोली कि  ""जा धा घिन''...."जी "मम्मी  जी कह कर मैं दूसरे कमरे में चली गयी ....उन्होंने फ़िर मुझे यूँ ही खडे देखा तो फ़िर बोली रंजना "धा घिन ....क्यों  खलोती हैं [ क्यों खड़ी हुई है इस तरह ][कुछ इसी तरह का वाक्य ] मुझे आज तक नही आई यह भाषा :) हैरान परेशान क्या करूँ  ....मेरा मासूम दिल समझ रहा था कि वह कुछ "था घिन घिन" कह रहीं हैं ....शायद वह किसी तरह के डांस की कोई रस्म से तो जुडा नही है ....बाबा रे !! यह शादी की रस्मे क्या मुसीबत है यह .सुबह सुबह डांस ..वो भी सबके सामने ..क्या करूँ अब ...कैसे करूँ ...उसी वक़्त .....ईश्वर ने साथ दिया राजीव [मेरे पति देव ] सामने दिखे ....अब  नई नवेली बहू अब पति को कैसे बुलाए .....आँखों में पानी ....कि करूँ तो क्या करूँ ....तभी यह अन्दर आए तो मेरी जान में जान आई ..पूछा कि  क्या करना है इस "धा घिन का ".....पहले देखते रहे और फ़िर जोर से हंस के बोले कि"इस का कुछ नही करना जा कर नहा लो" ...तौबा !! तो इसका यह मतलब था ...तो तुम क्या समझी ...पूछने पर मैंने बताया तो जनाब ने हँसते हुए यह खबर पूरे घर में फैला दी ....नानी सास ने भी मौका देख कर "मोटी "कहने वाली बात औरउस वक़्त के बिंदास हुलिए की  कहानी सुना दी :).... और शर्म से जो गाल लाल हुए वो होली के रंग को भी मात कर दे :)
 
भाषा तो आज भी नहीं बोली जाती मुझसे यह ..पर अब समझ आ जाती है ...कि क्या कहा जा रहा है ...इसी तरह नमकदानी को "नुनकी चुक लायी बारी विचो " बहुत समय बाद समझ आया था कि नमकदानी ले आ अलमारी से ...इस तरह याद करूँ तो भाषा से जुड़े तो कई किस्से याद आ जाते हैं और भी बाते नमक सी नमकीन और हलुए सी मीठी भी ...पर मीठी बाते ही याद रहे तो अच्छा है वही बाते ज़िन्दगी मैं आज भी मुस्कान भर जाती है ...रश्मि का शुक्रिया जो फिर से इन्हें याद दिलाया 

(रचना और रंजू आपका बहुत बहुत शुक्रिया हमसे इतनी रोचक यादें साझा करने का....अगली पोस्ट में दो और प्यारे से संस्मरण  )

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